मृत्यु के बाद
या सब धर्मों की संगति ( एक वाक्यता )
15 जनवरी 1903 को गोल्डेन गेट हाल में दिया हुआ व्याख्यान ।
महिलाओं और भद्रपुरुषों के रूप में अमर और सब धामों के उद्देश्य रूप:—
इस हाल में अब तक जो व्याख्यान दिये गये हैं वे बहुत कठिन थे, उनके विषय गूढ़ थे । किन्तु आज का भाषण अपेक्षाकृत सरल है ।
कुछ वर्ष पूर्व जब राष्ट्र भारतवर्ष में था, तब उसके हाथ
में एक रेवरेंड डाक्टर, एक अमेरिकन सज्जन, भारत के एक विश्वविद्यालय के अध्यापक की एक पुस्तक आई । इस पुस्तक का विषय था "मृत्यु के उपरान्त" । बड़े ही सुन्दर रूपक वा अलंकार द्वारा उसमें दिखलाया गया था कि यह दुनिया एक स्टेशन के समान है और परलोक खाड़ी के अथवा सागर के पार दूसरे स्टेशन के समान है, और इस खाड़ी वा सागर के पार जाने वालों को टिकट खरीदना पड़ता है । जिनके पास ठीक प्रकार के टिकट नहीं हैं, वे जहाज़ पर से गहरे गर्त (abyss) में फेंक दिये जांयगे । जिनके पास ठीक तरह के टिकट हैं, वे ठिकाने पर जाने पावेंगे । टिकट कई तरह के हैं, पहला दर्जा, दूसरा दर्जा, तीसरा दर्जा, इत्यादि । फिर कुछ नकली झूठे टिकट हैं । वे सफ़ेद, काले, पीले, हरे, आदि हैं । किन्तु ठीक तरह के टिकट, जो तुमको ठिकाने पर पहुँचावेंगे, लाल हैं, और ईसा अर्थात् क्राइस्ट का खून उनमें भरा हुआ है । जिनके पास ऐसे टिकट हैं सिर्फ वही सफलतापूर्वक ठिकाने पर पहुँवने पावेंगे, दूसरे कदापि नहीं, कदापि नहीं, । सफ़ेद, काले, पीले, तथा अन्य प्रकारों के टिकट मानो दूसरे धर्मों के टिकट हैं, और लाल टिकट जिनमें ईसू मसीह का रक्त लगा हुआ है इसाई धर्म के टिकट हैं । पुस्तक का यह विषय था और बड़ी सुन्दरता से पेश किया गया था । रेवरेंड डाक्टर ने अपनी सम्पूर्ण प्रविज्ञा और अंग्रेज़ी साहित्य का अपना सम्पूर्ण ज्ञान यह पुस्तक लिखने में लुटा दिया था ।
केवल इसाईयों का ही नहीं, दूसरे धर्मों के लोगों का भी, कुछ कुछ ऐसा ही विश्वास है । मुसलमान कहते हैं कि मृत्यु के बाद, टिकट-चेकर, बड़े स्टेशन मास्टर, या हिसाब
जांचने वाले हज़रत मोहम्मद हैं, और जिनके पास हज़रत मोहम्मद का चिन्ह न होगा, वे नरक में डाल दिये जांयगे । दूसरे धर्मों के भी इसी प्रकार के विचार हैं, और वे कहते हैं कि सब मुर्दे चाहे कहीं भी—अमेरिका, यूरोप, अफ़रीका, आस्ट्रेलिया या एशिया में—वे मरे हों, भुगतान के लिये एक मनुष्य के हवाले कर दिये जांयगे, चाहे वह ईसा हो, चाहे मोहम्मद, चाहे बुद्ध, ज़ोरोआस्टर, कृष्ण, या कोई और व्यक्ति । धर्मों में झगड़े और विवादों का यही कारण है । यह अन्ध विश्वास, यह गर्वान्ध विचार इस संसार में अधिकांश उस रक्तपात का कारण है, जो (रक्तपात) धर्म के नाम में किया गया है ।
इस विषय पर वेदान्त दर्शन का विचार तुम्हारे सामने रक्खा जायगा । वेदान्त इन सब धर्मों का समन्वय कर देता है, और कहता है कि दूसरे के अधिकारों को बिना दबोचे इनमें से हरेक ठीक हो सकता है । आप के ठीक होने के लिये यह ज़रूरी नहीं है कि आप अपने भाईयों को ग़लत करें । यह बहुत बड़ा अपराध है, और लगभग एक घंटे के थोड़े से समय में वेदान्त दर्शन की व्याख्या के अनुसार विषय के केवल अत्यन्त मुख्य पहलुओं पर हम विचार कर सकते हैं ।
इस संसार की सब उन्नति की एक सुन्दर रेखा है । विश्व का सब विकास और उन्नात एक तालबद्ध रेखा में है । इस संसार का सब आन्दोलन वा स्फुरण स्वरबद्ध है । उठाव और गिराव, ऊँच और नीच, एक नियमबद्ध क्रम में हुआ करते हैं । जैसा कि गणित विद्या प्रकट करती है कि हरेक अधिकतम (maximum) के लिये एक
