(2) धर्म और सदाचार ।
किसी धर्म को इस लिए अंगीकार मत करो कि वह सब से प्राचीन है । इस का सब से प्राचीन होना इस के सच्चे होने का कोई प्रमाण नहीं है । कभी कभी पुराने से पुराने घरों को गिराना उचित होता है और पुराने वस्त्र अवश्य बदलने पड़ते हैं । यदि कोई नये से नया मार्ग वा रीति विवेक की कसौटी पर खरी उतरे, तो वह उस ताज़ा गुलाब के फूल के सदृश उत्तम है जिस पर कि चमकती हुई ओस के कण शोभायमान हो रहे हों । 2
किसी धर्म को इस लिए स्वीकार मत करो कि यह सब से नया है । सब से नई चीज़ें समय की कसौटी से न परखी जाने के कारण सर्वथा सर्व-श्रेष्ठ नहीं होतीं । 3
किसी धर्म को इस लिए मत स्वीकार करो कि उस पर विपुल जन संख्या का विश्वास है; क्योंकि विपुल जन संख्या का विश्वास तो वास्तव में शैतान अर्थात् अज्ञान के धर्म पर होता है । एक समय था कि जब विपुल जन-संख्या गुलामी की प्रथा को स्वीकार करती थी, परन्तु यह बात गुलामी की प्रथा के उचित होने का कोई प्रमाण नहीं हो सकती । 4 (5?)
किसी धर्म पर इस लिए श्रद्धा मत करो कि उसे थोड़े
से गिने चुने लोगों ने माना हुआ है । कभी कभी अल्प जन-संख्या जो किसी धर्म को अंगीकार कर लेती है, (अज्ञान के) अंधेरे में भ्रान्त-बुद्धि होती है । 5
किसी धर्म को इस लिए अंगीकार मत करो कि वह किसी त्यागी द्वारा अर्थात् ऐसे मनुष्य द्वारा प्राप्त हुआ है कि जिस ने सब कुछ त्यागा हुआ है । क्योंकि हमारी दृष्टि में कई ऐसे त्यागी आते हैं कि जिन्हों ने सब कुछ त्यागा होता है, पर जानते भी कुछ नहीं हैं; और यथार्थ रूप से वे धर्मोन्मादी होते हैं । 6
किसी धर्म को इस लिए अंगीकार मत करो कि यह युवराजों और भूपतियों द्वारा प्राप्त हुआ है । राजा लोगों में प्रायः आध्यात्मिक धन का पूरा अभाव रहता है । 7
किसी धर्म को इस लिए अंगीकार मत करो कि वह ऐसे मनुष्य का चलाया हुआ है कि जिस का चरित्र परम श्रेष्ठ है । अनेकशः परम श्रेष्ठ चरित्र के लोग तत्व का निरूपण करने में असफल रहे हैं । हो सकता है कि किसी मनुष्य की पाचन शक्ति असाधारण रूप से प्रबल हो, तो भी उसे पाचन क्रिया का कुछ भी ज्ञान न हो । यह एक चित्रकार है जो कला चातुर्य का एक मनोहर, उत्कृष्ट और अत्युत्तम नमूना दिखलाता है; परन्तु वही चित्रकार शायद संसार भर में अत्यन्त कुरूप हो । ऐसे भी लोग हैं जो अत्यन्त कुरूप होते हैं पर तो भी वे सुन्दर तत्वों का निरूपण करते हैं । शुक्राचार्य इसी प्रकार का मनुष्य था ।
किसी धर्म पर इस कारण श्रद्धा मत करो कि यह किसी बड़े प्रसिद्ध मनुष्य का चलाया हुआ है । सर आइज़क न्यूटन एक बहुत प्रसिद्ध मनुष्य है तो भी उस की प्रकाश-सम्बन्धी निर्गम मीमांसा (emissary theory of light) असत्य है ! 9
जिस किसी चीज़ को स्वीकार करो या जिस किसी धर्म पर विश्वास करो, तो उस की निजी श्रेष्ठता के कारण से करो । उस की स्वयं आप जाँच पड़ताल करो । खूब छानबीन करो । 10
अपनी स्वतन्त्रता को बुद्ध, ईसा मसीह, मोहम्मद या कृष्ण के हाथों न बेच डालो । 11
जब तक आप स्वयं अपने अन्तरगत अंधकार को दूर करने के लिए उद्यत नहीं होते, तब तक संसार में चाहे तीन सौ तेंतीस अरब ईसा मसीह आ जावें, तो भी कोई भला नहीं हो सकता । दूसरों के आश्रय मत रहो । 12
