श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(1) भारत—वर्ष ।

भाग 28 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 28 · अध्याय 1 / 9

(1) भारत—वर्ष ।

1 कोई मनुष्य सर्व रूप परमात्मा से अपनी अभेदता तब तक कदापि अनुभव नहीं कर सकता जब तक कि समग्र राष्ट्र के साथ अभेदता उस के शरीर के रोम रोम में जोश न मारती हो ।

2 यह देख कर कि सारा भारत वर्ष प्रत्येक भारतवासी में मूर्तिमान है, प्रत्येक भारत सपूत को उस सारे की सेवा में तत्पर रहना चाहिये ।

3 किसी व्यक्तिगत और स्थानीय धर्म को राष्ट्रीय धर्म से

ऊँचा स्थान न देना चाहिये, उन्हें ठीक प्रमाण से रखना ही सुख लाता है ।

4 राष्ट्र के हित की वृद्धि के लिये प्रयत्न करना ही आधिदैविक शक्तियों अर्थात् देवताओं की आराधना करना है ।

5 ईश्वरानुभवार्थ आवश्यकता है संन्यास भाव की-अर्थात् स्वार्थ को नितान्त त्याग कर इस परिच्छिन्नात्मा को भारत माता के महान् आत्मा से बिलकुल अभिन्न करने की ।

6 परमात्मा या परमानन्द के अनुभवार्थ आवश्यकता है ब्राह्मण भाव की-अर्थात् राष्ट्र की उन्नति के उपाय सोचने में अपनी बुद्धि समर्पण करने की ।

7 परमानन्द के अनुभवार्थ आवश्यकता है अपने में क्षत्रिय भाव रखने की-अर्थात् देश के वास्ते प्राण न्योछावर करने के लिये प्रति क्षण तत्पर रहने की ।

8 परमात्मा के अनुभवार्थ आवश्यकता है अपने में सच्चा वैश्य भाव रखने की-अर्थात् अपने धन को राष्ट्र की धरोहर समझने की ।

9 परन्तु परमानन्द व राम को इस लोक वा परलोक में अनुभव करने के लिये और अपने निजी सूक्ष्म (अमूर्त) धर्म को बाह्य प्रत्यक्ष जीती जागती मूर्ति बनाने के लिये तुम्हें अपने हाथों पैरों से उस परिश्रम द्वारा, कि जो कभी शूद्रों के जिम्मे छोड़ रक्खा था, इस संन्यास भाव, ब्राह्मण, क्षत्रीय

और वैश्य की वीरता को आचरण में लाना होगा । संन्यासी भाव शूद्रों के उद्योग में परिणित होना चाहिये । आज तो केवल यही उपाय है । जागो, जागो ।

10 संसार में केवल एक ही रोग है और एक ही औषधि है । दैवी-विधान के आचरण से ही राष्ट्र निरोग और स्वतंत्र बनाये जा सकते हैं । उसी से मनुष्य देवताओं से अधिक श्रेष्ठ और महात्मा बनाये जा सकते हैं ।

11 अधिकार जमाने के भाव को छोड़ने में, वेदान्त के संन्यास-भाव को ग्रहण करने में ही राष्ट्रों और व्यक्तियों की मुक्ति निर्भर है । इस से इतर और कोई मार्ग नहीं है ।

12 भारत में असंख्य शक्तियों का प्रभाव परस्पर एक दूसरे से विपरीत होने के कारण मिट जाता है, जिस से उन का परिणाम शून्य होता है । क्या यह अफ़सोस की बात नहीं है ? इस का कारण क्या है ?-यह कि प्रत्येक दल अपने पड़ोसियों की त्रुटियों पर ही अपना ध्यान डालता है ।

13 हा तिरस्कार करने योग्य सत्कार ! किसी देश में उस समय तक एकता और प्रेम नहीं हो सकते जब तक कि तुम एक दूसरे के दोषों पर ज़ोर देते रहते हो ।

14 सफलता-पूर्वक जीवित रहने का रहस्य अपना हृदय मातृवत बनालेने में है; (क्योंकि) माता को अपने बच्चे छोटे या बड़े सभी प्यारे लगते हैं ।