न्यूनतम (minimum) होना ज़रूरी है । अधिकतम और न्यूनतम बिन्दु बारी बारी से होते हैं । दिन-रात हमारी गति तालबद्ध है । जब तुम्हें चलना होता है, तब पहले एक पैर उठाते हो और फिर दूसरा । साल की ऋतुएँ निश्चित क्रमपूर्वक एक दूसरी के बाद होती हैं । वही ऋतुएँ बार २ होती हैं, जिसे सामयिक गति कहते हैं । इस संसार में सामयिक गति है । नित्य तुम जागते हो और सोते हो, तुम सोते हो और जागते हो । जिस प्रकार सोना और जागना ठीक क्रमपूर्वक एक दूसरे के बाद होता है, उसी प्रकार वेदान्त के अनुसार, जीवन और मरण, मरण और जीवन भी ठीक क्रम से एक दूसरे का अनुगमन करते हैं । इस सम्पूर्ण विश्व में किसी स्थान पर एकाएक रुकाव कभी नहीं हुआ । कालचक्र क्या कभी रुकता है ? नहीं । क्या आप जानते हैं कि समय कब वा कहां से शुरू हुआ ? क्या स्थान (Space) कहीं भी कभी रुकता है ? नहीं । कहीं अन्त नहीं है । क्या नदियां कभी रुकती हैं ? आप कहते हैं कि वे रुकती हैं । नहीं, वे नहीं रुकतीं । जो नदियां समुद्र में गिरती हैं, वे भाप के रूप में ऊपर उठती हैं, फिर लौट कर पहाड़ों को जाती हैं, और फिर बह कर समुद्र में पहुँचती हैं, और समुद्र से फिर लौट कर पहाड़ों को जाती हैं । मान लो कि यहां एक मोमबत्ती है । लगभग एक घंटे में वह जल जाती है, बत्ती और सब । तुम कहते हो वह मर जाती है । नहां, वह नहीं, वह नहीं मरती । रसायन विद्या बताती है कि वह नहीं मरती । उस का केवल रूपान्तर हो जाता है । उस से उत्पन्न होने वाले कार्बन डायोक्साइड (carbon dioxide) और जल फिर उद्भिज्ज पदार्थों (वनस्पतियों) में प्रकट होते हैं । कुछ भी नहीं मरता है ।
इस दुनिया में सारी प्रगति ( progrsss ) एक चक्र में या गोलाकार है। यह देखो, तुम ज़िन्दा हो, तुम मरते हो। मृत्यु के बाद की यह दशा क्या सदा बनी रहेगी? तुम्हें ऐसा कहने का कोई अधिकार नहीं है। इस प्रकार का बयान करना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। जब तुम कहते हो कि मृत्यु के बाद अनन्त नरक भोग है और जीवन बिलकुल नहीं है,तब तुम संसार के संचालक रूप अति कठोर नियमों का अवज्ञा शुरू कर देते हो। तुम्हें ऐसी बात कहने का कोई अधिकार नहीं है। मनुष्य के मरने के बाद, यदि परमेश्वर उसे सदा के लिये नरक में डाल देता है, तो वह परमेश्वर बड़ा ही वैरशील है। एक मनुष्य अपनी 70 साल की ज़िन्दगी टेर करके ( बिताकर ) मर जाता है। विचारे को ठीक प्रकार की शिक्षा पाने के अवसर नहीं मिले, अपने उन्नत करने के उचित उपाय उस के हाथ नहीं लगे। दीन माता-पिता से उस का जन्म हुआ था, जो उस शिक्षा नहीं दे सके, जो उसे किसी देवल-स्थान वा में नहीं ले जा सके, और वह विचारा मर गया। इस मनुष्य के पास ईसा के रक्त से रञ्जित टिकट नहीं था। तो क्या यह मनुष्य सदा के लिये नरक में डाल दिया जायगा? अरे! जो परमेश्वर ऐसा करता है वह क्या अत्यन्त प्रति हिंसा- परायण ( प्रतिकार परायण वा बदला लेने वाला ) नहीं है? न्याय के नाम में इस प्रकार का बयान करने का उन्हें कोई अधिकार नहीं है। वेदान्त के अनुसार, मर जाने के बाद किसी मनुष्य का सदा मुर्दा बना रहना आवश्यक नहीं है। प्रत्येक मृत्यु के बाद जीवन है, और प्रत्येक जीवन के बाद मृत्यु। और वास्तव में मृत्यु एक नाम मात्र है। हमारा उसे बड़ा जूजू ( bugaboo) बना देना भारी भूल है। उस में कुछ
भी भीषण या द्वेष्य वा गर्हित नहीं है, वह तो दशा का एक परिवर्तनमात्र है।
अच्छा, जब तक तुम इस दुनिया में जीवित हो, 70 या 80 साल तक मान लो,तब तक तुम दीर्घ, दीर्घ जाग्रत अवस्था का उपयोग कर रहे हो। इस दुनिया में जीवन एक दीर्घ, निरन्तर जाग्रत अवस्था है, और जीवन के बाद यह नाम मात्र मृत्यु वेदान्त के मत से उतने ही दर्जे की एक लम्बी निद्रा मात्र है। वेदान्त के अनुसार यह मृत्यु एक दीर्घ निद्रा है। जिस तरह हर 24 चौबीस घंटे में लग भग तीन या चार घंटे की निद्रा का उपभोग करने के बाद तुम फिर जागते हो, उसी तरह मौत के विश्राम को भोगने के बाद तुम्हें फिर इस दुनिया में जन्म लेना पड़ता है, तुम फिर अवतीर्ण होते या जन्म लेते हो। पुनर्जन्म या फिर देह धारण करना एक झपकी लेने के बाद फिर जागने के समान है।
वेदान्त के अनुसार, मर जाने के बाद मनुष्य तुरन्त उसी स्थल पर पुनर्जन्म नहीं लेता है। जब एक बीज पेड़ से गिरता है, तब उससे तुरन्त नया पेड़ नहीं उग आता है, कुछ देर लगती है। जब कोई मनुष्य एक घर छोड़ता है, तब वह तुरन्त दूसरे घर में नहीं प्रवेश करता, उसमें उसे कुछ देर लगती है। इसी तरह मरने के बाद मनुष्य तुरन्त दूसरी देह नहीं धारण करता है। उसे एक बीच की हालत से होकर गुज़रना पड़ता है, जिसे हम 'मृत्यु' की दशा या दीर्घ निद्रा की दशा कहते हैं। अब इस दशा का क्या हाल है? यह दशा अर्थात् मृत्यु और दूसरे जन्म के बीच की दशा किस प्रकार की है? यह निद्रा की अवस्था है, और
