श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

कथा-प्रश्नों के उत्तर।

भाग 26 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 26 · अध्याय 2 / 10

कथा-प्रश्नों के उत्तर।

गोल्डेन गेट हाल, रविवार, 24 जनवरी 1903,

महिलाओं और सज्जनों के परिवर्तनशील रूपों में

अमर स्वरूप।

प्रश्न—छोटे बच्चे क्यों मरते हैं?

इन प्रश्नों पर विस्तार पूर्वक विचार करने का हमें समय नहीं है, किन्तु केवल उत्तर की ओर संकेत करेंगे।

उत्तर—यह एक पुस्तक किसी की रची हुई है। इस पुस्तक में अनेक अंग्रेज़ी वाक्य हैं, और उन के अलावा, कहीं कहीं संस्कृत पद्य या वाक्य उद्धृत किये गये हैं। आप जानते हैं कि जिस क़लम से हम अंग्रेज़ी लिखते हैं उस से विभिन्न प्रकार की क़लम की ज़रूरत हमें संस्कृत लिखने के लिये पड़ती है। अतएव जब कोई ग्रन्थकार अंग्रेज़ी लिखता है, तब वह एक प्रकार की क़लम का प्रयोग करता है, और जब वह संस्कृत लिखता है तब उसे वह क़लम बदलनी पड़ती है, और इसी तरह (अन्य भाषा के लिखते समय)। इसी प्रकार जब तक तुम इस एक सांसारिक शरीर में रह रहे हो, तब तक तुम अपने इस शरीर का उसी तरह व्यवहार करते हो जिस तरह तुम एक क़लम से काम लेते हो। इस शरीर का तुम तभी तक धारण या शासन करते हो जब तक इस से तुम्हारा काम चलता है। जब देह इतनी बूढ़ी और रोगी हो जाती है कि फिर उस से तुम्हारा काम नहीं चलता, तब तुम उसे दूर फेंक देते हो,

तुम उसी तरह दूसरा शरीर धारण कर लेते हो जिस तरह कपड़े पुराने हो जाने पर तुम उन्हें बदल कर दूसरे कपड़े धारण कर लेते हो। इस में कुछ भी भयंकर बात नहीं है। यह तो बिल्कुल स्वाभाविक है।

बच्चे क्यों मरते हैं? यह एक मनुष्य जिस की विभिन्न प्रकार की इच्छाएँ हैं। एक समय आता है जब वह विशेष प्रकार की इच्छाएँ बदल जाती हैं और दूसरी या विभिन्न प्रकार की इच्छाएँ हो जाता हैं। उदाहरण के लिये, एक मनुष्य अमेरिका के किसी नगर में बहुत काल तक रहता है। वह ऐसा साहित्य पढ़ता है, ऐसी पुस्तकों का अध्ययन और चिन्तन करता है कि उस की आन्तरिक इच्छाएँ और वृत्तियां बदल जाती हैं। मान लो कि उसका मन पूर्वीय रंगमें रंग जाता है, अर्थात् हिन्दू हो जाता है। वह अपना अमेरिकन धंधा कुछ दिनों तब तक किये जाता है, जब तक उस के समस्त आन्तरिक भाव और इच्छाएँ उस की बाहरी इच्छाओं से बिल्कुल न्यारी नहीं हो जातीं। अब वह अमे- रिका का नहीं रह गया; वह भारत का हो गया है और भारत में उसे पैदा होना चाहिये। साथ ही एक धनी पुरुष जो उसे रुचता है, उस के साथ रहने का वह बड़ा इच्छुक है। मान लो, सैनफ्रांसिस्को के नगर-पति या किसी और बड़े आदमी से लगाव होने की उस की जो इच्छा थी वह उतनी प्रबल नहीं थी जितना भारत में जन्म लेने का अभि- लाषा। अब इस पहली इच्छा का पूरी होना आवश्यक है, और दूसरी इच्छा का भी। इस का निपटारा कैसे हो? परिस्थिति ऐसी है कि वह उस का अपने उस मनुष्य से सम्पर्क न होने देगी जिस से उसे अति स्नेह है। इस लिये

वह मरता है, तथा अमुक अमुक नगर-पति (मेयर) के पुत्र के रूप में, या जिस बड़े आदमी ने उसे आकृष्ट किया था, उस का लड़का हो कर पैदा होता है। इस मनुष्य से, जिसने उसे आकृष्ट किया था, उस का वत तक सम्बन्ध बना रहता है, जब तक रहने की अवधि की, या इस प्रिय पुरुष से लगाव की समाप्ति नहीं हो जाती। इस के बाद अब उसे भारत में पैदा होना है, ताकि दूसरी संचित इच्छाएँ परिपूर्ण हों। यह कारण है बच्चों के भरने का।

इस एक (व्यक्ति) से पिता या माता की हैसियत से सम्बन्ध होने की इच्छा अंग्रेज़ी अक्षरों में लिखी हुई एक बड़ी किताब में एक संस्कृत पंक्ति के तुल्य है। इस तरह जो बच्चे छोटेपन में ही मर जाते हैं, वे उन किताबों में, जो निरानिर किसी विदेशी भाषा में नहीं लिखी हुई हैं, प्रमाण की पंक्तियों के समान हैं।

प्रश्न—कृपया नेकी और बदी में प्रभेद (फर्क़) की रेखा बताइये।

उत्तर—यह एक सीढ़ी है। यदि तुम सीढ़ी पर ऊपर चढ़ो, तो वह नेकी है, और यदि तुम सीढ़ी पर नीचे उतरो, तो वह बदी है।

गणित विद्या में हमें विभिन्न सम्पद्स्थ सूत्र (co-ordinate axioms) मिलते हैं। किसी सूत्र का कोई ऐसी स्थित नहीं है जिसमें वह अपने आप से धन या ऋण (positive or nega- tive) कहा जाता हो। धन और ऋण तो सम्बन्धवाची या सापेक्षक (relative) शब्द हैं।

इस तरह वेदान्त के अनुसार नेकी और बदी सापेक्षक शब्द हैं। ऐसा कोई बिन्दु नहीं है जहां पर तुम यह कह

सको कि यहां बदी रुक जाती है और नेकी शुरु होती है।

यह एक रेखा है जिसका शीर्ष (vertex) गणित में य है। किसी बिन्दु की बात यदि एक ओर को होती है तो धन कहलाती है और दूसरी अथवा विपरीत ओर को होती है तो ऋण कहलाती है। किन्तु बिन्दु की वही स्थिति ऋण के स्थित बिन्दु से धन कही जा सकती है, और दूसरी ओर से या धन के स्थित बिन्दु से ऋण कही जा सकती है। इसी तरह से यदि आप किसी विशेष प्रकार के कार्य से आने को और उधर को बढ़ रहे हो, यदि आप सत्य के निकट पहुँच रहे हो, तो वह नेकी हो जाती है। यदि किसी विशेष प्रकार के कार्य से आप सत्य से भटक जाते हो, तो वह कार्य आप के लिये विष है। यदि विवाह सम्बन्ध से आप विश्व- प्रेम के, सार्वभौम प्रकाश के, जो संसार में व्याप्त है, निकट पहुँच रहे हैं, तो विवाह बन्धन आप के लिये अच्छे हैं। यदि विवाह-बन्धन से आप विश्व-प्रेम और विश्व-प्रकाश के निकट नहीं पहुँच रहे हैं, तो आह! वे तुम्हारे लिये विष हैं, वे पापमय हैं, तब तो विवाह-बन्धन तुम्हारे लिये अभिशाप (curse) हैं।

वेदान्त के अनुसार हरेक व्यक्ति को इन पाशविक इच्छाओं में होकर निकलना पड़ता है। यह कर्म का सिद्धान्त है। विकासवाद के तौर पर सब लोग उन्नति कर रहे हैं, विकसित हो रहे हैं, आगे और आगे जा रहे हैं।

कुछ लोग ऐसे हैं जो हाल ही में पशु-शरीर से आये हैं और मानव शरीर में पग रक्खा है। उनमें पाशविक अभि- लाषाओं की प्रबलता होना अनिवार्य है। उन्हों ने हाल ही में भेड़ियों, चीतों, कुत्तों, शूकरों इत्यादि के शरीर छोड़े हैं, और

उनमें उन इच्छाओं का अधिक होना ठीक ही है। जड़ता वा तमस् के नियम (Law of Inertia) से इतने तक तो सीधी रेखा में प्रत्येक व्यक्ति की गति सदृश रहती है।

