(3) दर्शन शास्त्र।
1 जो दर्शन-शास्त्र प्रकृति (कुदरत) में होने वाले सब तथ्यों का समाधान नहीं करता, वह दर्शन-शास्त्र ही नहीं है।
2 सत्य क्या है? तत्वमसि अथवा प्रेम स्वयं।
3 सत्य को परस्पर समझौता करने की आवश्यकता नहीं। सारा संसार सूर्य के चारों ओर परिक्रमा किया करे, परन्तु सूर्य को संसार के चारों ओर परिक्रमा करने की आवश्यकता नहीं।
4 सत्य किसी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं है; सत्य ईसा की जागीर नहीं है; हम ने ईसा के नाम से सत्य का प्रचार करना नहीं है ............. । यह सत्य कृष्ण अथवा किसी भी व्यक्ति विशेष की सम्पत्ति नहीं है। बल्कि यह (सत्य) प्रत्येक व्यक्ति की सम्पत्ति है।
5 सत्य की, जिस का कल भी वही रूप था, आज भी वही रूप है, और सदा वही रूप रहेगा, किसी घटना विशेष के साथ गड़बड़ मत करो।
6 सत्य का अनुभव करना विश्व का स्वामी हो जाना है।
7 इस लिए कि आप सत्य तक पहुंच सकें, वा आप आत्मानुभव कर सकें, यह ज़रूरी है कि आप की प्रियतम अभिलाषायें और आवश्यकतायें सारी की सारी नितान्त भिद् (छिद) जायें, आप की ज़रूरतें और प्रियतम ममतायें (आसक्तियां) आप से अलग २ हो जायें और आप के प्रिय अन्ध विश्वास मलिया-मेट हो जायें; वे आप के शरीर से नितान्त अलग २ होकर दूर गिर जायें।
8 यदि सत्य के लिए आप को अपना शरीर त्यागना पड़े तो त्याग दीजिए। यही अन्तिम है। यही अन्तिम ममता है जो भंग होती है।
9 यह सत्य अथवा ईश्वर आप को अपना पितावत् भान हो, यह सत्य या ईश्वर आप को अपनी माता रूप भान हो, यह सत्य या ईश्वर आप को अपनी स्त्री स्वरूप हो, यह आप को अपना पितामह, गुरू, घर, सम्पत्ति, प्रत्येक वस्तु भान हो।
10 सत्य का सच्चा भाव सारे संसार तथा समस्त विश्व के विरुद्ध व्यक्ति की प्रधानता स्थापित करना है।
11 अपनी मृत्यु पश्चात् आप का नर्क को जाना अथवा स्वर्ग में समावेश होना ही पूरा तत्व (सत्य) नहीं है।
12 सम्पूर्ण मनुष्य हमें कितना ही थोड़ा मिलता है। सम्पूर्ण मनुष्य वह है जो ईश्वरबोधित (ईश्वर-संचारित inspired) हो, सम्पूर्ण मनुष्य सत्य स्वरूप है, ..... आप सम्पूर्ण वनों,
कामनाओं और मोह के बन्धनों से रहित हो। इस राग और द्वेष से परे हो।
13 असल में केवल एक ही आत्मा है, जो हम हैं, इस के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। और इस आत्मा के अतिरिक्त और कुछ भी न होने के कारण आप बिना झिझक (या लगातार) यह नहीं कह सकते कि आप एक अंश हैं। परन्तु इस से यह सिद्ध होना अनिवार्य है कि आप ही वह सम्पूर्ण आत्मा हो। सत्य (तत्व) के भाग नहीं हो सकते। अब आप ही सत्य हैं।
14 लोग तथा अन्य वस्तुएँ तभी तक हमें प्यारी लगती हैं, जब तक वह हमारा स्वार्थ सिद्ध करती हैं तथा हमारा काम निकालती हैं। जिस क्षण हमारे स्वार्थ के सिद्ध होने में जोखिम (भय) होती है, उसी क्षण हम सब कुछ त्याग देते हैं।
15 बच्चे के लिए बच्चा प्यारा नहीं होता, किन्तु अपने लिए वह प्यारा होता है। पत्नी के लिये पत्नी प्यारी नहीं होती, किन्तु अपने लिए पत्नी प्यारी होती है। ऐसे ही पति के लिए पति प्यारा नहीं होता, बल्कि अपने लिए पति प्यारा होता है। यही तत्व वा दैवी-विधान है।
16 यद्यपि लोगों को मृत्यु का मानसिक ज्ञान है, तो भी उस में उन को अमली विश्वास क्यों नहीं होता? इस का समाधान वेदान्त इस प्रकार करता है; मनुष्य के भीतर एक असली आत्मा है जो अमर है; एक शुद्ध आत्मा है जो
अविनाशी, अपरिवर्तनशील है, कल आज और सदा एक समान है। मनुष्य में कोई ऐसी वस्तु है, जो मृत्यु गवारा नहीं कर सकता, और जिस के लिए कोई परिवर्तन है ही नहीं।
17 अपने को एक पुरुष या स्त्री कहना, अपने को एक क्षुद्र रेंगने वाला जन्तु बतलाना झूठ और नास्तिकता है।
18 ब्रह्म वह है कि जो चक्षु इत्यादि ज्ञान-इन्द्रियों और मन से जाना नहीं जा सकता, बल्कि जो इन मन, चक्षु इत्यादि को अपने २ कामों में लगाना है।
19 हे चंचल नास्तिक (अश्रद्धालु)! तू क्यों तिलमिलाता और दुःखी होता है? सिवाय तेरे मधुरात्मा (दैवी-विधान) के संसार पर अन्य किसी का भी आधिपत्य नहीं है।
20 तुम कौन हो? शुद्धात्मा बल्कि सब का अनन्त निष्कलंक और अमर आत्मा ही तुम्हारा आत्मा है।
