श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

(7) आत्मानुभव।

भाग 28 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 28 · अध्याय 7 / 9

(7) आत्मानुभव।

1 आत्मानुभव आप को बाह्य प्रभावों से मुक्त कर देता है। यह आप को अपने सहारे खड़ा कर देता है।

2 सब पापों से बचने का और सब प्रलोभनों से ऊपर रहने का एक मात्र उपाय अपने सत्य स्वरूप का अनुभव करना है।

3 जब तक आप इस वैभव और ऐश्वर्य को, जो आप को मुग्ध और आकर्षित किए हुए है, छोड़ न दोगे, तब तक आप पाशविक मनोविकारों का विरोध न कर सकोगे।

4 जिस समय आप वह (अपना स्वरूप) अनुभव कर लेते हो, तब आप सब मनोविकारों से ऊपर खड़े होते हो और साथ ही पूर्णतया मुक्त और परमानन्द से परिपूर्ण होते हो; और वही स्वर्ग है।

5 आत्मानुभव कोई (बाहर से) प्राप्त किए जाने वाला पदार्थ नहीं। आप को ईश्वर-दर्शन की प्राप्ति के लिए कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। केवल अपने इर्द गिर्द जो आप ने इच्छाओं के अंधकारमय कोकून बना रखे हैं, उनको उधेड़ डालना है।

6 अपने ईश्वरत्व को प्रतिपादन करो; परिच्छिन्न-

आत्मा पर इस प्रकार खाक डाल दो (या उसे बिल्कुल ऐसा भुला दो कि) जैसे यह कभी हुआ ही नहीं। जब यह (परिच्छिन्नात्मा का) छोटा बुलबुला फूट जाता है, तब यह अपने को महासागर पाता है। आपही सम्पूर्ण, अनन्त और सर्वस्वरूप हो।

7 आप अपने प्राचीन (असली) तेज से जगमगाइये। हे पूर्ण पुरुष! तेरे वास्ते न कोई कर्तव्य है, न कर्म है, न करने का कोई काम है। सारी प्रकृति सांस रोके (दम घुटे) तेरी प्रतीक्षा कर रही है।

8 यदि मानवी अथवा प्रायः पाशवी भावनाओं को धो डाला जाय, तो उनकी जगह दिव्य भावनाएं उमंडने लगती हैं।

9 यदि आप वेदान्त का अनुभव करना चाहते हैं तो इस को सब प्रकार के शोरोगुल में बल्कि सब प्रकार की व्याधियों की अग्नि में अनुभव कीजिये। इस संसार में आप किसी प्रकार भी, कभी भी, उस अवस्था में अपने को नहीं पा सकते जहां बाहर से न शोर हो और न कोई असुविधा हो।

10 सच तो यह है कि जितनी ही अति कठिन परिस्थिति होती है, जितना ही अति पीड़ाकर अड़ोस पड़ोस (घिराव) होता है, उतने ही अति विलिष्ट वे लोग होते हैं कि जो परिस्थितियों से निकल आते हैं। इस कारण इन समस्त बाह्य कष्टों और चिन्ताओं का स्वागत करो। इन परिस्थि-

तियों में भी वेदान्त को आचरण में लाओ। और जब आप वेदान्त का जीवन व्यतीत करोगे, तब आप देखोगे कि सारे अड़ोस पड़ोस और परिस्थितियां आप के वश में हो जाएंगी, आप के उपयोगी (वा अधीन) हो जाएंगी, और आप उन के स्वामी बन जाओगे।

11 चाहे आप बड़े हों या छोटे, चाहे आप ऊंचे स्थित हो या अति नीचे, इस की तृणवत् परवा मत करो; अपने पांवों पर खड़े हो।