यदि जड़ता का नियम इस दुनिया से हटा लिया जाय, तो दुनिया अस्त व्यस्त दशा में हो जाय। यदि जड़ता का नियम हटा लिया जाय तो वे लोग जो पशुओं की योनियों से आये हैं पाशविक प्रकृति के ही बने रहें। हमें इन लोगों की निन्दा वैसे ही नहीं करना चाहिये जैसे कि बहती नदियों से हम घृणा नहीं करते। हमें कोई हक़ नहीं है कि उन्हें हम पापी कह कर घृणित समझें। जिन लोगों को हम दुष्ट या दोषी कहते हैं, उनसे घृणा करने का हमें कोई अधिकार नहीं है। इन पापी कहे जाने वालों से प्रेम करने का हमें अधिकार है। ईसा कहते हैं (Love the sinner) "पापी पर प्रेम करो"। यही वेदान्त स्पष्ट करता है कि उनसे घृणा करने का कोई युक्ति संगत कारण नहीं है। उनके लिये पापी होना स्वाभाविक है।

अपने आप से ये लोग अपना लक्ष्य बना ही क्या सकते हैं? उन्हें बढ़ना होगा। जड़ता का क़ानून अकेला ही नहीं इस दुनिया का शासन कर रहा है। यदि वे जीवित हैं तो उन्हें अवश्य उस जड़ता को जीत लेना होगा।

मौलिक जड़ता (original Inertia) में शक्ति जो परिवर्तन पैदा करती है उसी से सब ताक़त जानी जाती है। यदि प्रगति (हरकत) की मौलिक रेखा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है, तो वहां कोई शक्ति नहीं है, कोई जीवन नहीं है। अब ये लोग यदि जीवित कहलाने की इच्छा रखते हैं,तो उन्हें अवश्य वह जीवित शक्ति प्रकट करना चाहिये, अपने

को उलझन से निकालना चाहिये, अपने में शक्ति का परि- वर्तन करना चाहिये, और शक्ति या हार्दिक-शक्ति के इस परिवर्तन से उन्हें अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति को पूर्ण रूप से बदलना होगा। यहाँ 'स्वाभाविक' शब्द आग है। इसे समझा देना चाहिये क्योंकि यह 'स्वाभाविक' शब्द हज़ारों को नहीं, लाखों को भटकाने का कारण होता है, (इसके नाम से) सब तरह की बुराइयों और संकटों का पोषण और प्रोत्साहन होता है।

कुछ लोग सोचते हैं कि 'स्वाभाविक' का अर्थ चित्त में आने वाली सब पाशविक इच्छायें और विकार हैं। वे कहते हैं "हमें अपने मनो-विकारों के घोड़े छोड़ देने चाहिये, हमें उन बागों को छोड़ देना चाहिये जो हमारे सच्चे आचरण को क़ाबू में रखती हैं, हमें स्वाधीन होने दो।" किन्तु इस स्वाधानता से सांसारिक, पाशविक जीवन के सिवाय और कुछ भी अभिप्रेत नहीं है।

यहां एक खिलौना-गाड़ी है, पूरी तेज़ी से दौड़ रही है। खींचने वाली ताक़त को हटा लो, कुछ दूर तक गाड़ी अपने आप ही दौड़ेगी। क्यों? कारण यह है कि गाड़ी का उस तरह दौड़ना स्वाभाविक है, क्योंकि शक्ति या उस (गाड़ी) का वेग चाहता था कि वह आगे और आगे बढ़े। यह स्वाभाविक है। दूसरे शब्दों में स्वाभाविक का अर्थ वा तमस् है, चाहती थी कि गाड़ी उस ओर दौड़े। जब कोई ढेला आकाश में फेंका जाता है तो जड़ता के कारण उस का आगे और बढ़ना स्वाभाविक है। लड़कों का लट्टू अपनी तेज़ी या वेग से गिन गिन घूमता रहता है। उस के लिये गिन-गिन घूमना स्वाभाविक है।

इसी तरह जब पशुओं की योनियों में थे, तब तुम एक विशेष दिशा में दौड़ते रहे थे। जब पशुओं के शरीरों में थे, तब पाशविक विकारों को तृप्त करने की ओर लोग दौड़ते थे। यह स्वाभाविक था। तब स्वभावतः वह (पाशविक विकार) तुम्हें दिये गये थे, और साथ ही ये कार्य तुम्हारे लिये बिल्कुल उपयुक्त थे, क्योंकि उन कामों और इच्छाओं से तुम्हारा उत्थान हुआ था, वे कार्य और इच्छायें तुम्हारे लिये नेकियां थीं, उन के द्वारा तुम उठे, तुम्हें आवश्यक ज्ञान की प्राप्ति हुई।

कोई कुत्ता यदि कुत्तेपने के काम करता है तो उसे पापी न कहो, न सुअर को सुअरपन के काम करने के लिये पापी कहो।

जब तुम मनुष्य के शरीर में आये, तब तुम में वैसी ही पाशविक इच्छाओं का होना स्वाभाविक था कि जिन के तुम पशुओं की योनियों में अभ्यासी थे। यह एक मनुष्य-शरीर है ये कार्य स्वभावतः होते हैं, और इन का कारण है तुम्हारी जड़ता। जब तुम पशुओं की योनियों में थे तब के स्वाभा- विक कार्य इन का हेतु हैं। इस तरह पर 'स्वाभाविक' शब्द का अर्थ तमोगुण के सिवाय और कुछ भी नहीं है। किन्तु जड़ता तुम्हें तुम्हारी सच्ची प्रकृति दिखाने या प्रकट करने वाली वस्तु नहीं है। वह तुम्हारे में मृतक तत्वों को प्रकट करती है, वह ईश्वरत्व वा देवत्व को नहीं प्रकट करती।

मनुष्य तभी वास्तविक मनुष्य है जब वह इस तमस को जीतता और मिटा देता है, जब वह इस से ऊपर उठता है। ये पाशविक वासनाएँ और विकार पशुओं के लिये बिल्कुल स्वाभाविक हैं और कुछ प्रकार के ऐसे मनुष्यों के

लिये भी स्वाभाविक हैं कि जिन्हों ने अभी अभी नर-देह में पैर रक्खा है। ये इन इच्छाओं का अनुसरण करने में चाहे स्वतंत्र हों, किन्तु कुछ काल के बाद उन्हें इन को छोड़ना होगा, इन से ऊपर उठना होगा, इन से आगे बढ़ना होगा।

एक कहानी सुनिये जो बेमौक़े न होगी। भारत वर्ष में तुलसीदास नाम के (राम के एक पूर्व पुरुष) एक महात्मा थे। वे अपनी स्त्री से बहुत प्रेम करते थे। उन्हें अपनी स्त्री पर जितना प्यार था उतना पहले कर्मः किसी का अपनी स्त्री पर न हुआ होगा। एक बार उन की स्त्री को अपने पिता के घर जाना पड़ा, जो दूसरे गांव में स्थित था। महात्मा जिस गांव में रहते थे उस से सात या आठ मील की दूरी पर वह था। तुलसीदास जी स्त्री-वियोग न सह सके, और उस निशा अपना घर छोड़ कर स्त्री की खोज में गये। रात को ग्यारह बजे के लगभग उन्हों ने उस (स्त्री) के प्रस्थान की बात सुनी और अपने आतुरतापन (desperation) में वे पागल की तरह अपने घर से दौड़े। दोनों गांवों के बीच में एक नदी पड़ती थी, और नदी की तेज़ धारा के कारण रात के समय उस पार करना बड़ा कठिन था, और इस के सिवाय उस समय में कोई व्यक्ति (सहायक) मिलना नहीं था। नदी के तट पर तुलसीदास जी को एक सड़ी हुई लाश मिली। अपने उन्मत्त प्रेम में, अपनी स्त्री के पास पहुँचने के आतुरतापन में, उन्हों ने कसकर लाश पकड़ी और पर कर नदी पार हो गये, कुशल पूर्वक उस पार पहुँच गये। दौड़ते 2 जब वे उस घर पर पहुंचे, जहां उन की स्त्री थी, तो सब द्वार बन्द मिले। वे न तो भीतर घुस सके, और न किसी नौकर

