श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

पत्र मंजूषा.

भाग 27 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 27 · अध्याय 3 / 4

पत्र मंजूषा.

मनुष्य को मैं छूता हूँ, और स्त्री को मैं छूता हूँ—ऐसा मेरा लीलामय मनोरञ्जन है ।

मैं प्रकाश हूँ, बड़े स्नेह से मैं अपने बच्चों—फूलों और पौधों-को पोषता हूँ । सुन्दरों और बलवानों के नयनों और हृदयों में मैं रहता हूँ ।

मेरे साथ ठहरो, तब मैं प्रार्थना करूंगा, रहो मेरे साथ दिन भर और रात भर भी, और वहां भी जहां न दिन है और न रात, खुपके चाप रहो । अब फिर परे न जा, परे न जा । तुम परे नहीं जा सकते । मैं भी वहाँ हूँ, जहां तू है ; मैं तुझे मज़बूत पकड़े हूँ, न तो पीत चालू में और न गंभीर नील में, किन्तु मेरे हृदय में, तेरा हृदयों का हृदय है ।

प्रकाशों के प्रकाश में रहने से रास्ता आपही आप खुल जाता है । ब्योरे का ठीक ठीक व्यापार अनायास होता है ( गुलाब की कली की बन्द पंखुरियों की तरह ) जब कि भक्ति और दिव्य बुद्धि का सुखकर प्रकाश स्वतंत्रता से चमकता है ।

आशा की जाती है कि "थंडरिंग डान" ( Thundering Dawn ) का जनवरी का अंक आपने मिस्टर पूर्ण सूतरमंडी, लाहौर से पाया होगा ।

आपका अपना आप

जनवरी के अंक में आपकी कविता कमलानन्द के नाम से प्रकाशित की गई है, जो कि पूर्ण स्वामी (संन्यासी) नाम है । अब जब तुम और नये लेख भेजोगी, तो वे 'ॐ' के नाम से छपे जायँगे, यदि आप पसन्द करें ।

प्रिय महाभाग गिरजा तथा सब को प्यार, आशीर्वाद, आनन्द, शान्ति ।

STARS.

From the intense, clear, star-sown vault of heaven.

Over the lit sea's unquiet way, In the rustling night-air came the voice, " Would'st thou be as they are ? Live as they, " Unaffrighted by the silence round them, " Undistracted by the sights they see. " These demand not, that the things without them" Yield them love, amusement, sympathy. " And with joy the stars perform their shining, " And the sea its long moon-silvered roll ; " For self-poised they live, nor pine with noting. " All the fever of some differing soul. " Bounded by themselves and unregardful " In what state God's other work may be " In their own tasks, all their powers pouring, These attain the mighty life you see "

नक्षत्र ।

प्रचण्ड, निर्मल, तारों से बोये हुए नभ मंडल से । प्रकाशित सागर के अशान्त मार्ग के ऊपर, रात्रि की फरफराती हवा में आवाज़ आई, "क्या तू होगा वैसा जैसे वे हैं ? क्या उनकी तरह तू रहेगा ?

"अपने इर्दगिर्द के मौन से वे निडर हैं, "जो दृश्य वे देखते हैं, उनसे निराकुल हैं । "वे मांगते नहीं हैं, पर उनसे बाहर की वस्तुएँ, "उनको प्रेम, मनोरंजन, और सहानुभूति अर्पण करती हैं । "और आनन्द से तारे अपना चमकने का काम करते हैं, "और सागर अपना दूर तक चन्द्र से रुपहला लहराने का काम करता है ;

"क्योंकि वे स्वयं समर्चित रहते हैं, "किसी भिन्नमत अन्तःकरण का सम्पूर्ण ताप देख कर खीजते नहीं हैं ।

"अपने आप से परिमित और "परमेश्वर के दूसरे काम की हालत से वे परवाह अपने ही निजी कामों में, अपनी सम्पूर्ण शक्ति ढालते हुए वे उस महान जीवन को जिसे तुम देखते हो पाते हैं ।"

ॐ । लाहौर, ( भारत वर्ष ) 25 जुलाई, 1905.

कल्याण स्वरूप !

राम इत्तरा हिमालय के घने वनों में है और उस का अन्तिम पत्र निम्न लिखित है, जो संक्षेप में राम विषयक सब समाचार दे देगा ।

"दिन रात में समाप्त होता है, और रात फिर दिन में बदल जाती है, और यह आप का राम है, कि कुछ करने को जिसे समय नहीं । कार्य-व्यग्र (busy), कुछ नहीं करने में व्यग्र । आंसू बहा करते हैं, इस अत्यन्त वर्षाती जिले की निरन्तर वर्षा से अच्छा मुकाबला कर रहे हैं । रोमांच होते हैं, आँखें फटी अपने सामने की कोई वस्तु नहीं देखतीं ! बातचीत बन्द है, वदनशीघ्री से काम बन्द हो गया ? नहीं, बहुत ही खुशक्रिस्मती से । अरे ! मुझे अकेला छोड़ दो ।

गद्गद् परमानन्द की यह निरन्तर तरंगमाला । रे प्रेम ! इसे चलने दे । ओ ! परम दुखिकर पीड़ा ।

Away with writing ! Off with lecturing ! Out with fame and name ! Honours ! Nonsense. Disgrace ! meaningless. Are these toys the end of life ? Logic and Science, the poor Bunglers! Let them see me and have cured their blindness,

In dreams a sacred current flows. In wakefulness, it grows and grows, At times, it overflows the banks Of senses and the mortal frame. It spreads in all the world and flows. It inundates in wild repose. For this, the Sun, he daily rose, For this the Universe did roll, All births and deaths for this. Here comes surging wonder Undulating Bliss, Here comes rolling laughter, Silence.

लिखने से दूर ! व्याख्यानबाज़ी से परे ! कीर्ति और नाम से कोई काम नहीं । सम्मान ! वाहियात । अपमान ! निरर्थक । क्या ये खिलौने जीवन का उद्देश्य हैं ? तर्क और विज्ञान, विचारे प्रमादी ( गड़बड़-कारी ) ! उनको मुझे देखने दो और अपना अन्धापन मिटाने दो । स्वप्नों में एक पवित्र धारा बहती है, जागृत अवस्था में वह बढ़ती और बढ़ती है, कभी कभी वह इन्द्रियों और विनाशशील तनुके तटों से उमड़ जाती है। वह सम्पूर्ण संसार में फैलाती और बहती है ।

बड़ाम ( wild ) शान्ति में वह प्लावित करती है । इस के लिये, सूर्य नित्य उदय हुआ, इस के लिये विश्व ज़रूर लुढ़का, सब जीवन और मौत इस के लिये । यहां आता है ज़ोर से कल्लोल करता हुआ विस्मय रूप तरंगित कल्याण । यह आता है गरजता हास्य रूप मौन । ,

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श्री: पोर्टलैंड ओर, श्रीमती ई. सी. कैम्पवेल, डेनवर, कोलोरेडो ।

जब लोग किसी वस्तु पर अपना दिल लगाते हैं, और विघ्न पड़ता है, तब वे व्याकुल और बेचैन होते हैं । प्रतीत होने वाली बुराई के प्रतिरोध करने की प्रवृत्ति, बिना अपवाद के, संक्षोभ और उत्पात का कारण है । इस प्रकार, क्या आप नहीं समझतीं कि हज़रत ईसा का सिर ठिकाने पर था जब उसने कहा था कि "असत् वा पाप का प्रतिरोध न करो", ! अपने आप को शान्त, बिलकुल खुश रक्खो, और अपनी इच्छा की धारा के विरुद्ध जो कुछ प्रतीत हो उसका बल्लासपूर्वक स्वागत करो । जब हम अपने चित्त की स्थिरता नहीं नष्ट होने देते और स्वरूप ( आत्मा ) में केन्द्रित रहते हैं, तब, राम ने सदा अपने निजी अनुभव से देखा है,कि प्रतीत होने वाली बुराई भलाईमें बदल जाती है । क्या तुम्हें याद नहीं है कि एक प्रतीत होने वाली बुराई के बाद वह दश रुपये किस प्रकार एक हिन्दू विद्यार्थी को

भेजे गये थे ? किन्तु बदमिज़ाजी और बेचैनी से सब कल्याणों, उत्कृष्ट विचारों और हमारी राह देखनेवाली खुश नसीबियों का द्वार हम अपने लिये बन्द कर लेते हैं । सब बुराई और कठिनाइयों को उस चित्त से जीतो जो देह और सांसारिक जीवन को अपने हाथ की हथेली पर लिये हुए हो; दूसरे शब्दों में,प्रेम पूर्ण चित्त को अर्पण करके, ( जिससे बढ़कर कोई उच्चतर शक्ति नहीं है ) आप उस दोष को जीतो । ॐ !

तुम्हारा अपना प्रियात्मा राम स्वामी के रूप में

पोर्ट लैंड ओर । श्रीमती ई० सी० कैम्पबेल, डेनवर, कोलोरेडो । आप निरन्तर राम से याद की जाती हो । ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

आप अति सच्ची, पवित्र, श्रेष्ठ, एकाग्रचित्त, श्रद्धालु, और बड़ी ही भली हो ! क्या ऐसी नहीं हो ?

(1) To compare or contrast one person with another in the mind, (2 To compare oneself with any body else mentally, (3) To compare the present with the past and brood over the memory of past mistakes, (4) To dwell upon future plans and fear any, thing,

(5) To set our heart on any thing but the one Supreme Reality, (6) To depend on outward appearances and not to practically believe in the inner Harmony that rules over every thing, (7) To jump up to the conclusions from the words, or seeming conduct of people and not to rest thoroughly satisfied with faith in the Spiritual Law, (8) To be led astray too far in conversation with the people. It is this that breeds discontent in people's mind. Therefore shun these eight sources of trouble. Om !

1. मन में एक मनुष्य की दूसरे से तुलना या मिलान करना । 2. मनसे अपने आप की किसी दूसरे मनुष्य से तुलना करना । 3. वर्तमान का भूत से मिलान करना और पिछली भूलों की याद में रंज करना । 4. भावी तरक्कीयों के मनसूबे करना और प्रत्येक बात से डरना । 5. एक परम तत्व वस्तु के सिवाय किसी और वस्तु में चित्त लगाना । 6. वाह्री रूपों ( दिखलावों ) पर आश्रय करना और

व्यवहारतः आन्तरिक साम्यता पर, जो हरेक वस्तु पर शासन करती है,विश्वास न करना ।

7. लोगों के शब्दों, या वाह्य आचरण से नतीजों पर कुदक जाना और रूहानी क़ानून में विश्वास पूर्वक पूर्णतया संतुष्ट न रहना ।

8. लोगों से वार्तालाप में ( निज स्वरूप से ) बहुत दूर भटक जाना ।

ये बातें हैं जो लोगों के मन में असंतोष उत्पन्न करती हैं । इस लिये क्लेश के इन आठ स्रोतों ( कारणों ) से आप दूर रहियेगा । ॐ !

तुम्हारा अपना प्रिय स्वरूप रामस्वामी के रूप में

॥ श्री: ॥ मुज़फ्फर नगर, 18 अक्टूबर 1905 । प्रियतम, महानुभाव,

हाथों में मली हुई राख खाल को साफ (स्वच्छ) कर देती है ।

इस प्रकार, शारीरिक रोग तीन वार धन्य हैं, जब वे अपने साथ देहाध्यास रूपी मल को उड़ा देते हैं ।

अरे, रोग और पीड़ा का स्वागत करो !

जब तक एक निर्जीव शव घर में पड़ा है, तब तक सब प्रकार की महामारियों का बड़ा खटका है । जब मुर्दा हट जाता है, तब स्वस्थता का परम राज्य विराजता है । ठीक इसी तरह जब तक देहाध्यास का पोषण किया जाता है, तब

तक हम दुनिया के सब रोगों को निमंत्रित करते हैं । देह और उस के भावों को भस्म कर दो और तुरन्त हम अद्वितीय बादशाहत भोगने लगते हैं ।

HURRAH ! HURRAH ! No jealousy, no fear ; I'm the dearest of the dear. No sin, no sorrow ; No past no morrow.