15 माता शब्द ऐसा है कि जो हिन्दूमात्र के हृदय से गहरे से गहरा भाव उत्पन्न करता है ।

16 भारत वर्ष में प्रायः प्रत्येक नगर, नदी, पहाड़ी, पत्थर या पशु की कल्पित मूर्ति बनाई जा कर उस की प्रतिष्ठा की जाती है । क्या अभी उत्तम समय नहीं आया है, कि सारी मातृ-भूमि को दैवी रूप समझा जाय और उस की प्रत्येक एक-देशीय विभूति हम में सारे भारत वर्ष की भक्ति भर दे ?

17 आप से स्थापित किये हुए श्वेत, ऊँचे मन्दिर और पत्थर के विष्णु आप के हृदय के पाप को शान्त नहीं करेंगे । ...पूजो, देश के इन भूखे नारायणों और परिश्रम करने वाले विष्णुओं को पूजो ।

18 अपने हाथ से बनाई अग्नि के मुख में बहु-मूल्य घी व्यर्थ नष्ट करने के स्थान पर आप सूखी रोटी के छिलकों को उस जठराग्नि के अर्पण क्यों नहीं कर देते कि जो जीवित किन्तु भूखे मरते लाखों नारायणों के हाड़ मांस को खाप जा रही है ?

19 सर्वोपरि श्रेष्ठ दान जो आप किसी मनुष्य को दे सकते हैं, वह विद्या वा ज्ञान का दान है । आप किसी मनुष्य को आज भोजन खिला दें तो कल वह फिर उतना ही भूखा हो जायेगा । उस को कोई कला (हुनर) सिखला दें तो आप

उसे जीवन पर्यन्त अपनी जीविका प्राप्त करने के योग्य बना देते हैं ।

20 भारत वर्ष की दान शीलता भूखे मरते हुए श्रम-जीवियों (गृहस्थों) की कोई अधिक सुध नहीं लेती, वरन् वह ईश्वर के भण्डार में पापाणवत् जड़ बने हुए धर्म के उच्च प्रतिनिधियों (ब्राह्मणों) को, पहिले ही से तृप्त आलसियों को भोजन दिलवाकर दान शील दाताओं को सीधा स्वर्ग में ले जाती है ।

21 दुर्बल-चित्त यात्री जो निरन्तर मुफ्तखोरे आलसियों को कुछ नक़दी दे देता है, परलोक में अपनी आत्मा के उद्धार निमित्त कुछ कर लेने से भले ही अपने को सराह सकता है । चाहे जो भी हो, पर इस में तो किंचित संदेह नहीं है कि उस ने इस समय इस लोक में इस राष्ट्र के पतन करने के लिये अवश्य कुछ कर डाला है ।

22 आधी जनता भूखों मर रही है । शेष आधी तो स्वयं फ़िज़ूल-ख़र्ची, आवश्यकता से अधिक सामान, सुगन्ध की बोतलों, मिथ्या गौरव, ऊपरी प्रभाव वाले व्यवहार, समस्त प्रकार की बहु-मूल्य व्यर्थ खेलों, गन्दे धन और रोग-जनक दिखावे (ज़ाहिरदारी) से दबी पड़ी है ।

23 भारतवर्ष का साधारण गृहस्थ सारे राष्ट्र की दशा का चित्र है-बहुत थोड़ी सी तो आमदनी, और निरंतर प्रतिवर्ष खाने वालों की संख्या में वृद्धि ही नहीं, वरन् निरर्थक और दुःखदायी रस्मों में दास्ता भाव से अनुचित खर्च ।

24 भारतीय राजा और अमीर अपने सारे बहु-मूल्य रत्नों और शक्ति को खोकर पोली झनझनाती हुई उपाधियों, और निस्सार फोके नामों से युक्त शतरंचे के शेर रह गये हैं ।

25 आज कल के साम्य वादियों की सब से बड़ी भूल यह है कि वे नाम मात्र के धनवानों के मार पर करुणा दिखलाने की जगह, उनके अधिकार में जो 'समुद्र फेन की बूँद' (कुछ थोड़ा सा धन) है, उस के लिये उन से डाह करते हैं ।