सब धर्मों का लक्ष्य 'अपने ऊपर से पर्दे का हटाना' अर्थात् अपने आप का स्पष्ट निरूपण करना है । 13
सत्य धर्म का मतलब ईश्वर शब्द पर विश्वास की अपेक्षा भलाई पर विश्वास करना है । 14
स्मरण रहे कि धर्म हृदय-सम्बन्धी वस्तु है, पुण्य
(शील) भी हृदय-सम्बन्धी वस्तु है; इसी प्रकार पाप भी । पाप और पुण्य की स्थिति नितान्त आप के चित्त की स्थिति और दशा के अधार पर होती है । 15
धर्म, जैसा कि अध्यात्म-विद्या से विलक्षण (भिन्न) और साथ ही मत मतान्तरों के चिन्हों से पृथक है, वास्तव में एक ऐसा गूढ़ मार्ग (क्रिया) है कि जिस से मन या बुद्धि पीछे लौटती है और अपने आप को उस सर्वोपरि (परमात्मा) अर्थात् अगाध स्रोत (आदि कारण) में खो देती है । 16
Religion [धर्म, जैसा कि शब्द की उत्पत्ति से स्पष्ट है = re (री) वापिस, पीछे या आधार + ligare (लिगारी) बांधना मिलाना] वह वस्तु है जो किसी (मनुष्य) को उसके मूल या आदि स्रोत के साथ पुनः बान्धती या मेल दिलाती है । 17
कोई भी मत या धर्म (सम्प्रदाय), जो आज कल की वैज्ञानिक अन्वेषणा के नीरोग और शिष्ट परिणामों के साथ मेल नहीं खाता, उसे किंचित अधिकार नहीं है कि वह अपने मूख भक्तों (अनुयायियों) पर ज़बरदस्ती करे वा उन्हें अपना शिकार बनावे । 18
इस समाज अथवा उस समाज में सम्मिलित होने, इस ईसा मसीह अथवा उस कृष्ण की उपासना करने, यह पाखंड (टोटका) अथवा वह पाखंड करने की समस्त क्रियाओं से कोई लाभ नहीं होगा ।
थोड़े वा बहुत अन्ध-विश्वास की छाप संसार भर के सब मत-मतान्तर की अध्यात्म-विद्याओं के मुँह पर लगी हुई है । 20
जो परदा हमारी आँखों पर पड़ा हुआ है, उसी को फाड़ डालने के प्रयत्न मात्र ही ये सब धर्म हैं । 21
धर्मों, मतों और संज्ञाओं (नामों) को लोग केवल गले के तावीज़ों की तरह धारण करते हैं । इन में सब प्रकार के गुण और प्रभाव बतला रे जाते हैं, परन्तु फिर भी जो कुछ थोड़ा सा लाभ हम को प्राप्त होगा है वह इन प्यारे स्वप्नों से नितान्त स्वतंत्र होकर होता है । 22
जब तक बाह्य कर्तव्य और "तू यह कर" और "तू यह न कर" इस प्रकार की विधि-निपेध-युक्त आज्ञाओं का कोई लेशमात्र भी रहेगा, तब तक सच्ची पवित्रता की आध्यात्मिक उन्नति के लिए कोई गुंजायश नहीं हो सकती । 23
Imperative Mood (आज्ञा-सूचक क्रिया), Second Person (मध्यम पुरुष) अर्थात् मध्यम पुरुष प्रति आज्ञा देने की क्रिया हमारे अन्दर परिच्छिन्न व्यक्तित्व को जीवित रखती है; और जहां कहीं परिच्छिन्नता है, वहां परमानन्द नहीं होता, वहां न राग द्वेष से छुटकारा मिलता है, न मोह और घृणा से मुक्ति मिलती है, और न अस्थिरता और लोभ से छुट्टी मिलती है ।
निर्दोप लड़के और लड़कियों पर धार्मिक विश्वास ज़बरन् मँढ़ने से आध्यात्मिक दरिद्रता आ जाती है । 25
आध्यात्मिक दरिद्रता और धार्मिक असहिष्णुता (या उन्मत्ता) यथाक्रम उसी एक ही रोग की क्रियावान और निष्क्रिय अवस्थाएं हैं । 26
व्यक्ति, रूप, मान, पद, धन, विद्या और आकार का सत्कार करना मूर्ति-पूजन है । 27
वह रसोईघरवाला धर्म जो अपरिमित और अमर आत्मा को बाहरवालों के शोरबे से बिगड़ने देता है, सचमुच ही निन्दनीय है । 28
ऐ अस्थिर, चंचल और संदिग्ध चित्त ! इस उत्साहहीन धर्मपरायणता वा विधर्म परायणता की कोई ज़रूरत नहीं । तू इन सब संशयों और संदेहों को झुलसा डाल (वा जला डाल) । ये सब मत-मतान्तर (doxies) तेरी अपनी रचना हैं । 29