जय ! जय ! कोई डाह नहीं, कोई भय नहीं; मैं प्रियों में प्रियतम हूँ । कोई पाप नहीं, कोई रंज नहीं; न अतीत, न ( आगामी ) कलह है ।

The learned mahatmas with hair-splitting heads and prominent bellies, The spectacled Professors, astonishing the innocent students in the laboratory or the observatory The bare-headed orators striking dumb their audience from their pulpits or platforms, Even the poor rich full of complaints of one kind or another —

All these I am. The heavens and stars, Worlds, near and far,

Are hung and strung On the tunes I sung; No rival, no foe; No injury, no woe ! No, nothing could harm me. No, nothing alarm me. The Soul of all, The nectar-fall, The Sweetest Self, Yea! health itself. The prattling streams, The happiest dreams, All myrrh and balm, Rawan and Rama, So pure, so calm, Am I, am I,

बाल की खाल निकालने के मस्तिष्क और निकले (फूले) हुए पेट वाले विद्वान महात्मा, प्रयोगशाला या वेधशाला में सरल विद्यार्थियों को चकित करने वाले चश्मेधारी अध्यापक (Professers), अपनी वेदियों या आसनों से अपने श्रोता-समुदायों को मूक बना देने वाले नंगेसिर व्याख्यान दाता, एक या दूसरी प्रकार की शिकायतों से परिपूर्ण दीन अमीर भी :— वे सब मैं हूँ । आकाश और तारे,

निकट और दूर लोक, मेरे गाये स्वरों पर; लटके और बंध हैं, न कोई प्रतिद्वन्दी, न शत्रु ! न चोट, न क्लेश ! नहीं, कोई वस्तु मुझे हानि नहीं पहुंचा सकती । नहीं, मुझे कोई नहीं डराता । सब का आत्मा, अमृत-स्राव, मधुरतम आत्मा, हां, खुद तन्दरुस्ती । सफ़की नदियां, सुखिरतम स्वप्न, सब गन्धरस और सुगन्धित प्रलेप, रावन और राम, अति पवित्र, अति शान्त, मैं हूँ, मैं हूँ ।

राम ।

हर्ष ! आशीर्वाद ! शान्ति ! प्रेम ! 30 अगस्त 1905 । परम कल्याण स्वरूप प्रियतम,

तीन महीने तक राम एक पहाड़ की चोटी पर था ( लगभग 8000 फुट ), जो संसार के सर्वोच्च पहाड़, माँट

एवरेस्ट (Mt. Everest) शिखर के सामने है । परसों नीचे मैदान को उतरूँगा । पाँच पुस्तकें यहां लिखी गई हैं, और बीस पढ़ी गई हैं ।

राम का मन हर्ष और शान्ति से लबालब भरा है । संसार मानो मन से बिलकुल गायब हो गया है ।

God, God alone Everywhere ! Within, without Far and near ! O joy ! Thrilling peace ! Undulating Bliss ! What a heaven!

परमेश्वर, परमेश्वर केवल सर्वत्र ! भीतर, बाहर दूर और नज़ीच ! अरे आनन्द ! सनसनाती शान्ति ! लहराता कल्याण ! कैसा स्वर्ग है ! शान्ति ! कल्याण ! प्रेम ! आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक स्वस्थता, और जो कुछ कल्याण रूप है, वह सब गिरजा, ओम्, वल्पा, और दूसरों को जो तुम्हें प्यारे हैं, प्राप्त हो ।

0 Peace immortal falls as rain drops, Nectar is dropping in musical rain. Drizzle ! Drizzle ! Drizzle ! My clouds of glory, they march so gaily ! The worlds as diamonds drop from them, Drizzle ! Drizzle ! Drizzle ! My breezes of Law blow rhythmical rhythmical Lo ! Nations fall like petals, leaves. Drizzle ! Drizzle ! Drizzle. ! My balmy breath, the breeze of Law, Blows beautiful ! beautiful ! Some objects swing and sway like twigs, And others like the dewdrops fall. Drizzle ! Drizzle ! Drizzle ! My graceful light, a sea of white, An ocean of milk, it undulates. It ripples softly, softly, softly; And then it beats out worlds of spray ! I shower forth the stars as spray. Drizzle ! Drizzle ! Drizzle ! RAMA.

Om ! Om ! Om ! अमर शान्ति बरसती है जैसे पानी बरसता है । संगीतमय वृष्टि में अमृतवर्षा हो रही है । वाह मंद २ वृष्टि ! वाह मंद २ वृष्टि !! वाह मंद २ वृष्टि !!

मेरी महिमा के मेघ, वे बड़ी प्रफुल्लता से कूच करते हैं ! उनसे हीरों के से संसार बरसते हैं । वाह मंद २ वृष्टि, वाह मंद २ वृष्टि ! वाह मंद २ वृष्टि !

मेरे क़ानून के भकोरे तालबद्ध चलते हैं, तालबद्ध । देखो ! राष्ट्रों का पतन पंखुरियों, पत्तियों के समान होता है । वाह शीकर वृष्टि ! वा शीकर वृष्टि ! वाह शीकर वृष्टि !

मेरी सुगंधित सांस, क़ानून की मृदुपवन हुई, कैसी सुन्दर ! सुन्दर चलती है ! कुछ पदार्थ भूलते हैं और डालियों की तरह डोलते हैं और दूसरे ओस के कणों के समान झरते हैं । वाह मन्द २ वृष्टि ! वाह मन्द २ वृष्टि ! वाह मन्द २ वृष्टि !

मेरा मनोरम प्रकाश, श्वेत का एक सागर, दूध का एक सागर, वह लहराता है । इसमें कोमलता से, कोमलता से, अति कोमलता से तरंगें उठती हैं और फिर वह फेन के संसार बिछा देता है ! मैं नक्षत्रों को फेनके रूप में बरसाता हूँ ! वाह मंद २ वृष्टि ! वाह मंद २ वृष्टि ! वाह मंद २ वृष्टि ! ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

* ॐ * पुष्कर, ज़िला अजमेर, ( भारतवर्ष ) । आनन्द ! आनन्द ! आनन्द ! शान्ति ! कल्याण ! प्रेम ! आनन्द !

परम प्रिय और परम कल्याण स्वरूप,

एक शान्त, स्वच्छ, और गहरी गहरी झील के तट पर राम रहता है । एक ओर एक लम्बी, समाकार, अविच्छिन्न पहाड़ी फैली हुई है, जो सब कहीं सुन्दर हरा दुशाला ओढ़े हुए है । आम-कुञ्ज यहां बहुतायत से हैं । जिस मकान में राम रहता है उस में दो छोटी फुलवगियां हैं । अति सुन्दर मोरों के झुंड अपने धातुमय गलों से शोर मचाये रहते हैं । बच्चे खेल खेल कर झील में तैर और गोते लगा रही हैं । नारायण स्वामी ( सुन्दर युवापुरुष जिसकी चर्चा शायद रामने तुमसे की हो ) यहां राम के लेखों आदि की नक़ल करके राम की सहायता कर रहा है ।

झील का नाम पृथिवी-नेत्र है । जंगलदार पहाड़ियां और चोटियां झील की लटकती भौंहें ( भवें ) हैं । यह वह दर्पण है जिसे कोई पत्थर दरका नहीं सकता, जिसका पारा कभी न छूटेगा, जिस दर्पण में उसे भेंट की जाने वाली सारी मलीनता डूब जाती है, जिसे सूर्य की धुंधली भाड़ बुहारती और साफ करती है—उसका यह प्रकाश ही भाड़न-कपड़ा है ।

यह झील अत्यन्त गौरवोंमें से एक है,कि जिनको राम मिला है । किस खूबी से यह अपनी विशुद्धता क़ायम रखती है !

इस की सम्पूर्ण तरंगों के बाद इस में एक भी झुर्री नहीं पड़ी है । यह सदा जवान बनी रहती है । हमारे हृदय ऐसे ही हों ।

गर्मी में राम शीतल हिमालय पर चढ़ जाता है । The western sky doth seem to glow So beautiful bright ; Is it the Sun that makes it so ? Surely it is thy light.

पश्चिमी आकाश चमकता ज्ञान पड़ता है इतना सुन्दर चमकीला; क्या सूर्य उसे ऐसा बनाता है ? अवश्य ही यह तेरा प्रकाश है;

Here do— Birds hang and swing, green robed and Or droop in curved lines dreamily, Rainbows reversed from tree to tree ; Or sing low hanging overhead, Sing soft as if they sing and sleep, Sing low like some distant waterfall, And take no note of us at all.

यहां अवश्य हैं :— हरी पोशाक वाली और लाल, चिड़ियां लटकतीं और झूलतीं,

या मानों ऊँघते हुए चंक-रेखा में भ्रमती हैं, इन्द्रधनुप पेड़ से पेड़ तक श्रोंधे हुए हैं, या धीमी आवाज़ से नीचे मूँड किये लटकती गाती हैं, ऐसी कोमलता से गाती हैं, मानो वे गाती और सोती हैं, धीमे से दूर के जलप्रपात के समान गाती हैं, और हमारा कुछ भी खयाल नहीं करतीं।

"थंडरिंग डान" (अखबार का नाम) फिर निकाला गया है। चार नये अंक अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। जनवरी का अंक लगभग सारा राम की कलम का लिखा है। कमला की कुछ कविताएँ भी कमलानन्द के नाम से निकाली गई हैं।

भारतवर्प में कमला का एक भी पत्र नहीं मिला। शान्ति, कल्याण, प्रेम तुम्हें प्राप्त हो तुम्हारा निजात्मा स्वामी राम।

प्यारे नन्हे ओम् को हर्ष, हर्प, हर्प और गिरजा को प्यार। तुम्हें तैयार रहना चाहिए ठीक समय पर राम के पास आने को। समय आने पर राम लिखेगा। ॐ। शास्ता स्प्रिंग्स। 22 जुलाई 1903, प्रिय कल्याणिनी चम्पा (फ्लोरा flora), शायद इस तरह सम्बोधित होना तुम्हें पसन्द न होगा। किन्तु तुम्हें यह भावे या न भावे, राम की रुचि तुम्हें इसी नाम से पुकारने की है। पूर्व भारतीय (हिन्दु) की भाषा

में हर नाम का विशेष महत्व है, और चम्पा नाम (साधारणतया श्रेष्ठ और उच्च कुलों की लड़कियों का यह नाम रक्खा जाता है) का शाब्दिक अर्थ है, मधुर सुगन्ध वाली पूर्ण विकसित सफ़ेद मालती (पुष्प)।

यह चिट्ठी लिखने को जब कलम हाथ में ली गई थी, ठीक तब स्वभावतः और अनायास यह नाम राम के ध्यान में आ गया। अंग्रेज़ी में इस का अक्षर-विन्यास इस तरह हो सकता है-Champa या Chumpa।

उस दिन तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर में एक लम्बा खत कमला (पौलिन Pauline) को लिखाया गया था। क्या तुम्हें उस की चिट्ठी मिली? उस में राम की अभी की कुछ काव्य-कृतियां भी थीं।

Vedantic Directions. 1 Vedantic Religion may be summed up in the single commandment— "keep yourself perfectly happy and at rest, no matter what happens—sickness, death, hunger, columny, or anything.

Be cheerful and at peace on the ground of your Godhead to which thou shalt ever be true."

2 The world - its inmates, relations, and all are vanishing quantities if you please to assert the majesty of your real Self.

Inspect, observe, and watch or do anything; but do all that in the light of your True Self, that is to say, forget not that your Self is above all that and beyond all want.

You really require nothing. Why should you feel a desire for anything? Do your work with the grace of a Universal Ruler, for pleasure, fun, or mere amusement's sake. Never, never feel that you want anything.

3 When you live these principles of Vedanta, spontaneously will the sweet aroma of Truth proceed in all directions from you.

Before falling asleep—when the eyes begin to close—every night or noon make a firm resolve in your mind to find yourself an embodiment of Vedantic Truth on waking up.

When you wake up, before doing anything else, just bring to your mind vividly the determination dwelt upon before falling asleep.

Whenever you can, just chant or hum to yourself Om."

वेदान्तिक निर्देश। 1, वेदान्त-धर्म एक अकेले सूत्र (आदेश-वाक्य) में संगृहीत किया जा सकता है—

अपने को बिलकुल खुश और निश्चिन्त रक्खो, कोई परवाह नहीं, कुछ भी हो-रोग, मौत, भूख, निन्दा, या कुछ भी हो।

अपनी परमेश्वरता के आधार पर, जिस के प्रति तुम्हें सदा सच्चे बने रहना चाहिये, खुश और शान्ति में रहो।

2. संसार, उस के निवासी, सम्बन्धी, तथा सब कुछ नाशशील पदार्थ हैं, यदि आप अपने वास्तविक स्वरूप की महिमा के दृढ़ निरूपण की कृपा करें।

जाँचिये, देखिये, और ताकिये या कुछ भी कीजिये, किन्तु यह सब कुछ अपने सच्चे आत्मा के प्रकाश में कीजिये, कहने का तात्पर्य यह कि यह न भूलिये कि आप का आत्मा इन सब से ऊपर और सब अपेक्षाओं से परे है।

वास्तव में तुम्हें किसी भी वस्तु की ज़रूरत नहीं है। तुम्हें किसी वस्तु की भी इच्छा क्यों हो? सम्पूर्ण विश्व के शासक के प्रसाद से, सुख के लिये, खेल या केवल मनोरंजन के लिये अपना काम करो। कदापि, कदापि न समझो कि तुम्हें किसी चीज़ की ज़रूरत है।

3. जब वेदान्त के इन सिद्धान्तों पर तुम अमल करोगे, तब सत्य की मधुर गंध तुम से निकल कर फैलेगी।

सोने के पहले, जब आँखें बन्द होने लगें, तुम हरेक रात या दोपहर को अपने मन में दृढ़ निश्चय करो कि जागने पर अपने आप को वेदान्तिक सत्य की साक्षात मूर्ति पाओगे।

जागने पर दूसरा कोई काम करने से पहले सोने के पूर्व तुम ने जो प्रतिज्ञा की थी, उसे पूरे ज़ोर से अपने मन में लाओ।

जब कभी तुम से बन पड़े, ॐ उच्चारो या अपने मन में ॐ जपो।

इस तरह से यथार्थ असली चम्पा की भाँति तुम मनोरम सुगंध और मनोहर प्रताप अपने चारों ओर हर समय फैलाती रहोगी।

Loud outcries and wounds which once would hurt and smart, Now sound so sweet—like hymns of praise or music's balmy art, O thief, o slanderer, robber dear! Look sharp, come, welcome, quick, O don't you fear, My self is thine, thine is mine, Yes, if you don't dont, Please take away these things you think are mine.

