श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

आत्मानुभव की सहायता नं0 1।

भाग 26 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 26 · अध्याय 6 / 10

आत्मानुभव की सहायता नं0 1।

या प्राणायाम।

8. मार्च 1903 को दिया हुआ व्याख्यान।

आज राम का प्रवचन कुछ बातों पर होगा जिन से उन लोगों को बड़ी सहायता मिलेगी जिन्हों ने राम के पिछले व्याख्यान सुने हैं। पहले हम प्राणायाम को लेंगे। प्राणायाम का शाब्दिक अर्थ श्वास (प्राण) का नियंत्रण है। योग पर हिन्दुओं की पुस्तकों में प्राण के नियमन की आठ मुख्य विधियां दी हुई हैं। किन्तु 'राम' आप के सामने केवल एक विधि पेश करेगा जिसे प्राणायाम कहते हैं, और जो प्राण के नियमन की बड़ी महत्वपूर्ण विधि है। आप सवाल करेंगे कि प्राण का संयम करने से क्या लाभ है? इस के उत्तर में 'राम' केवल यह कहता है, "प्राण (श्वास) के नियंत्रण की यह विधि सीखो और इसे अमल में लाओ। आप का अपना ही अभ्यास बतावेगा कि यह अत्यन्त उपयोगी है।" जब कभी तुम चकराओ, जब कभी तुम्हें विषाद जान पड़े, जब कभी तुम खिन्न हो, जब कभी तुम्हें उदासी जान पड़े, जब कभी तुम्हारा मन मलीन हो, निरुत्साही हो, तब प्राणायाम करो, जिसे 'राम' तुम्हारे सामने अब उपस्थित करने लगा है, और तुम देखोगे कि तुम्हें तुरन्त शान्ति मिल जाती है। प्राण के नियमन की इस विधि का लाभ आप को तुरन्त जान पड़ेगा। पुनः, जब कभी किसी विषय पर आप लिखना शुरू करो, जब आप कभी

किसी विषय पर विचार करना शुरू करो, और आप को जान पड़े कि आप अपने विचारों को काबू में नहीं ला सकते, तब आप यह प्राणायाम करो, और इस से जो तुम को तुरन्त शक्तियां प्राप्त होंगी उस पर आप को विस्मय होगा। हरेक वस्तु क्रम में (ठीक स्थान पर) है। हरेक वस्तु अत्यन्त वांछनीय अवस्था में रखी हुई है। प्राणायाम के ये लाभ हैं:— इस से आप के बहुत से शारीरिक रोग दूर हो जायेंगे। प्राणायाम से आप पेट के दर्द से, सिर के दर्द से, दिल के दर्द से अच्छे हो सकते हैं। अब हम देखेंगे कि यह प्राणायाम क्या है। इस देश में लोग इस या उस विधि से प्राण का नियमन करने का यत्न कर रहे हैं, किन्तु 'राम' आप के सामने वह उपाय रखता है जो समय की परीक्षा में पूरा उतर चुका है, भारत में जो अति प्राचीन काल में प्रचलित था, और जिस का आज भी वहां प्रचलन है, तथा अति प्राचीन काल से लगा कर आज तक जिस किसी ने उस का अभ्यास किया है, उसी ने उसे अत्यन्त उपयोगी पाया है।

अच्छा, प्राणायाम करने के लिये आप को अत्यन्त सुखकर, सरल स्थिति में बैठना चाहिये। एक पाँव दूसरे पर चढ़ा कर बैठना बड़ा ही सुखकर आसन है, किन्तु यह आसन, पूर्वीय भारत वासो, आप को मार डालेगा। आप आराम-कुर्सी में बैठ सकते हैं। अपनी देह सीधी रक्खो, रीढ़ की हड्डी कड़ी रक्खो; सिर ऊपर, सीना बहिर्गत, नेत्र सामने रक्खो। दहने हाथ का अंगूठा दहने नथुने पर रक्खो और बाँए नथुने से धीरे धीरे भीतर श्वास खींचो। तब तक धीरे धीरे भीतर सांस खींचते रहो, जब तक तुम्हें आराम मिले। जब तक आराम से खींच सको, तब तक श्वास भीतर

खींचते रहो। श्वास भीतर खींचते समय चित्त को शून्य न होने दो। भीतर श्वास खींचते समय चित्त को एकाग्रता से इस विचार पर जमाओ कि, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ परमेश्वर भीतर खींचा जा रहा है, कि आप परमात्मा, नारायण, सम्पूर्ण संसार, सम्पूर्ण विश्व को पी रहे हैं। अच्छा, जब आप को समझ पड़े कि आप ने अपनी पूर्ण शक्ति भर हवा भीतर भर ली है, तब अंगुली से उसी बाँए नथुने को बन्द कीजिये, जिस से आप भीतर श्वास भर रहे थे; और जब आप दोनों नथुने बन्द कर दें, तब मुख से श्वास न निकलने पावे। भीतर खींची हुई सांस अपने अन्दर फेफड़ों में, पेट में, पेडू में रहने दो। सब छिद्र (सूराख, खाली स्थान) हवा से भरे हों, उस हवा से भरे हों, उस हवा से जो आपने भीतर खींची है। और जब श्वास से खींची हुई हवा आप के भीतर हो तब मनको शून्य न होने दीजिये, मन इस विचार में, इस सत्य में केन्द्रित (ध्यानावस्थित) रहे कि "मैं परमात्मा हूँ, मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ, जो विश्व की हरेक वस्तु में, हरेक अणु में, प्रत्येक परमाणु में, भिदा हुआ है, स्थापित है, परिपूर्ण है"। यह समझो। इस विचार के अनुभव की उपलब्धि में अपनी सारी शक्तियों का प्रयोग करो, अपनी परमेश्वरता को अनुभव करने में अपनी सारी शक्ति लगा दो। ज्यों ज्यों श्वास तुम्हारी देह में भरती जाय, त्यों त्यों अनुभव करो और समझो कि मैं सत्य हूं, मैं वह दैवी शक्ति हूं जो सम्पूर्ण विश्व में परिपूर्ण है।" यह समझो। आवश्यकता है कि आप अपने मन इस पर एकाग्र करें। जब आप को समझ पड़े कि अब आप सांस एक क्षण भी और नहीं रोक सकते, तब बांया नथुना बन्द रख कर

