वास्तविक आत्मा।
ता० 7 जनवरी 1903 को अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को के गोल्डेन गेट हाल में दिया हुआ व्याख्यान। भद्रपुरुषों और महिलाओं के रूप में सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर ! एक जर्मन कथा के अनुसार एक मनुष्य ने अपनी प्रतिच्छाया खो दी थी। यह बड़ी ही विचित्र बात है। एक मनुष्य ने अपनी छाया खो दी और उसके लिये उसे हानि उठानी पड़ी। उसके सब मित्रों ने उसे तज दिया। सम्पूर्ण सम्पत्ति ने उसे छोड़ दिया और वह बड़ी विपत्ति में पड़ गया। छाया खोने के बदले जिस मनुष्य ने अपना सारांश
खो दिया हो उसके लिये आप क्या विचार करेंगे? जो मनुष्य केवल अपनी छाया खो बैठा है उसके उद्धार की आशा हो सकती है, किन्तु जो अपना वास्तविक सारांश शरीर खो चुका है उसके लिये कौनसी आशा हो सकती है? इस संसार में अधिकांश मनुष्यों की यही गति है। अधिकांश मनुष्यों ने अपनी छाया ही नहीं, परन्तु अपना मुख्यांश, अपनी वास्तविकता खो दी है। अचम्भों का अचम्भा !! शरीर छाया मात्र है, वास्तविकता है वास्तविक स्वयं, वास्तविक आत्मा। हरेक मनुष्य हम से अपनी छाया की चर्चा करेगा, हरेक पुरुष अपने शरीर के सम्बन्ध की प्रत्येक और तुच्छ से तुच्छ बात बतावेगा किन्तु अपने वास्तविक स्वयं, वास्तविक ईश्वरांश, वास्तविक आत्मा सम्बन्धी जो सो तथा हरेक बात हमें बताने वाले कितने थोड़े आदमी हैं। तुम कौन हो? यदि तुमने अपनी आत्मा ही खो दी तो सारे संसार की प्राप्ति से भी क्या लाभ? लोग सम्पूर्ण संसार के पाने की चेष्टा कर रहे हैं परन्तु वे जीवात्मा से, आत्मा से रहित हो रहे हैं। खो गया, खो गया, खो गया। क्या खो गया? घोड़ा या घोड़सवार? घोड़सवार खो गया है। शरीर घोड़े के सदृश है। और आत्मा, सच्चा स्वयं, जीवात्मा घोड़सवार के तुल्य है। घोड़ा तो है, घोड़सवार खो गया। हरेक मनुष्य घोड़े के विषय में हम से जो सो और सब कुछ कह सकता है, परन्तु हम सवार, घोड़सवार, घोड़े के मालिक के सम्बन्ध में कुछ जानना चाहते हैं। इस समय हमारा विचार यह जानने का है कि, सवार, घोड़सवार या आत्मा क्या वस्तु है। यह गम्भीर विषय है। यह वह विषय है जिसके सम्बन्ध में संसार के तत्ववेत्ता अपने दिमाग को छानते रहे हैं, जिस पर भरसक
प्रत्येक ने और सब ने प्रयत्न किया है। यह गहरा विषय है, और इस घंटे भर या कुछ कम ज़्यादा समय में इस विषय पर उचित विचार आप नहीं कर सकते। फिर भी एक कथा या उदाहरण के द्वारा हम इसे यथासम्भव सरल बनाने का उद्योग करेंगे। एक बार यह विषय 15 या 16 वर्ष के एक लड़के को समझाया गया था और थोड़े ही समय में उसने पूरी तरह से समझ लिया था। यदि वह 15 या 16 वर्ष का लड़का समझ गया था तो तुम सब और तुम में से हरेक भलीभांति विषय को समझ लेगा, यदि एकाग्र होकर सुनोगे, पूरा