श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

आत्मानुभव के संकेत नं0 2

भाग 26 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 26 · अध्याय 8 / 10

आत्मानुभव के संकेत नं0 2

परमेश्वर अब कुछ दूसरे आकारों (रूपों) में निरूपण किया जाता है। विशाल, विशाल क्षीरसागर में, जो समग्र विश्व को व्यापे हुप है, एक सुन्दर रेंगता सर्प या शेषनाग (इस परमेश्वर का) कोमल बिछौना बनाता है और अपनी देह की गेड़ुआर्यां (तहें) मानो उस का एक गद्दा होती हैं। उसके सहस्र फन छत्र का काम दे रहे हैं। ऐसे सागर पर एक अत्यन्त सुन्दर, मनोहर देवी लेटी हुई है, जो उस परमेश्वर की पत्नी है। उसकी देह पारदर्शक है, नेत्र आधे खुले हैं और अधर मुसकराते हैं। वह उस परमेश्वर के चरण धीरे धीरे दबा रही है। यह सुन्दर मूर्ति एक सुन्दर, शोभायमान कमल पर बैठी हुई है, और उस पर बैठ दाब रही है, और देह मर्दन कर रही वा मुठ्ठियां भर रही है। दोनों के नेत्र मिल रहे हैं एक दूसरे के नेत्रों को देख रहे हैं। यह पत्नी क्या निरूपण करती है? वह ईश्वरत्व, बुद्धि, कल्याण, और आनन्द निरूपण करती है। वह उस परमेश्वर की अपनी महिमा है। इसका अर्थ यह हुआ कि मुक्तात्मा अपनी ही महिमा को हर समय देखा करता है, और वह आत्मा तब स्वतंत्र है जब कि दुनिया उसके लिये बिलकुल डूबा हुई होती है। और सम्बन्धों से परे, सब बन्धनों को तोड़ कर, उसे दुनिया से कोई प्रयोजन नहीं होता है।

सागर का अर्थ अनन्तता है। और यह सागर क्षीर

का क्यों कहा जाता है? दूध में तीन गुण हैं। वह प्रकाश है, फिर वह सफेद है जिसका अर्थ कल्याण है, वह बलदा- यक भी है, जिसका अर्थ शक्ति है। वह फलतः क्षीरसागर अनन्त प्रकाश, अनन्त कल्याण और अनन्त शक्ति का रूप है। इस में दो (नारायण लक्ष्मी) आराम करते हैं।

अब शेषनाग का क्या अर्थ है? शेष नाग का अर्थ है वह एक जो हरेक चीज़ के बाद बच रहता है। जब सांपिन अपने 100 सौ अंडे देती है, तब वह अपने ही दिये हुए अंडों को खाना शुरू करती है। हरेक वस्तु मर जाती है, केवल एक वस्तु रह जाती है। कल्याण, ज्ञान और शक्ति के सागर में एक अमर तत्व रहता है। दोनों अपनी ही महिमा में पूर्ण आनन्द, स्थिर और शान्त हैं। ॐ!

राम दो बातों पर आपका ध्यान विशेष रूप से खींचता है:-

1 - परिच्छिन्नात्मा का निषेध (अनंगीकार) 2 - शुद्धात्मा का असंदिग्ध निरूपण (अंगीकार)।

प्रथमः - वेदान्त के अनुसार उक्त निषेध पूर्ण विश्राम (उपशम), चैन, आराम, त्याग है। जब कभी तुम समय निकाल सको, पलंग पर या कुर्सी पर पड़ रहो, मानो वह बोझ या भार तुम कभी साथ नहीं ले जा रहे थे और उससे कोई मतलब नहीं था, तथा उससे तुम उतनेही अपरिचित थे जितने कि किसी से। कुछ देर तक देह को निर्जीव मुर्दे की तरह आराम करने दो, संकुचन या विचार पर किसी तरह का ज़ोर डाल कर सहारा न लो ताकि का तनाव न हो। देह का सब अनुराग और मोह त्याग हो। दिल को शरीर या किसी भी वस्तु की सारी

फ़िक्रों और चिन्ताओं से छुट्टी पा जाने दो। सब इच्छा या आकांक्षा को त्याग दो और उन का निषेध करो। यही है निषेध या निवृत्ति (relaxation)।