21 क्या तुम्हें अपने दिव्यात्मा के विषय में सन्देह है? अपने हृदय में इस सन्देह की अपेक्षा यदि गोली होती तो अच्छा होता।
22 ईश्वर ही एक सत्य है, संसार वा नाम रूप (दृश्य) माया मात्र है।
23 शरीर केवल छाया है; शुद्ध स्वरूप वा वास्तविक
आत्मा तो परम-सत्य है।
24 असली मनुष्य, सच्चा मनुष्य तो ईश्वर वा परमात्मा है; इस से अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
25 शुद्ध आत्मा, अर्थात् असली ईश्वर मन और शब्दों की पहुँच से परे है।
26 ब्रह्म मानसिक विवेचना और बोध का विषय नहीं हो सकता। मन और वाणी उस से विस्मित (व्याकुल) हुए वापिस लौटते हैं।
27 आप में एक ऐसी वस्तु है जो सुषुप्ति काल में भी जागती रहती है, वह आपकी वास्तविक आत्मा, परम चिच्छक्ति अथवा चेतन स्वरूप है।
28 लोग पूछते हैं "क्या आप ईश्वर का एक अंश है"? नहीं, नहीं, ईश्वर के भाग नहीं हो सकते। ईश्वर तोड़ा फोड़ा नहीं जा सकता। यदि ईश्वर अनन्त है, तब तुम अवश्य पूर्ण ईश्वर हो; ईश्वर के भाग नहीं हो सकते।
29 प्र॰—क्या आप का ईश्वर (के अस्तित्व) में विश्वास है? उ॰—"मैं ईश्वर को जानता हूं", हम विश्वास तो उस चीज़ में करते हैं जिस को हम जानते नहीं, और जो हम पर जबरन मढ़ी गई हो। ईश्वर में विश्वास करना, इस का क्या अर्थ है? आप उस के विषय में क्या जानते हैं"? "मैं ईश्वर को जानता हूं! मैं वही हूं; मैं वही हूं"।
30 जहां एक अपने से अन्य न किसी को देखता है, न सुनता है, और न जानता है, वही अनन्त है, क्योंकि जब तक आप से अतिरिक्त कोई वस्तु मौजूद है तब तक आप परिच्छिन्न और अन्तवान हो।
31 अनन्त ही परमानन्द है। किसी अन्तवान् में परमानन्द नहीं होता। जब तक आप अन्तवान् हैं, तब तक आपके लिए परमानन्द नहीं, सुख नहीं। अनन्त ही परमानन्द है, केवल अनन्त ही परमानन्द है।
32 कोई भी आपके पास आवे, ईश्वर समझ कर उस का स्वागत करो, परन्तु उस समय साथ २ अपने को भी अधम मत समझो। यदि आज आप बंदी खाने में हो तो कल आप प्रतापवान् (परम पद प्राप्त) हो सकते हो।
33 आप ही के भीतर सच्चा आनन्द है। आप ही के भीतर दिव्यामृत का महासागर है। इसे अपने भीतर ढूंढ़िये, अनुभव कीजिए, महसूस कीजिए, यह अर्थात् आत्मा यहीं है। यह न शरीर है, न मन है, और न मस्तिष्क ही है। यह न इच्छार्थ है, न इच्छा-शक्ति और न इच्छित पदार्थ ही है; आप इन सब से ऊपर हो। यह (नाम रूप) सब आभास मात्र हैं। आप ही मुसकराते हुए फूल और चमचमाते हुए तारों के रूप में प्रगट होते हैं। इस संसार में ऐसा कौन है जो आप में किसी चीज़ की अभिलाषा उत्पन्न कर सकता है।
34 जिस क्षण आप इन बाह्य पदार्थों की ओर मुख फेरोगे
और उन को पकड़ना तथा रखना चाहोगे, उसी क्षण वे आप को छलकर आप के हाथ से निकल भागेंगे। और जिस क्षण आप इन की ओर पीठ करोगे और प्रकाशों के प्रकाश स्वरूप अपने निजात्मा की ओर मुख करोगे, उसी क्षण झांककर (कल्याणकारी) अवस्थायें आप की खोज में लग जाएंगी। यह दैवी विधान है।
35 जब कभी मनुष्य किसी सांसारिक वस्तु से दिल लगाता है, जब कभी मनुष्य किसी पदार्थ के साथ उसी पदार्थ के लिए प्रेम करने लगता है, जब कभी मनुष्य उस पदार्थ में सुख ढूंढ़ने का यत्न करता है, उस को धोका होता है, वह अपने को केवल इन्द्रियों का मूढ़ पावेगा। आप सांसारिक पदार्थों से आसक्ति करके सुख नहीं पा सकते। यही दैवी-विधान है।
36 शक्ति-शाली मुद्रा (रुपय) में विश्वास न करो, ईश्वर पर भरोसा रखो। इस पदार्थ अथवा उस पदार्थ पर भरोसा न करो। ईश्वर में विश्वास करो। अपने स्वरूप वा आत्मा में विश्वास करो।
37 अहंकारी मत बनो; धमण्डी मत बनो। कभी मत समझो कि आप के परिच्छिन्न आत्मा की भी कोई वस्तु है, वह आपके असली आत्मा ईश्वर की वस्तु है।
38 शरीर से ऊपर उठो। यह समझो और महसूस करो कि मैं अनन्त और परमस्वरूप हूं, और (इस कारण) मुझ पर मनो-विकार और लोभ भला कैसे प्रभाव डाल सकते हैं।
39 आप अपने ईश्वरत्व में निवास कीजिए, फिर तो आप स्वतन्त्र हैं, स्वयं अपने स्वामी और सारे विश्व के शासक हैं।
40 जिस समय मनुष्य विश्व-आत्मा को अपनी निजी आत्मा अनुभव करता है, तो सारा विश्व उसके शरीर के समान उसकी सेवा करता है।
41 भूख प्यास शरीर के हैं, और मन से भान होते हैं, परन्तु वह स्वयं, शुद्ध आत्मा शरीर की थकान, भूख अथवा प्यास से न व्यथित होता है और न विक्षिप्त होता है।
