दुनिया का कब और क्यों।
जनवरी 1903, में गोल्डेन गेट हाल, सैन फ्रांसिस्को में दिया हुआ एक व्याख्यान।
महिलाओं और सज्जनों के रूप में हे माया के शासक, हाकिम और नियामक स्वरूप!
आज के व्याख्यान का विषय माया है। यह वह विषय है जिसे ऊपरी या मोटी दृष्टि वाले समालोचक वेदान्त दर्शन का अत्यन्त निर्बल स्थल समझते हैं। आज हम अत्यन्त दुर्बल अंश को उठावेंगे। जिन विचार वानों और दार्शनिकों ने वेदान्त दर्शन का अध्ययन किया है, वे सब एकमत से कहते हैं कि यदि इस माया का स्पष्टीकरण हो सके तो वेदान्त की और सब बातें मान्य होंगी। वेदान्त की अन्य हरेक बात अत्यन्त स्वाभाविक, स्पष्ट, स्वच्छ, हितकर और उपयोगी है। वेदान्त के विद्यार्थियों के रास्ते में यह एक अटक, एक गिरानेवाली रोक है। यह एक बहुत बड़ा विषय है। इस की पूर्ण विवेचना के लिये केवल इसी विषय पर दस व्याख्यान होने चाहिये और तब कहीं विषय इतने स्पष्ट और सरल रूप में उपस्थित किया जा सकता है कि सूर्य तले वा पृथ्वी परका और किसी तरह का भी सन्देह,या प्रश्न वे उत्तर न रह जाय। हरेक बात साफ़ की जा सकती है,
परन्तु उस के लिये समय चाहिये। जल्दबाज पाठकों और जल्दबाज श्रोता गणों द्वारा उस के पूरी तरह समझे जाने की आशा नहीं की जा सकती।
प्रश्न है, 'यह दुनिया क्यों हुई, यह दुनिया कहां से हुई?' अथवा वेदान्त की भाषा में यों कह सकते हैं, 'विश्व में यह अविद्या क्यों?' आप जानते हैं कि वेदान्त कहता है कि यह विश्व असत्य है। केवल देखने मात्र वा व्यापार मात्र है। अविद्या नित्य नहीं है। ये सब दृश्य (व्यापार) सत्य या नित्य नहीं हैं। प्रश्न उठता है, "यह अविद्या ही क्यों है?" यह अविद्या जो इस दृश्य (व्यापार) का कारण है, अथवा यह माया जो इस सम्पूर्ण में और तुम रूपी भेद और भेद करण के मूल में है, यह अविद्या शुद्ध स्वरूप या आत्मा पर क्यों काबू जमा ले? यह माया या अविद्या परमेश्वर से अधिक शक्तिशालिनी क्यों हो?.
साधारण भाषा में, अन्य दार्शनिकों और ब्रह्म विद्या के जानने वालों की भाषा में प्रश्न है, "इस संसार का अस्तित्व ही क्यों है?" "परमेश्वर ने इस संसार को क्यों रचा?" वेदान्त कहता है, "नहीं, भाई! तुम्हें यह प्रश्न करने का कोई अधिकार नहीं है। इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है।" वेदान्त साफ़ साफ़ कहता है कि इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं है। वह कहता है कि निज अनुभव से (वा परीक्षणार्थ) और प्रत्यक्ष रीति से सिद्ध करके हम तुम्हें दिखा सकते हैं कि यह संसार जो तुम देखते हो वास्तव में परमेश्वर के सिवाय और कुछ नहीं है, और अनुभव द्वारा निर्विवाद रूप से हम तुम्हें दिखा सकते हैं कि सत्य की उपलब्धि में जब तुम यथेष्ट ऊंचे चढ़ते हो तब यह दुनिया तुम्हारे लिये
गायब होजाती है। किन्तु इस दुनिया का अस्तित्व ही क्यों है! इस प्रश्न का उत्तर देने से हम विरत रहते हैं। यह प्रश्न करने का तुम्हें कोई अधिकार नहीं है। इस प्रश्न का उत्तर देने में वेदान्त अपनी असमर्थता स्पष्टतया स्वी- कार करता है, और यहीं पर अन्य सब ब्रह्मवादी, अन्य मतावलम्बी और सब मोटी दृष्टि वाले दार्शनिक आगे आते और कहते हैं, "अरे, अरे, वेदान्त-दर्शन अपूर्ण है, वह संसार का क्यों और कहां से, नहीं बतला सकता। वेदान्त कहता है, "भाई, इस प्रश्न (संसार का क्यों और कहां से) जो उत्तर तुम स्वयं देते हो उन की जांच करो,सावधानी से उनकी जांच करो और तुम देखोगे कि तुम्हारे जवाब कोई जवाब ही नहीं हैं। इस प्रश्न पर विचार करना बिलकुल समय नष्ट करना है,निरानिर समय और श्रम का अपव्यय है। यह काम काफ़ी की दो चिड़ियों की खोज में अपने हाथ की चिड़िया को छोड़ देने के समान है। उन चिड़ियों तक पहुँचने के पहले वे उड़ जांयगी और तुम अपने हाथ की चिड़िया खो दोगे। वह भी उड़ जायगी। वेदान्त कहता है कि सम्पूर्ण तत्वज्ञान और सम्पूर्ण विज्ञान की गति ज्ञात से अज्ञात को होनी चाहिये। घोड़े के आगे गाड़ी को न रक्खो। अज्ञात से आरम्भ करके ज्ञात पर न आओ।
एक नदी बह रही थी, जिस के तट पर कुछ लोग खड़े हुए थे और उसके उद्भव के सम्बन्ध में युक्ति पूर्वक विचार कर रहे थे। उन में से एक ने कहा, "यह नदी शिलाओं, चट्टानों, पहाड़ियों से आती है। पहाड़ियों से जल उमड़ कर सोता बनता है, और वह नदी का कारण है।" दूसरे मनुष्य ने कहा, "अरे, नहीं, यह असम्भव है। पत्थर इतने
कठोर, इतने कठिन और इतने दृढ़ हैं और जल इतना सरल तथा कोमल है। कड़े पत्थरों से मुलायम जल कैसे निकल सकता है? असंभव। असंभव! बुद्धि नहीं मान सकती कि कड़े पत्थर मुलायम पानी को बाहर निकाल रहे हैं। यदि पत्थर पानी देसकें तो मैं पत्थर का यह टुकड़ा उठाता हूं और इसे निचोड़ता हूं। इस से तो बिलकुल पानी नहीं बहता। इस प्रकार यह कथन निराधार है कि नदी बन पहाड़ों से निकली है। मैं एक अच्छी युक्ति (theory) बताता हूं। कहीं कोई दीर्घकाय पहलवान है. उसी के पसीने से यह नदी बहती है। हम नित्य देखते हैं कि जब कोई मनुष्य पसीजता है, तब उस के शरीर से पानी बहता है। यहां पानी बह रहा है। अवश्य ही यह किसी व्यक्ति के शरीर से निकला है जो पसीज रहा है। यह युक्तिसंगत है। हमारी बुद्धियां इसे स्वीकार कर सकती हैं। यह बात यथार्थ सी जान पड़ती है, यह बिलकुल ठीक है।" दूसरे मनुष्य ने कहा, "नहीं, नहीं, कोई व्यक्ति कहीं खड़ा हुआ थूक रहा है और यह थूक है।" दूसरे मनुष्य ने कहा, "नहीं, नहीं।"
अब इन लोगों ने कहा, "इधर देखो, उधर देखो, हम लोगों की ये सब कल्पनाएँ साध्य (feasible) हैं, पानी के मूल की ये सब युक्तियां अमली हैं। प्रत्येक दिन हम ऐसी बातें देखते हैं। नदी के मूल के सम्बन्ध में ये सब कल्पनाएँ बहुत ही यथार्थ सी हैं, उत्तम और महान् ज्ञान पड़ती हैं, किन्तु पत्थरों से जल बहने की युक्ति को, बस मनुष्य की साधारण बुद्धि कभी न मानेगी कि जिस ने पत्थरों से जल उमड़ते कभी नहीं देखा है, जो पहाड़ों पर कभी नहीं गया
है, यद्यपि है यह सत्य।" और इस युक्ति की सत्यता का आधार क्या है? अनुभव, निज परीक्षा, प्रत्यक्ष अवलोकन।
इसी प्रकार, दुनिया के मूल, इस संसार के 'क्यों और कहां से को' इस संसार की धारा के सोते, जीवन की नदी को विभिन्न लोग भिन्न प्रकार से वर्णन करते हैं। उस प्रकार की बुद्धि के लोगों के अनुसार, कि जिन्हों ने नदी का मूल-सोत थूक और पसीना बताया था, दुनिया के मूल की भी व्याख्या बहुत कुछ वैसी ही होती है। वे कहते हैं' "यह एक मनुष्य है जो जूते बनाता है, जूते बिना किसी मनुष्य के बनाने के इरादे या नकशे के नहीं बन सकते थे। यह एक मनुष्य घड़ी बनाता है। यदि कोई मनुष्य घड़ी बनाने का इरादा और तरकीब न करता घड़ी नहीं बन सकती थी। यह एक मकान है। बिना किसी मनुष्य के नक्शा और ढांचा तैयार किये मकान नहीं बन सकता था। प्रति दिन वे यह देखते हैं और तब वे कहते हैं, 'यह संसार है। चमार, घड़ीसाज़, मेहमार सरीखा कोई मनुष्य हुए बिना दुनिया नहीं बन सकती थी, और इस लिये दुनिया का बनाने वाला एक कोई होना ज़रूरी है, जो इस संसार को बनाता है, और इस प्रकार वे कहते हैं कि एक साकार (व्यक्तिगत) परमेश्वर है, जो मेघों पर खड़ा है। बिचारे पर रहम भी नहीं खाते कि कहीं उसे सर्दी न हो जाय। उन का कहना है कि किसी साकार परमेश्वर ने अवश्य दुनिया की रचना की होगी।"
