श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

केन्द्र-च्युत न हो।

भाग 26 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 26 · अध्याय 5 / 10

केन्द्र-च्युत न हो।

9 जून 1903 को कैसिल स्प्रिंग्स में दिया गया व्याख्यान।

यहां के लोगों का ढँग यह है कि भोजन करते समय बातचीत करते रहते हैं, किन्तु भारत में दूसरी ही चाल है। वहां भोजन करते समय बातचीत नहीं की जाती। आप जानते हैं कि भोजन करते समय प्रत्येक व्यक्ति को वह (खाने की) क्रिया मानों धार्मिक भाव से करनी पड़ती है, उसे पवित्र कृत्य बनाना पड़ता है। आप के मुख में जाने वाले भोजन के हरेक ग्रास के साथ आप को इस विचार पर ध्यान देना होता है कि यह कौर (ग्रास) बाहरी सृष्टि का प्रतिनिधि है और इस प्रकार मैं सम्पूर्ण विश्व को अपने में सम्मिलित कर रहा हूँ। और वे खाते समय निरन्तर इस विचार को अपने चित्त में रखते हैं और ॐ जपते रहते हैं, मनसे अनुभव करते और समझते जाते हैं कि सम्पूर्ण संसार मुझमें सम्मिलित है। ॐ, ॐ, विश्व मुझमें है, दुनिया मेरी देह है। इस प्रकार, प्रत्येक ग्रास के साथ वे आध्यात्मिक बल प्राप्त करते हैं। आध्यात्मिक और शारीरिक भोजन साथ २ होता है। सारी दुनिया मैं हूँ, मेरा ही मांस और रुधिर है। भोजन सम्पूर्ण संसार का, जो मेरा अपना ही मांस और रक्त है, एक प्रतिनिधि है। सब एकता है। हिन्दुओं का इस से घनिष्ट परिचय होने के कारण, ये सब विचार उनके चित्तों और भावनाओं में एकत्रित हो जाते हैं, भावुक प्रकृति (emotional nature) और संघर्ष शक्ति (will power) की यहां तक पुष्टि होती है कि तुरन्त

आत्मानुभव होता है, और वही आहार क्रिया जो पाशविक क्रिया कही जाती है आत्मानुभव की क्रिया हो जाती है।

स्नान करते समय आप को सोहम् वा ॐ जपना चाहिये, जिस का अर्थ जल है। जल ठोस पृथिवी का समुद्र है। विवस्त्र शरीर पानी से एक होता है, शरीर का प्रत्येक रोमकूप उस जल को ग्रहण कर रहा है और हम प्रकृति से एक होने हैं, मीन (जल जन्तु) से अभिन्न होते हैं, विश्व के जल से अपने बन्धुत्व का हमें पुनर्लाभ हो जाता है। जिस प्रकार से जल मट्टी और मैल को देह से हटा रहा है उसी तरह आत्मा की धूल भी छूट रही है। सम्पूर्ण विश्व मेरा भोजन है, मैं पवन भक्षण कर रहा हूँ। इसी तरह जीवन की प्रत्येक क्रिया और प्रत्येक कृत्य को, वेदान्त के अनुसार, धार्मिक कार्य बनाया जा सकता है। रोग तक देवता बनाये जाते हैं।

भारत में जब किसी घर में चेचक आती है तब वे कदापि नहीं विकल होते, कदापि कोई चिकित्सा नहीं करते, बल्कि खुश होते हैं। क्या यह अद्भुत नहीं है? वे अनेक प्रकार से गाते बजाते हैं, अवसर को अत्यन्त धार्मिक समझते हैं। घरका हरेक और सब परमात्मदेव की पूजा करते हैं। उन्हें शोक या चिन्ताकुल इच्छाएँ नहीं होतीं। जब बच्चा चंगा हो जाता है, वे धन-दान द्वारा और ढ़ाल पीट कर देवता का पूजनोत्सव करते हैं, और बहुत हर्ष तथा आनन्द प्रकट करते हैं, दिव्य विश्व के प्रति प्रेम और कृतज्ञता प्रकट करते हैं। इन दिनों इन रीतियों ने जनता के लिये अपनी महत्ता खो दी है। लोग चाहे इन बातों को समझें यह न समझें, राम इन का अर्थ जानता है और इन सब का

सर्वोत्तम उपयोग करता है।

राम आप में से हरेक से एक बात की सिफारिश करता है। सबेरे जब आप उठते हैं या चलते हैं अथवा कोई और काम करते हैं, तब अपना विचार सदा निजधाम में रखिये। सदा अपने आप को केन्द्र में रखिये। केन्द्रच्युत मत हूजिये। जिस तरह मछलियां जल राशि में रहती हैं, जिस तरह चिड़ियां वायु-राशि में रहती हैं, उसी तरह प्रकाश-निधि में तुम रहो। प्रकाश में तुम रहो, चलो, फिरो, और अपना अस्तित्व रक्खो। जब अँधेरा होता है, तब भी विज्ञान के अनुसार प्रकाश ही होता है। आन्तरिक प्रकाश सदा मौजूद है। गाढ़ निद्रा-अवस्था में प्रकाश उपस्थित है। एकाग्रता की सहायता में आत्मानुभव के उच्चतम शिखर पर चढ़ने निमित्त, नौसिखुओं के लिये यह अत्यन्त आवश्यक पाया गया है कि वे अपनी सत्ता को प्रकाश का संसर्गी मानें।

