श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

मैं प्रकाश स्वरूप हूं।

भाग 26 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 26 · अध्याय 4 / 10

मैं प्रकाश स्वरूप हूं।

13 जनवरी 1904 को डेनवर, कौलोरेडो में दिया हुआ व्याख्यान।

शुद्धात्मा ( सत्यस्वरूप ) क्या है ? देह सत्यस्वरूप नहीं है, न चित्त ही असली अपना आप है, न यह प्राण ही वास्तविक आत्मा है। आप कैसे जानते हैं कि दुनिया है ? अपनी चेतना (Consciousness) के द्वारा। आप की चेतना को भी तीन प्रकार के परिवर्तनों या वृत्तियों के अधीन होना पड़ता है। एक जाग्रत चेतना है, एक स्वप्न शील चेतना है, और गाढ़ निद्रित चेतना भी है। आप की चेतना तापमापक (thermometer) या वायुभारमापक (barometer) यंत्र के समान है। वह ताप (temperature) या संसार की गुरुता ( pressure ) को मापती है।

जाग्रत दशा में चेतना सूचित करती है कि संसार ठोस है, कठोर है, अपने क़ानूनों और नियमों में ठसा हुआ है। स्वप्नावस्था में चेतना का निर्णय बिलकुल भिन्न है। किन्तु स्वप्न और निद्रा की अवस्थाएं भी ठीक उतनी ही प्रबल हैं जितनी कि जाग्रत दशा। फिर हम देखते हैं कि आप का निद्रागत अनुभव ठीक उतना ही समय लेता है जितना कि जाग्रत अनुभव। अपने जीवन में आप उतना ही सोते हैं जितना जागते हैं। एक बच्चा, माना, हर समय निद्रित ही है। यह अनुभव सारे संसार को होता है। गाढ़ निद्रा या स्वप्नावस्था की चेतना के निर्णय जाग्रत अवस्था की चेतना के निर्णय या ज्ञान का पूर्ण रूप से खंडन करते हैं।

अब वास्तविक (या सत्य) वह है जो कल्ह, आज,

और सदा वही ( एकसां ) है। सभी को सत्य की यह कसौटी मान्य है। जो क़ायम रहता है वह असली है। अधि- ष्ठान अर्थात् द्रष्टा के स्थिति-बिन्दु से यह चेतना तीन विभिन्न रूप ग्रहण करती है। जाग्रत दशा में यह चेतना देह से अपनी अभेदता स्थापित करती है, और जब आप "मैं" शब्द का व्यवहार करते हैं, तब आप को इस शरीर, इस चेतना का बोध होता है। स्वप्नशील अवस्था में वह बिलकुल दूसरी ही दशा धारण करती है। आप बदल जाते हैं। स्वप्नशील द्रष्टा वैसा ही नहीं है जैसा कि जाग्रत-द्रष्टा है। आप अपने स्वप्नों में अपने को निर्धन पाते हैं, यद्यपि आप धनी हैं। आप अपने को शत्रुओं से घिरा हुआ पाते हैं, आप का घर अग्नि से नष्ट हो जाता है, और आप विवश जीते बचते हैं। अपने स्वप्न में आपने चाहे कुछ पानी पिया हो किन्तु जागने पर आप अपने को प्यासा पाते हैं। स्वप्नशील द्रष्टा जाग्रत द्रष्टा से भिन्न है। इस तरह चेतना स्वप्न की अवस्था में एक रूप धारण करती है, और जाग्रत अवस्था में दूसरा, और गाढ़ निद्रा- वस्था में वह तीसरा रूप धारण करती है। आप की चेतना तब (गाढ़ निद्रा में) शून्यता से अपनी अभेदता स्थापित करती है। आप कहते हैं "मुझको बड़ी गहरी नींद आई, मैंने कोई स्वप्न भी नहीं देखा।" गाढ़ निद्रा की दशा में आप में कोई चीज़ है जो बराबर जागती रहती है, जो नहीं सोती वही आपका वास्तविक आत्मा (स्वरूप) है। वह विषयाश्रित चेतना से पृथक है, वह शुद्ध चेतना है। वह आप का स्वरूप (अपना आप) है।