उन का तर्क बहुत यथार्थ सा, युक्तिसंगत और उसी प्रकार का जान पड़ता है, जिस प्रकार की उन लोगों की दलीलें कि जिन्हों ने कहा था कि नदी किसी के पसीने से
बहती है। दुनिया भी किसी मनुष्य द्वारा ज़रूर ही बनाई गई होगी।
वेदान्त इस तरह की कोई युक्ति नहीं पेश करता। वेदान्त कहता है, देखो, इसे अनुभव करो, इसे विचार से देखो, प्रत्यक्ष अनुभव से तुम देखोगे कि दुनिया जो कुछ दिखाई देती है वह नहीं है। यह कैसे? वेदान्त कहता है, यहां तक तो मैं तुम्हें समझा सकता हूं कि पानी उन पत्थरों से बाहर निकल रहा है। पत्थरों से पानी कैसे निकलता है, यह चाहे मैं तुम्हें न बता सकूं, परन्तु मैं जानता हूं कि पानी पत्थरों से आता है। मेरे साथ उस स्थान तक चलो और तुम पत्थरों से पानी उमड़ते देखोगे। यदि मैं यह नहीं बता सकता कि पानी पत्थरों से क्यों निकलता है तो मुझे दोष न दो, दोष लगाओ पानी को, वह पत्थरों से निकल रहा है।
इसी भांति वेदान्त कहता है, मैं चाहे तुम्हें बता सकूं या नहीं कि यह माया या अविद्या क्यों है, किन्तु माया का होना है एक तथ्य। वह क्यों आई, मैं तुम्हें शायद न बता सकूं। यह एक तथ्य है, अनुभव सिद्ध तथ्य है। वेदान्तिक ढंग निरानिर वैज्ञानिक और अनुभव सिद्ध (अनुभवलब्ध) है। वह कोई असिद्ध अनुमान (hypothesis) नहीं स्था- पित करता, कोई कल्पना (theory) नहीं पेश करता है। संसार के भूल को समझाने की योग्यता का वह दावा नहीं करता। धारणा या बुद्धि के प्रदेश से परे की यह बात है। यह है वेदान्त का पक्ष। यह माया कहलाती है। दुनिया क्यों प्रकट होती है? वेदान्त कहता है, क्योंकि तुम उसे देखते हो। संसार (वहां) क्यों है! वेदान्त केवल कहता है,
चूंकि तुम उसे देखते हो। तुम नहीं देखते हो, (वहां) तो दुनिया नहीं है। कैसे तुम जानते हो कि दुनिया (वहां) है? क्यों कि तुम उसे देखते हो। न देखो, तो दुनिया कहां है? अपनी आंखें बन्द कर लो, दुनिया का पांचवां हिस्सा चला गया, दुनिया का वह अंश, जिसे तुम अपने नेत्रों के द्वारा बोध करते हो अब नहीं रह गया। अपने कान बन्द करो और पांचवां हिस्सा और चला गया। अपनी नाक बन्द करो और दूसरा पांचवां हिस्सा लुप्त। अपनी किसी इन्द्रिय से काम न लो तो कहीं कोई दुनिया नहीं। तुम दुनिया देखते हो, और तुम्हें समझाना चाहिये कि दुनिया (वहां) क्यों है। तुम उसे (वहां) बनाते हो। तुम्हें स्वयं उत्तर देना चाहिये। तुम मुझ से क्यों प्रश्न करते हो। तुम वहां दुनिया की रचना करते हो। (फिर मेरे से प्रश्न कैसा?)।
एक बच्चा था। उसने दर्पण में एक छोटे लड़के की प्रतिमा, अर्थात् स्वयं अपनी प्रतिमा देखी। किसी ने बच्चे से कहा कि शीशे में एक बहुत ही सुन्दर, प्रिय छोटा बच्चा है, और उसने शीशे में देखा-तो उसे एक प्यारा नन्हा लड़का दिखाई दिया। किन्तु बच्चा यह नहीं जानता था कि यह स्वयं उसका प्रतिबिम्ब है। इसने प्रतिबिम्ब को शीशे के अन्दर एक अद्भुत लड़का समझा। बाद को बच्चे की मां ने उसे समझाना चाहा,कि शीशे के अन्दर का लड़का उसी का प्रतिबिम्ब मात्र है, असली लड़का नहीं है, किन्तु बच्चे को विश्वास न हुआ। वह नहीं समझ सका कि दर्पण में वस्तुतः दूसरा बालक नहीं है। जब माता ने कहा, "इधर देखो, यह एक शीशा है, इसमें कोई लड़का नहीं है," तब
बच्चे ने वहाँ पहुँच कर कहा, "हे मां, हे मां, यह क्या लड़का है,"। जब लड़का कह रहा था, 'यह लड़का है' तब 'यह लड़का है' कहते ही समय उसने अपना प्रतिबिम्ब शीशेमें डाला। माता ने फिर उसे समझाना चाहा कि शीशे में सच्चा लड़का नहीं है। लड़के ने फिर प्रमाण या साधन मांगा। लड़का दर्पण के पास गया और बोला, "यह देखो, यह लड़का है।" शीशे में कोई वस्तु नहीं है, यह सिद्ध करने ही के कार्य में लड़के ने शीशे में वस्तु रखदी।
इसी तरह अब तुम आकर कहते हो, "दुनिया क्यों हुई, दुनिया कहाँ से हुई, दुनिया कैसे हुई," जिस क्षण तुम दुनिया के मूल और दुनिया की उत्पत्ति के कारण और स्थल का अनुसन्धान करने लगते हो, उसी क्षण तुम दुनिया की वहां सृष्टि कर देते हो। इस प्रकार कैसे तुम दुनिया का मूल और उत्पत्ति-स्थान जान सकते हो? हम कैसे उसका मूल जान सकते हैं? हमें उससे परे का ज्ञान कैसे हो सकता है? हम कैसे उसका अतिक्रमण कर सकते हैं? यह और भी स्पष्ट होजाना चाहिये, लौकिक और आध्यात्मिक दोनों पहलुओं से। कुछ कहते हैं कि जगदीश्वर ने जगत् को रचा है और वह सृष्टा कहीं अलग खड़ा हुआ है। यदि वे एक घर देखते हैं तो उन्हें विदित होता है कि किसी ने उसे बनाया था। इस लिये वे कहते हैं कि यह दुनिया किसी व्यक्ति के द्वारा रची गई थी। अब प्रश्न यह है कि दुनिया की सृष्टि करने के लिये यह सृष्टि कर्त्ता कहीं खड़ा अवश्य हुआ होगा। वह कहां खड़ा हुआ था? यदि वह कहीं खड़ा हुआ था, यदि, उसके ठहरने के लिये कोई जगह थी, तो दुनिया उसकी सृष्टि होने से पहले ही से मौजूद थी, क्योंकि
ठहरने की जगह कहीं दुनिया में अवश्य होगी। दुनिया अपनी रचना होने से पहले ही से मौजूद थी। जव तुम जाँच करने लगते हो कि दुनिया का प्रारम्भ कव हुआ, तव तुम दो कल्पनाओं को पृथक करना चाहते हो—कव, कैसे और कहां से की कल्पना को एक ओर, और दुनिया की कल्पना को दूसरी ओर। किन्तु "क्या, कव, और कहाँ से" ये शब्द, "काल, कारण (वस्तु) और देश" की कल्पनाएँ क्या दुनिया का एक हिस्सा नहीं हैं? अवश्य हैं। और अव आप ध्यान दीजिये, आप समग्र संसार का 'मूल', 'क्यों' और 'कहां-से' जानना चाहते हैं। काल, देश, और कारण भी दुनिया में हैं, दुनिया से परे नहीं हैं। ज्यों ही तुम कहना शुरू करते हो कि दुनिया कव शुरू हुई, उसी क्षण दुनिया एक ओर हो जाती है और 'कव' की कल्पना दूसरी ओर। तव तुम दुनिया को दुनिया ही से पहले रख देते हो। यह विषय वहुत ही सूक्ष्म और वहुत ही कठिन है, और आप कृपया वहुत ध्यान देकर, अत्यन्त सावधानी से सुनें।
दुनिया प्रारम्भ हुई, कव? इस कथन में तुम दुनिया को दुनिया ही से पृथक कर लेना चाहते हो, तुम 'कव' की कल्पना को दुनिया से अलग करना चाहते हो, तुम दुनिया को 'कव' और 'कैसे' से नापना चाहते हो। किन्तु तुम जानते हो कि 'कव' और 'क्यों' स्वयं दुनिया हैं। तुम दुनिया से ऊपर उठना, दुनिया से परे जाना चाहते हो, और वहां आगे दुनिया को ही रखते हो।
एक वार एक इंस्पेक्टर एक स्कूल में गया और लड़कों से यह सवाल पूछा, "यदि खरिया का एक टुकड़ा हवा में छोड़ दिया जाय तो वह कव पृथ्वी पर पहुँचेगा?" एक
लड़के ने उत्तर दिया, "इतने पलों में।" "यदि पत्थर का एक टुकड़ा इतनी वितनी ऊँचाई से फेंका जाय तो वह कितनी देर में गिरेगा?" लड़के ने जवाव दिया, "इतने समय में।" तव इंस्पेक्टर ने कहा, "यदि यह वस्तु गिरने दी जाय तो इसे कितनी देर लगेगी?" लड़के ने उत्तर दे दिया। तव परीक्षक ने फंदे में फंसाने वाला एक सवाल पूछा, "यदि पृथ्वी गिरे तो उसे गिरने में कितनी देर लगेगी?" लड़के हकवका रह गये। एक तेज़ लड़के ने जवाव दिया, "पहले मुझे यह वताइये कि पृथ्वी गिरेगी कहां?"