द्वितीयः- परमेश्वरता। ईश्वर की मर्ज़ी को ही अपनी मर्ज़ी बनाओ। चाहे सुख के लिये हो या दुख के लिये ईश्वरेच्छा का पालन करो, मानो वह तुम्हारी ही इच्छा है, और "आत्मानुभव" सम्बन्धी व्याख्यान में वर्णित विचारधारा के अनुसार अपने को शरीर और उसके अड़ोस पड़ोस, मन और उसके प्रवर्तक (motives), सफलता और भय का विचार, इन सब से ऊपर (पृथक) समझो; अपने आपको सर्वव्यापी, परम शक्ति, सूर्यों का सूर्य, कारणातीत नाम रूप संसार और समस्त महान लोकों, पूर्णानन्द तथा स्वाधीन राम से अभिन्न समझो। किसी सुर या सुरों में जो स्वभावतः और अनायास तुम्हारे ध्यान में आजांय, ॐ उच्चारो, प्रणव गाओ। ऐसा समझो कि "मैं पूर्ण आनन्द, आनन्द, आनन्द हूं"। इस तरह पर शिकायतों और रोगों के सब हेतु स्वतः आपके सामने से चले जांयगे। दुनिया और आपका आस- पास ठीक वैसे ही है जैसे आप उन्हें समझते हैं। दुनिया हृदय पर भारी न होने पाय। दिन और रात इस सत्य का ध्यान करो कि दुनिया का सम्पूर्ण लोकमत और समाज केवल मेरा ही संकल्प है और मैं ही असली शक्ति हूं, कि जिसकी सांस या छाया मात्र सारी दुनिया है। आप अपने लक्ष्य के शिखर पर क्यों नहीं पहुँचते? इसका कारण यह है कि आप अपने निकट पड़ोसी, परम शुद्ध स्वरूप की अपेक्षा दूसरों के चंचल, अस्थिर, और धुंधले निर्णय का अधिक आदर तथा सत्कार करते हो। राम कहता है अपने ही लिये जियो,

न कि दूसरों की सम्मत्तियों के लिये। स्वतंत्र हो। एक प्रभु, निज स्वरूप, अद्वितीय सच्चे पति, मालिक, अपने ही भीतरी परमेश्वर को प्रसन्न करने का यत्न करो। अनेक, सर्वसाधारण, बहुमत को आप किसी हालत में न सन्तुष्ट कर सकेंगे, और सहस्र-शिरधारी (पागल) जनता को संतुष्ट करने को आप किसी तरह भी बाध्य नहीं हैं। सर्वसाधारण का क्या तुमने कुछ देना है? लोगों के क्या तुम किसी तरह के ऋणी हो? नहीं, बिलकुल नहीं। तुम आप अपने विधाता हो। अपने आप के लिये गाओ, मानो अकेले तुम्हीं तुम हो, और कोई पास सुननेवाला नहीं है। जब तुम्हारा अपना आत्मा प्रसन्न है, तब जनता अवश्य संतुष्ट होगी। यही क़ानून है। दूसरों के लिये अस्वाभाविक जीवन जीने से क्या लाभ?

एक राजकुमार अपने बचपन में दरबारियों के बच्चों के साथ लुक्कन छिप्पन (hide & seek) खेल रहा था। उसे लड़कों को ढूँढ़ने में बड़ा भंभट करना पड़ा। पास खड़े एक मनुष्य ने कहा, "संगी खिलाड़ियों को ढूँढ़ने में इतना भंभट करने से क्या फ़ायदा जब कि एक क्षण में वे जमा किये जा सकते हैं यदि आप उन्हें आज्ञा देने में अपनी शाही सत्ता से काम लें"? ऐसे सवाल का जवाब यह है कि उस हालत में खेल का मज़ा जाता रहेगा। खेल में कोई आनन्द न रह जायगा। ठीक इसी तरह, राम के अनुसार, वास्तव में तुम सर्वश्रेष्ठ शासक और सब के जानेवाले सर्वज्ञ देवता हो, किन्तु चूँकि तुमने खेल में अपने ही विषयों (सब तरह के विचारों और नाम मात्र के ज्ञान) को दुनिया की लुकन छिपन (लुकी लुकावल) वाली भूल

भुलैया में ढूँढ़ना शुरू किया है, इस लिये विचार की गंध त्याग देना और खेल में उस अधिकार (सत्ता) से काम लेना, जिससे सारा खेल रुक जाता है, उचित खेल न होगा। जिस प्रदेश में भूत, वर्तमान, और भविष्य और सब हज़ारों सूर्य तथा नक्षत्र आप के अपने आत्मा (स्वरूप) हो जाते हैं तथा आप के ज्ञान के सागर में तरंगें और भंवर मात्र होते हैं, उनमें आप क़ानून (वकालत) की और सांसारिक सफलता की कैसे परवाह कर सकते हैं? यदि आप सच्ची दिव्यदृष्टि को प्राप्त करना (clairvoyance) चाहते हैं, तो आप का इन्द्रियों के लोक को, जिससे आप दिव्यदृष्टि (clairvoyance) चाहते थे, त्यागना या उससे ऊपर उठाना होगा।

मछली पकड़ने को एक जाल बिछाया गया था। मछ- लियां जाल में फंस कर अपनी प्रचंड शक्ति से उस घसीट ले गईं। ईश्वर को कभी सलाह न दो कि वह आप के साथ ऐसा बर्ताव करे, अपनी मर्ज़ी का आदेश 'उस' न दो, अपने आप को 'उस' पर छोड़ दो, क्षुद्र वा परिच्छिन्नात्मा को त्याग दो, नक़ली इच्छाओं को छोड़ दो, और इस प्रकार अपने शरीर और चित्त को आप प्रकाश से परिपूर्ण तथा ईश्वरादेश (इल्हाम वा श्रुति) का पूर्ण यंत्र बना देंगे। सम्पूर्ण सत्यज्ञान और वास्तविक शिक्षा भीतर से आती है और किताबों या बाह्य वा बहिर्मुख चित्तों से नहीं। अलौ- किक बुद्धि पुरुषों (men of genius) ने, तफ़तीश के क्षेत्र में नवीन कार्यकर्ताओं ने केवल तभी अपने आविष्कार (discoveries) और अनुसन्धान (investigations) किये, जब कि वे विचारों में नितान्त लीन थे, इन्द्रियों के लोक से