एक मनुष्य आता और कहता है, "कल्ह रात को बारह

बजे मैं ब्राडवे स्ट्रीट पर था, और मैंने कुछ नहीं देखा। उस समय वहां एक भी व्यक्ति नहीं था।" हम उससे कहते हैं कि वह अपना बयान लिख दे कि उक्त सड़क पर अमुक समय पर एक भी व्यक्ति मौजूद नहीं था। वह मनुष्य कहता है कि यह बयान सत्य है, क्योंकि मैं प्रत्यक्षदर्शी गवाह हूँ। तब प्रश्न किया जाता है, "तुम कोई नहीं हो या कोई हो? यदि यह बयान तुम्हारे प्रमाण पर हम मानें, तो यह आत्मविरोधी है। यदि यह बयान सत्य है तो आप वहां मौजूद थे।"

जब कोई गाढ़तम निद्रा में है तब वह जागने पर कहा करता है कि मैंने कोई स्वप्न नहीं देखा। हम कहते हैं, भाई! तुम यह बयान तो करते हो कि वहां कुछ नहीं था, किन्तु इस बयान के सही होने के लिये तुम्हें आकर गवाही देना पड़ेगी। यदि आप वस्तुतः गैरहाज़िर थे तो यह गवाही आप कैसे देते हो? आप में कोई चीज़ ऐसी है जो उस गाढ़ निद्रा में भी जागती है। वह आप का वास्तविक स्वरूप (आत्मा) है, वह परम संकल्प (will) या परम चेतना है।

देखिये इससे सारे संसार का प्रसार कैसे होता है। नदियों को देखिये। उनकी तीन दशायें होती हैं, एक हिमानी नद (glacier) की, दूसरी छोटे चश्मों और नालों की। बर्फ पिघली और नदी बहुत ही कोमल शान्त और शिष्ट अवस्था में होती है। तीसरी दशा वह है जब नदी पहाड़ों को छोड़ कर मैदान में उतर आती है और बड़ी उत्पातिनी होती है तथा कीचड़ से भर जाती है। ये तीन दशायें हैं।

पहली दशा में पहाड़ों में, बरफ में, सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं दिखाई पड़ता था। दूसरी और तीसरी में वह (सूर्य का

प्रतिबिम्ब) दिखाई देता है। दूसरी दशा में नदी जहाज़ या नौका चलने के लायक नहीं थी। वह किसी व्यावहारिक काम की नहीं थी। किन्तु तथापि वह बड़ी सुन्दर थी। तीसरी दशा में वह नाव या जहाज़ चलने के लायक है और खेतों तथा घाटियों को भी उपजाऊ बनाती है। सो हम देखते हैं कि दो चीज़ें मौजूद थीं, एक सूर्य और दूसरी नदी।

एक तुम में सूर्यों का सूर्य है, जो गाढ़ निन्द्रावस्था में परमेश्वर है। वह सूर्यों का सूर्य जमी हुई बरफ पर चमकता है। वह सूर्यों का सूर्य, अचल, अव्यक्त, साक्षी है। जब वह सूर्य उस आप में की शून्यता पर कुछ समय तक चमकता रहता है, गाढ़ निन्द्रावस्था में कहिये, आप में सूर्यों का सूर्य अपने को चमकती, गरम करने वाली हालत में रखता है, और आप के कारण शरीरको पिघलाता है, तब उस शून्यता से स्वप्नशील दशा प्रवाहित होती है। यही इंजील कहती है, "परमेश्वर ने शून्य से संसार की सृष्टि की।" परमेश्वर था और वह, वह था जो पहली दशामें शून्य कहा जाता है। जिस तरह सूर्य बरफ से नदियां पैदा करता है, ठीक उसी तरह जब सूर्यों का सूर्य, तुम में का परमेश्वर देखने मात्र शून्य पर—जिसे हिन्दू माया कहता है—चमकता है, तब उसी दिन दृष्टा और पदार्थ बाहर वह निकलते हैं। द्रष्टा के अर्थ ज्ञाता है और पदार्थ वह है जो देखा वा जाना जाता है।