इसी तरह हम सवाल कर सकते हैं कि यह दिया कव जलाया गया था, यह घर कव बनाया गया था, और यह तल (फ़र्श) कव जमाया गया था, इत्यादि। किन्तु जव हम प्रश्न करते हैं, "भूमि की सृष्टि कव हुई थी, संसार की सृष्टि कव हुई थी, तव यह उलझाने वाला सवाल भी उसी तरह का है जिस तरह का "पृथिवी को गिरने में कितना समय लगेगा" सवाल था। पृथ्वी कहां गिरेगी? "क्यों, कव और कहां से," यह स्वयं दुनिया का एक अंश है, और जव सम्पूर्ण संसार के संबंध में हम इस क्यों, कव, और कहां से की चर्चा करते हैं तव हम मानो एक मंडल में दलील करते हैं। अर्थात् घूम फिर कर पुनः वहीं पहुँचते हैं। एक तार्किक भूल करते हैं। क्या तुम अपने आप से वाहर निकल कर कूद सकते हो? नहीं। इसी तरह क्यों कव और कहां से, यह स्वयं दुनिया होने के कारण, दुनिया का एक भाग है। वे दुनिया, सम्पूर्ण विश्व की व्याख्या नहीं कर सकते। वेदान्त जो कुछ कहता है वह यह है।
अब दूसरी तरह पर यह समझाया जायगा।
यहां एक मनुष्य सोया हुआ है। और अपनी निद्रा में वह सव प्रकार की वस्तुएँ देखता है। वह द्रष्टा और वस्तु (दृश्य) है; स्वप्न का द्रष्टा, मैं कहूंगा, स्वप्न, जंगलों, नदियों, पहाड़ों तथा अन्य वस्तुओं का विश्रान्त द्रष्टा है। वहां स्वप्न की वस्तु और द्रष्टा का साथ ही साथ आविर्भाव होता है, जैसा कि उस दिन के व्याख्यान में वताया गया था। क्या स्वप्न का द्रष्टा, स्वप्न का मुसाफिर वतला सकता है कि ये नदियाँ, पहाड़, झीलें तथा अन्य भूभाग कव अस्तित्व में आये? जव तक तुम स्वप्न देख रहे हो, क्या तुम कह सकते हो कि ये वस्तुएँ कव आकर मौजूद हो गईं? नहीं, कदापि नहीं। जव तुम स्वप्न देख रहे हो, नदियां, घाटियां, पहाड़ और भूमदेश (landscapes) तुम्हें नित्य जान पड़ेंगे, तुम्हें ये सव प्राकृतिक जान पड़ेंगे, मानों सदा से उनका अस्तित्व है। स्वप्नदर्शी द्रष्टा की हैसियत से तुम कभी कल्पना नहीं करोगे कि तुमने कभी अपना स्वप्न शुरू किया था, तुम उसे सत्य समझोगे और वे सव घाटियां, नदियां, भूभाग नित्य प्रतीत होंगे। तुम कभी उनका मूल नहीं जान सकते। जव तक तुम स्वप्न देख रहे हो तव तक तुम स्वप्न का क्यों, कव और कहां से कदापि नहीं जान सकते। जागते ही सव कुछ चला जाता है, जागते ही सव चीज़ें गायव हो जाती हैं।
इसी तरह इस दुनिया में तुम सव प्रकार के पदार्थ देखते हो। वे असली जान पड़ते हैं और अनन्त प्रतीत होते हैं, जैसे कि स्वप्न में कोई हद नहीं होती। तुम नहीं जान सकते कि स्वप्न कव शुरू हुआ था। क्या आप कह सकते हैं कि काल चक्र कव आरम्भ हुआ था? दो व्यवस्थाओं के इस परस्पर विरोध को कैन्ट (Kant) ने भी वताया है। काल (समय) कव शुरू हुआ था? जव तुम
कहते हो कि काल अमुक समय शुरू हुआ था, तव तुम काल को स्थापित कर देते हो। यह प्रश्न ही असम्भव है। देश कहां से शुरू हुआ था? यह प्रश्न असम्भव है। उस ओर से जहां देश शुरू हुआ तुम वहां एक विन्दु रखते हो, जहां वह शुरू हुआ था। देश का प्रारम्भ 'कहां' की कल्पना से घिरा हुआ है, और 'कहां' की कल्पना में देश की कल्पना शामिल है। प्रश्न असम्भव है। कारण की लड़ी कहां से शुरू हुई? यह प्रश्न असम्भव है। कारण की लड़ी क्यों शुरू हुई? यह प्रश्न असम्भव है। अरे, यदि तुम कारण की लड़ी का कोई प्रारम्भ वताते हो, तो तुम यह भी तो देखते हो कि क्यों की कल्पना स्वयं ही कारण है। वह तुमसे परे है। यह ऐसा प्रश्न है जिसका कि कोई जवाव नहीं। इस पार या उस पार कहीं भी देश, काल, वस्तु या कारण का कोई अन्त नहीं है। शोपेनहार (Schopenhauer) उसे सिद्ध करता है। हर्वर्ट स्पेंसर (Herbert Spencer) इसे सिद्ध करता है। प्रत्येक विचारवान् तुम्हें वतावेगा कि इनका कोई अन्त नहीं है। स्वप्नों में भी उस विशेष श्रेणी के समय का जिसे तुम स्वप्न में वोध करते हो कोई अन्त नहीं है, चाहे इस ओर हो या उस ओर। स्वप्नों में भी उस श्रेणी विशेष के देश की, जिसे तुम स्वप्न में वोध करते हो, कोई सीमा नहीं है। स्वप्नों में उस विशेष श्रेणी की कारण-परम्परा का कोई अन्त नहीं है जिसे तुम स्वप्नों में देखते हो।
इस प्रकार जागृत अवस्था में भी ऐसा ही है। वे सव लोग, जो इस प्रश्न का उत्तर प्रत्यक्ष प्रमाण से (या लौकिक दृष्टि से) देने का यत्न करते हैं, अपनी राह भूल रहे हैं और
तर्कों के घेरे में चक्कर काट कर अपने को हैरान कर रहे हैं। इस प्रकार प्रश्न के सव प्रत्यक्ष वा प्रयोगसिद्ध (empirical) उत्तर असम्भव हैं। स्वप्नदर्शी द्रष्टा जव जागता है, तव सारी समस्या हल होजाती है। और जागता हुआ स्वप्नदर्शी द्रष्टा कहता है, 'अरे, कोई स्वप्न नहीं था, वह सव (उस रूप में भी) विलकुल सत्य था।' इसी भांति सत्य की उपलब्धि रूपी जागृति पर, मुक्ति की वह पूर्ण अवस्था पाने पर जो वेदान्त सव के सामने रखता है, तुम देख सकते हो कि यह दुनिया निरानिर तमाशा थी, केवल कीड़ावस्तु, कोरा भ्रम थी, और कुछ नहीं।
माया का वही प्रश्न इस तरह भी किया जाता है:— "यदि मनुष्य परमेश्वर है, तो वह अपने असली स्वभाव को क्यों भूल जाता है?" वेदान्त का उत्तर है:—"तुम में जो असली परमेश्वर है, वह अपनी वास्तविक प्रकृति को कभी नहीं भूला। तुम में जो वास्तविक परमेश्वर है वह यदि अपने सच्चे स्वभाव को भूल गया होता, तो वह निरन्तर इस विश्व का शासन और नियंत्रण न करता रहा होता। सच्चा परमेश्वर विलकुल नहीं भूला है। वह अव भी इस विश्व का शासन और नियंत्रण कर रहा है। कोई नहीं, कोई नहीं भूला है। ठीक स्वप्न की सी अवस्था है। स्वप्न में, जव तुम विभिन्न प्रकार के पदार्थ देखते हो; वास्तव में वह तुम नहीं होते हो जो उन पदार्थों को देखता होता है। वह स्वप्न का द्रष्टा है, जिसकी सृष्टि स्वप्न की अन्य वस्तुओं के साथ ही होती है, जो उन सव पदार्थों को पाता है, उन सव दृश्यों को देखता है, और उन कंदराओं, पहाड़ों, तथा नदियों में रहता है। असली स्वरूप, आत्मा, सच्चा
परमेश्वर कदापि कोई वात नहीं भूला है। यह मिथ्यात्मा (अहंकार) का ख्याल ही स्वयं माया की रचना है, या उसी प्रकार भ्रम है जैसे अन्य पदार्थ। शुद्ध स्वरूप कुछ भी नहीं भूला है। जव तुम कहते हो, "परमेश्वर आदमी (के जामे) में क्षुद्र अहंकारी आत्मा होकर, अपने को भूल क्यों गया," तव वेदान्त कहता है, तुम्हारे इस प्रश्न में वह वात है जिसे तर्कशास्त्री प्रमाण में घेरे या युक्ति के चक्र की भूल कहते हैं। यह सवाल तुम किससे कर रहे हो? यह प्रश्न तुम स्वप्नदर्शी द्रष्टा से कर रहे हो या जागृत के द्रष्टा से? स्वप्नदर्शी द्रष्टा से तुम्हें सवाल नहीं करना चाहिये, क्योंकि वह कुछ नहीं भूला है। वह तो स्वयं भी वैसी ही रचना है जैसी कि दूसरे पदार्थ जिनको वह देखता है। और जाग्रत अवस्था के असली द्रष्टा से तुम सवाल कर नहीं सकते। सवाल कौन करेगा! तुम जानते हो कि स्वप्नों में प्रश्नकर्ता स्वयं स्वप्नमय अवश्य होता है, और जब स्वप्नदर्शी द्रष्टा ही दूर कर दिया, तव प्रश्न कौन करेगा? प्रश्न करने और उत्तर देने की सम्पूर्ण द्वैत केवल तभी तक सम्भव है जव तक माया का स्वप्न जारी है अथवा रहता है। केवल स्वप्नदर्शी द्रष्टा से तुम प्रश्न कर सकते हो और स्वप्नदर्शी द्रष्टा उसका उत्तरदायी नहीं है। स्वप्नदर्शी द्रष्टा को हट जाने दो, फिर तो सम्पूर्ण दृश्य-संसार, सम्पूर्ण स्वप्न ही अदृश्य हो जाता है। और प्रश्न करनेवाला कोई नहीं रह जाता। कौन किससे सवाल करेगा?