तुम्हें अपने आप को ईश्वर, ईसा, मोहम्मद, बुद्ध, कृष्ण अथवा संसार के अन्य किसी ऋषि के अधीन क्यों समझना चाहिये ? आप सब के सब स्वाधीन हो । 30
राम आप को ऐसा धर्म बतलाता है: जो राह में (गली में) पड़ा हुआ मिलता है; जो (वृक्ष की) पत्तियों
पर लिखा हुआ है; जिस को नदियां गुनगुनाती हैं; जिसको पवन धीरे धीरे से सुनाती है; जो आप की ही नसों और नाड़ियों में फड़क रहा है; ऐसा धर्म, जिस का तुम्हारे व्यापार और हृदय से सम्बन्ध है; ऐसा धर्म, जिस आपको किसी विशेष मन्दिर में जाकर व्यवहार में नहीं लाना पड़ता; ऐसा धर्म, जिस के अनुसार आप को अपना जीवन व्यतीत करना होगा, और जिस का अपने जीवन में बर्तना होगा । जिस का तुम्हारे चूल्हे से और पाकशाला से सम्बन्ध है । जिस धर्म के अनुसार सर्वत्र ही आपको अपना जीवन व्यतीत करना होगा । 31
वेदान्त शब्द का अर्थ केवल परम तत्व है । वह तत्व (सत्य) तुम्हारी निजी वस्तु है, तुम्हारे से अधिक वह तत्व राम का नहीं है, तुम्हारे से अधिक वह तत्व हिन्दुओं का नहीं है । वह तत्व किसी एक की सम्पति नहीं है; परन्तु प्रत्येक वस्तु उस तत्व की है । 32
सफलता का रहस्य वेदान्त को व्यवहार में लाना है । व्यावहारिक वेदान्त ही सफलता की कुञ्जी है । 33
वेदान्त कहता है कि "ओ ईसाइयो ! मुसलमानो ! वैष्णवो ! और संसार भर के भिन्न भिन्न मतावलम्बियो ! यदि आप समझते हो कि आप की मुक्ति ईसा, बुद्ध, कृष्ण अथवा किसी अन्य बड़े तपस्वी के नाम से हो गई है, तो यह स्मरण रहे कि वास्तविक शक्ति वा सामर्थ्य ईसा अथवा बुद्ध, कृष्ण अथवा किसी अन्य व्यक्ति में नहीं धरा है, (वरन्) वह असली गुण आप की अपनी आत्मा में ही है ।
वेदान्त कहता है "कि इस व्यक्ति या उस व्यक्ति की भावना की अपेक्षा सत्य का अधिक सत्कार करो; क्योंकि यदि आप सत्य की क़दर करोगे, तो (यह) यथार्थ में अपने मित्र की सच्ची क़द्रदानी होगी । 35
मांस के विषय में वेदान्त कहता है "कि अपने शरीरों की ममता मत रखो; शरीर मरता है कि जीता है इस का ख़्याल छोड़ दो । लोग तुम्हारे शरीर को पूजते हैं या उस पर पत्थर मारते हैं, इस की परवा मत करो । इन सब से ऊपर उठो । 36
वेदान्त कहता है "क़ायदा यह है कि जिस हद तक आप अपनी निजी मूर्ति अर्थात् देह को सच्चा समझते हैं, उसी हद तक आप अन्य मूर्तियों को भी सच्चा समझ सकते हैं । यही नियम (विधान) है । 37
आप किसी चित्र को उसी चित्र के कारण ही प्यार करने लग जाते हो, और जिस मनुष्य का वह चित्र है, उसको भुला देते हो । क्या तुम्हारा यह काम मूर्तिं पूजन नहीं है । 38
मूर्तिपूजा क्या है ? अपने मित्रों और शत्रुओं को इस हद तक व्यक्तित्व, पृथकत्व और वास्तविकता का भाव प्रदान कर देना कि जिस से वह मूर्तिमान (वेष बदली हुई) व्यक्ति ही भूल से निरवयव आत्मा या दैवी-विधान मान ली जाए ।
39 हिन्दुओं के सिद्धान्तानुसार हर एक व्यक्ति ईश्वर है, और सर्वोत्तम बहुमूल्य रत्न, समस्त भण्डार, परम आनन्द तथा सब प्रकार के सुखों का स्रोत उसी के अन्तर्गत है। प्रत्येक व्यक्ति ईश्वर है, और वही स्वयं यह सब कुछ (नाम रूप) है।
40 उपनिषदों और विख्यात (तेजस्वी) वेदान्त की उत्कृष्ट शिक्षाओं का स्थान एक प्रकार के रसोई घर के धर्म को (अर्थात् भोजन और भोजन करने की विधि की उस तरह परवा करने को) दिया गया है।
