सोहम् ।
10 जून 1903 को दिया व्याख्यान ।
एक बड़ा ही उपयोगी मंत्र है जिससे हरेक की धनिष्ठता होनी चाहिये । वह है सोहम् । अंग्रेज़ी भाषा में 'सो' का अर्थ है ऐसा, किन्तु संस्कृत भाषा में 'सो' का अर्थ है 'वह', और 'वह' का अर्थ सदा परमेश्वर या परमात्मा है । इस तरह 'सो' शब्द का अर्थ परमेश्वर है । भारत में स्त्री अपने पति का नाम कभी नहीं लेती । उसके लिये दुनिया में केवल एक पुरुष है, और वह ( एक पुरुष ) उसका पति है । वह ( स्त्री ) सदा उसे "वह" कहती है, मानो समग्र विश्व में कोई और मौजूद ही नहीं है । फलतः उसके लिये 'वह' सदा परमेश्वर है, और परमेश्वर सदा उसके विचारों में है । इसी तरह वेदान्ती के लिये 'सो' शब्द का अर्थ सदा परमेश्वर या परमात्मा है । मेरा स्वरूप केवल एक सत्य मात्र है, यह विचार निरन्तर चित्त में रहना चाहिये ।
हम् ( Ham ) का अर्थ फ़ारसी भाषा में 'मैं' है । एच को निकाल दो और वहां आई ( i ) को बैठा दो, और हमें सो- एम-आई ( So-am-I ) 'वह मैं हूँ' की प्राप्ति हो जाती है । परमेश्वर मैं हूँ, परमात्मा में हूँ, और परमेश्वर सदा मेरे द्वारा बोल रहा है, क्योंकि वही वह तो है ही । ॐ भी इसमें शामिल है । एस और एच ( S and H ) को निकाल दो, हमें ॐ मिलता है । सोहम् श्वास से आने वाली स्वाभाविक ध्वनि है, और ( इस ) शब्द की पूर्ण महिमा हर समय निर-
न्तर हमारे मनों में रहनी चाहिये । श्वास को ताके रहो और इस मंत्र सोहम् के द्वारा उसे सुरीली बनाओ । यह एक मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक व्यायाम है । सांस लेने में दो क्रियाओं का समावेश है, भीतर जाना और बाहर निकलना, सांस लेना और सांस निकालना । भीतर सांस लेते समय 'सो' कहा जाता है और बाहर सांस निकालते समय 'हम' कहा जाता है । कभी कभी प्रारम्भ करने वाले को ॐ की अपेक्षा 'सोहम्' जपना ( उच्चारना ) बहुत सहज पड़ता है । यह दोनों को आलिंगन करता है । जब ज़ोर ज़ोर से न उच्चार रहे हो, तब इस पर विचार करो, भीतर ही भीतर और चित से इस पर मनन करो, किन्तु इस सारे समय बिलकुल स्वाभाविक रीति पर सांस लेते रहो । यह सच्चे प्रकार की आत्म-सूचना है जो मनुष्य को इन्द्रियों के सम्मोहन से हटा कर परमेश्वरता में लौटा ले जाती है । वह हूँ मैं । विश्व में हर समय तालबध गति हो रही है । संस्कृत में उस शब्द का अर्थ सूर्य भी है । सूर्य हूँ मैं । मैं प्रकाश का दाता हूँ, मैं लेता कुछ नहीं हूँ, पर देता सब हूँ । मैं दाता हूँ और लेने वाला नहीं हूँ । मान लीजिये कि हम दूसरों से बहुत ही रूखी चिठ्ठियों और डाही पुरुषों की कठोर आलोचनाओं के पाने वाले हैं । तो क्या इससे हमें रंजीदा और हैरान तथा परेशान होना चाहिये, नहीं । अपनी में क्षोभ रहित चैन से रहो । जो आप को सब से अधिक हानि पहुँचाने की कोशिश कर रहे हैं उनका पूर्ण और प्रेममय चिन्तन करो । वे तुम्हारे अपने स्वरूप हैं, और अपने निजी स्वरूप के लिये तुम केवल अच्छे विचार रख सकते हो । मैं सूर्यों का सूर्य हूँ । प्रकाश, प्रताप, शक्ति में हूँ । मुझे कौन हानि पहुँचाने वाला है ? मेरा स्वरूप