इसमें निद्रा के सब गुण हैं। आप जानते हैं कि जब कोई मनुष्य सो जाता है, तब स्वप्न में वह उसी प्रकार की चीज़ें देखता है जैसी उसने अपनी जागती हालत में देखी थीं। यह साधारण नियम है। कभी कभी इसके अपवाद भी देखने में आते हैं, किन्तु साधारणतः मनुष्य अपने स्वप्नों में उसी प्रकार की चीज़ें देखता है जैसी वह अपनी जाग्रत अवस्था में देखता था। जो लोग विश्व विद्यालयों में परी- क्षाओं के लिये पढ़ते हैं, वे राम के इस कथन का अनुमोदन करेंगे, कि जब उनकी परीक्षा बहुत निकट होती है और वे बड़े श्रम से उसकी तैयारी करते होते हैं, तब उन्हें अपने स्वप्नों में प्रायः उसी प्रकार की बातें दिखाई पड़ती हैं और वे उसी तरह का काम करते रहते हैं जैसे काम में वे दिन में लगे हुए थे। जब उनकी परीक्षा हो जाती है और परिणाम की आशा लगाये होते हैं, तथा इच्छा करते हैं कि वे उत्तीर्ण हों, एवम् कृतकार्य उपाधि धारियों की सूची में प्रथम हों, उन दिनों में जब कि वे सन्देह की दशा में होते हैं, तब वे परीक्षा के परिणाम के संबंध में स्वप्न देखा करते हैं। जो लोग किसी विशेष विषय या पदार्थ से प्रेम रखते हैं, वे रात को उसके स्वप्न अवश्य देखते हैं।
जब राम विद्यार्थी था और बी. ए. परीक्षा की तैयारी कर रहा था, तब एक सहपाठी बड़ा खिलंदड़ा जवान था। गाने, नाचने और खेलने में वह अपना समय बिताता था, एक दिन एक सज्जन ने इस मित्र से पूछा कि पढ़ने लिखने में तुम कितने घंटे लगाते हो। उसने मुसकराते हुए कहा "पूरे 18 घंटे।" मित्र ने कहा, "इसका क्या मतलब है? तुम चार या पांच घंटे मेरी मौजूदगी में बरबाद करते हो,
मेरी आंखों के सामने। मैं जानता हूँ कि तुम 24 घंटों में द या 1 घंटे सोते हो, और फिर तुम्हें केवल 10 या 12 घंटे बच रहते हैं, परन्तु फिर भी तुम कहते हो कि मैं पूरे 18 घंटे पढ़ता हूँ।" युवक ने कहा, "आपने गणित नहीं पढ़ा है। मैं साबित कर सकता हूँ कि मैं पूरे 18 घंटे पढ़ता हूँ।" उस सज्जन ने कहा, "भला, यह कैसे?" नवयुवक ने कहा, "मैं और यह राम एक ही कमरे में रहते हैं। मैं वास्तव में 12 घंटे पढ़ता हूँ, और वह (राम) 24 घंटे पढ़ता है। ये 36 घंटे हुए। अब औसत निकाल लो, 18 उसके हिस्से के हुए और 18 मेरे हिस्से के।" भद्रपुरुष ने कहा, "अच्छा, माना कि तुम 12 घंटे पढ़ते हो, परन्तु मैं यह मानने को तैयार नहीं हूं कि राम पूरे चौबीसों घंटे पढ़ता है। यह कैसे संभव है? मैं जानता हूँ कि राम बड़ा मेहनती विद्यार्थी है, मैं जानता हूँ कि वह अनेक विषयों का अध्ययन कर रहा है, और वह केवल विश्वविद्यालय ही का कार्य नहीं कर रहा है, वह उससे चौगुना फालतू काम भी कर रहा है, तथा अन्य अनेक विषय तैयार कर रहा है, एवं सब तरह के काम कर रहा है, फिर भी प्रकृति के नियम उसे 24 घंटे नहीं काम करने देंगे।" इस सहपाठी ने समझाना शुरू किया। उसने कहा, "मैं तुम्हें दिखा सकता हूँ कि जब वह भोजन करता होता है तब भी वह अपने चित्त को एक क्षण भी आलस्य में नहीं गँवाने देता। मैं तुम्हें दिखा सकता हूँ कि हर समय उसके पास एक कागज़ रहता है जिस पर कोई न कोई वैज्ञानिक समस्या विचार के लिये होती ही है, कोई गणित या दर्शन शास्त्र का विषय होता है, अथवा कोई पुस्तक या कविता कंठ करने के लिये होती है। वह चाहे कोई कविता लिखता हो या दूसरे किसी प्रकार का काम
करता हो, एक क्षण भी वह अपना नष्ट नहीं करता—भोजन के समय भी। जब वह कपड़े पहनने के कमरे में होता है, तब वह खरिया से दिवाल पर आकृतियां खींचता रहता है। जब वह सोता है तब भी किसी न किसी समस्या को हल करता रहता है, वह सदा उन्हीं विषयों का स्वप्न देखता रहता है जिनमें दिन में उसका चित्त लगा होता है। इस प्रकार उसके चौबीसों घंटे पढ़ने में बीतते हैं।
