आत्मानुभव के संकेत नं0 3.
आप देखते हैं कि जीवन की मांगें (ज़रूरतें) और आप की अपनी शारीरिक तथा मानसिक ताकतों पर विभिन्न दावे पेश हैं कि आप पर सदा दबाव और खिंचाव डाल रहे हैं। यदि इन बाहरी परिस्थितियों से आप सदा अपने को दबाव और तनाव में रहने देते हैं, तो अपने ही हाथों और अपनी ही नसों से आप अपनी अकाल मृत्यु की व्यवस्था कर देते हैं।
इस से कैसे बचा जाय और कैसे कुछ आराम मिले ? राम काम को टालने या नित्य के कामों को त्यागने की सिफारिश नहीं करता है। राम ऐसी सलाह कदापि नहीं देता है। फिर भी वह एक बहुत ही सुन्दर आदत-जो आदत आप को सदा भारी और कठिन कार्यों से बचाये रहेगी—डालने की सलाह आप को देता है। यह सलाह वेदान्तिक त्याग से कुछ भी कम नहीं है। आप ने अपने आप को सदा त्याग की शिला पर रखना है, और उस श्रेष्ठ स्थान पर खड़े हो कर जो कार्य आप के सामने आ पड़े उस में दिलो जान से जुट जाना है। तुम थकोगे नहीं, तुम में काम सम्हालने की शक्ति होगी।
और स्पष्ट करने के लिये—काम करते समय बीच बीच में थोड़ा आराम लो, और एक या दो मिनट क आराम के उन छोटे अन्तरों को इस विचार में लगाओ कि देह कुछ भी नहीं है, तुम्हारा कभी इस से कोई सरोकार नहीं था।
तुम एक साक्षी मात्र हो, शरीर के कामों के नतीजों या परिणामों से तुम्हें तनिक भी वास्ता नहीं। इस प्रकार विचार करते समय तुम अपने नेत्र बन्द कर लो, नसें ढीली कर दो, शरीर को पूरा आराम में रक्खो, और सारी चिन्ता का बोझ उतार दो। चिन्ता का बोझ अपने कंधे से उतारने में आप जितना अधिक सफल होंगे, उतना अधिक बलवान आप अपने को अनुभव करेंगे।
धमनियां (nerves) देह में प्राणशक्ति को रखने वाली हैं, और धमनियों का ही व्यूह विचार शक्ति का भी पोषक है। पाचन क्रिया, खून का दौर, बालों की बाढ़ इत्यादि अन्त में शिराव्यूह (nervous system) के ही कार्य पर निर्भर हैं। यदि आप की विचार शक्ति उद्विग्न है और आप सब तरह के विचारों से हैरान और जल्दी में हैं, तो इस का अर्थ आप की नाड़ियों पर बहुत अधिक बोझ है। नाड़ियों का यह चेष्टाशील विचार रूपी प्रयत्न के आकार में काम, जो एक ओर में लाभ है, तो दूसरी ओर से निश्चित हानि है। इस तरह पर देह के प्राणभूत कार्यों को हानि पहुँचती है। यह एक ही घोड़े पर दो भारी बोझों के रख देने के समान है। एक बोझ बढ़ाओ तो तुम्हें दूसरा घटाना चाहिये। घोड़े का बोझ उतार लो, तब बोझों के भार को बिना किसी तरह की हानि पहुँचाये घोड़ा दौड़ सकता है। यदि आप अपनी प्राणशक्ति को क़ायम रखना चाहते हैं, यदि आप अपने स्वास्थ्य को क़ायम रखना चाहते हैं, यदि आप चाहते हैं कि नाड़ी-चक्र का घोड़ा शरीर के भार को आसानी से सहन करे, तो आप को चिन्ता का बोझ हलका करना होगा। घबड़ाहट भरे विचारों और हैरानी भरी कल्पनाओं को अपने जीवन के रस
को न रहने दो। पूर्ण स्वास्थ्य और प्रबल क्रियाशीलता का रहस्य इस में है कि आप अपने मन को और प्रसन्न रक्खें, सदा परेशानी और जल्दबाज़ी से परे, और सदैव किसी भी प्रकार के भय और विचार या चिन्ता से रहित रक्खें।
इस प्रकार वेदान्तिक त्याग का अर्थ सम्पूर्ण चिन्ता, भय, खेद, व्यग्रता, और मन के क्लेश को, सदा अपनी दृष्टि के सामने अपने वास्तविक आत्मा की परमेश्वरता रख कर, दूर करना और फेंक देना है, सब सांसारिक चिंताओं, परेशानियों और कर्तव्यों से वरी होना है। तुम्हें कोई कर्तव्य नहीं पालने हैं, तुम किसी में बंधे नहीं हो, तुम किसी के भी प्रति उत्तर दाता नहीं हो। तुम्हें कोई ऋण नहीं चुकाना है, तुम किसी के भी बंधन में नहीं हो, सब समाज और सब राष्ट्रों तथा हरेक वस्तु के विरुद्ध अपने व्यक्तित्व (स्वरूप) का निरूपण करो। यह है वेदान्तिक त्याग। समाज, रीति और मर्यादा, नियम, विधान, खंडन-मंडन, और आलोचनाएं तुम्हारे वास्तविक स्वरूप को कदापि नहीं छू सकतीं। यह समझो, इसे (देह भावना को) अलग कर दो, इसे त्याग दो, यह तुम नहीं हो। ॐ का यह अर्थ करो, और थकावट के सब अवसरों पर ॐ को उच्चारो।