पाप की समस्या।
28 दिसम्बर 1902 को दिया हुआ व्याख्यान।
वेदान्त की शिक्षाओं पर कुछ आपत्तियां राम की राय में लाई गई हैं। उस दिन किसी मनुष्य ने कहा कि यदि हिन्दुओं का तत्वज्ञान यही हो तो भारत के राजनैतिक पतन के कारण समझना सहज है। दूसरे मनुष्य ने राम से पूछा,यदि हिन्दुओं की शिक्षायें,वेदान्त, अर्थात् यह तत्वज्ञान, यह धर्म दुनिया का सर्वोत्कृष्ट धर्म और तत्वज्ञान होते, तो भारतवर्ष इतना अन्धकार ग्रस्त और ईसाई देश इतने समृद्ध क्यों होते!
राम इस समय इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा, क्योंकि
यदि ये प्रश्न उठा लिये जांयगे तो निश्चित विषय को त्याग देना पड़ेगा। किन्तु ये प्रश्न कुछ बाद के व्याख्यानों में उठाये जांयगे और इन के उत्तर इस तरह पर दिये जांयगे कि सब लोग चकित हो जांयगे। जिन लोगों को ( राम के ) कुछ उपदेश सुनने मिले हैं, राम केवल उनसे अधीर न होने की, तुरन्त नतीजों पर न फुदकने की प्रार्थना करता है। राम चाहता है कि वे तनिक धीरज रखें और वक्ता को आद्योपान्त सुन लें।
मुसलमानों की इंजील, अलकोरान में एक वाक्य इस प्रकार है, "असदाचार और दुर्गुण के हवाले ( यदि ) तुम अपने को कर दो, मद्यपान और विषयभोग में ( यदि ) तुम अपने जीवनों को लगा दो, तो तुम अपनी सत्यानाशी आप कर रहे हो, तब तुम अपना सत्यानाश आप प्रतिपादन करोगे।" एक मुसलमान सज्जन शराब पीते और इन्द्रियों के सुखों के पीछे दौड़ता हुआ और काम-वासनाओं को भोगता देखा गया था। एक मुसलमान धर्माचार्य उसके पास पहुँचा और उसे फटकारते हुए कहा कि "ऐसा-भत कर क्योंकि तू अपने ( मुसलमानों के ) पैगम्बर के नियत किये हुए नियमों को भंग कर रहा है।" तब इस शरावी ने अलकोरान के वचन का पहला भाग तुरन्त पढ़ा और कहा "यह देखो। अलकोरान कहता है. 'तुम शराब पियो और आनन्द करो और अपने आप कामाचार के हवाले कर दो। अलकोरान का, हमारे धर्मग्रथों का, हमारी इंजील का, यह यथार्थ वचन है। अलकोरान, धर्मग्रथ मदिरापान और कामपरायणता की आज्ञा देते हैं। क्यों वे न दें?"
तब तो धर्माचार्य ने कहा, "भाई ! रे भाई ! तुम क्या करने जा रहे हो? बाद के भाग को भी तो पढ़ो, 'तुम आप
अपना सत्यानाश करोगे' ( यह है वचन का दूसरा भाग )। दूसरा भाग भी तो पढ़ो।" शरावी ने जवाब दिया, "पृथ्वी- तल पर एक भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो सारे अलकोरान पर अमल कर सके। मुझे इन हिस्सों पर अमल करने दो। यह आशा या कल्पना नहीं की जा सकती कि कोई मनुष्य इंजील की सब नसीहतों पर अमल कर सकता है। कुछ लोग थोड़े अंश पर अमल कर सकते हैं और कुछ बड़े अंश पर; और बस। उस समग्र अलकुरान पर कोई नहीं अमल करता। फिर आप मुझ से समग्र पर अमल करने की आशा क्यों रखते हैं? मुझे वचन के प्रथम भाग का उपयोग करने दो"।
अतः राम की केवल यही प्रार्थना है कि उस मुसलमान शरावी की तर्क-शैली वा तत्वज्ञान का उपयोग नहीं किया जाना चाहिये। पूरा वचन पढ़ना उचित है, तब परिणाम निकाला जाय, उससे पहले नहीं।
एक समय राम के पास एक सोने की घड़ी थी। चैन में लगे हुए छोटे अलंकारों में एक खिलौना-घड़ी थी, जो वास्तव में कुतुबनुमा या परकार था। वह ( खिलौना-घड़ी ) चलती नहीं थी, किन्तु सुइयों को एक विशेष प्रकार से ठीक करने पर वह एक बजा सकती थी। सदा एक बजा रहता था, हैत के लिये कोई स्थान नहीं था। वही एक तुम हो। समय, स्थान और कारणत्व अर्थात् देश, काल, वस्तु से ऊपर खड़े हो। ये सब तुम से शासित होते हैं, तुम उनसे नहीं। वे तुम्हारी कल्पना शक्ति के चाकर हैं--दो और तीन मिथ्या हैं--वह एक तो काल के बंधन से मुक्त है।
प्र०--क्या विवाहित मनुष्य आत्मानुभव की प्राप्ति
का हौसला कर सकता है?