हां, उसके बयान में कुछ सत्यता थी। जो मनुष्य अपने पूरे 18 घंटे अध्ययन में लगाता है, वह अपने स्वप्नों में भी वही काम कर सकता है जो वह दिन में करता होता है, दूसरी तरह के काम नहीं कर सकता। कभी कभी लोग कहते हैं कि वे अपने स्वप्नों में ऐसी चीज़ें देखते हैं जैसी पहले कभी नहीं देखने में आई थीं। वेदान्त कहता है, "नहीं"। यह एक मनुष्य आता है। वह कहता है कि मैंने अपने स्वप्न में एक दानव देखा। उसका सिर सिंह का था, पीठ ऊँट की थी, दुम सांप की थी, पैर मेंढ़क के थे। वह कहता है कि पहले कभी ऐसा पशु मैंने नहीं देखा था। वेदान्त उससे कहता है, भाई! तुमने मनुष्य देखा है, तुमने सर्प देखा है, तुमने ऊँट देखा है, तुमने मेंढ़क देखा है। और सांप की दुम, सिंह के सिर, ऊँट की पीठ तथा मेंढ़क के पैरों का तुमने अपने स्वप्न में एक में मिला कर एक नये पदार्थ की रचना कर ली है। सो वास्तव में हरेक वस्तु जो तुम अपने स्वप्न में देखते हो, और प्रत्यक्ष यह नये प्रकार का दानव रूप पशु, इसे भी तुमने अपनी जाग्रत अवस्था में देखा है।"
जो मनुष्य रुस कभी नहीं गया है, और कभी वहां का हाल नहीं सुना है, वह अपने स्वप्न में सेंटपीटर्स बर्ग ( रुस
की राजधानी ) कभी नहीं पहुंच जाता। कभी नहीं, कभी नहीं। कभी कोई तत्ववेत्ता क्या स्वप्न में चमार का काम करता है? यदि वह मोची का पड़ोसी भी होता है और मोची को प्रायः अपने स्वप्नों में देखता है, तो भी जूते मुरम्मत करने या टांकने के काम में लगा हुआ अपने को कभी नहीं पाता।
जब कि यह बात है, तब मृत्यु की अपनी दीर्घ निद्रा में आप को क्या आशा करनी चाहिए? मृत्यु और दूसरे जन्म के बीच का काल, दीर्घ निद्रा का समय, कैसे बीतेगा? वेदान्त कहता है यह तुम्हारे स्वर्गों या नरकों में बीतेगा, यह तुम्हारे बैकुँठों या रौरव नरकों में बीतेगा। ये बैकुँठ, ये स्वर्ग और नरक क्या हैं? एक मृत्यु और उसके बाद के जन्म के बीच में पड़ने वाले ये स्वप्न-लोक हैं। यह मनुष्य एक सच्चा ईसाई है, बड़ा ही साधु और धार्मिक जीवन इसने बिताया है, प्रत्येक रविवार को गिर्जाघर जाता रहा है, नित्य शाम को प्रार्थना करता रहा है। प्रत्येक बार भोजन करते समय इसने ईश्वर से कल्याण की प्रार्थना की है, ईसा की सूली (cross of christ) अपनी छाती पर आजीवन इसने रक्खी है, अपने जन्म से मरण तक जितनी देर जागा है, बराबर ईसा का ध्यान किया है, उठते बैठते, सोते जागते हर घड़ी ईसा की पवित्र मूर्ति इसके सामने उपस्थित रही है। इस मनुष्य ने 70 या 80 साल की अपनी जाग्रत अव- स्था को ईसा के प्रेम में लगाया है। इसने अपनी सारी चिन्ता ईसा में लगाई है। मृत्यु के बाद ईसामसीह के दक्षिण पार्श्व में अपने को बैठा हुआ देखने की आशा यह करता रहा है, अपनी सारी ज़िन्दगी ऐसा सोचता और स्वप्न
देखता रहा है। कि मृत्यु के बाद फ़रिश्ते, देवदूत और स्व- र्गीय जन मेरा स्वागत करेंगे। वेदान्त के अनुसार, इस प्रकार का पक्का ईसाई मृत्यु के बाद अपने को ईसा के दहने पार्श्व में बैठा पावेगा। ठीक बिलकुल ठीक वह मृत्यु के उपरान्त अर्थात् इस मृत्यु और इस के बाद के जन्म, इन दोनों के बीच की उस दीर्घ, दीर्घ निद्रा में वह अपने को देवदूतों, स्वर्ग के लोगों और फ़रिश्तों से घिरा हुआ पावेगा कि जो बराबर स्तुति कर रहे होंगे। कोई कारण नहीं है कि वह अपने को उनके बीच में न पावे। वेदान्त कहता है, "ऐ इसा- इयो! यदि तुम भक्त हो, यदि तुम श्रद्धालु और उत्सुक हो, तो तुम अपने धर्म ग्रन्थों के वचनों को पूरा होते पाओगे। किन्तु मुसलमानों और हिन्दुओं को बुरा न कहो ( ये मुसल मान बड़े ही उत्सुक, अत्यन्त उत्साही और आप कह सकते हैं, कभी २ परधर्मद्वेषा धर्मोन्मत्त भी हैं )"। किन्तु वही मुसलमान सच्चा मुसलमान है जिसने अपने जीवन की 70 या 80 साल की सम्पूर्ण जाग्रत अवस्था उसी तरह पर विताई है जैसा कि मोहम्मद साहब का आदेश है, जो मोहम्मद साहब का चिन्तन तथा अवलोकन करता रहा है और मोहम्मद के नाम में दिन में पांच वार नमाज़ पढ़ता रहा है। जो मोहम्मद के लिये अपनी जान देने को सदा तैयार रहा है। तब इस प्रकार के मुसलमान का ( कि जिस के जीवन का स्वप्न रहा है मुसलमानियत का हित करना, दुनिया के इस सिरे से उस सिरे तक मोहम्मद की कीर्ति फैलाना ) क्या होगा? प्रकृति के नियमों के विरुद्ध कोई बात उसे न होगी। प्रकृति का नियम है कि अपनी जाग्रत अवस्था में हम जिसका स्वप्न देखते रहते हैं सोने पर भी वही वस्तु हमें स्वप्न में दिखाई देता है। (ज़िन्दगी में) मोहम्मद,