( आत्मा ) मेरे स्वरूप ( आत्मा ) को हानि नही पहुँचा सकता । असम्भव है । दूसरों की चुद्र मिथ्या सम्मतियों से ऊपर उठो परमेश्वर को सदा अपने द्वारा बोलने, सोचने और कार्य करने दो । अपनी परमेश्वरता में शान्ति से चैन करो । मैं सूर्य हूँ, दुनिया को प्रकाश का दाता हूँ ।
पूर्ण शक्ति अनुभव करो । आप देखते हैं कि हमारी सब कठिनाइयों का कारण अहं, देश से परिमित अपने चुद्र अहं, की चाहना है । यही विचार है, जो हमें दुर्बल करता और मार डालता है । इस रोग को दूर करने के लिये किसी व्यक्ति या हरेक व्यक्ति को स्वभावतः एक कमरे में बैठ जाना होता है और वहां रोना या विलपना, अपनी छाती पीटना, और यह कहना होता है "निकल शैतान निकल, निकल शैतान निकल ।" अपने को ऐसी हालत में लाओ कि मानो यह देह आपकी कभी पैदा ही नहीं हुई थी । तुम तो परमेश्वर हो, तुम यह ( देह ) नहीं हो । यदि तुम अपने आप को देश काल के अन्दर क़ैद रखते हो, तो दूसरे लोगों के विचार और दूसरे मनुष्यों की तरकीबें तुम्हें तंग करेंगी । यह देह जिसे तुम संबोधन कर रहे हैं एक व्यामोह ( hallucination ) है । मैं परमेश्वर हूँ । क्या तुम इस पर ध्यान देते हो ? मिथ्या सम्मतियों की श्रद्धा वास्तविकता में अधिक विश्वास करो, परमेश्वरता तुम हो । बुरे विचारों और प्रलोभनों को तुम्हारी पवित्र उपस्थिति में आने का कोई हक़ नहीं है । क्या अधिकार है उन्हें तुम्हारी मौजूदगी में प्रकट होने का ? पवित्र पुनीत तुम हो, यह अनुभव करो । रोग फिर कहां है ? किसी से कोई आशा न करो, किसी से न डरो, अपने को कोई उत्तरदायित्व न समझो । कर्तव्य में बंध कर अपने
काम को न करो । कर्तव्य क्या है ? कर्तव्य आपकी अपनी रचना है । श्रेष्ठ राजकुमार की भांति अपना काम करो । हरेक चीज़ तुम्हारे लिये खेल की सी चीज़ होना चाहिये । अपने सामने का काम प्रसन्नता से, स्वच्छन्दता से करो ।
रोग दो प्रकार के हैं । भारतीय भाषा में हम उन्हें आध्यात्मिक ( भीतरी ) रोग और आधिभौतिक ( बाहरी ) रोग कहते हैं । इसका शब्दार्थ है शैतानी ( विकट आधिभौ- तिक ) रोग और दैवी ( काल्पनिक, आध्यात्मिक ) रोग, पहलवान रोग और नारी रोग । इसका क्या अर्थ है ? अरे, काल्पनिक रोग या नारी रोग वह है जो हमारे भीतर से उठता है । हमारे भीतर की इच्छाएँ, हमारी आकांक्षाएँ, हमारे अनुराग, हमारी लालसाएँ मायिक या नारी रोग हैं । और पहलवान रोग या यथार्थ रोग वह हैं जो दूसरे के कार्यों या प्रभावों से हमें होते हैं । अच्छा, किसी मनुष्य को निरोग कैसे किया जाय ? लोग कहते हैं, पुरुषरोग जिसे आधिभौतिक रोग, दानव रोग, या बाहरी रोग कहते हैं, उसके संबंध में अपने आप को परेशान मत करो । जिस क्षण आप अपने आप को अपनी निर्बलकारिणी इच्छाओं से, जिस क्षण आप अपना पिंड उनसे