श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

पुनर्जन्म और पारिवारिक बन्धन।

भाग 26 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 26 · अध्याय 3 / 10

पुनर्जन्म और पारिवारिक बन्धन।

27 दिसम्बर 1902 को एकेडेमी आफ साइंसेज में दिया गया (व्याख्यान)।

महिलाओं और भद्रपुरुषों के रूप में स्वयं मैं—

भारतवर्ष में एक बड़ा धनी व्यापारी एक बार अपने नगर के निवासियों को एक बड़ा भोज देने वाला था। प्रायः बड़े भोजों में रंडियों का एक गोल नाचने गाने के लिये बुलाया जाता है। यह चाल अब भारतवर्ष में छोड़ी जा रही है। किन्तु राम जिस समय की चर्चा कर रहा है तब इसका बड़ा रिवाज था।

एक रंडी ने नाचना गाना शुरू किया। उसने बहुत ही फूहड़ (अश्लील) गीत गाया। किसी को भी रुचने के लायक नहीं था। तथापि उस विशेष अवसर पर गीत सारी महफ़िल के दिल में गड़ गया। किस कारण से ? आप जानते हैं कि भारतवर्ष में शिक्षित पुरुष और सज्जन युवक ऐसे खराब और भद्दे गीतों को कभी नहीं पसन्द करते हैं, किन्तु उस अवसर पर गीत ने महफ़िल में मौजूद लोगों के दिलों में ऐसा घर किया कि वे मोहित हो गये। उस अवसर के महीनों बाद, अधिकांश पंडित जन, जिन्हों ने वह गीत सुना था, एक बार सड़क पर जाते हुए धीरे धीरे वह गीत गुन- गुनाते हुए देखे गये। और वे सब के सब, जिन्हों ने एक बार सुना था, उस गीत को पसन्द करते और ध्यान में रखते थे।

प्रश्न यह है कि मोहने वाली कौन सी वस्तु थी ? जिन लोगों ने गीत सुना था उन में से किसी से भी पूछो कि वह

कौन सी बात है जिस के कारण गीत तुम को इतना प्यारा हो गया है ? वे सबके सब कहेंगे कि गीत बड़ा सुन्दर है, बड़ा सरल है, बहुत ही श्रेष्ठ बनाने वाला है, अति उन्नायक है। किन्तु वह ( वास्तव में ) ऐसा नहीं है। यही गीत उस रंडी से सुनने के पहले उनके लिये अत्यन्त घृणित था, किन्तु अब वे इसे पसन्द करते हैं। यह एक भूल है। असली जादू गाने के तर्ज़ और स्वर में, चेहरे में, चितवन में, वेश्या की सूरत में था। असली आकर्षण औरत में था, और वह असली मोहनी गीत में बदल दी गई थी।

यही दुनिया में होता है। एक शिक्षक आता है जिसका मुख बड़ा सुन्दर है और नेत्र बड़े रसीले हैं। उसका स्वर अति स्पष्ट है और वह अपने को इधर और उधर घोल दे सकता है। वह जो कुछ कहता है सो सुन्दर और चित्ता- कर्षक है। उसका कथन मनोहर है। दुनिया यह गलती करती है। कोई केवल सत्य की जाँच नहीं करता। गीत के सम्बन्ध में कोई कुछ भी नहीं सोचता। मज़लिस या जमाव के लिये बातों को उपस्थित करने के तरीके, या अभिनय करने वा बोलने का ढंग, वर्णनप्रणाली, बाहरी चांज़ों की मनोहरता, ये सब शिक्षा वा उपदेश को अधिक चित्ताकर्षक बनाते हैं।

उस दिन एक बड़े सज्जन मित्र, एक बड़े आदरणीय श्रोता एक स्वामी अर्थात् स्वामी विवेकानन्द के सम्बन्ध में 'राम' से बातें कर रहे थे। प्रश्न किया गया, "क्या उन की नाक और नेत्र सुन्दर नहीं थे ?" तुम व्याख्यानों पर ध्यान देते हो या नाक आँखों को देखते हो ?

दुनिया का यही तरीका है। अधिकांश वक्ताओं के

बोलने के ढँग में, वर्णनप्रणाली में, उन की आवाज़ में चित्ता- कर्षण वा जादू है, और वह जादू उन की वक्तृता में आरोपित किया जाता है।

स्वयं चीज़ों या बातों को तौलो। वक्ता की देह की अपेक्षा वास्तविक वक्ता पर अधिक ध्यान दो। ये शब्द कटु और विकट मालूम पड़ते हैं, किन्तु 'राम' पुरुषों या शरीरों का आदर करने वाला नहीं है। 'राम' तुम्हारा आदर करता है, अर्थात् तुम जो सत्य हो उस का। सत्य तुम्हारा वास्तविक स्वरूप है, और इस अर्थ में 'राम' तुम्हारा आदर करता है। आप चाहे बोलने के ढँग को नापसन्द करें, आप चाहे वर्णन शैली को नापसन्द करें, 'राम' महिलाओं,सज्जनों के रूप में अपने आप से कहता है, 'राम' आप से कहता है कि यदि आप सच्चा सुख चाहते हैं, यदि आप सच्ची शान्ति चाहते हैं, तो आप को 'राम' की वक्तृताओं पर ध्यान देना चाहिये, आप को उस के ये व्याख्यान सुनना चाहिये। वे तुम्हें सुख देने वाले हैं। उन को तौलो। उन पर विचार करो, जो शब्द तुम सुनो उन का चिन्तन करो। जब आप घर जाँय, तब उन्हें याद करने और उन पर अमल करने की कोशिश कीजिये।

'राम' वेदान्तिक धर्म पर व्याख्यान देना चाहता था। किन्तु यहां तो अनेक सवाल हैं। ये प्रश्न उत्तर देने के लिये 'राम' को भेजे गये हैं। यदि 'राम' से कोई भी प्रश्न न किये जाँय, तो भी 'राम' विषय पर बोलता हुआ एक के बाद एक प्रमेय (proposition सिद्धान्त) पर विचार करेगा। सब प्रश्नों का उत्तर यथा समय दिया जायगा, किन्तु कुछ ( लोग ) अपने प्रश्नों का उत्तर पहले चाहते हैं। आज हम

इन सब प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकते। एक दिन में एक प्रश्न हम ले सकते हैं, और वही प्रश्न उस दिन के प्रवचन या व्याख्यान के विषय का भी काम दे सकता है। यह प्रश्न पहला था, अतः हम इसे उठाते हैं।

इसे प्रारम्भ करने से पूर्व इंजील, कुरान, वेदों, और गीता के सम्बन्ध में कुछ शब्द कहे जा सकते हैं। लोग इन पुस्तकों को लेते हैं और इन पर आँख मूँद कर विश्वास करते हैं, क्योंकि वे ऐसे मनुष्य की कलम से निकली हुई हैं, जिन्हें वे पसन्द करते हैं। हज़रत ईसा का चरित्र उत्कृष्ट था, प्रभाव सुन्दर था। और जो वृत्त ईसा के इतिहास ( गास्पेल-Gospel ) में दिये हुए हैं, वे उन ( ईसा) के मुख से निकले हुए बताये जाते हैं, इस लिये हमें उन्हें ज़रूर मानना ही उचित है। कृष्ण महाराज बड़े अच्छे थे और उन का चरित्र उत्कृष्ट था, और चूंकि गीता उन के मुख से निकली है, अतएव समग्र और पूर्ण रूप से हमें उसे ज़रूर मानना ही चाहिये। बुद्ध देव बहुत अच्छे थे, और अमुक अमुक पुस्तक उन से निकली हुई है, या कम से कम उन से निकली हुई बताई गई है, अतएव उस में पूरा विश्वास हमें अवश्य करना ही उचित है, तथा हमें अपना विचार करना अब रोक देना चाहिये। हमें चिन्तन छोड़ देना चाहिये, हमें उस सत्य को इस लिये स्वीकार कर लेना चाहिये कि वह उन ( महापुरुषों ) से प्राप्त होता है। क्या यह वही चूक नहीं है, क्या यह वही भूल नहीं है जो कुछ मिनट पहले उक्त वेश्या के दर्शकों और श्रोताओं ने की थी ! वही गलती है। उन का उपदेश एक चीज़ है और उन का चरित्र तथा उन के जीवन का सौंदर्य दूसरी चीज़ है। प्रायः