42 अपने चित्त को शान्त रखो, अपने मन को शुद्ध विचारों से भरदो और कोई भी मनुष्य आपके विरुद्ध अपने को खड़ा नहीं कर सकता। ऐसा दैवी-विधान है।
43 दैवी-विधान यह है कि मनुष्य को भीतर से विक्षेप रहित शान्त तथा क्षोभ-रहित होना चाहिये और शरीर को सदा चलता फिरता रखना चाहिये। चित्त को स्थिति-शास्त्र के नियमों के अधीन रखना चाहिये और शरीर को गति-शास्त्र के नियमों के अधीन अर्थात् शरीर काम में और भीतरी आत्मा सदा शान्त हो, यही दैवी-विधान है। स्वतन्त्र हो।
44 यह वेधने योग्य परिच्छिन्नात्मा, जो हम में और दूसरों में पाप का उत्पादक मात्र है, इसे हमें फैंक डालना चाहिये।
45 निष्पापावस्था वास्तव में शुद्ध आत्मा को गुण है, परन्तु
व्यवहार में भ्रम से यह शरीर का गुण समझा जाता है।
46 निम्न लिखित ध्वनि के समान शब्द लोगों धा फुफकारते हुए सर्प के समान लगते हैं: तुम स्वयं ईश्वर हो, पवित्रों के पवित्र हो। संसार (वास्तव में) संसार नहीं है। तुम ही सब में सब कुछ परम शक्ति हो, वह शक्ति कि जिसका कोई शब्द, शरीर अथवा बुद्धि निरूपण नहीं कर सकते; तुम शुद्ध "मैं हूं" हो। वही तुम हो।
47 मैं स्वतन्त्र कब हूंगा? जब परिच्छिन्न "मैं" का अन्त हो जाएगा।
48 ईश्वर क्या है? ईश्वर एक रहस्य (पहेली) है।
49 वह कौन है जो आप के सम्मुख होता है, वह कौन है जो सीधा आपकी ओर देखता है, जबकि आप किसी मनुष्य की ओर निगाह उठाते हैं? यह परमात्मा है।
50 अनन्त शक्यता अर्थात् वह अनन्त शक्ति जो किसी परिच्छिन्न रूप अथवा आकार में गुप्त वा अप्रकट है, और शब्द बीज का वास्तविक अर्थ है, वह भीतर से अनन्त है, न कि उसका ऊपरी या बाहिरी रूप। वह बाह्यरूप अनन्त नहीं।
51 आदि बीज के लाख पुश्त के वंशज में भी वही अनन्त सामर्थ्य तथा शक्यता है जो आदि बीज में थी।
52 मनुष्य के भीतर की अनन्तता, अनन्त सामर्थ्य अथवा शक्ति स्थाई और निर्विकार है। अनन्तता कैसे नाश हो सकती है? इसका नाश कभी नहीं होता।
53 अज्ञान से तुम अपने को शरीर कहते हो, परन्तु शरीर तुम हो नहीं। तुम अनन्त शक्ति हो, ईश्वर हो, नित्य-स्थाई और निर्विकार स्वरूप हो। वही तुम हो, उसे जानो और तुम फिर अपने को सारे संसार में और समस्त विश्व में बसा हुआ पाओगे।
54 यह एक अनन्त राम ही है, जो सब शरीरों में प्रतिबिम्वित है, अज्ञानी लोग इस संसार में कुत्ते की भांति आते हैं। कृपया इसका रूपान्तर कर दो। इस संसार में घर के, दर्पण के और शीशमहल के स्वामी की भांति प्रवेश करो। इस संसार में dog (कुत्ते) की भांति नहीं बरन् god (ईश्वर) की भांति आओ, और फिर आप शीश महल के स्वामी और सारे विश्व के मालिक हो जाओगे।
55 मनुष्य का असली स्वरूप ईश्वर है। यदि ईश्वर, मनुष्य का निजी आत्मा न होता तो इस संसार में किसी भी ऋषि अथवा पैगम्बर का आना कभी सम्भव नहीं होकता।
56 सारा संसार स्वर्ग है, और ईश्वर को कभी भी धोका नहीं दिया जा सकेगा।
57 "अहं ब्रह्मास्मि" का न कहना पाप है।
58 वेदान्त के अनुसार स्वतः सिद्ध सत्य यह है, कि तुम पहिले ही से ईश्वर के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं हो; तुमने अपने ईश्वरत्व का जनाना नहीं है, उसे केवल जानना, अनुभव करना या महसूस करना है।
59 वेदान्त आप से यह अंगीकार कराना (या दर्शाना) चाहता है कि (दान) देने में आनन्द है, लेने अथवा भीख मांगने में नहीं।
60 वेदान्त के अनुसार किसी व्यक्तिगत सम्पत्ति पर अधिकार जमाना, भीतरी या निजस्वरूप आत्मा के विरुद्ध घोर पातक कर्म है।
61 व्यावहारिक (अमली) वेदान्त क्या है? धका-पेल करना और बढ़ता हुआ परिश्रम, न कि जकड़ा हुआ आलस्य; काम में आनन्द, न कि थकानेवाली बेगार; चित्त की शान्ति न कि संशय रूपी घुन; संगठन न कि अस्त व्यस्त अवस्था; उचित सुधार न कि कट्टर (अपरिवर्तनशील) रीति रिवाज़; सच्ची और पक्की भावना; न कि पुष्पित वाणी; तथ्य भरी कविता, न कि कपोल कल्पित गप्प; घटनाओं का न्याय, न कि मृतक लेखकों के प्रमाण; जीता जागता अनुभव, न कि मुर्दा वाक्य लेख। उपरोक्त सब मिल कर व्यावहारिक वेदान्त होते हैं।
62 पुस्तकों में छपे हुए और कीड़ों का आहार होने के लिए अलमारियों में रखे हुए वेदान्त से काम न चलेगा, तुम्हें इसे आचरण में लाना होगा।