छुड़ाते हैं, उसी क्षण तुरन्त बाहरी रोग आपको छोड़ देंगे । किन्तु इस दुनिया में लोग एक भूल करते हैं, वे अपने निजी काम को नहीं देखते । वे कठिनता के उस भाग पर नहीं ध्यान देते, जिस की सृष्टि इन्हीं की इच्छाओं से होती है । वे पहले बाहरी भयों से लड़ना शुरू करते हैं, अतः वे गलत जगह से शुरू करते हैं, वे पहले परिस्थितियों से लड़ना चाहते हैं । वे नररोग को जो रोग दूसरों के प्रभाव द्वारा आता है, हटाना चाहते हैं ।
वेदान्त कहता है कि आप की इच्छायें आप की कमज़ोरियां हैं अन्य हरेक बात का निर्णय आप के लिये कर दिया जायगा । यह आप में नारी भाग है । यही बाहरी प्रभावों को आकां- षित करता है । जैसे कि एक कुत्ते के मुँह में जब मांस का एक टुकड़ा होता है, तब दूसरे कुत्ते आकर उसके लिये रार ठानते हैं । जब आप अपनी कमज़ोरी या नारीरोग से छूट जायेंगे, तब नररोग आप को तुरन्त छोड़ देगा । इस नारी या मायिक रोग की प्रकृति की और व्याख्या की जानी चाहिये । यह कोई व्यक्ति है । यदि वह पूर्णतया शुद्ध है, यदि वह सब प्रलोभनों से अपने को पूर्णतया परे और अपने अन्तर्गत परमेश्वरता का अनुभव कर सकता है, तथा यह कहने को तैयार है "शैतान मेरे पीछे जा, मैं तुझ से कोई वास्ता नहीं रख सकता," तो राम उससे एक बात कहता है । उस मनुष्य को इस दुनिया में किसी भी व्यक्ति की इच्छाएँ, किसी के भी विचार, इस दुनिया के किसी भी व्यक्ति की बुराइयां या प्रलोभन कोई हानि नहीं पहुँचा सकते । कोई भी शक्ति उसे तंग या तनिक भी नीचा नहीं दिखा सकती, क्योंकि वह आप खुद आसुरी या नररोग से मुक्त हो चुका है । जिस क्षण हम अपने को दुर्बल बनाते हैं और शारीरिक भोगों की इच्छा आरम्भ करते हैं, तब क्या होता है ? सब शत्रुओं के बुरे विचार हम या उस प्रलोभन का रूप धारण करते और हमें भक्षण करते हैं । यदि आप शांति और पूर्ण आनन्द भोगना चाहते हैं, यदि आप अपनी परमेश्वरता को प्राप्त करना चाहते हैं, तो नीचस्थ प्रकृति की मृत्यु अवश्य होना चाहिये । इस मृत्यु में जीवन है, इस मृत्यु में जीवन है, इस मृत्यु में जीवन है । अब यहां अपने आपको परमेश्वर समझो । भारतवर्ष जब तक आप न पहुँचें, तब तक के लिये
अपनी परमेश्वरता अनुभव करने को स्थगित न कीजिये । अपने को स्वाधीन कीजिये, और इस काम को करते समय ठंडे दिमाग से, धीर, निर्भय वृति से, काम लीजिये ।
मैं कोई इच्छा नहीं करता । मुझे कोई आवश्यकता, कोई भय, कोई आशा, कोई उत्तरदायित्व नहीं हैं ।
रेशमी धागा । 4 + 6 10
यह चक्र अ एक चरखी है, और इस चरखी पर एक बड़ा सुन्दर रेशमी तागा लटका है, और इस रेशमी तागे के सिरों में दो वाट बंधे है, जिसमें से एक 10 सेर और दूसरा 6 सेर का है । अब इस 6 सेर के वाट ( छोटे वाट ) में हम दूसरा 4 सेर का वाट जोड़ते हैं । 6 सेर में चार सेर जोड़ने से दस होते हैं । सो अब एक तरफ दस सेर और दूसरी ओर भी दस सेर हो गये । दोनों पलले बराबर । वे