ऐसा होता है कि एक मनुष्य अपने समय का सर्वोत्कृष्ट मनुष्य था, किन्तु उस की शिक्षा अपूर्ण थी। दुनिया की सारी दलबन्दी या साम्प्रदायिकता का आधार यही भूल है। दुनिया के सब धार्मिक झगड़े और संग्राम इसी भूल का परिणाम हैं। आप जानते हैं कि ओलिवर गोल्डस्मिथ ( Oliver Goldsmith ) ऐसा मनुष्य था जिस के सम्बन्ध में डाक्टर जॉहन्सन ( Dr. Johnson ) ने कहा था कि उस का लिखना देवदूत ( फ़रिश्तों ) का सा था, और वह एक एम. डी. ( डाक्टरी ) की सब से बड़ी परीक्षा उत्तीर्ण भी था। यह ओलिवर गोल्डस्मिथ भोजन और बातचीत करते समय बहुत ठीक रहता था, किन्तु अपने भोजन और बातचीत के प्रकार का वर्णन करते समय वह कहा करता था कि भोजन या बातचीत करते समय मैं नीचे का जबड़ा ( jaw ) कभी नहीं चलाता हूँ। हमेशा ऊपर का जबड़ा चलता है, और नीचे का कदापि नहीं। इस विषय पर डाक्टर जॉहन्सन से उस का बहुत शास्त्रार्थ हुआ था। वह अपने भ्रान्त कथन का बड़े आग्रह से निरूपण किया करता था। आज कल प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि जब हम बात- चीत करते या खाते हैं, तब सदा नीचे का जबड़ा चलता है और ऊपर वाला कभी नहीं। जब हम सारा सिर घुमाते हैं तब बेशक ऊपरी चोंह (जबड़ा) चलती है। तथापि उस का पक्ष था कि नीचे की चोंह कदापि नहीं किन्तु ऊपर की चोंह चलती है।

जहां तक व्यावहारिक जीवन का सम्बन्ध है। वह बिल- कुल ठीक है, किन्तु स्वयं अपना अनुभव, अपना निजी कार्य, स्वयं अपना जीवन मनुष्य नहीं बयान कर सकता।

आप जानते हैं कि (किसी काम का) करना एक बात है और हमारे काम करने की विधि का विज्ञान जानना दूसरी बात है। हरेक व्यक्ति अंग्रेज़ी बोलता है, किन्तु अंग्रेज़ी व्या- करण थोड़े ही लोग जानते हैं। हरेक व्यक्ति किसी न किसी तरह बहस करता है किन्तु तर्कशास्त्र थोड़े ही लोग जानते हैं या थोड़े ही लोगों ने आनुमानिक या आनुपत्तिक तर्क- शास्त्र ( Deductive or Inductive Logic ) पढ़ा है। इसी तरह, आदर्श जीवन व्यतीत करना एक बात है और उस के तत्वज्ञान कहने की योग्यता, उस की युक्तियां देने की योग्यता, दूसरी चीज़ है। लोग यह भूल करते हैं। वे आचार्यों के शरीर या व्यक्तिगत आचरण को उन के उपदेशों में बदल देते हैं और आचार्यों के ग़ुलाम बन जाते हैं। 'राम' कहता है, सावधान; सावधान!

हज़रत ईसा के पास बहुत थोड़ी किताबें थीं। तथापि बड़े बड़े शास्त्री और महामहोपाध्याय गोस्पल (धर्म- ग्रन्थ) में जो कुछ लिखा है उस व्याख्या के लिये अपने दिमाग़ को खाली किया करते हैं। हज़रत मोहम्मद ने उत्तम बातें कही हैं। उन्हें सारी प्रेरणा और सूचना कहां से मिली? उन्हें प्रत्यक्ष उस भंडार से प्राप्त हुई जो तुम्हारे अन्दर भी है।

महर्षि मनु के पास बहुत थोड़ी पुस्तकें थीं, किन्तु उन्हों ने हिन्दुओं को क़ानून पर एक सुन्दर ग्रन्थ प्रदान किया। मिस्टर होमर के पास बहुत थोड़ी पुस्तकें थीं, तथापि उस ने जो महाकाव्य इलियड एंड ओडीसी ( Iliad and Odyssey ) आप को दिया उस का सब भाषाओं में उलथा हो रहा है। अरस्तू (Aristotle) न तो

एम. ए. था और न धर्माचार्य था, तथापि एम. ए. पास लोगों को उस की पुस्तकें पढ़ना पड़ती हैं।

क्राइस्ट और कृष्ण को ईश्वर-प्रेरणा ( inspiration ) कहां से मिली? अन्दर से। यदि ये लोग अन्दर से ज्ञान प्राप्त कर सके, तो क्या आप ऐसा नहीं कर सकते? अवश्य आप कर सकते हैं। वह मुख्य सोता, वह भंडार, वह चश्मा, जिस से उन्हें प्रेरणा (ईश्वर प्रबोध) मिली, तुम्हारे अन्दर भी है, ठीक वहीं है। यदि यह बात है, तो उस जल के लिये क्षुधा और पिपासा क्यों जो हज़ारहा वर्षों से इस दुनिया में पड़ा रहा है और जो अब वासी हो गया है। तुम सीधे अपने अन्दर जा सकते हो और छक के अमृत पी सकते हो। स्रोते तुम्हारे अन्दर हैं।

'राम' कहता है, "भाइयो और मेरे आत्म स्वरूपो! वे लोग उन दिनों में जीवित थे, तुम आज ज़िन्दा हो, हज़ारों साल के सुरक्षित मुर्दे न बनो। जीतों को मृतकों के हाथ में न सौंपो। देवी वंशलोचन (divine manna) कल्याणमय सुधा (blessed nectar) तुम्हारे अन्दर है। प्राचीनों की पुस्तकें जब उठाओ, तब उन्हें इस विश्वास से न उठाओ कि उन (पुस्तकों) में दिये हुए प्रत्येक शब्द के हाथ तुम्हें अपने आप को बेच देना चाहिये। अपने आप सोचो, स्वयं चिन्तन करो। जब तक तुम उन बातों का अनुभव नहीं करोगे, जब तक तुम स्वयं उन बातों को अमल में नहीं लाओगे, जब तक अपने ही जीवन से तुम उन के सत्यासत्य की जांच नहीं करोगे, तब तक तुम क्राइस्ट का अभिप्राय नहीं समझ सकोगे, तब तक तुम नहीं जान सकोगे कि वेदों का क्या अर्थ है, या गीता का क्या

अर्थ है, अथवा ईसाई धर्मग्रंथ (गास्पेल्स) का क्या प्रयोजन है। जैसी कि कहावत प्रचलित है, कि मजनूं को समझने के लिये एक मजनूं ही की ज़रूरत है। क्राइस्ट को समझने के लिये तुम्हें क्राइस्ट होना पड़ेगा। कृष्ण को जानने के लिये तुम्हें भी एक कृष्ण बनना पड़ेगा और बुद्ध को समझने के लिये तुम्हें बुद्ध होना पड़ेगा। "होना" का क्या अर्थ है? बुद्ध होने के लिये क्या तुम्हें भारतवर्ष में पैदा होना चाहिये? नहीं, नहीं। क्राइस्ट होने के लिये क्या तुम्हें जूदिया (Judea) में पैदा होना होगा? नहीं। मोहम्मद होने के लिये क्या तुम्हारा अरब में पैदा होना ज़रूरी है? नहीं। बुद्ध कैसे बना जा सकता है, ईसा कैसे बन जा सकता है, मोहम्मद कैसे बना जा सकता है? यह छोटी कहानी इसका स्पष्टीकरण करेगी।

एक मनुष्य एक प्रेम-काव्य, एक सुन्दर काव्य, जिस में लैली और मजनूं के प्रेम का उपाख्यान था, पढ़ता था। उस काव्य का नायक मजनूं उसको इतना भाया कि उसने मजनूं बनने का प्रयत्न किया। मजनूं बनने के लिये उसने एक चित्र लिया, जिस चित्र के सम्बन्ध में किसी ने उससे कह दिया कि यह उसी काव्य की नायिका (लैली) का चित्र है, कि जो वह पढ़ता रहा है। उसने वह चित्र लिया, उसे गले से लगाया, उसके लिये आँसू गिराये, उसे अपने हृदय पर रक्खा, और कभी उसे छोड़ता नहीं था किन्तु आप जानते हैं कि कृत्रिम प्रेम बहुत दिनों नहीं टिक सकता। यह बनावटी प्रेम है। स्वाभाविक प्रेम की नक़ल नहीं की जा सकती, और वह प्रेम का स्वांग करने की चेष्टा कर रहा था।

एक आदमी उसके पास आया और उससे पूछा, "भाई!