दहना नथुना खोल दीजिये, और दहने नथुने से धीरे धीरे क्रमशः सांस बाहर निकालिये । तब भी मन को सुस्त न होने दीजिये, वह काम में लगा रहे, उसे अनुभव करने दो कि ज्यों ज्यों सांस आ रही है,और पेट की सब मलिनता दूर हो रही है, त्यों त्यों सारी मलिनता, अशुद्धता, सारी गंदगी, सारी दुष्टता, दुर्गन्धता, सम्पूर्ण अविद्या बाहर निकल रही है, दूर की जारही है, और त्यागी जारही है । सारी दुर्बलता कूच कर गई, न कोई दुर्बलता है, न अविद्या है, न भय है, न चिन्ता, न व्यथा, न परेशानी, न क्लेश हैं, सब का अन्त हो गया, सब चल गये, आप को छोड़ गये । जब आप सांस बाहर निकाल चुको, आराम से जितनी सांस बाहर निकाल सकते हो; उतनी जब आप निकाल चुको, तब तक सांस बाहर निकालते रहो,; जब तक तुम आराम से निकाल सकते हो, और जब तुम्हें समझ पड़े कि अब और सांस बाहर नहीं निकाली जा सकती, तब दोनों नथुनों को खुले रखने हुए यत्न करो कि तनिक भी हवा भीतर न जाने पावे । हाथ नाक से हटा लो. कुछ देर तक हवा को भीतर न जाने दो, जितनी देर तक तुमसे रोका हो सके उतनी देर तक, और जब तुम्हारे प्रयत्न से हवा नथुनों के द्वारा फेफड़ों में न जने पाती हो, तब मन को फिर काम मे लगाओ और उसे यह भान करने दो, अपने पूर्ण बल और शक्ति से उसे यह अनुभव करने की चेष्टा करने दो, कि यह परमेश्वरता अनन्त है । सम्पूर्ण समय ( काल ) और स्थान (देश) मेरा अपना विचार है; मेरा सत्य आत्मा, निज स्वरूप, समय, स्थान और कारकत्व ( काल, वस्तु और देश ) से परे है । अनुभव करो कि यह परमेश्व- रत्व देश काल वस्तु से परे है, इस दुनिया की किसी भी

वस्तु से परिमित नहीं है । वह कल्पनातीत है, विचारातीत है, इन सब से परे है, प्रत्येक वस्तु से परे है, अपरिमत है, हरेक वस्तु इस में समाई है, हरेक वस्तु इससे परिमित है, आत्मा या निज स्वरूप सीमाबद्ध नहीं हो सकता । यह अनुभव करो ।

इस प्रकार आप ध्यान दें कि इस प्राणायाम में, जितना कुछ अब तक आप के सामने रक्खा गया है चार प्रक्रियाएँ हैं—मानसिक और शारीरिक दोनों । पहली प्रक्रिया भीतर सांस खींचने की थी । भीतर सांस खींचने का अंश शारीरिक क्रिया थी । और यह विचार, विधि, या अनुभव करना और समझना कि परमेश्वरता में हूँ, मैं परमेश्वर हूँ, तथा उस परमेश्वरता को अनुभव करने में मन को लगाना, एवं शक्ति को प्रयत्नशील करना, यह विचार तत्संबंधी मानसिक प्रक्रिया थी । फिर जब तक श्वांस तुमने अपने फेफड़ों में रोक रक्खी, तब तक दो क्रियाएँ होती रहीं, एक तो सांस को फेफड़ों में रखने की शारीरिक क्रिया और अपने आप को सम्पूर्ण विश्व समझने की मानसिक प्रक्रिया । और तीसरी प्रक्रिया में आप ने दहने नथुने से सांस बाहर निकाली, और सारी दुर्बलता दूर कर दी; अपने को परमेश्वरता में स्थापित रखने, आसीन रखने, जमे रहने की, कभी कोई दुर्बलता पास न फटकने देने की, या कोई आसुरी प्रलोभन अपने निकट न आने देने की दृढ़ प्रतिज्ञा की और तदनन्तर चौथी प्रक्रिया सांस को बाहर रखने की थी । इस प्रकार प्राणायाम का प्रथमार्द्ध अब तक इस चौथी प्रक्रिया में होगया । आधा (प्राणायाम) समाप्त होगया । यह चौथी

क्रिया कर चुकने के बाद आप कुछ विश्राम ले सकते हैं । तब सांस को यथेच्छ अपने नथुनों में भरने दीजिये । उसी तरह जल्दी २ सांस भीतर ले जाइये और बाहर निकालिये जैसा कि दूर तक चलने के बाद होता है । सांस का यह स्वाभाविक भीतर जाना और बाहर निकलना, जो बहुत शीघ्रता से होता रहता है, स्वतः प्राणायाम है । वह प्राकृतिक प्राणायाम है । इस प्रकार विश्राम लेने के बाद, कुछ देर तक अपने फेफड़ें को भीतर सांस लेने और बाहर निकाल देने के बाद पुनः प्रारम्भ करो । अब शुरू करो, बायें से नहीं बल्कि दहने नथुने से । मानसिक क्रिया पूर्ववत । केवल नथुनों में अदला बदल हो गया । दहने नथुने से श्वांस भीतर खींचो और ऐसा करते समय समझो कि मैं परमे- श्वर को सांस में भीतर खींच रहा हूँ. यथाशक्ति सांस भीतर खींच चुकने के बाद जब तक आराम से होसके तब तक सांस अपने भीतर रखिये । और फिर जब सांस आप के भीतर है, अनुभव कीजिये कि आप सम्पूर्ण विश्व का जीवन और श्वास हैं, आप विशाल विश्व को परिपूर्ण और संजीवित करते हैं । इसके बाद बायें नथुने से सांस बाहर निकालिये । उस नथुने से सांस बाहर निकालिये जिससे आप ने प्राणायाम के पूर्वार्ध में सांस भीतर खींची थी,और समझिये कि आप सारी दुर्बलता,सम्पूर्ण अन्धकार अपने चित्त से निकाल बाहर कर रहे हैं, जैसे सूर्य को रहे, धुंध,शीत,और अन्धकार को मार भगाता है । न फिर कोहरा,न धुंध,न अन्धकार और न सर्दी रहती है । तब सांस को अपनी नाक से बाहर रखिये तथा हरेक क्रिया को बढ़ाने और दीर्घ करने का यत्न कीजिये सब मिला कर इसमें आठ क्रियाएं हैं । पहली चार क्रियाओं से आधा प्राणायाम होता है, और