26 इंग्लिस्तान में वास्तव में कुछ फ़सलें नहीं होतीं, और तो भी देश समृद्धशाली है । क्या कारण ? क्योंकि हाथों के देवता इन्द्र को कलाओं और उद्योग धन्धों का भोग इतना दिया जाता है, कि अज़ीर्ण की सीमा तक पहुँच जाता है ।

27 कूड़ा करकट को फेंक देना, मृत पशुओं की हड्डियों को स्पर्श करने से डरना और जिनको लोग मलबा कहते हैं उन सब प्रकार की चीज़ों से घृणा करके एक प्रकार का नासिका-रोग उत्पन्न कर लेना, भारतवर्ष की दरिद्रता का सर्व-प्रधान कारण है ।

28 भारतवर्ष की अधोगति अर्थात् भारतवर्ष के पतन का कारण वेदान्त-दर्शन समझाता है कि यह कर्म का विधान है ।

29 कुछ लोग ऐसे हैं जिनके लिये देशभक्ति का अर्थ भूतकाल की अदृष्ट महानता पर निरन्तर आलोचना करना है । ये दीवालिए साहूकार हैं, जो बहुत पुराने बही-खातों पर जो कि अब व्यर्थ हैं, गहरी देख भाल कर रहे हैं ।

30 होने वाले सुधारक युवक ! तू भारतवर्ष की प्राचीन रीतियों और परमार्थ निष्ठा की निन्दा मत कर । इस प्रकार विरोध का एक नया बीज बो देने से भारत वर्ष के मनुष्य एकता को प्राप्त नहीं कर सकते ।

31 तुच्छ अहंकार को त्याग कर और इस प्रकार देश का समस्त रूप होकर आप कुछ भी महसूस करो, तो आपका देश आपके साथ महसूस करेगा । आप आगे बढ़ो, तो आप का देश आपके पीछे चलेगा ।

32 उन्नति का वायु-मण्डल सेवा और प्रेम है, हुक्म और मज़बूरी नहीं, अर्थात् सेवा और प्रेम से उन्नति होती है विधि-निषेध भरी आज्ञाओं से नहीं ।

33 जो मनुष्य लोगों का नेता बनने के योग्य होता है, वह अपने सहायकों की मूर्खता, अपने अनुगामियों के विश्वास-घात, मानव-जाति की कृतघ्नता और जनता की गुण-ग्रहण हीनता की कभी शिकायत नहीं करता ।

34 किसी देश का बल छोटे विचार के बड़े आदमियों से

नहीं किन्तु बड़े विचार के छोटे आदमियों से बढ़ता है । 35

पूर्ण प्रजातन्त्र-शासन, समता, बाहरी सत्ता का भार उतार फेंकना, धन एकत्र करने के व्यर्थ भाव को दूर रखना, समस्त असाधारण अधिकार को परे फेंक डालना, बड़प्पन की शान को ठुकरा देना, और छुटपन की घबराहट को उतार डालना यह भौतिक दृष्टि से वेदान्त है । 36

प्रत्येक मनुष्य को अपना स्थान स्वयं निर्धारित करने के लिए एक समान स्वतंत्रता रखने दो । मस्तक चाहे जितना ऊंचा रहे, परन्तु पांव सदा एक समान पृथ्वी पर ही रहें । कभी किसी मनुष्य के कन्धे अथवा गर्दन पर न हों, चाहे वह स्वयं निर्बल अथवा इच्छुक ही क्यों न हो । 37

झूठे राजनीतिज्ञ तो शक्ति के प्रधान स्वर बजाये बिना ही, अर्थात् स्वतन्त्रता और प्रेम के भाव को लाये बिना ही राष्ट्र की उन्नति लाने की सोचते हैं । 38

अमेरिका और यूरुप का उत्थान ईसा के व्यक्तित्व के कारण से नहीं है । उन्नति का असली कारण अज्ञात रूप से वेदान्त का आचरण है । भारतवर्ष का पतन आचरण में वेदान्त के न रहने से हुआ है । 39

