भारतवर्ष के सम्बन्ध में तथ्य और आंकड़े ।
भारतवर्ष का बाह्य रकबा लगभग बीस लाख वर्ग मील है, अथवा अलास्का, ओरीगन और कैलीफोर्निया छोड़ कर सारे अमेरिका के बराबर है ।
आबादी लगभग 30 करोड़ है, अथवा मानव जाति के पंचमांश के लगभग । सम्पूर्ण साम्राज्य में, पहाड़, ऊसर और जंगल के सहित प्रति वर्ग मील 167 की आबादी है, इसके विपरीत अमेरिका में 21.4 है । बंगाल प्रान्त में प्रति वर्ग मील में 588 की आबादी है । भारत के कुछ भागों में इतनी बड़ी आबादी है कि दुनिया का कोई भी भाग उतनी (आबादी) नहीं रखता ।
भारतवर्ष में हर प्रकार की जलवायु है । उसकी भूमि के एक भाग में दुनिया भर से अधिकतम जलवृष्टि होती है । दूसरे हिस्से में, जो कई लाख वर्गमील का है, एक बूँद भी पानी शायद ही कभी बरसता है ।
भारत में 118 विभिन्न भाषाएँ बोली जाती हैं, और इन में से 51 भाषाओं के बोलने वालों की संख्या एक लाख से अधिक है ।
वहां बीस लाख से अधिक ईसाई हैं, जिस में से 10 लाख से अधिक रोमन कैथोलिक हैं, 453612 चर्च आफ़ इंग्लैंड सम्प्रदाय के हैं, 322586 कट्टर ग्रीक चर्च के हैं, 220863 बैपटिस्ट हैं, 155455 लूथर-अनुयायी हैं, 538818 प्रेसबार्टीरियन हैं, और 153887 फुटकर ईसाई हैं । इन ईसाइयों (20 लाख से कुछ ऊपर) में विदेशियों, ब्रिटिश
सेना, विदेशी धर्म प्रचारक ( missionaries ) इत्यादि, की आबादी शामिल है । इस तरह देशी ईसाइयों की संख्या अधिक नहीं है, और जो भारतवासी ईसाई बनाये गये हैं, वे अत्यन्त नीच जातियों के हैं । उच्च जातियों का बिलकुल स्पर्श नहीं हुआ है । अंग्रेज़ सरकार भारतीय ख़ज़ाने से हर साल पैंतालीस लाख रुपये ईसाई धर्म पर खर्च करती है ।
पिछली मर्दुमशुमारी के अनुसार 546224664 एकड़ भूमि पर खेती होती है, जो औसत में आबादी के प्रति मनुष्य के हिस्से में लगभग २ एकड़ है । दो करोड़ बीस लाख से अधिक एकड़ भूमि साल में दो फसलें पैदा करती है । 17 करोड़ 57 लाख 35 हज़ार मनुष्य निरन्तर खेती करते हैं । 255468000 मनुष्य न्यूनाधिक खेती के काम में नौकर हैं । 26 लाख 46 हज़ार मनुष्य मवेशी ( पशु ) पालने में और 1 करोड़ 45 लाख 76 हज़ार खाद्य और पेय के उत्पादन में लगे हैं । 1 करोड़ 12 लाख 20 हज़ार मनुष्य घरेलू चाकरी करते हैं । 1 करोड़ 26 लाख 11 हज़ार कपड़ा बनाने, 2361000 शीशा, बर्तन, और पत्थर की चीज़ें बनाने में लगे हैं, 32 लाख 85 हज़ार चमड़े का कारवार करते हैं ( ये सब मुसलमान हैं, 42 लाख 13 हज़ार, सब मुसलमान, लकड़ी, बेंत और बटाई बनाने का काम करते हैं । ) लाखों हिन्दू मर्दुमशुमारी की शब्दावली में "निन्द्य पेशों" में हैं—बिलकुल कुछ करते ही नहीं । उनसे पहले उनके पूर्वजों ने जो कुछ किया, वही यदि वे करने में असमर्थ हैं, तो वे कुछ करेंगे ही नहीं ।
भारत में कुल 150486135 नारियों में से केवल 542415 लिख पढ़ सकती हैं—हज़ार में एक से भी कम । 30