दूसरी चार से प्राणायाम का उत्तरार्द्ध बनता है । इन सब क्रियाओं को यथासाध्य बढ़ाइये और दीर्घकालव्यापी बनाइये इस में एक ताल गति है । जिस तरह लटकन (पेंडुलम,pendulum) दो तरफा भूलता है, उसी तरह इस ( प्राणायाम ) में आप को अपनी श्वास को लटकन बनाना होता है । तालबद्ध चाल चलाना होता है । आप तब अपने ही अनुभव से देखेंगे कि आप को बड़े बल की प्राप्ति होती है । आप के अधिकांश रोग आपको छोड़ देते हैं । दमा, पेट के विकार, खून की बीमारियाँ और प्रायः हरेक रोग आप को छोड़ देगा यदि आप प्राणायाम का अभ्यास करेंगे ।

अस्तु,राम देखता है कि जब लोग प्राणायाम का अभ्यास शुरू करते हैं तब अधिकांश उनमें से बीमार पड़ जाते हैं । कारण यह है कि वे स्वाभाविक विधि का नहीं ग्रहण करते । वे इतने सैकिड़ों तक सांस भीतर खींचते और बाहर निकालते हैं कि जिस से आप बीमार अवश्य पड़ जायँगे । इस श्वास-क्रिया के हरेक भाग में आप स्वाभाविक बनिये । हरेक क्रिया को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये, भरसक यत्न कीजिये, किन्तु अपने को थका न डालिये । अधिक काम न कीजिये । यदि केवल पहली दो क्रियाएं (अर्थात् भीतर सांस खींचना और फेफड़ों में उसे रखना) करने के बाद आप को थकन जान पड़े, तो रुक जाइये । रुक जाइये क्योंकि आप किसी के बंधे नहीं हैं । दूसरे दिन अधिक विचार से काम कीजिये और पहली या दूसरी क्रिया करते समय अपनी शक्तियों को बचा रखिये ताकि बाकी क्रियाओं को भी आप कर सकें, विवेकी बनिये ।

अस्तु, श्वास के नियंत्रण की यही एक अनुकूल विधि

है । यह हर प्रकार का शारीरिक व्यायाम है । जो लोग समझते हैं कि इस प्राणायाम में कोई गूढ़ रहस्य है, इसमें कोई दैवी अभिप्राय है, वे गलती पर हैं । जो समझते हैं कि अत्यन्त ऊँचे दर्जे का आत्मानुभव इससे प्रतिफलित होता है और इससे बढ़ कर कुछ भी नहीं है, वे गलती पर हैं । प्राणायाम या श्वास के इस नियंत्रण में कोई अलौकिकता नहीं है । यह एक साधारण व्यायाम है । जिस तरह बाहर जाकर शारीरिक व्यायाम करते हैं उसी तरह यह एक प्रकार की फेफड़ों की कसरत है । इसमें कोई वास्ति- विक महिमा नहीं है, इसमें कोई गुप्त भेद नहीं है ।

प्राणायाम के संबंध में एक बात और कही जानी चाहिये, जब आप सांस भीतर खींचना या बाहर निकालना शुरू करें, तब अपने पेंदू (इस शब्द के व्यवहार के लिये राम को क्षमा कीजिये) को, शरीर के अधो भाग को, भीतरी ओर खिंचा रखिये । इससे आप का बड़ा हित होगा । पुनः जब आप सांस भीतर खींचे या बाहर निकालें, तब श्वास को अपने सम्पूर्ण उदर में पहुँचने और भरने दीजिये । ऐसा न हो कि सांस केवल हृदय तक जाय और हृदय से आगे न जाने पाये । सांस को नीचे और गहरा उतरने दीजिये । अपने शरीर की प्रत्येक गुफा (खाली स्थान),अपने शरीर का सब ऊपरी आधा भाग परिपूर्ण हो जान दीजिये । अस्तु, प्राणायाम के संबंध में इतना यथेष्ट है और वेदान्त की रीति पर जो लोग अपने मनों को एकाग्र करना चाहते हैं वे ॐ का उच्चारण (जाप)शुरू करने के पूर्व,वेदान्तिक साहित्य में पढ़ी हुई किसी विधि पर मन की एकाग्रता आरम्भ करने के पूर्व, प्राणायाम करना अत्यन्त उपयोगी पावेंगे ।