63 यदि वेदान्त आप की सर्दी अर्थात् तेज-हीनता (निर्बलता) को दूर नहीं करता, यदि यह आप को प्रसन्न नहीं करता, यदि यह आप के क्षोभों को परे नहीं हटाता, तो उस को ठुकरा कर अलग फैंक दो।
64 वेदान्त के अनुसार समस्त करुणा (दया) निर्बलता है।
65 वेदान्त साधारण लोगों का ध्यान इस लिए आकर्षण करता है कि वह उन के धर्म-ग्रन्थ की शिक्षा है; शिक्षित हिन्दु को वह इस लिए आकर्षित करता है कि सूर्य के तले (संसार भर में) दर्शन शास्त्र कहलाने योग्य कोई भी ऐसा दर्शन नहीं है; कि जो वेदान्तिक अद्वैतवाद का समर्थन न करे, और न ऐसा कोई शास्त्र (विज्ञान) ही है कि जो वेदान्त अथवा सत्य के पक्ष की सहायता तथा (उस के प्रचार की) वृद्धि न करे।
66 वेदान्त-दर्शन के प्रचार का अत्यन्त सर्वोत्तम मार्ग इस का अपने आचरण में लाना है, अन्य कोई भी शाहेराह (राजपथ वा सुगम मार्ग) नहीं है।
67 जिस समय आप अपने को एक ऐसी विचित्र, अकथ-
...नीय भावना वा कल्पना में ढाल देते हैं कि जो हम (और आप) दोनों से उत्तम है। उसी समय आप मुझे (वास्तवमें) पाते हैं। वेदान्त आप को यही बतलाता है।
68 यदि आप किसी अर्थ या उद्देश्य की उपलब्धि चाहते हैं, यदि आप किसी भी पदार्थ को पाना चाहते हैं, तो उस की परछाईं के पीछे मत दौड़ो। अपने ही सिर को छुओ, अपने भीतर प्रवेश करो। इस तथ्य का अनुभव करो, तब आप देखेंगे कि तारागण आप (के हाथों) की ही कारीगरी है, आप देखेंगे कि प्रीति के सारे पदार्थ, सब मोहने और लुभाने वाली चीज़ें, केवल आप का अपना ही प्रतिबिम्ब अथवा परछाईं (प्रति छाया) हैं।
69 अमरपुरी (सुर लोक) आप के भीतर है; स्वर्ग अर्थात् आनन्द का धाम आप के भीतर है; और तब भी आप सुख को बाज़ारों में, अन्य पदार्थों में ढूँढ़ते फिरते हैं, उस वस्तु को बाहर ढूँढ़ते हैं; अर्थात् इन्द्रियों के विषय में बाहर ढूँढ़ते हैं। कैसा आश्चर्य है।
70 तुम एक ही समय में मांस (हाड़मांस के शरीर) के दास और विश्व के स्वामी नहीं बन सकते।
71 इस युग के चाहे सारे बड़े बड़े व्याख्यानदाता (उपदेशक) आ जाएं; ईसा अथवा ईश्वर स्वयं आकर उपदेश करें, परन्तु जब तक आप अपने को स्वयं उपदेश देने के लिए तत्पर नहीं हैं, तब तक दूसरों के उपदेशों से किंचित लाभ नहीं होगा।
72 वेदान्त आप को प्रचण्ड-प्रवृत्ति (अत्यन्त कार्य) द्वारा परिच्छिन्न आत्मा अर्थात् तुच्छ अहंकार से ऊपर उठाना चाहता है।
73 वेदान्त चाहता है कि आप काम को काम की खातिर करें।
74 कर्म का अर्थ वेदान्त में सदा असली आत्मा से मेल और विश्व से अभिन्नता है।
75 कर्म क्या है? वेदान्त के अनुसार अत्यन्त प्रवृत्ति वा अत्यन्त कर्म-विश्राम है। समस्त सत्यकर्म विश्राम है।
76 शरीर को तो कर्मशील उद्योग (प्रयत्न) में और मन को शान्ति और प्रेम में रखने का अर्थ इसी जन्म में दुःख और पाप से मुक्ति है।
77 अन्तर-आत्मा शान्त रहे और शरीर निरन्तर काम में लगा रहे। अर्थात् शरीर गतिशास्त्र के नियमों के आधीन बुरा कर्म में प्रवृत रहे और अन्तर-आत्मा सदा स्थिति शास्त्रानुसार स्थिर रहे।
78 आप का काम अव्यक्तिगत (कर्तृत्व भाव से रहित) हो, आप का काम स्वार्थ पूर्ण अहंकार की मलीनता से रहित हो,
आप का काम सूर्य और तारागणों के काम के समान हो; आप का काम चन्द्रमा के काम क सदृश हो। तभी आप का काम सफल हो सकता है।
79 शरीर और मन निरन्तर काम में इस हद तक प्रवृत्त रहें कि परिश्रम बिल्कुल भी ज्ञान न पड़े।
80 अपने इस तुच्छ अहंकार को त्याग दो, अपने काम के करने में इसे भुला दो, और तब आप की सफलता अवश्य बनी बनाई है; अन्यथा हो नहीं सकता। अपने काम में सफलता पाने से पहिले सफलता की आकांक्षा अवश्य नष्ट हो जानी चाहिये।
81 निर्लिप्त साक्षी के स्वरूप में सब संसृष्टों से स्वतंत्र होकर कर्म करो। सदा स्वतंत्र वा निर्लिप्त रहो।
82 जहां कहीं भी तुम हो, दानी की हैसियत से काम करो; भिक्षुक की हैसियत से कदापि न करो। ताकि आप का काम विश्वव्यापी काम हो, और किंचितमात्र भी व्यक्तिगत न हो।
83 संसारी मनुष्य के लिए निरन्तर कर्म, तथा निरन्तर परिश्रम ही सब से महान् योग है। तभी संसार के लिए आप सब से महान् कार्य कर्ता हैं, जब आप अपने (स्वार्थ के) लिए काम नहीं करते।
84 सफलता प्राप्त करने के लिए, समृद्धिशाली होने के लिए