करोड़ की कुल आबादी में से अपढ़ों की सारी संख्या 27 करोड़ 85 लाख 46 हज़ार 1 सौ, पछत्तर दर्जे हुई है ।
ई० 1800 में 5 करोड़ 50 लाख मनुष्यों पर दुर्भिक्ष का प्रभाव पड़ा था । दरबार के साल में 50 लाख भूखों मर गये । जीवन के लिये संग्राम प्रति वर्ष भयंकर होता जाता है । शीघ्रता से उन्नति करते हुए उद्योग-धंधों, रेलों का व्यूह, तथा दौलत और काम काज के अन्य साधनों के बढ़ने पर भी मज़ूरी का निखे बढ़ने के बदले घटता जाता है ।
भारत में 20 करोड़ से अधिक आदमी पांच पैसे रोज़ से भी कम पर निर्वाह कर रहे हैं । 10 करोड़ से अधिक तीन पैसे रोज़ से कम पर जी रहे हैं, और 5 करोड़ से अधिक एक पैसा रोज़ से भी कम पर बसर कर रहे हैं । पूरी आबादी के कम से कम दो तिहाई भाग को अपने जीवन के किसी भी साल में उतना काफी भोजन नहीं मिलता जितना कि मानवशरीर को पोषण के लिये आवश्यक है । देश के अनेक भागों में कुटुम्ब औसत में एक चौथिगारी एकड़ भूमि पर बसर करने को लाचार हैं, तथा और लाखों आधे एकड़ भूमि पर ।
भारत के हद के खेतों में जो नारी और नर काम करते हैं उन्हें 5 रुपया महीने से अधिक नहीं मिलता । एक पैसा हजामत बनवाई दिया जाता है । सरकार के नौकर डाकिये, चिठ्ठी ले जानेवाले, आश्रम अधिक केवल 12) रु मासिक पाते हैं, जो लगभग 3 डौलर के बराबर हैं । हट्टे कट्टे और होशियार कारीगर, मेमार, बढ़ई और लोहार 8) या 12) रु महीने से अधिक नहीं पाते, और मुनीम, गुमाश्ते तथा अन्य लोग, मकान के भीतर के पेश वाले 16) से
25) 30 महीने तक पाते हैं । भारत के सब मज़ूरी कमाने वालों को एक साथ कर लिया जाय तो उनकी माहवारी आमदनी लगभग ठीक उतनी ही है जितनी अमेरिका के बसी दर्जे के लोग एक दिन में पाते हैं ।
सारी आबादी का दोतिहाई भाग अपनी समृद्धि के लिये जलवृष्टि के सहारे है, और यह भी कहा जा सकता है कि, अपनी ज़िन्दगी ही के लिये वह जलवृष्टि के सहारे है । यदि पानी वहां न वर्षे, तो दुर्भिक्ष पड़ जाता है । वे काफी नहीं कमा सकते कि दुर्भिक्ष के लिये अन्न जमा कर सकें । अन्न का अभाव नहीं, बल्कि धन का अभाव दुर्भिक्षजन्य व्यथा का कारण है, क्योंकि सामान्यतः जब भारत के एक भाग में दुर्भिक्ष होता है तब भारत के अन्य भागों में यथेष्ट, और कभी कभी यथेष्ट से अधिक, अन्न पैदा होता है ।
अंग्रेज़ी सरकार को जो नक़द (पक्की) आमदनी रेल विभाग के एक सप्ताह ( 24 मार्च 1904 के सप्ताह ) में हुई, वह 66 लाख अमेरिकन डालर ( लगभग २ करोड़ 50 लाख रुपये ) थी । यह निरन्तर बढ़ रही है ।
भारत में 65 सैकड़ा सरकारी नौकर भारतवासी हैं, और सरकारी नौकरों को जो कुल रकम तनखाह में मिलती है उसका केवल 25 सैकड़ा उन्हें ( 65 सैकड़ा भारतवासी सरकारी नौकरों को ) मिलता है, 75 सैकड़ा रकम 5 सैकड़ा अंग्रेज़ सरकारी अफसरों की जेब में जाती है ।
समस्त विदेशी धर्म प्रचारक समाजों ( foreign missionary societies ) की आमदनी सन 1903 ई० में
20218057 डालर थी । यह प्रायः भारतवर्ष में खर्ची जाती है ।