बिलकुल नहीं हिलेंगे । अच्छा, अब मान लीजिये कि हम ने चार सेर का वाट हटा लिया और तब एक ओर 10 सेर और दूसरी ओर 6 सेर रह गये । वाट बराबर नहीं हैं । नतीजा क्या होगा ? 10 सेर का नीचे चला जायगा, और 6 सेर का ऊपर उठेगा । एक पल के बाद हम यह चार सेर का वाट 6 सेर के वाट में जोड़ देते हैं । फिर हम दोनों बोझ दोनों तरफ समान कर देते हैं । तब क्या परिणाम होगा ? बहुत से लोग बयान करते हैं कि पलड़े बराबर सध जायेंगे, किन्तु बात ऐसी नहीं है, वे डोलते रहेंगे । पहली दृष्टि से ऐसा जान पड़ता है कि बोझों के बराबर हो जाने के एक पल के ही बाद गति भी समान हो जायगी । जब राम ने इस विषय पर विश्वविद्यालय में व्याख्यान दिया, तब सब विद्यार्थी कहने लग पड़े कि गति रुक जायगी, किन्तु जब उन्हें प्रयोग दिखाया या समझाया गया, तब उनकी आँखें खुलीं । जब वाट बराबर कर दिये गये, तब भी पलड़े हिलते डुलते रहे, रुके नहीं । इस तरह प्रारम्भ में हम समझते हैं कि यदि वाट बराबर कर दिये जायँगे तो वह ठहर जायँगे, मौलिक शान्ति क़ायम हो जायगी । एक बार जब गति शुरू हो जाती है, तब फिर दोनों ओर बोझ बराबर कर देने पर भी हिलना-डोलना रोका नहीं जा सकता । यदि हम 6 सेर और 10 सेर के वाटों को दो पल तक दो तरफ काम करने दें और दो पल के बाद हम चार सेर का वाट फिर बढ़ा दें, तो दोनों तरफ वाट बराबर हो जाने पर भी गति संधगी नहीं, रुकेगी नहीं । इसी तरह यदि तीन पल के बाद हम बोझ बराबर करें, तो भी गति रुकेगी नहीं । पहले पत्र के अन्त में हमें एक अन्तर दिखाई देता है, बोझों की तेज़ी या चाल प्रति पल 4 फुट अवश्य होगी ।
यदि असमान वाट एक पल हिलते रहते हैं तो परिणामभूत शीघ्रगति 4 फुट होती है, और यदि असमानता दो पल तक बनी रहे तो परिणामभूत तीव्रगति 8 फुट होगी । यदि असमान वाटों को निरन्तर तीन पल तक काम करने दिया जाय, तो तीव्रगति 12 फुट होगी, और 4 पल के अन्त में वह 16 फुट होगी, इत्यादि । हम देखते हैं कि यदि वाट असमान रक्खे जाते हैं, तो परिणाम यह होता है कि हरेक पल के अन्त में गति की तीव्रता में अन्तर पड़ जाता है, गति की मौलिक तीव्रता ( original velocity ) में 4 फुट का योग होता जाता है । इस तरह गति अपनी 4 फुट की तरक़्क़ी प्रति पल पाती ही जाती है । जो तीव्रगति अब तक प्राप्त हो चुकी है वह वही बनी रहती है । हम देखते हैं कि यदि वाट शुरू में, गति आरम्भ होने के पूर्व, बराबर कर दिये जाते हैं, तो वाट बराबर होने के कारण स्थिरता बनी रहती है । यदि वाट 4 फुट की तेज़ चाल चल चुकने के बाद समान किये जाते हैं, तो वाटों की की तेज़ी में अधिक वृद्धि होने से रोक देगी, और यदि दूसरे पल के अन्त में वाट बराबर किये जाते हैं, तो परिणाम यह होगा कि हाथ लगी चाल 8 फुट होगी और इस तीव्रगति में और तरक़्क़ी न होगी, और तीसरे पल के अन्त में लब्ध तीव्रगति 12 फुट होगी, तथा आर आगे वृद्धि चाल में न होगी । पहले पल के अन्त में तेज़ी की तरक़्क़ी वेग-वृद्धि ( acceleration ) कहलाती है । किन्तु यहां हम एक दूसरी ही बात देखते हैं । जब दोनों ओर वाट समान कर दिये जाते हैं, तब तनुओं पर प्रभाव डालने को कोई शक्ति नहीं रह जाती । यदि तनुओं पर कोई शक्ति प्रभाव न डालती हो, तो विश्राम या प्रगति की अवस्था में कोई परि- वर्तन नहीं उत्पन्न किया जा सकता । विश्राम या प्रगति