तुम क्या कर रहे हो? मजनूं होने का यह उपाय नहीं है। अगर तुम मजनूं होना चाहते हो तो तुम्हें उसकी प्रेयसी को लेने की ज़रूरत नहीं है, तुम में मजनूं का असली आन्तरिक प्रेम होना चाहिये। प्रेम के उसी पात्र (पदार्थ) की तुम्हें ज़रूरत नहीं हैं, तुम्हें आवश्यकता है उतने ही तीव्रतम प्रेम की। तुम्हारा अपना (स्वतंत्र) प्रेमपात्र हो सकता है, तुम अपनी नायिका आप चुन सकते हो. तुम आप अपनी प्यारी चुन सकते हो, किन्तु तुम में भावना और प्रेम की वही अतिशयता होनी चाहिये जो मजनूं में थी। सच्चा मजनूं बनने का यह उपाय है।"

इसी तरह 'राम' तुमसे कहता है, यदि तुम ईसा, बुद्ध, मोहम्मद, या कृष्ण बनना चाहते हो, तो तुम्हें उन कामों की नक़ल करने की आवश्यकता नहीं है जो उन्होंने किये थे; उनके आचरण के प्रकार का दास होने की तुम्हें ज़रूरत नहीं है। यह ज़रूरत नहीं है कि तुम अपनी स्वतंत्रता उनके कृत्यों और कथनों के हाथ बेच डालो, तुम्हें उनका चरित्र उपलब्ध करना होगा, तुम्हें उनकी भावनाओं की अतिशयता प्राप्त करना होगी, तुम्हें उनके अनुभव की गहराई प्राप्त करना होगी, तुम्हें उनकी गम्भीर प्रकृति, उनकी सच्ची शक्ति प्राप्त करना होगी। यदि तुम अपने जीवन में वही शील प्रकट करो, तो अब तुम्हारे सामने तुम्हारे आसपास और इर्दगिर्द जो चीज़ें हैं वे ज़रूर बदल जायंगी। क्राइस्ट का, यदि आज जन्म होता तो वह क्या करता? क्या वह फिर अपने को सूली पर चढ़ाता? नहीं। तुम ईसा बन कर भी जीते रह सकते हो। क्राइस्ट ने अपने विश्वासों के लिये अपनी देह को सूली पर लटकवाया, और शोपेनहार ने अपने विश्वासों के लिये अपनी

देह को जीता रखा। और कभी कभी अपने विश्वासों के लिये जीना अपने विश्वासों के लिये मर जाने से अधिक कठिन है।

सो इस प्रस्तावना का संकलन इस कथन से होता है, "हरेक वस्तु का विचार उसके गुण दोषों से करो, आचार्य के व्यक्तित्व को, आचार्य के जीवन को, उसके उपदेशों में बाधक न होने दो। उपदेश और जीवन को हमें पृथक पृथक समझना चाहिये।"

यह पहला प्रश्न है; "यदि पुनर्जन्म सत्य है तो क्या यह पारिवारिक बन्धनों का टूटना नहीं है?" और प्रश्न का दूसरा भाग यह है, "जो इस जीवन में एक साथ गुथे हुप हैं क्या वे प्रेत संसार (वा परलोक) में न मिलेंगे?"

यह एक सुन्दर प्रश्न है। हम इस के हिस्सों पर क्रम से विचार करेंगे। "यदि पुनर्जन्म सत्य है, तो क्या यह पारिवारिक बन्धनों का टूटना नहीं है?"

राम केवल इतना जानना चाहता है कि क्या इस संसार में कोई पारिवारिक बन्धन हैं? क्या आप के कोई पारिवा- रिक बन्धन हैं? एक मनुष्य के एक लड़का है, जो अपने बाप के साथ तभी तक रहता है जब तक नाबालिग़ है। बच्चा सयाना होता है, अच्छी आमदनी का पद पाता है, और अपने बाप से फट कर अलग रहना शुरू करता है। लड़का जो तनख्वाह पाता है उस से बाप क्यों लाभ उठावे? तुरन्त बन्धन चट से तोड़ दिया जाता है। लड़के का अपना निज का एक कुटुम्ब है। हो सकता है कि पुत्र भारत, जर्मनी, या किसी दूसरे देश को चला जाता है, पिता किसी दूसरे देश को लम्बा होता है। पारिवारिक बन्धन कहां है?

हां, पारिवारिक बन्धन है, किन्तु केवल नाम का। मैं जॉन एस. (John S) हूँ, मेरा पिता जार्ज एस. (George S) था। नाम, केवल नाम। नाम में क्या है? आओ देखें कि क्या कोई बन्धन है?

एक मनुष्य यहां पैदा हुआ है और एक लड़की कहीं अन्यत्र पैदा हुई है। एक अमेरिकन है, दूसरा जर्मन है। उन का विवाह होता है। कन्या का पारिवारिक बन्धन किसी जगह था, लड़के का पारिवारिक बन्धन किसी दूसरी जगह था, और उन में विवाह हुआ। अरे, पुराने बन्धन कहां चले गये? अब एक नई गांठ लग गई, और फिर एक ऐसा समय आता है जब उन का विवाह बन्धन टूट जाता है। दोनों फिर अलग २ ब्याह करते हैं। बन्धन कहां हैं? क्या तुम उन को स्थिर, अचल रख सके? एक लड़का और उस की बहन एक ही माता-पिता से पैदा हुए हैं, और उसी घर में अपना बचपन बिताते हैं। वे साथ बन्धे हुए हैं। उन में एक पारिवारिक ग्रन्थि है। लड़का चला जाता है और अपने नाते वहां जोड़ लेता है। बहन फ्रांस चली जाती है और वह फ्रांसीसी नारी बन जाती है। बन्धन कहां हैं? अब सवाल होता है, "यदि पुनर्जन्म सत्य है, तो क्या यह पारिवारिक बन्धनों की टूट- फाटी नहीं है?" पारिवारिक बन्धनों का इस संसार में अस्तित्व ही नहीं है। वह (पुनर्जन्म) तोड़ेगा क्या? यह पारिवारिक बन्धनों का तोड़ना नहीं है, क्योंकि पारिवारिक ग्रन्थियां कहीं नहीं हैं।

किन्तु यदि हम मान लें कि वस्तुतः पारिवारिक ग्रन्थियों का अस्तित्व है और हम उन्हें इस जीवन में कुछ समय