Yes, if you think it fit, Kill this body at one blow, Or slay it bit by bit, Take off the body and all you may, Be off with name and fame, away! Take off, away! Yet if you look just turning round, 'T is I alone am safe and sound. Good day! O dear, good day,

ज़ोर का विलाप और घाव जो पहले कष्ट और पीड़ा देता था, अब ऐसे मधुर जान पड़ते हैं—जैसे स्तुतियां या पीड़ाहर नाद-कौशल के स्तोत्र।

ऐ चोर, ऐ निन्दक, डाकू प्यारे! जल्दी करो, आओ, तुझे स्वागत, शीघ्र करो, अरे तुम मत डरो। मेरा आत्मा तेरा है, और तेरा आत्मा मेरा है, हां, यदि आप को क्लेश न हो, तो कृपया इन चीज़ों को ले जाइये जिन्हें आप मेरी समझते हैं।

हां, यदि आप यह ठीक समझते हैं, तो एक ही वार से इस शरीर को मार डालिये, या टुकड़े टुकड़े कर के इसे क़त्ल कीजिये, देह ले जाइये और सब कुछ जो ले जा सको, ले जाइये, दूर हो, नाम और कीर्ति लेकर दूर हो! ले जाओ, दूर हो!

तथापि यदि पीछे घूम कर तुम तनिक देखो, तो केवल मैं खुरक्षित और व्याधि रहित रहता हूँ। नमस्कार! ऐ प्रिय, नमस्कार! तुम्हारा आत्मा राम स्वामी के रूप में।

स्वामी राम की भेजी हुई टिप्पणियां।

वेदान्तिक साम्यवाद घटाने का सच्चा उपाय, दौलत या दीनता की बिना परवाह किये, हमारा 'अब' और 'यहां' का भोगना है, यहाँ तक भोगना कि अमीर हमारे सामने अपनी गरीबी को अनुभव करें और अपने अधिकार जमाने के भाव से ऊपर उठें। आज कल के साम्यवादी सब से बड़ी भूल यह करते हैं कि नाम मात्र के अमीरों के अधिकार में, जो समुद्र फेन (के समान धन) है उस की एक बूँद के लिये, उन के भार पर करुणा करने के बदले वे डाह करते हैं।

जिन का चित्त सुख भोग सकता है, वे नक्षत्रों से प्रदीप्त उज्ज्वल आकाश में चमकते हुए हीरों का सुखभोग कर सकते हैं, मुसकयाते हुए धनों और नाचती हुई नदियों से बहुत सुख प्राप्त कर सकते हैं, शीतल पवन से, सूर्यप्रभा और चन्द्रिका से, जिनको प्रकृति ने बे रोकटोक हरेक और सब की सेवा के लिये नियुक्त कर दिया है अनन्त आनन्द लूट सकते हैं।

जिनका विश्वास है कि "हमारा सुख विशेष अवस्थाओं पर अवलम्बित है, वे सुख के दिन को अपने से सदा परे हटते और अगिया-चैताल की भांति निरन्तर भागते पावेंगे। जिसे दुनिया की दौलत कहा जाता है, वह सुख की साधन होने के बदले सम्पूर्ण प्रकृति की महिमा और सुगन्धि को—आकाश मंडल और अवाधित दृश्य को छिपाने के लिये केवल बनावटी पर्दे का काम देती है।

कोई कृत्रिम संगीत ऐसा नहीं है जो मनुष्य की भाव-

नाओं के प्राकृतिक बहाव की—वह चाहे मौन अश्रुओं के रूप में हो, या एकान्त हास्य के, अथवा अकेले कविता में डबडवाने के रूप में हो—कभी भी बराबरी कर सकता है।

सब कृत्रिम संगीत और विशेषतः फोनोग्राफ का संगीत बार बार सुना जाने से अन्त में कानों में खटकने लगता है, और आत्मा (चित्त) को स्थूल लोक में उतार लाता है।

पत्थरों और कंकरों (pebbles) के समान विभाग पर हम क्यों झगड़ें?

दौलत नामक रोग के सम्पूर्ण अधिकार का दावा करके यदि अमीर कहलाने वाले लोग अपने को बेवकूफ बनाना चाहते हैं, तो कमला का इस में क्या बिगड़ता है। उन्हें अपने को मूर्ख बनाने की खुली छुट्टी कमला को दे देनी चाहिये।

हिमालय की एकान्तता। (अभी कुछ साल तक जारी रहेगी)

दुपहली शान्ति का सागर फैलाता हुआ चन्द्रमा चमक रहा है। राम के पयाल के विस्तर पर पूरी चाँदनी पड़ रही है। असाधारण रूप से लम्बी गुलाब की झाड़ियों की, जो इस पहाड़ पर बेखटके निर्विघ्न उगती हैं, परछाहियां चाँदनी से प्रदीप्त बिछौने पर चारखाना बना रही हैं, और ऐसे खिलंदड़ेपन से लहरा रही हैं मानों वे शान्त चाँदनी के, जो बड़ी स्थिरता से राम के सामने सो रही है, अति सुन्दर छोटे स्वप्न हैं।

सोजा, बच्चे, सोजा। और गुलाबी स्वप्नों से मन्द मन्द हँस।

सुन्दर, पवित्र तुषारपुंज (glaciers) इतने पास पास स्थित हैं कि मानों उन तक हाथ पहुँच सकता है। वास्तव में, अति दीप्तिमान हीरकवर्णी चोटियों का एक अर्धचन्द्र (semi-circle) जड़ाऊ मुकुट की भाँति इस आश्रम की शोभा बढ़ा रहा है। सब श्वेत बरफीली चोटियां चाँदनी के क्षीरसागर में स्नान कर रही हैं, और शीतल पवन के झकोरों के रूप में उन की गम्भीर सोऽहम् रूपी श्वांसें यहां निरन्तर पहुँच रही हैं।

इस पहाड़ पर जितनी वरफ गिरी थी सब पिघल गई है, और चोटी पर का विराट खुला मैदान जहां राम रहता है वह अब नीले, लाल, पीले, और सफेद फूलों से बिलकुल ढक गया है, जिन में से कुछ बहुत ही सुगंधित हैं। लोग यहां आने से डरते हैं क्योंकि वे इस स्थान को परियों का बाग मानते हैं। प्रकृति की सुन्दरता को नष्ट करने वाले देव-निन्दक उन के नित्य के आवागमन से यह स्थान इस कल्पना के कारण बचा रहता है। राम इस पुष्प-भूमि पर बड़ा कोमलता, बड़ी सावधानी से चलता है, ताकि प्रकृति का कोई कोमल, विहँसता हुआ छोटा बच्चा (पुष्प) राम की साधारण कठोर चाल से चोटैल (पीड़ित) न हो जाय। कोयलें, वत्तक, और अन्य अनेक पंखदार गवैये सबेरे (प्रातः उठते ही) राम का सत्कार करते हैं। गंभीर ध्यान, वेदों के अध्ययन, और धर्म तथा तत्वज्ञान पर लेख लिखने में राम का सम्पूर्ण समय इस ऊँचे एकान्त में बीत जाता है। आठ मील के भीतर २ कोई गाँव नहीं है। पहाड़ी के उतार पर, एक मील की दूरी में एक सेवक राम का भोजन बनाने को रहता है। अनेक महीनों तक राम ने

न तो कुछ लिखा और न किसी प्रकार के पत्रों के उत्तर दिये। सब पत्रव्यवहार त्याग दिया।

के (कमला) और ओ (ओम्) को भारतवर्ष के लिये जल्दी न करना चाहिये।

यथासमय सुन्दरता से हरेक बात निकल आवेगी, बिना हमारी किसी प्रकार की बेसब्री के। परमेश्वर की, तरह तनिक परमेश्वर में रहो तो।

Not the body, not the mind. No relations, no connections, Constitute your Self. Nothing but God is, Nothing but God is your Self.

न देह, न मन, न नातेदार, न सम्बन्धी, अपने आत्मा का प्रतिपादन करो। ईश्वर के सिवाय और कुछ नहीं है, आपका आत्मा ईश्वर के सिवाय कुछ नहीं है। अति कल्याण स्वरूप गिरजा और चम्पा को शान्ति, कल्याण, आनन्द पहुँचे।

राम के एक प्रिय कल्याणरूप मित्र द्वारा अनुवादित अष्टावक्र गीता इसके साथ ही पृथक पैकिट में भेजी जाती है।

परिच्छिन्नात्मा या व्यक्तित्व की हैसियत से कुछ न होने दो। हमें इस तरह रहना चाहिये जैसे देह इत्यादि का मानो कभी अस्तित्व ही नहीं था।

एक प्राचीन वैदिक गीत (मंत्र) का आंशिक अनुवाद नीचे दिया जाता है, मूल में एक हिन्दू महिला ने इस की रचना की थी।

4 जो कोई देखता है, या सांस लेता है, अथवा जो कुछ कहा जाता है, उसे सुनता है, भोजन करता है, वह सब मेरे द्वारा (करता है), पर वे इसे जानते नहीं हैं, किन्तु मेरे अधीन हैं। सब एक बार सुनो, यह ठीक ऐसा ही है।

= सब संसारों पर अधिकार जमाता हुआः मैं चलता हूँ जैसे हवा चलती है; भूमि से परे, आकाश से परे हूँ; मैं सम्पूर्ण शक्ति हूँ।

5 मैं कानून हूँ जो अनिवार्य है, मैं सत्य हूँ जो निर्दयी (निष्ठुर) है। मैं प्रकृति के लिये धनुप झुकाता हूँ ताकि उसका वाण उन लोगों को मार गिराचे जो परमेश्वरीय जीवन नहीं बिताते।

स्वर्ग पर मेरी हुकूमत है, इस शक्ति-शाली पृथिवी पर मैं फैला हूँ।

मांनव जाती की प्रार्थनाएँ शाम के समय वन से घर को लौटते हुए चौपायों की तरह बंवाती हुई मेरे पास पहुँचती हैं।

पूर्ण के नाम मिसिज वैलमैन का पत्र सहित उन सब पत्रों के जो राम से समय २ पर सूर्यानन्द जी को प्राप्त हुए।

प्रिय और अत्यन्त धन्यवान पूर्ण, "ओह, तुम्हारे पत्र ने आनन्द की सनसनी मुझमें पैदा

करदी। ऐसा मालूम पड़ा, अथवा यह सत्य था कि हमारे राम की पवित्र चेतना इस चिट्ठी और मेरी आत्मा में व्याप्त थी। निस्सन्देह यह अब सत्य है, क्योंकि उसके पत्रों में से एक में मुझे सूचित किया गया था "माता, राम सदा तुम्हारे साथ है," और आत्मा के लिये कोई हद्बन्दी नहीं है। ऐसा ही मैं विश्वास करती हूँ। हां, निश्चय रखती हूँ कि राम *पूर्ण के साथ है। आज का दिन कैसा पवित्र और शान्तिमय रहा है जो तुम्हारे पत्र में महान् चेतना को ला रहा है। इस पत्र के साथ साथ तुम निवेदन करते हो, कि मैं उन पत्रों के संग्रह को, जो राम ने मुझे भेजे थे, भेजूँ। उनकी कहावतों और कृतियों की भी कुछ याददाश्तें (भेज दूँ)। हम में से सब से शुद्ध के लिये भी सदा प्रेमपूर्ण रखने वाला भावात्मक ध्यान। यह महान् प्रबुद्ध आत्मा बच्चे की सी सौम्यता से हमारे मनों और हृदयों को हमारे परमेश्वर, अपनी दैवी आत्मा से मिलाने को ऊपर उठा ले गया। अरे, आधुनिक ऋषि राम के द्वारा आविभूर्त होने वाली उस महान चेतना की मधुरता और कोमलता की बलिहारी! परमेश्वर हमारे साथ था, पर हम में से कुछ यह नहीं जानते थे, और अब भी परमात्मा हमारे साथ है, और जैसा कि कल्याणात्मा राम ने प्रायः कहा था, "मृत्यु है ही नहीं," 'वह' (परमात्मा) उन से दूर नहीं जिनके नेत्र देखने को और कान सुनने को हैं। 1903 साल का ठीक आरम्भ था, जब मैं पहले पहल इस महात्मा से मिली थी। वह सैन-फ्रांसिस्को में व्याख्यान दे रहा था। मैं वे मन उस का व्याख्यान सुनने गई थी। किन्तु उस के ॐ उच्चारण से मेरा मन ऊपर को उठ गया, मेरी हस्ती ऐसी खुशी से

________________________ * सरदार पूर्णसिंह से मुराद है।

फड़क उठी जैसी कि पहले कभी मैं ने अनुभव नहीं की थी। स्वर्गीय, कल्याणकारी शान्ति ने मुझे जगमगा दिया।