या घर वाले को जगा सके, क्योंकि वे सब कोई अत्यन्त भीतरी कमरों में सो रहे थे। अब वे क्या करते? आप जानते हैं कि लोग कहते हैं, राह में यदि नदी हो तो प्रेम उसे तैर जाता है, राह में यदि पहाड़ हों, तो प्रेम उन पर चढ़ जाता है। सो प्रेम के पंख पर तुलसीदास को अपनी स्त्री के पास पहुँचना था। जब उन का दिमाग़ व्याकुल (भ्रान्त) हो रहा था, तब उन्हें मकान से लटकती हुई कोई वस्तु दिखाई पड़ी, जिसे उन्हों ने रस्सी समझा। उन्हों ने विचारा कि मेरी स्त्री मुझ से इतना अधिक प्रेम करती है कि मेरे ऊपर चढ़ने के लिये उसने रस्सी लटका रक्खी है। वे बहुत खुश हुए। यह रस्सी नहीं थी किन्तु लम्बा साँप था। उन्हों ने साँप को घर पकड़ा, और साँप ने उन को काटा नहीं। और इस प्रकार से वे घर की ऊपर की मंज़िल पर चढ़ गये, और जिस कमरे में उन की स्त्री सोई हुई थी, उस में वे जा दाखिल हुए। वह चकित होकर उठा और बोली, "तुम यहां कैसे पहुँचे, यह बड़े आश्चर्य की बात है?" वे आनन्दाश्रु गिराते हुए बोले, "ऐ भद्रे! स्वयं तुम्हीं ने मेरे लिये यहां का मार्ग इतना सरल कर दिया था। क्या तुम ने नदी के पार आने को मेरे लिये एक प्रकार की डोंगी तट पर नहीं रख दी थी, और ऊपर चढ़ने के लिये क्या तुम ने दिवाल पर रस्सी नहीं लटका रक्खी थी"? वे विक्षिप्त थे, प्रेम ने उन्हें पागल कर दिया था। स्त्री करुणा और हर्ष के आंसू बहाने लगी। वह विद्वान् नारी थी, दिव्य बुद्ध की देवी थी। उसने कहा, 'हे देव (दिव्यस्वरूप)! हे प्राणप्यारे! इस प्रत्यक्ष मुझ में, मेरे इस शरीर में, जो दिव्य तत्व (आत्मा) है, जो इस का आधार और रक्षक है, उसमें यदि आप को इतना ही अधिक प्रेम होता, तो आप ईश्वर हो जात,

तो आप संसार में सब से बड़े महात्मा होते। आप सिद्ध होते, समग्र विश्व के आप पूज्य-

स्त्री जब उन्हें ईश्वरत्व की भावना का उपदेश दे रही थी, और उन्हें सिखा रही थी कि परमेश्वर में और मुझमें अभेदता है, तब बोली, "ऐ प्यारे पति! क्या तुम्हें मेरे इस शरीर से प्रेम है। यह शरीर तो केवल अस्थायी है। इसने तुम्हारा घर छोड़ा, और यह इस घर चला आया। इसी तरह यह देह आज या कल इस लोक को भी छोड़ सकती है। यह देह आज ही बीमार हो सकती है और एक क्षण में इसकी सारी सुन्दरता रफ़ूचक्कर हो सकती है। अब देखिये, वह कौन चीज़ है जिसने मेरे कपोलों को खिला रक्खा है, मेरे नेत्रों की ज्योति किसकी दी हुई है, मेरे शरीर की कान्ति कहां से आई, वह कौन वस्तु है जो मेरे नयनों के द्वारा चमकती है, मेरे केशों को यह सोनहला रंग किस ने प्रदान किया है, मेरी इन्द्रियों और मेरी देह में जीवन और प्रकाश तथा कर्मण्यता किसकी करतूत है? देखो प्यारे! तुम्हें मोहित करने वाला यह चर्म, मेरा यह शरीर नहीं है। कृपया ध्यान दीजिये, कृपया देखिये, वह कौन है? वह मेरा सच्चा ईश्वर, आत्मा है जो तुम्हें मोहित और वशीभूत तथा आसक्त करता है। वह मुझ में परमेश्वर है, और कोई नहीं। वह परमात्मा है, और कुछ नहीं। वह, वह परब्रह्म है, सर्वेश्वर मेरे अन्दर है, और कुछ नहीं। उस परमेश्वर का अनुभव करो, सर्वत्र उस परमेश्वर को देखो। क्या वही परमात्मा, परमेश्वर, नक्षत्रों में, चन्द्र में नहीं मौजूद है, सीधा तुम्हारी ओर नहीं देख रहा है?"

तुलसीदास जी विषयसेवा, भोगवासनाओं, तथा सांसारिक अनुरागों से ऊपर उठ गये। उन्हों ने, जिन्हें पहले एक स्त्री ही से असाधारण प्रेम था, अब उस परमात्मा को, उस प्यारे स्वरूप को संसार में सब कहीं अनुभव किया। यहां तक कि यह (तुलसीदास) परमेश्वर का एक प्रेमी, परमात्मा का मतवाला महात्मा, और शुद्ध पवित्र हुआ एक दिन जंगल में जाते जाते एक पंस आदमी के पास पहुंचा जिसके हाथ में कुल्हाड़ी थी और जो सरो के एक सुन्दर पेड़ को काटने ही वाला था। जब कुल्हाड़ी की चोटें सरो के सुन्दर वृक्ष की जड़ों पर पड़ने लगीं, तब तुलसीदास जी को मूर्छा आने वाली ही थी। वह लपट कर उस मनुष्य के पास गया और बोला 'तुम्हारे ये वार मुझे हैं, वे मेरे कलेजे को छेद रहे हैं। दया करके प्रहार न करो।" उस मनुष्य ने पूछा "महात्मा! यह कैसे?" तुलसीदास जी ने कहा, 'महाशय! यह सरो, यह सुन्दर पेड़ मेरा प्यारा है, इस में मैं अपना सच्चा परमात्मा देखता हूँ, इस में मुझे परमेश्वर दिखाई देता है"।

अब परमेश्वर उसकी स्त्री, उसका बच्चा, उसकी मां, उस की बहन और उसका सब कुछ होगया। उसकी सारी भक्ति, उसका सम्पूर्ण प्रेम परमेश्वर के चरणों में निछावर होगया; परमात्मा को, सत्य को समर्पित होगया, और तुलसीदास जी ने उस मनुष्य से यों कहा, "मुझे वहां अपना प्यारा दिखाई देता है, मैं अपने प्यारे परमेश्वर पर चोटें पड़ते नहीं सह सकता।"

एक दिन एक मनुष्य एक बारहसिंगा या हिरन को मारने वाला था। परमात्मा महात्मा (तुलसीदास जी, ने

उसे देखा। वह (तुलसीदास जी) वहां पहुँचे और अपने को उस मनुष्य के चरणों पर डाल दिया जो वारहसिंग का वध करनेवाला था। उस मनुष्य ने पूछा, "महात्मा! यह क्या बात है"? महात्मा जी बोले, "अरे! दया करके हिरन को बक्श दो, देखो उन अाँखों से मेरा प्यारा देख रहा है। अरे! मेरे इस शरीर को मार डालो, परमेश्वर के नाम में, परमात्मा के नाम में इस शरीर का बलिदान कर दो, मेरे शरीर का बलिदान कर दो, मैं अविनाशी हूँ, किन्तु बक्श दो, अरे! प्यार को छोड़ दो।"

इस संसार में जो सब मनोहरता तुम देखते हो वह सच्च परमेश्वर के सिवाय और कुछ भी नहीं है, वही है जो तुम्हारे लिये एक प्यारे के शरीर में प्रकट होता है, वही है जो वृक्षों, पहाड़ों और की विभिन्न पोशाक धारण करता है। इसे अनुभव करो, क्योंकि इसी तरह तुम सब सांसारिक विकारों और वासनाओं से ऊपर उठ सकते हो। सांसारिक इच्छाओं के आध्यात्मिक प्रयोग का और उन्हीं के लिये उन के प्रयोग का यही उपाय है। तुम अपनी आध्यात्मिक सत्यानाशी कर रहे हो, तुम पापी हो रहे हो। किन्तु यदि इन का उचित उपयोग करके तुम इन लौकिक लालसाओं को उन्नत करो, तो तुम इन्हीं कामों को पुण्यमय बना सकते हो।

प्रश्न—विकासवाद (Theory of Evolution) के अनुसार हम "अपूर्ण" से "पूर्ण" होते हैं। क्या इस से आवागमन सिद्ध होता है?