( हरकत ) में कोई परिवर्तन नहीं पैदा होता है । यदि वहां मौलिक स्थिरता है और हम शक्ति एक ओर 10 सेर तथा दूसरी ओर 10 सेर कर देते हैं, और यदि वाटों में एक पल भर प्रगति रही है और तब वाट बराबर किये गये हैं, तो इस क़ानून के अनुसार शुरू प्राप्त प्रगति बनी रहेगी । इस से मौलिक स्थिरता या पहिले से प्राप्त वेग रुकता नहीं है, किन्तु वाटों की समानता वेग में आगे को परिवर्तन न होने देगी । इस तरह यदि दूसरे पल के अन्त में हम वाट समान कर देते हैं, तो पहिले से प्राप्त वेग वही बना रहेगा । इसी तरह तीसरे पल के अन्त में वाटों की समानता पहिले से प्राप्त 12 फुट की तीव्रगति के वेग में और कोई परिवर्तन न होने देगी ।
अब हम आत्मानुभवी मनुष्य के मामले पर आते हैं । आत्मानुभव दोनों ओर वाटों की बराबरी मात्र है । आत्मा- नुभव बोझों को बराबर करता है, आप के अन्दर से असमा- नता को निकाल लेता है । वह ( आत्मानुभव ) आप को बाहरी परिस्थितियों से मुक्त करता है । वह आप को हवाओं और तूफ़ानों की करुणा की अधीनता से छुटाता है । आत्मानुभव आप को बाहरी प्रभावों से बचाता है । वह आप को अपने बल पर खड़ा करता है । यह हो जाने पर आगे के लिये सब वेगवृद्धि रुक जाती है, किन्तु पहिले की प्राप्त तीव्रगति वहां बनी रहती है । पहिले से प्राप्त गति को हम जड़ता या पूर्व अभ्यास कहते हैं । वह वहां बना रहता है । वह अपनी राह आप लेवेगा । हम देखते हैं कि यह आत्मानुभव कुछ लोगों को हुआ था, जिनमें पहिले से प्राप्त वेग बहुत ही कम था, किन्तु उनके शरारों के द्वारा महान् कार्य नहीं हुए थे ।
किन्तु दूसरे लोग हैं जिनकी पहिले से प्राप्त की हुई गति। की तीव्रता अद्भुत, आश्चर्यजनक है। वे स्वच्छन्द हैं किन्तु उनके शरीरों की प्रगति जारी रहेगी। उनके शरीर विलक्षण कार्य करते रहेंगे, महान और उत्कृष्ट कार्य आत्मानुभव का दूसरा नाम है।
डाक्टर एनथोनी (Dr Anthony) का दिया हुआ वाक्य है। "Pleasures wrapped up in duties' garments."*
"सुख कर्तव्यों के वस्त्रों में लिपटे हुए हैं।"
अपनी परमेश्वरता को अनुभव करो, और फिर हरेक बात पूर्ण है।
वा समष्टिवाद (SOCIALISM)
सब से पहले नाम समष्टिवाद (Socialism) के संबंध में, राम उसे व्यक्ति स्वातंत्र्य वाद (Individualism) कहना पसन्द करेगा। समष्टिवाद का शब्द समाज के शासन की कल्पना को प्रमुखता देता है, किन्तु राम कहता है कि सत्य का यथार्थ तत्व तो सारी दुनिया, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के भी विरुद्ध व्यक्ति स्वातंत्रता की श्रेष्ठता को निरूपण करने के लिये है। तब तो कोई हैरानी, कोई चिन्ता नहीं है। इसी को राम व्यक्ति-स्वातंत्र्यवाद कहता है, लोगों की यदि इच्छा है तो उन्हें इसे साम्यवाद व समष्टिवाद कहने दीजिये। पर व्यक्ति के स्थिति-बिन्दु से यह वेदान्त की शिक्षा है।