तक बनाये रख सकते हैं, तो पुनर्जन्म उन्हें मना नहीं करता है। मान लीजिये कि आप कहते हैं कि मेरे इतने बच्चे हैं। उन में से एक मर जाता है। तुम पारिवारिक बन्धनों को क़ायम रखना चाहते हो, किन्तु एक छिन जाता है। इस दुनिया में भी सम्बन्ध टूट जाता है। किन्तु कुछ लोग सम- झते हैं कि जो धागे टूट जाते हैं वे वैकुंठ में जुड़ जाँयगे। यदि वे किसी दूसरे लोक में जुड़ सकते हैं, और यदि आप चाहते हैं कि वे फिर बन जांय और ये बन्धन जुड़ जाना चाहिये, तो कोई ज़रूरत नहीं है कि एक काल्पनिक वैकुंठ के अस्तित्व को आप मान लें, जिस का उल्लेख किसी भूगोल पुस्तक में नहीं है और जिस का पता कोई पदार्थ- विज्ञान नहीं बताता। यदि आप चाहते हैं कि आप का लगाव आप के मित्रों से अधिकतर काल तक बना रहे, तो पुनर्जन्म के क़ानून के अनुसार यह मृत्यु के बाद नहीं चल सकता। उस (पुनर्जन्म के नियम) के अनुसार वह (लगाव) नहीं जारी रह सकता, क्योंकि मनुष्य अपने भाग्य का आप स्वामी है। आप अपने व्यक्तिगत बन्धन और व्यक्तिगत नाते तथा रिश्ते खुद बनाते हैं। मरते समय यदि आप का किसी पर गहरा प्रेम है तो अपने दूसरे जन्म में आप उसी व्यक्ति को किसी दूसरे शरीर में उत्पन्न हुआ और अपने से सम्बद्ध पावेंगे। यदि अपने वर्तमान जन्म में आप उस पुरुष को नहीं देखना चाहते हैं और आप उस से कोई सरोकार नहीं रखना चाहते, तो पुनर्जन्म के क़ानून के अनुसार आप के दूसरे जन्म में आप का उस का कोई वास्ता न होगा। पुनर्जन्म का क़ानून यह नहीं कहता कि मित्र और शत्रु भी, जिन लोगों के संसर्ग में आप नहीं आना चाहते, और जिन लोगों को बड़ी उत्सुकता से आप अपने

साथ रखना चाहते हैं, मृत्यु के बाद वे बलात आप के साथ कर दिये जाँयगे। वेदान्त यह नहीं कहता कि जिनकी उपस्थिति आप के लिये घृणास्पद है, जिन की मौजूदगी आप के अत्यन्त विकट है, वे ज़बरिया आप के सम्बन्धी बनाये जाँयगे। यदि किसी नारी का अपने पति से विवाह बन्धन टूट गया है और वह उसे फिर नहीं देखना चाहती, तो कर्म के क़ानून के अनुसार वह पति उस को फिर कभी नहीं परेशान करेगा। जिन को वह देखना चाहती है, जिन से वह सम्बन्ध रखना चाहती है, उन्हीं को वह दूसरे जन्म में जानेगी।

इस विषय के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां हैं। एक के बाद एक उन सब को उठाया जायगा। यूरोप और अमेरिका में व्यापक तौर पर स्वर्ग के सम्बन्ध में लोगों की जो भ्रान्त धारणा है उस पर हम विचार करते हैं। क्या हम उसे ईसाई स्वर्ग (Christian heaven) कहें? नहीं। हम उसे पादड़ी स्वर्ग (Churchian heaven) कहेंगे। स्वर्ग की कल्पना में क्या वचन-विरोध का पुट (contradiction in terms) नहीं है? स्वर्ग शब्द से वे एक ऐसा स्थान समझते हैं जहाँ वे सब के सब एक साथ रहेंगे। 'राम' आप से चाहता है कि कृपया आप तनिक सोचें, सत्य के लिये आप तनिक विचार करें। जहां आप परिच्छिन्न (limited) हैं, क्या वहां पूर्ण आनन्द हो सकता है? परिच्छेद में क्या कोई भी सुख हो सकता है? असम्भव, असम्भव। यदि आप के स्वर्ग में आप के प्रतियोगी होंगे,-वे सब जो अतीत में मर चुके हैं, और जो भविष्य में मरेंगे, और वे सब जो आज भारत वर्ष में, आस्ट्रेलिया में अमेरिका में, अथवा कहीं और मर रहे

हैं,—तो आप को क्या उस से सुख मिलेगा? आप जानते हैं कि सिकन्दर सेलकर्क (Alexander selkirk) कहता था।

"I am monarch of all I survey, My right there is none to dispute"

"जहां तक मेरी दृष्टि जाती है उस का सम्राट मैं हूँ, मेरे अधिकार का प्रतिवादी कोई नहीं है।"

जब आप एक गाड़ी में बैठते हैं, तब आप सारी गाड़ी केवल अपने ही लिये होने की इच्छा करते हैं। यदि दूसरे लोग भीतर आ जाते हैं, तो आप उद्विग्न पाते हैं। जब आप अपने कमरे में बैठे होते हैं और कोई आप से मिलने को आता है, तब आप नौकर से कहलवा देते हैं, कि आप घर पर नहीं हैं।

तुम्हारे एक घर और जायदाद है, और एक दूसरे आदमी का भी वैसा ही घर और सम्पत्ति है, और गास्पेल तथा वेदों के सारे उपदेशों का अनादर करते हुए तुम्हारी इच्छा है कि तुम्हारे पास उस आदमी से अधिक दौलत होती। तुम चाहते हो कि तुम्हारा दुसरिहा (Rival, शरीक) न होकर वह तुम्हारा मातहत होता। क्या यह तथ्य नहीं है कि कुछ ईसाई, असली ईसाई नहीं, किन्तु ग़लती से ईसाई कहे जाने वाले, यदि उनके साथ एक ही जहाज़ पर एक बौद्ध, मुसलमान या हिन्दू यात्री होता है तो, उसकी उपस्थिति से वे घृणा करते हैं? "राम" यह अपने अनुभव से कहता है। वे उसकी उपस्थिति से घृणा करते हैं। इस (उसकी उपस्थिति) से उनका सुख नष्ट हो जाता है। और यदि स्वर्ग में तुम्हें अपने इर्दगिर्द सब

प्रकार के लोग देखना पड़ेंगे, ऐसे लोग जो क्राइस्ट और बुद्ध के समान तुमसे कहीं श्रेष्ठ हैं, तथा तुम से आगे बढ़े हुए वहां और लोग हैं, तो क्या तुम सुखी हो सकोगे? क्या उससे तुम सुखी रह सकोगे? तनिक इस पर विचार करो, एक क्षण भर इस पर विचारो।

जहां कहीं भेद है, वहां सुख नहीं हो सकता। असम्भव असम्भव। वह कौन सी बात है जो तुम्हारी को नष्ट कर देती है? वह है दूसरों का दिखाई पड़ना। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक होना चाहता है। हरेक व्यक्ति अद्वितीय, बिना दुसरिहा का होना चाहता है। तुम्हें उस प्रकार के स्वर्ग में कोई सुख नहीं होसकता जो तुमने ग़लती से समझ रक्खा है कि इंजील ने तुम्हारे लिये प्रदान किया है।

इंजील की हम किस प्रकार टीका कर सकते हैं जिस से कि उसमें रत्ती भर युक्ति प्रतीत हो? इंजील में हम पाते हैं, "हम स्वर्ग में मिलते हैं।" हम सब के सब स्वर्ग में मिलते हैं। स्वर्ग में अपने मित्रों से हम मिलते हैं। इसका क्या अर्थ है? वस्तुतः इसका क्या अभिप्राय है? इसका ठीक ठीक अर्थ करो, इसे समझो। क्या तुम नहीं जानते कि उसी इंजील में जिसमें लिखा है कि हम सब स्वर्ग में मिलते हैं यह भी लिखा हुआ है, "स्वर्ग का साम्राज्य तुम्हारे अन्दर है।" परमेश्वर का राज्य, सच्चा स्वर्ग तुम्हारे 'अन्दर' है, तुमसे 'बाहर' नहीं है। अपने से बाहर स्वर्ग की कल्पना न करो। आकाश में या नक्षत्रों के बीच में उसे न ढूँढ़ो। परमेश्वर पर तनिक करुणा करो। यदि वह परमेश्वर मेघों पर रहता है तो विचारे ग़रीब को सर्दी हो जायगी। स्वर्ग तुम्हारे अन्दर है। परमेश्वर तुम्हारे अन्दर है।