और जीवन की रोटी जो वह बड़ी स्वच्छंदता से देता था पुष्टि पाने को मैं दूसरा अवसर कभी नहीं चूकी, अर्थात् प्राणाहार-रूपी व्याख्यान को सुनने से फिर मैं न चूकी। उसने अमेरिकनों से यह भी अपील की कि भारत वर्ष जाकर मेरे देशवासियों के परिवारों में बिलकुल उन्हीं के से होकर रहो और उन की सहायता करो। अनेक लोगों ने जाने का ववन दिया। किन्तु गया उन में से एक भी नहीं। एक दिन मैं ने राम से कहा, "स्वामी! आपने मेरे लिये जो कुछ किया है, उस के बदले में मैं आप के जाति भाइयों के लिये क्या कर सकती हूँ!" उन्होंने कहा, "अगर तुम चाहो तो बहुत कुछ कर सकती हो, किन्तु भारत वर्ष को जाओ।" मैंने उत्तर दिया, "मैं जाऊँगी।" किन्तु मित्रों ने मुझे रोका और उपहास तक किया। कुछ ने कहा कि जाने का विचार करना मेरा पागलपन है, विशेषतः चूंकि मेरे पास लौटने को काफी रुपया नहीं था, किन्तु राम ने कहा, "यदि तुम वस्तुतः वेदान्त जानती होती तो तुम कभी न डरती, क्योंकि भारत वर्ष में तुम वैसा ही परमेश्वर पाओगी जैसा अमेरिका में।" वैसे ही प्राणों के दिव्य चैतन्य स्वरूप परमेश्वर ने, मेरे प्यारे हिन्दू भाइयों और बहनों, हां, मेरे बच्चों की प्रेममयी, और कोमल उत्कंठा के द्वारा, अपनी सर्वपालक शक्ति प्रमाणित कर दी। फिर भी पांच महीने वीत जाने पर, अपने कल्याण स्वरूप राम से किये हुए अपने वादे को मैं पूरा कर सकी और उस के स्वदेश के लिये मैंने प्रस्थान कर दिया। अकेली! उस सुदूर देश में मैं एक भी मनुष्य को नहीं जानती थी, तथापि राम की शिक्षा के अनुसार पूर्ण

विश्वास के साथ "अनन्त की पालक भुजा का सहारा" था। मेरी अंतिम भेंट राम से शास्ता स्प्रिंग्स, कैलिफोर्निया में हुई थी। सैन-फ्रांसिस्को के लिये मेरी गाड़ी छुटने के पूर्व केवल चन्द घंटे में वहां ठहरी थी। मैं उस पहाड़ पर का वह दिन कभी भूल नहीं सकती, हिमाच्छादित शास्ताशृंग मीनार की तरह हमारे सिरों पर दंडायमान थी। ढाई वर्ष बाद, जब मैं अमेरिका लौटने वाली थी, इस महात्मा से मिलने के लिये कई दिन तक हिमालय का सफर करके मैं व्यास मुनि के स्थान गई। मन को हिला देने वाले उस अन्तिम अभिवादन का वर्णन करना या लिखना असम्भव है। और अन्तिम, कुछ ही महीनों बाद इस महापुरुष ने शरीर त्याग किया।

भारत वर्ष के लिये रवाना होनेके पूर्व मुझे कल्याण स्वरूप राम की, जो कुछ दिनों तक शास्त्रा में रहे थे, कई चिट्ठियां मिली थी। वे लिखते हैं:—

शास्ता स्प्रिंग्स, कैलीफोर्निया, 8 अक्तूबर, 1903।

अत्यन्त कल्याण स्वरूप दिव्य माता, राम आप की हरेक प्रगति की पूरी कद्र करता है। राम इतना स्वार्थी नहीं है कि और का और समझे, न इस की कोई सम्भावना है कि राम कभी उसे भूल जाय जो अपने भारत के, सत्य के, और पीड़ित मानव जाति के प्रेम में राम रूप हो गई थी। सूर्य का अर्थ है 'धन' (अंग्रेज़ी शब्द सूर्य का पर्यायवाची)। (उसने मेरा नाम सूर्यानन्द रक्खा था और वैसा ही राम कहता है।) "असत् का

प्रतिरोध न करो" इस का अर्थ निष्क्रिय नास्तित्व हो जाना नहीं है। नहीं, बिलकुल नहीं। इस वचन का शरीर के कार्यों से कोई सम्बन्ध ही नहीं है। इस आदेश का सम्पर्क मन से, और केवल मन से है। यह वाक्य मन की शान्ति का उपदेश देता है। मानसिक प्रतिरोध, विरोध और विप्लव "सँवारने के" बदले सदा विपमता, व्यग्रता और खीझ पैदा करते हैं, और फलतः तुम्हें अस्थिर करके प्रतीत होने वाली बुराई को प्रेम से ( बलिदान, या दानशील प्रकृति से) जिससे बढ़कर कोई उच्चतर शक्ति नहीं है, जीतते हैं।

"बुराई का प्रतिरोध न करो" और घटनाओं का स्वागत एक दाता की सी प्रसन्नता से करो। महान् आत्माएँ अपनी सभ्यता कभी नहीं नष्ट होने देतीं। अपनी शान्ति क़ायम रखने से हम बाधक ढेलों वा रोड़ों को सदा सीढ़ी के पत्थरों (ओटों) में बदल सकते हैं। निराशा की भावना को तुम्हें कदापि, कदापि अपने मन में न आने देना चाहिये।

ठीक, इसी समय राम को विचार आया था कि "भारतवर्ष पहुँचने पर मुझे अपने सुभीते के अनुसार तुरन्त प्योर पूरन का पता दर्याफ्त करना चाहिये"। वह पंजाब में कहीं होगा। "थंडरिंग डान" का सम्पादक" वही है। इसके लिये परिचायक पत्रों (introductory letters) की ज़रूरत नहीं है।

आशा है कि एक स्थान (सीट) ठीक कर लेने के बाद तुम तुरन्त राम को पत्र लिखोगी।

तुम्हारा अपनाही विशुद्ध वीर आत्मा राम स्वामी के रूप में।

यह चिट्ठी (राम से) मुझे तब लिखी गई थी जबकि अपनी नियत भारतीय यात्रा के सम्बन्ध में मेरे मन पर बड़ा भार था, क्योंकि मेरे जाने का बड़ा विरोध हो रहा था।

शास्ता स्प्रिंग्स, केलीफ़ोर्निया, 10 अक्तूबर, 1803,

प्यारी माता,

लिखने के कागज़ और लिफ़ाफ़ों सहित तुम्हारा प्यारा पत्र मिला। मैंने उसे एक पेटी कागज़ और लिफ़ाफ़े भेजे। जब तुम उस सहानुभूतिशील भूमि (भारत) पर क़दम रक्खोगी, तब तुम्हारा हार्दिक स्वागत किया जायगा। राम भारत को लिख चुका है। यदि तुम वहां जाओगी तो अपने नाम को अपने आपसे आगे दौड़ते देखोगी। जहां कहीं तुम टिकना चाहोगी, वहीं तुम्हारा स्वागत होगा। (एक प्रश्न के उत्तर में वह कहता है)। जब हम अपने आपको ओछेपन, तुच्छता और हास-विलास के हवाले कर देते हैं, तब प्रकृति के एक अदृश्य क़ानून से हमें उस की प्रतिक्रिया से ऐसा दुःख भोगना पड़ता है कि जो हमें नीचे दबा देता है। बुद्धिमान मनुष्य सदा अपने मन को स्वस्थ रखता है और एक मात्र परम तत्व में लगाये रहता है।

जहां तक सांसारिक बातों का सम्बन्ध है, वह अति उदार राजकीय दाता की सी तटस्थ, उदासीन, निष्काम और धैर्ययुक्त वृत्ति से उन में लगता है।

यह श्रेष्ठ भाव समस्त क्रियाशील कार्यों में क़ायम रक्खा जाता है। और निष्क्रिय अनुभवों के सम्बन्ध में, मुक्त-आत्मा उन सब को अप्रभावित, अविचलित भाव से और बड़ी हंसी खुशी से भोगता है, अथवा हर समय अपने इस स्वाभाविक प्रताप को स्पष्ट रूपसे याद रखता है!! "मैं अकेला हूँ, अद्वितीय हूँ, सूर्य मेरी मूर्ति (चिन्ह) है। अपने आपके वास्तविक सूर्य-बिम्ब को निरन्तर मनन करने से और जीवन के नित्य के मामलों में उसके प्रयोग से आप का व्यक्तिगत आत्मा प्रेम, प्रकाश, और प्राण की उच्चतम विभूति हो जाता है। आशा है कि जहाज़ पर चढ़ने या जहाज़ चलने के पहले तुम राम को लिखोगी। जब आप हांगकांग और जापान पहुंचोगी तब भी आप को लिखना चाहिये। भारत में तुम्हारे लिये, कुछ (सुभीता) करने में राम को बड़ी खुशी होगी।

तुम्हारा श्रेष्ठ, प्रेमी आत्मा राम के रूप में। ॐ ! ॐ !! ॐ !!!

शास्ता स्प्रिंग्स, कैलीफोर्निया, 16 अक्तूबर, 1803,

अत्यन्त धन्य और श्रेष्ठ सूर्यानन्द,

तुम्हारी दोनों चिट्ठियां आज दोपहर को एक साथ ही राम के हाथ में आईं। सब ठीक और सन्तोषजनक है। चूंकि तुम लम्बा सफर करने वाली हो, इस लिये यदि मानवप्रकृति का तुम्हारा ज्ञान कुछ और बढ़ जाय, तथा पूर्ण रूप से स्थिरचित्त, शान्त और सदा अपने घर में रहने की महत्ता तुम्हारे हृदय पर अमिट रूप से अंकित हो जाय,

तो तुम्हारा उपकार हो सकता है। (एक मामले में देर थी जिससे मुझे बड़ी बेचैनी थी)। सब बाह्य विलम्बों और विरोधों का अभीष्ट तुम्हारी आन्तरिक शक्ति और पवित्रता को बढ़ाना है। प्रकृतिवादियों ने निर्विवाद रीति पर सिद्ध कर दिया है कि विरोध और युद्ध वा कलह के बिना किसी तरह का विकास या उन्नति असम्भव है।

तुम्हें राबर्ट ब्रूस और मकड़ी की कहानी याद है? "क्या सैकड़ों, नहीं नहीं, हज़ारों असफल प्रयत्न प्रत्येक महान् आविष्कार के पूर्वगामी नहीं होते हैं?" खूब सवेरे यदि आध घंटा यह मन्त्र जपने में तुम लगाओगी तो अच्छा करोगी (मन्त्र न देने के लिये क्षमा करिये)। इस मन्त्र को जपते समय इस में निहित सत्य को अपनी प्रकृति में प्रबलता से भरते रहो। इस प्रकार की निरन्तर आत्म-सूचना तुम्हें पूरा संन्यासी (स्वामी) बना देगी। कृपया शीघ्र लिखना कि तुम्हारी यात्रा के सम्बन्ध में क्या बन्दोबस्त हुआ। गम्भीरतम प्रेम और अत्यन्त सच्चे आदर के सहित।

तुम्हारे निजात्मा राम स्वामी। ॥ ॐ ॥

शास्ता स्प्रिंग्स, कैलीफोर्निया, 21 अक्तूबर, 1803।

अत्यन्त धन्य और दिव्य सूर्यानन्द, तुम्हारा कल का पत्र अभी मिला।

ओह! कैसा सुखकर संवाद है, भारत के लिये प्रस्थान। हांगकांग में यदि आप सेठ वस्तिसया मल आत्मुमल (घंटाघर

के निकट) से मिलोगी तो हिन्दू व्यापारियों को राम (तीर्थ) की आनन्दावस्था और अपने श्रेष्ठ उद्देश्य का समाचार देकर आप उन्हें प्रसन्न कर सकोगी।

जिन लोगों को चिट्ठियां दी जा चुकी हैं वे सब स्थानीय मामलों के सम्बन्ध में तुम्हें संतोषजनक समाचार से सुबोध कर देंगे। तुम्हें केवल चल पड़ने की ज़रूरत है, बाद को अन्य हरेक बात यथेष्ट स्निग्धता से चलेगी। एक बात ध्यान में रखना। जब किसी सम्प्रदाय के लोगों से मिलने का तुम्हें इत्तिफ़ाक़ हो, तब दूसरे दलों की जो समालोचना वे करें उस पर आप कदापि नहीं, कदापि नहीं, कदापि नहीं ध्यान दें, इस का ख़याल रक्खें, या इसे याद रक्खें। यदि कहीं भी आप को भक्ति, अलौकिक प्रेम, दानशीलता, या आत्मिक ज्ञान की वृत्ति दिखाई पड़े, तो उसे तुम ग्रहण करो, सीख लो, अपना निजांग रूप बना लो, और किसी व्यक्ति के द्वेष को ग्रहण करने का समय न पाओ। उन की दुर्बलताओं और त्रुटियों पर ध्यान न दो।

कलकत्ते में सेठ सीताराम को मिलने से न भूलना। कलकत्ते में तुम (मासिक पत्र) "डान" के विद्वान सम्पादक से भी मिल सकती हो, जो निराभिमानी, विशुद्ध, आत्मत्यागी, श्रद्धालु और कट्टर वेदान्ती पुरुष हैं। वे एक शिक्षा और आश्रावास संस्था भी सफलता-पूर्वक चला रहे हैं। कलकत्ते में तुम संकीर्तन, भक्ति पूर्ण नृत्य का भी सुखोपभोग कर सकती हो।

भारत माता सदा तुम्हें उसी तरह ग्रहण करेगी जिस तरह एक प्रेममयी माता वर्षों के बिछुड़े बच्चे को लौटने पर ग्रहण करती है। वर्तमान के लिये भगवान तुम्हारा कल्याण करे। राम सदा तुम्हारे साथ है।

Passage to India! O! We can wait no longer! We too take ship, O soul! To you, we too launch out on trackless seas! Fearless for unknown shores. On waves of ecstacy To sail. Amid the wafting winds Carolling free, — singing our song of God! Chanting our chant of happy soothing OM! Passage to India! Sailing these seas, or on the hills, or waking in the night, Thoughts, silent thoughts of Time and Space and Death like waters flowing, Bear me indeed as through the regions infinite Whose air I breathe, whose ripple…………

Bathe me O God in Thee, mounting to Thee, I and my soul to range, in range of Thee, Passage to Mother India! Reckoning ahead, O soul, when Thou the time achieved, The seas all crossed, weathered the copes, the voyage done, Surrendered, copest, frontest, God. Yieldest, the aim attained.