अब राम चित को एकाग्र करने की एक विधि आप के सामने रक्खेगा । इस कागज़ ( प्रबन्ध ) को अभी पढ़ना शुरू करने की आप को कोई ज़रूरत नहीं है । राम आप को बतावेगा कि इसे कैसे पढ़िये । भला आप जानते हैं कि यह उनके लिये हैं जो राम के व्याख्यानों में आते रहे हैं । जिन्हों ने व्याख्यान नहीं सुने हैं उनके लिये यह रोचक न होगा, उन्हें इसमें कोई अच्छाई नहीं मिलेगी, तथापि शायद इस के पढ़ने की विधि से उनका कुछ हित होगा । वे उस विधि को अपनी निजी प्रार्थनाओं में प्रयुक्त कर सकते हैं । इस कागज़ को अपने साथ लेजाने की भी उन्हें ज़रूरत नहीं है । वे विधि को सीख लें और अपनी निजी प्रार्थनाओं में उसका प्रयोग करें । यदि आप समझते हैं कि ये टाइप किये हुए कागज़ किसी काम के हैं, तो आप इन्हें, आप में से कोई भी अपने व्यवहार के लिये छपवा सकते हैं । प्रार्थना का यह एक रूप है । यह इस अर्थ में प्रार्थना नहीं है कि इसमें परमेश्वर से कोई वस्तु मांगी, चाही या याचना की गई है । यह इस अर्थ में प्रार्थना है कि आप को अपनी परमेश्वरता अनुभव करने के योग्य बनाती है । आप में से अधिकांश के पास "आत्मानुभव" पर रामकृत वह लाल किताब है । अच्छा, यह प्रबन्ध भी उसी किताब के ढंग का है । यह कागज़, अर्थात सोहम् शीर्षक लेख, जो इस व्याख्यान के अन्त में दिया हुआ है, आप हर समय अपनी जेबों में रख सकते हैं, और जब कभी आप को समझ पड़े कि आप की स्थिति की दशा आप के लिये बहुत अधिक ( विपरीत ) है, जब कभी आप को जान पड़े कि चिन्ताओं का, परेशानियों का, नित्य के जीवन के फिकों का बोझ अपने को दबाये देता है, तब इस कागज़ को लेकर एकान्त

में बैठ जाइये, और इसे उस प्रकार से पढ़ना शुरू कीजिये जिस प्रकार से राम आज पढ़ेगा ।

आराम से बैठ जाइये । उसी तरह पर बैठिये जिस तरह पर आप से प्राणायाम करने के लिये बैठने को बताया था । आप चाहे तो अपने नेत्र बन्द करलें, और प्रार्थनात्मक वृत्ति में प्रारम्भ करें, अथवा अपनी आँखें आधी बन्द रक्खें, जैसा आप को भावे ।

"बस, केवल एक तत्व है. ॐ ! ॐ !! ॐ !!!" इसे पढ़ो और कागज़ को अलग रखदो, उसे वहाँ रक्खा रहने दो । "बस केवल एक तत्व है ।" आप यह जानते हैं, यही सत्य है । कम से कम वे सब, जिन्हों ने राम के व्याख्यानों में जी लगाया है, जानते हैं कि यह सत्य है. और जब आप को विश्वास हो जाय कि यह सत्य है,तब इसे अनुभव कीजिये । "बस केवल एक तत्व है", भाव पूर्ण भाषा में यह कहिये, अपने समग्र हृदय से इसे कहिये, इस कल्पना में घुल जाइये । बस,केवल एक सत्य है, ॐ ! ॐ !! ॐ !!! अब देखिये, यह पद "बस केवल एक सत्य है" लिखने के बाद इसके सामने लिखा हुआ है ॐ ! ॐ !! ॐ !!! इससे क्या सूचित होता है ? इससे सूचित होता है कि आपका दिल भर जाने के बाद, "केवल एक सत्य है" के विचार में आपका मन डूब जाने के बाद, ये सब शब्द, एक, दो, तीन, चार, पाँच पढ़ने के बदले केवल एक शब्द ॐ आप कहें,क्योंकि यह एक शब्द आप के लिये सम्पूर्ण कल्पना को प्रतिपादन करता है । जैसे कि बीजगणित में हम बड़े भागों ( अंशों ) को य अथवा र, क अथवा ख, या किसी और अक्षर से दिखाते हैं, उसी तरह जब तुम यह विचार 'बस केवल एक सत्य है, पढ़

चुको, तब यह नाम ॐ, जो पवित्रों का पवित्र है,यह नाम ॐ जिसमें परमेश्वरता या परमात्मा की परम शक्तियाँ हैं. उच्चारण चाहिये, और उसे उच्चारते समय केवल एक सत्य की कल्पना को आप अनुभव करें । जब आप के ओंठ ॐ उच्चारते हों, तब आप के सम्पूर्ण अन्तः करण को 'केवल एक सत्य है' की कल्पना का अनुभव करना चाहिये । किन्तु अभी तो आप को ये शब्द 'बस केवल एक सत्य है' सम्भवतः गलबलाहट मात्र हों । वे आपके लिये निर थक हैं । यदि आप ने राम के व्याख्यान सुने हैं, तो आप को जानना ज़रूरी है कि 'केवल एक सत्य है' । इसका एक मोटा अर्थ आपके लिये होना चाहिये । इसका अर्थ है कि यह सम्पूर्ण दृश्य(विश्व) जो हमारे उल्लाह को ठंड़ा कर देता है और हमारी प्रसन्नता को नष्ट कर देता है,यह सम्पूर्ण भेद-मय दृश्य जगत सत्य नहीं है, सत्य केवल एक है, सारी परिस्थितियां सत्य नहीं हैं । यह अर्थ है । सत्य केवल एक है, और ये हैरान करने वाली परिस्थितियां सत्य नहीं हैं । जिन्हों ने इस प्रयोग की परीक्षा नहीं की है, और अपनी शक्तियों को भय- भीत कर दिया है, केवल वे ही इस एक सत्य के अस्तित्व को अस्वीकार कर सकते है । यह मामला भी उतना ही प्रयोग करने का है जितना कि किसी प्रयोग शाला में किया हुआ कोई भी प्रयोग । यह दृढ़ कठोर तथ्य है । जब तुम अपने चित्त को गला देते हो, जब तुम अपने चुद्र मिथ्या अहंकार को परमेश्वरता में विलीन कर देते हो, तब क्या परिणाम होता है ? परिणाम यह होता है ( नज़ारथ के ईसा के इन शब्दों पर ध्यान दीजिये ) कि यदि सरसों के बीज भर भी विश्वास आप में हो और पहाड़ को आने का आदेश आप दें,तो पहाड़ आ जावेगा । उस सत्यमें आप जियें (जीवनमें

