श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

मनुष्य, अपने भाग्य का आप ही स्वामी है।

भाग 25 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 25 · अध्याय 7 / 7

मनुष्य, अपने भाग्य का आप ही स्वामी है।

तां० 24 जनवरी 1901 को गोल्डेन गेट हाल में दिया हुआ व्याख्यान।

महिलाओं और सज्जनों के रूप में अखिल विश्व के स्वामीः—

आज का विषय है "मनुष्य, अपने भाग्य का आप ही स्वामी है"। हम मनुष्य का विचार उसके वास्तविक स्वरूप के अनुसार करते चले आये हैं। वास्तविक मनुष्य, सत्य मनुष्य परमेश्वर है, परमात्मा है, जगदीश्वर के सिवाय और कुछ नहीं है। वास्तविक मनुष्य केवल एक ही शरीर के भाग्य का स्वामी नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण विश्व का स्वामी है।

आज 'मनुष्य' शब्द हम उसी अर्थ में ग्रहण करेंगे जिसमें वेदान्तियों का सूक्ष्म शरीर ग्रहण किया जाता है, आप उसे इच्छा, संकल्प, वासना का पुतला कह सकते हैं। इस परि- मित और संकीर्ण अर्थ में भी मनुष्य अपने भाग्य का आप ही स्वामी है। इस प्रश्न के विभिन्न पहलू हैं। उन सब पर एक ही दिन में विचार नहीं किया जा सकता। आज हम केवल सूक्ष्म लोक की दृष्टि से प्रश्न पर विचार करेंगे।

शायद यह विश्वास करना सरलतर है कि पैदा हो जाने पर मनुष्य अपनी परिस्थिति को बहुत कुछ बदल सकता है। माना कि एक मनुष्य एक विशेष परिस्थिति में डाल दिया गया है,यह विश्वास करना सरलतर है कि वह अपनी परिस्थिति को थोड़ा या बहुत क़ाबू में रख सकता है, वह

परिस्थितियों का मालिक बन सकता है, वह उनसे ऊपर उठ सकता है, और अपने को शिक्षा भी दे सकता है। अत्यन्त गरीब लड़के से वह अपने को देश का सबसे बड़ा धनवान बना सकता है, जैसा कि कुछ लोगों ने किया है। मुफलिस भी अपने को लोकमान्य और लोक-विख्यात बनाने में सफल हुए हैं। बहुत ही ज़लील हालत में पैदा होने वाल मनुष्य अपने को अति समुन्नत करने में सफल हुए हैं। नेपालियन बोनापार्ट का मामला ले लो, शेक्सपीयर की बात ले लो, लंदन के एक नगर-अधिपति (लार्डमेयर) व्हिटिंगटन की बात ले लो, चीन के एक प्रधान मंत्री की बात ले लो जो किसी समय गरीब किसान, निर्धन खेतिहर (किसान) था। यह सिद्ध करना सरल है कि इस संसार में जन्म होने पर हम अपने जीवनकाल में ही अपनी हालत बदल सकते हैं। यह साबित करना आसान है, किन्तु प्रश्न का कठिन भाग तब आता है जब वेदान्त कहता है कि अपने जन्म और अपने माता पिता के भी कर्ता तुम्ही हो। बच्चा मनुष्य का पिता है, किन्तु केवल इतना ही नहीं, बच्चा अपने पिता का भी पिता है। यह सिद्ध करना कठिन है। किन्तु वेदान्त कहता है कि चाहे जिस ओर से प्रश्न को देखो, अपने भाग्य के तुम आप ही विधाता हो। यदि तुम जन्मान्ध हो, तो भी अपने भाग्य के तुम्ही मालिक हो। तुम ही ने अपने आप को अन्धा बनाया है। यदि तुम दरिद्र मातापिता की सन्तति हो. तो भी तुम्ही अपने भाग्य के स्वामी हो, क्योंकि तुमने अपने आप को गरीब माता पिता से पैदा किया है। यदि तुम अत्यन्त अवांछनीय अवस्था में पैदा हुए हो, तो भी तुम्ही अपने भाग्य के मालिक हो, तुम्ही ने यह भी किया है। पैदा होने पर भी तुम्ही अपने भाग्यके मालिक

हो। आज हम प्रश्न के इसी पहलू पर विचार करेंगे। मनुष्य अपने जनक (मात-पिता) आप ही कैसे चुनता है? दूसरे शब्दों में, आज हम किसी हद तक जीव के आवागमन की व्यवस्था पर विचार करेंगे। उसके केवल एक अंश को हम लेंगे।

कुछ लोगों का विश्वास है कि जब मनुष्य मर जाता है, तब वह बिलकुल मर जाता अर्थातू नष्ट हो जाता है। कुछ लोग मानते हैं कि मनुष्य के मर जाने पर एक भावना-सृष्टि (संकल्पज) परलोक के अस्तित्व का निरूपण हमें करना ज़रूरी है,ऐसे लोक का कि जिसका कोई निर्विवाद प्रमाण हम इस दुनिया में नहीं दे सकते, ताकि अपने अन्तर्वर्ती, सहज, स्वाभाविक अमरता के विचार का समर्थन हो, ताकि हमारी अन्तर्वर्ती अभिलाषा के कारणों का निर्देश वा स्पष्टी- करण हो कि हमारे कुटुम्बी न मरें और हम अपने मित्रों को मरते न देखें। कुछ लोगों का इस ढंग का विश्वास है, और इन लोगों के पक्ष में भी कुछ सत्य है। इन लोगों की ओर जो सत्य है उस पर इसी हाल (कमरे) में उस दिन शाम को विचार किया गया था। किन्तु यह सम्पूर्ण सत्य नहीं है। मृत्यु के बाद तुम्हारा नरक जाना या स्वर्ग में प्रवेश करना सम्पूर्ण सत्य नहीं है। हमें इस लोक में, अर्थात् भौतिक अस्तित्व के लोक। स्थूल जगत में मामले को समझाना होगा। आप के आध्यात्मिक लोक के नियमों को आप के स्थूल लोक के नियमों के उल्लंघन करने का अधिकार नहीं है। यहां एक मनुष्य भूमि के भीतर दुपा है। "मट्टी मट्टी में मिल जाती है", ऐसा उस की कब्र पर कहा जाता है। किन्तु तनिक समझ लो। देह अवश्य मट्टी को

लौट जाती है, किन्तु देह का नाश नहीं हुआ, केवल उसका रूपान्तर हो गया है। देह के स्थूल तत्व बदले हुए रूप में वर्तमान हैं. वे नष्ट नही हुए हैं। तुम्हारे मित्र का वही शरीर कब्र पर सुन्दर गुलाब के रूप में फिर प्रकट होगा,तथा किसी दिन फलों और वृक्षों के रूपमें उसका फिर आविर्भाव होगा। उसका नाश नहीं हुआ है।

अच्छा हमें सन्देह किस बात में होता है? क्या आत्मा, सत्य, वास्तविक परमेश्वर का नाश हो गया है? नहीं, नहीं। उसका कदापि नाश नहीं हो सकता। असली व्यक्ति, सत्य मनुष्य का कदापि नाश नहीं हो सकता, वह कभी नष्ट नहीं किया जा सकता। तो फिर हम संदिग्ध (संदेहाकुल) किसके सम्बन्ध में हैं? यह है सूक्ष्म शरीर, जिसे दूसरे शब्दों में आप मानसिक वासनायें, मानसिक भावनायें, मनोविकार, मनोभिलाषायें, चित्त की लालसायें, अन्तःकरण की आकां- क्षायें और संकल्प कह सकते हैं। इन्हीं का सूक्ष्म शरीर बना है इस सूक्ष्म शरीर का क्या हुआ? मनुष्य भूमि में गड़ा है, तो क्या ये चीज़ें भी तुपी हुई हैं? नहीं, नहीं। ये तोपी नहीं जा सकतीं। तो फिर उनका हुआ क्या? सारा प्रश्न इस सूक्ष्म शरीर का है कि जो तुम्हारी मानसिक क्रिया-शक्ति, आन्त- रिक क्रियाशीलता या भीतरी विकारों, भावनाओं और कामनाओं का बना है। इस शक्ति, विकारों, भांतरी इच्छाओं आदि के फलका, इन के संयोग या समूह का क्या होता है? यह कहना कि यह आध्यात्मिक लोक को—यहाँ मेरा अभिप्राय उस लोक से है जिसे आप यांत्रिक नियमों से नहीं सिद्ध कर सकते—चला जाता है, तुम्हारे विचार से भले ही बिलकुल ठीक हो, किन्तु विज्ञान (Science) इसी स्थूल