पुनः हम देखते हैं कि जिसे (साम्यवाद socialism) कहते हैं उसका लक्ष्य केवल पूँजीवाद को परास्त करना है। और यहां तक वह वेदान्त के लक्ष्य से एक है, जो कि आप को केवल स्वामित्व के सम्पूर्ण भाव से रहित कर देना चाहता है, और सम्पत्ति का सम्पूर्ण भाव तथा सम्पूर्ण रूप से स्वार्थपूर्ण अधिकार को हवा में उड़ा देना चाहता है। यह है वेदान्त और यह है साम्यवाद। लक्ष्य एक हैं।
वेदान्त समता की शिक्षा देता है, और यही परिणाम व अन्त अवश्य सच्चे साम्यवाद का है, अर्थात् उस के हां भी
किन्हीं बाहरी मिलकियतों के लिये न कोई सन्मान है, न कोई आदर, और न कोई इज़्ज़त है। यह बहुत ही विकट और बड़ी ही कठोर सी बात जान पड़ती है, किन्तु तब तक पृथिवी पर कोई सुख नहीं हो सकता, जब तक मनुष्य सम्पत्ति और अधिकारों, मोह और आसक्ति के सम्पूर्ण भाव को नहीं त्याग देता। परन्तु साम्यवाद केवल यह चाहता है कि मनुष्य इस सब को त्याग दे, और वेदान्त इस के साथ 1 ऐसा करने के लिये एक महान कारण भी प्रदान करता है। नामधारी साम्यवाद तो वस्तुओं के केवल ऊपरी तल (बाह्य रूप) का ही अध्ययन मात्र है, और इस परिणाम पर पहुँचता है कि मानव जाति को समता, बन्धुत्व और प्रेम जीवन के व्यवहार पर जीवन बिताना चाहिये। वेदान्त इस व्यापार का अध्ययन स्वदेशी (स्वाभाविक) दृष्टिकोण से करता है। उस (वेदान्त) के अनुसार किसी व्यक्तिगत सम्पत्ति का अधिकार अपनी आत्मा या आन्तरिक स्वरूप के विरुद्ध अत्यन्त पापाचार है। वेदान्त के अनुसार मनुष्य का एक मात्र अधिकार केवल अर्पण करना है, और लेना वा मांगना नहीं है। यदि तुम्हारे पास देने को और कुछ नहीं है, तो अपनी देह कीड़ों के खाने के लिये दे दो। जो कुछ तुम अपने पास रखते हो वह कुछ भी नहीं है, उस के लिये तुम्हें कोई भी धनी पुरुष नहीं कहता। जो कुछ तुम दे डालते हो उस से तुम अमीर हो। हरेक व्यक्ति किसी वस्तु का अधि- कारी बनने के लिये नहीं, किन्तु हरेक वस्तु को दे डालने के लिये काम करता है। दुनिया सब से बड़ी भूल यह करती है कि वह लेने पर सुख का भाव करती है। वेदान्त चाहता है कि आप इस सत्य को पहचानें वा अनुभव करें कि सर्व सुख देने में है और लेने वा मांगने में नहीं है।
जिस क्षण तुम मांगने या भिक्षा की वृत्ति को प्रवेश करने देते हो, उसी क्षण तुम अपने आप को संकीर्ण या संकुचित कर लेते हो और जो कुछ तुम्हारे अन्दर आनन्द होता है उसे तुम बाहर निचोड़ देते हो। जहां कहीं आप हों, दाता की स्थिति में काम करें और भिखारी की स्थिति में कदापि नहीं, ताकि आप का काम विश्वव्यापी काम हो, और तनिक भी निजी न हो।