बतें ), उस सत्य को अनुभव करें, और आप देखेंगे कि आप की सब परिस्थितियां, आप के सब समुपस्थित संकट, सब क्लेश और चिन्ताएँ जो आप के सिर पर सवार हैं, गायब हो जाने को लाचार हैं । परमेश्वरता की अपेक्षा बाहरी व्यापार में आप अधिक विश्वास रखते हैं, आप दुनिया को परमेश्वर से अधिक वास्तविक (सत्य) बना देते हैं । बाहरी व्यापार के संबंध में आपने मोहबश अपने को एक जड़ता में परिणत कर लिया है, और यही बात है कि आप अपने को सब तरह की बीमारियों और क्लेशों में फंसाते हैं । जब आप का चित्त बहुत गिरा हुआ हो, तब इस कागज़ को उठा लीजिये और अनुभव कीजिये कि 'बस केवल एक सत्य है' देखिये कि यह एक कथन उन सब नाम मात्र सत्यों से उच्चतर कथन है, जो संबंधियों के द्वारा आप में धीरे २ भर दिये गये हैं । सब नाम मात्र तथ्य जिनको आप तथ्य मानते रहे हैं माया मात्र वा भ्रम मात्र हैं, इन्द्रियों के इन्द्रजाल ने आप के लिये इन को बना रक्खे हैं । इन्द्रियों के चकमें में न आओ । एक व्यक्ति आता है और आप में दोष निकाल कर आप की आलोचना करता है, दूसरा आता और आपको गालियां देता है, तीसरा आता और आप की खुशामद करना तथा आप को अति स्तुति करके फुला देता है । ये सब तथ्य नहीं हैं, ये सब सत्य नहीं हैं । अटल तत्व, कठोर तथ्य तो आप को अनुभव करना चाहिये । इसे जपते समय उस सारे विश्वास को आप उड़ा दीजिये व निकाल दीजिये कि जो आप ने बाहरी दृश्य रूप परिस्थितयों में बना रक्खा है । अपनी सब शक्तियां और बल इस तथ्य में लगाओ, 'बस केवल एक सत्य है' ॐ ! ॐ !! ॐ !!। अच्छा, प्रायः आप देखेंगे कि 'केवल एक सत्य है' के विचार का

प्रथम पाठ आप को प्रसन्न और प्रफुल्लित कर देगा, आप को सब कठिनाई और व्यथा से मुक्त कर देगा । किन्तु यदि आप की और आगे पढ़ने की प्रवृति हो तो आप पढ़ सकते हैं, अन्यथा यदि आप अपनी जेब के उस कागज का एक ही वाक्य अमल में लासकें तो यथेष्ट है । यदि आप समझें कि आप को कुछ और बल की आव- श्यकता है, तो आप दूसरा वाक्य पढ़िये, "वह सत्य में स्वयं हूँ ।" अब वह घर के निकट आ रहा है । अरे, मेरा पड़ोसी मुझ से भिन्न नहीं है, मैं वहां भी मौजूद हूँ । वह तत्व मैं खुद हूँ । ॐ !! ॐ ॐ !!! ध्यान करो, कुछ लोग कहते हैं कि जब आप ॐ उच्चार रहे हों,या यह कर रहे हों, तब अपने हाथ आप बन्द रक्खें । किसी तरह का कोई प्रतिबन्ध नहीं है । इस विचार को अनुभव करो । मन को एकाग्र करते समय यह ज़रूरत नहीं है कि आप अपने को किसी विशेष आसन में रक्खें । कोई बंधन नहीं है । अनुभव करते,महसूस करते और विचार को भीतर घुसाने तथा अन्दर सांस के साथ खींचन की चेष्टा करते समय शरीर की परवाह न कीजिये । 'लोग क्या कहेंगे', इस की चिन्ता न कीजिये । यदि आप की गाने की प्रवृत्ति हो तो गाते रहिये । यदि आप की लेट रहने की प्रवृत्ति हो तो फर्श पर पड़े रहिये । भाव का अनुभव कीजिये यदि आप के हाथ उस ओर चलते हैं तो उन्हें चलने दीजिये । शरीर के संबंध में कोई प्रतिबंध नहीं है, केवल भाव का अनुभव कीजिये । 'सर्वशक्तिमान' का भाव आता है, उस पर मनन कीजिये । यह कागज़ उनके लिये है जिन्हों ने व्याख्यान सुने हैं । जिन्हों ने नहीं सुने हैं वे अवश्य ही इसे रोचक न पावेंगे । जिन्हों ने व्याख्यान सुने हैं वे जानेंगे

कि वास्तविक आत्मा सर्व शक्ति रूप है, परम स्वरूप, सर्वशक्तिमान है । इस संबंध में, इस संसार में हरेक बात आत्मा से की जा रही है, जैसे कि इस पृथिवी पर हरेक बात सूर्य के द्वारा हो रही है । हवा सूर्य के कारण चलती है, घास सूर्य के कारण उगती है, नदी सूर्य द्वारा बहती है, लोग सूर्य के कारण जाग पड़ते हैं, गुलाब सूर्य के कारण खिलते हैं । इसी तरह, आत्मा ही के कारण, सर्वशक्तिमान परम स्वरूप के ही कारण विश्व में प्रत्येक व्यापार हो रहा है । सर्वशक्तिमान, सर्वशक्तिमान ॐ ! ॐ !! ॐ !!! इस तरह उन सब सन्देहों को,जो आप को दुर्बल बनाते और पराजित करते हैं, उन सब भ्रान्तियों को, जो आप को कायर बनाती हैं, आप के सामने घुस आने का कोई अधिकार नहीं है । अनुभव कीजिये कि आप सर्वशक्तिमान हैं । जैसा आप ख्याल करते हैं वैसे ही आप हो जाते हैं । अपने आप को पापी कहिये और आप पापी हो जाते हैं, अपने आप को मूर्ख कहिये और आप मूर्ख हो जाते हैं, अपने आप को दुर्बल कहिये फिर इस दुनिया की कोई शक्ति आप को प्रबल नहीं बना सकती है । अनुभव कीजिये कि सर्वशक्ति और सर्वशक्तिमान आप हैं ।