लोक में प्रमाण चाहता है कि इस शक्ति का क्या हुआ। आप वह अटल, सार्वभौम नियम जानते हैं, जिसे विद्वान ने सब सन्देहों से परे कर दिया है, कि इस संसार में नाश किसी भी वस्तु का नहीं होता। शक्ति के आग्रह का नियम (Law of the Persistence of Force), पदार्थ के अवि- नाशत्व का नियम (the Law of the Indestructibility of Matter), शक्ति के संरक्षण का नियम (the Law of the Conservation of Energy) आपको बताते हैं कि कोई भी वस्तु नष्ट नहीं हो सकती है। अच्छा, यदि शरीर का नाश नहीं हुआ, केवल उसकी दशा बदल गई, और यदि हम में स्थित परमेश्वरता का नाश नहीं होता बल्कि वह नित्य निर्विकार रहती है, तो फिर इन मनोभिलापाओं, मानसिक क्रियाशक्ति, आन्तरिक जीवन का ही नाश क्यों हो जाना चाहिये? उनका नाश क्यों हो? शक्ति के संरक्षण का अनि- वार्य नियम हमें बताता है कि उनका नाश कभी नहीं हो सकता। तुम्हें यह कहने का कोई हक़ नहीं कि उनका नाश हो गया। उन्हें अवश्य जीना होगा, वे अवश्य जीवती हैं। वे चाहे अपना स्थान बदल दें, वे अपनी दशा चाहे बदल दें, परन्तु उनका जीना ज़रूरी है, उनका नाश कदापि नहीं हो सकता। ठीक इसी तरह कि जब तुम एक मोमबती ले कर जलाते हो, तब हम देखते हैं कि आध घंटे में वह सब समाप्त हो जाती है; मोम, बत्ती, सब कुछ चली जाती है। किन्तु रसायन विद्या सिद्ध करती है कि उसका नाश नहीं हुआ. वह लुप्त नहीं हुई है। मुकी-परीक्षा-नली (bent test tube) के द्वारा जिसमें तेज़ाब (Caustic Soda) और एक दूसरा रसायनी पदार्थ हो, यह प्रकट हो जाता है कि मोमबत्ती का जो सब अंश नष्ट हुआ प्रतीत होता था वह

मौजूद है, उस मुकी-परीक्षा-नली में रुका हुआ है। पानी से भरी हुई तशतरी (थाली) का सब पानी भाफ होकर उड़ जाने पर साधारण मनुष्य कहेगा, पानी का लोप हो गया, जल जाता रहा, किन्तु स्थूल पदार्थ-विज्ञान हमें बताता है कि जल जाता नहीं रहा है। प्रयोगों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह हवा में विद्यमान है, उसका नाश नहीं हो सकता।

इसी तरह जब मनुष्य मरता है, उसकी मानसिक शक्तियों उसकी इच्छाओं, मनोविकारों, भावनाओं की देखने में हानि होती है, और स्पष्ट में उनकी मृत्यु हुई प्रतीत होती है, किन्तु वेदान्त मानो अपनी आत्मा रूपी रसायन विद्या लेकर आता है और प्रयोगतः सिद्ध करके तुम्हें दिखा देता है कि उनका नाश नहीं हुआ है और न नाश होसकता है। यदि उसका नाश नहीं हुआ है, तो फिर क्या हुआ? हमें इस प्रश्न को वैसे ही हल करना होगा जैसे हम गणितके प्रश्न को हल करते हैं। हम एक सवाल ले लेते हैं,और उसकी निर्दिष्ट वा स्वीकृत बातों (data)तथा ज्ञातव्य वस्तु(quisita) पर, और अनुमान (hypothesis) तथा आवश्यक परिणाम पर दृष्टि डालते हैं। हम दोनों पहलुओं पर विचार करते हैं। कभी कभी केवल अनुमान या स्वीकृत पक्ष पर ही विचार करने से हमें पूरी बात सिद्ध करने में सफलता प्राप्त हो जाती है, और कभी कभी हमें परिणाम या ज्ञातव्य बात को लेकर उस पर विचार करना पड़ता है, और वार वार विचार करना होता है, और ज्ञातव्यपक्ष को स्वीकृतपक्ष से संयुक्त करना पड़ता है, या परिणाम को अनुमान से संयुक्त करना पड़ता है। अच्छा, स्वीकृत पक्ष क्या है, और ज्ञातव्य बात क्या है? जीवन और मृत्यु। ये हैं जानने की बात और जानी हुई

बात। जन्म का व्यापार स्वीकृत पक्ष के समान है, और मृत्युका व्यापार ज्ञातव्य वस्तु के समान है, अथवा व्यतिक्रम (vice versa) से। बात एक ही है। यहां दुनिया में इतने अधिक मनुष्यों का जन्म हो रहा है और वहां इतने अधिक की मौत हो रही है। ये लोग जो मरते प्रतीत होते हैं, यदि उनकी मानसिक शक्ति, या उनकी इच्छा इत्यादि भी उनके साथ मर जाती है, तो इस प्रकार का अनुमान करने से आप विज्ञान के स्थापित नियमों के विरुद्ध एक बात निरूपण करते हैं। यदि हमारी मानसिक शक्तियां चली जाती हैं अर्थात् नष्ट हो जाती हैं, तो कुछ नहीं (शून्य) में कुछ वस्तु चली जायगी। किन्तु आप जानते हैं कि यह असम्भव है। कुछ वस्तु 'कुछनहीं' में कदापि नहीं पैठ सकती। इस भूल से बचने के लिये आप को अवश्य विश्वास करना होगा कि मृत्यु के बाद मानसिक इच्छायें, मानसिक शक्ति और मानसिक क्रिया-शीलता 'कुछ नहीं' (शून्यता) में नहीं समा जातीं। तुम्हें पहले यह मान लेना ज़रूर होगा, तुम्हें यह स्वीकार कर लेना होगा। तुम्हें यह मान लेना उचित है, और तब दूसरा प्रश्न होगा, उनका क्या होता है?

मानसिक इच्छाओं आदि का क्या होता है, अब इस दूसरे प्रश्न का विचार हम जन्म के व्यापार पर विचारते हुए करेंगे। विभिन्न योग्यताओं, विभिन्न रुचियों, विभिन्न प्रवृत्तियों, विभिन्न कपालरेखाओं, विभिन्न मस्तिष्क-रचना के कितने ही लोग इस संसार में पैदा होते हैं। कुछ लोगों का दिमाग भारी होता है, कुछ का बहुत हलका होता है, कुछ का सिर गोल होता है, दूसरों के सिर समकोणकाट (oblong) होते हैं। यह क्या बात है! एक ही जनकों के

बच्चे पूर्णतया प्रतिकूल प्रवृत्ति के होते हैं। कितने माता- पिता एक ही घरमें हरसहाय और रामसहाय को जन्म दे रहे हैं, नन्दू और नन्दू के भाइयों को एक ही घरमें पैदा कर रहे हैं। महाविद्यालय के विद्यार्थी, एक ही छात्रावास में रहते हैं और एक ही अध्यापक से पढ़ने पर भी विभिन्न वृत्तियाँ के होते हैं, बिलकुल विपरीत रुचियों के होते हैं। एक गणित को पसन्द करता है,दूसरे की रुचि इतिहास पर होती है। एक कवि होता है, और दूसरा कुन्दज़हन। लोगों की मनोवृत्तियों और स्वभावों में कोई अन्तर है या नहीं? अन्तर है। तुम यह अस्वीकार नहीं कर सकते। कुछ लोग पैदायशी परिपक्व होते हैं, वे अपने बचपन में ही तेज़ होते हैं। दूसरे अपने लड़कपन में भी बहुत सुस्त होते हैं। वेदान्त का सवाल है कि प्रवृत्तियो और रुचियों के प्रभेद का क्या कारण है? यदि आप यह कह कर इस समस्या को हल करते हैं कि यही परमेश्वर की मर्ज़ी है, यह परमेश्वर का कार्य है, तो यह कोई जवाब नहीं है। यह तो केवल प्रश्न का टालना है। प्रश्न का टालना तो अदार्शनिक वा अतात्विक है, यह तो अपनी मूर्खता की घोषणा करना है। विज्ञान के मान्य नियमों से यह खमझाओ। यदि आप यह कहते हैं कि 'अपने बचपन से ही इन विभिन्न इच्छाओं को लेकर जो वे जन्म ग्रहण करते हैं' यह 'परमेश्वर की मर्ज़ी' है, तो विज्ञान के प्रस्थापित नियमों का आप उल्लंघन करते हैं। इस प्रकार तो आप खमली तौर पर निरूपण करते हैं कि 'कुछ नहीं' से कुछ वस्तु बाहर आ रही है। और यह असम्भव है, आप जानते हैं। इस कठिनता से बचने के लिये, आप को वह मानना वा ग्रहण करना पड़ेगा कि स्वभावों और प्रवृतियों का यह प्रभेद बच्चा मानो परलोक