स्वप्नावस्था का अनुभव जाग्रतावस्था के अनुभव के लिये वैसा ही है जैसा नन्हा, छोटा नाला महान नदी के लिये है। लोग कहते हैं कि मनुष्य परमात्मा के रूप (मूर्ति) में बना है। गाढ़ निद्रा में आप में कोई अहंभाव नहीं है, किन्तु स्वप्न और जागरण की अवस्था में आप में अहंभाव

है। स्वप्न और जागने की दशाओं में तुम परमेश्वर का प्रतिविम्ब रखते हो। असली आत्मा परमेश्वर है, सूर्य है, न कि यह प्रतिविम्बित सूरत (मूर्ति)। स्वप्नों में आप सब प्रकार की चीज़ें देखते हैं। किसी वस्तु को (स्वप्न में) देखने के लिये, किस प्रकाश में आप को उसे देखना पड़ता है। वह चन्द्रमा का आकाश है या नक्षत्रों का प्रकाश है, या सूर्य है जो हमें स्वप्न में वस्तुओं को देखने की योग्यता देता है? किसी का भी नहीं। फिर वह कौन सा प्रकाश है जो स्वप्नों में सब प्रकार की वस्तुयें देखने के योग्य बनाता है? वह आप के अन्दर का प्रकाश है। वह वही प्रकाश है जो प्रत्येक पदार्थ को दृष्टिगोचर बनाता है। यह प्रकाश जो स्वप्नों में सब प्रकार की वस्तुओं को देखने की शक्ति आप को देता है केवल गाढ़ निद्रावस्था में स्वच्छन्द रूप से चमका था। स्वप्नों में वह पदार्थों को अवलोकनीय बनाता है। इस तरह पर गाढ़ निद्रावस्था में और स्वप्नावस्था में भी वह प्रकाश निरन्तर रहता है। स्वप्न में यदि आप चन्द्रमा देखते हैं, तो चन्द्र और साथ ही चन्द्रिका के भी अस्तित्व का कारण अन्दर का प्रकाश है।

आज यह सिद्ध किया गया है कि तुम प्रकाश स्वरूप हो, तुम प्रकाशों के प्रकाश हो। जैसे कि नदी के संबंध में जानते हो कि उसके मूल में भी वही सूर्य है जो मुहाने पर है, उसी तरह असली आत्मा तुम में गाढ़ निद्रा, स्वप्न और जागरण की दशाओं में वही है। तू वह है। अपने को उस अन्तर्गत आत्मा से अभेद कर दो, तब तुम बलिष्ठ और शक्ति से पूर्ण होते हो। यदि आप अपने आप की चंचल परिवर्तनशील वस्तुओं से अभेदता कायम करते हैं, तो यह उस

लुढ़कते हुए पत्थर के समान है कि जिसमें काई या लेवार नहीं जमती। सूर्य केवल एक ही नदी के उत्पत्ति स्थान, बीच और मुहाने पर वही नहीं है किन्तु दुनिया की सब नदियों में भी वही है।

तुममें जो प्रकाशों का प्रकाश है, वह दुनिया के सब लोगों की गाढ़ निद्रा, स्वप्नशील और जाग्रत दशाओं का वास्तविक आत्मा है। वह प्रकाश उन पदार्थों से भिन्न नहीं है जिन पर वह चमकता है। तुम वह प्रकाशों के प्रकाश हो। इस विचार (ख्याल) पर टिको कि तुम प्रकाशों के प्रकाश हो। वह मैं हूँ। मैं प्रकाशों का प्रकाश हूँ। प्रकाशो के प्रकाश से अपनी अभिन्नता कायम करो। वही आपका असली सत है। कोई डर नहीं, कोई खिड़कियां नहीं, कोई शोक नहीं, सर्वत्र वही है। प्रकाशों का प्रकाश, अविच्छिन्न, निर्विकार, कल्ह और आज तथा सदा एकरस। मैं प्रकाशों का प्रकाश हूँ। सारी दुनिया केवल लहरें, केवल तरंगें और चक्कर जान पड़ती है।