उत्तर—इस सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि इस प्रकार के आवागमन का प्रसारण (विस्तार) प्रारम्भ से

होता है और पीछे लौटने वाला नहीं होता, चाहे कोई मनुष्य कल कुत्ता भी हो जाय। एक मनुष्य का अपनेको सुन्दर बनाने का कल वाला उदाहरण सांकेतिक (काल्पनिक) मामला है; केवल एक पहलू लिया गया था। किन्तु एक बड़े प्रश्न का विचार करते समय हमें दोनों पत्त ग्रहण करना चाहिये।

विद्यार्थीयों को गति-विद्या (Dynamics) पढ़ाते समय हम क्रिया और प्रतिक्रिया के क़ानून को अकेला ही मान लेते हैं, मानो दूसरे क़ानून उस काल में निष्क्रिय हो गये हैं। बाद को हमारी आगे की शिक्षा में हमें उन सब नियमों को (हिसाब में) लेना पड़ता है। इस तरह पिछले व्याख्यान में समय के अभाव से केवल एक अवस्था पर विचार किया गया था। इस प्रश्न पर विचार करते समय दूसरे पहलू पर भी ध्यान देना पड़ेगा।

एक मनुष्य आज चाहे पीछे लौट जाने की चेष्टा करे, नहीं नहीं, बल्कि एक निम्नतर पशु की तरह जीवन बिताने की यथाशक्ति पूरी चेष्टा करे। वह अपने चित्त से सब ऊँची और उत्तम भावनाएँ भले ही निकाल देने की कोशिश करे। यदि उसे अपने को बन्दर बनाने में, और अपनी इच्छाओं को निरा-निर पाशविक बनाने में वस्तुतः सफलता हो जाय, तो दूसरे जन्म में वह अवश्य बन्दर पैदा होगा। किन्तु मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता, क्योंकि दूसरी शक्तियां भी हैं, जो उसे रोकती हैं। वे कौन सी शक्तियां हैं? वे हैं जिन्हें रंज, कष्ट और यातना कहा जाता है, वे तनिक भी पीछे लौटा देने के विरुद्ध, अचूक साधन हैं। ये शक्तियां आप को पीछे नहीं लौटने देंगी। इस प्रकार उन्नति सुरक्षित है। परिणाम- वाद का जीवन उन्नति है, और उन्नति होना ही चाहिये,

तथा इस प्रकार से निरन्तर संघर्ष और निरन्तर संग्राम आवश्यक हैं।

इसी तरह, वेदान्त कहता है, तुम्हारे शरीरों में जो संघर्ष हो रहा है, ये सब तकलीफें, चिन्ता, व्यथा, यातना, रंज, खटका, क्लेश, चोभ, परेशानी, जिन से तुम्हारे दिल सताये जा रहे हैं,और जो तुम्हारे चित्त में भयंकर संग्राम करती हैं, तुम्हें आगे बढ़ाती हैं। इन शक्तियों के द्वारा, हमें विश्वास है, तुम्हें आगे बढ़ना होगा, और कल यह दिखाया जा चुका है कि इच्छाओं की प्रतिकूलता और पारस्परिक विरोध संग्राम का कारण होता है।

कोई परिस्थिति एक मनुष्य के लिये सुखकर और दूसरे के लिये दुखःकर हो सकती है। उदाहरण के लिये, यदि किसी मनुष्य की तनख्वाह या आमदनी हज़ार रुपये महीने से घट कर पाँच सौ रुपये मासिक हो जाय, तो वह पाँच सौ मासिक उस के लिये चिन्ता और क्लेश का कारण होगा। दूसरी ओर, यदि सौ रुपये मासिक पाने वाला पाँच सौ मासिक वेतन का पद पा जाय, तो वह पद उस के लिये स्वर्ग हो जायगा, सुख, हर्ष और शान्ति का कारण होगा। इसी तरह कोई स्थिति या पद अपने आप से बुरा या भला नहीं कहा जा सकता। अपने आप से सब स्थितियां अनिश्चित हैं, जैसे कोई कर्म अपने आप से पाप पूर्ण या पुण्यमय नहीं हैं। बाहरी गिर्दनवाह और परिस्थिति से आप के सम्बन्ध पर सब कुछ निर्भर है। यदि यह हालत उन्नति की है, तो आप खुश हैं; यदि यह हालत उन्नति की नहीं है, तो आप दुःखी और पीड़ित हैं। इस प्रकार ये इच्छाएँ भिन्न प्रकारों की होने के कारण ऐसी हैं जिन से तुम्हारी उन्नति

होती है, और इन के कारण का सम्बन्ध तथा आगमन पिछली योनियों से नहीं है। ये इच्छाएँ चाहती हैं कि आप जड़ता को जीतें। यदि जड़ता प्रबल की जाय और आत्मिक शक्ति दुर्बल हो जाय, तो आप क्लेश भोगते हैं। यह यातना, यह दर्द एक प्रकार की आध्यात्मिक सूचना है, इस से तुम मानो ठीक राह पर आ जाते हो, और तुम्हें अपनी उच्चतर प्रकृति की याद आ जाती है, और इस प्रकार से तुम्हारे आत्मिक रोग का निवारण होता है। व्यथा और यातना संसार के लिये कल्याण (मुबारक, blessings) हैं। व्यथा और यातना न होती तो बिलकुल उन्नति न होती। इस प्रकार वेदान्त कहता है कि यातना के इस क़ानून के द्वारा आप के पतन की कोई आशंका नहीं है। मत सोचो कि तुम कभी भी नीचे घसीटे जाओगे, कभी भी तुम पिछड़ोगे।

यदि तुम किसी को अपने से बहुत आगे खड़ा हुआ देखते हो, तो डाह न करो, क्योंकि तुम स्वयं वहीं पर एक दिन होगे। और यदि तुम अपने आप से किसी को बहुत नीचे या पीछे देखते हो, तो उसे तुच्छ न समझो, क्योंकि एक दिन वह भी वहां पर होगा जहां तुम अब हो। दस जन्म पीछे तुम जहां पर थे कुछ लोग आज वहां हैं, और कुछ लोग आज वहां हैं जहां तुम अब से दस जन्मों में पहुँचोगे। इस कारण तुम्हें सब पर सार्वभौम प्रेम होना चाहिये, किसी को तुच्छ न समझना चाहिये। जो तुमसे अधिक ऊँचे पर हैं उनसे डाह न करो क्योंकि तुम वहां पर होगे।

प्रश्न—यदि व्यथा के नियम के द्वारा हम उन्नति करने को बाध्य हैं, तो क्या वंशपरम्परा के नियम में कोई

सच्चाई है? बच्चे अपने पिता माताओं के विशेष रोगों से क्लेश पाते हैं। इन बातों की संगति कैसे करें?

उत्तर—आप जानते हैं कि कल यह कहा गया था कि हम आप ही अपने माता-पिताओं के निर्माण कर्ता हैं। यह एक मनुष्य है जिसके एक विशेष प्रकार का रोग है। हम मोल लेते हैं कि रोग उतना ही बुरा है जितना लोग उसे कहते हैं, यद्यपि वास्तव में बुरा शब्द अनिश्चित है— क्योंकि प्रत्येक वस्तु परमेश्वर—किन्तु यह एक मनुष्य है जिसके रोग का संबंध कामुकता, पाशविक विकारों,उग्र इच्छाओं, और लालसाओं से है। अब यह मनुष्य मृत्यु के बाद एक विशेष प्रकार का क्षेत्र और गिर्दनवाह, जिससे इन इच्छाओं की पूर्ति होगी, पसन्द करेगा। दूसरे शब्दों में ये इच्छाएँ अपने फलसे पहले प्रकट हो जाती हैं।

आध्यात्मिक संबंध के क़ानून से वह ऐसे लोगों के पास खिंच गया है, ऐसे लोगों से पैदा हुआ है, वह अब ऐसी देह में प्रवेश करने वाला है, जो उसकी विशेष इच्छाओं की पूर्ति के उपयुक्त होगी। इस तरह वह ऐसे लोगों के पास आता है। अब वंशपरम्परा का क़ानून (Law of Heredity) सत्य रहता है,क्योंकि वह उसे एक विशेष प्रकार का शारीरिक स्वभाव देता है,जिस के द्वारा उसे अपनी काम- नाओं को परितार्थ करना होता है। इस प्रकार उदाहरण के लिये, मनुष्य कहता है, 'मेरा विचार एक पुस्तक प्रकाशित करने का है।' अब, यदि मनुष्य एक पुस्तक प्रकाशित करना चाहता है, तो उसे किसी छापेखाने में जाना चाहिये, क्योंकि वहां यंत्र और सामान इत्यादि मिलेगा, छापेखाने वाले उसका काम करेंगे। वंशपरम्परा का नियम छापेखाने

के तुल्य है, उससे किसी की इच्छा के अनुकूल तैयार सामान मिल जाता है। मान लो, एक मनुष्य हत्या करना चाहता है, और भुजाली (Dagger) का बनाने वाला हत्या करने का इरादा रखने वाले को भुजाली देना है, और वह शत्रु पर आघात करता है। अब भुजाली बनाने वाले का अपराध नहीं है, किन्तु आघात करने वाला अपराधी है।