एक सूचना के उत्तर में कि "इस प्रश्न का विचार न किया जाय और इसके बदले में राम के आगे हुए विषय का अनुसरण किया जाय" राम कहता है हर एक विषय राम का है। इसका यदि पूर्ण विवेचन किया जायगा तो आपका बड़ा कल्याण होगा-किन्तु यह विस्मयजनक है, तुम्हें यह पूरा सुनना होगा। इस देश के विचारों को शायद यह विचित्र जान पड़े। राम इसकी परवाह नहीं करता, वह केवल तुम्हारा आदर करता है।
इस प्रश्न के उत्तर में वेदान्त कहता है, "अवश्य ही, औषधि बीमार को दी जाती है, और उसको नहीं कि जो अच्छा भला है"।
जो दुनिया और उसके धनों में सब से अधिक फंसे हैं, उन्हीं को इसकी सब से अधिक ज़रूरत है। एक अविवा- हित मनुष्य के लिये आत्मानुभव उतना सहज नहीं है जितना कि विवाहित और पारिवारिक जीवन को यथार्थ रीति पर निर्वाहकारी मनुष्य के लिये। किन्तु असावधान ढंग से वह अनुभव नहीं कर सकता और उलटा नीचे घसीटा जाता है। पुरुष और स्त्री के सच्चे संबंध के ज्ञान की बेखबरी बड़ी दुर्भावत का कारण होती है। इतने महत्वपूर्ण और हृदय के नज़दीकी विषय का निवारण क्यों न किया जाय! इस प्रश्न का एक पहलू ( विवाह की तैयारी ) इस समय नहीं उठाया जायगा! यह एक बड़ा विषय है और बाद के किसी व्याख्यान में इन पर विचार किया जायगा।
राम के विवाह के बाद उसने और उसकी स्त्री ने दो साल ब्रह्मचर्य पालन किया। यह तथ्य है, केवल ज़बानी
जमाखर्च नहीं।
विवाह हानिकारक नहीं है, केवल वह कमज़ोरी ( हानिकर ) है जो उसमें काबू जमा लेने पाती है; वह वस्तुतः हानिकर है; भय, पदार्थों और रूप में लगन, "मैं देह हूँ, मेरा साथी देह है," इस कल्पना की पुष्टि करना, अधि- कार जमाने की लालसा और उस का भाव ग्रहण करना पतनकारी तत्व हैं। यदि वैवाहिक संबंधों के पालन का यही ढंग हो, तो मनुष्य कभी आत्मानुभव नहीं कर सकता।
पिनैलोपी (Penelope) जब बीनती और उधेड़ डालती है, तो उसका काम कभी कैसे समाप्त हो सकता है? वह मनुष्य भला कैसे उन्नति कर सकना है जो सदा उस सब का निराकरण कर देता है कि जो उसने प्राप्त किया था? वेदान्त निर्भयता से कहता है कि तुममें शक्ति का संचार होना चाहिये, तुम्हें उच्चतर प्रेम से परिपूर्ण होना चाहिये, जिसे भूठ ही में प्रेम कहा जाता है, उसकी तुच्छता और नीचता से ऊपर उठना चाहिये--देहाध्यास से ऊपर उठो। यह है बीनने की क्रिया। जब तुम पति या पत्नी में केवल देह देखते हो, तब सब किया धरा चौपट होजाता है। कैसे तुम उन्नति कर सकते हो? क्या इससे यह निकलता है कि लोगों को विवाह नहीं करना चाहिये? नहीं, किन्तु विवाह का उपयोग भिन्न होना चाहिये। वेदान्त के उपदेश को समझो। विवाह को अपने उत्कर्ष का एक साधन बनाओ, तब वह बड़ा सहायक होजाता है। ठोकर लगाने वाला ढेला जीने का व्यापार अपने का पत्थर बन जाता है। जब विवाह काम-विकार की गुलामी बन जाता है, तब तुम्हारी हर बार की तुष्टि में गुलामी बढ़ती है, और तुम
