(4) प्रेम और भक्ति।
1 प्रेम को अर्थ व्यवहार में अपने पड़ोसियों के साथ और जिन लोगों को आप मिलते हैं उन के साथ अपनी एकता और अभेदता का अनुभव करना है।
2 प्रेम शिल्प (व्यवसाय) भी है और शास्त्र भी है। वैज्ञानिक आविष्कार (Scientific discoveries) तो महान् सूर्य अर्थात् प्रेमाग्नि अथवा एकत्र अनुभव की केवल चिंगारियाँ और स्फुलिंग (चमचमाहट) हैं।
3 एक मात्र शास्त्र-अनुकूल धर्म (अर्थात् नियम) है प्रेम। प्रेम में निवास करना ही अपने प्रति सच्चा रहना है।
4 सच्चा प्रेम सूर्य के समान आत्मा (मन) को विकसित (विस्तीर्ण) कर देता है। मोह मन को पाले के समान सकुड़ा देता और संकुचित कर देता है।
5 प्रेम को मोह से मत मिलाओ (अर्थात प्रेम को भूल से मोह मत समझो)।
6 भक्ति (प्रेम) कोई चिल्लाने वा मांगने की अभावात्मक दशा नहीं है। यह तो बराबरी फड़कती मधुरता और दिव्य लापरवाही का अकथ्य भाव है। जो कुछ हम देखते
हैं उस में सर्व रूप को देखना भक्ति (प्रेम) है। जहां कहीं दृष्टि पड़े उसी में अपने आत्मा को देखना भक्ति (प्रेम) है। यह अनुभव करना भक्ति है कि सर्व रूप सुन्दरता है और वह मैं हूं। तत्वमसि अर्थात् वही तू है।
7 विषय-वासना विहीन प्रेम तो आध्यात्मिक प्रकाश है।
8 प्रेम अथवा अभेदता का मत जब दो व्यक्तियों में आचरित होता है, तो भेद के भ्रम को मिटा देता है।
9 जीवन प्रतिवादिता (Struggle for existence) में कौन सी वस्तु विजय होती है? प्रेम!
10 प्रेम का अर्थ सुन्दरता का प्रत्यक्षीकरण (perception) है।
11 केवल प्रेम ही एक मात्र दैवी-विधान है। और सब विधान सुव्यवस्थित (संगठित) लूट मार है। केवल प्रेम को ही नियम (विधान) भंग करने का अधिकार है।
12 प्रेम को इस हद तक गलत समझा गया है कि शब्द प्रेम का उच्चारण मात्र ही प्यारे लोगों को दिव्य ज्योति की जगह कामुकता तथा मूर्खता के भाव की सूचना दे देता है।
13 प्रेम अन्तः प्रेरणा करता है, मस्तक (बुद्धि) उस की व्याख्या करता है। जिस प्रकार बच्चों से पहिले शरीर
होता है, उसी प्रकार विचारने से पहिले हमेशा भाव वा भावना होती है।
14 समस्त इच्छा प्रेम है और प्रेम ईश्वर है; और वह ईश्वर तुम हो।
15 जहां प्रेम है वहां न छोटाई है न बड़ाई, न ऊँचाई न नीचाई।
16 जिस समय आप प्रेम में एकीभू होते हैं, तब सोर चमत्कार सम्भव हो जाते हैं।
17 जिस मनुष्य ने कभी प्रेम नहीं किया, वह (मनुष्य) कदापि ईश्वरानुभव नहीं कर सकता। यह एक तथ्य है।
18 भय केवल संकुचित प्रेम है, अन्यथा भय पर प्रेम किस प्रकार विजयी हो सकता है?
19 दिखलावे का प्रेम, झूठ भाव और बनावटी कल्पना ईश्वर के प्रति अपमान हैं।
20 जिस समय आप विरह और भेद के दल दल में फँस जाते हैं, तभी आप सुखं से रहित और व्यथा व्याधि से पीड़ित होते हैं। जिस समय आप अपने को समस्त और सर्वरूप अनुभव करते हैं, तभी आप पूर्ण और सर्वरूप होते हैं।
21 व्यथा या व्याधि क्या है! प्रेम के अभाव के कारण संकोच
वा संकीर्ण वृत्ति, परछाँई के हिलने पर फड़ फड़ाना, और भय के स्वप्न देख कर चिल्लाना है।
22 जब स्वयं कोई बात बिगड़ रही हो, तो उस समय अपने को प्रेम के विधान से ठीक करने के स्थान पर अड़ोस पड़ोस से झगड़ना ऐसा है जैसा कि टेलीफ़ोन के अगले सिरे पर से बोलने वाले किसी मित्र से अशुभ समाचार के सुनने पर टेलीफ़ोन के सुनने वाले भाग को तोड़ डालना।
23 यह सत्य है कि वकवादियों, बाह्य आकृतियों वा रूपों में विश्वास करने वालों, और लज्जा जनक प्रतिष्ठा के निर्लज्ज दासों की संगत के समान और कोई विपैला पदार्थ नहीं है। परन्तु जहां पर प्रेम-प्रभू का डेरा लगता है, वहां पर कोई भी गुस्ताख़ (अशिष्ट) आवारा चक्कर नहीं लगा सकता।
24 हे मनुष्य! तुम ही अपनी दृष्टि से सब वस्तुओं को चित्ताकर्षक बनाते हो। उन आंखों से जब तुम इन की ओर देखते हो, तो तुम ही स्वयं अपना तेज पदार्थ पर डाल देते हो, और फिर तुम ही उस के प्रेम में आसक्त होते हो।
25 काल तो प्रेम के स्वाभाविक बोध के साथ २ रहने के लिये विवश है।
26 पहिले दिल जीतो, फिर बुद्धि (विवेक) से प्रार्थना करो। जहां बुद्धि निराश होती है, वहां प्रेम को फिर भी
आशा हो सकती है। ऐसी कहानी है कि यात्री के शरीर पर से आंधी कोट न उतरवा सकी, परन्तु गर्मी ने उतरवा दिया।
27 वह मनुष्य कितना ही धन्य है (अर्थात् भाग्यवान् है) कि जिस का माल (सम्पत्ति) चुरा लिया गया हो, और तिगुण धन्यवान् वह मनुष्य है कि जिसकी स्त्री भाग जाये, यदि ऐसा होने से उसका प्रेम स्वरूप के साथ सीधा संयोग हो जाय।
28 यह मेरे प्राण, हे प्रभू! स्वीकृत कीजिये, और निज अर्पित होने दीजिये। (इस कविता में शब्द "प्रभू" से तात्पर्य आकाश में बैठा हुआ, बादलों में सर्दी खाने वाला गुप्त बूढ़ा नहीं है; प्रभू का अर्थ है सर्वस्वरूप, तुम्हारा सहवर्ती जन)
29 प्रेम, मैं इस समस्त परिवर्त्तनशील संसार का आदि और अन्त हूँ। हे मनुष्य! इस से परे अन्य कुछ भी नहीं क्योंकि जिस प्रकार माला के दाने (मणके) धागे में पुरोये होते हैं, उसी प्रकार केवल एक (प्रेम स्वरूप) में यह सारा विश्व बंधा हुआ है।