भारत के वेदान्तवादी साधु आज भी यह साम्यवादी जीवन हिमालय पर व्यतीत कर रहे हैं, और ऐतिहासिक काल के पूर्व से ही ऐसा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे बड़ी सख्त मेहनत करते हैं, वे निठल्ले नहीं हैं, वे आरामतलब और विलासी मनुष्य नहीं हैं, क्योंकि उन्हीं के प्रयत्नों से भारत के सम्पूर्ण महान साहित्य की उत्पत्ति हुई है। यही लोग सर्व श्रेष्ठ कवि, नाटककार, वैज्ञानिक, तत्वज्ञानी, वैया- करणी, गणितज्ञ, ज्योतिर्विद्, आयुर्वेदज्ञ हुए हैं, और तथापि यही वे लोग हैं जिन्हों ने रुपया कभी नहीं छुआ। यही वे लोग हैं जिन्हों ने यथासाध्य कठोरतम जीवन व्यतीत किया। इस से साम्यवाद पर लगाया जाने वाला ऐसा कलंक धुल जाता है कि वह लोगों को कायर, आलसी, और पराश्रयी बना देगा। केवल वही खूब काम कर सकता है जो अपने को स्वच्छन्द समझता है।
वेदान्त और साम्यवाद के भी अनुसार आप को अपने बच्चों, स्त्री, घर या किसी वस्तु पर अधिकार जमाने का कोई हक नहीं है।
सभ्य समाज के ललाट पर यह बड़ा कलंक का टीका है कि नारी एक वाणिज्य की वस्तु बनाई गई है और मनुष्य
उसी अर्थ में उस पर अपना अधिकार जमाता या उसे काबू रखता है, जैसे वृक्ष, घर या रुपया उसका अपना होता है। इस प्रकार सभ्य समाज में नारी को अचेतन पदार्थ की स्थिति दी गई है, तथा नारी के हाथ पैर बंधे रक्खे जाते हैं जबकि मनुष्य अपने मार्गों वा ढंगों में स्वतंत्र है। वह अभी एक मनुष्य की सम्पत्ति हो जाती है, फिर दूसरे मनुष्य की। साम्यवाद के और वेदान्त के भी अनुसार यह अति विचित्र जान पड़ता है किन्तु नारी को अपनी स्वाधीनता उसी तरह पहचानना चाहिये जिस तरह मनुष्य पहचानता है। वह उतनी ही स्वाधीन है जितना कि मनुष्य है। फिर यदि मनुष्य को कोई वस्तु अपने अधिकार में न रखना चाहिये तो नारी को भी किसी वस्तु पर अधिकार न जमाना चाहिये, अपना आनन्द स्थिर रखने के लिये उसे भी अपने पति पर अधिकार रखने का कोई हक न होगा। यहां पर साम्यवाद के विरुद्ध एक गंभीर आपत्ति उठती है। यदि साम्यवाद नर और नारी को पूर्ण स्वाधीनता दे दे, तो वह समाज को पशुत्व की अवस्था में ले आवेगा, और लम्पटों, दुराचारियों की दुनिया बना देगा। राम कहता है कि नर और नारी के लिये नारी पुरुष के संबंध के दृष्टिविन्दु से इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। गौ और भैंस जैसे पशु अपने कामव्यवहार में बड़े ही बुद्धिगत हैं, अपने वर्ताव में बड़े ही मृदु () और युक्ति संगत हैं। यदि मनुष्य भी उसी ढंग से बर्ताव करे, तो सभ्य समाज की सब कामुकता और विकार (lust and passion) का अन्त हो जाय।
आश्चर्यों का आश्चर्य। कामासक्त पुरुष को पशु कह कर मनुष्य कैसी भयंकर भूल करता है, क्योंकि पशु निस्-