41 सच्चा वेदान्त केवल वेदों तक ही परिमित नहीं है, वह आप के हृदयों में है। .....राम को इस मत वा उस मत का दास मत समझो। राम तो आप का अपना आप है। स्वाधीनता स्वरूप है।
42 ब्रह्म-विद्या से किसी को भी वंचित रखने का क्या काम। अज्ञान और निर्बलता के बन्द कमरों और तहखानों को गिरा दो। दिव्य प्रकाश और वायु से सब का कल्याण होने दो।
43 वेदान्त आप की कामनाओं को छीन कर आप को दुखी नहीं बनाता, किन्तु वेदान्त आप से इन इच्छाओं का समाधान कराता है और इन्हें आप के अधीन करता है। उन (इच्छाओं) से कर्ता-पूर्वक शासित (दास) होने के स्थान
पर वेदान्त आप को उन का शासक (प्रभु) बनाना चाहता है।
44 उपवास (fasting) तो केवल सहायतार्थ किया जाना चाहिए, परन्तु उस का हम पर आधिपत्य न होना चाहिये। लोग प्रायः उपवास इस लिए करते हैं, कि वे उस के लिए विवश किए जाते हैं। उस समय वे (लोग) उपवास रूपी दासता के दास बन जाते हैं।
45 असली उपवास का अर्थ अपने को सारी स्वार्थयुक्त कामनाओं से रहित कर देना और उन से पूर्णतयः शुद्ध हो जाना है; उनको पोषण करना नहीं है।
46 दान (के उचित अनुचित होने) का निर्णय (दान करने वाले के) अभिप्राय से नहीं वरन् (दान) के फल से किया जाना चाहिये।
47 यदि हम एक दिन हज़ारों भूखों को भी भोजन करादें तो (उस से) क्या (लाभ)? इस प्रकार का विवेकहीन दान भले मानुष दरिद्रों के उत्पन्न करने में सहायता देता है।
48 "यज्ञ वा होम से विपत्ति टलती है" यह कहावत आज भी उतनी ही सच्ची है जितनी कि प्राचीन पुण्य-काल में थी, किन्तु (भेद केवल इतना है कि) यह यज्ञ केवल निर्दोष जीवों का नहीं बल्कि प्रेम की वेदी पर अपनी दल-बन्दी
की वृत्ति अर्थात् जाती-भेद, तथा ईर्ष्या के भावों का हवन करना है जो हमें इसी संसार में स्वर्ग ला देता है।
49 हवन के लिए कृत्रिम-अग्नि जलाने की जगह शुद्ध-चित्त युवकों को प्रातःकाल अथवा सायंकाल के सूर्य की प्रदीप्त प्रभा को यज्ञाग्नि कुण्ड बनाकर उस में अपने तुच्छ और ठिंगने अहंकार की आहुति देना चाहिये।
50 देवताओं के लिए सच्चे यज्ञ व हवन का अर्थ व्यक्तिगत शक्तियों और इन्द्रियों का उन के प्रतिरूप आधिदैविक शक्तियों के प्रति अर्पण कर देना है।
51 आदित्य के प्रति आहुति देने का अर्थ सारी आँखों का आदर तथा सम्मान करते हुए समस्त आँखों में ईश्वर की प्रत्यक्षता का अनुभव करना होगा।
52 इन्द्र के प्रति आहुति का अर्थ, देश भर में सब हाथों अर्थात् लोगों के कल्याणार्थ काम करना होगा।
53 यदि आप मनुष्य की पूजा करें, दूसरे शब्दों में यदि आप मनुष्य को मनुष्य नहीं ईश्वर रूप मानें, यदि आप सब चीज़ों को ईश्वर-रूप अर्थात् परमात्मा रूप समझें और तब मनुष्य की उपासना करें, तो यह तुम्हारी ईश्वर की उपासना होगी।
54 इस संसार में प्रत्येक वस्तु परिवर्तन-शील है। देश का रूप दिन २ बदल गया; शासन बदल गया, भाषा बदल गई,
देश-वासियों का रंग बदल गया, तो फिर वेदों के समय के देवता लोग ही अभी तक दूर स्वर्ग में अपने २ पालनों में क्यों भूलते रहें, और काल के साथ वे भी क्यों न आगे बढ़ें और इस पृथ्वी पर आकर हम लोगों से वे क्यों खुल्लम खुल्ला न मिलें और इस प्रकार वे क्यों न मनुष्य से परिचित हों?