से अपने साथ लाता है। ये विभिन्न प्रकार की इच्छायें 'कुछ नहीं' से बच्चे नहीं लाते हैं, बल्कि कुछ वस्तु से उन का आना हो रहा है। 'कुछ नहीं' से वे अस्तित्व में नहीं आ रही हैं। उन का अस्तित्व पहले भी रहा है। दूसरे शब्दों में, ये सब वासनायें, जिनको लोग जन्म के समय अपने साथ लाते हैं, पहले के उपस्थित रूप से लाई जाती हैं। ये इच्छायें कुछ समय पहले मौजूद थीं। यहां पर हम जन्म सम्बन्धी ज्ञातव्य विषय (quisita of birth) और मृत्यु के स्वीकृत तथ्य (data of death) पर विचार कर रहे हैं। वेदान्त दोनों को मिला देता और कहता है, जव मनुष्य मरता है, मरने के समय की उस की अपूर्ण इच्छाओं का नाश नहीं हो सका। विभिन्न स्पष्ट इच्छाओं से युक्त यह एक अजनवी यहां पैदा हुआ था। उस की इच्छायें 'कुछ- नहीं से' नहीं आ सकती थीं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जो इच्छायें मनुष्य के साथ कब्र में तोपी गई थीं वही घर में पैदा होने वाले नवीन मनुष्य के साथ फिर प्रकट होती हैं। यदि आप यह मान लो, तो आप उस भयंकर भूल से बच जाते हो जो आपने यह कहकर की थी कि कुछ चीज़ 'कुछ- नहीं' में खोगई है, और 'कुछ नहीं' से कोई चीज़ निकल आई है। हिन्दुओं के इस कर्म के नियम को मान लेने से आप उस विकट कठिनाई से छूट जाते हो, और मृत्यु तथा जन्म का सम्पूर्ण दृश्य वा व्यापार बिलकुल स्वाभाविक हो जाता है, एवं प्रकृति के क़ानूनों तथा इस विश्व के साम्य वा मेल के मान्य नियमों के सर्वथा अनुकूल हो जाता है।

फिर तुम देखते हो कि कर्म का यह क़ानून तुम्हें तर्क के एक दूसरे नियम के द्वारा जिसे तत्ववेत्ता कार्षण्य का क़ानून

(law of parsimony) कहते हैं, स्वीकार करना होगा। जब कोई बात स्वाभाविक और साधारण नियमों से समझाई जा सकती है, तब हमें खींचातानी की, अस्वाभाविक और अनुमानिक व्याख्याओं से न काम लेना चाहिये। कर्म का क़ानून अत्यन्त स्वाभाविक, अत्यन्त स्पष्ट और अत्यन्त वैज्ञानिक व्याख्या करता है। इसे छोड़ कर फालतू या लौकिक व्याख्याओं को आप न ग्रहण करें।

यहां पर एक प्रश्न होता है। वैज्ञानिक कहते हैं, नो नहीं, नो नहीं, नवजात शिशुओं की विभिन्न प्रवृत्तियों की व्याख्या हम कर्म के क़ानून के द्वारा न करेंगे, हमें कर्म के क़ानून का सहारा नहीं लेना चाहिये, वंश-परम्परा के क़ानून (Law of Heredity) के द्वारा बड़ी आसानी से हम इन सब बातों को समझ सकते हैं। वंश-परम्परा का नियम उन सब बातों की व्याख्या कर देगा, किन्तु वेदान्त का कहना है कि कर्म का क़ानून वंश-परम्परा के क़ानून के विरुद्ध नहीं है। यह (कर्म का क़ानून) उस (वंशपरम्परा के नियम) को ढक लेता है, उसकी व्याख्या कर देता है, किन्तु साथ ही साथ कर्म का क़ानून वंशपरम्परा के क़ानून की व्याख्या करने के अतिरिक्त, मृत्यु के समय, मानसिक शक्ति की देखने मात्र हानि की भी व्याख्या कर देता है। वंश- परम्परा का क़ानून इस (मृत्यु के समय मानसिक शक्ति की ज़ाहिरा हानि) की व्याख्या नहीं करता। इस लिये केवल वंशपरम्परा के क़ानून की अपेक्षा कर्म का यह क़ानून समस्त वैज्ञानिकों और तत्ववेत्ताओं के ध्यान का अधिक दावेदार है। कर्म का क़ानून वंशपरम्परा के क़ानून को कैसे समझाता है? किसी मनुष्य के मरने. पर उसकी सब इच्छायें देखने

में नष्ट हो जाती हैं। वेदान्त कहता है उन का नाश नहीं हुआ। जैसे जब मोमबत्ती जलती होती है, तब बत्ती और मोम की हानि हो जाती है, परन्तु जाहिरा जब हानि होती है तभी रसायनिक प्रीति ( Chemical affinity) से (दूसरे रूप में) उस की प्राप्ति भी होती है; अर्थात् रसायनिक प्रीति के द्वारा कार्बन ऑक्सीजन में मिल जाता है, हाइड्रोजन ऑक्सीजन में मिल जाता है। इस तरह ये इच्छायें, यह मानसिक शक्ति, या मनुष्य का सूक्ष्म शरीर, मृत्यु के बाद, आध्यात्मिक सम्बन्ध के एक क़ानून के द्वारा-अथवा हम उसे भौतिक सम्बन्ध भी कह सकते हैं—मिल जाते हैं। तुम्हारी सम्पूर्ण मानसिक शक्ति उस क्षेत्र में खिंच जाती है, जहां की अवस्था, परिस्थिति, उसकी वृद्धि के अनुकूल, फलने फूलने में सहायक, और विकास में बहुत उपकारिणी होती है। दूसरे शब्दों में, तुम्हारी इच्छाओं या मानसिक शक्ति का योग वा फल उस स्थान को खिंचा जाता है जहां तुम्हें अनुकूल भूमि मिलेगी, जहां सब अप्रयुक्त शक्तियां (unuti- lized energies) तथा अपूर्ण इच्छायें फलवान होंगी।

इस तरह हरेक व्यक्ति अपने माता पिता आप चुनता है। फिर हम देखते हैं कि जब एक मनुष्य ज़िन्दा होता है तब इच्छाओं से भरा होता है। उसकी अधिकांश इच्छायें उसके जीवनमें पूरी हो जाती हैं,किन्तु कुछ नहीं भी पूरी होतीं। इनका क्या होगा! क्या उनकी बिलकुल उपेक्षा होगी और वे नष्ट हो जायंगी! नहीं,नहीं। जब एक कली एक बाग में दिखाई देती है, तब उसके फूलने और खिलने की आशा होती है। कली से की गई आशा पूरी होती है, और ठीक उतरती है। हम देखते हैं कि चींटियों और क्षुद्र