अधिकाधिक नीचे ही डूबते जाते हो।
धर्म-प्रवर्तकों (Prophets) के वचन नारी के विरुद्ध हैं। वे कहते हैं कि नारी "नरक का द्वार है।" राम सहमत नहीं है। सड़क पर चलता हुआ एक मनुष्य (शराब की एक बोतल उसकी जेब से बाहर निकली हुई है) एक पुजारी से मिलता है, जेल की राह पूछता है, उसका परिदर्शन करना चाहता है, जैसा कि राम ने पिछले सप्ताह किया था। पुजारी के हाथ में एक छड़ी है और उससे उसने बोतल छुई। कहा कि "भाई, यह सबसे नज़दीक का रास्ता है. यह तुम्हें अवश्य वहां पहुँचा देगा।" इस प्रकार नारी के सम्बन्ध में कहा जाता है। दुनिया एक जेल है-आधुनिक विवाह अवश्य तुम्हें वहां पहुंचाता है। यदि नर और नारी एक दूसरे के पतन का कारण हैं, तो उसी परमेश्वर ने जिसने इंजील लिखी है मनुष्यों के हृदयों में नारी को ढूँढ़ने की ऐसी इंजील क्यों लिखी! यह तो वचनविरोध है। इस ग्रन्थि में एक गूढ़ अर्थ है। वह अज्ञान है जो इसे नरक का उपाय बनाता है। केवल उसी को दोष देना चाहिये. न कि विवाह के सम्बन्ध को। प्रश्न यह है कि उसे ( अज्ञान को ) दूर कैसे किया जाय। यह एक शून्य विन्दु है। यदि शून्य दशम- लव विन्दु (decimal point) की दाहिनी ओर रक्खा जाता है, तो उसका मूल्य घट जाता है। शून्य खुद कोई मूल्य नहीं रखता, अपने सम्बन्ध और स्थिति से ही वह मूल्यवान बनता है। इसी तरह इस मामले में आप की स्थिति सम्बन्ध का मूल्य स्थिर करती है, अपने आप से नहीं, सिर्फ आप के अपने ढंग से।
मनुष्यको अपनी स्त्री में सुख क्यों मिलता है? इसका
अनुसन्धान होना चाहिये, अन्यथा कठिनता हल नहीं होसकती। यही सुख मनुष्यों को गुलाम बनाता है। ट्रोजन रण (Trojan war) इसका दृष्टान्त है। यह है जो एक लड़की को वीर बना देता है और दूसरी को नहीं। यह कहना गलत है कि यह सुख स्वयं नारी से आता है। हमें इसमें की भूल को समझ लेना चाहिये। उस में या उसके शरीर में कोई सुख नहीं है।
यदि सर्व सुख प्रियवस्तु ( वा प्रेम पात्र ) में न केन्द्रित हो, तो क्या स्त्री और पुरुष सदा एक दूसरे के लिये सुख का स्रोत बने रहते? हम जानते हैं कि यह सत्य नहीं है। जब आप अपना सुख भोग चुकते हो, तो उसके बाद आप किस दशा में होते हो? और सुख की चेतना फिर नहीं रहती। जब तुम नपुंसक होते हो, तब क्या वह (नारी सुख का स्रोत होती है? जब तुम्हारी अर्धांगी रोगी होती है,जब वह व्यभिचारिणी होती है, जब तुम बीमार होते हो, तब उसमें कोई सुख नहीं रहता। यहां तुम दो पृथक सत्ताएँ पाते हो--द्वैत। जब ये अनुपस्थिति होती हैं तो केवल शरीर ही की पूर्ण एकता नहीं होती किन्तु मन और आत्मा की