55 दशा (स्थिति) अब बदल गई; अधिकतर लोग एक-राज-शासन (एक राजाधिपत्य) नहीं चाहते, वे स्वराज चाहते हैं। ईश्वर के पुराने, गर्वित और उद्धत भाव को 'अहं ब्रह्मास्मि' के स्वतंत्रता-प्रेरक भाव में विस्तृत करने का उत्तम समय है।
56 वर्तमान कर्मकाण्ड के प्रश्न का रूप बदल कर अब यह हो गया है; "यदि आप को वर्तमान उन्नति की तथा कला कौशल वाली वृद्धि की शताब्दी में रहना है और राजनैतिक तपेदिक़ से अंश २ करके नष्ट होना नहीं है, तो विद्युत के मातरिश्वा को बांध लो, भाप के वरुण को दास बना लो और कृषि-विज्ञान के कुबेर से परिचित हो जाओ। इन देवताओं से तुम्हारा परिचय कराने वाला पुरोहित वह वैज्ञानिक अथवा कला वेत्ता (artist, कारीगर) है जो विद्या के इन अङ्गों में शिक्षा देता है।"
57 अो तुम जो सत्य पर आरूढ़ हो, इस बात से भयभीत मत हो कि अधिकांश लोग मेरे विरुद्ध हैं।
58 जिस समय सब लोग तुम्हारी प्रशंसा करेंगे, तब यह तुम्हारे लिए अति दुःख वा कष्ट का कारण होगी, क्योंकि इसी प्रकार इन (वर्तमान लोगों) के पूर्वजों ने झूठे पैगम्बरों की प्रशंसा की थी।
59 हे थोड़ी श्रद्धा वाले लोगो! जागो अपने पवित्र प्रभुत्व में जागो। तुम्हारे लिए परवाही के केवल एक कटाक्ष से ही तुम्हारी प्रभुत्व पूर्ण लापरवाही के एक इशारे से ही घोर नरक भी मनोहर स्वर्ग में परिणित हो सकता है।
60 अपने हृदय (छाती) में विश्वास (श्रद्धा) की अग्नि को प्रज्वलित रखे और ज्ञान की मशाल को रोशन रखे चिना आप कोई भी काम पूरा नहीं कर सकते और एक क़दम भी आगे नहीं बढ़ सकते।
61 अन्य पतितों का उद्धार करते फिरने वाले प्यारे! आप कौन हैं! क्या स्वयं आप का उद्धार हो चुका है?
62 कर्म-उपसना से मुक्ति लाभ करने का विश्वास व्यर्थ है।
63 तुम अपने भीतर के स्वर्ग में जो तुम स्वयं हो निवास करो और फिर सब वस्तुएँ स्वतः आप के पास जमा होएँगी।
64 अपनी सच्ची आत्मा के ईसा को अर्थात् प्रभुओं के
प्रभु को, इस संसार के भ्रान्त करने वाले सुखों के बदले में मत बेचो।
65 यदि उस झूठे चुम्बन के बाद तत्काल पैसा वाक्य न होता, तो आज ईसा को कौन स्मरण रखता?
66 यदि आप चाहो तो ईसा आज उत्पन्न किया जा सकता है।
67 यदि वाह्यबल के ईश्वर ने एक वृक्ष विशेष को निषेध करके विभिन्न न किया होता, तो बेचारे हज़रत आदम को अदन के शोभायमान विशाल बाग़ में एक स्वच्छ स्थान में उस वृक्ष विशेष के फल को खाने का ख़याल तक कभी न होता।
68 जब तक पति पत्नियां एक दूसरे के परस्पर उद्धारक अर्थात् ईसा बनना अङ्गीकार न करें, तब तक संसार भर की इंजीलें भी कुछ लाभ नहीं कर सकतीं।
69 हज़रत मूसा के प्रथम नियम का अर्थ यह है कि प्रेम के अतिरिक्त तेरा कोई दूसरा ईश्वर नहीं होगा।
70 केवल परमात्मा ही सत्य वस्तु है; अन्य सब मिथ्या है। ला इलाह इल लिल्लाह।
71 प्रार्थना का अर्थ कुछ शब्दों का रटना नहीं है। प्रार्थना का अर्थ परमात्मदेव का मान करना, अनुभव करना है।