तब 'सर्वज्ञ' का भाव आता है । इस ( सर्वज्ञता के ) भाव को आप ग्रहण करें, मन को इस भाव पर मनन करने दीजिये, ॐ का गान करने दीजिये । ॐ शब्द सर्वज्ञ का स्थानीय है, और ॐ उच्चारिये । शब्द या सूत्र जो उच्चारा जाना चाहिये वह ॐ है । सर्वज्ञ, ॐ, ॐ । इस तरह चलो और उन गलत विचारों को जो आप को मुग्ध करके जाहिल मूर्ख बनाये हुए हैं, दूर कर दो । परमेश्वरता

का सब से सीधा रास्ता यही है ।

ऐसा ही भाव 'सर्वव्यापी' का लीजिये । अनुभव करो कि "मैं परिच्छिन्न नहीं हूँ, यह चुद्र शरीर नहीं हूँ, मैं यह परिच्छि- न्नात्मा नहीं हूँ;यह जीव,यह 'अहं' मैं नहीं हूँ । हरेक अणु और परमाणु में जो व्याप्त और भिदा हुआ है वह मैं स्वयं हूँ ।" इस संबंध में तनिक भी सन्देह चित्त में न लाओ । सर्व- शक्तिमान, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, वह मैं हूँ. वह हरेक चीज़ में व्याप्त है, सब शरीर मेरे हैं । ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

अच्छा, बाकी वाक्यों पर अधिक टिकने वा ठहरने की राम को ज़रूरत नहीं है । वे केवल आप को पढ़ कर सुना दिये जांयगे । इस विधि का अभ्यास करो और यदि एक ही सप्ताह में आप को परमेश्वरता का अनुभव न हो, तो राम को गलत समझियेगा ।

"पूर्ण स्वास्थ्य स्वरूप मैं हूँ।"

यदि वह शरीर, जिसे आप मेरा कहते हैं, बीमार है तो उसे अलग कर दीजिये, उसका खयाल न कीजिये, समझिये कि आप पूर्ण स्वास्थ्य स्वरूप हैं,पूर्ण स्वास्थ्य आप का है । यह अनुभव करो । शरीर तुरन्त अपने आप ही स्वस्थ हो जायगा ।यह है रहस्य । यत्न वा अभ्यास करने से तुम देखोगे कि यह तथ्य है या नहीं । तुम्हारी परवाह के बिना भी शरीर ठीक हो जायगा । तुम्हें इस शरीर के लिये नहीं फिक्र करना चाहिये कि "हे परमेश्वर, मुझे अच्छा कर दे ।" संस्कृत धर्म- ग्रन्थों में एक सुन्दर वाक्य (मंत्र) है "नायमात्मा बल- हीनेन लभ्य ।" दुर्बल इस सत्य को नहीं पा सकते । क्या आप नहीं देखते कि जब आप अमेरिका के राष्ट्रपति या किसी सम्राट के पास जाते हैं तब आप यदि फकीर बन

कर जाते हैं तो आप दुरदुरा दिये जाते हैं, आप उसके सामने नहीं हाज़िर होने पाते । सो जब आप फक्रीरी हालत में परमेश्वर के पास पहुँचोगे,तब आप धकेल कर बाहर कर दिये जाओगे । समझिये कि "मैं स्वस्थ हूँ," और कोई चीज़ न मांगिये । 'मैं तन्दरुस्त हूँ', और तन्दरुस्त आप हैं ।

तदुपरान्त दूसरा विचार "सम्पूर्ण शक्ति मैं हूँ" आता है । इसे मन में रक्खो और ॐ ! ॐ !! ॐ !!! उच्चारो । इस तरह कहो 'सर्व शक्ति मैं हूँ' ।

तब दूसरा विचार, "सम्पूर्ण विश्व मेरा संकल्प मात्र है ।" इसे मानो और इसे पढ़ते समय उन दलीलों को ध्यान में लाओ जिन्हें वेदान्त इस तथ्य को सिद्ध करने में पेश करता है । इस तथ्य को सिद्ध करने में तुम जो कुछ भी जानते हो वसे ध्यान में लाओ, और यदि आप ने ऐसी कोई भी बात पढ़ी या सुनी नहीं है जो साबित करती है कि दुनिया मेरा संकल्प है तो इस विचार पर विश्वास करो, और आप देखेंगे कि दुनिया आप की कल्पना रूप है । 'दुनिया मेरी कल्पना है,' ॐ उच्चारो और ऐसा समझो । इसी प्रकार बाकी सब,

सर्व आनन्द में हूँ । ॐ ! ॐ !! ॐ !!! सर्व ज्ञान में हूँ । ,, ,, ,, सर्व सत्य में हूँ । ,, ,, ,, सर्व प्रकाश में हूँ । ,, ,, ,, निडर, निर्भय में हूँ । ,, ,, ,, { न कोई अनुराग या विराग । { मैं सब इच्छाओं की { पूर्णता हूँ । ,, ,, ,,

मैं परमात्मा हूँ । ,, ,, ,, मैं सब कानों से सुनता हूँ । ,, ,, ,, मैं सब आंखों से देखता हूँ । ,, ,, ,, मैं सब मनों से सोचता हूँ । ,, ,, ,,

{ जो सत्य मेरा स्वरूप है उसी को जानने { की साधु आकांक्षा करते हैं । ,, ,, ,,

{ प्राण और प्रकाश जो नक्षत्रों और सूर्य { के द्वारा झलकता है, वह मैं हूँ । ,, ,, ,,