भी होती है। फिर एक ऐसी अवस्था आती है जिसका वर्णन नहीं हो सकता। तब देह देह नहीं है, संसार संसार नहीं है, एकता, स्वर्ग, स्वाधीनता, अभयता- क्योंकि द्वैत नहीं है--अभिन्नता, अद्वैतता विराजती है। दुनिया और देह के विनाश का बिलकुल नाश हो गया ! द्वैत-भ्रम का सब अस्तित्व नहीं रहा। न मैं देह हूं और न वह (नारी) देह है; हम दोनों शरीर,मन, दुनिया से ऊपर हैं। वैकुण्ठ फिर प्राप्त होगया, लक्ष्य पर पहुंच होगई, अब कोई
दशा या अवस्था नहीं! वेदान्त कहता है कि तुम तथ अपनी सच्ची आत्मा के लिये शक्ति और परमानन्द होते हो, तो तुम सचमुच ही उसने पूरा मंडल (नरक) बना लिया है--धन और ऋण की एकता होगई है, पूरी घूमी हुए बिजली-बत्ती की सी रोशनी हो रही है। बिजली का घेरा पूरा हो गया है, सुए एकत्र होगये हैं-और असली या असली हालत फिर होगई है! आनन्द, निर्भीकता, उत्पादक शक्ति, साक्षात् ईश्वर-अर्थात् असली यथार्थ आत्मा, और तब हम कह सकते हैं, "यह मनुष्य ईश्वर का पुत्र है।" जब पति और पत्नी मूलतत्व में लीन होगये हैं, सब उसमें गल जाते हैं, तब सारी दुनिया विलीन हो जाती है, मानो आत्मा से खा ली जाती है, सब जातियां, वर्ण, और सम्प्रदाय चावल के तुल्य होते हैं, जिसमें मृत्यु मसाला डालने के समान (चटनी) होती है, आत्मा उसे खा लेता है, क्योंकि आत्मा उत्पादक शक्ति है।
दूसरी ओर हम देखते हैं कि, वेदान्त के अनुसार अज्ञानी पुरुष, न जानना हुआ, बाहरी रूप, मिथ्या पदार्थों के प्रेम में फंस जाना है, आत्मा का अनादर कराता है और केवल बाहरी चिन्हों का विचार किया जाता है।
एक मनुष्य जंगल में एक किताब ज़मीन पर पड़ी देखता है। बिजली चमकती है। वह मूर्खता से समझता है कि बिजली का कारण पुस्तक हुई है, अन्यथा किसी तरह नहीं मानना. ये दोनों चीज़ें उसने एक साथ देखीं और समझना है कि एक दूसरी की कारण है। सो मनुष्य को एकता में आनन्द की प्राप्ति होनी है, जिसका कारण वास्तव में नर या नारी नहीं है, किन्तु परमेश्वर की वास्तविकता है, पर
अपने मन में वह उस आनन्द को एक मानवीय पदार्थ का संसर्ग मानता है।
आप इस तथ्य का क्या उपयोग कर सकते हैं? आप को उसी क्षण अनुभव करना चाहिये कि जब मन पदार्थ और विषयभोग से हटा लिया जाता है और केवल आनन्द का विचार करता है जो एक शक्तिरूप, तेज स्वरूप, सच्चा आत्मा है, तब अधम मन में उतरने की कोई ज़रूरत नहीं है, जो गायब हो जाता है,--यह दैवी तत्व वही है जो सूर्य, चन्द्रमा, शक्ति, अनन्त, देश काल वस्तु से परे, एक सागर है, जिसमें सब पदार्थ लहरों, तरंगों, भँवरों के तुल्य हैं,-- असली, आधारभूत, मूल तत्व के रूप हैं। तुम्हारे शरीर इन तरंगों और लहरों के समान हैं, भेदभाव का एक मात्र कारण जल है। एक बच्चा नदी को ओर देखता