यह एक सुन्दर नौका है, और यह नाविक का एक चित्र है जो नौका को नदी के आर-पार ले जाता है। मल्लाह वड़ा अच्छा आदमी है और वह नाव का मालिक है, किन्तु केवल
तभी तक जव तक वह वास्तविक समझी जाती है। नौका का मालिक उसी अर्थ में नौका का स्वामी है जिस अर्थ में नौका एक नौका है। वास्तव में न कहीं नौका है, और न कहीं नौका का मालिक। दोनों ही मिथ्या हैं। किन्तु जव हम एक वच्चे से कहते हैं, "चलो आओ, चलो आओ, देखो, नौका का स्वामी कैसा सुन्दर है," तव नौका का स्वामी और नौका दोनों एक ही तरह के हैं। नौका के मालिक को स्वयं नाव से अधिक वास्तविक कहने का हमें कोई अधिकार नहीं है।
इसी तरह वेदान्त के अनुसार, संसार का नियामक, शासक, स्वामी, या परमेश्वर, परमेश्वर की कल्पना का सम्बन्ध इस संसार से वैसे है, जैसे कि उस चित्र में नाविक का सम्बन्ध नाव से है। जव तक नौका वहां है, तभी तक मल्लाह भी वहां है। जव उन्हें नौका की अयथार्थता का अनुभव हो जाता है, तव मल्लाह भी गायव हो जाता है।
इसी प्रकार से नियामक, शासक, रचयिता, निर्माता तभी तक तुम्हारे लिये सच्चा है, जव तक दुनिया तुमको सच्ची जान पड़ती है। दुनिया को जाने दो, वह कल्पना भी चली जायगी। सृष्टिकर्ता की कल्पना में सृष्टि, "क्यों, कव, और कहां" से यह सव निहित है। दुनिया का "कव, क्यों, और कहां से," का प्रश्न इस दुनिया से उसी तरह सम्बन्ध रखता है जिस प्रकार मल्लाह नौका से। वे दोनों ही समग्र चित्र के भाग हैं। यदि वे दोनों एक ही भाव (दाम) के हैं, तो दोनों भ्रम हैं। 'क्यों, कव, और कहां-से' प्रश्न भी भ्रम है। कव, क्यों और कहां-से, यह प्रश्न इस दुनिया का सारथी, मल्लाह, या नेता है। जव तुम जागते हो और
सत्य का अनुभव करते हो, तव सम्पूर्ण संसार तुम्हारे लिये पट पर चित्रित नौका के समान हो जाता है, और क्यों, कव तथा कहां-से का प्रश्न, जो हांकने वाला या मल्लाह था, लुप्त हो जाता है। वास्तव में जो काल से परे है, देश से परे है, कारण (वस्तु) से परे है, वहां कोई क्यों, कव, और कहां-से नहीं है। लोग कहते हैं कि संसार का कारण एक सगुण वा साकार सृष्टिकर्ता है। वेदान्त कहता है, नहीं (नेति)। यह नेति शब्द संस्कृत में प्रायः आया है, और अमेरिकनों ने इसे विगाड़ कर 'निट', वह नहीं, वना लिया है। प्रश्न का उत्तर ही नहीं है, वा प्रश्न का उत्तर ही नहीं दिया जा सकता।
दूसरा मनुष्य आता और कहता है, "परमेश्वर को स्वयं अपने से प्रेम हो गया और उस ने यह संसार बनाया, उस ने शीशमहल की तरह यह संसार बनाया, और उसने अपने आप को इन सव रूपों में देखना चाहा, अतएव उस ने यह संसार बनाया।" वेदान्त कहता है, 'नेति' 'निट,' यह नहीं। तुम्हें यह अनुमान करने का कोई अधिकार नहीं है।
एक दूसरा मनुष्य आता और कहता है कि संसार की रचना हुए इतने साल वीते। वेदान्त कहता है, 'नेति,' 'निट,' यह नहीं। 'क्यों' का ठीक अर्थ माया है। मा का अर्थ है नहीं और या का अर्थ है यह, और माया का अर्थ है यह नहीं। प्रश्न ऐसा है जिस का तुम उत्तर नहीं दे सकते। यह नहीं। अव प्रश्न है, क्या संसार सत्य है? वेदान्त कहता है 'नेति,' 'माया,' यह नहीं, 'निट' (nit)। तुम इसे सत्य नहीं कह सकते। क्यों नहीं! क्योंकि सत्यता का अर्थ है
वह कोई वस्तु जो नित्य है, जो कल्ह, आज, और सदा एकसां रहती है। यह सत्यता है। क्या संसार सदा रहता है? वह सदा नहीं वना रहता। इस लिये सत्यता के वर्णन की पूर्ति वह नहीं करता। तुम्हारी गाढ़ निद्रा (सुषुप्ति) में वह गायव हो जाता है। अनुभव, पूर्णता या मुक्ति की तुम्हारी दशा में वह गायव हो जाता है। इस तरह वह सदा नहीं वना रहता। फलतः उसे सत्य कहने का तुम्हें कोई हक नहीं है। क्या संसार असत्य है? वेदान्त कहता है नेति, यह नहीं, माया, निट। यह अति विचित्र है। संसार असत्य नहीं है। वेदान्त कहता है, "नहीं, यह असत्य नहीं है, क्योंकि असत्य का अर्थ है वह कोई वस्तु जो वेदान्त के कथन के अनुसार कभी नहीं है, जैसे मनुष्य के सींग। क्या मनुष्य के कभी गौ के समान सींग थे? कभी नहीं। यह असत्य है, और संसार असत्य नहीं है क्योंकि इस समय वह तुम्हें वर्तमान प्रतीत होता है। वह तुम्हें उपस्थित जान पड़ता है, इस लिये तुम्हें उसे असत्य कहने का कोई अधिकार नहीं है। क्या संसार सत्य है? नेति, निट। क्या संसार असत्य है? नेति, निट। तो क्या संसार अंशतः सत्य और अंशतः असत्य है? वेदान्त कहता है माया, नेति, निट। यह भी नहीं। असत्य और सत्य साथ नहीं रह सकते। इन प्रश्नों के ये उत्तर वेदान्त का मायावाद कहलाते हैं। इन प्रश्नों के ऐसे उत्तरों का दूसरा नाम 'मिथ्या' है, यह शब्द तुम्हारे (अंग्रेज़ी के) 'माइथालोजी' शब्द का सगोत्री है। इस का अर्थ है वह कोई वस्तु जिसे हम न सत्य कह सकते हैं और न असत्य कह सकते हैं और न जिसे हम सत्य तथा असत्य दोनों कह सकते हैं। ऐसी तुम्हारी दुनिया है।
नास्तिक कहते हैं कि कहीं कोई परमेश्वर नहीं है। वेदान्त कहता है, नेति, निट, माया। वे गलती पर हैं क्योंकि उनके पास यह कहने की कोई दलील नहीं है कि परमेश्वर नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि एक साकार परमेश्वर है। वेदान्त कहता है नेति, निट, यह नहीं। इस तरह की वात कहने का तुम्हें कोई हक नहीं है। वेदान्त कहता है इस राज्य में तुमको पैर नहीं रखना चाहिये, इस राज्य में तुम्हारी बुद्धि काम नहीं दे सकती। इसी संसार में तुम्हारी बुद्धि के लिये यथेष्ट (काफी) काम करने को है, उसे यहीं काम करने दो।
"Render unto Caesar the things that are Caesar's and render unto God what is God's." सीज़र की जो चीज़ें हैं वह सीज़र को दो, और परमेश्वर का जो कुछ है वह परमेश्वर को दो।" तुम्हारी बुद्धि के लिये स्थूल लोक में ही, प्रत्यक्ष राज्य (ब्रह्माण्ड) में ही यथेष्ट काम है, किन्तु आध्यात्मिक जगत में तुम्हें केवल एक राह से आना है, केवल एक ही राह से, और वह मार्ग है अनुभव का, वह मार्ग है, प्रेम का, भावना का, श्रद्धा का, वल्कि ज्ञान का। अद्भुत प्रकार का ज्ञान, अद्भुत प्रकार का परमेश्वरीय ज्ञान। जब तुम इस प्रदेश में ठीक राह से आते हो, तब सव प्रश्नों का अन्त होता है, सव समस्याएँ हल हो जाती हैं। साम वेद के केन उपनिषद में एक वाक्य* है जिसका अंग्रेज़ी में कुछ कुछ यह उलथा होता है:—
"I cannot say I know it, nor can I say I do not know it;
――――――――――――――――― * नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च। यो न स्तंद वेद तद वेद नो न वेदेति वेद च ॥ 2 ॥ (केन खण्ड 2)
Beyond knowing and not knowing it is."