मातापिताओं ने हमें यह शरीर दिया है, क्योंकि हमने इसे चाहा था, और जो देह हमने मांगी थी वही हमें मिली, यद्यपि यह रोगग्रस्त है। अब प्रश्न यह होता है। यदि मनुष्य को अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिये एक शरीर पाना ही था, तो उसे रोगी शरीर नहीं मिलना चाहिये था। अच्छा, अब तुम जानते हो कि इच्छाओं का पूर्ण होना ज़रूरी है और साथ ही हमें उन्हें त्याग भी देना है; यह नियम है। मनुष्य अपने भाग्य का आप ही मालिक है। यह तुम्हारी अपनी पसन्द (रुचि) की बात है कि तुम अपनी नीची इच्छाओं को त्याग दो और ऊँची इच्छाओं को ग्रहण कर लो या न करो। ये पीड़ा और यातनाएँ तुम्हारी स्वाधीनता हरने हारी नहीं हैं, बल्कि उसे बढ़ाने वाली हैं। पीड़ा और यातना के कारण, जो चाहे जान कर हों या अनजाने, हम अधिक सावधान, अधिक खबरदार हो जाते हैं और इस तरह पर अपनी ही स्वतंत्र मर्ज़ी से हम नीची इच्छाओं को त्याग देते हैं और ऊँची इच्छाओं को ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार पीड़ा और यातना हमें अपने वश में नहीं करतीं बल्कि हमें स्वाधीनता देती हैं।

यह एक मनुष्य है जिसमें नीची इच्छाओं की प्रबलता है। इन कायिक इच्छाओं को पूरा होना है। और साथ

ही उन्हें अवश्य त्याग भी देना है। यह नियम है। चूंकि तुम्हारे इस प्रभुत्व (अधिकार) ने इच्छाओं की पूर्ति की कामना की थी, इस लिये उनकी तृप्ति होनी ही ज़रूरी है, और साथ ही इन इच्छाओं की तृप्ति के दौर में दर्द, रंज और यातना का आगमन होता है। यह व्यथा और यातना तुम्हारी वह दुर्बलता दूर कर देंगी। अपने अड़ोस-पड़ोस से- उसकी घृणा का, जिस अड़ोस पड़ोस को साथ ही वह सहने को लाचार है—यह नतीजा है।

प्रश्न:—नीची इच्छाओं और सामान्यतः वंशपरम्परा- गत माने जाने वाले रोगोंके संबंध की व्याख्या तो मैं समझा, किन्तु उदाहरणार्थ यक्ष्मा कहलाने वाले रोग को ले लीजिये। यदि यह रोग हमारी तृष्णा का फल नहीं है तो मेरी समझ में नहीं आता कि इच्छा कहां होती है।

उत्तर:—साधारणतः ऊँच और नीच, पाप और पुण्य शब्दों से सारे मामले की व्याख्या नहीं हो जाती। साधारणतः लोग जिन्हें अच्छा या बुरा समझते हैं, वे वेदान्त के अनुसार वैसे नहीं हैं।

वेदान्त के अनुसार अधिक भोजन या उस प्रकार का भोजन जिससे अजीर्ण या सुस्ती होती है, सब पापों की जड़ है। अधिकांश पापों का कारण एक तनिक सी त्रुटि होती है, किन्तु अजीर्ण के द्वारा तुम्हारा मिज़ाज बेकाबू होजाता है और सब प्रकार के पाप करने की पात्रता आ जाती है। वेदान्त के अनुसार, जो कोई भी बात तुम्हारे परम आनन्द या दिव्य हर्ष को रोकती या पिछाड़ती है, वही पाप है। इस प्रकार तुम्हारे अधिकांश पापों का मूल विशेषतः तुम्हारा भोजन है। दूसरे धर्म-प्रचारक इस बात

पर उतना ज़ोर नहीं देते जितना कि "राम" देता है। किन्तु है यह तथ्य। "राम" केवल अपने ही अनुभव से नहीं, किन्तु प्रिय मित्रों के अनुभव से भी कह सकता है कि यदि हमारा पेट (आमाशय) चैन से होता है या हमारा स्वास्थ्य ठीक होता है तो हम अपने मिज़ाज को काबू में रख सकते हैं, अपने विकारों को वश में कर सकते हैं, अपनी इच्छाओं को रोक सकते और चेरी बना सकते हैं।

आज यह एक आदर्श स्वरूप धर्मात्मा पुरुष है, जो हज़ारों प्रलोभनों को जीत चुका है, अपने विकारों को काबू में ला चुका है। इस आदमी को ले लो जो आज ऐसे निर्मल चरित्र का है और जिस के वर्तमान चरित्र के विचार से लोग मानों ऐसा कह सकते हैं, "अरे! वह तो एक ईसा है।" किन्तु कल उसकी ओर देखना, यही मनुष्य खराब से खराब प्रकारों के विकारों के अधीन हो सकता है।

लोग उछल कर परिणामों पर पहुँचना चाहते हैं। वे एक मनुष्य के माथे पर लिखना चाहते हैं "महात्मा" और दूसरे के माथे पर "पापी"। किन्तु वास्तव में कल जो महात्मा था वह दूसरे दिन पापी बन सकता है, और जो पापी था वह महात्मा हो सकता है।

चार्ल्स डिकेन्स के "दो नगरों की कहानी (A Tale of Two Cities-अ टेल आफ़ टू सिटीज़)" नामक उपन्यास में सिडनी कार्लटन (Sidney Carlton) का चरित्र अत्यन्त खराब अंकित किया गया है, किन्तु उस की मृत्यु इतनी शूरता पूर्ण, इतनी उत्कृष्ट है कि उस की सम्पूर्ण पाप और दोष पूर्ण प्रकृति समस्त धुल जाती है। रूसी काउंट

टॉल्सटाय (Russian Count Tolstoi) ने एक उपन्यास लिखा है जिस में एक महिला के चरित्र का चित्रण किया है। बराबर वह अत्यन्त कुत्सित प्रकार की विषयभोग- परायण नारी बताई गई है, किन्तु उस का अन्त इतना मर्म- स्पर्शी है कि हमारी सम्मति बदल जाती है।

लार्ड बायरन (Lord Byron) इंग्लैंड में दुरदुराया जाता था और सड़कों पर भी नहीं निकलने पाता था। लोगों को उस की सूरत से घृणा थी, किन्तु उस के जीवन के अन्तिम दृश्य इतने श्रेष्ठ और साहसिक थे कि अंग्रेज़ लोग उसे प्यार करने लगे। किन्तु सदा ही हमारे जीवन का अन्त श्रेष्ठ नहीं हुआ करता।

जब लार्ड बेकन (Lord Bacon) ने हाउस आफ लार्ड्स में पहला व्याख्यान दिया, तब लोक चकित हो गये, और समाचार पत्रों ने लिखा, "एक दिन प्रातःकाल जागने पर उस ने अपने को एकाएक प्रसिद्ध पाया।" वही लार्ड बेकन लोगों की नज़रों में गर्हित (obnoxious) होने को जीता रहा।

सर वाल्टर स्काट (Sir Walter Scott) अपने जीवन के पहले भाग में लार्ड बायरन जैसे उत्तम कवि नहीं समझे जाते थे। राज कवि (Poet Laureate) की हैसियत से वे अपना सिक्का नहीं जमा सके, किन्तु उन के जीवन के अन्त के समय उन की रचना इतनी सुन्दर थी कि वे उपन्या- सकारों के सिरताज कहे गये।

अतएव "राम" तुम से कहता है, "कि जिनके संसर्ग में तुम आओ उन की सदा आध्यात्मिक शक्तियों में,उन की अनन्त योग्यता में, विश्वास करो। अन्तिम निर्णय करना छोड़ दो,

कभी कोई विशेष सम्मति न क़ायम करो और न दोषी ठहराओ"।

तुम्हारे सामने यह एक पापी आता है। अपने चित्त में किसी प्रकार का द्वेष,घृणा या शत्रुता उस के प्रति न रक्खो। उसे एक आध्यात्मिक शक्तिशाली समझते हुए उस के पास पहुँचो। यह मत भूलो कि आज का वही महापातकी कल परम साधु और महाशूर बन सकता है। चरित्र सांचे में ढला हुआ नहीं है। केवल आत्मा की अनन्त सम्भावनाओं (शक्तियों) और योग्यताओं (सामर्थ्य) में विश्वास करो।

जो कोई तुम्हारे पास आवे, उसे परमेश्वरवत् ग्रहण करो, और साथ ही अपने को भी तुच्छ न समझो। आज तुम यदि कारागार में हो तो कल तुम गौरवशाली भी हो सकते हो।

पुरानी इंजील (Old Testament) में, जिस सैमसन (Samson) की चर्चा है, जो अपने राष्ट्र की ज़िल्लत का कारण हुआ, वह अपने अतीत (गत आचरण) का निरा- करण कर सका, गत अपमान को हर क्षण में धो सका। वेदान्त आप से सच्ची आध्यात्मिकता में, "सच्ची परमे- श्वरता में," "अन्तर्गत नारायण" में विश्वास करने को कहता है। उस में विश्वास करो, और बाहरी निर्णयों को कभी न मानो। वे कुछ भी नहीं हैं, क्योंकि हम उन को मेट सकते हैं। हम उन से ऊपर उठ सकते हैं।