हुआ कहना है, "भाई! देखो, यह एक लहर आ रही है"। यहां जल पहले ही से है, किन्तु प्रधानता उतपार को दी गई है। "मैं तुम्हें एक लहर दिखाऊंगा, न कि एक नदी। ठीक वही बात यहां भी है, एक निर्भय परमेश्वर है! सूर्य, चन्द्र, शरीर, और तरंगें "मैं तू" रूपी मानस सागर में उमड़ती हैं। इस तरह मनुष्य अनेकता लाता है. नाम रूपी दृश्य में पथराता है, शरीरों का संघर्ष होता है, तरंगें एक दूसरे से टकरानी हैं। सुख केवल पदार्थ के संघर्ष के द्वारा नहीं होना, वह तो आत्मा की उपस्थिति है, जो लहरों के दर्शन पर स्पष्ट होती है वेदान्ती बच्चे को सिखाना चाहना है कि सोना क्या है, उस एक अंगूठा दिखा कर कहता है, "यह सुवर्ण है।" बच्चा कहना है "क्या गोलाई सोना है?" नहीं। 'क्या रंग, सोना है?" नहीं। "चिकनाई?" नहीं, नहीं!
एक भावना दी कैसे जा सकती है ? सोने की दूसरी वस्तु भी दिखाई जाती है । अन्ततः वह भावना वा कल्पना निकाल ली गई । वह इसका अनुभव करता है । उनके गुणों को यथार्थ रूप से पहचानो और उन्हें जीवन में वर्तो ।
वीरवल ने बादशाह से पूछा कि अन्धों की संख्या अधिक है या दृष्टि वालों की । बहस हुई और निश्चय हुआ कि इसे साबित किया जाय । बादशाह समझता था कि अन्धे कम हैं । इस लिये प्रमाण के लिये वह एक टुकड़ा कपड़े का लाया, और अपने सिर में लपेट कर उसने पूछा " यह क्या है ! " उत्तर मिला, " पगड़ी । " तब उसने कपड़े को अपने कन्धों पर रखा और लोगों से पूछा, "यह क्या है ?" उत्तर मिला । " शाल ", तीसरी बार उसने कपड़े को धोती की तरह पहरा, और उन्हों ने इसे उसी नाम से पुकारा । " सब अन्धे, अन्धे ! इन ( उक्त नामों ) में से यह कुछ भी नहीं है, केवल कपड़ा है, नामों और रूपों से कपड़ा छिपा दिया गया है ।"
अनुभव करो कि आत्मा क्या है, सोने को देखने के लिये यह ज़रूरत नहीं है कि आप उसे तोड़ें । जब आप नर, नारी, भँवरों, लहरों कपड़े और सोने का विचार करते हैं, तब आप पीछे की (आधारभूत) वास्तविकता का नहीं विचार करते ।
मत कहो कि विवाह धर्म के विरुद्ध है । देखो कि सुख की वास्तविक दशा क्या है, वास्तविक स्वरूप क्या है । आत्मानुभव के अभिलाषी मनुष्य की हैसियत से, सच्चे आनन्द, वास्तविकता, मूल तत्वों पर विचार करो । जब मनुष्य, पगड़ी, शाल रूपी पहचान की चेतना तुममें न रह जाय, तब ध्यान परायण हो कर बन्धन के कारण को निर्मूल कर दो,
वास्तविकता में डूब जाओ ।
ॐ—वह मैं हूँ—इसे सिद्ध करो, "क्या वह मेरी असली प्रकृति है ? क्या मैं वह हूँ ? " यदि मैं हूँ, तो दुनिया केवल एक तरंग है, मैं क्यों उसके पीछे ललचाऊं ! क्यों ! क्योंकि देदीप्यमान सूर्य में कोई बिजली की रोशनी चमकती नहीं है । वह केवल अंधेरे ही में चमकती और प्रकाश देती है । धीरे धीरे उज्ज्वल सूर्य-प्रकाश में आओ, इन्द्रियों का सुख दीपक की तरह कोई प्रभा नहीं फैलाता । गाली देना और निन्दा करना अस्वाभाविक है । तुम इसे तभी कुचल सकते हो जब इस से ऊपर उठो । भाई ! उपाय का उपयोग करो और उठो ।