देह मनुष्य से कम कामासक्त हैं। उनमें अनुचित काम- विकार का कोई चिन्ह नहीं है। जब उन्हें सन्तानोत्पति करना होती है, तभी वे मैथुन करते हैं। मनुष्य का यह हाल नहीं है। जो मनुष्य शान्त और धीर वा अमत्त है वह कामी मनुष्य की अपेक्षा अधिक पशुओं का स्वाभाविक जीवन व्यतीत करता है। किसी कामासक्त मनुष्य को पशु नहीं कहना चाहिये, वह तो सभ्य मनुष्य है। यह तो सभ्यता की विशेषता है, न कि समाज की असभ्य अवस्था की। वे (असभ्य लोग) तो स्वाभाविक और बुद्धि संगत हैं। उनका हरेक कार्य ऋतु में और नियत समय पर होता है। वेदान्त के अनुसार और साम्यवाद के अनुसार जितनी अधिक अमत्तता (Sobriety) और प्रकृति की अधिक शान्त अवस्था की प्राप्ति होगी, उतनी इस विकलकारी विकार (passion) की कमी होगी, किन्तु साथ ही साथ पति या स्त्री और पिता या पुत्र का सा स्वत्वाधिकार वाला भाव भी कोई न होगा।
"इस बच्चे या इस स्त्री अथवा इस बहन की फिक्र हमें करना है," इस भावना का निरन्तर बोझ मनुष्य को अपने अध्ययन या अपनी परमेश्वरता को अनुभव करने में नहीं लगा रहने देता। साम्यवाद या वेदान्त तुम्हारी छाती से यह बोझ हटा देना, तुम्हें स्वच्छन्द कर देना चाहता है। जब तुम अन्वेषण (तफतीश) के सागर में उतरते हो, तब तुम विजय पताका उड़ाते बाहर आते हो, और जब तुम अनुस- न्धान (research) की रंग भूमि में प्रवेश करते हो, तब तुम कृतकार्य निकलते हो, क्योंकि तुम स्वच्छन्दता से पाशमुक्त, किसी प्रकार के बंधनों या दिक्कतों से अबद्ध या अवाधित (अप्रतिहत) हो कर काम करते हो। हर समय तुम अपने को स्वच्छन्द समझते हो, क्योंकि तुम निश्चय पूर्वक विशाल
दुनिया अपना घर समझते हो।
हमें केवल इतना ही करना है कि लोग देख लें कि उन के रोगों और बीमारियों की एक मात्र दवा अधिकार जमाने की कल्पना को दूर कर देना है। एक बार इसे जनसमुदाय की भारी संख्या के समझ लेते ही साम्यवाद सारे संसार में वन-वहि की तरह फैलेगा। यही वेदान्त-साम्यवाद उन के रोगों की एक मात्र चिकित्सा (इलाज) है। एक बार जहां यह वेदान्त-साम्यवाद दुनिया में सुन लिया गया, तब वैकुंठ यहीं हो जायगा, और उलटी दृष्टि तथा आस-पास की परिस्थिति के परिच्छिन्न ज्ञान से उत्पन्न होनेवाली आपत्तियां गायब हो जायेंगी। इस साम्यवाद के तले बादशाहों, राष्ट्रपतियों, धर्माचायों की ज़रूरत नहीं है, सेनाओं की कोई आवश्यकता नहीं है। फिर विश्वविद्यालयों की कभी कोई ज़रूरत न पड़ेगी, क्योंकि हरेक मनुष्य अपना विश्वविद्यालय आप ही होगा। हम ऐसे पुस्तकालय रक्खेंगे जिन में हरेक मनुष्य आ कर पढ़ सकेगा। अध्यापक न होंगे, सिवाय छोटे बच्चों के लिये। डाक्टरों की ज़रूरत न पड़ेगी, क्योंकि वेदान्त के उपदेशानुसार प्राकृतिक जीवन व्यतीत करने से आप कभी बीमार नहीं पड़ सकते, आप को डाक्टर न चाहिये। लोग चाहे जो करेंगे, जहां जी चाहेगा घूमेंगे, अब की तरह अपने भाई का डर उन्हें न होगा, किन्तु भलाई करेंगे और वास्तव में हितकारी अध्ययनों, तत्वज्ञान और अध्यात्म के अनुसन्धानों में अपना रुपया लगावेंगे, एवं अपने देवत्व और परमेश्वरत्व का पूर्णतम अनुभव करते हुए उसे अपने आचरण (बर्ताव) में लायेंगे।