"मैं नहीं कह सकता कि मैं उसे जानता हूँ, न यही कह सकता हूँ कि मैं उसे नहीं जानता,
वह जानने और न जानने से परे है।"
ठीक यही वात आधुनिक तत्वचिन्तक (वा विचारवान लोग) कहते हैं। हर्वट स्पेंसर (Herbert Spencer) अपने फर्स्ट प्रिंसिपल्स (First Principles) के प्रथम भाग "दी अननोएवल" (The Unknowable) में उसी परिणाम पर पहुँचता है जिस पर वेदान्त पहुँचता है। वह जो कुछ कहता है, उसे पढ़ कर तुम्हें सुनाने की ज़रूरत राम को नहीं है, किन्तु एक छोटा वाक्य पढ़ा जा सकता है।
"There must exist some principle which being the basis of Science cannot be established by Science. All reasoned out conclusions whatever must rest on some postulate. There must be a place where we meet the region of the Unknowable, where intellect ought not to venture, cannot venture to go."
अर्थ:—ऐसा कोई वीज (principle-तत्व) होना ही चाहिये जो विज्ञान का आधार होते हुए भी विज्ञान के द्वारा स्थापित नहीं किया जा सकता। तर्कसिद्ध सभी परिणामों के आश्रय के लिये कोई स्वीकृतपत्त (निर्विवाद आधार) होना आवश्यक है। कहीं न कहीं पर हम उस प्रदेश में अवश्य पहुँच जाते हैं जो अज्ञेय (The unknowable) है,
जहां बुद्धि का प्रवेश नहीं, जहां जाने का साहस बुद्धि नहीं कर सकती।"
इस विषय में सव तत्वज्ञानियों के कथन का आशय ऐसा ही है। तनिक ध्यान दीजिये। लोग कितनी भूल करते हैं जव वे परमेश्वर को साभिप्राय वताते हैं, जव वे कहते हैं कि परमेश्वर ने यह अवश्य किया होगा। परमेश्वर में दया अवश्य होगी, परमेश्वर में प्रेम ज़रूर होना चाहिये, परमेश्वर में भलाई होना चाहिये, परमेश्वर में यह या वह गुण होना चाहिये। ऐसे लोग कितनी गलती करते हैं, क्योंकि सव प्रकार का श्रेणीविभाग परिमितता (परिच्छेद) है। एक ही सांस में तुम परमेश्वर को अनन्त और सान्त कहते हो। एक ओर तो तुम कहते हो कि वह अनन्त है और दूसरी ओर तुम कहते हो "अरे, उसमें यह गुण है और उसमें वह गुण है।" जब तुम कहते हो वह अच्छा है, वह वुरा नहीं है, तब वह परिमित हो जाता है। जहां कहीं अच्छा (भला) है, वहां वुरा नहीं है। जब तुम कहते हो कि वह सृष्टिकर्ता है, वह प्राणी (जीव) नहीं है, तब तुम उसे परिच्छिन्न कर देते हो; तब तुम एक ऐसे स्थान का निर्देश करते हो जहां वह नहीं है। वह सर्व है। और पुनः जव तुम कहते हो कि परमेश्वर ने इस या उस उद्देश्य से संसार की रचना की, तब तुम परमेश्वर को ऐसी कोई वस्तु वना देते हो जो आकर अपनी करतूतों का उसी तरह जवाब दे सकता है जिस तरह एक मनुष्य एक मेजिस्ट्रेट के सामने जाकर अपने कृत्यों का विवरण देता है। इसी तरह जव तुम परमेश्वर को किसी वात के लिये ज़िम्मेदार ठहराते हो अथवा किन्हीं अभिप्रायों, उद्देश्यों, या मनसूवों को उसके
मत्थे मढ़ते हो, तव अमली तौर पर तुम अपने को मेजिस्ट्रेट या न्यायाधीश वनाते हो और परमेश्वर को वह मनुष्य, जिसने कि कुछ काम किये हैं और जो तुम्हारे समक्ष अपने कार्यों का हिसाव देने के लिये हाज़िर हुआ है। यों तुम उसे परिमित कर देते हो। वेदान्त कहता है कि परमेश्वर को अपनी अदालत के सामने लाने का तुम्हें कोई हक नहीं है। यह प्रश्न त्याग दो; यह अन्याय्य (विधिविरुद्ध) है।
वेदान्त शब्द का अर्थ 'किसी भी व्यक्ति विशेष की गुलामी नहीं' है। मोहमडन (मुसलमान) शब्द मोहम्मद के नाम पर निर्भर करता है। जो कुछ मोहम्मद साहिव ने किया या कहा है, उस पर हमें विश्वास करना चाहिये। क्रिश्चियैनिटी (ईसाइयत) शब्द क्राइस्ट (ईसा) के नाम की गुलामी है। वौद्धमत (बुद्ध धर्म) शब्द एक खास नाम बुद्ध भगवान् की गुलामी है। ज़ोरोआस्टर-धर्म (पारसियों का धर्म) एक विशेष नाम, ज़ोरोआस्टर की गुलामी है। वेदान्त शब्द किसी विशेष व्यक्तित्व या मनुष्य की गुलामी नहीं है। वेदान्त शब्द का शब्दार्थ है ज्ञान का अन्त या लक्ष्य। वेदान्त शब्द का अर्थ है सत्य, और इस प्रकार साम्प्रदायिकता का उसमें अंश तक भी नहीं है। वह सार्वभौम है। उसका नाम आप से अपरिचित होने के कारण, तुम उसके विद्रोही न वन जाओ। तुम उसे सत्य कह सकते हो जैसा कि हिन्दुओं ने समझा और प्रचार किया है। तुम जानते हो सम्पूर्ण सत्य, जर्मनी या अमेरिका में, कहीं भी उसका अनुसन्धान हुआ हो, उसी एक परिणाम पर ही पहुँचता है। जहां कहीं भी मनुष्य सूर्य की ओर देखता है, वह उसे उज्ज्वल और प्रभापूर्ण देखता है। जो कोई अपने
पक्षपातों को दूर हटा देगा और उनसे मुक्त होजायगा, वह वेदान्त के सिद्धान्तों से सहमत होगा। ये तुम्हारे अपने परिणाम हैं, ये तुम्हारे अपने तर्क और निष्कर्ष हैं, यदि तुम सव मत्सरों, पहले की धारणाओं और पूर्वानुरक्तियों को त्याग कर, खुले दिलसे, उदारता-पूर्वक विचार करो।
अव माया की इस समस्या को राम तुम्हें हिन्दुओं के ढंग से समझावेगा कि जिस प्रकार उसे उन्होंने अपने प्राचीन धर्मग्रन्थों में वयान किया तथा समझाया है। वे व्यवहारतः उसे प्रयोग द्वारा समझाते हैं। वे इस माया को अनिर्वचनीय कहते हैं, जिस का परिमित अर्थ तो भ्रांति है, परन्तु इस माया शब्द की व्याख्या है ऐसी कोई वस्तु कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता, जो (माया) न सत्य कही जा सकती है और न असत्य कही जा सकती है, और जो सत्य तथा असत्य का मेल भी नहीं है। यह सम्पूर्ण संसार माया या भ्रांति है, और यह भ्रांति दो प्रकार की है। हम उसे वाह्य और आन्तरिक भ्रांति कह सकते हैं।
मान लो कि अंधेरे में तुमने एक सर्प देखा। मारे डर के तुम्हारे प्राण निकल गये, तुम गिर पड़े और चोट खा गये। क्या साँप था? क्या साँप सत्य था? वेदान्त कहता है कि सर्प सत्य नहीं है, क्योंकि वाद को जव तुम, स्थान पर जाते हो जहाँ पर साँप था, तव वह वहां नहीं होता। किन्तु क्या सर्प असत्य है? वेदान्त कहता है, 'नहीं, नहीं।' तुम्हें सर्प को असत्य कहने का कोई हक नहीं है। यदि साँप असत्य होता तो तुम्हें चोट न लगती। सर्प एक भ्रान्ति है, और कोई भ्रान्ति सत्य नहीं है, और न वह असत्य है, क्योंकि असत्य का अर्थ है कोई
ऐसी वस्तु जिसका अस्तित्व कभी नहीं प्रतीत होता। तुम एक इन्द्रधनुप देखते हो। क्या इन्द्र धनुष सत्य है ? इन्द्र- धनुप सत्य नहीं है, क्योंकि जब हम उसके स्थान पर पहुँचते हैं, तब हम उसे नहीं पाते, और यदि हम अपनी स्थिति बदल दें, तो हम इन्द्रधनुप की स्थिति भी बदली हुई पावेंगे। क्या वह असत्य है ? नहीं, नहीं, क्योंकि वहां उसका अस्तित्व प्रतीत होता है, उसका हम पर कुछ प्रभाव पड़ता है। वह असत्य भी नहीं है। वह एक भ्रांति है।