"क्षुद्रात्मा वा परिच्छिन्नात्मा" को जो पर्दा घेरे हुए है उसे हटाने में निम्न लिखित उपाय बहुत ही उपकारी पाया जायगा।

लोग कहते हैं 'सैर करते समय वातचीत के लिये एक मित्र होना चाहिये।' नीचे लिखे कारणों से यह भ्रमजनक वा असत्य है:—

प्रथम—जब हम अकेले चलते हैं, तब हमारी सांस स्वाभाविक, तालबद्ध, और स्वास्थ्यकर होती है। इस कारण से, कांट (kant) अपने जीवन के अन्तिम भाग में सदा अकेला सैर करता था ताकि सांस का ताल बराबर बना

रहे, और उसने अच्छी दीर्घ आयु पाई। जब हम अकेले चलते हैं, तब हम नथुनों से सांस ले सकते हैं, किन्तु जब हम बातें करते होते हैं, तब हमें अपने मुखों से सांस लेनी पड़ती है। नथुनों से सांस लेना सदा शक्तिवर्द्धक है और फेफड़ों को बलवान बनाता है। परमेश्वर ने मनुष्य के नथुनों में सांस भरी और मुख में नहीं। हम मुख से सांस बाहर चाहे निकालें किन्तु भीतर सांस सदा नथुनों से हमें खींचना चाहिये। जो हवा फेफड़ों में प्रवेश करती है वह नथुनों के बालों से छन कर जाती है।

द्वितीय—जब हम अकेले चलते होते हैं तब हमारी विचार करने की अति सुन्दर वृत्ति होती है और उत्कृष्ट विचार उस समय मानों हमें खोजते हैं। लार्ड क्लाइव को किसी तरह इस रहस्य का पता लग गया और भारतीय राजनीति के जब किसी अत्यन्त पेचीदा मसले पर उन्हें विचार करना होता था, तब वह टहलने लगता था। इस तरह टहलना बुद्धि के परिशीलन में बहुत ही उपकारी है। जब हम संगति में चलते हैं, अथवा ऐसे लोगों के साथ चलते हैं जो सदा अपने विचार बलात् हम पर लादते रहते हैं, तब हम मौलिक और उत्कृष्ट विचारों को अपने पास आने से रोक देते हैं जो अन्यथा हम पर अनश्य कृपा करते।

तृतीय—अलौकिक स्थिति-बिन्दु से। अकेले चलते समय चित्त विभाजक शक्तियों और प्रतिकूल (विपरात) तत्वों को खिटक देता है और उसे अपन केन्द्र तथा आत्मा की विश्व रूप कल्पना (भावना) का लाभ होता है, और स्वयं उसे भोगने का वह अवसर पाता है। सम्पूर्ण कायव्यूह (शरीर-यंत्र) में तेज वा बल का संचार हो जाता है।

यह आत्म-सूचना (बुद्धि) अपने आपको दो कि तुम आनन्द स्वरूप हो। मैं प्रकाशों का प्रकाश हूँ। अपनी उच्चतर शक्तियों का उत्कर्ष करने में इस विचार पर ज़ोर देना चाहिये। चांदनी में या प्रातःकाल चलने में अकथ लाभ हैं जिनका लगाव इसी से है। अस्त या उदय होते हुए सूर्य, की ओर (मुख करके) चलो, नदियों के तटों पर सैर करो जहां शीतल पवन के झकोरे आते हों वहां टहलो, तब तुम अपने को प्रकृति से एकतान पाओगे, विश्व से एकताल पाओगे।