श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(6) ध्यान वा समाधि।

भाग 28 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 28 · अध्याय 6 / 9

(6) ध्यान वा समाधि।

1 ध्यान वा समाधि कामनाओं से ऊपर उठने से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।

2 कामनाएं एकाग्रता में बाधा डालती हैं और जब तक चित्त-शुद्धि और आत्म-ज्ञान नहीं होते, तब तक वास्तविक एकाग्रता प्राप्त नहीं हो सकती।

3 वेदान्त की मानसिक एकाग्रता में विशेष बात यह है, कि हमें अपनी असली आत्मा को सूर्यों का सूर्य और प्रकाशों का प्रकाश अनुभव करना होता है।

4 ज़रा प्रणव का गान करो, ज़रा प्रणव का उच्चारण करो, और उच्चारण करते समय अपना चित्त पूर्णतः इस में लगा दो, अपनी सारी शक्तियों को इस में जोड़ दो; अपना सारा मन इस में संचित करो; इस के अनुभव करने में अपना सारा बल लगा दो।

5 इस पवित्र अक्षर ॐ का अर्थ है "मैं और वह एक हैं, ॐ वही मैं हूं," ॐ ! ॐ !!

6 ॐ उच्चारते समय यदि हो सके तो अपनी समस्त निर्बलताओं और सारे प्रलोभनों को अपने सामने रक्खो। उन्हें

अपने पांवो तले कुचल डालो; उन से ऊपर उठो; और विजयी होकर निकलो।

7 शरीर पर के सारे अधिकार को त्याग दो; सारी स्वार्थता को, सारे स्वार्थ-युक्त सम्बन्धों को, मेरे और तेरे के भावों को छोड़ दो; इन से ऊपर उठो।

8 सत्य के लिए तड़पना आत्मा की परम वास्तविकता के आनन्द के लिए लालायित होना, अपने को ऐसी मानसिक स्थिति में रखना ही मुरली को भगवान (कृष्ण) के होंटों पर लगाना है।

9 ऐसी मानसिक अवस्था में, ऐसी हृदय की शांति के समय, ऐसे शुद्ध मन से ॐ के मन्त्र का उच्चारण आरम्भ करो। पवित्र प्रणव ॐ का गाना आरम्भ करो।

10 यह तो मुरली में राग का दम भरना है। अपने सारे जीवन को मुरली बना लो; अपने सारे शरीर को मुरली बना लो। इस का स्वार्थपरता से खाली करके इस में स्वर्गीय श्वास भर दो।

11 ॐ उच्चारण करो, और उच्चारते समय अपने मन के सरोवर में खोज आरम्भ करो। उस बहु-जिह्वा वाले विषधर नाग को ढूंढ निकालो, यह अनगिनत इच्छाएं, सांसारिक अभिलाषाएं और स्वार्थ-पूर्ण प्रवृत्तियां ही उस विषधर नाग के सिर जिह्वा और दांत हैं। उन को एक २

करके कुचल डालो, उन को अपने पांवों तले रौंद डालो। उन को एक 1 करके निकाल डालो, उन को अपने वश में कर लो और पवित्र प्रणव ॐ को उच्चारते रूप उन को नष्ट कर डालो।

12 शरीर और उस के अड़ोस पड़ोस (environments), मन और उस के प्रवर्तक (कार्य) और सफलता के ख्याल या भय से अपने को ऊपर महसूस करो।

13 अपने को सर्वव्यापक, परम शक्ति, सूर्यों का सूर्य, कार्यत्व से ऊपर नाम रूप जगत् से ऊपर और समस्त महान् लोकों से अभिन्न और परमानन्द स्वरूप मुक्त राम अनुभव करो।

14 ॐ उच्चारो और एक अथवा अनेक स्वरें जो भी स्वभावतः अथवा स्वतः आप के चित्त में फड़कें, उन्हीं से ॐ का गायन करो।

15 एक क्षण के वास्ते सब इच्छाओं को परे फैंक दो। ॐ को उच्चारो; न राग, न द्वेष, पूर्णतयः एक समान, और इस से आप का सारा अस्तित्व प्रकाश-स्वरूप हो जाएगा। कर्मके सांसारिक प्रवर्तकों (प्रयोजना-motives) इनको निराकरण कर दो; कामनाओं के भूत प्रेतों को उतार कर दूर फैंक दो; अपने सारे काम को पवित्र बना मोह अथवा आसक्ति के रोग से अपने को छुड़ा लो; एक पदार्थ में आसक्ति ही तुम्हें सर्व रूप (परमात्मा) अलग कर डालती है।