प्राणियों की भी इच्छायें पूर्ण होती हैं। तो फिर मनुष्य की ही इच्छायें क्यों मारी जाँय? प्रकृति या ईश्वर द्वारा मनुष्य क्यों हँसा जाय? मनुष्य उपहास के लिये नहीं है। उसकी इच्छाओं का भी सफल होना ज़रूरी है। हमारी अधिकांश इच्छायें हमारे जीवन में फलती फूलती हैं। इस तरह हम देखते हैं कि इच्छायें ही हमारे कार्य बनती हैं, इच्छायें ही प्रेरक शक्ति हैं। किन्तु अनेक इच्छायें नहीं पूर्ण होतीं। उनकी क्या गति होगी? वेदान्त कहता है, "हो मनुष्य! ईश्वर द्वारा हंसे जाने के लिये तुम नहीं हो। तुम्हारी सब अपूर्ण इच्छायें और अतृप्त शक्ति अवश्येमव फलवान होगी, यदि इस लोक में नहीं तो दूसरे लोक में ज़रूर।"

यहां अब एक प्रश्न है। यदि पहले किसी योनि में हमारा अस्तित्व था, और यदि मृत्यु के बाद हमें फिर जन्म ग्रहण करना है, तो फिर पिछले जन्मों की हमें याद क्यों नहीं है? वेदान्त पूछता है, स्मृति क्या है! उदाहरण के लिये राम यहाँ तुमसे एक विदेशी भाषा में बोल रहा है। राम ने भारतवर्ष में कभी अंग्रेज़ी भाषा में व्याख्यान नहीं दिया। तुमसे अंग्रेज़ी में बोलते समय मातृभाषा का एक भी शब्द राम के चित्त में नहीं आता। किन्तु उस भारतीय भाषा की क्या पूर्ण हानि हो गई है? नहीं। वह वहां है। और यदि राम चाहे तो एक क्षण की सूचना से अरबी, फारसी, या दूसरी भारतीय भाषायें उसे याद पड़ सकती हैं। तब, स्मृति क्या है! यह तुम्हारे मन की झील है। राम के मामले में सब भारतीय भाषायें, फ़ारसी, अरबी और संस्कृत इस झील की तह (bottom) पर अवस्थित हैं। एक क्षण की सूचना से हम झील को क्षुब्ध कर सकते

हैं, और इन सब चीज़ों को तल (surface) पर ला सकते हैं, और यही किसी बात को याद करना है। तुम बहुतेरी बातें जानते हो, परन्तु सब की तुम्हें चेत नहीं होती। अपने मन की झील को हिला डुला कर इसी क्षण तुम उन से सचेत हो सकते हो, उन्हें तल पर लाने से, वे तुम्हारे चित्त में आ जाती हैं।

इसी तरह वेदान्त कहता है, तुम्हारे सब जन्म और भूतपूर्व जीवन वहां तुम्हारी चेतना की आन्तरिक झील में, ज्ञान की आन्तरिक झील में हैं। वे वहां हैं। इस समय वे तह पर अवस्थित हैं। वे तल ( सतह ) पर नहीं हैं। यदि तुम अपने पिछले जन्मों की याद करना चाहते हो, तो कोई कठिन बात नहीं है। अपने ज्ञान की झील ही की तह को खलमला कर आप जो चीज़ चाहें तल पर ला सकते हैं। यदि आप चाहें तो अपने पिछले जन्मों को भी याद कर सकते हैं, किन्तु यह प्रयोग करने के योग्य नहीं है, क्योंकि एक दूसरे क़ानून अर्थात् उत्क्रान्ति के क़ानून के अनुसार,तुम्हें आगे बढ़ना है, तुम्हें अग्रसर होना है। पुराने मुर्दे पड़े रहने दो, भूत काल को अतीत की खवर लेने दो। तुम्हारा उस से कोई सम्बन्ध नहीं। तुम्हें तो आगे जाना है।

फिर ये सब चीज़ें जिन में तुम्हें इतनी दिलचस्पी है, जिन्हें तुम इतना अधिक पसन्द करते हो,जिन से तुम आकृष्ट होते हो, तुम दुनिया में देखते हो। वेदान्त कहता है, कर्म के क़ानूनों के अनुसार तुम इन्हें पसन्द करते हो, तुम्हारी इनमें दिलचस्पी है, तुम्हारा इन पर स्नेह है। तुम इन्हें पहचानते हो, केवल इसी कारण से कि किसी समय तुम ये सब

चीज़ें रह चुके हो, तुम चट्टानें हो चुके हो, तुम चट्टानों में सो चुके हो, तुम नदियों के साथ बहे हो, तुम पौधों के साथ उगे हो, तुम पशुओं के साथ दौड़े हो, और तुम उन सब को देखते और पहचानते हो। अब हम इसे दूसरी दलील से साबित कर सकते हैं।

यह अफ़लातूं की दलील को काम में लाना है। स्मृति क्या है? स्मृति से प्रतीत होता है कि जिस वस्तु को हम अभी याद कर रहे हैं उसे हम पहले से जानते थे। दृष्टान्त के लिये कल्पना करो कि कुछ लोग एक साथ ये व्याख्यान सुनने आते हैं, कभी न विछुड़ने वाला जोड़ा। इस भवन ( हाल ) में दिये हुए सात व्याख्यानों में वे आये, किन्तु आठवें व्याख्यान में केवल एक ही अकेला पधारता है, दूसरा नहीं। विछुड़े हुए अकेले मनुष्य से मित्रगण यह प्रश्न करेंगे, "तुम्हारा मित्र या प्रेमपात्र कहां है? वह कहां है?" यह प्रश्न क्यों किया जायगा? इस प्रश्न का कारण स्मृति का क़ानून है, जो संग वा संयोग का क़ानून भी है। हम दोनों को सदा साथ देखते हैं, दोनों हमारे सुपरिचित हो जाते हैं, दोनों हमारे चित्त में मानो एक हो जाते हैं, दोनों संयुक्त थे, और बाद को हम उन में से एक देखते हैं, और यह एक हमें तुरन्त दूसरे को याद कराता है। इस तरह पर दिमाग में संग वा संयोग क़याम हुआ था, और इस तरह पर याद आई। यही याद उस वस्तु की भूतपूर्व जानकारी की सूचना देती है जिसे हम स्मरण करते हैं।

अब यह तुम्हारा तर्क है। सब मनुष्य मरणशील हैं। शिवलाल मनुष्य है, अतएव वह मरणशील है। तुम्हारी सब दलीलें, तुम्हारी सब युक्तियां, तुम्हारा सब तर्क-शास्त्र इस

आधार (premise) पर अवलम्बित है—सब मनुष्य मरण- शील हैं, शिवलाल एक मनुष्य है। केवल ये दो बातें कहो, परिणाम को रोक रक्खो। स्मृति की भांति तुम्हारे चित्त में तुरन्त परिणाम - शिवलाल मरणशील है-आजाता है। यह नतीजा कैसे निकला? अफ़लातूं की व्याख्या के अनुसार स्मृति के क़ानून की क्या यह करतूत नहीं है? है। तीन कथन "सब मनुष्य मरणशील हैं," "शिवलाल एक मनुष्य है," और "शिवलाल एक मरणशील है"-मौजूद हैं। इनमें से दो तुम्हारे सामने रक्खे गये थे, "सब मनुष्य मरणशील हैं," "शिवलाल एक मनुष्य है"। ये दो तुम्हारे सामने रक्खे गये थे, और तुरन्त, जैसा कि दार्शनिक कहते हैं, विचार के नियमों के अनुसार, तीसरा कथन तुम्हारे चित्त में आ जाना है। हरेक के चित्त में वह आ जायगा। ऐसा क्यों होता है। ठीक वैसे ही यह भी होता है, जैसे कि जब हम एक मित्र को देखते हैं तो हमें उस दूसरे मित्र की याद आ जाती है जो सदा इस मित्र के साथ रहता था। अच्छा, यह याद क्योंकर आई, विचार का यह नियम हरेक और सब के दिमाग में स्वाभाविक क्यों है? विचार का यह नियम जिस के द्वारा इस प्रकार की याद आई हरेक और सब के चित्त में क्योंकर मौजूद है? एक प्रकार की स्मृति से। याद से पूर्वज्ञान सूचित होता है। हरेक बच्चा जिस का दिमाग है तर्क करने की योग्यता रखता है,हम हरेक बच्चे से बहस कर सकते हैं। जब वह कुछ सोचना शुरू करता है, तब हम उस के सामने यह तर्क पेश करें तो वह इसे मंजूर कर लेगा।

