संसार का आरम्भ कब हुआ ?
बुधवार, 6 अप्रैल 1904 का भाषण।
महिलाओं और सज्जनों के रूप में प्यारे भगवन् !
प्रश्न किया जाता है, दुनिया कब शुरू हुई थी ? 'कब' की व्याख्या देखने पर हमें मालूम होता है 'कौन समय'। अतः प्रश्न यह है—किस समय समय का आरम्भ हुआ था ? प्रश्न इस रूप में रक्खा जाने पर, अवश्य हास्यास्पद है। दुनिया कहां शुरू हुई थी ! स्थान कहां शुरू हुआ था ? यह भी प्रश्न है, 'दुनिया कैसे शुरू हुई थी !" कुछ चटक (फुर्तीले) लोग सम्भव है इन प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयत्न करें। किन्तु मैं इसे उनके लिये छोड़ दूंगा। यह काम मेरी शक्ति से परे है। कुछ लोग ऐसे हैं जो इन प्रश्नों को हल करने में अपने दिन बितावेंगे। किन्तु इस से होता ही क्या है ! एक हद तक पहुँच कर वे ऐसे ठहर जाते हैं कि मानो एक नितान्त कठिन (वज्रमय) पत्थर की दीवार सामने आ गई होती है।
अब यहां मेरे पास एक चिमटा है। इस और उस तथा अन्य चीज़ों को दबा कर वह चिमटा उठा सकता है, किन्तु वह उलट कर उस हाथ को नहीं दबोच सकता जो उसे पकड़े है और परिचालित करता है। इसी तरह काल, स्थान, और कारण (देश, काल, वस्तु) की त्रिमूर्ति संसार के व्यापार को धारण कर सकती है, किन्तु जो आत्मा
उसके पीछे है उसे वह धर (पकड़) नहीं सकती।
एक बार चार मनुष्य अस्पताल पहुँचाये गये थे, क्योंकि उनकी आंखों में मोतियाबिन्द था। उन्हें आशा थी कि नश्तर द्वारा अस्पताल में मोतियाबिन्द अच्छा हो जायगा। मोतियाबिन्द से पीड़ित ये सब लोग स्वभावतः वज्र अन्धे थे, और उनकी अब चार ही इन्द्रियां बाकी रह गई थीं। एक दिन वे खिड़की के काँच के रंग के सम्बन्ध में विवाद करने लगे। एक ने कहा, "मेरा लड़का जो विश्वविद्यालय का छात्र है यहां आया था और मुझसे कहा था कि 'कांच पीला है।' वह अवश्य पीला होगा।" दूसरे ने कहा, "मेरा चाचा, जो म्यूनीसिपल कमिश्नर है, उस दिन यहां आया था और मुझसे कहा था कि 'कांच सुर्ख है।' वह बड़ा तेज़ है और उसे मालूम है।" तब तीसरे ने कहा कि "मेरा एक चचेरा भाई, जो विश्वविद्यालय में अध्यापक है, मुझे देखने आया था और तब उसने मुझसे कहा था कि 'कांच हरा है'। अवश्य ही वह जानता होगा'। इस तरह वे काँच के रंग के सम्बन्ध में परस्पर झगड़े। तदुपरान्त उन्हों ने स्वयं इस को जानने का प्रयत्न शुरू किया कि शीशा किस रंग का है। पहले उन्हों ने अपनी जिभ उस पर लगाई, और स्वाद लेने का प्रयत्न किया। किन्तु रंग इस उपाय से नहीं जाना जा सकता था। तब उन्हों ने उसे थपथपाया और आवाज़ सुनी। किन्तु रंग का पता इस ढंग से भी न लगा। उन्हों ने उसे सूंघने का यत्न किया और उसे टटोला, किन्तु खेद ! उन की छूने, सूंघने सुनने और चखने की इन्द्रियां उन्हें नहीं बता सकीं कि कांच किस रंग का है। इसी प्रकार अनन्त को हम इन्द्रियों के द्वारा नहीं जान सकते। तनिक