तनिक देखो।

अपने को आनन्दमय ईश्वरीय ज्ञान की अवस्था में लाओ, परमेश्वर से पूर्ण अभिन्नता की अवस्था में अपने को डाल दो, यों कहिये कि, निर्वाण की दशा में प्रवेश करो, उस ईश्वरीय कल्याणमय दशा को प्राप्त करो और फिर तुम स्वयं स्वर्ग हो, न कि केवल स्वर्ग में। वहां तुम सब दुनिया से एक हो, वहां तुम सब मुर्दों और सब जीवितों और इस पृथ्वी पर जिन लोगों के आविर्भाव होने की आशा है, उन सब से अभिन्न हो जाते हो। स्वर्ग तुम्हारे अन्दर है, और इस प्रकार से हम स्वर्ग में मिलते हैं। जीवन्मुक्त, इसी जीवन में मुक्त मनुष्य, सदा स्वर्ग में है, उसकी सब जीतों और सब मुर्दों से एकता है। भविष्य में इस दुनिया में जिन लोगों के आने की आशा है उन सब से उसकी एकता है। वह अनुभव करता और मानता है कि सब तारागण, सब ज्ञात प्राणी उसके अपने आत्मा हैं। वह अनुभव और भान (महसूस) करता है कि "मैं सच्चा परमेश्वर हूँ, सच्चा परम पुरुष हूँ, स्वयं तत्वस्वरूप हूँ, सारभूत हूँ, अव्यय परमेश्वर हूँ। मैं सर्व हूँ, और इस प्रकार 'सर्व' होने से मैं स्वर्ग में हूँ, और स्वर्ग में मैं हरेक व्यक्ति से मिलता हूँ"।

लोग इस दुनिया में अपनी लालसा की वस्तुओं के लिये ललचाते हैं, किन्तु उन्हें वे पाते नहीं। वह क्या बात है कि वे उनको नहीं पाते हैं, और कैसे वे उनको पा सकते हैं? प्रेम की चोट खाये हुए, विकारग्रस्त (विषयी) इच्छा के मारे लोगों के दिल टूट जाते हैं, तथा अपना समय और जीवन वे नष्ट कर देते हैं, एवं जीवन को तबाह

तक कर देते हैं। ऐसा क्यों है? क्योंकि ये स्वर्ग में नहीं मिलते, यही एक मात्र कारण है। यदि आप चाहते हैं कि आप के मित्र आप को मिलें, ऐ सांसारिक ऐश्वर्यों के भूखे दुनिया के लोगों! यदि आप चाहते हो कि संसार के वैभव आप को तलाश करें, ऐ जो अपने प्रेम पात्रों के लिये अपनी शक्तियों को नष्ट करने वाले हैं, यदि आप चाहते हैं कि उन (मित्रों) को आप के प्यार करने के बदले वे आप का सा उत्कट प्रेम आप से करें तो, ऐ उच्च पदों की इच्छा रखने वाले और अकृतकार्य लोगों! राम की शिक्षा का अनुसरण करो, क्योंकि यही असंदिग्ध सुबन्ध (same) है, यही एक मात्र ताली है जो सब इच्छित पदार्थों के तालों को खोल देती है। तुम्हें स्वर्ग में मिलना होगा और तुम्हें प्रबन्ध करना होगा कि हरेक वस्तु तुम्हें खोजे। स्वर्ग में मिलने का क्या अर्थ है? प्रेम-भिक्षा में, प्रेम पाने की आकांक्षा में, प्रेम की खोज में, "क्या तुम मुझ से प्रेम करते हो" ऐसे क्षुद्र और स्वामित्व के भाव में ईश्वरपन का लेश भी नहीं है। मैं तभी तुम्हारे निकट खिंचता हूँ और तुम्हारी बग़ल में अपने को पाता हूँ जब तुम एक वाक्य में, जो हम दोनों से बड़ा है, अपने को ढाल कर मुझे (परिच्छिन्नात्मको) छोड़ देते और खो देते हो। यदि तुम अपने नयन मुझ पर गाड़ कर प्रेम की भीख मांगते हो, तो मैं दूर हट जाता हूँ। यह नियम है, यह अनिवार्य, अविनाशी, निष्ठुर अटल क़ानून है। जिस क्षण तुम इच्छा से ऊपर उठते हो, उसी क्षण इच्छा की वस्तु तुम्हें खोजती है, और जिस क्षण तुम मांगने, चाहने, ढूँढ़ने, उत्कट ललचाने का ढंग ग्रहण करोगे उसी क्षण तुम दुत्कारे जाओगे। तब तुम्हें इच्छित वस्तु न मिलेगी, तुम्हें नहीं मिल सकती। (इच्छित) वस्तु से ऊपर उठो, उस से ऊपर खड़े

हो, और वह तुम्हें ढूँढ़ेगी। यही क़ानून है। यह कहा गया है, 'कि जो चीज़ तुम ढूँढो वह तुम्हें दी जायगी, जिसे खटखटाओ वह तुम्हारे लिये खुल जायगा।" इसे समझने में ग़लती की जाती है। "ढूँढ़ोगे तो तुम कभी न पाओगे, खटखटाओगे, तो तुम्हारे लिये कभी न खुलेगा"। क्या यह यथार्थ नहीं है कि जब एक भिक्षु आप के पास आता है तो उसे देख कर आप को घृणा होती है? क्या यह ठीक नहीं है कि ग़रीब लोग सड़कों पर नहीं चलने पाते हैं जब वे जेल भेजे जाते हैं? राम ने जेल देखी और अधिकांश क़ैदियों का एक मात्र अपराध ग़रीबी थी। लोग कहते हैं, "दीन-आलय (poor house) को जाओ, तुम्हारी मौजूदगी से हमारा तिरस्कार होता है।" क्या ऐसा नहीं है?

तुम परमेश्वर के पास जाना चाहते हो; और फ़क़ीरी वृत्ति से, मलिन वस्त्रों से परमेश्वर के पास जाओगे, तो क्या तुम घुसने पाओगे? नहीं। जब तुम किसी राजा के पास जाते हो, तब तुम्हें अपनी सर्वोत्तम पोशाक पहनना पड़ती है। जब तुम परमेश्वर के पास जाते हो, तब तुम्हें निष्कामता की पोशाक पहनना पड़ेगी। यदि तुम ईश्वर को देखना चाहते हो, स्वर्ग के साम्राज्य को पाना चाहते हो, तो तुम्हें बेचाहपन की पोशाक पहनना पड़ेगी। तुम्हें आवश्यकता से परे होना होगा, तुम्हें इच्छा से ऊपर उठना होगा।

"First seek the kingdom of Heaven and everything else will be added unto you." That is the Law."

"पहले स्वर्ग का साम्राज्य ढूँढो और फिर हरेक चीज़ तुम में आ मिलेगी। यह नियम है।"

कर्म का क़ानून कहता है "मनुष्य अपने भाग्य का आप ही स्वामी है। अपनी परिस्थिति और अपना अड़ोस पड़ोस हम आप बनाते हैं। हरेक बच्चा अपने बाप का बाप है। हरेक लड़की अपनी मां की मा है।" ये कथन उलटे जान पड़ते हैं, वे असंगत जान पड़ते हैं, किन्तु ये हैं पूर्ण सत्य, और सत्य के सिवाय और कुछ नहीं हैं।

कर्म के क़ानून के अनुसार, (राम कर्म के क़ानून में प्रवेश करने नहीं जा रहा है, किन्तु उस के केवल उस एक अंश में प्रवेश करेगा जिस का लगाव विचाराधीन विषय से है) जब तुम वस्तुओं की इच्छा करते हो, जब तक तुम उनके लिये उत्कट इच्छा और अत्यन्त लालसा करते रहते हो, वे तुम्हें नहीं दी जातीं। किन्तु अति लालसा और उत्कंठ इच्छा करने के एक ज़माने के बाद एक ऐसा समय आता है जब तुम उस इच्छा और अभिलाषा से, उस संकल्प से ऊब जाते हो, और अपना मुँह उधर से फेर लेते हो, तथा निराश और खिन्न हो जाते हो। तब वह (इच्छित वस्तु) तुम्हारे पास लाई जाती है। यह कर्म का क़ानून है।