यह आध्यात्मिकता जो कुछ है वही सब वस्तुएँ हैं, और यह आध्यात्मकता सर्वत्र आ सकती है।

धर्म संसार के सदाचार को गलत समझते हैं। वे सम्पूर्ण असत् (पाप) के मूल में प्रहार नहीं करते। जिस मनुष्य ने आज सारे प्रलोभन का प्रतिरोध किया है, वह कल

घातक, जाति-च्युत हो सकता है। कर्म और देह दोनों की दृष्टि से इस की व्याख्या होती है।

स्थूल लोक में (भौतिक दृष्टि से) हमारे चरित्र में इस प्रभेद की व्याख्या यह है कि जब तुम्हारा शरीर सुस्वस्थ है, जब तुम्हारा पेट स्वस्थ है, तब तुम्हारा चरित्र बहुत ठीक है और तुम प्रलोभन का सामाना कर सकते हो। कल तुम को कोई रोग, कोई व्याधि घेर सकती है, तुम्हारा पेट दुरुस्त नहीं है, और ऐसी हालत में कोई भी बात तुम को चुब्ध, व्यग्र या अस्तव्यस्त कर सकती है, यह एक तथ्य है।

यह बड़े आश्चर्य की बात है कि धर्म-प्रचारक इस विषय की चर्चा करना अपनी मर्यादा के विरुद्ध समझते हैं।

अपने भोजन के सम्बन्ध में सावधान रहो, तो तुम अपने रोग को अच्छा कर दोगे।

पेट को अधिक लादना, अनुचित भोजन का व्यवहार, सब पापों की जड़ है। जिस में इस प्रकार की प्रवृत्तियां हैं, वह वेदान्त की दृष्टि में उतना ही बड़ा पातकी है जितना कि अन्य सातों पापोंमें से एक या सातों का करने वाला। पेट का प्यार हमें ठीक उन देहों,उन माता पिताओं के पास पहुँचाता है कि जिन की चर्चा पहिले को जा चुकी है,और कद्र भोग द्वारा हम दिव्य सत्य को पहुँचते हैं।

प्रश्न—इस की व्याख्या कैसे होती है कि मान लीजिये, 6 बच्चों के कुटुम्ब में एक बच्चा साधु, एक पापी, एक स्वस्थ या बीमार इत्यादि पैदा होता है? यह क्या बात है कि वे सब विभिन्न हैं?

उत्तर—इस तरह पर व्यक्तिगत जन्मों में अन्तर होता है। एक बात सदा सब में सामान्य होती है। एक मनुष्य एक छापेखाने में काम कर रहा है, दूसरा रोगन करने के कारखाने का काम करता है, तीसरा एक तेल की कोठी में, चौथा कपड़े के पुतलीघर में, इत्यादि। ये सब लोग विभिन्न व्यवसायों में लगे हुए हैं, किन्तु उन सब में एक बात सामा- न्य है। वे सब एक ही दुकान से कपड़ा खरीदते हैं। इसी तरह यदि एक बात में हम में प्रभेद है, तो यह लाज़िमी नहीं है कि हम में कोई भी सामान्य बातें न हों।

इन सब बच्चों में एक अभिलाषा सामान्य है, अपने माता पिता से अनुराग। यह बात उन सब में समान है। उन सब को उस घर से या उस अड़ोस-पड़ोस से स्नेह था, किन्तु उनकी दूसरी इच्छाएँ जुदी जुदी थीं। इस तरह ऐसा है कि इस संसार में कोई एक सड़क से आता है और दूसरा दूसरी सड़क से आता है, किन्तु सब एक उसी चौराहे पर मिल जाते हैं।

प्रश्न—क्या हम यह शरीर त्याग देने पर प्रेत-संसार में अपने आप को पूर्ण करते हैं?

उत्तर:—वेदान्त के अनुसार हम अपने को भावी जन्मों में पूर्ण करते हैं। ये भावी जन्म हैं, भावी जीवन हैं, जिन में हम अपने को पूर्ण करते हैं। प्रेत लोक हमारे लिये हर 24 घंटों में स्वप्न के तुल्य होंगे।

प्रश्नः—क्या हम उन की सहायता कर सकते हैं जिन की जा चुकी हैं?

उत्तर:—हां, तुम कर सकते हो। उन के चित्र या उन की मूर्तियां अपने सामने रक्खो और तब सोचो, अनुभव करो तथा भान (महसूस) करो कि वे परमेश्वर हैं। इस तरह पर तुम उन की सहायता कर सकते हा। उन के लिये अच्छे विचार करो, उन के लिये अत्युत्तम भावनाएँ रक्खो, और तुम उन की सहायता कर सकते हा, तथा (इसी रीति से) अपने आप का भी सहायता करोगे।

प्रश्नः—क्या वे कभी स्थूल मामलों में हमारी सहा- यता करते हैं?

उत्तर:—यदि स्थूल लोक में दूसरे लोग तुम्हें सहा- यता दे सकते हैं, तो हम कह सकते हैं कि मृतक भी तुम्हारी सहायता करते हैं। किन्तु वेदान्त के अनुसार स्थूल लोक में भी तुम्हीं स्वयं अपने आप के सहायक हो, मृतकों की चर्चा ही क्या। तुम्हीं अपने आप की सहायता करते हो, मृतक की हैसियत से या जीवितों के शरीरों में होकर। इस प्रकार वेदान्त आप से चाहता है कि बाहर से कुछ न ढूँढ़ो, अपना केन्द्र अपने अन्दर रक्खो, और हरेक वस्तु को अन्दर ही ढूँढ़ो और वहीं से आशा करो। यदि तुम में पात्रता है तो तुम्हें अभिलाषा करने की कोई ज़रूरत नहीं, इच्छित वस्तुएँ तुम्हारे पास लाई जायगी, तुम्हारे पास आवेंगी। यदि तुम अपने को योग्य बना लो तो, सहायता अवश्य तुम्हें आ मिलेगी। अब हम किसी अन्य दिन में किये गये सवाल पर आते हैं।

यदि मनुष्य पहले आस-पास (अड़ोस-पड़ोस) में रहता है कि जो हर घड़ी उस में भारत का प्रेम पैदा कर रहा है,जो

हर घड़ी उस में भारतीय विचारों का संचार कर रहा है, यदि वह ऐसी पुस्तकें पढ़ता है और ऐसे मनुष्यों के संसर्ग में आता है कि जो निरन्तर भारत वर्ष उस के सामने बनाये रखते हैं, तो वह मनुष्य चाहे अमेरिकन हो या अंग्रेज़, अपने विचारों के प्रतिफल स्वरूप भारत वर्ष में जन्म लेगा। इस प्रकार अपनी ही इच्छाओं से वह भारतवर्ष में पैदा होता है।

प्रश्नः—क्या मनुष्य लौट कर कुत्तों और बिल्लियों की योनियों में जाते हैं?

उत्तर:—अब बिल्लियों, कुत्तों और दूसरे पशुओं के बारे में। ऐसा है), यह उन अड़ोस पड़ोसों पर निर्भर है कि जिन में वे हैं। उन के भावी जन्म उन के वर्तमान अड़ोस- पड़ोसों पर निर्भर हैं।

भारतवर्ष में एक महात्मा के पास दो मनुष्य आये, उन में से एक का कुत्ते का मिज़ाज था, और दूसरे का बिल्ली का मिज़ाज था। अथवा आप यों कह सकते हैं कि एक बिल्ली और एक कुत्ता महात्मा के पास आये। कुत्ते ने महात्मा से यह प्रश्न किया, 'महाराज! यह बिल्ली या बिल्ली-तुल्य मनुष्य है। वह बड़ा दुष्ट और धूर्त है, वह बड़ा बद है। अपने दूसरे जन्म में उस का क्या गति होगी?" तदुपरान्त बिल्ली-तुल्य मनुष्य महात्मा के पास गया और वही प्रश्न किया, "महाराज! यह कुत्ता या स्वानशील मनुष्य है। वह बड़ा खराब है. वह घुड़कता है, भूँकता है। मृत्यु के बाद दूसरे जन्म में उस का क्या होगा?" महात्मा चुप रहे। किन्तु बार बार ये प्रश्न किये जाने पर वे बोले, "भाइयों! तुम ने ये सवाल न किये होते तो अच्छा होता।"

किन्तु उन्हों ने उत्तर पर आग्रह किया । महात्मा ने कहा, "अच्छा, यहां यह बिल्ली है, हे कुत्ते ! यह बिल्ली तुम्हारा साथ रखती है और वह तुम्हारी आदतें सिख रही है, तुम्हारे साथ रहती है, और हर समय तुम्हारे चलन में शामिल होती है । अच्छा. अपने दूसरे जन्ममें यह बिल्ली कुत्ता होगी । वह और कुछ कैसे हो सकती है ?" और कुत्ते के सम्बन्ध में यह कि ऐ बिल्ली ! अच्छा,वह कुत्ता तुम्हारे साथ रहता है और हर घड़ी तुम्हारे लक्षण ग्रहण कर रहा है, आदतों में भाग ले रहा है । अपने दूसरे जन्म में वह अवश्य बिल्ली होगा ।" अब यह उस पर निर्भर है कि जो कुत्ते या बिल्ली का साथ रखता है । इस प्रश्न पर ब्यौरे में जाने की हमें कोई ज़रूरत नहीं है ।

प्रश्नः—मृत्यु के बाद मनुष्य का पुनर्जन्म होने में कितने दिन लगते हैं ?