यहां पर हम रेखागणित का एक साध्य (Proposition)

सिद्ध कर रहे हैं। हम तुरन्त नतीजे पर पहुँच जाते हैं। यह नतीजा याद द्वारा प्राप्त हुआ। हरेक और सब के दिमाग में स्वाभाविक होने के कारण यह याद इस बात का ठीक 2 प्रमाण है कि जो चीज़ें स्मृति द्वारा तुम्हारे दिमाग में फिर संजीवित होती हैं, उन से तुम पहले ही से परिचित हो। स्मृति से जो वस्तुयें तुम्हारे मस्तिष्क में फिर संजीवित होती हैं उनसे परिचित और अवगत होनेके लिये यह ज़रुरी है कि किसी न किसी समय तुम ने उन्हें सीखा या प्राप्त किया होगा। तुम्हें अब यकीन है कि तुम ने उन्हें इस जीवन में सीखा या प्राप्त नहीं किया। यह ज्ञान तुम्हें कहां से मिला? वेदान्त कहता है, किसी भूतपूर्व जन्म में।

अब एक दूसरा सवाल है। अच्छा, यदि हम अपने भाग्य के विधाता हैं, तो हम में से कोई भी ग़रीब नहीं होना चाहता। फिर हम गरीब क्यों पैदा होते हैं? हम सब चाहते हैं कि धनी पैदा हों, हम में से कोई भी ग़रीब नहीं होना चाहता, फिर भी हम में से बहुतेरे ग़रीब पैदा होते हैं। यह क्या बात है? वेदान्त जवाब देता है, तुम्हें इन मामलों पर ठीक ठीक रीति से दृष्टि डालनी चाहिये, उन्हें पूरी तरह पर समझना चाहिये। आधी सच्चाइयों पर भरोसा न करो। सब पहलुओं से तथ्यों को देखो। यह सत्य नहीं है कि हरेक व्यक्ति लंदन का नगरपति होने का इच्छुक है। यह एक मनुष्य है जो पांच रुपये सप्ताह पाता है, उस की अभिलाषा है कि सात रुपये सप्ताह की जगह मिल जाय। लंदन का नगर-पति होने का विचार उस के चित्त में कभी नहीं आता। नहीं, तुम देखते हो, यह सत्य नहीं है।

अब दूसरी ओर ( दृष्टि-स्थल ) से मामले को देखिये।

लोग अपनी अभिलापाओं में असंगत और अनुचित हैं। वे अपनी अभिलापाओं को परिस्थिति के योग्य नहीं बनाते। वे अभिलापाओं के गुलाम हो जाते हैं। वे अपनी इच्छाओं के स्वामी नहीं हैं, और इस प्रकार वे प्रतिकूल होते हुए भी, अपनी ही इच्छाओं से वे कठिनताओं और तंगियों में पहुंच जाते हैं, वे चिन्ता और दिक्कत में पड़ जाते हैं।

अब हरेक और सब के लिये वार्तालाप का रोचक हिस्सा आता है। मान लो कि यह एक मनुष्य है जो अपनी पाश- विक वृत्तियों को चरितार्थ करना चाहता है। वह ज्ञान से कोई मतलब नहीं रखना चाहता। वह आध्यात्मिकता, धर्म, सदाचार, नाम या कीर्ति के भंजड़ में किसी तरह नहीं फंसना चाहता। वह इन बातों से कोई मतलब नहीं रखना चाहता। उसे केवल अपनी पाशविक इच्छाओं, अपनी इन्द्रियों की वासनाओं को तृप्त करने से प्रयोजन है। यह मनुष्य मरता है। ( दृष्टान्त के लिये यह एक कल्पित मामला है )। अब यह किस प्रकार के माता-पिता अपने लिये बनावेगा? उस की इच्छा नहीं चाहती कि विद्वान माता- पिता उसे जन्म दें। जिस प्रकार की शक्ति उस में है उसे अपने अनुकूल भूमि के लिये धनवान माता-पिता की ज़रू- रत नहीं है। इस शक्ति को शिक्षित या सभ्य माता-पिता की आवश्यकता नहीं है। नहीं, वेदान्त कहता है कि यदि यह मनुष्य निरन्तर पाशविक वृतियों का बना हुआ है, तो सुअरों या कुत्तों के रूप में उसे अत्यन्त उपयुक्त और उचित शरीर प्राप्त होगा, क्योंकि उस योनि में उसे पिता-माता से वह शरीर प्राप्त होगा जो खान से नहीं अघाता, जिसे पाशविक वृत्तियों के अनुशीलन से तृप्ति नहीं होती, जो

शरीर इस के लिये उपयुक्त है कि वह अपने आप को बहूदा बनावे। वह उस प्रकार का शरीर पावेगा। उस की इच्छाओं की पूर्ति के लिये उस का सुअर या कुत्ता के रूप में पैदा होना ज़रूरी है। इस तरह वह अपने भाग्य का आप ही स्वामी है, तब भी जब कि वह कुत्ता या सुअर है।

इस दुनिया के लोग जब किसी चीज़ की इच्छा करते हैं, तब वे नहीं देखते परिणाम क्या होगा, वे नहीं देखते कि वे कहां पहुँचेंगे। और बाद को जब वे अपनी इच्छाओं का फल पाते हैं, तब वे रोना और चीखना और अपने भाग्य को कोसना शुरू कर देते हैं, अपने ग्रहों को रोते हैं, वे रोना और अपने ओठ चवाना शुरू कर देते हैं। इस प्रकार जब तुम इच्छा करते होते हो, तभी तुम समझ लेते हो कि परिणाम क्या होगा। तुम स्वयं ही इस मुसीबत को लाते हो, और दूसरा कोई नहीं।

पूर्वीय भारत के एक कवि की कथा राम तुमको सुना- वेगा। वह मुसलमान कवि था। बड़ा भला और चतुर था। वह एक देशी राजा के दरबार में रहता था। राजा उस से बड़ा स्नेह करता था। एक रात को देशी राजा ने देर तक उसे अपने साथ रक्खा। कवि ने तरह तरह की कवितायें, सरस कथायें और अत्यन्त रोचक कहानियां सुना कर उस का मनोरंजन किया। चतुर कवि ने यहां तक राजा को प्रसन्न किया कि वह नींद को भूल गया, और बड़ी रात बीते सोने गया। रानी ने पूछा कि सयनघर सोने को आने में इतनी देर होने का क्या कारण है। राजा ने उत्तर दिया, "ओह, आज एक विलक्षण पुरुष आ गया था, वह बड़ा ही मज़ेदार, रसिक और रोचक था।" तब रानी ने उस

का अधिक हाल पूछा। रानी के कौतूहल के कारण राजा को कवि की योग्यता और गुणों का इस कदर विस्तार पूर्वक वर्णन करना पड़ा कि दोनों बहुत देर तक जागते रहे और बिलकुल तड़का होते होते सोये। रानी का कौतूहल बहुत ही बढ़ गया। उस ने राजा से कहा कि उस रसिक कवि को किसी दिन मेरे महल में भी लाओ। दूसरे दिन यह रसिक कवि रानी के सामने लाया गया। आप जानते हैं कि भारत वर्ष की रीतियां पश्चिमी रीतियों से बिलकुल भिन्न हैं। भारत में नारियां पृथक कमरों में रहती हैं और मर्दों से, पुरुषों से, बहुत नहीं मिलती जुलतीं। वे अलग रहती हैं, विशेषतः मुसलमान रमणियां, हिन्दू नारियां नहीं, बहुत बड़ा घूंघट काढ़ती हैं, और अपने पति या अत्यन्त शुद्ध अथवा सच्चरित्र और शरीफ के सिवाय किसी और के सामने मुँह नहीं खोलतीं। तथास्तु, बादशाह इस शायर को (हम लोगों की जवान में) रनिवास में, ज़नाने महल में लाया। वहां उस ने अपनी कवितायें पढ़ीं और कहानियां सुनाईं। महिलाओं का दिल बहुत ही खुश हुआ। तब कवि ने बतलाया कि मैं अन्धा हूँ, नेत्रों के एक रोग से पीड़ित हूँ। किन्तु वास्तव में वह अन्धा नहीं था। इस कवि का दुष्ट अभिप्राय यह था कि वह रनिवास में रहने पावे, कोई उस पर सन्देह न करे, और नारियां उसे अन्धा समझ कर बिना किसी संकोच के उस के सामने निलकें और वातचीत करें, इस कमरे से उस कमरे में जायं और उस के सामने अपने चेहरों पर लम्बी नकाबें न डालें। अब उसे अन्धा समझ कर राजा ने उसे नारियों के भवन में रहने दिया किन्तु आप जानने हैं कि सत्य छिपाया नहीं जा सकता। "Truth crushed to earth shall rise again