As filled with friendship, Love complete, The Elder Brother found, The younger melts in fondness in his arms. Passage to India! Are the wings plumed indeed for such far flight? O soul, voyagest thou indeed on voyages like these? Soundest below the Sanscrit and the Vedas? Then have thy bent unbashed. Passage to you, your shores, ye aged fierce enigmas, Passage to you, to mastership of you, you Strangling problems, Passage to mother India, O Secret of earth and sky! Of you, O waters of the sea! O winding creeks and Ganges! Of you, O woods and fields! Of you, O mighty Himalayas, O morning red! O clouds! O rain and snows, O day and night, passage to you! O sun and moon, and all ye stars, stars, Sirius and Jupiter, Passage to you! Passage, immediate. Passage! The blood burns in my veins!. Away O soul, hoist instantly the anchor,

Cut the hawsers — haul out — shake out every sail. Have we not stood here like trees in the ground long enough? Sail forth, steer for the deep waters only, O we are bound where mariner has not yet dared to go, And we will risk the ship ourselves and all. O my brave soul! O father, father, sail. O daring joy but safe, O father, father, sail To your real Home. Rama

भारत की यात्रा।

अरे! अब हम नहीं रुक सकते! हम भी जहाज़ पर सवार होते हैं, हे आत्मा! तेरे लिये, हम भी पथहीन समुद्र में नाव छोड़ते हैं! निर्भय होकर अज्ञात तटों के लिये! आत्यानन्द की लहरों पर। समुद्र यात्रा करने को हम भी तैयार होते हैं। वहां ले जाने वाली हवा के बीच स्वच्छन्दता से आनन्द के गीत गान अर्थात् भगवत् भजन करते और सुखमय शान्ति कर, ॐ का उच्चारण करते हुए हम भी चलने को तैयार हैं, हे भारत यात्रा! इन समुद्रों में यात्रा करते या पहाड़ों पर चलते, अथवा रात में जागते हुए,

विचार—काल, देश और मृत्यु के मौन विचार—जलवत् बहते हुए, वस्तुतः मुझे मानो अनन्त प्रदेशों के मध्य में से ले जाते हैं। जिन की वायु में सांस लेता हूँ, जिस की तरंग………

हे परमेश्वर! मुझे अपने में नहला, तेरी ओर बढ़ते हुए, मैं और मेरी आत्मा तेरी पंक्ति में भ्रमण करें। हे भारत माता की यात्रा! आगे को काल गिनते हुए हे आत्मा, जब समय रूप 'तू' प्राप्त हो गया, सब सागर पार कर लिये, भंवरों को सम्हाल लिया, यात्रा पूर्ण हो गई, आत्मसमर्पण किया, अब परमेश्वर झगड़ता है, सामना करता है और अधीन होता है, लक्ष्य प्राप्त हो गया। मानो परिपूर्ण मित्रता से, पूर्ण प्रेम से, बड़ा भाई मिल गया, छोटा उस के अंक में स्नेह से पिघला जाता है। हे भारत यात्रा! क्या इतनी दूर की उड़ान के लिये वस्तुतः पंख सधे हुए हैं? हे आत्मा, क्या सचमुच तू ऐसी यात्राओं की यात्रा करती है? क्या नीचे (इस लोक में) तू संस्कृत और वेदों की ध्वनि करती है?

तब वे अपनी निर्लज्ज लगन तू प्राप्त कर। हे वृद्ध भयानक पहेलियों! तुम्हारी ओर, तेरे तटों की ओर यात्रा हो! हे गलाघुटती समस्याओं! तुम्हारी ओर यात्रा, तुम्हारे स्वामित्व की ओर यात्रा हो! भारत माता की यात्रा हो! हे पृथिवी और आकाश का रहस्य! हे समुद्र के जल! हे चक्करदार दरार और गंगा तुम्हारा रहस्य! तुम्हारा (रहस्य) हे वनो और खेतो! तुम्हारा रहस्य, हे शक्तिशाली हिमालय, हे मेघों! हे वृष्टि! और हिमों! लाल प्रभात का रहस्य, हे दिन और रात, तुम्हारी यात्रा हो। हे सूर्य और चन्द्र, और सब तुम नक्षत्रों, तुम्हारी यात्रा हो, नक्षत्रों, बुध और वृहस्पति, तुम्हारी यात्रा हो! यात्रा तुरन्त यात्रा! मेरी नाड़ियों में रक्त जलता है! हे आत्मा, तुरन्त लंगर उठाओ, रस्सियां काट दो, खींच लो, हरेक बादबान हिला दो! भूमि में वृक्षों की भांति क्या हम काफी देर तक यहां खड़े नहीं रहे? खेओ, केवल गहरे जल (समुद्र) के लिये खेओ, क्योंकि हम वहां जाने वाले हैं जहां अब तक किसी मल्लाह ने जाने की हिम्मत नहीं की है, और हम जहाज़ को, अपने आप को, और सब कुछ को जोखिम में डालेंगे।

हे मेरे वीर आत्मा! हे पिता, हे पिता! खेओ। हे साहस किन्तु सुरक्षित आनन्द, हे पिता, पिता! अपने सच्चे घर को खेओ।

राम ॐ ! ॐ !! ॐ !!! ॐ

शिकागो, इल्लीनोइस। 15 फरवरी 1804। अत्यन्त धन्य आत्मा

आप के अनेक पत्र, तार, और सब कुछ ठीक समय पर राम को मिले। जब केवल एक ही तत्व है, तो कौन किस को धन्यवाद देगा? राम हर्ष से परिपूर्ण है, राम सर्व आनन्द है। राम सर्वदा पूर्ण शान्ति है। कार्य राम से बहता है। राम कोई काम नहीं करता है। तू स्वयं सुगन्धित गुलाब हो, और मधुर गंध आप ही चहुँ ओर तुझ से, मुझ से, और मुझ से, बहेगी।

क्या तुम अपने आप को पूर्ण हृदय से हिन्दू समझती हो? क्या उनकी भूलों और अन्ध विश्वासों को आप अपना समझती हो? अपने निजी भाइयों और बहनों के समान क्या आप उनपर भरोसा कर सकती हो? क्या आप कभी अपनी अमेरिका की पैदायश भूली और जन्म के हिन्दू में अपने को रूपान्तरित पाया? जैसा कि राम प्रायः अपने आप को गहरा रंगा कट्टर ईसाई देखता है। यदि ऐसा है तो अनायास अद्भुत कार्य तुम से निकलेगा।

तुम कौन हो! तुम कौन हो जो पतितों का उद्धार करने को दौड़ती फिरती हो? क्या स्वयं तुम्हारा उद्धार हो गया?

क्या तुम जानती हो कि "जो कोई अपने प्राण बचावेगा, वह उन्हें खोवेगा!" तो क्या तुम नष्टों (भ्रष्टों) में से एक हो? क्या तुम भी एक च्युत (भ्रष्ट) हा सकती हो या होना चाहोगी? तब उठो और त्राता बनो। पापी बनो-उससे अपनी एकता का अनुभव करो, और तब तुम उस का उद्धार कर सकती हो। केवल एकमात्र प्रेम-मार्ग से अतिरिक्त और कोई रास्ता सब पर विजय पाने का नहीं है।

तुम्हारा अपना आत्मा स्वामी राम के रूप में ॐ ! मिन्नियापोलिस, एम, एन. अमेरिका 3 अप्रैल 1804, अत्यन्त कल्याणात्मा,

तुम कहां हो! मथुरा के लिखे शुभ नये वर्ष के पत्र के बाद प्रिय श्रेष्ठ माता की कोई चिट्ठी नहीं मिली। शान्ति, शान्ति, शान्ति भीतर से आती है। स्वर्ग का साम्राज्य केवल भीतर है। पुस्तकों, देवालयों, देवस्थानों, महात्माओं, और साधुओं में आनन्द की खोज व्यर्थ है। तुम्हारे अनुभव ने अब तक तुम पर यह ज़रूर प्रकट कर दिया होगा। यदि यह पाठ एक बार पढ़ लिया गया तो मूल्य कुछ भी देना पड़े, पर वह महँगा किसी दामों नहीं होगा। अकेले बैठो, अपनी पीड़ा वा आकुलता को दिव्य आनन्द में परिणत कर दो। "थंडरिंग डान" सरीखी पुस्तकों से उत्साह प्रद

सूचनाएँ आप को प्राप्त हो सकती हैं। ॐ का चिन्तन (ध्यान) करो! और मानवजाति निमित्त शान्ति के दाता बनो, न कि एक आशाशील अन्वेषक। प्यारी! "शास्ता स्प्रिंग्स" में क्रीक (Creek) के पास राम ने जो अन्तिम शिक्षा तुम्हें दी थी, क्या वह तुम्हें याद है? वह शिक्षा मंगता की दशा से नहीं दी गई थी, बल्कि प्रकाश और प्रेम के नित्य दाता की हैसियत से दी गई थी, जब हमारा मंगने का भाव होता है, तब हमारे हृदय फट जाते हैं। अमेरिकनों के प्रति राम की अपील में भारत की जो दशा वयान की गई है वह तुम ने तसदीक कर ली होगी। दया करके उस व्याख्यान को एक बार फिर पढ़ लेना। अपने निष्काम श्रम से किसी तात्कालिक, प्रत्यक्ष फल की आशा न करना। ईसा की आत्मा कहती है, "सेवा से सन्तुष्ट रहो!" सेवा के अधिकार से बढ़कर कोई पुरस्कार, आशीर्वाद या इनाम नहीं है। यदि लखनऊ के "पेडवोकेट" के सम्पादक बाबू गंगाप्रसाद वर्मा से आप नहीं मिली हैं तो कृपया उसे ज़रूर मिलिये। भारत के गरीब हिन्दुओं के कष्टों में भाग लेने में आप के हृदय को क्या अधिक सुख प्राप्त होता है या अमेरिका में जीवन के सुखों को भोगने में? (यहां तक कि) मैं फिर भारतवर्ष में उत्पन्न होना चाहता हूँ।

राम एक महीने तक पोर्टलैंड (ओरीगन) में, एक महीने डेनवर में, दो सप्ताह शिकागो में, और दो सप्ताह मीनियापोलिस में था। इन स्थानों में वेदान्त सभाएँ संगठित हैं। विभिन्न विश्वविद्यालयों में निःशुल्क छात्रवृत्तियां गरीब हिन्दू विद्यार्थियों के लिये प्राप्त की गई हैं। यहां से

राम बफैलो, (न्यो यार्क) को जायगा। वहां से बोस्टन, निउयार्क, फिलाडल्फ़िया और वाशिंगटन डी. सी. को जायगा। पहिली मार्च और 29व 30 जून को सेंटलूईस में वर्ल्डस यूनिटी लीग (संसारभर के मिलाप की संस्था) के अधिवेशनों में राम को उपस्थित होना होगा। जुलाई में राम लेक जेनेवा में होगा। दूसरे शरत्काल में राम लंदन, इंग्लैंड जायगा। प्यारी माता! साहस न छोड़ो। वस्तुओं के केवल उज्ज्वल पक्ष (bright side) की ओर देखो। बिना कांटे के एक भी गुलाब नहीं है, इस अमिश्रित संसार में पुण्य कहां! एक पुण्य स्वरूप तो केवल परमात्मा है। यदि भारत में असली वेदान्त (सत्य) होता तो अमेरिका से अपील करने की क्या ज़रूरत पड़ती? जब तुम्हारा हृदय सर्व की सुन्दरता से पूरी तरह फरवर हो जायगा, तब तुमको सब कहीं हरेक वस्तु महोज्ज्वल मालूम पड़ेगी। शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!