बिहिश्त, आनन्द कानन और हूरों, मय की नदियों का स्वप्न वह देखता रहा है कि मौत के बाद जिनकी प्राप्ति का बादा उनके ( मुसलमानों के ) धर्माचार्य ने किया है। मृत्यु के बाद बैकुंठ के भव्य भवनों और विलासिता की वस्तुओं का स्वप्न वह देखता रहा है। वेदान्त कहता है, प्रकृति में ऐसा कोई नियम या शक्ति नहीं है जो उसे उस प्रकार के बैकुँठ का उपभोग करने से रोक सके जिसका कि वह स्वप्न देखता रहा है। उसका वैसा ही स्वर्ग अवश्य देखने को मिलेगा, अपने धर्माचार्य के वाक्यानुसार स्वर्ग में वह अपने को अवश्य पावेगा।
किन्तु वेदान्त कहता है, "ऐ मुसलमानों, तुम्हें कोई हक नहीं है कि इस दुनिया के सब मनुष्यों को, मृत्यु के बाद, अपने धर्माचार्य ( पैगम्बर ) के हवाले कर दो, उन्हें एक मोहम्मद ही की दया पर छोड़ दो। ईसाइयों को उन के विचारों का उपभोग करने दो, उन्हें स्वच्छन्द कर दो, उन सब को,— यूरोप, अमेरिका, पूर्वे भारत, जापान, या चीन में कहीं भी वे मरें,— मोहम्मद की दया के अधीन करने की इच्छा न करो। तुम्हें कोई अधिकार नहीं है कहने का कि,यदि वे मोहम्मद में विश्वास करते हैं तो ठीक है, अन्यथा उन का अकल्याण होगा। क्योंकि यह निठुरता है। यदि आप हज़रत मोहम्मद के अनुयायी हैं, तो आप को उसी प्रकार का स्वर्ग मिलेगा जिस की आप को अभिलाषा है। और यही बात सब धर्मों के सम्बन्ध में है। यदि आप अपने धर्म-सिद्धान्तों या लक्ष्य के प्रति सच्चे हैं, मृत्यु के बाद आप को उसी प्रकार के स्वर्ग की प्राप्ति होगी जिस की आप आशा करते हैं। वास्तव में मृत्यु के बाद स्वर्ग या नरक आप ही पर
निर्भर है। मृत्यु के बाद आप ही स्वर्ग बनाते हैं और मृत्यु के बाद आप ही नरक बनाते हैं। असलियत में स्वर्ग और नरक आप के स्वप्नमात्र हैं, जो स्वप्न कि आप को उस समय सत्य जान पड़ते हैं, इस से अधिक कुछ नहीं। आप जानते हैं कि स्वप्न देखते समय हमें स्वप्न सत्य प्रतीत होते हैं। अतएव ये नरक और स्वर्ग मृत्यु के बाद आप को सच्चे प्रतीत होंगे, किन्तु वास्तव में, असलियत में, स्वप्नों से अधिक ये कुछ भी नहीं हैं।
एक बात और कही जा सकती है। लोग कहते हैं कि हमारे धर्म-ग्रन्थों ने जो वचन हमें दे रक्खे हैं यदि मृत्यु के बाद सत्य उतरें तो हमें सर्वकालीन सुख की प्राप्ति हो। हमारे धर्मग्रन्थ मृत्यु के बाद या तो नित्य कल्याण का या शाश्वत अकल्याण का हमें वचन देते हैं। यह कैसी बात है? वेदान्त कहता है, नित्यता क्या है? आप जानते हैं कि नित्यता एक ऐसी वस्तु है जिस का सम्बन्ध समय, अनन्त समय से है। आप जानते हैं कि जाग्रत अवस्था का समय स्वप्न देश के समय से भिन्न है। तुम्हारी जाग्रत अवस्था में समय एक प्रकार का है और तुम्हारी स्वप्नावस्था में समय दूसरे प्रकार का है। तुम्हारी स्वप्नावस्था में कभी कभी एक ऐसी वस्तु आप के सामने प्रकट होती है जो आप को पांच हज़ार वर्ष की पुराना दिखती है। मान लो कि अपने स्वप्नों में आप एक पहाड़ देखते हैं। जाग्रत अवस्था के दृष्टि विन्दु से पहाड़ आपने तुरन्त उस स्थल पर जमा दिया है, किन्तु स्वप्नावस्था के दृष्टिबिन्दु से वह पहाड़ ) पांच हज़ार साल पहले जमाया गया था। वेदान्त कहता है कि अपने स्वप्नों में आप अपने को अपने स्वर्ग में अनन्तता से
पाते हैं; स्वप्न-दर्शी अधिष्ठान के दृष्टि-बिन्दु से आप स्वर्ग या नरक में अनन्त काल से रहेंगे, किन्तु जाग्रत-दर्शी अधि- ष्ठान के दृष्टिविन्दु से नहीं।
यह सत्य है कि इंजील ने जो वचन आप को दिये हैं उन को आप यथार्थ पावेंगे, क्योंकि उस हालत में आप ऐसा सोचेंगे कि हम सदा से इस हालत में रहते आ रहे हैं। वह (हालत) आप के लिये नित्य होगी। स्वप्नदर्शी आत्मा (द्रष्टा) के स्थितिबिन्दु से जो ( वस्तु ) नित्य है, वही जाग्रत आत्मा के दृष्टिबिन्दु से कुछ भी नहीं है।
इस से आप को कुछ पता लग जायगा कि मृत्यु के बाद विभिन्न धर्मों का समन्वय वेदान्त किस तरह करता है।