ध्यान दोगे। उस लड़के को समझाने में जिस ढंग से काम लिया गया था आज भी उसी का सहारा लिया जायगा। एक बार एक भारतीय राजा का पुत्र राम के पास पहाड़ पर आया, और यह प्रश्न किया, "स्वामीजी स्वामीजी ईश्वर क्या है?" "यह जटिल प्रश्न है, बड़ा कठिन सवाल है। सकल धर्म और अध्यात्म शास्त्र इसी एक विषय के अनुसन्धान में रत हैं और तुम ज़रा सी देर में इसे पूरी तरह जान लेना चाहते हो"। उसने कहा, "हां स्वामीजी, हां, महाराज। किससे मैं यह समझने जाऊं। मुझे यह समझा दीजिये"। लड़के से प्रश्न किया गया, "प्यारे राजकुमार, तुम जानना चाहते हो, ईश्वर क्या वस्तु है, तुम ईश्वर से परिचित होना चाहते हो। परन्तु क्या तुम यह नियम नहीं जानते कि किसी महापुरुष से जब कोई मनुष्य भेंट करने की इच्छा करता है तो पहिले उसे अपना परिचयपत्र (कार्ड) भेजना पड़ता है, अपना नामधाम प्रधान को भेजना पड़ता है? तुम ईश्वर से मिलना चाहते हो। उचित होगा कि अपना परिचय-पत्र ईश्वर को
भेजो, अपनी हुलिया ईश्वर को बतलाओ। अपना परिचय-पत्र उसे दो। मैं साक्षात् ईश्वर के हाथ में उसे रख दूँगा, और ईश्वर तुम्हारे पास आ जायगा, तथा ईश्वर क्या है, तुम देख लोगे"। लड़के ने कहा, "यह बहुत ठीक है, उचित बात है। मैं कौन हूं, आप को अभी जताता हूं। उत्तर भारत में हिमालय पर रहनेवाले अमुक राजा का मैं पुत्र हूं। यह मेरा नाम है"। एक पर्चे पर उसने ये नाम-धाम लिख दिया। राम ने पर्चा ले लिया और पढ़ा। यह तुरन्त ईश्वर के हाथ में न रखा। जाकर उसी राजकुमार को लौटा दिया गया। उससे कहा गया, "अरे राजकुमार, तुम नहीं जानते कि तुम कौन हो। तुम उस निरुत्तर, मूर्ख आदमी के समान हो, जो तुम्हारे पिता, राजा से मिलना चाहता है और अपना नाम तक नहीं लिख सकता। क्या तुम्हारा पिता, राजा, उससे मिलेगा? राजकुमार, तुम अपना नाम नहीं लिख सकते। ईश्वर तुम से कैसे मिलेगा? पहले हमें ठीक २ बताओ कि तुम कौन हो और तब ईश्वर तुम्हारे पास आवेगा और खुले चित्त से तुम से भेंट करेगा।" लड़के ने सोचा। वह विषय पर मनन करने लगा। उसने कहा, "स्वामी, स्वामी, अब मैं समझा, अब मैं समझा। मैंने अपना ही नाम लिखने में भूल की थी। मैंने केवल शरीर का पता आपको बताया, और कागज़ पर यह नहीं लिखा कि, मैं कौन हूं।" पास ही राजकुमार का एक अनुचर खड़ा हुआ था। अनुचर इसे नहीं समझ सका। अब राजकुमार से कहा गया कि, वे अपना अभिप्राय अनुचर को साफ़ २ बतावें, और कुमार ने इस अनुचर से यह प्रश्न किया:—"महाशय अमुकामुक,