72 "प्रभु! तेरी इच्छा पूर्ण हो" ऐसी प्रार्थना के स्थान पर तुम्हें इस प्रकार आनन्दित होना चाहिये कि "मेरी इच्छा पूर्ण हो रही है; मेरी इच्छा पूर्ण हो रही है।"
73 दूसरों की राय से समोहित मत हो; जो पुरुष दूसरों की रायों से समोहित होने की निर्बलता से जितना अधिक ऊपर रहता है, उतना ही वह अधिक स्वतन्त्र रहता है।
74 जैसा कि नियम है, ये गिरजे, मन्दिर, सभाएँ और सम्मेलन, संसार की संमोहन निद्रा को जारी रखने के भिन्न २ तरीक़े हैं।
75 क्या प्रमाण (शास्त्र) सत्य को प्रतिपादन वा स्थिर कर सकता है? क्या सूर्य के स्पष्ट दर्शन के लिए छोटे से दीपक की ज़रूरत होती है! यदि ईसा, मोहम्मद, बुद्ध, ज़ोरास्टर, वेद आदि सब मिल कर गणित के किसी साधारण तथ्य की (सत्यता विषय) साक्षी दें, तो क्या उस साधारण तथ्य का महत्व किंचित मात्र भी बढ़ जावेगा।
76 हे जीवित मनुष्य! स्वयं प्रेम रूप बन कर जीवन व्यतीत करना उचित है। बुद्ध, ईसा स्वामियों और भूतकाल के अन्य उपास्य मूर्तियों के अधूरे चरित्रों (दृष्टान्तों) को देख कर भ्रम में मत पड़ो (अपनी बुद्धि पर परदा मत डालो)।
77 बीसवीं शताब्दी में यह हमारे लिए उत्तम समय है कि हम विवेक के भाव में जागें और व्यक्तियों को उन के उपदेशों के साथ मिश्रित न करें। क्या हम को सुन्दर कमल का फूल इसलिए त्याग देना चाहिये कि वह एक गन्दे तालाब में उत्पन्न होता है।
78 किसी मनुष्य की शिक्षा और उपदेशों को, शिक्षक की व्यक्ति को ध्यान में न रख कर, हमने उन्हें उन (शिक्षा और उपदेशों) के गुणों पर लेना अर्थात् ग्रहण करना है। रेखा-गणित के तत्वों का यूक्लिड (अंग्रेज़ी रेखा-गणित निर्माता) की व्यक्ति के साथ भला क्या सम्बन्ध है?
79 बंधन और दासत्व शीघ्र दूर हो रहे हैं, विकास का क्रम जारी है और इस कारण प्रत्येक वस्तु को अवश्य आगे बढ़ कर उन्नति पर उन्नति करना है। तो क्या आप की व्यक्तिगत परमात्मा ही (वहीं का वहीं) ठहरा रहेगा (अर्थात उन्नति नहीं करेगा)? नहीं।
80 देहात्मवाद (Materialism) ईश्वराविश्वास-वाद (Scepticism), प्रत्यक्षैकात्मक-दर्शन वाद (Positivism) नास्तिकवाद (Atheism) और अज्ञेयतावाद (Agnosticism) के कट्टर पक्षपातियों तक को जो सफलता प्राप्त होती है, उस का कारण भी अज्ञातत: उन के अन्तर्गत धर्म का प्रत्यक्ष भाव है।
81 संसार स्वयं एक कौतुक है, अन्य कौतुकों की आवश्यकता नहीं, भय जो सब पापों का मूल है, केवल आत्मा के ज्ञान से दूर होता है। शुद्धता का अनुभव करो और स्वयं शुद्ध बनो। किसी अन्य धर्म की शिक्षा देना अस्वाभाविक है।
82 दूसरों को अपना जीवन व्यतीत करने देना और वस्त्र, भोजन, गमन, शयन, हंसी रुदन और वार्तालाप का तो भला कहना ही क्या है, इन सब में स्वतन्त्रता रखना, क्या यह वास्तव में अकर्मण्यता (जड़ता) नहीं है?