अब कागज़ समाप्त हो गया ।

अब इसे स्पष्ट करने के लिये कुछ शब्द कहे जा सकते हैं । हिन्दी कहानियों में एक बड़ी सुन्दर कहानी है । एक समय में एक बड़े पंडित, बड़े महात्मा थे । कुछ लोगों को वे पवित्र कथा सुना रहे थे । ऐसा हुआ कि गांवकी ग्वालिनें पंडित जी के पास से होकर निकलीं, जब कि वे पवित्र कथा बांच कर लोगों को सुना रहे थे । इन ग्वालिनों ने पंडित जी के मुख से ये वचन सुने "पवित्र स्वरूप परमेश्वर का पवित्र नाम बड़ा जहाज़ है, जो हमें (भव-) सागर के पार लगा देता है । मानो कि सागर एक छोटा सरोवर मात्र है । बिलकुल कुछ नहीं है ।" इस प्रकार का कथन उन्हों ने सुना । इन ग्वालिनों ने उस कथन को शब्दशः ग्रहण किया । उन्हों ने उस कथन में अचल विश्वास स्थापित किया । उस पार अपना दूध बेचने के लिये उन्हें नित्य नदी पार करना पड़ती थी । वे ग्वालिनें थीं । उन्हों ने अपने मनों में सोचा । वह पवित्र वचन है, वह गलत नहीं हो सकता, अवश्य वह यथार्थ होगा । उन्हों ने कहा, "नित्य एक हम मल्लाह को क्यों दें ? परमे- श्वर का पवित्र नाम लेकर और ॐ उच्चारती हुई हम नदी

क्यों न पार करें ? हम नित्य एकन्नी क्यों दें ?" उन का विश्वास वज्र के समान कठोर था । दूसरे दिन वे आईं और केवल ॐ उच्चारा, मल्लाह को कुछ नहीं दिया, नदी पार करना शुरू किया, नदी उतर गईं और डुबी नहीं । प्रति दिन वे नदी पार करने लगीं, मल्लाह को वे कुछ नहीं देती थीं । लगभग एक महीने के बाद उस उपदेशक के प्रति, कि जिस ने वह वाक्य पढ़े थे और उन का पैसा बचाया था, अत्यन्त कृतज्ञता का भाव उन में उदय हुआ । उन्हों ने महात्मा को अपने घर पर भोजन करने को निमन्त्रण दिया । अच्छा, निमन्त्रण स्वीकृत हुआ, नियत तिथि पर महात्मा को उन के घर पधारना पड़ा । एक ग्वालिन महात्मा को लेवाने आई । यह ग्वालिन जब महात्मा को अपने गांव लिये जाती थी, तब वे नदी पर पहुँचे । ग्वालिन एक पल में दूसरे तट पर पहुँच गई और महात्मा जी उसी पार खड़े रह गये, वे उस साथ न जा सके । कुछ देर में ग्वालिन लौट आई और महात्मा से विलम्ब का कारण पूछा । उन्हों ने कहा कि मैं मल्लाह की राह देख रहा हूँ । मल्लाह को उसे दूसरे तट पर ले जाना चाहिए । ग्वालिन ने उत्तर दिया, "महाराज ! हम आप की बड़ी कृतज्ञ हैं । आप की कृपा से हमारे पैंतीस आने बच गये, और केवल पैंतीस ही आने नहीं किन्तु अपने आजीवन अब हमें मल्लाह को पैसा देने में कुछ न ख़र्च करना पड़ेगा । आप खुद भी रुपया क्यों नहीं बचाते और हमारे साथ उस पार चल चलते ? आप के उपदेश और शिक्षा से हम, बिना कोई हानि उठाये, अनत उस पार चली जाती हैं । आप स्वयं भी उस किनारे को जा सकते हैं ।" साधु ने पूछा वह कौन सी शिक्षा थी जिस से तुम लोगों का पैसा बच गया । ग्वालिन ने उस वचन की साधु को याद दिलाई

और उन्हों ने एक बार कहे थे कि भगवान का नाम एक जहाज़ है जो हमें भवसागर के पार उतारता है । साधु ने कहा, बिलकुल ठीक है, बहुत ठीक है, मैं भी उस पर अमल करूँगा । अन्य साथी भी थे । ( चले न जाओ, अब कथा का दिलचस्प भाग आता है ) । एक बड़ा लम्बा रस्सा था । उस ने वह रस्सी अपनी कमर में बांध ली, और रस्सी का बाक़ी हिस्सा साथियों से अपने पास रखने को कहा, और कहा कि परमेश्वर का नाम लेकर मैं नदी में फांदता हूँ और विश्वास पर नदी के पार जाने का साहस करूँगा, किन्तु देखना कि मैं यदि डूबा जाने लगूँ, तो मुझे घसीट लेना । महात्मा नदी में कूद पड़ा, कुछ पग आगे बढ़ने पर वह डूबने लगा । साथियों ने उसे बाहर निकाल लिया । अब तनिक ध्यान दीजिये । इस प्रकार की श्रद्धा जैसी पंडित में थी, यह श्रद्धा जैसा विश्वास उत्पन्न करती है, वह रत्ता का बीज नहीं है । तुम्हारे दिलों में यह कुटिलता है । अब आप ॐ उच्चारना शुरू करते हैं या परमेश्वर का नाम लेते हैं और कहते हैं, "मैं स्वास्थ्य हूँ, स्वास्थ्य," पर अपने हृदयों के हृदय में आप कांपते हैं, आप के हृदयों के हृदय में वह छोटा कांपता, लरजता "अगर" मौजूद रहता है कि "अगर मैं डूबने लगूँ तो मुझे बाहर निकाल लेना" — आप में वह चुद्र हिचकिचा "अगर" है । तुम्हारे चित्त में शैतान मौजूद है, यहां कोई अनुमानिक मामला नहीं हैं । यह एक तथ्य है कि सारे भेद, इस संसार की सब पारिस्थि- तियां मेरी सृष्टि हैं, और मेरी करतून हैं, और कोई चीज़ नहीं हैं । तुम परमेश्वर हो, प्रभुओं के प्रभु हो । इसे आप समझो । इसी क्षण इसे अनुभव करो । दृढ़, अचल विश्वास रक्खो · ज्ञान, व्यावहारिक ज्ञान को प्राप्त करो । आप देखेंगे

