श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सम्मोहन और वेदान्त।

भाग 25 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 25 · अध्याय 6 / 7

सम्मोहन और वेदान्त।

1. इमरसेन का कहना है कि एक को चोर कहो और वह चोरी करने लग पड़ेगा। दूसरे शब्दोंमें यह कि किसी तरह की तजवीज़ (उपदेश) करो और कार्य में तुम्हें उस के अनुरूप नतीजा दिखाई देगा। यह कथन कुछ मामलों के लिये यथार्थ है, किन्तु सर्वव्यापी रूप से नहीं। कुछ मामलों में एक सूचना (तजवीज़) प्रत्यक्ष फल पैदा कर सकती है, किन्तु दूसरे मामलों में उस का बिलकुल विपरीत परिणाम हो सकता है। सूचना के सीधे लागूपन पर जो लोग अनु- चित ज़ोर देते हैं वे केवल आधे सत्य से ही परिचित हैं। वेदान्त के अनुसार, सूचनाएँ अपना प्रभाव उसी तरह पैदा करती हैं जैसे बिजली करती है, अर्थात् अनुमान (induc- tion) और प्रवाहन (conduction) के द्वारा। उन मामलोंमें परिणाम सीधा और सूचना के अनुरूप होता है कि जिन में हमारी सूचना सीधे अधिकरण (subject आधार) को छू सकती है, किन्तु जिन मामलों में हमारी सूचना सीधे रोगी (अधिकरण) तक नहीं पहुँच सकती, अर्थात् वह अवस्था जब कि रोगी मनुष्य की बुद्धि सूचनाकारी मनुष्य से द्वेष रखती है और बीच में बाधक बन कर सूचना को अधिकरण (subject) के कारण-शरीर से सीधा संस्पर्श नहीं होने देती, तब परिणाम आशय वा विचार किये हुए परिणाम से बिलकुल उलटा होता है। यह परिणाम अनुमान (induc- tion) द्वारा सम्मोहन (hypnotism) है। प्रथमवर्ती

परिणाम प्रवाहन (Conduction) द्वारा सम्मोहन है।

कारण शरीर मनुष्य के सम्पूर्ण (मानसिक) संस्कारों और अप्रकट शक्तियों का अनाविष्कृत (sub conscious) भंडारघर है। मनुष्य के सब काम, चेष्टायें वा गतियें, वर्ताव और दशायें (अवस्थायें वा स्थितियें) कारण शरीर में छिपी हुई सामग्री की फैलावट मात्र हैं, और तदनुकूल परिणाम का होना अनिवार्य है। कारण शरीर मनुष्य का हृदय, ठीक मध्य (केन्द्र), वादशाह है, अथवा तुम उसे मनुष्य का अधिकरणनिष्ठ मन ( subjective mind ) कह सकते हो।

ग—कारण शरीर। ख—सूक्ष्म शरीर या मानसता वा मानसिक अवस्था और बुद्धि या प्रज्ञा। क—स्थूल शरीर।

स्थूल शरीर-कृत कोई भी काम तुरन्त मानसिक शक्ति और विचार में रूपान्तरित हो जाता है, और कुछ दिनों तक मानसिक लोक में - साथ के चक्र में जो 'ख' से दर्शाया गया है—रहने के बाद, कारण शरीर में, जो उक्त शक्ल में 'ग' से दर्शाया गया है-पहुँच जाता है, और वे सकल संकल्प वा विचार जो स्थूल जगतसे आये बिना, अनायास, मानसिक लोक 'ख' में प्रकट होते हैं, कारण शरीर की पुरानी जमा की हुई शक्ति मात्र हैं, जो शक्ति फिर कारण शरीर से नीचे के लोक (सूक्ष्मशरीर) 'ख' में प्रकट होती है। इस प्रकार क, ख, और ग या तीन शरीरों का परस्पर सम्बन्ध कुछ कुछ

वायु जल और जलमय वाप्य के सम्बन्ध के सदृश है। अथवा बरफ, पहाड़ी नदी और वदी फिर नीचे मैदान में नदी के सम्बन्ध के समान है। वास्तव में, सम्बन्ध अविच्छिन्न है।