विदेशी राजनीतिज्ञों से बचने का एकमात्र उपाय आध्यात्मिक स्वास्थ्य के विधान अर्थात् अपने पड़ोसी से प्रेम करने के नियम का अपने जीवन में चरितार्थ करना है ।

शुद्धता या अशुद्धता के नाम पर, हम को क्या अधिकार है कि ईश्वर की गुप्त-चर मंडली (खुफ़िया पुलिस) के स्वयं निर्वाचित सदस्य का भाग लें और ऐसे मनुष्य के व्यक्तिगत चरित्र में झांकें जिसका सामाजिक जीवन देश के लिए हितकर वा सहायक हो । 41

हिन्दू लोगों में हम को नुक्ताचीनी नहीं, किन्तु गुण ग्रहण का भाव, भ्रातृत्व की भावना, समन्वय की बुद्धि, धर्मों व काव्यों का समानाधिकरण और श्रम की प्रभुता को जागृत करना है । 42

अपने व्यक्तित्व को सारे समाज और सब राष्ट्रों तथा प्रत्येक वस्तु के विरुद्ध दृढ़ता-पूर्वक प्रतिपादन करो । 43

अपनी बुद्धि (विचारों) का देश भर की बुद्धि को समर्पण कर देना, अथवा देश के कल्याणार्थ ऐसे चिन्तन करना कि मानो देशवासियों से इतर मैं कुछ नहीं हूं. यह बृहस्पति देव निमित्त यज्ञ है । 44

यदि विदेशों में अपना निर्वाह करने से इतर और अधिक तुम से नहीं हो सकता, तो वहीं रहो । और यदि तुम्हें भारत माता की दुखती हुई छाती पर निकम्मी (निश्चेष्ट) रेंगती हुई जोंक बनना पड़े, तो अरब के सागर (Arabian Sea) में कूद पड़ो और भारतवर्ष में फिर पैर रखने की बजाय अर्ब सागर के अतिथ्य का भाग लो ।

पश्चमीय विज्ञान से डर कर भागने की बजाय आज हिन्दू उस को अपनी ब्रह्म-विद्या (श्रुति) का सर्व-प्रधान सहायक मान कर स्वागत करें । 46

जब कि जाति और वंश के भावों का कांच का पर्दा दिलों का मिलाप नहीं होने देता, उस समय यदि तुम बातें (मामले) विवेक और न्याय द्वारा निपटाना चाहो तो तुम हानि कारक निकटता में आ जाते हो । 47

धार्मिक मत मतान्तर ने लोगों के मनुष्यत्व को मेघाच्छादित (धुंधला) कर डाला है और सामान्य स्वदेशाभिमान के भाव को ग्रहण लगा दिया है वा ग्रस लिया है । 48

भारत के भक्तो ! उस मधुर मुख ग्वाले (भगवान् कृष्ण) के तुम प्यारे प्रेम-पात्र बन जाओगे, जब तुम दिव्य प्रेम के साथ चांडाल में, चोर में, पापी में, अभ्यागत में और सब में दिव्य-प्रेम से उस (प्रभु) के दर्शन करोगे और उस (प्रभु) को केवल पत्थर की मूर्ति ही में परिमित न रहने दोगे । 49

ग़लती से जिन को तुम 'पतित' कहते हो, वे अभी "उठे नहीं" हैं । वे उसी प्रकार से विश्व-विद्यालय के नौ-आगन्तुक विद्यार्थी हैं, जिस प्रकार किसी समय तुम भी थे । 50

भारत-वर्ष के प्यारे कट्टर (शास्त्र-परायण) मनुष्यो ! शास्त्रों का उचित प्रयोग करो । देश का धर्म तुम से जाति

के कठोर से कठोर नियमों को ढीला करने और तीव्र जाति-भेद-भाव को सहानुभूति से दवा देने को कहता है । 51

मेरे प्यारे हिन्दुओ ! परिवर्तन से अथवा समय-अनुकूल बनने से घृणा करके और पुरानी रीतियों तथा वंश-परम्परा पर अधिक ज़ोर देकर अपने को मनुष्यता के आसन से नीचे मत गिराओ । 52