उत्तरः—एक मनुष्य आज सब तरह के काम कर रहा है । वह सो जाता है,और दूसरे दिन सवेरे फिर जागता है । उसका सोने का समय मृत्यु के तुल्य है, और उसका फिर जाग पड़ने का समय पुनर्जन्म के समान है । उसके सो रहने के क्षण और फिर जागने के क्षण के बीच में जो समय बीतता है, वह उस समय के समान है जो तुम स्वर्ग, नरक, प्रेतों के राज्यों इत्यादि में बिताते हो । अब हम देखते हैं कि इस दुनिया में कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल चार या पाँच घंटे सोते हैं,कुछ लोग दस घंटे सोते हैं, और कुछ आठ घंटे सोते हैं । बच्चे देर तक सोते हैं । बूढ़े आदमी अधिक नहीं सोते हैं । जवान आदामियों को अधिक सोने की ज़रूरत होती है । इतना भाँति २ के मनुष्यों पर,

उनकी आध्यात्मिक उन्नति की अवस्थाओं पर निर्भर करता है । जिस प्रकार इस दुनिया में तुम्हारी ज़िन्दगी का कोई नियत समय नहीं है, कुछ लोग जवान मर जाते हैं, कुछ तीस साल जीते हैं, कुछ लोग सत्तर वर्ष जीते हैं, इसी तरह पुनर्जन्म के लिये कोई नियत समय नहीं हैं ।

प्रश्नः—क्या कोई मनुष्य इस ज़माने में वेदान्त का अनुभव कर सकता है ? बीसवीं सदी की सभ्यता में रहता हुआ क्या कोई मनुष्य वेदान्त का अनुभव कर सकता है ? और यह सूचित किया गया था कि वेदान्त के अनुभव के लिये मनुष्य को इस या उस तरहकी ज़िन्दगी बसर करना चाहिये । उसे हिमालय के बन में चले जाना चाहिये ।

उत्तरः—"राम" कहता है, 'नहीं, नहीं, बन में तुम्हारे जाने की कोई ज़रूरत नहीं है ।' लोग कहते हैं, हमें समय नहीं है । हमारा समय नित्य के कामों में बीत जाता है, हमें सब तरह के कामों को देखना पड़ता है, हमारे संबंधी और मित्र हमारा समय ले लेते हैं । एक प्रार्थना है, "हे परमेश्वर ! मुझे मेरे शत्रुओं से बचा ।" किन्तु आज कल के मनुष्य के लिये यह प्रार्थना करना अधिक है, "हे परमेश्वर ! मुझे मेरे मित्रों से बचा ।" मित्र हमारा सब समय लूट लेते हैं, तब चिन्ताओं का आगमन होता है ।

एक बात उपसंहार में । आप जानते हैं, पढ़ना या अध्ययन करना विभिन्न प्रकारों का है । कुछ लोग तोते के समान केवल जुबान से पढ़ते हैं, कुछ लोग हाथों द्वारा विद्याभ्यास करते हैं,जैसे नौकाकार या कारीगर । "राम" के कहने का यह अभिप्राय नहीं है कि सब कारीगर वैज्ञानिक नहीं हैं, किन्तु ऐसे कारीगर भी हमने देखे हैं जो वैज्ञानिक

नहीं हैं । ऐसे लोग हैं जो एक खाड़ी तैर जा सकते हैं किन्तु जलविज्ञान के संबंध में कुछ भी नहीं जानते । ऐसे लोग हैं जो हवा में नौका उड़ा सकते हैं, किन्तु वायुविज्ञान का तनिक भी ज्ञान नहीं रखते । औषधियों के बनानेवाले प्रायः रसायनविद्या से बिलकुल अनभिज्ञ होते हैं । जो लोग अपने हाथों से विद्याभ्यास करते हैं उनका स्वागत है । कुछ लोग ऐसे हैं जो केवल हृदय से अध्ययन करते हैं । वे लोग दुनिया में धन्य हैं । जो लोग एक झलक में एक वस्तु का ज्ञान और अनुभव कर लेते हैं, जो लोग ( Clairvoyant ) दिव्यदर्शी हैं, हरेक वस्तु देखते हैं, उनका भी स्वागत है । किन्तु यदि वे केवल अपने चित्तों से अध्ययन करते हैं, तो उनकी शिक्षा से कोई लाभ नहीं है । उनमें उत्कट इच्छा होना चाहिये, और साथ ही साथ खूब अभ्यास होना चाहिये ताकि उनकी विद्या, उनकी शिक्षा दूसरों को प्रदान की जा सके । यदि वे केवल हृदय का अनुसरण करते हैं, तो वे एक अंग हैं । इस संसार में सब से अधिक काम के वे लोग हैं जो तीन पहलुओं से काम करते हैं, जिनके दिल, दिमाग, हाथ और जुबान खूब रचे हैं । वे अधिक शिक्षित हैं, वास्तव में व्युत्पन्न हैं ।

इसी तरह राम चाहता है कि आप इन सब मार्गों से दिल,दिमाग,हाथ और ज़बान, अन्तःकरण,हरेक वस्तु से,वेदांत का अध्ययन करें और सीखें । उसे आप अपने शोणित (blood) के द्वारा झनझनाने दो, अपनी धमनियों और नसों में उसे घूमने दो, अपने हृदय में उसे धड़कने और व्यापने दो, अपना दिमाग उसमें डुबो दो, अपनी सारी हस्ती उसमें भीजने दो । तब आप अपने को उन्नत करोगे, तब आप हर प्रकार

से स्वतंत्र होंगे । तब आप अपनी परम ईश्वरता, अपनी सच्ची प्रकृति का अनुभव करोगे । तब आप प्रत्येक स्थिति बिन्दु से पूर्णतया स्वतंत्र होंगे ।

'राम' आप से कहता है कि यदि आप इस या उस शरीर में दूसरा भेद पावें, यदि आप को समझ पड़े कि ( अमुक ) मनुष्य जो कुछ उपदेश देता है वह सचमुच उसके हृदय में नहीं है, तो आप उसे कुछ न गिनें । आप स्वयं विषय को अपनावें, दिल, दिमाग और अन्तःकरण से (उसके) सत्य का पालन करें, आचरण में उसका पालन करें; आप उच्च, श्रेष्ठ और महान हो जाँयगे । 'राम' की आकांक्षा है कि आप वह हो जाँय और वह बन जाँय ।

यदि 'राम' में हज़ारों दोष हैं, यदि वह हज़ारों भूलें या गलतियां करता है, तो आप से क्या प्रयोजन ? 'राम' उन भूलों का ज़िम्मेदार है । 'राम' तुम्हें श्रेष्ठ सत्य ( ) देता है । इसे अपना जीवन बना लो, और यह तुम्हें सुख देगा, यह तुम्हें सब संशयों से परे कर देगा ।

मान लो कि 'राम' जो कुछ उपदेश देता है उस के अनुसार वर्ताव नहीं करता है । हो सकता है कि राम ऐसी परिस्थिति और अड़ोस पड़ोस में रहता है जो उस के ऐसा आचरण करने में बाधक हैं । किन्तु तुम इस (वेदान्त) के अनुसार रह सकते हो, इस का प्रयोग कर सकते हो ।

इसी तरह ये कालविन (Calvins), ये एडीसन (Edisons) और अन्य सब महापुरुष केवल अपने दिमागों से काम की बान्दिश बांधते हैं । ये नमूने, ये नकशे हाथ से नहीं बनाये जा सकते । उन के लिये एक प्रकार की यंत्रावली की ज़रूरत है । इस लिये वे आप को केवल नकशे या

मनसूबे देते हैं । तुम्हारे हाथ हैं, और तुम यंत्रावली बना सकते हो । तुम में ये नकशे बनाने अथवा ये बन्दिशें बांधने की योग्यता या शक्ति न हो, किन्तु उन्हें लेने को और उन्हें अमल में लाने को तुम्हारे हाथ हैं ।

श्रमजीवियों ( मज़दूरों ) के कष्ट का यह कारण है । जो नकशे उन्हें दिये जाते हैं, उन को ग्रहण करके वे अमल में नहीं लाते हैं ।

"इसी तरह उन लोगों की दलील झूठी है जो कहते हैं, हम इस शिक्षक से कुछ न ग्रहण करेंगे, क्योंकि वह जो कुछ उपदेश देता है तदनुसार आचरण नहीं करता है ।"

पुनः, एक मनुष्य पाक, दूध या मिठाइयां बेचता है । चूंकि वह उन पाकों को नहीं खाता है, दूध नहीं पीता है, मिठाई नहीं खाता है, इस लिये क्या आप उस से खरीदेंगे नहीं ?