देखिये कि यह कैसी असम्भव बात होगी; यदि अनन्त को आप इन्द्रियों के द्वारा जान सके। तब तो अनन्त को सान्त से अवश्य छोटा होना पड़ेगा। अनर्थ (absurd)। केवल विश्वज्ञान (Cosmic Consciousness) रूपी परमेश्वर ज्ञान (God consciousness) द्वारा ही हम अनन्त को जानते हैं। यह दियासलाई अपने हाथ में लेता हूं। दियासलाई उस हाथ से छोटी है जो उसे पकड़े है। अब आप देखते हैं कि क्योंकर सान्त अनन्त (वा परिच्छिन्न अपरिच्छिन्न) को नहीं ग्रहण कर सकता ? इन्द्रियां उसे नहीं जान सकतीं जो उन से परे है। उन अन्धों की भाँति, (जिन्हें कांच का रंग बताया गया था, किन्तु खुद नहीं जानते थे कि वह किस रंग का है और जिन्हों ने भाई या लड़के के कथनानुसार उसे लाल पीला आदि मान रक्खा था), अपने से बाहर की किसी वस्तु पर न निर्भर करो कि वह तुम्हारे लिये आत्मा को व्यक्त कर देगी। मुझे बताया गया है कि H₂O पानी पैदा करता है। मैं क्या यह जानता हूं ? नहीं, यद्यपि सब रासायनिक मुझे बताते हैं कि यह सत्य है। मैं केवल तभी जानता हूं जब खुद प्रयोगशाला में जाकर प्रयोग कर चुकता हूं। तभी यह वास्तविक तथ्य मेरे लिये हो जाता है। कृष्ण, ईसा, या बुद्ध कोई भी हो, आप अपने से बाहर के किसी प्रमाण पर नहीं भरोसा कर सकते। उसे जानने के लिये तुम्हें स्वयं उसे अवश्य जानना होगा। तुम्हें चाहे किसी अच्छे प्रामाणिक सूत्र से मालूम हुआ हो, उदाहरणार्थ अध्यापक से, कि कांच सुर्ख है, किन्तु इसे जानने के लिये तुम्हें उसे देखना होगा। एक युवा पुरुष कहता है, "मेरे बाप का पेट अच्छा है, वह मेरा भोजन मेरे बदले पचा
सकता है।" क्या वह पचा सकता है ? नहीं, लड़के को अपना भोजन आप पचाना पड़ेगा। मैं उन महान् आत्माओं को प्रणाम करता हूं जो संसार-विख्यात हैं, किन्तु वे मेरा भोजन मेरे बदले नहीं पचा सकते। सो तो मुझे स्वयं ही अपने लिये करना होगा। परमेश्वर से मेरी अभिन्नता का वे (महात्मा लोग) मुझे विश्वास नहीं दिला सकते, मुझे स्वयं यह अपने लिये करना होगा। सत्य को तो हम केवल विश्व के ज्ञान ही से जानते हैं। इस के बारे में मैं तुम्हें बाद को बताऊंगा।
नास्तिक और स्वाधीन चिंतक (free thinkers) कहते हैं, "मैं स्वयं अपने लिये अनुसन्धान कर लूंगा," और हम देखते हैं कि वे कहां तक पहुँचते हैं। वह कहता है कि रोशनी इस दियासलाई में है। अब हम उस का पता कहां पावें ! इस लिये वह दियासलाई के टुकड़े २ कर डालता है, किन्तु प्रकाश नहीं पाता। फिर वह उस की बुकनी (चूर्ण) बना देता है, तथापि रोशनी उसे नहीं मिलती। वह शरीर को लेकर खंड खंड कर देता है, पर जीवन (प्राण) नहीं मिलता। वह हड्डियों को चूर चूर कर डालता है, परन्तु ज़िन्दगी वहां भी नहीं है। वह कहता है