दुनिया खुद एक अचंभा है । दूसरे अचम्भों की कोई ज़रूरत नहीं है । सब पापों के कारण से डरो जो केवल आत्मा को जानने से दूर होता है । विशुद्धता का अनुभव करो और विशुद्ध हो जाओ । दूसरे किसी धर्म की शिक्षा देना अस्वाभाविक है ।
"Do come or do not come, You are in me. Stay near, or stay far, wherever you be; In me you are, in me you move, Nay me is thee, Dissolve in me, and be the blissful sea. Giver and not seeker— Partake of my nature and be happy."
" आओ वा न आओ, तुम मुझ में हो । दूर रहो, या निकट रहो, जहां कहीं तुम हो,
मुझ में तुम हो, मुझ में तुम्हारी गति है । नहीं, मैं तू हूँ, मुझ में घुल जाओ, और आनन्दमय सागर हो जाओ । दाता हूँ और मांगने वाला नहीं हूँ । मेरी प्रकृति को भोगो और सुखी हो । "
भारत में तर्क संगत, वैज्ञानिक, और स्वाभाविक विधि यह प्रचलित है कि स्त्री सहायता करती है, पति की बाधक नहीं होती ।
आत्मानुभव कर चुकने के बाद दो साल और राम गृहस्थ रहा । अपनी स्त्री से उसने वेदान्त की चर्चा की, और वह फूल, बतियां लाती, और निज-आत्मा में लीन हो जाती थी । वह अब दंडवत प्रणाम करके उपासना करती है, फिर राम को ओर तब तक देखती है जब तक उस (राम) की देह उसके लिये एक (परमात्मा का) चिन्ह नहीं हो जाती, ॐ उच्चारती है, राम में आत्मा के दर्शन करती है और अपने आप में परमेश्वर को देखती है, इन विचारों को बाहर भेजती है, प्रत्येक आदमी में परमेश्वर को देखता है, परस्पर एक दूसरे की सहायता करते हैं, और आत्मानुभव प्राप्त करते हैं । राम ने उसे उठाने में सहायता दी । यह कुछ समय तक होता रहा, फिर उन्होंने महीनों साथ बिताये, अश्रम विचारों का कोई ख़याल उन्हें नहीं आया, काम-विकार जीत लिया गया था । परस्पर एक दूसरे को यथार्थ समझते थे, दोनों मुक्त थे । पति और पत्नी का विचार जाता रहा था, कोई बंधन नहीं था । वह उसे अपना पति नहीं समझती है और न वह उसे अपनी स्त्री समझता है ।
विचारों की संकीर्णता, और अभिरुचियों के कारण पारि-
वारिक क्लेश होते हैं । तभी स्वार्थों की मुठभेड़ होती है, और विवाह वाली रुकावटें तब उत्पन्न होती हैं । वेदान्त को समझो और मुक्त हो । और नाम मात्र ग्रन्थियों के अतिरिक्त, और कोई ग्रन्थि नहीं है । हरेक स्वाधीन होने के लिये है । अपने बच्चों को पूर्णतया स्वाधीन होने दो । उस से मनुष्य कभी नहीं बिगड़ता । संपूर्ण संसार एक स्वर्ग है, और परमेश्वर को कभी धोखा नहीं दिया जा सकेगा ।