आप जानते हैं कि किसी मनुष्य को उन्नति करने के लिये एक पैर अपना ऊपर उठाना और दूसरा नीचा करना होगा। इसी तरह कर्म के क़ानून का शासन चलने के लिये, आप की इच्छाओं की चरितार्थता और पूर्ति के लिये, उस समय का आना ज़रूरी है कि जब आप ऊपर उठते हों, इच्छा त्याग देते हों। और इस तरह इच्छा रखने तथा इच्छा त्याग देने से इच्छा की पूर्ति होती है। कर्म के क़ानून पर लिखने वाले साधारणतः प्रश्न के धन-पहलू (positive side) पर बड़ा ज़ोर देते हैं और ऋण-पहलू (negative

side ) की उपेक्षा करते हैं। 'राम' तुम से कहता है कि तुम्हारी सब इच्छाएँ ज़रूर पूर्ण होंगी, तुम्हारी सब अभि- लाषाएँ अवश्य सफल होंगी । हरेक वस्तु, जिस की तुम कामना करते हो, तुम्हारे सामने अवश्य लाई जायगी। किन्तु एक शर्त है। उस की प्राप्ति से पूर्व तुम्हारा ऐसी हालत में जाना ज़रूरी है कि जिस में तुम इच्छा त्याग दो। और जब तुम इच्छा त्याग दोगे, तभी वह पूरी होगी। 'राम' ख़याल करता है कि यह अंश सब की समझ में नहीं आया है। इस का कारण यह है कि उन्हों ने 'राम' के पिछले व्याख्यान नहीं सुने हैं, जो हरमेटिक ब्रादरहुड ( के स्थान ) में दिये गये थे। अच्छा, यदि तुम इसे इस समय नहीं सम- झते हो, तो यह फिर कभी उठाया जायगा।

एक बात और। अधिकांश लोग अपने बंधन और अपने नाते बनाये रखना चाहते हैं ताकि उनके लगाव स्थायी हों और जुड़ जांय। उच्चस्वर से घोषित करो, हर जगह कहो कि लौकिक संबन्धों, सांसारिक सम्पर्कों को क़ायम रखने और स्थायी बनाने की इच्छा पागलपन का विचार है। तुम नहीं कर सकते, नहीं कर सकते। यह आशा के विरुद्ध आशा करना है। त्यक्त आशा है। आप अपने सांसारिक संबंधों और लौकिक बन्धनों को स्थायी नहीं बना सकते। किसी भी सांसारिक वस्तु को तुम नित्य नहीं बना सकते। इस सत्य को अपने हृदयों में धंसने दो, अपने अन्तःकरणों में इसे गहरा घर करने दो कि लौकिक बन्धनों या सम्बन्धों को स्थायी बनाने की चेष्टा करना विक्षिप्त विचार है। राम इसे दोहराता है कि भाई ! तुम ऐसा नहीं कर सकते। इस संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है। इस संसार में कुछ

भी नित्य नहीं है। एक मात्र नित्य वस्तु तुम्हारे अन्दर का परमेश्वर है, वह परमेश्वर जो स्वयं तुम हो, वह तत्व जो कि तुम हो। यह देह स्थायी नहीं बनाई जा सकती। यह क्षुद्र शरीर नित्य स्थायी नहीं बनाया जा सकता। यदि तुम पांच अरब साल भी जीते रहो, तो भी मृत्यु आवेगी। सूर्य एक दिन मरता है, पृथिवी एक दिन मरती है, तारे मरते हैं, जिसका अर्थ परिवर्तन है। इन सब को बदलना पड़ता है, नित्य नहीं बनाये जा सकते, जैसे आप का शरीर हर क्षण बदल रहा है। सात साल के बाद यह बिलकुल नया हो जाता है वह एक बिलकुल नया शरीर हो जाता है।

इसी तरह तुम्हारे संबंध, तुम्हारे बंधन बदलते रहते हैं। वे नित्य नहीं बनाये जा सकते। यदि तुम्हारा उस ओर कुछ अनुराग है तो त्याग दो।

Rivers may flow uphill, winds may blow downward, Fire may emit cold rays, the sun may shed darkness, But this Law of the impermanence of worldly relations cannot be frustrated or foiled.

"नदियां चाहे उलट कर पहाड़ पर चढ़ें, पवन नीचे की ओर चाहे चले, अग्नि चाहे ठंढ़ी किरणें उगले, सूर्य चाहे अन्धकार फैलावे,

किन्तु सांसारिक रिश्तों की अनित्यता का यह क़ानून विफल या व्यर्थ नहीं किया जा सकता " । यदि तुम्हारा विचार

कुछ और है तो तुम गलती पर हो। ठीक नदी का सा हाल है। लकड़ी के लट्ठे जलतल पर तरते हुए आत हैं, एक लट्ठा एक ओर से आता है और दूसरा किसी दूसरी तरफ से। एक क्षण के लिये उनका मिलन होता है, एक पल भर उनका लगाव रहता है और फिर वे जुदा हो जाते हैं। एक तेज़ लहर आती और उनको अलग कर देती है। संभव है कि नदी में बहते हुए ये लट्ठे फिर मिलें, किन्तु फिर उनको किसी समय अलग होना पड़ेगा। ठीक ऐसे ही तुम्हारे जीवन में, नित्य प्रति के रोज़ के काम काज के जीवन में, पिता और माता, भाई और बहनें एक साथ रहते हैं, किन्तु हर चौबीसवें घंटे अलग हो जाते हैं। बहुत दफ़े वे पुनः चन्द मिनटों के लिये मिलते हैं, उसके बाद वे अपने २ पृथक कमरों या दफ्तरों में चले जाते हैं। तुम्हारे संबंधों और दूर के मित्रों का यही हाल बड़े पैमाने पर है। सदा सर्वदा तुम साथ नहीं रह सकते। यदि यह मामला है तो बच्चों का खेल क्यों करते हो ? जो सदा टिकता है, जो नित्य और शाश्वत है, उससे फिर अधिक सरोकार क्यों नहीं रखते ? चपल संबंधों की अपेक्षा जो नित्य है उसके लिये फिर अधिक चिन्ता क्यों नहीं करते ? नित्य स्थायी तत्व का अधिक विचार क्यों नहीं करते ? जिससे तुम पृथक नहीं हो सकते, उसे पाने और अनुभव करने का यत्न क्यों नहीं करते ? और स्थायी तत्व, वास्तविक नित्यता के बलिदान का यत्न क्यों करते हो ? शीघ्र सटकते हुए अस्थायी नातों के लिये उस (असली तत्व) की कुर्बानी क्यों करते हो ?

भारतवर्ष में एक नवविवाहित युवती थी। वह अपनी सास और अपनी ननदों या जेठानियों-देवरानियों के साथ

बैठी हुई मज़ेदार गपशप कर रही थी। इस नई दुलहिन का पति उपस्थित नहीं था। इस नई दुलही की जेठानियों या ननदों ने इस के पति के विरुद्ध कुछ वचन कहे। 'राम' मौजूद था। 'राम' ने इस दुलहिन के मुख से ये मधुर शब्द सुने। उसने कहा, "तुम्हारे लिये जिन्हें उन ( मेरे पति ) के साथ केवल कुछ दिन रहना है, मैं दूल्हे से, जिसके साथ मुझे अपनी सारी ज़िन्दगी बितानी है, बिगाड़ कर बच्चों का खेल न करूँगी।"

उस दुलहिन में जितनी बुद्धि थी, उतनी बुद्धि रक्खो। ये सब सांसारिक बन्धन सदा न टिकेंगे। तुम्हें अपना सारा जीवन सच्चे आत्मा के साथ बिताना है, वह नित्य है, तुम उससे संबंध नहीं तोड़ा सकते। इस चपल वर्तमान काल के लिये तुम्हें सच्चे आत्मा से नाता न तोड़ना चाहिये । तुम अपने आप को बेचते क्यों हो ? तुम वह जीवन क्यों निर्वाह करते हो जो तुम्हें क्षुद्र बनाता है ? अन्तर्गत परमेश्वर को आप क्यों नहीं अनुभव करते हैं, सच्चे आत्मा से आप क्यों अलग होते हैं ? बुद्धिमान हो !