आप को अपने कर्मों द्वारा तथा अपने जीवन के दैनिक-व्यवहार से, अपने ही शरीर और पट्टों को प्रयोगाग्नि में भस्म कर देना और दहन कर देना पड़ेगा। आप को अवश्य उन का प्रयोग करना होगा। आप को अपना शरीर और मन खर्चना होगा, उन्हें जलती हुई अवस्था में कर देना होगा। अपने शरीर और मन को कर्म की सूली पर चढ़ाओ; कर्म करो, कर्म करो; और तब आप के भीतर से प्रकाश प्रदीप्त होगा।
85 वेदान्त चाहता है कि आप अपनी अन्तरात्मा में निश्चल (स्थिर) रहें।
86 प्रसन्न कार्यकर्ता! जिस समय तुम सफलता को ढूँढ़ना छोड़ दोगे, उसी समय सफलता अवश्य आप को ढूँढ़ेगी।
87 वह हमारी स्वार्थ-पूर्ण चंचलता है जो सारा काम बिगाड़ देती है।
88 यदि आप अधिकारी हैं, तो आप को इच्छा करने की आवश्यकता नहीं; आप के इच्छित पदार्थ आप के पास स्वतः लाभ आ जाएँगे, (अथवा) आप के पास आ जाएँगे; यदि आप अपने को योग्य बना लो, तो सहायता आप के पास अवश्य आवेगी।
89 जिस क्षण आप लालसा से ऊपर उठते हो, उसी क्षण आप का इच्छित पदार्थ आप को ढूँढ़ने लग जाता है; और
जिस क्षण आप प्रार्थी, इच्छुक, याचक, अथवा भिक्षुक का भाव धारण करते हो उसी क्षण आप परे धकेले जाते हो, आप वह पदार्थ नहीं पाते, आप इच्छित पदार्थ नहीं पा सकते।
90 अपने भीतर के स्वर्ग को अनुभव करो, तब एक दम सारी कामनाएं पूर्ण होती हैं, सारे दुःख और व्यथा का अन्त हो जाता है।
91 शब्दों की अपेक्षा कर्म अधिक पुकार पुकार कर उपदेश देते हैं।
92 आप का कर्म कर्म की खातिर होना चाहिये।
93 अपनी इच्छाओं का त्याग कर दो, उन से ऊपर उठो, तब आप त्रिगुण शान्ति, तत्काल विश्रान्ति और अन्त में इच्छित फल पाएंगे। स्मरण रखो कि आप की कामनाएं तभी सिद्ध होंगी जब आप उन से ऊपर उठकर परम सत्य में पहुंचेगे। जब आप जान कर या अनजाने अपने आपको ईश्वरत्व में मिटा देते हो, तभी और केवल तभी आप की कामनाओं के पूर्ण होने का काल सिद्ध होता है।
94 आप का कर्म सफल होने के लिए, आप को उस के परिणाम पर ध्यान नहीं देना चाहिये, आप को उस के नतीजे अथवा फल की परवा नहीं करना चाहिये साधन और परिणाम को लाकर मिला दो, वही काम आप का उद्देश्य या लक्ष्य हो जाए।
95 नहीं, परिणाम और नतीजा मेरे लिए कुछ नहीं है, सफलता अथवा असफलता मेरे लिए कुछ नहीं है, मुझे काम ज़रूर करना चाहिये, क्योंकि मुझे काम प्यारा लगता है, मुझे काम काम के लिए ही करना चाहिये। काम करना मेरा उद्देश्य वा लक्ष्य है; कर्म में प्रवृत्त रहना ही मेरा जीवन है। मेरा स्वरूप, मेरा असली आत्मा स्वयं शक्ति है। मैं अवश्य काम करूंगा।
96 नतीजे की बावत शोक मत करो, लोगों से किंचित आशा न रखो; अपने ग्रन्थों पर अनुकूल समालोचना अथवा प्रतिकूल नुक्ताचीनी (विद्वान्वेषण) के विषय अपने को व्याकुल मत करो।
97 सदा स्वतन्त्र कार्य-कर्ता और दाता बनो; अपने चित्त को कभी भी याचक तथा आकांक्षी की दशा में न डालो। अपना व्यक्तिगत अधिकार करने के स्वभाव से पहला छुड़ाओ।
98 जब आप इच्छा को छोड़ देते हैं, केवल तभी यह सफल होती है। जब तक आप अपनी अभिलाषा को तनी रखेंगे, अथवा इच्छा करते रहेंगे और आकांक्षा तथा अभिलाषा जारी रखेंगे, तब तक दूसरे पक्ष के दिल तक यह (इच्छा) न पहुँचेगी। जब आप इस को छोड़ देते हैं, केवल उसी समय यह (तत्सम्बन्धी) प्रतिपक्षी के हृदय को भेदती (बेधती) है।
99 भाग्य का दूसरा नाम संकल्प है।
100 संसार और आप का अड़ोस पड़ोस ठीक उसी प्रकार के होते हैं जैसा उन के विषय में आप का ख्याल वा संकल्प होता है।
101 जैसा आप विचार करते हैं वैसे ही आप हो जाते हैं; अपने को आप पापी कहो, तो अवश्य ही आप पापी हो जाते हैं, अपने को आप मूर्ख कहो, तो अवश्य ही आप मूर्ख हो जाएंगे; अपने को निर्बल (शक्तिहीन) कहो, तो इस संसार में कोई ऐसी शक्ति नहीं है जो आपको बलवान बना सके। अपने सर्व-शक्तित्व को अनुभव करो तो आप सर्व शक्तिमान होते हैं।
102 किसी व्यक्ति की भावना को बदल दो, तो उसका सोचने का सारा तरीका उलट पुलट हो जाएगा।
103 जिस प्रकार गरुड़ उड़कर उस वायुमण्डल के बाहर नहीं जा सकता कि जिसमें वह उड़ रहा है। इसी प्रकार विचार अपनी सीमा के मण्डल से आगे नहीं बढ़ सकता।
104 विचार और भाषा एक ही हैं। बिना भाषा के आप विचार नहीं कर सकते। छोटे बालक को भाषा का ज्ञान नहीं होता, और (इसी कारण) उसका कोई विचार भी नहीं होता।
105 जो कोई ख़यालों में निवास रखता है, वह...