केन्द्रीय आनन्द, आन्तरिक हर्ष, सदा और सर्वदा के लिये (तुम्हारे साथ हो)।

तुम्हारा अपना आत्मा स्वामी राम के रूप में

ॐ! ॐ!! ॐ!!! विलियम्स बे, विस, या लेक जेनेवा, 8 जुलाई 1804, अत्यन्त कल्याण रूप दिव्य आत्मा,

तुम्हारे पत्र राम को मिले। धन्यवाद। राम स्थिति को पूरी २ तरह समझता है। शान्ति, आनन्द और सफलता

सदा तेरे साथ रहेगी। अधिकार जमाने ही भावना और अभि- लाषा जिस पवित्र आत्मा ने दूर कर दी उसके लिये कोई भय, खतरा या किसी प्रकार की कठिनता नहीं है। मैं विश्व में अपने को पसारता हूँ और स्वच्छन्द हुआ आराम करता हूँ। छाती में भुजंग यह परिच्छिन्न "मैं" ही है। उसे निकाल कर फेंक दो, और सारा संसार तुम्हारा सत्कार करेगा। मिनियापोलिस से "राम" के लौटने पर एक लम्बा टाइप किया हुआ पत्र "प्रैक्टिकल विज़डम" (मासिक पत्र) में प्रकाशनार्थ प्राप्त को भेजा गया था। पत्र का विषय था "व्यवहार में लाने योग्य वा व्यवहार सिद्ध ज्ञान"। सेंट लुइस में वर्ल्डस यूनिटी लीग की प्रथम बैठक "राम" की अध्यक्षतामें आरम्भ हुई। यूनिटी लीगमें राम के व्या- ख्यानों के साथ २ कुछ अन्य स्थानों के अतिरिक्त सेंट लुइस में स्थापित थियासोफिकल सोसाइटी और चर्च आफ प्रैक्- टिकल क्रिश्चैनिटी के आश्रमों के तले भी प्रवचन हुए थे। कुछ दिनों में राम शिकागो जायगा,वहां से बफैलो, लिलीडेल और ग्रीनएकर (मेन) जायगा, और सितम्बर में या पहले ही अमेरिका से रवाना होजायगा। सबको शान्ति कल्याण और प्रेम पहुँचे। तुम्हारा अपना आत्मा स्वामी राम के रूप में

ॐ! ॐ!! ॐ!!! जैकसनविल्ले. फ्लोरिडा, 1 अक्तूबर 1904, अत्यन्त कल्याणस्वरूप प्रियात्मा, राम ने कुछ दिनों से तुम्हें कुछ भी नहीं लिखा है। इसका कारण यह है—

(1) राम निरन्तर बहुत मसरूफ ( कार्यव्यग्र ) रहा, (2) समाचार पत्रों के लिये कुछ पत्रों के सिवाय भारत में किसी व्यक्ति को पत्र नहीं लिखे गये, (3) यह जान कर कि तुम अच्छे हाथों में ( सज्जनों के पास) हो, राम ने पत्र भेजना आवश्यक नहीं समझा, (4) जब से मिन्नियापोलिस छोड़ा, तब से राम को तुम्हारी कोई चिट्ठी नहीं मिली। शान्ति कल्याण, प्रेम तथा आनन्द सदा और सर्वदा तुम्हारे साथ रहे। स्वयं अपनी भीतर की आवाज़ ( नाद ) का ठीक 2 अनुगमन करने में तुम किसी के प्रति झूठ नहीं होसकते हो। हमने किसी को भी कुछ देना नहीं है। हमारा परिश्रम प्रेम का परिश्रम ( निष्काम ) होना चाहिये। सदा गम्भीर और सम्पन्न होना हमारा नियम वा सिद्धान्त होना चाहिये। हरेक नर और नारी को स्वच्छन्दता से अपना अपना अनुभव करने दो। हमें केवल यही अधिकार है कि अपने साथी मनुष्यों को उनकी अग्रसर गति में सहायता दें। जब मैं मित्रों को उनके आध्यात्मिक पतन में सहायता देता हूँ, तब उनके साथ में स्वयं गिरता हूँ। तुम कुछ भी करो, कहीं भी तुम हो, राम का आशीर्बाद और प्रेम तुम्हारे साथ है। परसों "राम" न्युयार्क के लिये रवाना होगा। बहुत सम्भव है कि 6 अक्तूबर को ( राम ) प्रिंसेज़ आईरीन ( Princes Irene ) नामक जहाज़ पर सवार होकर जिब्राल्टर जायगा। सम्भवतः भारत पहुँचने में कुछ समय लगे, क्योंकि राह में अनेक स्थानों में ठहरने की संभावना है।

याद रखने और अमल करने के सूत्रः— यदि किसी मित्र के किसी दोष को आप जानते हों तो उसे भुला दो। यदि उसकी कोई अच्छी बात जानते हो तो वह कह दो। "वह परमेश्वर सब लोगोंके हृदयोंमें ऊँचे पर विराजमान है और वह भी जो कि हम लोगों में दोष प्रतीत होगा। उस का चेहरा अत्युतम रसायन की तरह नेकी और योग्यता में बदल जायगा। उस निर्भय निरन्तर दाता की सूर्यवत् वृत्ति, जो (वृत्ति) विना किसी पुरस्कार की आशा के सेवा करती है, जो विघ्नरहित प्रेम से प्रकाश और जीवन का प्रसार करती है, ईश्वर के तेज की तरह दिव्य प्रभा में निवास करती है, जो व्यक्तित्व की सम्पूर्ण भावना से परे है, और स्वार्थ परता से मुक्त है, वही मुक्ति और बड़ाई है।

"I eat of the heavenly manna, I drink of the heavenly wine, God is within and around me, All good is for ever mine."

"मैं स्वर्गीय बंशलोचन खाता हूँ, मैं स्वर्गीय मदिरा पान करता हूँ, परमेश्वर मेरे भीतर और इर्दगिर्द है, सारी भलाई सदा के लिये मेरी है।" तुम्हारा अपना आत्मा स्वामी राम ( मिस्टर बैलमैन अर्थात् सूर्यानन्द का राम के खत के उत्तर में नीचे लिखा पत्र बिना तारीख का है।

"ओह, इन अमूल्य चिट्ठियों को पढ़ने में क्या लुत्फ़ है ! और इनकी नक़ल करना अधिक प्रकाश,हर्ष, पवित्र और बढ़ा चढ़ा अनुभव प्रदान करता है। प्यारे पूरन ! मैं जानती हूँ, इन से तुम्हें आनन्द मिलेगा, और फिर जिन्हें तुम ये देखोगे उन सब को ये सहायता पहुँचावेंगे। पूरी नक़ल देना तो असम्भव है। कल्याण स्वरूप दिव्य गुरुदेव का (aura),ओजस (तेज) कागज़ और गुरुदेव की लिखी सब पंक्तियों में व्याप्त है। मेरे लिये सब से अधिक मूल्यवान यही हैं। स्वयं राम ही मेरे निकट उपस्थित हो जाते हैं जब मैं उन सात्विक पंक्तियों को पढ़ती हूँ, जो मेरे हृदय में प्रेरणा उत्पन्न कर देती हैं, हां मेरे मन और हृदय को प्रकाशित करती हैं, यहां तक कि आत्मा की उज्ज्वलता दिखाई देने लगती है, और मेरी आत्मा, वास्तविक दिव्यात्मा एक मात्र तत्त्व मुझे ज्ञान होती है। सूर्यानन्द।

निम्न लिखित पत्र स्वयं सूर्यानन्द को राम के अमेरिका से भारत पहुँचने पर लिखा गया था। हर्ष ! हर्ष ! हर्ष ! ॐ ! ॐ ! ॐ ! बम्बई।

अत्यन्त धन्य रूप प्रिय माता,

राम बम्बई में पांच दिन से है और शीघ्र मथुरा पहुँ- चेगा। व्याख्यानों और लोगों से मिलने जुलने में राम सदा अति प्रवृत्त रहता है। राम सदा की भांति अत्यन्त प्रसन्न

है। आप अभी तक भारत में हैं यह सुन कर 'राम' को बड़ी खुशी हुई। ईश्वर तुम्हें पूर्ण स्वस्थता, हृदय में शान्ति, प्रफुल्लित वृत्ति, और आनन्दमय चित्त प्रदान करे। तुम से मथुरा में मिलने की मैं आशा करता हूँ। आप का आत्मा में रहने वाला

—:॥:— ॐ ! आनन्द ! आनन्द ! आनन्द !

प्यारे पूरन, तुम जानते हो कि हम सब मथुरा में कैसे मिले। और तुम सभाओं का हाल भी जानते हो। कैसा धन्य समय वह था। धन्य ! धन्य ! ॐ ! ॐ ! ॐ ! पुष्कर, 14 फरवरी 1905।

अत्यन्त धन्य रूप प्रिय दिव्य माता,

बम्बई विश्वविद्यालय के एक उपाधिधारी ( बी. ए. चतुर्थ विद्यार्थी ), एक सुन्दर युवा पुरुष ने आज राम के कार्य में अपना जीवन अर्पण किया है। वह राम के साथ रह कर साहित्य के कार्य में सहायता दिया करेगा। प्यारा परमेश्वर या विधाता कितना भला है। जो उस पर भरोसा करके काम करते हैं उन को वह कभी धोखा नहीं देता है। नारायण स्वामी शीघ्र विदेशों में व्याख्यान देने को भेजे जायँगे। विचित्र स्थानों और दिशान्तरों का काम भी बढ़ना

ही महान है जितना उज्ज्वल केन्द्रों का। रहट में दांत के सदृश छोटी लकड़ी का सहारा ( हिन्दुस्तानी में जिसे कुत्ता कहते हैं ) भी उतनाही महत्वपूर्ण है जितना कि बैल। यदि क्षुद्र लकड़ी का सहारा हटा लिया जाय तो फिर सारा यन्त्र नहीं टिक सकता। नहीं, नहीं, चक्र में लगी हुई हरेक कील अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यदि देखने में ऐसी छोटी चीजों का वे लोग उपयोग नहीं करते हैं तो क्या हुआ। ईश्वर की दृष्टि में छोटा से छोटा कार्य भी, प्रेम वृत्ति से किया जाने पर, बहुत बड़ा है। नन्हा सा अंशकण प्रभापूर्ण सूर्य के सामने कुछ भी नहीं जान पड़ता है, किन्तु विचारवान् की दृष्टि देखती है कि वही नन्हा बूँद समस्त सूर्यमण्डल को अपने मधुर छोटे हृदय में प्रतिविम्बित करता है। इस लिये, मेरी धन्य प्यारी माता, उपेक्षित स्थानों में कोमल, मौन कार्य, जिस में नाम और कीर्ति नहीं है, उतना ही श्रेष्ठ और श्रद्धापश्यक है जितना कि खूब शोरगुल का काम जो सम्पूर्ण मानवजाति का ध्यान आकर्षित करता है। मैं जो थोड़ा काम करता जान पड़ता था उस से मैं निराश हुआ था। "वे भी सेवा करते हैं जो केवल खड़े होकर प्रतीज्ञा करते हैं।" माता नन्हे बच्चे को लपेटती है, और उस का समय जब उसे विश्वविद्यालय में लाता है, तब अध्यापक सयाने लड़के को पढ़ाता है, माता का कार्य उतना उच्च और कीर्तिकर ही है जितना कि अध्यापक का। तथापि माता का कर्तव्य अध्यापक से कहीं अधिक मधुर और महत्वपूर्ण है। हम यह नहीं सह सकते कि बचपन में माता की गोद और सुलाने की थपथपाहट का स्थान अध्यापक का कमरा और शिक्षा ग्रहण कर ले। वेदान्त चाहता है कि साधारण कुली अपने दीन वा छोटे

से परिश्रम को ठीक रूप्ण या ईसा का सा महत्वपूर्ण और पवित्र परिश्रम समझे। कुर्सीका एक पाया जब हम हटाते हैं,तब क्या हम सारी कुर्सी नहीं हटाते हैं ! इसी तरह जब हम एक चीज़ को उठाते या ऊँचा करते हैं, तब हम उस के द्वारा सम्पूर्ण संसार को उठाते और उत्कृष्ट करते हैं, मनुष्य की घनता (solidarity) इतनी कठोर है।

" अपने आप से परिमित, और परमेश्वर के अन्य कार्य की दशा से निश्चिन्त (बे परवाह) अपनी सम्पूर्ण शक्ति अपने ही कार्यों में ढालने वाले सज्जन तुम देखते हो ऐसे महान जीवन प्राप्त करते हैं।

अरे पवन-जात वायी ! बहुत काल से अत्यन्त स्पष्ट, तेरी सी एक चीख अपने ही हृदय में मैं सुनता हूँ।

निश्चय करो अपने आप में स्थित होने का, और जानो कि जो अपने आप को पाता है वह अपने दुर्भाग्य को खोता है।

ॐ ! हर्ष ! हर्ष ! ॐ ! शान्ति, कल्याण ! प्रेम ! —:o:— राम पुष्कर, ( जिला अजमेर ) । 2 फरवरी 1905, ॐ ! शान्ति, कल्याण ! प्रेम ! हर्ष ! अत्यन्त धन्य स्वरूप प्रिय माता,

तुम्हारा मधुर, स्वर्गीय पत्र प्राप्त हुआ। शरीर पर ऐसा सुन्दर काबू होना जैसा कि कल्याण रूप सूर्यानन्द का है,

वास्तव में परमेश्वर से विचित्र स्वरैक्य ( एक स्वरता ) है, और प्रेम से अद्भुत तालैक्य ( एक तालता ) है। ( मैं बीमार था, और दिव्य शक्ति से चंगा हुआ हूँ । प्रेम ) ॐ ! जय ! जय ! जय !

तुम ने जो कविता भेजी थी वह अत्युत्कृष्ट थी।

God moves in a mysterious way His wonders to perform! He plants His footsteps in the sea And rides upon the storm.

Deep in unfathomable mines Of never failing skill, He treasures up His bright designs 'And works His Sovereign Will.

'Ye fearful saints, fresh Courage take. The clouds ye so much dread 'Are big with mercy and shall break In blessings 'on your head.

Behind a 'frowning Providence He hides in smiling face. The bud may have a bitter taste But swe et will be the flower.

परमेश्वर गूढ़ ढंग से चलता है

अपने अद्भुत कार्य करने को ! वह सागर में अपने पग जमाता है और तूफान पर सवार होता है।

कभी न चूकने वाली दत्तता की, अथाह गहरी खानों में। अपने उज्ज्वल मनसूबों को वह संचित करता है और अपने सर्व श्रेष्ठ संकल्प को कार्यान्वित करता है,

तुम भयभीत सन्तों ( साधुओं ) ! नया साहस पकड़ो जिन मेघों से तुम इतना डरते हो। वे दया से बड़े हैं और तुम्हारे सिर पर आशीर्वाद में टूटेंगे ( बरसेंगे )

घूरने वाली विधि के पीछे ईश्वर अपना हँसता चेहरा छिपाता है। कली में चाहे कड़ुआ स्वाद हो, परन्तु पुष्प मधुर होगा।

हां, वाबू ज्योतिष स्वरूप वास्तव में भलाई के अत्यन्त धन्य, स्वर्गीय अवतार हैं। वे बड़े ही कृपालु हैं। तुम्हारा अपना आत्मा स्वामी रामतीर्थ के रूप में

पुष्कर, ( जिला अजमेर ) ॐ ! हर्ष ! हर्ष ! ॐ ! शान्ति !