तुम दर्पण में अपनी तसवीर देखते हो। क्या तुम्हारी तसवीर असत्य है ? वेदान्त कहता है, "नहीं, वह असत्य नहीं है, क्योंकि वह तुम पर एक असर पैदा करती है, तुम उसे देखते हो।" क्या वह सत्य है ? नहीं, वह सत्य भी नहीं है। तुम ने इधर अपना मुँह फेरा और उधर वह गायब। यह एक भ्रान्ति है। अब यह भ्रान्ति दो प्रकार की है, भीतरी और वाहरी। भीतरी भ्रान्ति वह, जैसे रस्सी का सर्प समझ पड़ना। आन्तरिक भ्रान्ति की एक विशेषता यह है कि जब वहां भ्रान्तिकारी वस्तु होती है, तब असली वस्तु वहां नहीं दिखाई पड़ती है, और जब (असली) वस्तु दिखाई पड़ती है, तब भ्रान्तिकारी वस्तु वहां नहीं होती। दोनों साथ नहीं रह सकतीं, आन्तरिक भ्रान्ति में वास्त- विकता और भ्रान्ति संग नहीं रह सकते। भ्रान्तिकारी वस्तु सर्प को, और उस के पीछे (आधार) की असली वस्तु रस्सी को हम एक साथ नहीं देख सकते। यदि सर्प वहां है तो रस्सी वहां नहीं है। और यदि रस्सी वहां है तो साँप वहां नहीं है। दो में से एक को मिटना ही होगा। दो में से एक की मौजूदगी ज़रूर रहेगी।
किन्तु वाहरी भ्रान्ति में दोनों संग रहते हैं, असलियत भी और भ्रान्ति भी। दोनों एक साथ रह सकते हैं, जैसे शीशे में। शीशे के अन्दर की वस्तु, प्रतिबिम्ब असत्य है, अथवा, वैज्ञानिकों की भाषा में, वह एक सार्वभौम प्रतिबिम्ब है, असत्य प्रतिमूर्ति है, भ्रान्ति है। चेहरा असली वस्तु है। अब मुख और उसका प्रतिरूप साथ हैं। भ्रान्तिकारी वस्तु अर्थात् प्रतिबिम्ब और असली वस्तु अर्थात् मुख संग हैं। यह वाहरी भ्रान्ति की विशेपता है। वाहरी भ्रान्ति के संबंध में हम एक बात और देखते हैं, एक निमित्त वा द्वार (medium) दिखाई पड़ता है, शीशे के समान बिच्चवानी (माध्यम)। दर्पण माध्यम (निमित्त वा साधन) है, और भ्रान्तिकारी वस्तु प्रतिबिम्ब है, और वास्तविक वस्तु मुख है। इस प्रकार वास्तव में एक वाहरी भ्रान्ति में, तीन चीज़ें एक साथ ही मौजूद हैं; और भीतरी भ्रान्ति में एक ही वस्तु उस समय उपस्थित है।
वेदान्तियों के अनुभव वा प्रयोग जो समग्र विश्व की एकता आपके सामने सिद्ध करते हैं, जिस प्रकार के हैं वह आपको बताया जायगा। उनके प्रयोग, अनुभव और उनके धार्मिक विकास तथा सत्य के अनुभव से सिद्ध होता है कि यह संसार भीतरी और वाहरी दोनों प्रकारों की भ्रान्तियों से बना हुआ है। जब कोई मनुष्य धार्मिक जीवन और अपने अन्दर परमात्मा का अनुभव करना शुरू करता है, तब वह केवल वाहरी भ्रान्ति पर विजय प्राप्त करता है। पृथ्वीतलके सव धर्मों अर्थात् ईसाइयत, मुसलमानी, बौद्धता, ज़ोरोआस्ट्री, इन सव ने, वेदान्त को छोड़ कर, बाहरी भ्रान्ति को जीतने में बड़ा काम किया है। वे जहां
तक वाहरी भ्रान्ति को जीतते हैं, तहां तक वेदान्त कहता है वे बहुत ठीक हैं। किन्तु वेदान्त एक पग आगे जाता है। वह आन्तरिक भ्रान्ति को भी जीतता है, और दूसरे धर्म प्रायः वहां पर पीछे ठिठक जाते हैं। तब वे कहते हैं कि वेदान्त हमारे विरुद्ध है। नहीं, नहीं, वह विरुद्ध नहीं है। वह केवल उसी (कमी) की पूर्ति करता है जिसे उन्होंने (उक्त धर्मों ने) शुरू किया था। वह उनकी अभिवृद्धि करता है। वह उनका प्रतिद्वंदी नहीं है, वह उनका विरोधी नहीं है। किन्तु तुम कहोगे कि यह तो हम से संस्कृत में बोलना है, यह तो हम से यूनानी भाषा में बोलना है। इस से तुम्हारा क्या प्रयोजन है ?
अब एक अत्यन्त सूक्ष्म बात कही जाने वाली है। इसी लिये बड़ी सावधानी से आप ध्यान दें। एक रस्सी को भ्रमवश साँप या भुजंग समझा जाता है। रस्सी में वहां सांप प्रगट हो गया। किस प्रकार की भ्रान्ति सर्प का कारण थी ? सर्प आन्तरिक भ्रान्तिजन्य था। तुम जानते हो कि यदि साँप वहां है, तो रस्सी वहां नहीं हो सकती; यदि रस्सी वहां है तो साँप वहां नहीं हो सकता। एक समय में केवल एक ही चीज़ दिखाई पड़ती है। यह है भीतरी भ्रान्ति। फिर आप ख़याल करें। यह सर्प या भुजंग जो प्रगट हुआ था एक भ्रान्ति मूलक पदार्थ था। उसके अस्तित्व का कारण आन्तरिक भ्रान्ति थी। यह साँप अपने पीछे (आधार- रूप से) स्थित रस्सी का वही काम देता है जो काम शीशा तुम्हें उस समय देता है जब कि तुम उसमें देखते हो। यह तुम्हारे लिये साबित करना है। तुम जानते हो कि शीशा निमित्त वा माध्यम रूप से तुम्हारा काम देता है, और
शीशे के माध्यम होने से, तुम शीशे में एक भ्रान्तिमूलक पदार्थ - मैं कहता हूं - एक प्रतिबिम्ब देखते हो। शीशे के मामले में तुम्हें एक वाहरी भ्रान्ति मिलती है। अब यह दिखाया जायगा कि आन्तरिक भ्रान्ति के कारण रस्सी में साँप प्रगट हुआ था। यह साँप अपने नीचे स्थित वास्त- विकता या रस्सी के माध्यम अथवा शीशे का काम देगा, और उसी स्थान पर हमें वाहरी भ्रान्ति भी मिलेगी।
एक लड़का तुम्हारे पास आकर कहता है, "पिता, पिता, मैं डर गया हूं, वहां साँप है।" हम पूछते हैं, "बच्चे! साँप कितना लम्बा था ?" लड़का कहता है "साँप लगभग दो गज लम्बा था"। अच्छा, साँप मोटा कितना था ? बच्चा कहता है, "बहुत मोटा था। वह उस तार का सा मोटा था जो मैं ने उस दिन उस जहाज़ में देखी थी कि जो सैन- फ़्रांसिस्को से चलने को था"। हम पूछते हैं, "अच्छा, साँप क्या कर रहा था ? उसने कहा, "साँप ने गँडरी मार ली थी"। तुम जानते हो कि साँप वहां नहीं था। साँप मिथ्या था, रस्सी वहां पड़ी हुई थी। रस्सी करीब दो गज लम्बी थी, और उतनी ही मोटी थी जितनी कि वह तार जो उस ने उस दिन देखी थी जब कि जहाज़ सैनफ़्रांसिस्को से रवाना हो रहा था। रस्सी भूतल पर लिपटी पड़ी थी, और मानो रस्सी के गुणों ने - उसकी मोटाई, लम्बाई, और स्थिति - अपने को भ्रान्ति मूलक साँप में प्रतिबिम्बित किया। रस्सी अपनी मोटाई, अपनी चौड़ाई, और अपनी स्थिति भ्रान्तिमू- लक साँप में डालती है। साँप इतना लम्बा नहीं था, लम्बाई तो सिर्फ रस्सी की थी। साँप उतना मोटा नहीं था, मोटाई तो केवल रस्सी की थी। साँप उस स्थिति में नहीं
था, वह स्थिति तो केवल रस्सी की थी। अतः आप ख़याल करें कि पहले तो भीतरी भ्रान्ति के कारण हमें सांप मिला था, और बाद को सर्प में हमने दूसरे प्रकार की भ्रान्ति की खृष्टि की, जिसे हम वाहरी भ्रान्ति कह सकते हैं। एक के गुणों का आरोप दूसरे पर हो गया।
यह दूसरे प्रकार की भ्रान्ति है। इन भ्रान्तियों को हटाने के लिये कौन सी क्रिया अंगीकार की जाय ? पहले एक भ्रान्ति को हम हटावेंगे, तब दूसरी को। पहले वाहरी भ्रान्ति हटाई जायगी, और तब भीतरी भ्रान्ति।
वेदान्त के अनुसार, यह सम्पूर्ण विश्व वास्तव में केवल एक अविभाज्य (indivisible), अनिर्वचनीय (ind- escribable), सत्य के सिवाय और कुछ नहीं है, जिसे हम सत्य भी नहीं कह सकते, जो वाणी से पर है, जो देश काल वस्तु से पर है, जो सब से पर है। सत्य की इस रस्सी में, इस भीतरास्थित आधार में, तत्त्व में, अथवा जो चाहो तुम इसे कहो, उस में नामों, रूपों, और भेदों का, अथवा तुम कह सकते हो तेज, कार्यशालता वा स्फुरण का, आविर्भाव होता है। ये सब सर्प के तुल्य हैं। वहां हम देखते हैं कि यह भीतरी भ्रान्ति पूर्ण होने के बाद वाहरी भ्रान्ति आती है, और वाहरी भ्रान्ति के कारण हम समझते हैं कि इन नाम और रूपों, इन व्यक्तियों और सत्ताओं में, अपनी निज की एक वास्तविकता है, ये नामरूपादि मानों अपने आप पर निर्भर (जीवित) स्वतः स्थित, और अपने ही कारण सत्य हैं। यह दूसरी या वाहरी भ्रान्ति पेश की गई। अब तुम इसे समझोगे जब हम विधि को उलट देंगे।