भौतिक वस्तु के रूप में हम प्रकाश की पूजा नहीं करते हैं, जैसा कि रोमन कैथोलिक ईसाई अपनी मूर्तियों के साथ करते हैं। आत्मानुभव के अत्यन्त निश्चित उपाय के तौर पर, हिन्दू धर्मग्रन्थों में यह बार बार उपदेश दिया गया है कि अपने आप को निरन्तर संसार का प्रकाश समझते हुए पूजा को आरम्भ करना चाहिये। जब आप ॐ जप रहे हों तब अनुभव कीजिये कि आप प्रकाश हैं, तेज हैं। प्रकाश आप हैं। यह भाव जो हिन्दू शास्त्रों में बड़े विज्ञान के साथ प्रकट किया गया था, इस की ठेस (ठोकर) सब महात्माओं को लगी थी। ईसा ने कहा, "मैं संसार का प्रकाश हूँ।" मोहम्मद और सब महान पुरुष इसी प्रकार से बोले थे। प्रकाश

के रूप में आप सब वस्तुओं में व्याप्त हैं। इन विचारों को निरन्तर आप को अपने सामने रखना चाहिये और इस प्रकार से आप सदा परमेश्वर के संस्पर्श में होते हैं। इस प्रकार से हिन्दू का हरेक कृत्य धार्मिक स्थिति-बिन्दु से आत्मा से एक स्वर (अभेद) हुए होता है।

राज़ी से या बे राज़ी, प्रकृति की सब शक्तियां मनुष्य को आत्मानुभव कराने में बाध्य हैं। अनुकूल तथा प्रतिकूल परिस्थितियों से कोई भेद नहीं पड़ना। जैसे चलने में हम एक पैर उठाते हैं और तब दूसरा नीचे उतारते हैं, उसी तरह सुख और पीड़ा निरन्तर परस्परानुगामी हैं, और सम्पूर्ण विश्व भर में यह प्रक्रिया काम कर रही है। वे लोग सचमुच सुखी हैं जो सांसारिक सुखों और दुखों से अपने को परे रखते हैं। उन दोनों से बचना चाहिये, और इसी में सच्चा सुख है। एक का उतना ही स्वागत है जितना दूसरे का। सांसारिक सुख और दुख उसे विभिन्न नहीं प्रतीत होते, जो मनुष्य उन से ऊपर उठता है उस को एक उतना ही मान्य है जितना कि दूसरा। प्रत्येक सुख के गर्भ में दुख उपस्थित है, और प्रत्येक पीड़ा के गर्भ में सुख मौजूद है। जो सुखों को ग्रहण करता है, उसे दुख भी लेने ज़रूरी हो जाते हैं। वे अलग नहीं किये जा सकते। सच्चे आनन्द का मार्ग उन (सुख दुख) से ऊपर उठना है। सर्वदा अपने आत्मा का भोग करो। वही मनुष्य स्वतंत्र है जो सुखों और दुखों का सम भाव से उपयोग कर सकता है। सदा सत्यात्मा में रहो, फिर तुम्हारे आनन्द में कोई बाधा नहीं डाल सकता। जो स्वतंत्र है उस की अभ्यर्थना सारी प्रकृति करती है, सम्पूर्ण विश्व उस के सामने शीश झुकाता है।

मैं वह हूँ, आप स्वतंत्र हैं। आज यह आप को आदरणीय हो या न हो, फिर भी यह कठोर वास्तविकता बनी रहती है, और देर या सबेर सब को इस की उपलब्धि करनी होगी। सोहम और ॐ का जप आप को केवल सत्य में रखने के लिये है। सब से बड़ा पतन है कारणता (हेतु) के प्रदेश में उतार लिया जाना। संसार के दृश्य के कारणों (हेतुओं) पर ज्यों ही कोई सोचना आरम्भ करता है, त्योंही वह गिरता है। एक बच्चा कारणत्व (हेतु) से परे है, वह हरेक वस्तु का उपयोग करता है और कारण की परवाह नहीं करता। अतः वह प्रफुल्लित और सुखी है। वह कारणत्व हेतुता के प्रदेश से ऊपर है। कारणत्व के प्रदेश में गिरने के बदले आपको परमेश्वरता में चढ़ना चाहिये। मैं केवल दृश्य का साक्षी हूँ, कदापि उन (रूपों वा रूप) में फँसा नहीं हूँ, सदा उन से ऊपर हूँ। ये सब नाम रूप व्यापार सुस्वर स्पन्दन मात्र हैं, चक्र की ऊपरी और नीची गति हैं, कदम का ऊपर उठना और नीचे आना है। उद्देश्य है आप को कारणत्व से ऊपर उठाने का, न कि नीचे लाने का। हेतुता के मण्डल से ऊपर उठने के लिये आप को निरन्तर प्रयत्न और संघर्ष करना पड़ेंगे। अपने परमेश्वरत्व में रहो और तुष स्वाधीन हो, आप ही अपने स्वामी हो। विश्व के विधाता हो।