The eternal years of God are hers." दलमल कर ज़मीन में मिला दिया जाने पर भी सत्य फिर उठेगा, परमेश्वर के नित्य वर्ष उस के हैं।"

सत्य छिपाया नहीं जा सकता, वह एक दिन अवश्य प्रकटेगा। एक दिन इस कवि ने एक लौंडी से कोई चीज़ लाने को कही। आप जानते हैं कि भारत में जो लोग तनिक धनी होजाते हैं वे बड़े आलसी हो जाते हैं। आलस्य धनशालिता का लक्षण समझा जाता है। तुम बड़े ही कुलीन हो यदि तुम खुद कुछ नहीं कर सकते। यदि एक आदमी की सहायता से तुम गाड़ी में बैठ पाते हो,तो तुम बड़े ही शरीफ आदमी हो। यदि कपड़े पहनने में तुम्हें किसी आदमी से सहायता लेनी पड़ती है, तो तुम बड़े ही कुलीन हो। यदि चलने फिरने में भी तुम्हें एक आदमी का सहारा लेना पड़ता है तो तुम बड़े ही कुलीन हो। इस प्रकार से परावृ- लम्बन प्रतिष्ठा का चिन्ह है। स्वाधीन और स्वावलम्ब को पराधीनता और दासत्व समझा जाता है। जब इस कवि को राजा के भवन में एक अच्छी जगह मिल गई, तो अपनी जगह से उठ कर दूसरे किसी मनमाने स्थान पर कुर्सी ले जाकर रखना वह अपनी शान के खिलाफ समझने लगा। इस लिये एक दासी को उसने ऐसा करने की आज्ञा दी। किन्तु उसने कटुता से जवाब दिया कि मुझे छुट्टी नहीं है, इसके बाद दूसरी दासी वहां आई। उसने उसे बढ़कर अपने पास आने का संकेत किया और कुर्सी हटा देने को कहा। किन्तु उसने कहा कि कमरे में कोई कुर्सी नहीं है। उसने कहा, "पानी का वह गिलास मेरे पास ले आओ।" उसने कहा, "इस कमरे में एक भी नहीं है। मैं दूसरे कमरे से

तुम्हारे लिये लाती हूँ।" उसने कहा, "उसे लाओ, एक तो कमरे में है, तुझे दिखाई नहीं पड़ता, वह है।" काम कराने की धुन में वह अपने को भूल गया। यही हुआ करता है। इस तरह पर सत्य झूठों से दिल्लगी करता है। तुम जानते हो कि वी वी मैक्वैथ ने वह काम किया, परन्तु वह उसे छिपा न सकीं। सत्य ने उसे विक्षिप्त कर दिया और अपने आपही उसने डाक्टर से क़बूल दिया। यही हुआ करता है। यह कुदरत का क़ानून है। जब इस कवि ने कहा, "वहां वह है, तुम्हें नहीं दिखाई पड़ता?" तब दासी काम कर देने के बदले तुरन्त दौड़ कर सीधी रानी साहिबा के पास पहुँची और भेद खोल दिया, तथा बोली, "देखिये! यह मनुष्य अन्धा नहीं है, यह दुष्ट पुरुष है, इसे घर से निकाल बाहर करना चाहिये।" वह घर से निकाल दिया गया, किन्तु लगभग तीन दिन के बाद वह सचमुच अन्धा हो गया। यह क्या बात है? बात क्या है, कर्म का क़ानून आप को बताता है कि यह मनुष्य अपनी ही मर्ज़ी से अन्धा हो गया है। अपने भाग्य का वह आप ही मालिक है। उस के अपने आपही ने उसे अन्धा किया। किसी दूसरे ने उसे नेत्रहीन नहीं किया, उसी की इच्छाओं ने उसे अन्धा किया। बाद को अन्धापन आने पर उसने रोना और विलपना, दांत पीसना और छाती पीटना शुरू किया।

एक आदमी एक भारी बोझ अपने कंधों पर लिये जाता था। वह बूढ़ा था, कमज़ोर था, उसे ज्वर था, और उष्ण देश में, भारत में रहता था। वह एक पेड़ की छाया में बैठ गया और कंधों से बोझ उतार कर कुछ देर तक विश्राम लिया और चिल्लाया, "हे मौत! आ जा, हे मौत! मेरा

संकट हर, मुझे चैन दे।" कहानी कहती है कि मृत्यु देव उसी ठौर उसके सामने प्रकट हो गये। जब उसने काल की ओर देखा, तब वह चकित होगया, और कांपने लगा। यह भयानक मूर्ति, यह कोई दानवत् वस्तु क्या है? उसने कालदेव से पूछा,"तुम कौन हो?" कालदेवने कहा,"मैं वह हूँ जिसको तुमने याद किया था, तुमने अभी मुझे बुलाया है, और मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करने आया हूँ।" तब तो बूढ़ा काँपने लगा और बोला, 'मैंने तुम्हें इस लिये नहीं बुलाया था कि मुझे मार डालो, मैंने तुम्हें केवल इसी लिये बुलाया था कि मेरा बोझा उठवा दो और मेरे कंधों पर धरवा दो।"

लोग यही करते हैं। तुम्हारी सब कठिनाइयां, तुम्हारी सब मुसीबतें, और जिन्हें रंज कहा जाता है उन सब को लाने वाला तुम्हारा अपना ही आप है। तुम अपने भाग्य के आप ही विधाता हो। किन्तु जब (इच्छित) वस्तु आती है, तब तुम रोना और भीखना शुरू करते हो। तुम मृत्यु का आवाहन करते हो, और जब मृत्यु आती है तब तुम रोने लगते हो। किन्तु ऐसा नहीं हो सकता। जब तुम नीलाम में सब से ऊँची बोली एक बार बोल देते हो, तब तुम्हें चीज़ लेना ही पड़ती है। जब तुम घोड़े को दौड़ाते हो, तब गाड़ी घोड़े के पीछे दौड़ती ही है। इस लिये जब एक बार तुम इच्छा करते हो, तो तुम्हें परिणाम भोगना ही पड़ेगा। इसका क्या कारण है कि लोग सामान्यतः बुढ़ापे में मरते हैं और जवानी में बहुत कम लोग मरते हैं? वेदान्त कहता है कि जब लोग बूढ़े हो जाते हैं, तब उनके शरीर रोगी हो जाते हैं। बीमारी उन्हें सताती है और तब वे मौत की इच्छा करने लगते हैं। वे संकट से

छूटने की इच्छा करने लगते हैं, और संकट से उनका छुट-कारा होता है। इस तरह पर आप की मृत्यु को लानेवाला आप का अपना ही आप (मन वा आत्मा) है। वेदान्त के अनुसार प्रत्येक मनुष्य आत्महन्ता है। मृत्यु उसी क्षण आती है, जब तुम उस के आने की इच्छा करते हो। लोग चढ़ती जवानीमें क्यों मर जाते हैं? इस समय शायद राम पर आप विश्वास न करेंगे, किन्तु यदि आप ठीक ठीक अव-लोकन करें तो राम, इस समय जो कथन कर रहा है उस से आप को सहमत होना पड़ेगा। राम ने बहुतेरे लोगों को चढ़ती जवानी में मरते देखा है। राम ने उन के गुप्त जीवन में प्रवेश किया, सारे मामले की जाँच की, और मालूम हुआ कि ये युवक दिलोजान से मृत्यु के अभिलाषी थे, अपनी परिस्थितियों से परेशान थे, और आसपास को बदलना चाहते थे। सदा यही बात होती है। अब ठोस वा मोटे उदाहरण देने के लिये समय नहीं है, परन्तु यह एक तथ्य है।