मान लो कि तुम राह पर कोई बीमार मनुष्य पड़ा देखते हो। स्वभावतः तुम उसकी सहायता करने पहुँचते हो। जब तुम उसकी सेवा सुश्रुषामें लगे होते हो,तब तुम्हारा उस काम की ओर बिलकुल ध्यान नहीं जाता, तुम पीड़ित मनुष्य की भरसक पीड़ा हरने के लिये सब कुछ करते रहते हो, तुम्हारी सब इंद्रियां और अंग पूर्णतया क्रियाशील होते हैं। जब तुम (पीड़ित) मनुष्य की सेवा कर चुकते हो और तुम्हारे शारीरिक अंग एवम् इंद्रियां विश्राम पाती हैं, तब तुम स्वभावतः देखोगे कि वह क्रियाशीलता और शक्ति जो पहले इंद्रियों के लोक में काम कर रही थी 'ख' लोक में पहुँच जाती है। दूसरे शब्दों में, तुम्हारा चित स्वभावतः तुम्हारे किये हुए कामों का चिन्तन करने लग जाता है, और तुम ज्ञानतः कार्य की भलाई या शूरता पर विचार करने लग पड़ते हो। कुछ कुछ देर के बाद यही शक्ति जो 'ख' लोक में काम कर रही थी, वहां न दिखाई पड़ेगी। वह कहां चली गई? क्या वह गायब हो गई है? ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि प्रकृति (कुदरत) में कुछ भी खोता नहीं है। वेदान्त के अनुसार यह शक्ति अदृश्य हो गई है, और उप—सचेतन अवस्था ( subconscious state ) 'क', कारण शरीर में पहुंच गई है, और इस प्रकार से कारणशरीर में जो शक्ति संचित होती है, वही 'ख' लोक में हमारे स्वप्नों में, हमारे आन्तरिक भावों में, आन्तरिक रुचियों, प्रवृत्तियों और शीलों

में प्रकट होगी। वेदान्त के अनुसार यह रुचियों की उपपत्ति ( rationale ) का वर्णन है।

परीक्षात्मक प्रमाण।

किसी मनुष्य की जागृत या सम्मोहित अवस्था में उसके कारण शरीर तक सीधी या फेरफार से पहुँच होने दो। वहां जिस प्रवृत्ति या रुचि की भावना पहुँचेगी, वह निः सन्देह उचित समय में स्वयं प्रकट होगी। जब कोई मनुष्य सम्मोहित होता है, तब की उत्तर-सम्मोहन सूचना (post hypnotic suggestion) जो जागने के बाद सम्मोहित पुरुष से किसी विशेष समय पर कोई विशेष कार्य करवाना चाहती है, वह सूचना कार्य करने की प्रबल रूचि के रूप में ठीक समय पर निस्सन्देह सफल होगी। इस प्रकार, जैसा कि इस कार्य में.जो कुछ कारण शरीर में सूचना के प्रवेश से स्पष्ट प्रकट किया जा सकता है, मनुष्य कृत सभी कामों में कारण शरीर में प्रविष्ट पहले की सूचनाओं का अस्तित्व है, ऐसा वेदान्त बतलाता है। उन सूचनाओं का कारण चाहे इंद्रियों का सम्मोहन हो, या आन्तरिक संस्कारों का सम्मोहन हो। अथवा सम्मोहन का कोई भी रूप हो, जिस ( सम्मो- हन ) संपूर्ण संसार वेदान्त के अनुसार बना हुआ है। कारण शरीर में स्वस्थता की सूचना भरने दो, स्थूल शरीर में परमेश्वरता की सूचना व्यापने दो, मनुष्य महात्मा हुए बिना नहीं रह सकता। कारण शरीर को गुलामी और कमज़ोरी की सूचनाओं से परिपूर्ण होने दो, स्थूल शरीर का दुर्बल और दास्य शील होना अनिवार्य है। अपने फल का मनुष्य आप ही विधाता है, क्योंकि उसी का कारण शरीर उसकी सम्पूर्ण परिस्थिति का ज़िम्मेदार है।