रेखांश (Longitudinally अर्थात् समय के) विचार से तुम्हारा सम्बंध भले ही हिमांचल के ऋषियों की वंश-परम्परा से हो, परन्तु अक्षांश (Latitudinally अर्थात् देश) के विचार से अमेरिका और यूरुप के कला-कौशल के यथार्थ प्रयोगकर्ताओं के साथ जो आप का सहजीवन वा सहभाव (Co-existence) का सम्बन्ध है, उस से आप इनकार नहीं कर सकते । 53

यदि आप नई रोशनी को जो आप ही के देश की पुरानी और प्राचीन रोशनी है, ग्रहण करने को राज़ी और तय्यार नहीं हो, तो जाओ और पितृलोक में पूर्व पुरुषों के साथ निवास करो । यहां ठहरने का कौन काम है ? प्रणाम ! 54

"भारत ऐसा (ख़राब) हो गया है," इस विचार में समय नष्ट मत करो । अपनी जो अनन्त शक्ति है उसे संचय करो और दृढ़ता से निश्चय करो कि "भारत आगे ऐसा (उत्तम) होगा" !

आज तो यह हाल है कि भारत वर्ष में स्वामी और पंडित लोग अपने वंश की आलस्यशील निद्रा को बनाए रखने वाली लोरी गा रहे हैं । 56

स्वतंत्रता पूर्वक विचार को भारत वर्ष में पाखंड, नहीं नहीं, घोर पाप समझा जाता है । जो कुछ (विचार) मृत-भाषा से आ रहा है, वही पवित्र (माना जाता) है । 57

जो बालक ईसाई हो जाता है, वह अपने हिन्दू पिता का अपना हाड़ मांस होते हुप भी गली के कुत्ते से अधिक सम्बन्ध-रहित (अपरिचित) हो जाता है । 58

सत्य का अध्यास शक्ति और विजय (सफलता) दिलाता है । देहाध्यास (चाहे वह ब्राह्मणत्व का अध्यास अथवा संन्यासपने का अध्यास ही क्यों न हो) तुम्हें चमार बना देता है । 59

सभ्य समाज में स्त्री को निर्जीव पदार्थ का दर्जा दिया हुआ है । जब कि पुरुष अपने मार्गों में स्वतंत्र है, स्त्री के हाथ पाँव जकड़े हुए होते हैं । वह कभी एक पुरुष की कभी दूसरे पुरुष की सम्पत्ति हो जाती है । 60

यह सभ्य समाज के मुँह पर बड़ा कलंक है कि स्त्री को एक प्रकार का व्योपार का पदार्थ बना लिया है । और जिस प्रकार पेड़, घर, या धन मनुष्य की सम्पत्ति होती है, उसी प्रकार स्त्री मनुष्य की सम्पत्ति और उस के अधिकार में है ।

स्त्रियों, बालकों और मज़दूरी-पेशा जातियों की शिक्षा पर ध्यान न देना उन्हीं शाखाओं को काट गिराना है कि जिन के हम आश्रय हैं । नहीं, नहीं, यह तो राष्ट्रीयता के वृक्ष की जड़ पर ही नाशकारी कुठाराघात करना है । 62

यह मत कहो कि विवाह और धर्म में विरोध है, वरन् जिस प्रकार आत्मानुभव का जिज्ञासु सच्चे परमानन्द, तत्व वस्तु और मूल तत्वों पर विचार करता है, उसी प्रकार (विवाहावस्था में) देखो कि आनन्द की शुद्ध अवस्था क्या है, और असली आत्मा क्या है 63

ऐसे सब विवाह-सम्बन्ध, जो मुख के रंग, मुखाकृति, रूप व आकार अथवा शारीरिक सुन्दरता की आसक्ति से उत्पन्न होते हैं, वे अन्त में हानि-युक्त और बहुत आनन्द-रहित होते हैं । 64

पति का उद्देश्य धन कमाना और पारिवारिक सम्बन्धों का दुरुपयोग करना नहीं बल्कि विवाह बन्धन की वास्तविक उन्नति करना होना चाहिये ।