16 हृदय को शुद्ध करो, प्रणव अक्षर का गायन करो; निर्बलता के सब चिन्हों का चुन कर उन्हें अपने भीतर से बाहर करो। सुन्दर चरित्रवान बन कर विजयी निकलो।

17 जब मनोविकार के राक्षस (वा भयानक सर्प-dragon) का नाश हो जाएगा, तब आप देखेंगे कि आप की इच्छा के पदार्थ आप की उसी प्रकार पूजा करते हैं, जिस प्रकार कि यमुना नदी के भीतर श्रीकृष्ण से कालिया सर्प के मारे जाने पर उस की स्त्रियों ने श्रीकृष्णजी की पूजा की थी।

18 शरीर से ऊपर उठो। यह समझो और अनुभव करो कि आप अनन्त, परम आत्मा हैं; और तब आप लोभ अथवा मनोविकार से कैसे प्रभावित हो सकते हैं?

19 समाज, रिवाज़ लोकाचार क़ानून-नियम, व्यवस्था, छिद्रान्वेषण और समालोचनाएं आप की सच्ची आत्मा को नहीं छू सकतीं। ऐसा अनुभव करो, उस (समाज इत्यादि के भ्रम) को फैंक दो, उस को त्याग दो, वह आप हैं ही नहीं। ऐसा अर्थ ॐ का करो और थकान के प्रत्येक अवसर पर इस ॐ का उच्चारण करो।

20 यह अनुभव करो कि आप पूर्ण आनन्द हो, आनन्द हो, आनन्द हो।

21 प्रति दिन रात इस सत्य का अभ्यास (चिन्तवन) करो कि संसार का सब मत और समाज केवल आप का अपना ही संकल्प है; और आप ही वह असली शक्ति हैं कि संपूर्ण संसार जिसका सांस अथवा छायामात्र है।

22 भोजन का जो ग्रास (कौर) आप के मुंह में जाता है उस के साथ साथ आपको इस आशय का चिन्तवन करना चाहिये कि यह कौर बाह्य पृथ्वी का प्रतिनिधि रूप है और मैं यहां अपने भीतर सारे ब्रह्माण्ड को लीन कर रहा हूं।

23 प्रत्येक रात अथवा मध्याह्न के समय सोने से पहिले-जब आंख बन्द होने लगे-तब अपने मन में दृढ़ निश्चय कर लीजिये कि जागने पर आप अपने को वेदान्त के सत्य की साक्षात् मूर्ति पाएंगे।

24 जिस शरीर को आप अपना बतलाते हैं, यदि वह अस्वस्थ हो तो इस को एक ओर पड़ा रहने दो, इस का विचार मत करो; समझो वा भान करो कि आप स्वास्थ्य की स्वयं मूर्ति हैं; पूर्ण स्वास्थ्य आप का है; इस को महसूस करो। शरीर फौरन् स्वयं ही चंगा हो जायगा।

25 प्रातः काल जब आप ॐ (प्रणव) का जाप करो, तो इस के अनुसार जीवन व्यतीत करने का और इस को व्यवहार में लाने का दृढ़ और पक्का निश्चय करो। जो कोई भी काम हाथ में लो उस के करने से पहिले ही सावधान हो जाओ।

26 पूर्ण रूप से वायु को मुंह के द्वारा भीतर खींचो और अपने अपने नथनों से बाहर निकालो। इस क्रिया का अभ्यास दृढ़ता पूर्वक किया जाना चाहिये और तुम देखोगे कि कितना अद्भुत आप को यह प्रसन्न कर देता है।

27 राम आप को अत्यन्त स्वाभाविक प्राणायाम की सलाह देता है। श्वास, श्वास, श्वास लो। गहरा सांस लेने से कोष्ठ (आमाशय, stomach) के नीचे के हिस्से में वायु भर जाएगी और भीतर सारी नली में भी जाएगी। इस प्रकार से आप तत्क्षण सुस्ती से मुक्त हो जाओगे और आप की शक्तियां सर्वोत्तम रूप से संचित हो जाएंगी।