जिस प्रकार स्वप्रचार ( Somnabulism सोते सोते चलने ) या सम्मोहन की अवस्था में एक मनुष्य को उस स्थान पर भील दिखाई पड़ती है, जहां दूसरों के लिये कोई भील-वील नहीं है; वह मछियों के तालाव को देखता है, जहां दूसरों की कोई तालाव दिखाई नही देता; और वह उन चीजों को देखता है, जो दूसरों के लिये कभी मौजूद नहीं थी; ये सब दृश्य वा अलौकिक कार्य उस सम्मोहित मनुष्य के निजात्मा से ही उत्पन्न और राच्छत होते हैं। उसी प्रकार वेदान्त के अनुसार मनुष्य द्वारा देखा जाने वाला सम्पूर्ण संसार विशुद्ध रूप से केवल मनुष्य के निजात्मा से ही धारण किया जाता है। स्वप्न- चारिक और सांसारिक अवस्थाओं के दृश्यों वा अद्भुत व्यापारों में इतना ही अन्तर है कि पूर्व वर्ती अपेक्षाकृत अल्प जीवी तथा थोड़े काल की स्थिति वाले होते हैं। यह ठीक वैसी ही बात है जैसे कि कोई मनुष्य सम्मोहन की अवस्या में लाया जाकर अपने आप से भुला दिया जाय और उससे फिर निकाला न जाय। संसार के सब मनुष्य संसार के बिचित्र जादू में मोहित हैं, और उन का यह मोह भंग होने में बहुत, बहुत समय लेगा, और तव तक बना रहेगा, जब तक कि कोई ब्रह्मज्ञानी जीवन- मुक्त आकर उन के मोह को दूर करके उन को असली ब्रह्मज्ञान ( निज स्वरूप का ज्ञान ) न दे दे, और वे स्वस्वरूप में जाग न उठें। वह जो सार पदार्थ है, और जो सम्पूर्ण दृश्य वा व्यापारका आधारभूत है,वही अवश्य सत्य है,और जो कुछ उस के ऊपर आरोपित है. वह अवश्य भ्रमात्मक व्यापार वा दृश्य है। कारण शरीर का आधार वा अधिष्ठान जो सब अवस्थाओं में, सुग्धावस्था में, जाग्रत अवस्था में, स्वप्न की अवस्था में, और गाढ़ निद्रा आदि की अवस्था

में—एकसां रहता है, वही सच्चा आत्मा या सत्य मात्र है। दूसरी हरेक वस्तु उस के ऊपर आरोपित (कल्पित) है, और भ्रमात्मक दृश्य वा व्यापार है। आत्मानुभव का अर्थ लाचारी और मोह की अवस्था से मुक्त होना तथा दिखाई पड़ने वाले दृश्य (व्यापार) को इस परम सत्य में लीन कर देना हैं। माता और पिता की कल्पना वा सूचना (suggestion) के द्वारा जिस का अनुमोदन इन्द्रियों की सूचना से हुआ, संसार को मोह-निद्रा प्राप्त हुई,और ठीक ढंग से प्रतिकूल सूचना वा कल्पना द्वारा उस का निवारण हो सकता है।

शुद्ध आत्मा गलत क्यों चला?

यह क्यों और किस लिये तथा सम्पूर्ण चिन्ता सम्मोहन का एक अंश और परिणाम है; वे मूल कारण के बच्चे और प्रजा हैं। यह सवाल करन का अर्थ है कि कार्य के द्वारा कारण को काबू में लाने की आशा की जाय, बच्चे को पिता से आगे रखा जाय, और, गाड़ी को घोड़े से आगे रखा जाय। यह 'क्यों' की प्रवृति और सवाल करने की रुचि तथा यह सम्पूर्ण प्रश्न-प्रवाह व्याप्त सम्मोहनावस्था का एक भाग वा आविर्भाव (manifestation) है। मोह-नाश की अवस्था में ये कोई भी वर्तमान नहीं रहते। असली मूल अवस्था में इस में से कोई भी मौजूद नहीं होता, कोई भी प्रश्न सम्भव नहीं होता। यह सम्पूर्ण हेतु-माला कागज़ के टुकड़े पर खिंचा हुआ एक घूम-घुमाया चक्र है जिस का कभी भी अन्त नहीं होता। यह कारण-श्रृंखला कभी रुकेगी नहीं, पेंच पर पेंच डालती हुई घूमती चली जायगी, किन्तु एकमेव सत्य कागज के टुकड़े के समान है जिस पर ये

सब चक्कर और लपेटे ठहरी हुई हैं। वह (सत्य) श्रृंखला से परे है। इस प्रकार 'क्यों और किस लिये इत्यादि' प्रश्न करने का चेष्टा करना, कागज़ को चक्र का यह अथवा वह खिरा बनाने के तुल्य है, मानो कागज़ चक्र के सब घुमाओ (चक्करों), लपेटों और फेरों में मौजूद नहीं था। इस लिये सम्पूर्ण संसार को राम की आज्ञा है कि अपने आप को तुम ज़ंजीर या घूम-घुमाया चक्कर अथवा साँप की केंचलीमें उलझा हुआ न समझो। अपने आप को साँप की केंचली का नियन्ता, शासक और मालिक समझो, जानो, तथा अनुभव करो, और (तब) कारण-माला से तुम्हारा पार हो जाना निश्चित है। ठीक यही सत्य है, यही सत्य है। ॐ