उपदेश-भाग ।
बिना भोजन के मनुष्य की तरह हम भूखे और प्यासे हैं, आत्मानुभव के स्वाद के लिये लालायित हैं, मंत्र जपते हैं, मन की सांस से बांसुरी बजाते हैं। इस लिये मन की झील में अंगड़ित स्वार्थपूर्ण इच्छाओं को ढूँढ़ो और एक एक करके उनको कुचल डालो—दृढ़ प्रतिज्ञाएँ करो, और गम्भीर शपथें लो। जब तुम झील से बाहर निकल आवोगे, तब जल किसी पीने वाले के लिये विषैला न रहेगा। गौओं, नारियों, मनुष्यों को पीने दो—निन्दकों का विष ईश्वर से प्रवाहित स्वच्छ जल में बदल जायगा। (अपने मन में) दुर्बलता के बिन्दु तलाश करो और उन्हें निर्मूल करदो। इच्छाएँ एकाग्रता को रोकती हैं, और जब तक विशुद्धता तथा आत्मज्ञान का अस्तित्व न हो, तब तक सच्ची एकाग्रता नहीं हो सकती। पहले आप उसे उखाड़ फेंको जो एकाग्रता की चेष्टा करते समय आप को नीचे घसीट लाता है। अपने आप के प्रति आप सच्चे बनो। इस देश में दूसरों के द्वारा अत्यन्त संख्या में व्याख्यान दिये जाते हैं। तुम्हें अपने आप को उपदेश देना चाहिये। बिना इसके कोई उन्नति नहीं आती है।
बिछौने पर जाने के पहले बैठ जाओ, और उन दोषों को चिन्हित करो जिन्हें हटाना है। इंजील, गीता, उपनिषद, या इमर्सन जैसे लेखकों को पढ़ो। यदि लोभ या शोक दोष हो, तो इस पठन की सहायता से विचार करो कि यह दोष क्यों मौजूद है, क्यों इसे जाना चाहिये, कैसे यह
तुम्हें रोकता है ?—अपना मन उससे ऊपर उठा लो, ॐ उच्चारो। जब उसके पराजय का निश्चय हो जाय, अनुभव करो कि वह पराजित हो गया, और फिर उसका बिलकुल ख़याल न करो। एक एक करके इन भुजंगों के फन पकड़ो, उन्हें कुचलो, और हरेक पर अपने आप को व्याख्यान दो। हरेक को अपना काम आप करना चाहिये। ध्यान करते समय ॐ जपो, जब तक वाणी रटती रहेगी और स्वर्गीय ध्वनि के प्रभाव पड़ते रहेंगे, तुम्हें सहायता मिलेगी, और सुन्दर संस्कार डाल कर आप बलवान होकर निकलेंगे। यह पहली क्रिया है।
सब दोषों का मूल कारण सब प्रकार की अविद्या है— अर्थात् शुद्ध आत्मा का अज्ञान, और अपने आत्मा को देह तथा बाहरी सुखों से अभिन्न मानने की इच्छा, एवं शोक, पीड़ा, क्लेश की सम्भावना है। जब आप अनुभव करलें कि आप अनन्त आत्मा हैं, तब आप उत्कट विकार या रंज के अधीन कैसे हो सकते हैं ? लोग कहते हैं कि नैतिक नियम गणित विद्या के नियमों के समान निश्चित नहीं हैं। यह एक भूल है। गुफाओं और सुदूर वनों में तुम्हें देख कर विस्मय होगा कि घास तुम्हारे विरुद्ध गवाही देने को उठ खड़ी होती है—दिवालें और वृक्ष तुम्हारे अपराध को प्रमाणित करते हैं। जो लोग कारण नहीं जानते हैं वे अड़ोस-पड़ोस से लड़ते हैं। यह एक दैवी क़ानून है जो अभंगनीय घोषित किया जा सकता है। परमेश्वर के नयनों में धूल भोंकने की चेष्टा करके तुम खुद अन्धे हो जाओगे। मलिनता को आश्रय देने के परिणाम भोगने पड़ेंगे। ये क़ानून एक एक करके सिद्ध
होंगे, सिद्ध होजाने पर मनुष्य नीच इच्छाओं को नहीं अंगीकार कर सकता।
अपवित्र इच्छाओं पर एक बार प्रभुता होजाने पर आप जितनी देर चाहें एकाग्रता लाभ कर सकते हैं।
न भूख मरो और न अधिक खाओ। दोनों से बचना चाहिये। उपवास प्रायः स्वभावतः आता है, क्योंकि सहज स्वभाव का अनुसरण करना चाहिये, वह चाहे खाने का हो और चाहे उपवास करने का। दासता से बचना चाहिये। स्वामी बनो।
भारत में कुछ दिन, जैसे पूर्णिमा का दिन, एकाग्रता उत्पादक सिद्ध हुए हैं। उस दिन अभ्यास करो और आप ऐसे दिनों को सहायक पावेंगे, यदि आप उस दिन विशेषतः बादाम आदि मग़ज़्यात, रोटी और फल खाते हैं।