(5) त्याग वा संन्यास।
1 बिना कामना के कर्म सर्वोत्तम त्याग अथवा ईश्वराधना का पर्याय वाचक है।
2 जिस प्रकार मधु में फंस जाने पर मक्खी अपनी टांगों को मधु से धीरे-धीरे परन्तु दृढ़तापूर्वक साफ़ कर लेती है, इसी प्रकार व्यक्तियों और रूपों से आसक्ति का प्रत्येक कण हमें दूर करना आवाश्यक है।
3 सम्बन्धों को एक एक करके काटना पड़ेगा, बन्धनों को यहां तक तोड़ना पड़ेगा कि मृत्यु के रूप में अन्तिम अनुग्रह सम्पूर्ण अनिच्छित त्याग में सफली-भूत हो।
4 दैवी-विधान का चक्र निर्दयतापूर्वक घूमता रहता है। जो इस विधान के अनुकूल चलता है वह इस पर सवारी करता है; परन्तु जो अपनी इच्छा को ईश्वर-(दैवी-) इच्छा (दैवी-विधान) के प्रतिकूल खड़ा करता है, वह अवश्य ही कुचला जायगा और उसको प्रोमिथियंस के समान भारी पीड़ा भोगनी पड़ती है।
5 इस त्याग को हिन्दू ज्ञान कहते हैं; अर्थात् त्याग और ज्ञान एक ही और वही वस्तु हैं।
6 जो ज्ञान त्याग का पर्यायवाची है वह सत्य का
ज्ञान है, वास्तविक आत्मा का ज्ञान है, जो तुम वास्तव में हो उस का ज्ञान है। यह ज्ञान त्याग है, इस ज्ञान को प्राप्त कर लो तो आप त्यागी मनुष्य हो।
7 आप के स्थान, पदवी और शारीरिक परिश्रम से त्याग का कोई सम्बन्ध नहीं; उन से इस का कोई सम्बन्ध नहीं।
8 त्याग केवल आप को सर्वोत्तम स्थिति में रखता है; आप को उत्कर्ष दशा वा श्रेष्ठ पद में स्थित रखता है।
9 त्याग केवल आप के बल को बढ़ा देता है; आप की शक्तियों का गुणा कर देता है; आप के पराक्रम को दृढ़ (मज़बूत) कर देता है, और आप को ईश्वर बना देता है। यह आप की चिंता और भय को हर लेता है। और आप निर्भय तथा प्रसन्न चित्त हो जाते हैं।
10 काम केवल तभी हो पाता है, जब हम इस परिच्छिन्न स्वार्थी अहंकार से पल्ला छुड़ा लेते हैं। जिस क्षण आप इस स्वार्थी अहंकार को प्रतिपादित करते हैं; उसी क्षण काम बिगड़ जाता है। सर्वोत्तम काम वह काम है जो अकर्तृत्व भाव से किया जाता है। त्याग का अर्थ इस पारिच्छिन्न, व्यक्तिगत, स्वार्थी अहंकार अर्थात् निजात्मा की इस झूठी भावना से पल्ला छुड़ाना है।
11 त्याग का अर्थ फ़क़ीरी नहीं है।
12 त्याग का अर्थ प्रत्येक पदार्थ को पवित्र बनाना है।
13 बच्चे को त्याग देने का अर्थ बच्चे से सब सम्बन्धों का तोड़ लेना नहीं है, वरन् बच्चे को तथा पौत्र को ईश्वर समझ लेना है।
14 प्रत्येक में और सर्व में ईश्वरत्व का भान करना ही वेदान्त के अनुसार त्याग है।
15 स्वार्थ-पूर्ण और व्यक्तिगत सम्बन्धों को त्याग दो, प्रत्येक में और सर्व में ईश्वरत्व को देखो; प्रत्येक में और सर्व में ईश्वर के दर्शन करो।
16 व्यावहारिक त्याग का अर्थ अपनी मानसिक दृष्टि के सामने सृष्टि का गोलाकार (खोखलापन) और अपनी वास्तविक आत्मा का स्वरूप (ठोसपन) हर समय रख कर चिन्ता, भय, फ़िक्र, शीघ्रता और अन्य मानसिक व्याधियों का त्याग देना और फेंक देना है।