बुद्ध भगवान् के पास एक आदमी गया, और उनसे उनके पिता के को चलने को कहा। आप जानते हैं वही बुद्ध भगवान् जो राजकुमार थे, एक समय भिक्षु थे। उन्हों ने सब त्याग दिया और भिक्षु हो गये। भिक्षु के वाने से वे दरबदर घूमते थे, किसी से कुछ मांगते नहीं थे। यदि कोई उनके कमंडल में, जिसे वे अपने हाथ में लिये रहते थे, कुछ डाल देता था तो अच्छा, अन्यथा वे शरीर के लिये, इस सांसारिक जीवन के लिये एक तिनका भर भी परवाह नहीं करते थे। वे अपने पिता के राज्य में गये

और भिक्षु के वस्त्रों में वहां वे सड़कों पर घूम रहे थे। उन्हें भिक्षु कहना गलती है। वह फ़क़ीरी नहीं है, वह शहंशाही है। वह कोई वस्तु नहीं ढूँढ़ता, वह कोई चीज़ नहीं मांगता। वह अगर नष्ट होजाय तो भी क्या ? उसे नष्ट होने दो; क्या परवाह है। भोजन या वस्त्र मांगने वह तुम्हारे पास नहीं आता।

उस भेष में वह सड़कों पर घूम रहा था। उसके पिता ने यह हाल सुना, वह उसके पास गया, और विलखता हुआ बोला, "बेटा ! प्यारे कुमार ! मैंने ऐसा कभी नहीं किया, तुम जो पोशाक पहने हो वह मैंने कभी नहीं पहनी। मेरे पिता अर्थात तुम्हारे बावा ने यह फ़क़ीरी पोशाक कभी नहीं धारण की, तुम्हारा परबाबा भिक्षु बन कर सड़कों पर कभी नहीं घूमा। हम लोग राजा रहे हैं, तुम राजघराने के हो, और तुम यह फ़क़ीरी बाना धारण करके आज सारे वंश को क्यों ज़लील और लज्जित कर रहे हो ? कृपया ऐसा न करो, दया करके यह न करो। मेरी आबरू रक्खो।"

बुद्ध भगवान् ने मुसकुराते हुए उत्तर दिया, उसने मुसकुराते हुए कहा, "महाराज ! महाराज ! मैं जिस वंश का हूँ उससे आगे मैं देखता हूँ, मैं अपने पूर्वजन्मों को देखता हूँ, और मैं देखता हूँ कि जिस वंश का मैं हूँ वह सदा भिक्षुओं का वंश रहा है। इसका दृष्टान्त इस तरह पर दिया जा सकता है।

यह एक सड़क है और वह दूसरी सड़क आती है। बुद्ध देव कहता है, "महाशय तुम अपने जन्मों से उस राह से आते हो, और मैं इस राह से चला आ रहा हूँ, और

इस जन्म में हम लोग चौराहे पर मिल गये हैं। अब मुझे अपनी राह जाना है और तुम्हें अपनी राह जाना है।"

बन्धन कहां हैं ? संबंध कहाँ हैं ? आप कहते हैं कि आप के अपने बच्चे हैं। आप "राम" को क्षमा करें, यदि वह ऐसी बातें कह दे कि जो इस देश की सभ्यता के द्वारा असभ्य समझी जाती हैं। आप कहते हैं कि ये बच्चे आपके हैं। आप कहते हैं कि यह मेरा पुत्र है, मेरे मांस का मांस, मेरे रक्त का रक्त, मेरी हड्डी की हड्डी है। अरे, यह मैं स्वयं हूँ, यह मेरा पुत्र है, ओह प्यारा छोटा बेटा ! नन्हा मधुर बच्चा ! और तुम उसे अपने कलेजे से चिपटाते हो, तुम उसे अपने पास रखते हो। किन्तु तनिक अपने तत्वज्ञान की परीक्षा तो करो। वह बच्चा तुम्हारा है और तुम चाहते हो कि यह गांठ सदास्थायी हो जाय। क्या आप कृपया सत्य के नाम पर उत्तर देंगे कि, यदि बच्चा आप का पुत्र है और आप की देह से बच्चा पैदा होने के कारण आप अपने इस सम्बन्ध को क़ायम रखना चाहते हैं, तो जुओं का क्या होगा ? क्या वे तुम्हारी देह से नहीं पैदा हुए हैं ? क्या वे तुम्हारे पसीने के बच्चे नहीं हैं ? क्या वे तुम्हारे खून के खून नहीं, क्या उन का सब खून तुम से नहीं लिया गया है ? क्या (उन का) समग्र जीवन तुम्हारा जीवन नहीं है ? तनिक जवाब दीजिये। एक तरह के बच्चे की हत्या करना, एक तरह के बच्चे को नष्ट करना और दूसरी तरह के बच्चे को चूमना चाटना तथा अपने सारे प्रेम की उस पर वर्षा करना कितना अन्याय है, कैसा युक्ति विरुद्ध है। अपने तर्क को तो देखो। "राम" का यह अभि- प्राय नहीं है कि आप को अपने बच्चों के प्रति निठुर हो

जाना चाहिये, कि आप उनकी ज़रूरतों की ओर ध्यान न दें। मैं यह बिलकुल नहीं चाहता। "राम" का उपदेश है कि आप को सम्पूर्ण संसार अपना आत्मा समझना चाहिये, और आप के अपने बच्चे भला इस भाव ) से वर्जित क्यों कर दिये जांय ? राम ( की बातों ) का अनर्थ न करना। 'राम' यह कहता है, कि "आपके पारिवारिक बन्धन आप की अपनी उन्नति को न रोकने पाये। अपने पारिवारिक सम्बन्धों को अपने मार्ग में बाधक न बनने दो। तुम्हारी अग्रसर गति को वे रोकने न पावें।"

जब इस शरीरने, अर्थात् तुम्हारे अपने आपने, जिसे तुम "राम" कहते हो, संन्यास ग्रहण किया था, पारिवारिक संबंध और सांसारिक पदवी का त्याग किया था, तब कुछ लोगों ने कहा था, "महाशय ! यह क्या बात है कि आपने अपनी स्त्री, बच्चे, नातेदारों, और विद्यार्थियों के हकों का ख़याल नहीं किया, जो आप से सहायता और उपकार की आशा रखते थे; आप ने उनके दावों का बिलकुल लिहाज़ क्यों नहीं किया ?" यह प्रश्न किया गया था "राम" कहता है, "आप का पड़ोसी कौन है ?" तनिक देखिये। जिस मनुष्य ने "राम" से यह सवाल किया था वह महाविद्यालय में उस (राम) का सह-अध्यापक था। राम ने उससे कहा। "आप एक अध्यापक हैं, आप कालेज में दर्शन-शास्त्र पढ़ाते हैं, अब क्या आप कह सकते हैं कि आप की स्त्री और बच्चों में भी उतनी ही विद्या है जितनी आप में ? क्या आप कह सकते हैं कि आप की चाची और दादी भी उतनी ही विद्वान हैं जितने आप हैं ? क्या आप के चचेरे भाइयों को भी इतना ही ज्ञान है ?" उसने कहा,

"नहीं, मैं अध्यापक हूं।" "राम" ने कहा, "यह क्या बात है कि आप विश्वविद्यालय में आते और पढ़ाते हैं, किन्तु आप अपने छोटे बच्चों, अपनी स्त्री, और अपने नौकरों को नहीं पढ़ाते ? आप अपनी दादी और अपने चचेरे भाइयों तथा अपनी चाची को क्यों नहीं पढ़ाते ? यह क्या बात है ?" उसने कहा कि वे मेरे पढ़ाने को समझ नहीं सकते। तब उसे निम्न लिखित बातें समझाई गईं।