83 हम दूसरों की दृष्टि में बड़े भले बनना चाहते हैं, यही (हमारी अभिलाषा) समाज की बुराई है और सब धर्मों के लिए विष है।
84 प्रत्येक स्मृति यह कहने के लिए मौजूद है "कि कल हम ने उस पदार्थ को इस प्रकार माना था, आज आप का अनुभव इस वस्तु के सम्बन्ध में क्या है।"
85 जब तक कोई धार्मिक ग्रन्थ लोगों की आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति न करे, तब तक वह ठहर नहीं सकता, और जैसे २ विकास के मार्ग पर लोग उन्नति करते हैं, वैसे वैसे उन के धार्मिक ग्रन्थों की व्याख्या में भी उन्नति अवश्य होती है।
86 भूत काल के महा-पूज्य ऋषियों और मुनियों की आँखों से झांकते रहने की अपेक्षा हमें अपनी ही आँखों द्वारा देखना और अपनी समस्याओं का स्वयं ही हल करना है।
87 प्रकृति में परमात्मा को प्रकृति रूप से देखो, बल्कि उस से भी बढ़ कर तुम उसे (रसायन) की प्रयोग शाला और विज्ञान-भवन में देखो, तुम्हारे लिए रसायनज्ञ की मेज़ यज्ञाग्नि के समान पवित्र होनी चाहिये।
88 आप के भीतर के निजात्मा से यदि वाह्य प्रकृति का शासक आत्मा भिन्न होता, तो आप के लिए सिर नीचे लटकाने और धिक्कारे जाने से अतिरिक्त अन्य कोई उपाय न होता।
89 अस्त होते या उदय होते सूर्य की ओर जाइये, नदियों के तट पर विचरिये, अथवा ऐसी जगह पर टहलिये जहां शीतल वायु अठखेलियां करती हो, तब आप अपने को प्रकृति के साथ एक ताल तथा विश्व के साथ एक स्वर (अविरोध) पावेंगे।
90 वे लोग धन्य हैं जो समाचार-पत्र नहीं पढ़ते, क्योंकि (ऐसा करने से) उन को ठीक प्रकृति के दर्शन होंगे, और प्रकृति के द्वारा ठीक परमात्मा के दर्शन होंगे।
91 हमारे भोजन (अन्न) का निर्देशक (guide) ज्ञान हो।
92 समग्र संसारों के धर्म्म-ग्रन्थों को उसी भाव से ग्रहण करना चाहिये, जिस प्रकार रसायन शास्त्र का हम अध्ययन करते हैं, अपने तजुर्बे के अनुसार अन्तिम निश्चय ते पाते हैं।
93 विज्ञान को सर्व प्रिय बनाने के उद्योग का अभिप्राय यह है, कि कुछ स्पष्ट धार्मिक भूलों का मूलोच्छेद किया जाय और लोगों की शक्तियों को अधिक साधारण तथा विवेक युक्त मार्ग में लगाया जाय।
94 भूत काल को वर्तमान से गठाने के लिए वैज्ञानिक अविष्कारों को ईसाईयों की इंजील अथवा अन्य धार्मिक ग्रन्थों (भाष्य आदि) के आदेशों के साथ क्या टांका जा सकता है?
95 यदि विज्ञान पवित्र शब्द ॐ के प्रभाव सम्बन्धी मान्यता का विरोध करे तो उस के लिए शोक है। यदि पवित्र ओंकार के प्रभाव सम्बन्धी सत्य के विरुद्ध विज्ञान चलता है तो उसे धिक्कार है।
96 वेद विज्ञान से विरुद्ध नहीं हैं; आप के आजकल की रचनाएँ और अविष्कार श्रुतियों की महारानी के चरण धो रहे हैं। वे वेदान्त की अधिकाधिक सेवा कर रहे हैं।
97 शौच के समय मनुष्य को कितनी कुल्ली करना चाहिये। इस प्रकार के पेचीदा प्रश्नों पर वाद-विवाद करने में बहुत सारे युवकों की मानसिक शक्तियां अपव्यय अथवा नष्ट की जाती हैं।
98 आप अपनी शक्ति को उत्तम विषयों की ओर लगने दीजिए, तब आपके पास कामुकता की गंध (रस) तर्क के ख़याल करने का भी समय न मिलेगा!