किन्तु आवागमन के सम्बन्ध में क्या ( किस्सा ) है? उन लोगों के सम्बन्ध में क्या है कि जो मुक्त पुरुष, या मुक्त आत्मा कहलाते हैं। वेदान्त कहता है कि मृत्यु के बाद हरेक व्यक्ति को स्वर्ग और नरक के इन पड़ावों में होकर नहीं गुज़रना पड़ता है, और न मृत्यु के बाद सब का पुनर्जन्म ही होता है। हां, प्रत्येक व्यक्ति की यह हालत नहीं होती। वे भी हैं जिन्हें मुक्त आत्मा कहते हैं। वे कौन हैं? इन्हें पुनर्जन्म के अधीन नहीं होना पड़ता। वे स्वनंत्र हैं। ये अपने को नरकों या स्वर्गों में क़ैद न पावेंगे। सब स्वर्ग या नरक उन में हैं। सब लोक उन में हैं। कुछ शब्द इन के सम्बन्ध में ज़रूर कहना उचित है।
अपने स्वप्नों में आप दो प्रकार के चमत्कार पाते हैं, द्रष्टा और दृश्य पदार्थ। ये सब नदियां, पहाड़, पहाड़ियां, जिन से आप अपने को सब ओर से घिरा हुआ पाते हैं, पदार्थ हैं। यह स्वप्नदर्शी आत्मा जो अपने को घिरा हुआ
पाता है, यह मुसाफ़िर, यह तीर्थयात्री, द्रष्टा है। अपने स्वप्नों में आप जानते हैं कि अनेक चीज़ें हैं। उन में से एक है जिसे आप 'मैं स्वयं' कहते हैं, और दूसरी वस्तुएँ हैं जिन्हें आप पदार्थ कहते हैं, जो मुझ से पृथक हैं। यह जिसे आप 'मैं स्वयं वा आत्मा' कहते हैं द्रष्टा है, और दूसरी वस्तुएँ जिन्हें आप नहीं स्वयं वा अनात्मा कहते हैं पदार्थ हैं। साधारणतः तुम्हारे स्वप्नों में ये विभाग हैं, द्रष्टा और पदार्थ। वेदान्त कहता है कि द्रष्टा और पदार्थ भी आप ही की सृष्टि हैं, सच्चे आत्मा की सृष्टि, जाग्रत आत्मा की सृष्टि हैं। कोषकार (lexicographer) डाक्टर जोहन्सन, जो, आप जानते हैं, वाग्मियों ( बातचीत करने वालों ) का बादशाह ( Prince of Talkers ) कहलाता था, तर्क में परास्त होना नहीं कबूल करता था। अन्तिम बात सदा वही कहता था, वा अन्तिम परिणाम उसी के पक्ष में होता था ( अर्थात् विरोधी को लाजवाब कर देता था )। किसी ने उस के सम्बन्ध में कहा था कि यदि उस के तमंचे का निशाना चूक जाता तो उस के कुन्दे (butt-end) से वह अपने प्रतिस्पर्धी को गिरा देना वा ज़मीन से चित्त कर देता था। हमेशा वह अपनी ही जीत रखता था, और यदि कभी कोई तर्क में उस से बीस (प्रबल) पड़ जाता, तो उस से बदला निकालने को वह आकाश पाताल एक कर देता था। एक बार उसने स्वप्न देखा कि व्याख्यान वाच- स्पति एडमंड बर्क ने उसे तर्क में हरा दिया। जोहन्सन की प्रकृति के मनुष्य के लिये यह स्वप्न जूजू (nightmare) के समान था। इसने उसे चौंका दिया. इसने उसे जगा दिया। वह बेचैनी की हालत में था, और उसे किसी तरह फिर नींद नहीं आती थी। आप जानते हैं कि चित्त का गुण है कि वह
सदा चैन ढूँढ़ता है और शान्ति चाहता है। जब वह व्याकुल होता है तब वह शान्ति के लिये व्याकुल हो जाता है, कारण यह है कि असली शान्ति उस का घर है, निज घर वह ढूँढ़ा ही चाहे। जिस किसी तरह शान्ति का अन्वेषण उस के ( डा० जोहन्सन के ) लिये ज़रूरी था। उसने इस विचार से अपने को शांत किया, यदि मैं एडमंड बर्क के पास जाऊँ और कहूँ, "बर्क, बर्क! मेरे स्वप्न में किस दलील से तुमने मुझे हराया," तो वह दलील को दोहरा न सकेगा। जब मैं सोया था तब जो प्रबल दलीलें उसने दी थी, और मेरी जिन दुर्बल दलीलों से मेरी हार हुई, उनको मैं जानता हूँ। मैं दोनों जानता हूँ। मैं विजयी और पराजित दोनों पक्षों को जानता हूँ, किन्तु एडमंड बर्क उसके सम्बन्ध में कुछ नहीं जानता है। इस प्रकार से मेरे ही दिमाग़ से दोनों पक्ष की दलीलें पैदा हुईं, मैं ही स्वयं एक ओर तो एडमंड बर्क प्रकट हुआ और दूसरी ओर पराजित जोहन्सन।
सो वेदांत कहता है कि अपने स्वप्नों में आप स्वयं ही एक ओर तो पदार्थ के रूप में प्रकट होते हैं और दूसरी ओर पदार्थ का द्रष्टा बन जाते हैं। वह तुम्हीं स्वयं हो, वह तुम में का असली आत्मा है जो एक ओर तो पहाड़ों, नदियों, जंगलों, पक्षियों, पशुओं और हैवानों के रूप में प्रकट होता है और दूसरी ओर व्याकुल तीर्थयात्री। तुम द्रष्टा हो और तुम्ही पदार्थ हो।
इस प्रकार वेदान्त के अनुसार, मृत्यु की आप की दीर्घ निद्रा में, आप ही नरक और स्वर्ग हो. और आप ही वह मनुष्य हो जो स्वर्ग भोग रहा है या नरक भुगत रहा है। इस तत्व का अनुभव करो और तुम स्वतंत्र हो जाते हो।