धन्य दैवी माता,

राम उस छत पर लेटा था जिस पर आप उसके साथ बैठी थीं। ( किशनगढ़ के प्रधानमंत्री की उदारता-पूर्ण कृपालुता के द्वारा मुझे मुबारक राम के साथ पुष्कर में एक दिन व्यतीत करने की आज्ञा मिल गई थी। ) मैं दिव्यज्ञान में डूबा हुआ था, और तब तक बेखबर था जब तक तुम्हारा पत्र कुछ और पत्रों के साथ राम के हाथों में लाकर रक्खा गया था। चिट्ठी खोलने के पहले तक लम्बी, हार्दिक, पुरज़ोर और सुखपूर्ण हँसी तुम्हारी धन्यात्मा को भेजी गई थी। ॐ ! शान्ति ! शान्ति ! शान्ति ! प्रियतम माता, तुम्हारा मधुर पत्र पढ़ने के बाद राम तुम्हें हर्षपूर्ण हँसी की दूसरी महाध्वनि (गरगराहट) भेजता है। माता, हर प्रकारसे तुम बिलकुल ठीक हो, और राम तुम्हारी पवित्र, मधुर, कोमल, और सौम्य प्रकृति को खूब समझता है। राम विभिन्न विषयों पर लिख रहा है—गद्य और कुछ कविता—परमेश्वर के आदेश के अनुसार। बाबू गंगाप्रसाद वर्मा लखनऊ तथा अन्य स्थानों में तुरन्त स्त्री-शिक्षा का सुधार करने के उद्देश्य से कन्या पाठशालाओं को देखने के लिये और स्त्री-शिक्षा-पद्धति का अवलोकन करने के लिये विदेशों को भारत के अन्य प्रान्तों में जाने वाले थे। यह कार्य प्रान्तिक सरकार ने उनको सिपुर्द किया है। इस कारण मार्च से पहले वे राम को देखने नहीं आ सके। राम सम्भवतः गर्मी में मैदानों

में न रहेगा। राम को कश्मीर से प्रेम है और तुम्हारी तथा राय भवानीदास और अन्य मित्रों की संगति में उसको बड़ा स्वाद आवेगा। राम की उपस्थिति और वार्तालाप से अगणित क्षुधित आत्माओं को लाभ होगा, यदि राम तुम्हारे साथ कश्मीर जा सका। किंतु दिव्य माता, सब से बड़ा विशेषाधिकार जिसका मनुष्य उपभोग कर सकता है, वह है हृदय, मन, शरीर और सर्वस्व का निरन्तर सत्य और मनुष्यता की वेदी पर जलना है, और यह मार्ग भीतर की भावमयी, विशुद्ध, धार्मी, नीरव वाणी के रूप में परमात्मा को स्वीकार है।

"यदि कर्तव्य पीतल की दीवारों को बुलाता वा पुकारता है ( दीवारों से सिर टकराने को कहता है ),

तो कौन मूर्ख ऐसा पतित होगा जो हिचकेगा।"

माता ! समर्पित जीवन का पथप्रदर्शन प्रायः कोई गुह्य दिव्य चिह्नुक्ति करती है, जिसका विश्लेषण नहीं किया जा सकता। राम तुम्हारे साथ कश्मीर शायद जाय किन्तु चलने के ठीक समय तक निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा सकता। तुम्हारा अपना आत्मा, राम तीर्थ। —:— ॐ ! ॐ !! ॐ !!! जयपुर, 6 मार्च 1905।

अत्यन्त धन्य प्रियतम भगवति,

राम के आने के सम्बंध में तुम्हारी भविष्यद्वाणी यहां तक सत्य उतरी है कि राम पुष्कर से चल दिया है। यहां से वह किधर जायगा, इसे वह समय आने पर परम विधाता ( सूर्यों के सूर्य ) के हाथ में निर्णय के लिये छोड़ता है। दो व्याख्यान अजमेर टाउन हाल में दिये गये थे। लोग जयपुर के टाउन हाल में व्याख्यानों का प्रबन्ध करने वाले हैं। पूरन पुष्कर गया था, और दो या तीन दिन तक राम के साथ पहाड़ों पर घूमा। दिलजंगसिंह बड़ा ही सुशील है। झुंड के झुंड लोग राम को देखने आते हैं और इसका अन्त होना चाहिये। परमेश्वर और मैं !

आज सारे दिन हम साथ जाँयगे, सदा प्रेम पियासे रात को हम साथ सोवेंगे और सवेरे उठेंगे तथा जहां कहीं पग ले जाँयँगे वहां जाँयगे, एकान्त स्थानों में या भीड़ में, सब ठीक ही होगा। हम यात्रा का अन्त करने की इच्छा न करेंगे, न विचार करेंगे कि परिणाम क्या होगा। क्या सब बातों का अन्त अभी से हमारे साथ नहीं है ?

राम शीघ्र ही चिट्ठियों की पहुंच के परे जंगलों में, पहाड़ों में, परमेश्वर में, तुम में होगा। न मालूम कब फिर तुम्हें पत्र मिले। तुम्हारा निजात्मा राम

शान्ति, कल्याण, प्रेम सदा तुम्हारे साथ रहे।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!! हरद्वार। सायंकल, गुरुवार।

अत्यन्त धन्य प्रिय माता,

आपकी भविष्यद्वाणी ठीक उतरी और रामदिद्रा तथा अपनी दैवी माता की ओर आ रहा है। किन्तु लोगों ने अत्यन्त प्रेम के कारण राह में कई स्थानों पर राम को रोक लिया है। अलवर, मुरादाबाद, अजमेर और जयपुर में व्याख्यान दिये गये हैं। अपने प्रिय धन्य बाबू ज्योतिस्वरूप का रेल में संग छोड़ कर, राम हरिद्वार में रुका है। यहां के लोगों को राम की उपस्थिति का पता लग गया है और वे बड़े प्रेम से राम से अधिक काल तक ठहरने की प्रार्थना करते हैं। राम भी यह उचित नहीं समझता कि जो युवा साधु या अन्य लोग राम से बड़े उपदेशों के भूखे या विलक्षण रूप से पात्र हैं, उनकी दशा को सुधारने के लिये उत्पन्न किसी भी जवान साधुओं तथा जो कुछ किया जा सकता है उसे करने का यह मौका खो दिया जाय। जब मथुरा में हम मिले थे, तब माता, तुमने राम से साधुओं में ही काम करने को कहा था। बड़े प्रेम से साधुगण राम के, उपदेश ग्रहण कर रहे हैं।

गंगा के उस तट पर चंडी के मन्दिर पर राम आज चढ़ा था। एक मनोहर छोटी सी, पहाड़ी की चोटी पर मंदिर स्थित है। और दृश्य अत्यन्त सोहावना। दुर्जनों शाखाओं में बँटती, और लौटती हुई गंगा का दृश्य बड़ा ही सुन्दर है। चंडी मन्दिर से हिमालय के हिमखंड(glaciers) सोने या हीरे के से दिखाई पड़ते हैं।

Blessed One,

Neither praise nor blame, Neither friends nor foes, Neither love, nor hatred, Neither body, nor its relations, Neither home, nor strange land, No! Nothing of this world is important, God is! God is real, God is the only reality.

हे धन्य स्वरूप,

न स्तुति न निन्दा, न मित्र न शत्रु, न प्रेम, न द्वेष, न देह, न उसके सम्बन्ध, न घर, न विदेश,

नहीं ! इस दुनिया की कोई भी वस्तु महत्वपूर्ण नहीं है। परमेश्वर है ! परमेश्वर सत्य है, परमेश्वर एक मात्र तत्व वस्तु है।

हरेक चीज़ को जाने दो। परमेश्वर, परमेश्वर केवल सब में सब है। अमर शांति वृष्टिबून्दों के समान गिरती है। वृष्टिबुन्दों में अमृत गिरता है। राम का मन शान्ति से परि- पूर्ण है। हर्ष मुक्त से बहता है।

राम सुखी है, और तुम सदा सुखी हो, तुम्हें शान्ति ! कल्याण ! प्रेम ! हर्ष ! हर्ष ! ॐ ! ॐ ! ॐ पहुँचे !

तुम्हारे विद्यार्थियों को, मेज़वान और उनकी पत्नी (बाबू और श्रीमती ज्योति स्वरुप) को प्रेम, आशीर्बाद, हर्ष पहुँचे। तुम्हारा अपना आत्मा, राम। ————

4 जुलाई 1905 अत्यन्त धन्य प्रिय आत्मा, लगभग एक सप्ताह पूर्व तुम्हारे मसूरी के पते से भेजा हुआ राम का पत्र आप श्रीमती को इससे पूर्व पहुँच गया होगा। आपकी गर्मी में राम काश्मीर नहीं जा सकता। अतः कैलाश, मान सरोवर, तथा अन्य स्थानों की अपनी सैर का उपयोग तुम बड़े सुभीते से कर सकती हो। सुखी अमे- रिका में व्यतीत होने वाले पहले के जीवन के दृश्यों की याद दिलाने वाले भूभागों को सुन्दर पहाड़ी दृश्यों में देख कर निश्चय तुम्हें घर का अनुभव होगा।

Rama is very happy! In the floods of life, in the storm of deeds up and down I fly, Hither and thither weave, From birth to grave, An endless web, A changing sea, Of glowing life, Thus in the whistling loom of time, I fly weaving the living robe of Deity.

राम बड़ा प्रसन्न है! जीवन की बहियाओं में, कार्यों के तूफान में ऊपर और नीचे मैं उड़ता हूँ, यहां और वहां; जन्म से मृत्यु तक, एक अन्तहीन जाला, और देदीप्यमान जीवन का, एक परिवर्तनशील सागर में बीनता हूँ! इस तरह समय की सीटी बजाने हुए करघे में, मैं देवता की असली पोशाक को। बीनता हुआ उड़ता हूँ! ॐ! तुम्हारा अपना आत्मा राम, ———— ॐ! 10 अगस्त 1905 कल्याण! प्रेम! हर्ष! शान्ति! शान्ति! अत्यन्त कल्याणमयी प्रिय माता, कुछ दिन बीते, तुम्हारी चिट्ठी मिली थी। किन्तु हाल में राम ने किसी चिट्ठी का जावब नहीं दिया है। आज तीन अति उपयोगी पुस्तकें समाप्त हुई हैं, जिन्हें राम भाषा में जनता के लिये लिख रहा था। अब तुम्हारा स्वास्थ्य कैसा है? राम तुम्हारे पूर्ण स्वास्थ्य और बल का अभिलाषी है।

ॐ! ॐ!! ॐ!!! अमेरिका को तुम्हारी यात्रा का प्रबन्ध करना तनिक भी कठिन काम नहीं है, किन्तु हम लोग चाहते हैं कि तुम हम लोगों के साथ रहो। शायद यह स्वार्थपूर्णता है, किन्तु आप भी तो यहां के लोगों को प्यार करती हैं। क्या आप को यह निश्चय है कि शरीर की दुर्बलता का कारण केवल भारतीय जलवायु है, और अमेरिका लौट जाने से आप को अवश्य लाभ होगा? यदि पेसा है, तो हम में से किसी को भी आप को यहां रखने की ज़िद न करना चाहिये। आप के कुशल- पूर्वक कैलीफोर्निया पहुँचने में हम सव को सहायक होना चाहिये।

शान्ति! हार्दिक आशीर्वाद! प्रेम! आशा है कि यह पत्र आप को स्वस्थ पावेगा। ॐ! राम। ————

ॐ! ॐ!! ॐ!! शान्ति! कल्याण! प्रेम! हर्ष! हर्ष! अत्यन्त कल्याणमयी प्रिय भगवति, शायद तुम्हें पहले ही से मालूम हो कि राम पहाड़ में मसूरी से लगभग एक हज़ार मील दूर है। बंगाल के जंगली मेहकमे के अधिकारियों के एक पुराने मकान में राम बिल- कुल अकेला रहता है। यह स्थान रेल लाइन से दूर, डाकघर से हटा हुआ, आगन्तुकों और मिलने वालों की पहुंच से परे, दुनियां के एक अत्यन्त मनोहर दृश्य से घिरा हुआ है। इस के थोड़ी ही दूरि पर सुन्दर झरने और चश्में

बह रहे हैं, और जब वर्षा-बादल नहीं होता, तब दुनिया का सर्वोच्च पहाड़ गौरीशंकर (Mt. Everest) दूर पर दिखाई पड़ता है। यहां भी वनवासी पहाड़ी लोग राम के लिये ताज़ा दूध लाते हैं। वन में विचरने और अध्ययन करने में राम का समय वीतता है।

जब "मनुष्य वन में परमेश्वर से मिल सकता है," तब यह नाम, यश, आकांक्षाएँ, दौलत, कृतकार्यता और सर्वस्व किस काम का? "कुछ करने के बुखार" को हम क्यों ग्रहण करें और पोषण करें?