कि यदि कोई "वास्तविकता" (तत्व) है, तो वह मैं ही हूं, परन्तु वह अश्रय है। जहां तक वह पहुँचा है वह ठीक है। किन्तु अभी तक विश्व-बोध उस ने विकसित नहीं किया है, अनन्त को जानने के लिये उसने पूर्णतया स्थानीय ज्ञान (अपने परिच्छिन्न ज्ञान) से काम लिया है। परन्तु यह स्पष्ट है कि इस तरह से वह उसे कदापि नहीं जान सकता। अब हम देखें कि "बुद्धि से हम अनन्त तक पहुँच सकते
यह देह एक अविच्छिन्न देह है। यदि हाथ स्वतंत्र रूप से रहने की ठाने और कहे कि मैं रोटी कमाने वाला हूं, मैं सारी कमाई विलसूंगा, तो यह कैसे निभे ? भोजन मुख से खाया और उस पेट से पचाया जाने के स्थान पर और उसकी पोषण शक्ति के वितरण के बदले, भोजन पिचकारी द्वारा हाथ में पेवस्त करना होगा। है हंसी की बात कि नहीं ? क्या रुपये हाथ में चिपट जाते हैं ? एक पीली बरैया हाथ में काट खाती है और हाथ फूल जाता तथा दर्द करता है। किन्तु यदि हाथ काट दिया जाय तो निरन्तर पीड़ा और क्लेश रहता है, क्योंकि वह समग्र [देह] का है। इसी से जब उदर द्वारा भोजन पचाया जाता है, तब हाथ का भी उचित अंश में पोषण होता है। समग्र [शरीर] एक साथ काम करता है। इसी लिये जब हम समग्र [विश्व] से अपने को काट लेते हैं; तब हम क्लेश पाते हैं, और तब तक क्लेश पाते हैं जब तक हमें अपनी विश्वव्यापकता का अनुभव नहीं होता। इस अभिनय (खेल) में कोई चैन नहीं मिल सकता। जब विश्व-व्यापी ज्ञान की समुन्नति होती है, तब हमें सूझता है कि सारे शरीर अन्येान्याश्रित हैं, वे मेरे हैं, उनमें कोई विलगना नहीं है।
एक बार एक स्वामी एक सुनार के पास जा कर बोला "अपनी सर्वोतम अंगूठी निकाल कर परमेश्वर की अंगुली में पहना दो।" तदुपरान्त उसने जूते वाले से जाकर कहा, "अपना सब से बढ़िया जोड़ा लाकर परमेश्वर के पैरों में पिन्हा दो।" फिर वह दर्ज़ी के पास गया और उससे कहा, "अपनी सब से अच्छी पोशाक परमेश्वर को पहना दो", जिससे उसका अभिप्राय अपनी देह से था। जब लोगों ने
प्यारा है। वे उस से माता और पिता के विषय में कहते हैं। जब बच्चा तनिक बड़ा होना है और अपने आप इधर-उधर खेलने लगता है,तब वह ऐसे शब्द करता है जो समझ में नहीं आते। किन्तु अम्मा और दादा की बार बार कान में भनक पड़ने के कारण छोटा बच्चा भी उन ध्वनियों (आवाज़ों) की नक़ल करता है और जब बच्चा 'दा' कहता है, तब माता पिता से कहती है कि बच्चा तुम्हें पुकारता है। पिता बच्चे से कहना है, "यहां आओ," क्या लड़का इस का अर्थ जानता है ? नहीं। केवल पिता के फैले हुए हाथों और पुचकारने से बच्चे पर इस तथ्य का संस्कार पड़ता है कि यहे सब उसके (पिता के) पास जाने के लिये है। इस तरह हम देखते हैं कि बच्चे में अपने सम्बन्ध बोध की उन्नति उन लोगों की संगति से होती है, कि जिन में वह रहता सहता