यदि किसी चिकित्सक के बीमार होने के कारण तुम उस की बनाई दवाई नहीं ग्रहण करते तो, वेदान्त कहता है, आप गलती पर हैं. चाहे वह अपने रोग की दवा न बता सकता हो । चिकित्सक किसी रोग से बीमार है । जिस रोग से आप बीमार हैं उस की चिकित्सा वह जानना है, किन्तु जिस रोगसे वह स्वयं बीमार है उस की दवा वह नहीं जानता है । हो सकता है कि वह अपने को नहीं चंगा कर सकता है, किन्तु साथ ही वह आप को निरोग कर सकता है ।

इस तरह 'राम' कहता है कि भारत और अमेरिका में बहुतेरे लोगों से वार्तालाप करने में उसे पता लगा है कि लोग पहले जब तक ग्रंथकारों का नाम नहीं जान लेते, तब

तक पुस्तकें नहीं पढ़ते । बहुतेरे कहते हैं, "यह एक ग्रंथ- कार है, उस ने यह और वह जघन्य कृत्य किया है, और वह अपने को परमेश्वर कहता है । मैं उस की पुस्तक नहीं पढ़ना चाहता ।" 'राम' कहता है, भाई ! भाई ! गलती न करो । मनुष्य चाहे खराब हो, परन्तु जो सत्य वह तुम्हें देता है उस का विवेचन करो, सत्य को उसी के गुण-दोषों से परखो ।"

भारत वर्ष में रहट के द्वारा कूपों से पानी भरा जाता है । कूँओं से पानी निकल कर विशेष तरह के बने हुए हौदों में गिरता है, और छोटी नालियों के ज़रिये से पानी इस हौद से खेतों में पहुँचाया जाता है । जब जल कूप में है तब उस के किनारे न चरागाह है, न हरेरी है, और न पेड़ हैं । जब जल हौदे में है तब वहां भी कोई पास फूल नहीं है, किन्तु जब खेतों में जल पहुँचता है, तब भूमि उर्वरा ( Fertile ) और सम्पन्न हो जाती है, और हरेरी प्रकट होती है । इस प्रकार हमें यह तर्क नहीं करना चाहिये कि जल खेतों में हरेरी नहीं पैदा कर सकता, क्योंकि जब पानी कूँए या हौद में था तब वहां कोई हरेरी नहीं थी ।

इसी तरह राम आप से कहता है कि जब ज्ञान आप के पास आता है तो उसे ग्रहण कीजिये, कहीं से भी वह आता हो । यह न कहो, "यदि ज्ञान भारत से आता है तो भारतवासी खयं प्रकृति के पलड़े में इतने नीचे क्यों हैं ?" सत्य को उसी के गुण दोषों से परखो । मनुष्यों को सुखी करने का यहां एक मात्र उपाय है; सर्वे कल्याण का, पर- मेश्वर का केवल यही मांग है । यह आप को सब चिन्ताओं से छुटा देता है, यह आप को सब मुसीबत से ऊपर उठा

देता है । यही एक मात्र मार्ग है, दूसरा कोई नहीं ।

इसी तरह 'राम' आप से कहता है कि यदि ईसा का चरित्र इतना श्रेष्ठ था तो यह नतीजा न निकालो कि ईसा के उपदेश सम्पूर्ण सत्य हैं और सत्य से इत्तर नहीं हैं । कभी कभी हम अति सुन्दर युवकों को अति वृणित कार्य करते देखते हैं । एक मनुष्य के कर्म चाहे श्रेष्ठ हों, उस के उपदेश और लेख भी चाहे वैसे ही हों,किन्तु साथ ही साथ जो कुछ उस से निकलता है वह सब उत्तम नहीं है । उस का रक्त या उस की हड्डियां नहीं अच्छी हैं ।

इसी तरह इंजील पढ़ने में उसमें जो कुछ है वह सब इसा के उपदेशा में न लगाओ । हज़रत ईसा पूर्ण हैं, उनके उपदेश पूर्ण हैं । किन्तु जो दूसरे का है वह उस एक के माथे न मढ़ो । पुस्तक को उसकी योग्यता से परखो । सर आइज़ाक न्यूटन (Sir Isaac Newton) की रचना प्रिंसिपिया (Principia) में अनेक भूलें हैं । वह अपने समयमें चाहे सर्व श्रेष्ठ मनुष्य रहा हो,तथापि उसकी पुस्तकों का विवेचन उनके गुण दोषों से करो ।

इसी तरह 'राम' कहता है कि आपको 'राम' की भला- इयों और बुराइयों से कोई मतलब नहीं है । आध्यात्मिक उपदेश को उसी (उपदेश) की भलाई बुराई से परखो । वेदान्त के उपदेश आपको उठान्त और उन्नत करते हैं । 'राम' यह नहीं चाहता कि आप उपदेश को यह समझ कर ग्रहण करें कि 'राम' देता है, वह उपदेश तुम्हारे लिये है,वह तुम्हारा है ।

वेदान्त का अर्थ किसी की गुलामी नहीं है । बौद्ध धर्म बुद्ध की गुलामी है, इस्लाम मोहम्मद की गुलामी है, पारसी धर्म ज़ोरोआस्टर की गुलामी है, किन्तु वेदान्त किसी

महात्मा की गुलामी नहीं है । वह सत्य है, ऐसा सत्य जो हरेक व्यक्ति का है ।

यदि हम घाममें बैठें,तो हम उसके कृतज्ञ नहीं होते,क्योंकि सूर्य प्रत्येक मनुष्य का है । यदि 'राम' वेदान्त के घाम में बैठता है, तो तुम भी उस घाम में बैठ सकते हो, वह आप का भी उतना ही है जितना कि 'राम' का है । सत्य आपका भी ठीक उतना ही है जितना भारत वर्ष का है । इसे इसकी योग्यता के हिसाब से स्वीकार और, ग्रहण करो । यदि यह अच्छा है तो रखो । यदि यह खराब है तो बाहर ठोकरा दो । जिस तरह पर इस्लाम और ईसाइत भारत में तलवार और रुपये से लाये गये हैं,उस तरह पर हम वेदान्त नहीं लाते हैं । राम उस तरह से इसे नहीं लाता है । वेदान्त आप का है, इसे लो और अभ्यास करो ।

यदि एक मित्र घाम में बैठता है और उसका उपयोग नहीं करता, तो यह कोई कारण नहीं है कि तुम भी घाम का उपयोग न करो । ठीक ऐसा ही वेदान्त के बारे में है । इसे इस की योग्यताओं से परखो । इसे सीखो । अपने चरित्र में इसे उतारो । सम्पूर्ण व्यक्तित्व से ऊपर उठे रहो । सब ईसाओं, बुद्धों, मोहम्मदों या रामों से ऊपर खड़े हो । राम कहता है, "इस शरीर को अपने पैरों से कुचल डालो ।" 'यह शरीर मैं नहीं हूँ,' यह अनुभव करो, ऐसा जानो । जानो कि 'मैं वास्तविक तत्व हूँ,' ऐसा मुझे जानो और स्वाधीन होवो, यह अनुभव करो, ॐ उच्चारण करो "मैं हूँ"—ॐ, जिहोवा, ईसाओं का ईसा । मुझे जानो और मैं तुम हूँ । इसका अनुभव करो, और तुम सब चिन्ताओं से परे हो जाते हो । यह सब लड़खड़ाहट और जल्दी छोड़ दो, और तब सब

ईसाओं, सब मोहम्मदों, सब मित्रों और अन्य सब से, जो उनको नियत पथदर्शक मानते हैं, ऊपर उठो ।

वे परिवर्तनशील हैं । सब चंचल हैं । परम तत्व, अर्थात इन सब छायाओं के कारण और मूल स्वरूप परम तत्व को जानो । उसे जानो और स्वाधीन हो जाओ ।