17 आप को करने के लिए कोई कर्तव्य नहीं; आप किसी के प्रति उत्तर-दायी नहीं, आप को चुकाने के ऋण नहीं, आप किसी के प्रति बन्धे हुए नहीं। आप अपनी व्यक्ति को सारे समाज और सारे राष्ट्रों तथा प्रत्येक वस्तु के विरुद्ध प्रतिपादन करो। यही वेदान्ती त्याग है।
18 प्रत्येक वस्तु आप ही हैं; भूत और प्रेत; देव तथा
देव दूत, पापी तथा ऋषि सब आप ही हैं। इस बात को जान लीजिए, इस को महसूस कीजिए, इस को अनुभव कीजिए, और आप मुक्त हैं। यही त्याग का मार्ग है।
19 त्याग (क्या है?)—अहंकार-युक्त जीवन का त्याग देना। अवश्य और निस्सन्देह अमर जीवन तो व्यक्तिगत और संकुचित (परिच्छिन्न) जीवन के खो डालने में है।
20 केवल त्याग ही अमरत्व प्राप्त कराता है।
21 वेदान्ती त्याग यह है कि आप को सदा त्याग की चट्टान पर ही रहना पड़ेगा, और अपनी स्थिति उत्कर्ष दशा वा श्रेष्ठ पद में दृढ़ता-पूर्वक जमा कर, और जो काम सामने आये, उसके प्रति अपने को पूर्णतः अर्पण करके आप थकेंगे नहीं, कोई भी (मुश्किल से मुश्किल) हो कर्तव्य आप को एक समान हो जाएगा।
22 त्याग का आरंभ सब से निकट और सब से प्रिय वस्तुओं से होना चाहिये, मुझे जिसका त्याग करना आवश्यक है, वह मिथ्या अहंकार है; अर्थात् "मैं यह कर रहा हूं", "मैं कर्ता हूँ और मैं भोक्ता हूं" यह विचार जो मुझ में, इस मिथ्या व्यक्तित्व को उत्पन्न करता है, इसका त्याग करना है।
23 जंगलों में चले जाना उद्देश्य प्राप्ति का केवल एक साधन मात्र है, यह विश्व विद्यालय में जाने के समान है।
24 वेदान्तयोग को अनुभव करने के लिए वनों में जाने और असाधारण अभ्यास करने की कोई आवश्यकता नहीं है; जिस समय आप कर्म में निमग्न और प्रवृत्ति में लीन होते हैं, उस समय आप स्वयं शिव के पिता हैं।
25 त्याग आप को हिमालय के घने जंगलों में जाने को नहीं कहता; त्याग आप को सारे कपड़े उतार डालने को नहीं कहता, त्याग आप को नंगे पांव और नंगे सिर घूमने को नहीं कहता।
26 त्याग को उदासीन निस्सहायता तथा तितिक्षु निर्बलता के साथ एक न करना चाहिये; ईश्वर के पवित्र मन्दिर अर्थात् अपने शरीर को बिना रोक टोक के मांसाहारी भेड़ियों को खिला डालना कोई त्याग नहीं है।
27 अपने आप को सत्य से पृथक और भिन्न समझते रहना और फिर धर्म के नाम पर त्याग आरंभ करना इसका अर्थ जो चीज़ अपनी नहीं उस (पराई वस्तु) पर अधिकार जमा लेना है, यह छल वा गबन है।
28 प्रेम के द्वारा त्याग से रहित सभ्य मनुष्य केवल अधिक अनुभवी और अधिक बुद्धिमान वनमानुष (वन मानु) हैं।
29 त्याग के अतिरिक्त और कहीं भी वास्तविक आनन्द
नहीं है; त्याग के बिना न ईश्वर-प्रेरणा हो सकती है, न प्रार्थना।
30 ईश्वरत्व और त्याग पर्यायवाची शब्द हैं। शिक्षा (अनुशीलन-Culture) तथा सदाचार ये उसके बाह्यरूप हैं।
31 अहंकार-पूर्ण जीवन का छोड़ देना अर्थात् त्याग ही सुन्दरता है।
32 हे धार्मिक विवाद तथा दार्शनिक तर्क वितर्क दूर हो जाओ। मैं यह जानता हूं कि सुन्दरता प्रेम है, और प्रेम सुन्दरता है। और दोनों ही त्याग हैं।
33 हृदय की शुद्धता का अर्थ अपने को सांसारिक पदार्थों की आसक्ति से अलग स्वतंत्र रखना है। त्याग (का अर्थ) इससे कम नहीं है।