99 प्रायः यह उपदेश दिया जाता है कि सांसारिक प्रेम से धर्म का किंचित सम्बन्ध नहीं है, राम आप से कहता है कि इनका सम्बन्ध है। प्रेम का उचित प्रयोग आप को ईश्वर का अनुभव करा देता है।
100 जब तक पत्नि पति का वास्तविक हित करने को तत्पर नहीं होगी और पति पत्नि की कुशल-क्षेम की वृद्धि के लिए उद्यत न होगा, तब तक धर्म की उन्नति नहीं हो सकती; फिर धर्म के लिए कोई आशा नहीं है।
101 इन्द्रिय-सुख यदि ठीक ठीक कहा जाय तो अपने स्वरूप से वह धर्म है; परन्तु धर्म के अनुभव करने का इन द्वारा जो मार्ग है वह गंदी मोरी के सींकचों से दरबार की झांकी लेने के समान है।
102 देवतागण हमारे त्याग (प्रदान) और विनय पर अपने दिल ही दिल में हँसते हैं। हा! ये कैसी उपहास युक्त झूठी
शपथें हैं जो हम अपने दूर के पड़ोसी के प्रति सच्चा बने रहने के यत्न में लेते हैं।
103 भय से और दण्ड से पाप कभी बन्द नहीं हुए।
104 अपराधों के अनेक नाम होते हैं, मातृ-हत्या (matricide मैट्रीसाइड), नर-हत्या (homicide होमी-साइड) इत्यादि, परन्तु प्रत्येक और सब में ईश्वर को अनुभव न करके आप ईश्वर-अथवा देव-हत्या का अपराध करते हो।
105 आदेशों के देने से सदाचार की कमी न्यूनता उत्पन्न कर दी जाती है।
106 संसार ख्याल करता है, अधिकतर धर्म भी मानते हैं, और बहुत से नीतिज्ञ (सदाचार उपदेशक) इस बात का स्पष्ट समर्थन करते हैं कि "आदेशों और नियमों से सब मामले तय हो जायेंगे"; परन्तु ऐसा कभी नहीं, कभी नहीं, कभी नहीं हो सकता।
107 जिस प्रकार मोह (आसक्ति) का नाम प्रेम हो जाता है, उसी प्रकार कभी कभी नैतिक दुर्बलता को लोग शुद्धता कह देते हैं (समझ लेते हैं)।
108 हृदय की शुद्धता का अर्थ केवल वैवाहिक (प्रणय सम्बन्धी) पापों से ही बचा रहना नहीं है। इस का अर्थ यह भी है और इस के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ है।
109 आप का आत्मा, स्वभाव से ही अशुद्ध और पापी नहीं है, और न किसी एक मनुष्य के पाप से पतित हुआ है, और न अपने उद्धार के लिए वह किसी दूसरे मनुष्य के पुण्य के आश्रय ही है।
110 लोग चाहे आप से भिन्नमत हों, चाहे आप पर नाना प्रकार की कठिनाईयां डालें, चाहे आप को बदनाम करें, पर उनकी कृपा तथा कोप, उन की धमकियों तथा प्रतिज्ञाओं के होते हुए भी आप के मन रूपी सरोवर से दिव्य, अनन्त रूप से पवित्र, मीठे (ताज़ा) जल की धारा के अतिरिक्त और कुछ निकलना ही नहीं चाहिये। आप के अन्दर से अमृत का प्रवाह बहना चाहिये, जिस से आप के लिये बुरी बातों का सोचना उसी प्रकार असम्भव हो जाय, कि जिस प्रकार स्रोत के शुद्ध और ताज़ा जल के लिए अपने पीनेवालों को विष दे देना असम्भव हो जाता है।
111 यह एक दैवी-विधान है जिस को सब कोनों में तथा सब बाज़ारों में प्रसिद्ध कर देना चाहिये, कि "आप ईश्वर की आँखों में धूल फेंकने का प्रयत्न करो, तो आप स्वयं अन्धे हो जाओगे।"
112 चाहे आप किसी अत्यन्त एकान्त गुफा में कोई पाप कर लो, आप बिना किसी विलम्ब के यह देख कर चकित होंगे कि आप के पैरों नीचे की घास खड़ी हो कर आप के विरुद्ध साक्षी देती है, आप बिना किसी विलम्ब के देखेंगे
कि उन्हा दीवारों और उन्हीं वृत्तों के जुबान हैं और वे बोलते हैं। आप प्रकृति को, कुदरत को, धोखा नहीं दे सकते। यह एक सत्य है और यह एक दैवी-विधान है।
113 गुरूत्वाकर्ष्ण शक्ति (gravity) से विरोध मत करो, संभल कर पग धरो, आप कभी न गिरोगे। आप का सारा गिरना, आप की सारी हानियाँ, और आप की सारी चोटें, आप के सारे दुख और चिन्तायें, आप की किसी अन्दरूनी दुर्बलता के कारण हैं। उस (दुर्बलता) को दूर करो।
114 जितना अधिक आप का हृदय प्रकृति के साथ एक ताल होकर धड़कता है, उतना ही अधिक आप को भान होता है कि समस्त प्रकृति भर में आप ही हैं जो सांस ले रहे हैं।
115 दूसरों के प्रति आप का क्या कर्तव्य है? जब और लोग बीमार पड़ें तो उन को अपने पास ले आओ और जिस प्रकार अपने शरीर-विशेष के घावों की आप शुश्रुषा करते हैं, उसी प्रकार उन घावों को अपना ही समझकर आप उन की टहल करो।
116 जब आप कुछ भान (महसूस) करने लगते हैं, तो आप के पड़ोसी पर तत्क्षण असर पड़ता है।
117 वह मनुष्य जो अपने संगी से घृणा करता है, वह किसी मनुष्य के समान हत्यारा है कि जिस ने यथार्थ में हत्या की हो।
118 जिस समय आप अपने को अपने संगी मनुष्य से अभिन्न नहीं समझते, उस समय मानो आप से परम पवित्र सत्य का खण्डन हो जाता है।