धर्मों (मतों) ने क्या किया है ? चाहे प्यारी ईसाइयत, प्यारी
मुसलमानी की प्रशंसा में, और चाहे इन धर्मों की प्रशंसा में यह कहा जाय कि वाहरी भ्रान्ति को दूर करने में इन धर्मों ने बड़ा काम किया है। इन्हों ने मानवजाति को दिखलाया है कि यदि वे शुद्ध जीवन निर्वाह करें; यदि उनका जीवन सार्वभौम प्रेम का, दैवी आनन्द का जीवन हो; यदि मनुष्य आशा, श्रद्धा, और उदारता का जीवन जिये; यदि उस से असीम प्रेम चारों ओर उमड़ कर समग्र विश्व को परमेश्वरता से परिपूर्ण कर दे; तो हमें हरेक वस्तु में परमेश्वर मिल जाय। ज़रा ध्यान दो। सच्चा साधु या सन्त, सच्चा ईसाई, प्यारा ईसाई, नामों में भी परमेश्वर को देखता है। वह शत्रु से घृणा नहीं करता है, बल्कि शत्रु को प्यार करता है।
"Oh! Love your enemy as your self"
अरे ! "अपने शत्रु को आत्मवत् प्यार करो।" ईसू की यह शिक्षा धन्य है ! फूलों में भी वह उसी परमेश्वर के दर्शन करता है। कभी तुमने उस अवस्था का अनुभव किया? सच्चे धार्मिक लोगों ने किया है। फूल तुमसे बोलते हैं, और पत्थरों में तुम्हें धर्मोपदेश मिलते हैं, बहते हुए नालों में पुस्तकें, तारागण तुमसे वार्तालाप करते हैं, और परमेश्वर एक मनुष्य के चेहरे के द्वारा तुम्हें अवलोकता है। क्या परमेश्वर को किसी बुद्धिजन्य प्रमाण की ज़रूरत है ? नहीं, वह अपना प्रमाण अपने साथ रखता है। वह उस प्रमाण पर टिका हुआ है, जो सम्पूर्ण लौकिक तर्कशास्त्र और लौकिक तत्वज्ञान के परे है। जो मनुष्य सर्वत्र परमेश्वर का अनुभव करता है, वह परमेश्वर में ही रहता सहता, चलता फिरता है, और अपनी सत्ता रखता है। वह इस प्रकार के
धार्मिक जीवन, अभ्यास और अनुभव तथा, प्रयोगों द्वारा, वाहरी भ्रान्ति को जीत लेता है। वह कैसे ? तुम जानते हो, तुम्हारा कहना है कि परमेश्वर इन सब रूपों में है, परमेश्वर इन सब अवस्थाओं और आकारों और प्रभेदों में है। ये सब सांप के तुल्य हैं। तथापि यदि तुम उनके पीछे देखो, तो उनके परे तुम्हें साँप के नीचे अधोस्थित रस्सी दिखाई पड़ती है। लम्बाई चौड़ाई और गोलाई का आरोप तुम साँप पर नहीं करते हो, अधोस्थित रस्सी पर करते हो। इस में तुम केवल एक प्रकार की भ्रान्ति को हटाते हो। तुम हरेक वस्तु के पीछे परमेश्वर देखते हो, और धार्मिक जीवन की इस अवस्था की जव तुम्हें उपलब्धि होती है, तब तुम अपने मित्रों या शत्रुओं पर कारणों का आरोपण नहीं करते, किन्तु तुम उन में परमेश्वरता देखते हो, और तुम उनके पीछे परमेश्वर की अंगुली या जगन्नियन्ता की अंगुली देखते हो; और तुम कहते हो कि एक परमेश्वरता, या एक सर्वात्मा जो परमेश्वर है, वह ये सब काम कर रहा है और मुझे अपने मित्रों पर हेतु वा कारणों का आरोपण नहीं करना चाहिये। इस में एक प्रकार की भ्रान्ति, वाहरी भ्रान्ति, परास्त हुई। तुम्हारी उन्नति में यह एक पग है। किन्तु वेदान्त इस से आगे बढ़ता है और तुम से कहता है, "भाई, यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर इन सव में है, तो यह पूर्ण सत्य नहीं है, इस से आगे बढ़ो।" ये सब रूप और ये सब प्रतिमाएँ और भेद या प्रभेद स्वयं परमेश्वर को धारण करते हैं, किन्तु साथ ही ये सब विभिन्न भ्रान्तियां और रूप मिथ्या हैं और रस्सी में साँप के तुल्य हैं। इस से आगे बढ़ो, और तुम उस अवस्था को प्राप्त होते हो कि जो इन सब (बातों) से परे है, जो सम्पूर्ण कल्पना से परे है, और सब शब्दों से परे है।
यह असत्य भी है। इस प्रकार तुम देखते हो कि वेदान्त सब धर्मों का परिपूरक है। यह संसार के किसी धर्म का खण्डन नहीं करता।
यह दिखाया जायगा कि यह कहना अनावश्यक है कि "यह संसार इस परमेश्वर ने, या उस परमेश्वर ने, अवश्य रचा होगा"। वह सिद्ध किया जायगा कि ये रूप और शक्लें, ये विभिन्न आकृतियां और स्थितियां ही यह दुनिया है, और दूसरी कोई वस्तु नहीं है।
ये दो त्रिकोण (triangles) हैं, और एक समकोण
(rectangle)। ये दोनों त्रिकोण समद्विभुज (isosceles) हैं, दो भुजायें बराबर हैं। दोनो समान भुजायें अंक 3 से चिह्नित हैं, और तीसरी भुजायें 4 से। समकोण में छोटे पार्श्व (sides)
3 से चिह्नित हैं और लम्बे पार्श्व 4 से। ये आकृतियां काग़ज़ या दफ़ती या किसी वस्तु की कटी हुई हैं। इन का इस तरह पर रखो कि एक संयुक्त आकृति हो जाय, अथवा त्रिकोण की जड़ (वा तले) का और समकोण की एक तरफ़ का संग हो जाय। तब वह क्या हो जायगा ? तब एक षट्कोण (hexagon) हम पाते हैं, जिस के सब पार्श्व 3 हैं। 4 अंकित पार्श्व आकृति के भीतर आ गये और अब वे पार्श्व नहीं रह गये हैं। यह षट्कोण हम कैसे पाते हैं ? त्रिकोण और समकोण की भिन्न प्रकार की स्थिति या भिन्न प्रकार के संयोग से हमें इस की प्राप्ति होती है। इन आकृ- तियों और इन से बनने वाली आकृति के गुणों का क्या हाल है ? परिणामभूत आकृति के गुण उस में शामिल आकृतियों के गुणों से बिलकुल भिन्न हैं। अनाकृतियों में तीक्ष्ण कोण (acute angles) हैं, परिणामभूत आकृति में तीक्ष्ण कोण बिलकुल हैं ही नहीं। एक अनाकृति में ऋजु कोण (right angles) हैं, और परिणामभूत आकृति में कोई भी ऋजु कोण नहीं है।
अनाकृतियों में 4 से चिह्नित लम्बे पार्श्व (sides) थे; परिणामभूत आकृति में उतनी लम्बाई की कोई दिशा (तर्फ) नहीं है। अनाकृतियां कोई भी समपार्श्व (equilateral) नहीं थीं। उनके संयोग से बनने वाली आकृति समपार्श्व है, उस के सब कोण बहिर्लम्ब (obtuse) हैं। किसी भी आंशिक भाग के कोण बहिर्लम्ब नहीं थे। यहां हम एक ऐसी सृष्टि देख रहे हैं, जिस के सब गुण पहले बिलकुल अज्ञात थे। ये बिलकुल नये गुण कहां से आ गये ? तनिक ध्यान दीजिये इन निरन्तर नये गुणों की सृष्टि किसी सृष्टिकर्त्ता ने नहीं की
है। ये बिलकुल नये गुण घटकावयव (components parts) से नहीं आये हैं। वे एक नवीन रूप का नतीजा हैं। वे एक नवीन स्थिति, नवीन आकार का, जिसे वेदान्त माया कहता है, परिणाम हैं। माया का अर्थ है नाम और रूप। वे (गुण) नामों और रूपों का परिणाम हैं, यह ख़याल कर लो। फिर देखो। इस त्रिकोण को ज (पच), जलजनकवायु (हाइड्रोजेन) होने दो; इस दूसरे को 2 और तीसरे को अ (oxygen) होने दो। इस से तुम को ज २ अ, जल की प्राप्ति होती है। इन दो मूल तत्वों, हाइड्रो- जेन और ओक्सीजेन (एक प्रकार की वायु) में अपने २ निजी गुण थे, और परिणामभून योग एक निरन्तर नवीन वस्तु है। हाइड्रोजेन और ओक्सीजेन हमें जल देता है। हाइड्रोजेन भभक उठनेवाला पदार्थ है, किन्तु जल ऐसा नहीं है। जल में एक ऐसा गुण है जिस से हाइड्रोजेन बिलकुल अनभिज्ञ है। ओक्सीजेन ज्वलन का सहायक है, किन्तु पानी ऐसी सहायता नहीं करता। उस में अपना निजी एक गुण है, बिलकुल नया। फिर हम देखते हैं कि हाइड्रोजेन बहुत हलका है, किन्तु ओक्सीजन में वैसा हलकापन नहीं है। हाइड्रोजेन गुब्बारों में भर जाता है और तुम्हें ऊपर आकाश में चढ़ा ले जाता है; किन्तु जल, परिणामभूत योग, ऐसा नहीं करता। अवयवरूप तत्वों के गुण परिणामभून योग से बिलकुल विभिन्न हैं। परिणामभूत योग को अपने गुणों की प्राप्ति कहां से हुई ? उसको ये गुण अपने रचयिता से मिले या अवयवों से ! नहीं, वे रूप से, नये रूप से, नवीन स्थिति से, आकार से आये। यह है जो हमें वेदान्त बतलाता है। यह तुम्हें बताता है कि जो कुछ तुम इस संसार में देखते हो, वह नाम और रूप का परिणाम मात्र है। इसके और उसके