बहुत ऊपर थे, किसी प्रकार की जल्दी या एषणा (कांक्षा) से बहुतर ऊपर थे, जबकि वे अपने व्यक्तित्व और को स्वार्थपरता की किसी भी प्रवृत्ति से रहित कर चुके थे। वे एक पारदर्शक दर्पण या शीशे के द्वारा देख रहे थे और ज्ञान का प्रकाश उन के द्वारा चमका, उन्हों ने पुस्तकों पर प्रकाश डाला, पुस्तकालयों और पुस्तकों को प्रकाशित किया, और पुस्तकालय उन्हें प्रबुद्ध नहीं कर सके। यह है काम। काम से राम का अभिप्राय नित्य की नीच चाकरी कदापि नहीं है। वेदान्त में कार्य का अर्थ सदा विश्व से समताल होना तथा वास्तविक आत्मा से एक स्वर होकर स्फुरण करना है। वस्तु मात्र से यह पूर्ण एकता जो वेदान्त के अनुसार असली कार्य है, मूर्खों द्वारा प्रायः अकार्य या आल- स्य की उपाधि पाती अथवा मानी दी जाती है। कृपया "सफलता के रहस्य" (इस नाम के व्याख्यान) को एक बार फिर पूरी तरह पढ़िये, तब अत्यन्त कष्टसाध्य कार्य भी, वेदान्त की वृत्ति से किया जाने पर पूर्ण सुख और खेल जान पड़ता है, तथा गुलामी या बोझ तनिक भी नहीं प्रतीत होता। इस तरह वेदान्त की शिक्षानुसार, एक दृष्टि कोण से जो सर्वोच्च कार्य कहा जाता है वह दूसरे दृष्टि कोण से कोई काम हो नहीं है।

हिन्दू पुराणों में परमेश्वर के दो आकार दिये हुए हैं। प्रत्येक धर्म के तीन रूप होने चाहिये। एक है तत्वज्ञान, दूसरा क्रिया- काण्ड (कर्म-काण्ड) और तीसरा पुराण। तत्वज्ञान विद्वान् के लिये है, कर्म-काण्ड वाह्य शरीर, वा बच्चों के लिये है, और पुराण विचारवान् के लिये है। तीनों का साथ रहता है। यदि एक भी पिछड़ जाता है तो धर्म नहीं टिक

सकता। हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में इन तीनों में पूर्ण समता होने के ही कारण हिन्दू धर्म आज भी तीस कोटि मनुष्यों का धर्म है। जिस धर्म में इन में से एक का भी अभाव है वह वास्तविक धर्म नहीं हो सकता। हिन्दू धर्म में ये तीनों पूर्णावस्था में हैं। हिन्दू पुराण से राम आप के सामने पूर्ण पुरुष या परमेश्वर का वर्णन करेगा जो निरन्तर मन में रहता है।

हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में परमेश्वर के दो रूप, परमात्मा के दो आकार (रूप) दिखाये गये हैं। एक , प्रतापशाली, सुन्दर युवा पुरुष प्रतापी आकार, हिमालय के शिखरों पर बैठा हुआ, ध्यान और विचार में मग्न, आंखें बन्द, दुनिया से बेखबर, परमानन्द की साक्षात मूर्ति, दिक्कतों और वखेड़ों से दूर, सम्पूर्ण चिन्ता और फ़िक्र से मुक्त है। स्वतंत्र, स्वतंत्र, ऐसा प्राणी कि जिस के लिये दुनिया का कदापि अस्तित्व ही नहीं है। यह है परमेश्वर का एक चित्र। यह चित्र ध्यान का है। एक स्वच्छन्द, मुक्त आत्मा। श्वेत तो हिमालय का एक चिह्न है; और मन अचल, शान्त, शान्त।

इस के साथ उस परमेश्वर की पत्नी है जो सिर से पैर गुलाब के रंग की है। वह इस परमेश्वर के घुटनों पर बैठी और उस के लिये सदा वनस्पतियां तथा अन्य जोशीले करती है। परमेश्वर अपने नेत्र खोलता है और तुरत उस की पत्नी अपने तैयार किये नशीले अर्क से भरा हुआ एक कटोरा उस के मुख में लगा देती है ताकि वह फिर अपनी ध्यानावस्था में निमग्न हो जाय। तब वह उस से सम्पूर्ण विश्व के सम्बन्ध में प्रश्न करती है और वह उन प्रश्नों को उसे समझाता है। वह एक राजा की बेटी है,

किन्तु इस परमेश्वर के निकट रहने के लिये अपनी सब सुन्दर चीज़ें वह छोड़ चुकी है। परमेश्वर शिव कहलाते हैं, उन की पत्नी का नाम गिरिजा (पार्वती) है।