एक नारी थी जिसे वेदान्त का यह ज्ञान था। एक हाथ में अग्नि और दूसरे हाथ में शीतल जल लिये वह सड़क पर जा रही थी। लोगों ने उसके पास आकर पूछा, "एक हाथ में ठंढा पानी और दूसरे में अग्नि ले चलने में तुम्हारा क्या प्रयोजन है?" जिस मनुष्य ने यह प्रश्न किया था वह बड़ा धर्म-प्रचारक ( मिशनरी ) था। उस नारी ने कहा, "इस अग्नि से मैं आपके स्वर्ग और वैकुँठ में आग लगा दूँगी, और इस जल से मैं आपके नरक को ठंढा कर दूँगी। जो मनुष्य इस ज्ञान को रखता है कि वह स्वयं नरक है या स्वयं स्वर्ग है, उसके लिये आप के ये स्वर्ग और नरक समस्त प्रलोभनों और भयों से रहित हो जाते हैं। वह उनसे परे होता है। आप की इस दुनिया के संबंध में क्या है, और इस जाग्रत अवस्था का क्या हाल है जिसके आप इतने मज़े लूटते हैं? वेदान्त सिद्ध करता है कि यह स्थूल (ठोस) मालूम पड़ने वाली दुनिया भी, यह कठोर कठिन दुनिया भी अनन्य है, तुम्हारे स्वप्नों से भिन्न नहीं है। भेद केवल दर्जे का है, न कि गुण ( जाति ) का। तुम्हारी जाग्रत दुनिया भी एक स्वप्न है, एक ठोस वा घनीभूत स्वप्न है, तथा वेदान्त कहता है कि तुम्हारी इस सुदृढ़ प्रतीत होने वाली दुनिया में द्रष्टा और पदार्थ तुम्हारे सच्चे आत्मा की सृष्टि हैं और आपके कुछ नहीं। वह तुम्हारी सच्ची आत्मा ही है, जो एक ओर तो नगर, कस्बे, नदियां, तथा पहाड़ बन जाती है, और दूसरी ओर इस दुनिया का एक भूला भटका वा निराश्रय वटोही, एक तीर्थयात्री बन जाती है। तुम्हारी जाग्रत अवस्था में भी जो द्रष्टा के रूप में प्रकट होता है वही पदार्थ है, और जो पदार्थ के रूप में प्रकट होता है वही द्रष्टा है।
मृत्यु का अर्थ केवल द्रष्टा का दब जाना ( या विराम
लेना ) है, और पदार्थ का नहीं। तुम स्वप्न देख रहे हो। मान लो कि अपनी स्वप्नावस्था में तुम अपने को बर्कले में पाते हो, किन्तु वास्तव में तुम सैन फ्रांसिस्को में सोये हुए हो। वहां तुम्हारे स्वप्न में बर्कले क्या था और बर्कले से सम्बन्ध रखने वाले सब दृश्य क्या थे? वे पदार्थ थे और तुम बर्कले में होने वाले द्रष्टा थे। अब तुम जानते हो कि कभी २ हमें दोहरी निद्रा आती है,कभी हमें नींद में नींद आती है, ठीक वैसे ही जैसे कि चक्र-व्याज (compound interest) होता है, और इसी तरह यहां स्वप्न में स्वप्न या दोहरा स्वप्न होता है। यदि तुम्हें बर्कले में निद्रा आती है, तो यह दोहरी निद्रा का दृष्टान्त है। क्या होता है? तुम फिर जागते हो। कभी २ स्वप्नों में हम एक स्थान पर सो जाते हैं और एक ही निरन्तर स्वप्न में फिर जा पड़ते हैं। इसी तरह यहां तुम लेटे हुए थे और स्वप्न में तुम अपने को बर्कले में पाते हो। बर्कले पदार्थ था और तुम द्रष्टा थे। द्रष्टा सो गया,पदार्थ बर्कले वही बना रहा, द्रष्टा दब गया और फिर उठा। तुमने अपने को फिर बर्कले में पाया, किन्तु तुम्हारी नींद ठीक जैसी की तैसी जारी है। बर्कले से आप लॉज़ेंजिलस Los Angeles गये। वहां तुम अपने एक मित्र के घर में ठहरे, और फिर सो गये। वहां लॉज़ेंजिलस Los Angeles तुम्हारे मित्र का मकान इत्यादि पदार्थ थे और तुम द्रष्टा थे। वहां द्रष्टा दब या सो जाता है और फिर उठता है। लॉज़ेंजिलस में एक झपकी लेने के बाद तुम लिक आबज़र्वेटरी ( Lick Observatory ) को जाने हो। लिक आबज़र्वेटरी ( वेध शाला ) में भी आप एक झपकी लेते हैं। लिक आबज़र्वेटरी पदार्थ थी और आप द्रष्टा थे। कुछ देर के लिये द्रष्टा दब जाता या विराम लेता है, और फिर उठता है। लिक आबज़-
आप बेंटरी से ग्रीष्मावास ( Summer resort ) को जाते हैं, और आप जब वहां थे तो और कोई आप के कुटुम्ब का आता है और आप को जगा देता है। यहां आप ही ग्रीष्मा- वास थे और आप ही उस ग्रीष्मावास का सुख भोगने वाला मनुष्य भी। जब आप जाग पड़ते हो, द्रष्टा और पदार्थ दोनों चल बसते हैं, वे दोनों गायब हो जाते हैं। द्रष्टा और दृश्य दोनों ही लुप्त हो जाते हैं। किन्तु जब आप स्वप्न देख रहे थे, तब केवल द्रष्टा दबक गया था और पदार्थ बने रहे थे। तुम असलियत में नहीं जागे थे।