...व्याधिके संसार (चक्र) में निवास करता है। और चाहे वह बुद्धिमान और पण्डित ही जान पड़े, परन्तु उसकी बुद्धिमानता और पाण्डित्य उसी लकड़ी के टुकड़े के समान खोखली हैं कि जिसको दीमक ने खा डाला हो।
106 सच्ची विद्या (शिक्षा) उसी समय आरंभ होती है, जब कि मनुष्य समस्त बाहरी सहारों (सहायता) को छोड़कर अपनी अन्तर्गत अनन्तता की ओर ध्यान फेरता है, और मूल ज्ञान का मानों एक स्वाभाविक स्रोत अथवा महान् नवीन विचारों का स्रोत हो जाता है।
107 अपनी विद्वता दर्शाने के लिए बड़े-बड़े और लम्बे-लम्बे वाक्य वा श्लोक को उद्धृत करने की योग्यता और वाक्यों तथा प्राचीन धर्म-ग्रन्थों के भाव तोड़ने मोड़ने के लिए व्यर्थ बाल की खाल निकालने की शक्ति, तथा ऐसे विषयों का अध्ययन कि जिनका हमें अपने जीवन में कभी व्यवहार नहीं करना है, यह विद्या (शिक्षा) नहीं है।
108 सच्ची शिक्षा (विद्या) का पूर्ण उद्देश्य लोगों से ठीक बातें कराना ही नहीं बल्कि ठीक बातों से आनन्द दिलाना है, केवल परिश्रमी बनाना नहीं बल्कि परिश्रम से प्रेम कराना है।
109 यदि विद्या मुझे स्वतन्त्रता तथा मोक्ष की प्राप्ति नहीं करा देती, तो इस को धिक्कार है, इसे दूर कर दो, मुझे इस की आवश्यकता नहीं। यदि विद्या मुझे बन्धन में रखती है, तो मुझे ऐसी विद्या से कोई प्रयोजन नहीं।
110 किसी विचार को दक्षता से (चतुराई से) व्यवहार में ले आना और बात है, किन्तु उस के असली भाव को पा लेना बिल्कुल ही दूसरी बात है।
111 मनुष्य और पशु में प्रधान भेद यह है कि जहां कुत्ते के बच्चे अर्थात् पिल्ले में उस के उत्कर्ष के लिए वंश-परम्परा के नियमानुसार लगभग सब कुछ मौजूद है, वहां शिशु (मानवी बच्चा) अपने पैत्रिक गुणों का विकास और उत्कर्ष शिक्षा और संयोजना (अनुकूलता) द्वारा पैदा कर सकता है, अथवा कर लेगा कि जिस से सारे संसार को वह अपने अधिकार में ला सके।
112 भाव जितने बुद्धि वा विवेक के अधीन होते हैं, उतना ही मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ माना जाता है।
113 शिशु की चेष्टा का कोई प्रयोजन नहीं होता, तो भी शिशु की गणना पृथ्वी के सब से अधिक प्रवृत लोगों में से है।
114 जीवन क्या है? बाधाओं की एक माला। हाँ जो लोग जीवन के ऊपरी भाग में ही निवास करते हैं, उन के लिए तो यह (जीवन) पेड़ा (बाधाओं की माला) ही है; परन्तु जो लोग (प्रेम रूप) जीवन व्यतीत करते हैं, उन के लिए पेड़ा नहीं है।
115 इन्द्रियों का अस्तित्व किस से हुआ? तत्वों से। तत्वों...
...की आप को जानकारी किस प्रकार होती है? इन्द्रियों द्वारा। क्या यह दलील चक्ररूप में (कोल्हू के बैल के चलने के समान) नहीं है? यह दलील जाग्रत (चेतन) अवस्था में संसार के मायिक स्वभाव को स्थापित करती है।
116 जब तक प्रश्नकर्ता और प्रश्न के विषय बने रहेंगे, तब तक माया के कारागार की दीवारें भी बनी रहेंगी और नाम रूपों से ऊपर उठना असंभव रहेगा।
117 जाग्रत अवस्था के अनुभव पर ही यूरोप और अमेरिका के दर्शन-शास्त्र अवलम्बित हैं; और सुषुप्ति तथा स्वप्न अवस्था के अनुभव का ख्याल इन में बहुत थोड़ा अथवा किंचित भी नहीं है। इस कारण हिन्दू का कहना है कि अधूरे आधार (ज्ञान कारण) से जब आप आरंभ करते हैं, तो इस विश्व की समस्या का हल आप का किस प्रकार ठीक हो सकता है?