हमें दिव्य स्वरूप होने दो। प्रातःकालीन पवन चलती है और उसे यह चिन्ता नहीं होती कि कितने, और किस प्रकार के, फूल खिले हैं। वह केवल हरेक वस्तु पर चलती है, और जो कलियां खिलने को बिलकुल तैयार हैं, वे अपनी आँखें खोल देती हैं। शेरों की कंदरें, जलते हुए वन, मैले- कुचैले कारागार, भूकम्प के धक्के, गिरती चट्टानें, तूफान, समरभूमियां और मुख पसारे हुई क्षुधा, यदि हम में ईश्वर- भावना साथ २ लावें, तो वे इस तरह भड़क, सम्मान, महिमा, सिंहासनों, विलासी परिजन समूह (retinue) और अन्य समस्त वस्तुओं से कहीं अधिक मधुर हैं, कि जिनसे युक्त मनुष्य स्वयं आन्तरिक एकान्त में भीतर हृदय में अद्वैत से एक नहीं है।

ओह! कृतकार्य की खुशी, प्रत्येक पग को अपना उद्देश्य सदृश बनाने वाले हलके २ कदम, प्रत्येक रात शारीरिक मृत्यु और प्रत्येक दिवस हमारा नवजीवन (नित्य हो, नित्य हो)।

Farewell, friends, and part, The mansion universe is too small. I and my love alone will play, Oh! The joys of swimming together! Together? No. The joy of swimmers dissolved rolling as the ocean! joy! joy!

अन्तिम नमस्कार, मित्रो! और हम अलग होते हैं, मेरे लिये विश्व-महल बहुत छोटा है। मैं और मेरा प्यारा अकेले खेलेंगे, ओह! ओ साथ तैरने के मज़े! साथ? नहीं, नहीं, तैराकों की खुशी समुद्र की तरह लहराते हुए घुल गई! हर्ष! हर्ष! ॐ तुम्हारा अपना आत्मा ॐ। निम्न लिखित भी एक (कविता का) भाग है और अभी मुझे मिला है। "Om! Peace! Peace! Disciple! up! untiring hasten to bathe thy breast in - the morning red." "As journeys this earth, her eye on a Sun through the heavenly spaces and radiant in azure, or sunless swallowed in tempests."

"Halters not, journeying equal sunlit, or stormgirt." So thou, son of earth, who hast force, goal, and time, go still onward." " As the light of the sun in the rain mist, As the stars reflect in the sea; So what to my wonder seems vastest Is but a reflection from me, And all things that my spirit revereth, All grandeurs my heart would enshrine, By command of the silence that heareth, Already for ever were mine. All arguments may fail, All formal creeds prove false, Only the limping soul needs Logic's crutches While to the pure in heart the very air breathes,

And the very ground pulses with truth. Nature and God within man's heart are one. Why should I pray? Since all things far and near. But answer to my spirit's most needs. I bring my joy, my gratitude, my love, I enter into life fearless and confident, I cleanse myself from every hateful thought, I make my daily toil a song of praise.

I love the earth and feel its very life is part of me.

My only prayer is gladness which I love, Why should I make appeal for help from some far source? Since life is mine, since I am one with Him, Who is my life."

"ॐ! शान्ति! शान्ति! हे शिष्य! उठो। प्रातःकालीन लालिमा में अपनी छाती निमज्जित करने को अकलान्त जल्दी करो"। "जैसे यह पृथिवी सूर्य पर अपनी आँख लगाये, आकाशी स्थानों में होती हुई और नीलिमा में आरब्ध, या सूर्यहीन तूफानों में निगली हुई यात्रा करती है"। "ठहरती नहीं है, समान रूप से सूर्य से प्रकाशित या तूफान से ग्रस्त हुई यात्रा करती है"। वैसे ही तू, हे पृथिवी के पुत्र, जिसमें शक्ति, लक्ष्य और समय है, "अब भी आगे जा" जैसे सूर्य का प्रकाश वर्षा के कोहरे में, जैसे नक्षत्र सागर में प्रतिबिम्बित होते हैं; वैसे ही जो मेरे आश्चर्य को विराटतम प्रतीत होता है, मेरी केवल एक प्रतिच्छाया है। और सब वस्तुएँ जिनका आदर मेरी आत्मा करती है, सब विभूतियां जिन को मेरा हृदय अपनावेगा, जो मौनता सुनती है उसकी आशासे, जो पहले ही से सदृश के लिये मेरी थीं। सब बहसें बेकाम हो सकती हैं,

सब नाम मात्र मत मिथ्या साबित होते हैं, केवल शिथिल चित्त को तर्क के आधार की ज़रूरत होती है। जब कि पवित्र हृदय वाले को खुद हवा स्वांस लेती है, और स्वयं भूमि की नाड़ी सत्य से चलती है। मनुष्य के हृदय में प्रकृति और परमेश्वर एक हैं। मैं क्यों प्रार्थना करूं! जब कि सब चीज़ें दूर और निकट केवल मेरी आध्यात्मिक अत्यन्त आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। मैं अपना हर्ष, अपनी कृतज्ञता, अपना प्रेम लाता हूँ। मैं जीवन में निर्भय और निधड़क हुआ प्रवेश करता हूँ। मैं अपने आपको प्रत्यक द्वेषमय विचार से स्वच्छ करता हूँ। मैं अपने दैनिक श्रम को स्तुति का स्तोत्र बनाता हूँ। मैं पृथिवी को प्यार करता हूँ, और उसके निज-जीवन ही को अपना अंश समझता हूँ। मेरी एक मात्र प्राथना प्रसन्नता है, जिसे मैं प्यार करता हूँ, किसी दूरस्थ कारण से मैं सहायता की विनती क्यों करूं? जब कि प्राण मेरा है, जब कि मैं "उससे" एक हूँ जो मेरा प्राण है।" ॐ! ॐ!। ॐ!!! आप स्वयं राम।

प्यारे पूरन, इन मूल्यवान चिट्ठियों में भाग लेने से मैं प्रसन्न हूँ। हम दोनों राम के शिष्य थे। पे भारत माता! मेरा हृदय तेरी ओर उछलता है। प्यारे बच्चों! सूर्यनन्द को स्मरण करने में न भूलना।

तुम्हारे आधुनिक ऋषि (राम) का विद्यार्थी सदा सर्वदा तुम्हारा ध्यान रखना है। मृत्यु के इस शरीर से, गड़बड़ की इस नगरी (बेबीलन) से जाग कर हमें बाहिर आना चाहिये। जरामरण के अनुभव से धनवान होकर हमें अपने पिता के घर लौटने दो। "Let the dead past bury its dead". "मृतक अतीत को अपना मुर्दा दफ़ने दो।" मृतक वर्तमान को अपना मुर्दा गाड़ते रहने दो। जो वाणी हम में बोल रही है, उसकी हम सुनेंगे, और परमेश्वर के लिये भेजेंगे नहीं। हम अपने आप को उसी एक नाम से पुकारेंगे, क्योंकि हमारा जन्म लिंगहीन ईश्वर से हुआ है और "मैं हूँ" में अभेद है।

तू ईश्वर परमात्मा का शब्द है और तू नित्य है। सारा जीवन अव्यक्त है।

"केवल वही प्राणी अनन्तता को जान सकते हैं जो व्यक्तित्व को देखना छोड़ चुके हैं।" संकीर्णचित्त लोग पूछते हैं, "क्या यह हमारी जाति का है? किन्तु द्विज (सत्य से उत्पन्न) लोग श्रेष्ठ स्वभाव के होते हैं। (उनको) सम्पूर्ण संसार केवल एक परिवार है" (गीता)।

प्रकाश और प्रेम एक हैं। तू स्वतः प्रकाश स्वरूप है। "Hatred stirreth strife, but Love covereth all sins."

"द्वेष कलह को भड़काता है किन्तु प्रेम सब पापों को ढक लेता है।"

मनुष्य का हृदय अपनी राह (पर चलना) चाहता है। किन्तु प्रभु उसके कदमों को सञ्चालित करता है।

"स्मृति के काग़ज़ात, यद्यपि दुःखद परन्तु मधुर, अपना प्रभाव कभी नहीं खो सकते!"

प्यारे पूरन! मेरी इच्छा है कि जिस २ लेख के प्रकाशन करने की तुम्हारी अभिलाषा हो, उस सब के छपवाने के लिये मैं इसी के साथ २ रुपया भेज सकूँ।

मैं भरोसा करती हूँ, प्यारे पूरन! कि तुम इसका उत्तर देना स्थगित न करोगे, क्योंकि मुझे इसकी पहुँच की सूचना की ज़रूरत है।

तुम्हारी माता और तुम्हारी पत्नी को प्यार, और जो 2 मुझे पूछें उन्हें कृपया मेरी ओर से भी पूँछ देना। वा० ज्योति स्वरूप से जब-उत्तर मिला था तब से उन को मैं दो चिट्ठियां लिख चुकी हूँ। स्वामी शिवगणाचार्य का क्या हुआ? कृपया सूचित कीजिये यदि अभी तक भी वे मथुरा में ही हों! यदि प्रिय राम के परिजनों से तुम्हारी भेंट हो, या उन्हें प्रेम-सन्देश भेज सकते हो, तो पेसा कर देना। तुम जानते हो कि सत्य, प्रेम, ज्ञान के साभ्रज्य में हम एक हैं! ॐ! ॐ! ॐ! भवदीय- सदा सदा की माता।

पता—स्टेशन पम. लोस-एंजलिस कैलीफोर्निया सूर्यानन्द।

NATIONAL ANTHEM

(1) God bless our ancient Hind, Ancient Hind, once glorious Hind, From Sagar Island to the Sind, From Kashmir to Cape Comorin, May perfect peace e'er reign therein. God bless our peaceful Hind. (2) Let all her sons in Love unite And make them do their duty aright. Fill them with knowledge ever true And let their virtue shine anew. (3) Your aid the Country doth implore, Give her a hearing, oh, once more, National spirit in her do pour, Extend her fame from shore to shore God bless once powerful Hind. (4) O Krishna of mighty deeds untold, O Rama ever so brave and bold, Forsake them not in evil days, Unworthy though in many ways, God bless our helpless Hind, Rama's Lover

राष्ट्रीय गीत।

ईश्वर कल्याण करे हमारे प्राचीन हिन्द का, प्राचीन हिन्द, एक समय के प्रतापी हिन्द, का सागर द्वीप से सिंध तक, काश्मीर से कन्या कुमारी तक, सदा पूर्ण शान्ति भारत में विराजे। ईश्वर कल्याण करे हमारे शान्तिमय हिन्द को।

2 उसके सब बच्चे प्रेमसूत्र में गुन्द जायें। और अपने कर्तव्य का पालन ठीक ठीक करें। हे परमात्मा! नित्य सत्य ज्ञान से तू उन्हें परिपूर्ण कर। और उनके सद्गुण फिर से चमकें।

3 तुम्हारी सहायता की प्राथना देश करता है, ओह, एक वार हे प्रभु! उसकी फिर सुन लो, राष्ट्रीय भाव उसमें भर दो, उसकी कीर्ति द्वीप द्वीपों में फैला दो, कभी के शक्तिशाली हिन्द को भगवान कल्याण करे।

4 अकथित शौर्य्यपूर्ण कार्यों के कर्ता, हे कृष्ण! नित्य महावीर और साहसी हे राम! बुरे दिनों में उनका साथ न छोड़ो, यद्यपि वे अनेक प्रकार से अयोग्य हैं, ईश्वर कल्याण करें हमारे निस्सहाय हिन्द का। राम का प्रेमी।

स्वामी राम।

भारत के लिये स्वामी राम के प्रस्थान करने के अवसर पर होने वाली एक विद्यार्थियों की सभा में नीचे लिखी कविता पढ़ी गई थी।

Like Golden Oriole' neath the pines Rama chants to us his blessed lines Rich freighted with the Orient's lore He spreads it on our Western shore. A bird of passage on the wing, He brings a message from the King. And this his clear resounding call . All, all for God, and God for all ! His message given, he flits afar Like swiftly coursing meteor, But leaves of heavenly fire a trace— A new born love for all his race. Adieu ! Sweet Rama, thy radient smile, A soul in Hades would beguile, And though we may not meet again Upon this changing earthly plane, We know to thee all good must be For thou'rt in God, and God in thee.

देव दारुओं के नीचे की सुनहली कोयल की तरह— राम अपनी कल्याणकारी पंक्तियां हमें सुनाता है। पूर्व के पांडित्य से खूब लदा हुआ

वह उसे हमारे पाश्चमी तट पर फैलाता है, राहगीर उड़ती हुई चिड़िया (के समान) वह बादशाह का सन्देश सुनाता है। और उस की यह स्पष्ट गूंजती हुई पुकार! "सब, सब परमेश्वर के लिये, और परमेश्वर सब के लिये!" वह अपना सन्देश सुना चुका, अब वह द्रुतगामी उल्का की तरह दूर को उड़ता है, किन्तु स्वर्गीय वह्नि का एक चिन्ह छोड़े जाता है— अर्थात् अपनी सम्पूर्ण जाति के लिये एक नवजात प्रेम। अन्तिम नमस्कार! मधुर राम! तेरी प्रभामयी मुसक्यान। पाताल लोक की आत्मा को भी भटकाने वाली है, और चाहे इस परिवर्तनशील भूलोक में फिर हम न मिलें, पर हम जानते हैं सब भलाई तेरे ही लिये अवश्य है, क्योंकि तू परमेश्वर में है और परमेश्वर तुझ में है। ॐ! ॐ! ॐ!

POEMS.

MARCHING LIGHT. 1 No, no one can atone me. Say, who could have injured And who could atone me? No, no one can atone me.

2 The world turns aside. To make room for me; I come, Blazing Light! 'And the shadows must flee.

3 I come, O you Ocean! Divide up and part; 'Or parched up and scorched up. Be dried up, depart.

4 O. Mountains, beware! Come not in my way; Your ribs will be shattered. 'And tattered to-day.

5 O Kings and Commanders! my fanciful toys!