भारत वर्ष के एक साम्प्रदायिक महाविद्यालय में एक होनहार युवक अध्यापकी का काम करता था। एक सार्व-जनिक सभा में उस ने कहा कि मैं अपना जीवन इस निमित्त अर्पण करूंगा। उस ने अपने आप को उस काम के अर्पण कर दिया। कुछ समय तक बड़ी सरगर्मी से वह वहां काम करता रहा और फिर उस की राय बदली, उस के विचार फैले, उस का चित्त विस्तृत हुआ, उस के विचार बढ़े, और फिर उन सम्प्रदायावलम्बियों के साथ मिल कर काम करना उस के लिये कठिन हो गया, उन सम्प्रदायवादियों की हार्दिक सहानुभूति उसके साथ न रह सकी। फिर भी उसे उन

के साथ किसी तरह मिल कर काम करना पड़ता था, क्योंकि वह वचन दे चुका था. क्योंकि वह उन के पक्ष में अपने को बांध चुका था। इस लिये इस युवा पुरुष के लिये छुटकारे का कोई उपाय नहीं था। उस का मन यदि एक स्थान में था तो तन किसी दूसरे स्थान पर, मन और तन मिले हुए नहीं थे। यह हालत नहीं टिक सकी। मनुष्य की मृत्यु हो गई। मृत्यु के सिवाय किसी दूसरे उपाय से वह अपनी अवस्था को नहीं बदल सका। मृत्यु से हालत बदल गई। इस तरह पर मौत भी हौवा नहीं है जैसी कि वह जान पड़ती है।

तुम अपनी परिस्थितियों के स्वामी हो, आप ही अपने भाग्य के ईश हो। लोग दुःखी कैसे बनते हैं ? मुसीबतें क्यों कर आती हैं ? इच्छाओं के संग्राम (conflict) से। तुम्हें एक प्रकार की इच्छा होती है जो तुम से एक प्रकार का काम करवाती है. और फिर तुम्हें दूसरी इच्छायें होती हैं, जो तुम से दूसरे प्रकार के काम करवाती हैं। दोनों इच्छायें मौजूद हैं। एक इच्छा तुम्हें लेखक, वक्ता, अध्यापक, व्याख्यानदाता,या प्रचार की हैसियत से एक पद पर उठा ले जाना चाहती है, और दूसरी प्रकार की इच्छा उत्पन्न होती है और वह चाहती है कि तुम इन्द्रियों के दास बनो। ये पर-स्पर विरोधी इच्छायें हैं, और साथ २ नहीं टिक सकतीं। (ऐसी हालत में) क्या होता है? दोनों की पूर्ति आवश्यक है। जब कि एक की पूर्ति होती है तब दूसरी को हानि पहुँचती है और तुम्हें व्यथा होती है। जब कि दूसरी की पूर्ति होती है तो पहिली को हानि पहुँचती है और तुम्हें दुःख होता है। इस प्रकार से लोग अपने को क्लेश में डालते हैं। तुम्हारी पीड़ा भी यह प्रकट करती है कि तुम अपने

भाग्य के आप ही स्वामी हो। बड़ी सुन्दर कहानी से राम इस का दृष्टान्त देगा।

एक भारतीय के दो स्त्रियां थीं। आप जानते हैं कि हिन्दू बहुविवाह में कदापि नहीं विश्वास करते, किन्तु मुसलमान करते हैं। यह मुसलमान था, जिसके दो स्त्रियां थीं। उनमें से एक कोठे पर रहती थी और एक नीचे। एक दिन एक चोर घर में घुसा। उसने सब माल चुराना चाहा, किन्तु घरके आदमी जाग रहे थे, और चोर को कोई चीज़ चुराने का अवसर नहीं मिला। सबेरा होने के समय घर के लोगों ने चोर को देखा, और उसे पकड़ कर मजिस्ट्रेट के सामने ले गये। कुछ चोरी नहीं गया था, फिर भी चोर ने घर में सेन्ध तो लगा ही दी थी। यह एक अप-राध (जुर्म) था। मजिस्ट्रेट ने चोर से कुछ सवाल किये जिसने तुरन्त स्वीकार किया कि मैंने चोरी करने की नियत से घर में सेन्ध लगाई थी। मजिस्ट्रेट उसे कुछ दंड देने ही वाला था। उस मनुष्य ने कहा, "जनाब! आप जो चाहे कर सकते हैं, आप मुझे कारागार में भेज सकते हैं, आप मुझे कुत्तों के सामने फेंक सकते हैं, आप मेरे शरीर को जला सकते हैं, किन्तु एक दंड मुझे न दीजिये"। मजिस्ट्रेट ने चकित होकर पूछा, 'वह कौन सा'? मनुष्य ने कहा, 'मुझे दो स्त्रियों का पति कभी न बनाइये। यह दंड मुझे कभी न दीजियेगा।" यह क्यों ? तब चोर बताने लगा कि वह कैसे पकड़ा गया, कोई वस्तु चुराने का अवसर उसे क्योंकर नहीं मिला। उसने कहा कि सारी रात मकान के मालिक को जीने पर खड़ा रहना पड़ा, क्योंकि एक स्त्री उसे ऊपर घसीट रही थी और दूसरी नीचे। उसके सिर

के बाल नुच गये और पैरों के मौज़े फट गये। सारी रात वह जाड़े से काँपता रहा। इस तरह पर मैं पकड़ा गया और कुछ भी न चुरा सका।

ऐसा ही है। तुम्हारे सब क्लेश तुम्हारी परस्पर विरोधी इच्छाओं के कारण आते हैं, और तुम्हारी इच्छाओं में संगति (harmony) नहीं होती, तथा आप जानते हैं कि जिस घर में फूट होती है वह नष्ट हो जाता है। इस लिये अपने दिलों और चित्तों को जाँच कर देखिये कि वहां शान्ति है या नहीं। यदि आप का लक्ष्य एक है और उद्देश्य अविभक्त है तो आपको कोई कष्ट नहीं होगा, कोई व्यथा नहीं होगी। किन्तु यदि वहां विरोध और प्रतिकूलता है तो घर अवश्य गिरजायगा और आपको अवश्य कष्ट होगा। तुम्हारी व्यथा का यह कारण है, और आप स्वयं ही उसके लाने वाले हैं। आप अपने भाग्यों के आप ही मालिक हैं। मनुष्य की नीच आकांक्षायें भी होती हैं और ऊँच भी। दोनों में लड़ाई होती है। किन्तु विकास के सार्व-भौम सिद्धान्त के अनुसार, इस भगड़े और लड़ाई में, योग्यतम बचा रहेगा। योग्यतम को जीते रखना प्रकृति का अभीष्ट है। इस प्रकार योग्यतम को जीते रखने वाले इस सार्वभौम कानून के अनुसार, इस संग्राम में उन इच्छाओं की विजय होती है जिनमें सब से अधिक शक्ति होती है। किन्तु यह शक्ति कहां से आती है? शक्ति सत्य से, और केवल सत्य से आती है। केवल उन्हीं इच्छाओं की जय होगी जिनमें सत्य, सदाचार, न्याय, उतमता या शुद्धता की मात्रा अधिक है। तुम्हें संगीन की नोक अर्थात् खांड़े की धार पर उन्नति और सुधार करना पड़ेगा।

तुम सदा विषयभोग में नहीं सड़ सकते। स्वार्थमय तृष्णा और लोभ में तुम नहीं सड़ सकते। तुम्हें उठना होगा, धीरे धीरे किन्तु बिना किसी सन्देह के। यह है तुम्हारे सामने आनन्द। यहां यह कर्म का कानून हरेक और सब के लिये आनन्द लिये खड़ा है।