है। इसी तरह विश्व सम्बन्धी-बोध उन लोगों की संगति से उन्नति करता है कि जिनमें वह होती है, और जो अपना ईश्वरत्व अनुभव करने हैं। यदि तुम खिन्नता का अनुभव करना चाहने हो,तो तुम्हें उन लोगों की सोहवत की ज़रूरत है कि जो बहुत रंजीदा हैं। यदि प्रसन्नता का अनुभव करना है तो उनका संग करो कि जो जीवन और प्रफुल्लता से परिपूर्ण हैं। और इस प्रकार केवल संगति से यह ज्ञान प्रज्वलित होता है। चाहे प्रकृति की संगति हो, चाहे उज्ज्वल (शुद्ध) चित्त की,और चाहे उज्ज्वल चित्त के लेखों की, कोई बात नहीं है, किन्तु संगति उस में यह ज्ञान प्रज्वलित करती है। पिता माता पुकारते हैं मुनुआ, मुनुआ, और बच्चा मुनुआ हो जाता है। वह इसी तरह रजुआ भी हो सकता था। ऐसा है या नहीं ! फिर तीन या चार बच्चे एक कमरे में सो रहे हा। मुनुआ पुकारा जाता
है। अकेला मनुआ ही जवाब देता है, रजुआ नहीं देता। ज़ोर से पुकार होने पर भी रजुआ नहीं जागता। क्योंकि वह नहीं पुकारा गया था।
जिस मनुष्य ने आत्मा से अपनी अभिन्नता का अनुभव कर लिया है उससे कोई मनुष्य अज्ञान ही के द्वारा ऐसा पूछ सकता है कि तुम घास की एक पत्ती बना दो। प्रश्नकर्त्ता कह सकता है:—"अच्छा देखो, तुम जो अपने को परमेश्वर कहते हो, तुम क्या कर सकते हो ? परमेश्वर ने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की और तुम घास की एक पत्ती तक नहीं बना सकते। फिर भी आप अपने को परमेश्वर कहते हो। मुझे दिखाइये कि आप क्या कर सकते हो ?" क्या ईसा इसी तरह नहीं भड़काया गया था ? उसने शैतान के तानों की परवाह नहीं की, जिस ने उससे पहाड़ से फांदने का आग्रह किया था। किन्तु ईसा ने उसस कहा, "तू मेरे पीछे हट।" सारी शक्ति उसकी थी, किन्तु अविश्वासी के लिये वह करामात क्यों कर दिखावे। अगणित करामातें भी संशयशील को विश्वासी नहीं बना सकतीं। वह आत्मानुभव तब तक नहीं कर सकता जब तक उसमें भी विश्व के ज्ञान का उदय नहीं होता। जब मैं कहता हूं, "मैं परमेश्वर हूं". तब मेरा क्या आशय है ? यह क्षुद्र व्यक्तित्व ? नहीं, यह नहीं। यह मन ? नहीं, यह नहीं। बात इस प्रकार की है। मान लो कि एक मनुष्य शास्त्री (एम. ए.) है, और इसकी उसने उपाधि प्राप्त की है, मान लो कि वह राजा है,और उसकी राजा की पदवी है, यह तो व्यक्तित्व के लिये एक वाहरी वस्तु होगी, मानो कोई चांज़ ऊपर से टँकी हुई होगी। इसी तरह, मैं यदि कहूं कि
सांप काला है, तो यह (कालापन) साँप नहीं हुआ, यह तो साँप से बाहर की एक वस्तु है, साँप का एक गुण है। किन्तु जब मैं कहता हूं कि साँप रस्सी है, तब मेरा कथन उसे एक पूर्णतया भिन्न वस्तु बना देता है। मैं सम्राट हूं। सम्राट एक उपाधि है, एक पद है। किन्तु मैं कहता हूं कि मैं परमेश्वर हूं-इसका अभिप्राय वह तुच्छ अर्थ नहीं है जो तुम देखते हो, जैसे कि रस्सी साँप नहीं थी। वह एक भ्रान्ति थी। अपने अज्ञान-वश तुमने रस्सी को साँप समझा, किन्तु वह सत्य नहीं था, वह तो वास्तव में रस्सी थी। इसी तरह यह व्यक्तित्व एक भ्रान्ति है। मैं परमेश्वर हूं और केवल परमेश्वर, नित्य, सर्व हूं, कोई भी प्रतिद्वंद्वी (rival) नहीं है।