कि इस पत्र को आज बताये गये ढंग से नित्य पढ़ने से आप को बांधने वाले सब "अगर-मगर" दूर होजाँयगे । अपनी परमेश्वरता से निरन्तर अपने आप का लगाव रखने से तुच्छ 'यदि' से छुटकारा हो जायगा । यदि पाँच बार नहीं, तो कम से कम नित्य दो दफे इस काग़ज़ को पढ़ो, और आप के सब चुद्र 'अगर' निकाल दिये जाँयगे ।

राम अब व्याख्यान बन्द करता है, और आप में से जो लोग कुछ सामाजिक बातचीत राम से करना चाहते हैं वे, यह आसन छोड़ चुकने के बाद, ऐसा कर सकते हैं । यह आसन ॐ, ॐ, ॐ, उच्चारने के बाद छोड़ूँगा ।

एक शब्द और । आप में से जिन लोगों ने ये व्याख्यान नहीं सुने हैं, और इस लिये उस ( राम ) के व्याख्यान को नहीं समझ सके हैं, वे इस सम्पूर्ण वेदान्तिक तत्वज्ञान को पुस्तक के रूप में अत्यन्त दार्शनिक ढंग से प्रकाशित पावेंगे । सम्पूर्ण वेदान्त-दर्शन आप के सामने पेश किया जायगा । तथा एक शब्द और भी । जितने संदेह वेदान्त दर्शन के संबंध में आप के मन में हैं, और आप में जितनी आशंकाएँ हैं, वही सब संदेह और संशय एक समय में स्वयं राम के रहे हैं । आप के अनुभव और आपके सन्देह स्वयं राम के संदेह हैं । राम इन रास्तों में से होकर निकल चुका है, और आप को विश्वास दिलाया जाता है कि हमारे सब सन्देह अंधा अज्ञान हैं । ये सब सन्देह चंचल स्थायी हैं, वे एक पल में उड़ सकते हैं । यदि आप में से कोई अपने सन्देहों के संबंध में राम से विशेष वार्तालाप करना चाहता है, तो वह कर सकता है ।

पुनः यह कह दिया जाय कि यदि आप आपत्ति से टनाछू चाहते हैं, पूर्ण आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं, अपनी

मुक्ति को फिर पाना चाहते हैं, आत्मानुभव को प्राप्त करना चाहते हैं, तो आप को वेदान्त का अनुभव होना चाहिये । अन्य कोई मार्ग नहीं है । आप के सब मत, आप के सब सिद्धान्त, आपके सब अनुभव, केवल वेदान्त को पहुँचाते हैं । वे केवल परम सत्य के पथ-दर्शक हैं । ये आशाजनक लक्षण हैं, बहुत अच्छे चिन्ह हैं कि हाल में अमेरिका में जिन सम्प्रदायों का श्रीगणेश हुआ है उनमें से अत्याधिक वेदान्त को सम्मिलित और ग्रहण कर रहे हैं । वे उसे ( वेदान्त को ) अपने में ले रहे हैं । उन्हें इस का ऋण स्वीकार करने की ज़रूरत नहीं है । ईसाई-विज्ञान, नवीन- विचार, आध्यात्मिकता या दैवी-विज्ञान, इत्यादि, — ये लोग, जो हमें ग्रहण कर रहे हैं, परमेश्वर हैं । अमेरिका के लिये ये अति आशापूर्ण चिन्ह है । किन्तु राम आप से कहता है कि यदि आप सत्य को उसके पूर्ण प्रताप और सौन्दर्य के साथ प्राप्त करना चाहते हैं, तो वेदान्त मौजूद है । आप इसका चाहे जो नाम रख लें, किन्तु इन हिन्दू धर्मग्रन्थों में वे ( ऋषि ) इसे अति सुस्पष्ट और स्वच्छ भाषामें उपस्थित करते हैं । यह सर्वश्रेष्ठ सत्य है कि तुम परमेश्वर हो, प्रभुओं के प्रभु हो । यह समझो, यह अनुभव करो, और फिर तुम्हें कोई भी हानि नहीं पहुँचा सकता, तुम्हें कोई भी चोट नहीं पहुँचा सकता तुम प्रभुओं के प्रभु हो । दुनिया मेरा संकल्प है, मैं प्रभुओं का प्रभु हूँ । यह है सत्य । यदि आप ऐसी बातें सुनने के अभ्यासी नहीं हैं, तो ख़ौफ न खाइये । यदि आप के जनकों का इसमें विश्वास नहीं था, तो क्या हुआ ! आप के जनकों ने अपनी पूर्ण शक्ति से काम लिया, आप को अपनी पूर्ण शक्ति को काम में लाना चाहिये । आप की मुक्ति, आप के जनकों का उद्धार आप का अपना काम

है । वेदान्त को ग़ैर न समझो । नहीं, ये आप के लिये प्राकृतिक है । क्या आप की निजी आत्मा आप के लिये ग़ैर है ? वेदान्त आपको केवल आपकी आत्मा और स्वरूप के संबंध में बताता है । यह तब ग़ैर हो सकता था जब आप का अपना ही आत्मा आप के लिये ग़ैर होता । सब आप का अपना ही आत्मा आप के लिये ग़ैर होता । सब पीड़ा-शारीरिक, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक — वेदान्त का अनुभव करने से तुरन्त रुक जाती हैं, और अनुभव कठिन काम नहीं है ।