अब इस दृष्टान्त को घटाइये। वेदान्त के अनुसार यह विश्व, यह विशाल संसार भी एक स्वप्न है। इस विशाल दुनिया के स्वप्न में सब देश, काल, वस्तु, यह समस्त विश्व जिसे आप बाहर देखते हैं, पदार्थ हैं; और जिसे आप "मेरा शरीर", मेरा तुच्छ अपना आप कहते हैं, वह भी पदार्थ है। जब एक साधारण मनुष्य मर जाता है, तब क्या होता है? माया या अविद्या का लंबा स्वप्न नहीं भंग होता है, किन्तु जैसा का तैसा बना रहता है। वह मरता है। मृत्यु का अर्थ केवल द्रष्टा का दबक जाना वा दूर हो जाना है, पदार्थ वहीं का वहीं बना रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। सो जब एक मनुष्य यहां मरता है, वह दूसरे जन्म में फिर जगता है। वह वही संसार अपने इर्दगिर्द पाता है जिस से उस का मरते समय प्यार था। मान लो कि इस दूसरे जन्म में वह 70 या 80 साल जीता है, और फिर मर जाता है। तब फिर हम देखते हैं कि दूसरे जन्म में जो वर्केले या लौज़ेंजिलस के तुल्य था, पदार्थ वही बना रहा और केवल द्रष्टा कुछ देर के लिये दबका ( लुप्त ) रहा। परिणाम यह एक कुछ समय के बाद वह फिर पैदा
हुआ है। तीसरी ज़िन्दगी में वह 70 या 80 वर्ष जीता है, और तदुपरान्त फिर मर जाता है। पदार्थ जो लिक वेधगृह (Lick Observatory) के समान था, वही बना रहता है; द्रष्टा दबक जाता वा तिरोधान हो जाता है, और पुनः प्रकट होता है। इस प्रकार यह जन्म और मृत्यु, जन्म और मृत्यु का सिलसिला तब तक जारी रहेगा, जब तक द्रष्टा और दृश्य दोनों साथ ही न दब जायँगे वा न लुप्त हो जायंगे। जब तक दुनिया आप को अपने से भिन्न मालूप पड़नी है, तब तक इस संसार में आप एक क़ैदी हैं, आप सदा इस आवा- गमन, जन्म और मृत्यु के पहिये में बंधे रहेंगे। यह (पहिया) तुम्हारे इर्दगिर्द घूमता है, और तुम्हें कुचलता ही रहेगा, तुम्हें ऊपर लावेगा और नीचे ले जायगा। आप को कभी कोई विश्राम या शान्ति न मिलेगी।
अब वेदान्त कहता है। जो बच जाता है वह अपने आप ही में द्रष्टा और पदार्थ को पाता है। जब जागने पर हमें डाक्टर जॉनसन की तरह ज्ञान की उपलब्धि हो जाती है कि हमीं स्वप्न के द्रष्टा हैं, और हमीं पदार्थ, तब हम मुक्त हो जाते हैं। दुनिया मेरा शरीर है और सम्पूर्ण विश्व मेरा शरीर है, जो कोई ऐसा कह सकता है वह आवागमन के बन्धन से मुक्त है। वह कहां जा सकता है? वह कहां आ सकता है? कोई स्थान ऐसा नहीं है जो उस से परिपूर्ण न हो, वह तो एक अनन्त है। कहां वह जायगा? कहां वह आवेगा? विश्व ब्रह्माण्ड उस में है। वह प्रभुओं का प्रभु है, आवागमन के बन्धन से मुक्त है। पूर्वीय भारत का हरेक बच्चा माता के दूध के साथ इस एक इच्छा को पीता है कि "मुझे ऐसा अनुभव हो कि मैं आवागमन के अधीन न रह सकूं मैं (जन्म-मरण से) बच जाऊँ, और ईश्वरीय चेतना
(ईश्वरी-ज्ञान) में पूर्ण आनन्द तथा कल्याण की प्राप्ति करूँ"।
मिलटन की जीवनी में एक महिला के सम्बन्ध में, जो उस की स्त्री थी, एक बड़ी सुन्दर कथा दी हुई है। उस (स्त्री) ने स्वप्न में अपने पति को देखा और उस का हृदय पति के लिये छटपटाने लगा। उस ने उस को अंक में भर कर (गले लगा कर) कहा, "मेरे स्वामी! मैं सर्वथा तुम्हारी हूँ।" ठीक दूसरी क्षण उस की आंख खुल गई, और उसने देखा कि वह कुत्ता जो उसी के पलंग पर सोया हुआ था अपना शरीर उस के शरीर में सटा रहा है। कुत्ता बिस्तरे से उछल कर ज़मीन पर चला गया। वास्तव में कुत्ते की दाब या लिपट उसे स्वप्न में अपने पति की दाब या लिपट मालूम हुई थी। यदि कुत्ते ने अपनी देह और अधिकाधिक दबाई होती तो उसे (स्त्री को) एक महान् हिमालय अपनी छाती पर प्रतीत होता। और वेदान्त कहता है, जब तक अविद्या का कुत्ता, माया का कुत्ता तुम्हें नीचे दबाता रहता है, तब तक तुम्हारे स्वप्न निरन्तर अच्छे से बुरे और बुरे से अच्छे बदलते रहतेहैं, कभी तुम्हें पति और कभी तुम्हें प्रबल हिमालय दबाता है। आँसू और मुसक्यान के बीच में तुम सदा लटकन की तरह झूलते रहोगे, संसार का तुम्हारे दिल पर बड़ा बोझा पड़ेगा, तुम्हारे लिये चैन का नाम न होगा। वेदान्त कहता है, "अविद्या के इस कुत्ते से अपने को छुटाओ, अपने को परमेश्वर बनाओ, अपने को वह बनाओ, उसे अनुभव करो और तुम फिर स्वाधीन हो।"
हज़ारों रूपों में चाहे तू चकित करे, तथापि हे एक प्यारे! मैं तुझे ठीक पहचानता हूँ, तु अपने चेहरे को चाहे जादू से छिपावे, इत्यादि।