इसे तनिक और दूर तक समझाने के उद्देश्य से, ये दो लहरें हैं। पानी एक में जैसा है, उससे दूसरी में क्या कुछ भिन्न है ? नहीं, जल ठीक वही है। सम्पूर्ण सागर में जल ठीक वही है। यहां हम एक रूप पाते हैं और वहां दूसरा। क्या आत्मा इसमें कोई और है और उसमें कोई और ? नहीं। केवल एक ही सर्वरूप है, वही अद्वितीय है। ये देहें सब आत्मा की देहें हैं। वे सब मेरी हैं। कोई भेद नहीं है। विभिन्न भाषाओं में 'प्रकाश' को हम विभिन्न नामों से पुकारते हैं। अंग्रेज़ी में उसे 'लाइट' (light) कहते हैं, जर्मनी में 'लिचट' (licht) इत्यादि। किन्तु शब्दभेद के होते हुए भी है वह प्रकाश ही। क्या ऐसा नहीं है ? प्रकाश ठीक वही है, यद्यपि हम उसे विभिन्न नामों से जानते हैं। नामों से आत्मा में कोई भेद नहीं पड़ता, वह अवश्य सर्व रूप है, (सर्वं खल्विदं ब्रह्म)।
यह सुना, तो उसे परमेश्वर-निन्दक पाखण्डी कहने लगे और मांगा, "दूर करो उसे, उसे कारागार में डालना चाहिये।" दूर हटाये जाने से पहिले स्वामी ने सुनवाई की प्रार्थना की। उसने कहा कि जल में डाला जाने से पहले मैं आप लोगों से कुछ कहना चाहता हूं। उसने उन से कहा "यह संसार किसका है ?" उन्हों ने उत्तर दिया, "परमेश्वर का"। "चांद और सूर्य किसके हैं ?" "परमेश्वर के।" और जो कुछ उन खेतों में है ये सब किसके हैं ? "परमेश्वर का।" इसे तुम विश्वास करते हो ? उन्हों ने उत्तर दिया, "अवश्य, यह तो सत्य है।" तब उसने कहा, यह शरीर किसका है ? उन्हों ने कहा, परमेश्वर का। पैर किसके हैं ? परमेश्वर के। अंगुलियां किसकी हैं ? परमेश्वर की। सचमुच यह परमेश्वर का है। चूंकि उन्हीं की दलीलों से उसने उन्हें दिखा दिया कि उसने जो कुछ कहा था ठीक है, इस लिये निस्सन्देह कोई दण्ड नहीं दिया जा सका। वे थे और स्वामी के समान गद्दी उनकी दृष्टि नहीं गई थी।
भारत में जब कोई पुरुष मरने लगता है, तब कहा जाता है कि वह शरीर छोड़ रहा है; यहां लोग कहते हैं वह प्रेत या भूत को छोड़ रहा है। यहां जिस भाष्य का व्यवहार होता है उसकी अपेक्षा वहां का भाष्य ज़्यादा दुरुस्त है, क्योंकि यहां वाला भाष्य सूचित करता है कि शरीर से अतिरिक्त कोई प्रेत अन्य है। वहां यह भी कहा जाता है, "उसके प्राण निकल गये।" एक बार तीन मनुष्य एक साथ बैठे हुए शराब पी रहे थे। वे बड़े नशे में हो गये। उनमें से एक ने कहा, "कुछ खाया पिया जाय।" इस पर उन्हों ने