देखो। ये तुम्हारे पड़ोसी नहीं हैं। ये नौकर, यह दादी, स्त्री, बच्चे, और तुम्हारे ये कुत्ते भी तुम्हारे पड़ोसी नहीं हैं। यद्यपि कुत्ता तुम्हारा निरन्तर संगी है, कभी तुम्हारा साथ नहीं छोड़ता, और अज्ञानी की दृष्टि में आपका सब से बड़ा साथी है, किन्तु आप जानते हैं कि कुत्ता, नौकर, और मूर्ख चाची तथा दादी आपके पड़ोसी नहीं हैं। आप कौन हैं ? आप शरीर नहीं हैं, आप शुद्ध आत्मा हैं, किन्तु यूरोपीय तत्वज्ञानी होने के कारण आप यह स्वी- कार नहीं करते। आप चित्त हैं, आप के पड़ोसी वे हैं जो सदा आप के साथ उसी उच्च रेखा में रहते हैं जहां आप का चित्त रहता है। सब विद्यार्थी, शास्त्री, विशारद, अपने पढ़ने के कमरों में उन्हीं पुस्तकों पर ध्यान लगाते हैं, उसी विषय का चिन्तन करते हैं, वही चीज़ पढ़ते हैं जो आप पढ़ते हैं। आप का चित्त उन्हीं विषयों में रमता है जिनमें उनका, और वे आप के पड़ोसी हैं। जब आप अपने पढ़ने के कमरे में होते हैं, लोग कहते हैं कि आप पठागार (reading room) में हैं। ईमान से कहूंगा कि आप उस समय कमरे में होते हो या कि अपने विचारों में होते हो। आप पढ़ने के कमरे में नहीं रहते हैं, यद्यपि कुत्ता आप की गोद

में बैठा होता है, यद्यपि आप के बच्चे कमरे में आते हैं, वे आप के लिये कुछ भी नहीं होते, आप तो वहां दार्शनिक लोक में होते हैं, और उस ऊँचाई पर आप के पड़ोसी वे विद्यार्थी होते हैं जो अपने अपने घरों में वही विषय पढ़ रहे हों। ये आप के पड़ोसी हैं, आप के अत्यन्त समीपी पड़ोसी हैं, और इस प्रकार से आप अपना सहायक हस्त अपनी चाची और दादी और कुत्ते और नौकरों की अपेक्षा, जो आप के पड़ोसी नहीं हैं, विद्यार्थियों तक अधिक पहुँचा सकते हैं। आपका पड़ोसी वह है जो आपकी वृत्ति के अधिक नगीच रहता है, जो उसी लोक में रहता है कि जिस (लोक) में आप रहते हैं। आपका पड़ोसी वह नहीं है जो उसी घर में रहता है; चूहे और मक्खियां उसी घर में रहती हैं, कुत्ते और बिल्लियां उसी घर में रहती हैं।

अध्यापक ! मुझे बताओ, यदि तुम्हारे हाथ की बात हो, तो तुम कहां पैदा होगे ? क्या आप उसी अपढ़ दादी या चाची के परिवार में पैदा होंगे ? नहीं, नहीं। आप उस कुटुम्ब में पैदा होंगे जहां के लोग आप के जैसे चित्त के हों, जहां के लोग ऐसे हों कि आस-पास और इर्द-गिर्द आप के स्वभावानुकूल हों। आप विभिन्न कुटुम्ब में उत्पन्न होंगे, इस लिये आप हर समय अपने पारिवारिक संबंध बदल रहे हैं। प्रेम का क्या अर्थ है ? प्रेम का केवल इतना ही अर्थ है कि आप की भावना वैसी ही है जैसी दूसरे की। और अधिक कुछ नहीं। आप एक मनुष्य पर प्रेम करते हैं; उसके स्वार्थ, उसके मज़े, उसकी तक़लीफ़ ठीक आप की ही सी हैं। वही पदार्थ आप को पीड़ा पहुँचाते हैं जिनसे उस को पीड़ा पहुँचती है, जो पदार्थ उसे सुखक

होते हैं, वही आप को भी सुख देते हैं, वही पदार्थ उसे हर्ष देते हैं जो आप को हर्ष देते हैं। यह प्रेम है। आप किसी मनुष्य को उसके लिये प्यार नहीं करते हैं, आप उसमें अपने आप को प्यार करते हैं, और कुछ नहीं। आप केवल अपने आप को प्यार कर सकते हैं। तीन मनुष्य हैं, क, ख और ग, अथवा, जैसा कि हम रासायनिक सूत्र के रूप में रख सकते हैं, क और ख में कुछ सामान्य बात है, और क तथा ग में भी कुछ सामान्य बात है, या क में और ग में ख से अधिक सामानता है, इस लिये क ख की अपेक्षा ग की ओर अधिक आकृष्ट होगा।

इस प्रकार आप के पारिवारिक बंधन टूटते और पुनः पुनः टूटते तथा फिर २ जुड़ते हैं। इस प्रकार से प्रेम का अर्थ केवल अपने आप का कुछ (अंश) किसी दूसरे मनुष्य में अनुभव करना वा पहचानना है। किसी मनुष्य को पूर्णतया और एक मात्र आप का प्रतिरूप होने दा, तो आप उसके लिये पूर्ण प्रेम स्वरूप हो जायँगे।

इससे हम दूसरे विषय पर पहुँचते हैं जिसे आज "राम" न उठावेगा। वह बड़े महत्व का विषय है। वह विषय निर्भीकता है। भय की सृष्टि कैसे होती है, भय का कारण क्या है ? यह दिखाया जायगा कि यही अनुराग, अपने बन्धनों और सम्बन्धों को हमेशा क़ायम रखने की यही इच्छा, सम्पूर्ण भय की जड़ है। लोग कहते हैं, न डरो, डरो मत। कितने अतार्किक व हैं ! मानो भय तुम्हारे वश में है और तुम पर सवार नहीं है। भय की एक दवा बताई जायगी, किन्तु "राम" उस विषय को छोड़ता है, और वह फिर कभी उठाया जायगा।

एक कविता, जो एक उपनिषद का भाषान्तर है, पढ़ी जायगी, और तब बस। "राम" चाहता है कि हिन्दुस्तान का कम से कम एक शब्द तो आप लोग सीखें। अनुवाद पूरा नहीं है, फिर भी उससे कुछ आशय निकल आयगा।

The untouched soul, greater than all the Worlds, (because the worlds by it exist), Smaller than subtle ties of things minutest, Last of ultimatest, Sits in the very heart of all that lives, Resting, it ranges every where ! Asleep It roams the world, unsleeping; How can one Behold divinest spirit, as it is Glad beyond joy existing outside life, Beholding it in bodies, bodiless, Amid impermanency permanent, Embracing all things, yet in the midst of all The mind enlightened casts its grief away.

Om ! Om !!

निर्लेप-आत्मा, सब लोकों से महान (क्योंकि लोक इस में टिके हैं), छोटी से छोटी चीज़ों की सूक्ष्म ग्रंथियों से भी सूक्ष्म, सब से अन्तिम से भी अन्तिम, प्राणियों के हृदय में बैठा है, आराम करता हुआ, वह सर्वत्र प्रबन्ध बांधता है, सोता हुआ वह संसार में घूमता है, अनिद्रित; कैसे कोई

परमेश्वरीय आत्मा को देख सकता है, क्योंकि वह जीवन से परे उपस्थित, हर्ष से भी अधिक प्रफुल्लित है। उसे शरीरों में देखते हुए वह अशरीरी, अनित्यता के मध्य में वह नित्य, सब वस्तुओं का आलिंगन करता हुआ, तथापि सब के मध्य में प्रबुद्ध मन हुआ वह अपने शोक को दूर फेंक देता है।