118 इस संसार के सारे पदार्थ उन सरोवरों के समान हैं; कि जो एक सम्मोहित मनुष्य सूखे फर्श पर रचलेता है। और ऐसी दशा में उन पदार्थों का ज्ञान भी कि जिस पर इन के अध्यापक और आचार्य (डाक्टर) लोग घमण्ड करते हैं और अपने बड़प्पन की शेखी मारते हैं संमोहिनी विद्या (hypnoism) से अधिक कुछ भी नहीं है।
119 ऐसे काम जो आप को बहुत प्रिय (हृदय के निकटतर) हैं, जो आप के दिल और धन्धे से सम्बन्ध रखते हैं, उन...
...को करना अधिक उचित होगा। और परलोक अर्थात् स्वप्न का संसार अपनी फ़िक्र आप कर लेगा।
120 सांसारिक आनन्द (भोग) की भूमि में बोए हुए बीज से आध्यात्मिक उन्नति का पैदा नहीं उगता।
121 आध्यात्मिक शक्तियों में तथा जिन लोगों से आप का समागम हो, उन की अनन्त सामर्थ्य में विश्वास रखो। (लोगों के विषय में) निर्णय कर लेना त्याग दो। कभी भी (किसी के विषय में) अपना विशेष मत स्थिर मत करो; किसी को अपराधी मत ठहराओ।
122 जिस प्रकार राज सिंहासन पर राजा की अपनी उपस्थिति ही दरबार भर में व्यवस्था स्थापित कर देती है; इसी प्रकार मनुष्य का अपने ईश्वरत्व में तथा निजी महिमा में स्थित होना ही सारे वंश में व्यवस्था तथा स्फूर्ति स्थापित कर देता है।
123 चिमटा प्रायः और सब चीजों को पकड़ सकता है, परन्तु वह पीछे लौट कर उन्हीं उंगलियों को जो इसको पकड़े हुए हैं किस प्रकार पकड़ सकता है? इसी प्रकार मन अथवा बुद्धि से उस महान् अगेय को, जो स्वयं उसी का आदि मूल है, जानने की किसी प्रकार भी आशा नहीं की जा सकती।
124 वेदों का ज्ञान-काण्ड ही असली वेद है और इसी का...
...हिन्दुओं के षट्-दर्शन के लेखकों, जैन और बुद्ध-धर्म के लेखकों ने श्रुति के रूप में हवाला दिया है।
125 जिस समय हमें हमारी शारीरिक निर्बलता अपने को महसूस कराती है, उसी क्षण हम स्वर्ग से पतित हो जाते हैं। जिस क्षण हम भेद-भाव के वृक्ष का फल चख लेते हैं, उसी क्षण हम को स्वर्ग से भगा दिया जाता है; परन्तु हम अपने मांस (शरीर) को सूली पर चढ़ा कर उस खोए हुए स्वर्ग को फिर से प्राप्त कर सकते हैं।
126 इस लिए त्याग के भाव को ग्रहण करो और जो कुछ आप को प्राप्त हो उस का पलट कर दूसरों को दे डालो। स्वार्थ-पूर्ण शोषण (absorption) मत करो और इस से (शुद्ध) अवश्य हो जाएंगे।
*प्रकाश-विज्ञान में जो प्रकाश वस्तुओं पर पड़ता है, वह सात रंगो का होता है। प्रकाश के जिस-जिस रंग को जो वस्तु खा जाती (जज़्ब कर लेती) है वह रंग उस वस्तु का नहीं होता बल्कि जिस रंग को वह वस्तु वापिस सूर्य की ओर लौटाती है, उसी रंग की वह नज़र आती है। अर्थात् सूर्य के प्रकाश के जिस रंग को वस्तु स्वयं अपने भीतर प्रवेश न करके उलटा सूर्य की ओर वापिस लौटा देती है, उसी रंग की वह वस्तु दिखाई देने लगपड़ती है। और जो वस्तु सूर्य के प्रकाश के सारे रंगों को खा जाती है, वह काली हो जाती है और जो किसी भी रंग को खाती नहीं बल्कि प्रकाश के सारे के सारे रंगों को सूर्य की ओर वापिस लौटा देती है, वह वस्तु शुद्ध, सफेद हो जाती...
...है। इस लिये स्वार्थ-पूर्ण ग्रहण का निषेध करके श्वेत होने का उक्त नियम इस वाक्य में राम ने बतलाया है।
127 याद आप कर्म के विधान को यह कह कर समझावें कि यह ईश्वर की इच्छा है, कि यह उसका काम है; तो यह कोई (ठीक) उत्तर नहीं; यह तो स्पष्ट रूप से प्रश्न से कतराना है; और प्रश्न से कतराना बुद्धिमता (तत्व-विचारात्मक) नहीं है, अर्थात् अपनी अज्ञानता का प्रगट कर देना है।
128 ऐसे सब कर्मों और क्रियाओं की कि जिनको यदि आप स्वयं करते तो हानिकारक अथवा पाप रूप होते, आप घोर तम पाप समझ लीजिये; संसार के ऐसे कर्मों से आप घृणा कीजिए और विमुख हूजिए, परन्तु ऐसे कामों अथवा क्रियाओं के करनेवालों से न घृणा कीजिए और न नफ़रत। उनको ग़लत समझने का आपको कोई अधिकार नहीं है।
129 कांटे बिना कोई गुलाब नहीं होता, इसी प्रकार इस संसार में भी अमिश्रित (खालिस) भलाई अलभ्य है। जो पूर्ण रूप से शुद्ध (अच्छा) है, वह केवल परमात्मा है।
130 स्कापिनहावर (Schopenhauer) का कहना है 'कि आनन्द को अपने भीतर पाना कठिन है,' परन्तु उसको अन्यत्र पाना तो असंभव है।
131 स्वर्ण और लोहा तो स्वर्ण और लोहा खरीदने के लिए ही...