अपने एक साथी को मांस तथा दूसरी चीज़ें लाने को भेजा ताकि वे मौज उड़ा सकें। जब वह गया हुआ था तब बाकी दो में से एक की विलक्षण हालत हो गई और उसने अपने साथी से कहा, "मेरा दम निकलने चहता है।" दूसरे ने कहा, 'नहीं नहीं, तुम्हारा दम न निकलने पावे," और बीमार मनुष्य की उसने नाक दबा ली, ताकि दम न निकल सके। उसने उसके कान बन्द कर दिये और मुंह भी दबा दिया। उसने समझा कि इस तरह से सांस शरीर में रख सकूँगा। किन्तु हम भली भाँति जानते हैं कि इस कृत्य से उसके हाथ क्या लगा होगा। उन्हों ने सत्य का अनुभव नहीं किया था, और इस कृत्य की निरर्थकता नहीं समझे थे।
कृष्ण एक दावत देने वाले थे। सब मंत्री आमंत्रित हुए थे, किन्तु अपनी प्रेयसी राधा को उन्हों ने निमंत्रण नहीं दिया था। प्रधान मंत्री ने कृष्ण से राधा को निमंत्रण भेजने का निवेदन किया। किन्तु उन्हों ने मंत्री की बात न मान कर कहा, "नहीं।" तथापि महामंत्री ने कोई परवाह नहीं की और कृष्ण की दावत की सूचना जाकर राधा को दे दी। राधा ने मंत्री से कहा "जब आप भोज (उत्सव) करते हैं, तब आप अपने मित्रों को आमंत्रित तो करते हैं, किन्तु खुद अपने को नेवता तो नहीं भेजते, कि भेजते हैं ? मैं जानती हूं कि कृष्ण जी दावत कर रहे हैं। हम दोनों एक हैं। मुझे नेवता कैसे ?
एक दिन मजनू की माशूका ने कहा कि मेरी तबियत ठीक नहीं है, और कोई भी चीज़ फायदा नहीं करती। इस लिये वैद्य बुलाया गया। पुरानी रीति के अनुसार वह तुरन्त लैला को के लिये गया, अर्थात् उसके हाथ में
एक छोटा सा घाव कर दिया ताकि (खराब) खून निकल जाय। किन्तु लैली के बदन से खून नहीं निकला। परन्तु मजनू के बदन से खून की धार वह चली। इन प्रेमियों की एकता ऐसी थी। इस लिये यह शेर प्रसिद्ध है:—
खून रगे-मजनूं से निकला, फस्त लैला की जो ली। इश्क़ में तासीर है, पर जज़्बे-कामिल चाहिये॥
THE WORLD.
I saw, I studied and learnt it, This Primer well did Me describe,— Its letters were hieroglyphic toys,— In different ways did Me inscribe, This Alphabet, so curious one day, I relegate to the waste-paper basket, I burn this booklet leaf by leaf To light my lovely smoking pipe; I smoke and blow it through my mouth, Then watch the curly smoke go out.
संसार।
मैं ने (इस संसार को) अवलोका, मैं ने मनन किया, और जाना, इस प्रथम पुस्तक ने मेरा अच्छा वर्णन किया था, इस के अक्षर नक्शी खिलौने थे, विभिन्न ढंगों से इस ने मुझे खोद कर अंकित किया—
यह अति विचित्र वर्णमाला, एक दिन मैं रद्दी काग़ज़ की टोकरी के हवाले करता हूँ। मैं इस (संसार रूपी) पुस्तिका के पन्ने पन्ने अपनी प्यारी चिलम सुलगाने के लिये जलाता हूं। मैं अपने मुंह द्वारा इसे पीता और फूँक देता हूं। तव लच्छेदार धूम्र को बाहर जाते देखता हूं।