भारत में ब्रिटिश पूंजीयाद का प्रारम्भ ई० 1600 में भारतवर्ष में 70 हज़ार पौंड की पूंजी से ईस्ट इंडिया कम्पनी की स्थापना से हुआ है । ई० 1833 में ईस्ट इंडिया कंपनी का व्यापार बन्द हो गया । उस तारीख़ से 1858 तक कम्पनी केवल भारत का शासन करती रही । 1858 में, भारतीय गदर के बाद, खुद कम्पनी की ही समाप्ति हो गई । किन्तु उसकी नीति क़ायम है । कंपनी का मूलधन ऋणों से चुकाया गया, जो भारतीय ऋण बनाये गये, जिसका व्याज भारतीय टैक्सों या करों से चुकाया जाता है । सम्राट ने ईस्ट इंडिया कंपनी से साम्राज्य ख़रीदा था, किन्तु भारतवासियों ने ख़रीद का रुपया दिया । भारतीय ऋण, जो 1857 में 5 करोड़ 10 लाख पाउंड था, 1862 में बढ़ कर 8 करोड़ 70 लाख पाउंड हो गया । तत्पश्चात् शान्ति के जो 50 साल बीते हैं, उनमें भारतीय ऋण बराबर बढ़ता ही गया है । 1901 में वह 20 करोड़ पाउंड था, जिस पर भारत के लोगों को हर साल 30 से 50 लाख पाउंड, या डेढ़ करोड़ से २ करोड़ डालर तक, व्याज का देना पड़ता है । यह एक अरब डालर के ऋण के बराबर की रकम है जिस पर उन्हें ( भारतवासियों को ) व्याज देना पड़ता है । दुनिया का कौन देश इस तरह के से भार को सह सकता है ? भारतीय राजस्व ( मालगुज़ारी, revenue ) से जो घर खर्च ( Home Charges = सरकार द्वारा विलायत भेजी जाने वाली रकम ) इंग्लैंड हर साल भेजा जाता है, वह बढ़कर 1 करोड़ 60 लाख
पाऊंड हो गया है । भारत में यूरोपीय अफ़सरों की तनख़ाह, जिनका यथार्थ में सब ऊंची नौकरियों पर पूर्णाधिकार है, एक करोड़ पाउंड पड़ती है ।
भारत की निल्लोह ( खर्च बाद देकर नक़द = net income ) की आधी रकम, जो अब 4 करोड़ 80 लाख पाउंड है, हर साल भारत के बाहर बह जाती है ।
[ ऊपर के तथ्य, इंग्लैंड में प्रकाशित एक पुस्तक, सर रोमेश दत्त सी. आई. ई० कृत 'ब्रिटिश भारत का आर्थिक इतिहास' ( The Economic History of British India ) के आधार पर दिये गये हैं । ]
1901 में भारत में विधवाओं की संख्या 5531860 थी । बंगाला प्रान्त में 2655822 बालिका विधवाएँ हैं ।
पुष्कर, जिला अजमेर । 22 फरवरी 1905 ।
परम धन्य, प्रिय भगवन्,
जहां राम है वहां का जलवायु कैसा सुन्दर है । प्रत्येक दिवस नववर्ष-दिवस है, और प्रत्येक रात्रि बड़े दिन (Christmas) की रात्रि है । नीला आकाश मेरा प्याला है और जगमगी रोशनी मेरी मद्य है ।
पहाड़ों में मैं हलकी हवा हूँ, नीचे कस्बों और शहरों में मैं रेंग जाता हूँ—ताज़ा और सब सड़कों में मैं पूर्ण रूप से फैलता हुआ गुज़रता हूँ ।
Stay with me, then I pray ; Dwell with me through the day And through the night and where it is neither night nor day, Dwell quietly. Pass, pass not any more. Thou canst not pass. I too am where thou art ; I hold the fast ; Not by the yellow sands nor the blue deep, But in my heart, thy heart of hearts.