...उपयुक्त हैं; आनन्द भौतिक पदार्थों की श्रेणी में से नहीं है, यह मोल नहीं लिया जा सकता।
132 जिनका यह मत है कि उनका आनन्द विशेष स्थितियों पर अवलम्बित है; वे देखेंगे कि सुख की घड़ी सदा उनसे परे हटती जाती है और मृग-तृष्णा (छलावे) के समान निरन्तर भागता चली जाती है।
133 जैसे को तैसा आकर मिलता है; आप यहीं (इसी संसार में) ईश्वर के आनन्द को अपने भीतर अनुभव करो, सफलता का आनन्द आपकी ओर खिंचता हुआ चला आवेगा।
134 वही अत्यन्त सुखी है और धन्य है, कि जिसका जीवन निरन्तर स्वार्थ त्याग (की श्रृंखला) है।
135 वह मनुष्य सुखी है जो कि जीवन के अव्यक्तिगत (निःस्वार्थ पूर्ण) श्वास को, जो गुलाब की क्यारियों और शाह बलूत के कुंजों में प्रेरणा उत्पन्न करता है, पुरुषों और स्त्रियों के समूहों में देख कर सारे जगत को स्वर्गीय उपवन बनाता है।
136 यदि आप अपनी शक्ति को कायम रखना चाहते हैं, यदि आप अपने स्वास्थ्य को स्थिर रखना चाहते हैं, और आपकी इच्छा है कि नाड़ी-संस्थारूपी घोड़ा जीवन के बोझ को सुगमता पूर्वक उठा सके, तो आपको अहंकार युक्त विचारों के बोझ को हलका करना पड़ेगा।
137 आप अपने प्रति सच्चे बने रहें, और संसार में अन्य किसी बात की ओर ध्यान न दें।
138 संसार में व्यथा का प्रधान कारण यह है कि "हम लोग अपने भीतर नहीं देखते, स्वयं अपना मत स्थिर नहीं करते, अनेक बातों में आवश्यकता से अधिक विश्वास कर लेते हैं, अपने विचार करने को हम बाहरी शक्तियों पर आसरा रखते हैं।"
139 मित्रों अथवा शत्रुओं द्वारा किया हुआ छिद्रान्वेषण आप को अपनी सच्ची आत्मा, (अर्थात्) ईश्वर में जगाने के लिए रात के भयानक स्वप्न के समान है।
140 अरे! स्वर्ग आपके भीतर है; इन्द्रियों के विषयों में आनन्द मत ढूँढ़ो; अनुभव करो कि आनन्द आप ही के भीतर है।
141 संपूर्ण स्वर्ग आप के भीतर है; संपूर्ण सुख का मूल आप के भीतर है। ऐसा होते हुए अन्य जगह सुख को ढूँढ़ना कितना अनुचित वा अन्याय-पूर्वक है।
142 मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है।
143 जब समस्त संसार आप ही की रचना, आप ही का संकल्प मात्र है, तो आप अपने को तुच्छ और हीन पापी क्यों समझते हैं! आप अपने को भय रहित स्वावलम्बी
परमात्मा का रूप क्यों नहीं समझते?
144 राम कहता है कि सर्व रूप परमात्मा के साथ एक ताल होने का परिणाम स्वरूप सफलता लाभ होती है। सफलता सदा आप के भीतर की भलाई का परिणाम होती है, सफलता ईश्वर में आप के तन्मय तथा लीन होजाने का परिणाम होती है। सदा यही हुआ करता है।
145 स्वतन्त्र मनुष्य वही है जिसका भीतरी प्रकाश उस के चारों ओर सुन्दरता का दीप्त मण्डल फैला देता है, और जिस से केवल स्वर्गीय प्रेम ही प्रेम फूटता रहता वा झलकता रहता है।
146 जो मनुष्य मुक्त है, सारी प्रकृति (कुदरत) उस की वन्दना करती है, सारा विश्व उसके सामने सिर झुकाता है। मैं वह (मुक्त) हूं, आप मुक्त हैं। चाहे आज यह माना जाय या नहीं, पर वह एक निष्ठुर सत्य है, और सब लोगों को शीघ्र या देर में इस को अनुभव करना पड़ेगा।
147 अपने से अतिरिक्त और किसी के प्रति आप का उत्तर दायित्व नहीं। यदि आप प्रसन्नता और शान्ति का यह सब से पवित्र नियम भंग करते हैं तो आप अपने प्रति घोर अपराधी हैं।
148 ओम मन्त्र का पहिला अक्षर अ (A) उस निष्ठुर तत्व, अपने आत्मा को प्रतिपादन करता है, कि जो जाग्रत
अवस्था के भ्रमात्मक भौतिक संसार को प्रकाशता और उस के पीछे (अधिष्ठान रूप से) स्थित है। उ (U) अक्षर मानस संसार को प्रतिपादन करता है और अन्तिम अक्षर म् (M) उस परमात्मा (परब्रह्म) को प्रतिपादन करता है, कि जो शून्यावस्था के पीछे (अधिष्ठान रूप से) स्थित है और जो वहां (सुषुप्ति काल में) अपने को अज्ञात रूप से प्रकाशता है।
149 यदि विज्ञान-शास्त्र पवित्र ओंकार अक्षर के प्रभाव (सामर्थ्य) सम्बन्धी सच्चाई का विरोध करे, तो उस को धिक्कार है।
150 वही सुखी है कि जो ओंकार में रहता सहता, चलता फिरता और अपना अस्तित्व रखता है। अपने भीतर के इस ओप को अनुभव करने के लिए अथवा स्वर्ग के साम्राज्य का फाटक खुलवाने के लिए इस ताली का प्रयोग करना होता है।