लिये, जो नाम और रूप का परिणाम है, तुम्हें एक सृष्टिकर्त्ता की स्थापना करने की ज़रूरत नहीं है।
यह तुम्हारे सामने कोयले का एक टुकड़ा है और वहां जगमगा, चमकीला हीरा है। कोयले के टुकड़े के गुणों से बिलकुल भिन्न गुण हीरे में हैं। हीरा इतना कठोर है कि लोहे को काट सकता है। कोयला इतना कोमल है कि जब तुम कागज़ पर उसे रगड़ देते हो, तब कागज़ के टुकड़े पर उस का निशान लग जाता है। हीरा इतना अमूल्य, बहुमूल्य और प्रभापूर्ण है; और कोयले का टुकड़ा सस्ता, कुरूप, और काला है। दोनों के भेद पर ध्यान दो, और तथापि वास्तव में वे दोनों एक और वही वस्तु हैं। विज्ञान से यह सिद्ध है। अजी, आप कहोगे, "मेरी बुद्धि में यह न समा यगा।" आप चाहे इसे मानो या न मानो, यह एक तथ्य है। इसी तरह वेदान्त आप से कहता है कि यह एक बुरी चस्तु है, और यह एक अच्छी वस्तु है। हीरा अच्छा है और कोयला खराब है। यह एक वस्तु है जिसे तुम खराब कहते हो, और यह एक वस्तु है जिसे तुम अच्छा कहते हो। यह एक वस्तु है जिसे तुम मित्र कहते हो और यह एक वस्तु है जिसे तुम अरि (शत्रु) बताते हो। किन्तु वास्तव में उनके नीचे एक और वही वस्तु स्थित है, ठीक जैसे कि वही कार्बन (carbon) कोयले के रूपमें प्रगट होता है और वही हीरे में। सो वास्तव में एक और वही ईश्वरता है जो दोनों स्थानों में प्रकट होती है। नाम और रूप में भेद है, और किसी बात में नहीं। वैज्ञानिक तुम्हें बतांते हैं, कि कार्बन के कण कोयले की अपेक्षा हीरे में भिन्न प्रकार से स्थित हैं, हीरे के अणुओं के बनने में
भिन्न रूप के होते हैं। हीरे और कोयले में भेद नाम और रूप के कारण से है, या उस कारण से है जिसे हिन्दू माया कहते हैं। ये सब भेद नाम और रूप के कारण से है।
इसी तरह अच्छे और बुरे के भेद का कारण माया, नाम और रूप है, और कुछ नहीं; और ये नाम और रूप सत्य नहीं हैं क्योंकि वे अनित्य हैं। वे मिथ्या हैं, क्योंकि हम उन्हें एक समय देखते हैं और दूसरे समय नहीं देखते। पृथ्वी का यह अद्भुत व्यापार नामों और रूपों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है; विभेदों, परिवर्तनों और संयोगों के सिवाय और कुछ नहीं है। और इन विभिन्न परिवर्तनों तथा संयोगों का कारण क्या है ? उनका कारण है आन्तरिक भ्रान्ति। आन्तरिक भ्रान्तिमूलक इन नाम-रूपों में एक ब्रह्म अपने को प्रकट करता है। संसार के नामों और रूपों में, जो माया कहलाते हैं, परमेश्वर आप स्वयं आविर्भूत होता है। इस का कारण है भीतरी भ्रान्ति। उस के पार जाओ, और तुम सब कुछ हो जाते हो। वही वास्तव में देखता है जो सब में समान देखता है। उसी मनुष्य की आंखें खुली हुई हैं जो सब में एकसां एक परमेश्वर को देखता है।
गीता की कुछ पंक्तियां इसे तुम्हारे लिये और स्पष्ट कर देंगी।
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् । मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥ पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः । वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक् साम यजुरेव च ॥ गतिर्भर्ता प्रभु साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च । अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
"I am the sacrifice! I am the prayer! I am of all this boundless Universe The Father, Mother, Ancestor and God! The end of Learning! That which purifies In lustral water! I am Om! I am Rig, Sama and Yajur. I am The way, The Fosterer, the Lord, the Judge, The Witness; the Abode, the Refuge-house, The friend, the Fountain and the Sea of Life, Which sends, and swallows up seed and seed- sower, Whence endless harvests spring! Sun's heat is mine, Heaven's rain is mine to grant or to withhold ; Death am I and immortal Life I am!"
"मैं यज्ञ हूं; मैं प्रार्थी हूं ! इस असीम विश्व का मैं जनक, जननी, पूर्व पुरुष और परमेश्वर, ज्ञान की पराकाष्ठा हूं !" वह जो। शुचिकर जल में पवित्रकारी ॐ है ! वह ॐ मैं हूं। मैं ऋक्, साम और यजुर हूं। मैं हूं मार्ग, प्रतिपालक, प्रभु, न्यायाधीश, गवाह, निवास-स्थान, शरण-निकेत, मित्र, जीवन का मूल सोता और समुद्र, जो बीज और बीज-बोने वाले को भेजता है, और निगल जाता है।
जहां से अनन्त फ़सलें पैदा होती हैं ! सूर्य का ताप मेरा है,
आकाश की वर्षा मेरी है, चाहे दूं या रोकूं; मृत्यु मैं हूं, और अमर जीवन मैं हूं !"
The melodious song of the Ganges, the music of the waving pine, The echoes of the Ocean's war, the lowing of the kine, The liquid drops of dew, The heavy lowering cloud, The patter of the tiny feet, The laughter of the crowd, The golden beam of the Sun, The twinkle of the silent star, The shimmering light of the silvery moon shedding lustre near and far The flash of the flaming sword, the sparkle of jewels bright, The gleam of the light-house-beacon light in the dark and foggy night, The apple-bosomed Earth and Heaven's glorious wealth, The Soundless sound, the flameless light, The darkless dark, the wingless flight, The mindless thought, the eyeless sight, The mouthless talk, the handless grasp so tight,
Am I, am I, am I.
गंगा का मधुर गान, लहराते हुए देवदारु का संगीत, सागर के समर की प्रतिध्वनियां, गइयों का बँवाना, ओस के तरल बूँद, भारी अधोगामी मेघ, नन्हे पैरों की पदक, समूह की हास्यध्वनि, सूर्य की सुनहली किरण, मौन नक्षत्र की चमक, रूपहले चन्द्र का कपकपता (लचकता) प्रकाश। जो निकट और दूर उजियाला डाल रहा है। लपलपाती तलवार की दमक, चमकीले रत्नों की छुटा, अँधेरी और कोहरेदार रात में, प्रकाश-गृह के मार्ग-प्रदर्शक प्रकाश की ज्योति अपने गर्भ में सब धारण करने वाली भूमि और वैकुण्ठ की उज्वल दौलत। निश्शब्द शब्द, विना लौ का प्रकाश, अन्धकार रहित अन्धकार, और पंखहीन उड्डान, मनहीन विचार, नेत्रहीन दृष्टि, मुखहीन वातचीत, हस्तहीन अति दृढ़ पकड़ (द्वोच), मैं हूँ, मैं हूँ, मैं हूँ।