इच्छाओं की पूर्ति क्यों होना चाहिये? वेदान्त कहता है तुम्हारी असली प्रकृति, तुम्हारा असली आत्मा अमर है। राम अमर परमेश्वर है। अब तुम्हारी सब इच्छायें, मन और तन, सत्य के महासमुद्र में, नित्यता के महासागर में केवल लहरें और तरंगें होने के कारण, उसी पदार्थ के स्वभाव के हैं जिसके कि वे बने हुए हैं। सत्यनारायण, परमात्मा या आत्मा दुनिया को अपनी सांस की तरह बनता है। संसार मेरी सांस है। आपकी आँखों की झपक में, मैं ने दुनिया की सृष्टि की। तुम्हारे नयनों की झपक में दुनिया की सृष्टि होती है। (मैं तुम्हारा आत्मा हूं)। इन सब इच्छाओं में परमात्मा और तुच्छ अहंकार (अर्थात् शुद्ध व मलिन अहंकार वा खुदा-खुदी) भाव मिले हुप हैं। इच्छाओं का वह स्वरूप जो आन्तरिक परमेश्वरता या अमरता पर निर्भर है सब इच्छाओं को पूर्ण होने के लिये वाध्य करता है। और इच्छाओं के वे तत्व जो माया पर अवलम्बित हैं इच्छाओं की पूर्ति में देर लगाते हैं। तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति में जो यह देर होती है उसका कारण तुम्हारी इच्छाओं का माया-तत्व है, और तुम्हारी इच्छाओं की पूर्ति की असंदिग्धता (certainty) का कारण तुम्हारी इच्छाओं की आन्तरिक दैवी प्रकृति है। अच्छा, आप कहेंगे कि इच्छायें दैवी कैसे हुईं? सब इच्छायें

प्रेम के सिवाय और कुछ नहीं हैं, और प्रेम ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं है। क्या प्रेम ईश्वर नहीं है? सब इच्छायें उस प्रकार की हैं जैसी कि आकर्षण शक्ति। आकर्षण शक्ति क्या है? यहां पृथिवी चन्द्रमा को आकर्षित कर रही है। यहां सूर्य पृथिवी को अपनी ओर खींच रहा है। यहां ग्रह एक दूसरे को अपनी ओर खींच रहे हैं—'विश्व-प्रेम', यहां प्रीति वा स्नेहाकर्षण (affinity) का कानून है, एक अणु दूसरे अणु को खींच रहा है। अणुओं या परमाणुओं में संसक्ति वा संलग्नता (cohesion) की शक्ति क्या है? एक अणु दूसरे अणु को खींच रहा है। आकर्षण करना तो तुम्हारे स्थिति-बिन्दु से इच्छा करना है। यह खिंचाव, यह शक्ति, यह संसक्ति वा संलग्नता, यह रासायनिक चिपकाव या लगाव, यह आकर्षण क्यों हैं? यह सब इच्छा है। तुम्हारी सब इच्छायें दैवी वा परमेश्वरीय हैं। इस प्रकार तुम्हारी इच्छाओं का ईश्वरीय स्वभाव उन (इच्छाओं) की पूर्ति पर आग्रह करता है। किन्तु जब तुम उन्हें स्वार्थी या शारीरिक अथवा व्यक्तिगत बना देते हो, तब उनका स्वार्थी-पन उनको (इच्छाओं को) माया की प्रकृति का बना देता है और इस प्रकार उनकी पूर्ति में देर होती है।

तुम्हारी इच्छाओं की सरलता और निर्विघ्नता पूर्वक पूर्ति के लिये, और उनकी पूर्ण उपलब्धि के लिये, तुम्हें अपनी इच्छाओं के माया-स्वभाव को घटाना होगा, तुम्हें अपनी इच्छाओं की ईश्वरीय या निस्वार्थ-प्रकृति को प्रधानता देनी होगी, और तब वे फलवती होंगी।

हम एक कविता पढ़ कर इस विषय को समाप्त करेंगे। एक बार अनुभव कर लो कि तुम अपने भाग्य के आप ही

स्वामी हो, फिर देखो, तो कितने सुखी तुम होते हो। जब तुम ॐ रटंत (उच्चारते) हो, और जब तुम समझते हो कि अपने भाग्य के तुम आप ही स्वामी हो, तब रोने और भीखने और दुःखी होने की कोई ज़रूरत नहीं रह जाती। तुमने अपनी अवस्थायें विभिन्न वर्णाई हैं। तुम अपनी प्रभुता की उपलब्धि करो, अपने आप को अपने आस-पास का गुलाम न समझो, इस सत्य का अनुभव करो, इस सत्य को जानो कि तुम अपने भाग्य के आप विधाता हो, और तुम चाहे जिस दशा में हो, तुम्हारा आस-पास कुछ भी हो, देह चाहे कारागार में डाल दी जाय, अथवा तेज धारा में वह रही हो, अथवा किसी के पैरों से कुचली जा रही हो, याद रखो "मैं वह हूँ" जो सब अवस्थाओं का स्वामी है, मैं देह नहीं हूँ, 'मैं वह हूँ, भाग्य का स्वामी!" तुम्हारे मित्र तुम्हारे से बनाये जाते हैं। जिनको तुम मित्र कहते हो उनको तुम्हारी ही इच्छायें तुम्हारे इर्द गिर्द रखती हैं। जिनको तुम शत्रु कहते हो उनको भी तुम्हारी ही इच्छा ने तुम्हारे इर्द गिर्द रक्खा है। ऐ शत्रुओं, तुम्हें मैं ने बनाया है, ऐ मित्रो! तुम मेरी कृति हो। इस कल्पना को अनुभव करो, और इसका परिज्ञान करो और फिर देखो कि तुम कितने सुखी हो जाते हो।

Oh, brimful is my cup of joy, Fulfilled completely all desires Sweet morning's zephyrs I employ; 'Tis I in bloom their kiss admires,' The rainbow colours are my attires, My errands run like lightning fires, The smiles of rose, the pearls of dew.

The golden threads, so fresh, so new, All sun's bright rays, embalmed in sweet- ness, The silvery moon, delicious neatness. The playful ripples, waving trees, Entwining creepers, humming bees, Are my expression, my balmy breath, My respiration is life and death, What shall I do, or where remove ? I fill all space, no room to move. Shall I suspect or I desire ? All time is me, all force my fire Can I be doubt or sorrow-stricken ? No, I am verily all causation. All time is now, all distance here, All problems solved, solution clear All ill and good, all bitter and sweet In those my throbbing pulse doth beat. All lovers I am, all sweet hearts I, I am desires, emotions I. No selfish aim, no tie, no bond, To me do each and all respond, Impersonal Lord in foe and friend, To me doth every object bend.

अरे, मेरे हर्ष का प्याला लबालब भरा है, सब इच्छायें बिलकुल पूर्ण हैं, मधुर प्रभात की मंदवायु मेरी चेरी है,

खिलाव (खिड़ने) में उस के चुम्बन का मज़ा मैं लेता हूँ, इन्द्र-धनुप के रंग मेरे वस्त्र हैं, मेरे संदेशों वा दूत विजली की आग की भाँति दौड़ते हैं, गुलाब की मुसक्यान, ओस के मोती, सूर्य की सब चमकीली किरणें, मधुरता में लिपटी हुई, रुपहला चांद, सुस्वादु स्वच्छता, खिलंदड़ी तरंगें, लहराते वृत्त, अंकधारिणी लतायें, भनभनाते भौंरे. मेरा प्रकाशन वा आविष्करण है, मेरी सुगंधित सांस, मेरा श्वासोच्छ्वास जीवन और मृत्यु है। क्या मैं करूँ, या कहां हटूँ? मैं सम्पूर्ण स्थान को भरे हूँ, कहां सरकने की जगह नहीं है। क्या मैं सन्देह करूँ या क्या इच्छा करूँ? सब समय मेरा है, सब शक्ति मेरी अग्नि है। क्या मैं सन्देह या शोक पीड़ित हो सकता हूँ? नहीं, मैं सचमुच सब हेतु हूँ, सब काल अब है, सब अन्तर यहां, सब समस्यायें हल (हैं),(उनका) सुलभाव स्पष्ट है। सब बुरा भला, सब कड़ुआ और मीठा। उनमें मेरी फड़कती नाड़ी चलती है। सब प्रेमी मैं हूँ, सब माशूक़ मैं हूँ, मैं इच्छायें हूँ, भावनायें मैं हूँ। कोई स्वार्थपूर्ण लक्ष्य नहीं, कोई गाठ नहीं, न बन्धन, हरेक और सब मेरे प्रति उत्तर दायी हैं, निराकार स्वामी, शत्रु और मित्र में, हरेक पदार्थ मुझे प्रणाम करता है। ॐ ! ॐ !! ॐ !!!