यह परिचयपत्री (कार्ड) किसकी है?" उस मनुष्य ने कहा, "मेरी"। तब अनुचर के हाथ की छड़ी लेकर कुमार ने उससे पूछा, "ओ महाशय अमुकामुक, यह छड़ी किसकी है?" मनुष्य बोला, "मेरी"। "अच्छा, तुम्हारी यह पगड़ी किसकी है?" मनुष्य ने कहा, "मेरी"। कुमार ने कहा, "बहुत ठीक! यदि पगड़ी तुम्हारी है तो तुम्हारा और पगड़ी का एक सम्बन्ध है; पगड़ी तुम्हारा माल है, और तुम मालिक हो। तब तुम पगड़ी नहीं हो, पगड़ी तुम्हारी है"। उसने कहा, "बेशक, यह तो साफ ही है" "अच्छा, पेंसिल तुम्हारा माल है, पेंसिल तुम्हारी ही है, और तुम पेंसिल नहीं हो"। उसने कहा, "मैं पेंसिल नहीं हूँ, क्यों कि पेंसिल मेरी है, वह मेरी सम्पत्ति है, मैं स्वामी हूँ"। बहुत ठीक! तब कुमार ने उस अनुचर के कान हाथ से पकड़ कर अनुचर से पूछा, "ये कान किसके हैं?" और अनुचर ने कहा, "मेरे"। कुमार ने कहा, "बहुत ठीक। कान तुम्हारी वस्तु हैं, कान तुम्हारे हैं, परिणाम यह हुआ कि तुम कान नहीं हो। बहुत ठीक। नाक तुम्हारी है, नाक तुम्हारी है, इस लिये तुम नाक नहीं हो। इसी तरह, यह शरीर किसका है? (अनुचर के शरीर की ओर संकेत करते हुए)"। अनुचर ने कहा, "शरीर मेरा है, यह शरीर मेरा है"। "अनुचर जी, यदि देह तुम्हारी है तो तुम देह नहीं हो; तुम देह नहीं हो सकते, क्यों कि तुम कहते हो, कि देह तुम्हारी है। तुम देह नहीं हो सकते। मेरा शरीर, मेरे कान, मेरा शिर, मेरा हाथ यही बयान सिद्ध करता है कि तुम कोई दूसरी वस्तु हो और हाथ, कान, नेत्र इत्यादि के सहित शरीर कोई दूसरी ही वस्तु है। यह तुम्हारा माल है, तुम मालिक हो, तुम स्वामी हो, शरीर तुम्हारी पोशाक के तुल्य है, और तुम मालिक हो। शरीर तुम्हारे घोड़े के
समान है और तुम सवार हो। तो फिर तुम क्या हो?" अनुचर इतनी दूर तक समझ गया और कुमार के इस कथन से सहमत हुआ कि अपना पता बताने के अभिप्राय से जब उन्हों (कुमार) ने कागज़ पर अपने शरीर का पता लिख दिया था तब वे गलती पर थे। "तुम न शरीर हो, न कान हो, न नाक हो, न नेत्र हो, यह सब कुछ भी नहीं हो। तब फिर तुम क्या हो?" अब कुमार विचारने लगे, और बोले:— "ठीक, ठीक, मैं मन हूँ, मैं मन हूँ, मैं अवश्य मन हूँ"। अब उस कुमार से पूछा गया, "क्या वास्तव में ऐसा ही है"।
अब, क्या तुम मुझे बता सकते हो कि तुम्हारे शरीर में कितनी हड्डियां हैं? क्या बता सकते हो कि आज सबेरे तुमने जो भोजन किया था वह तुम्हारे शरीर में कहां पर रक्खा है? कुमार कोई उत्तर नहीं दे सका और उसके मुँह से ये शब्द निकल पड़े, "जी, मेरी बुद्धि वहां तक नहीं पहुँचती। मैं ने यह नहीं पढ़ा है। मैं ने शारीरिक या प्राणिविद्या नहीं पढ़ी है। मेरी बुद्धि इसे नहीं समझ सकती, मेरा मस्तिष्क इसकी धारणा नहीं कर सकता"।
अब कुमार से पूछा गया, "प्यारे कुमार, ऐ प्रिय बालक, तुम कहते हो मेरा मन इसे नहीं धारणा कर सकता, मेरी बुद्धि वहां तक नहीं पहुँचती, तुम्हारा मस्तिष्क इसे नहीं समझ सकता। ये बातें कह कर तुम सकारते या कबूलते हो कि मस्तिष्क तुम्हारा है, मन तुम्हारा है, बुद्धि तुम्हारी है। अच्छा, यदि बुद्धि तुम्हारी है तो तुम बुद्धि नहीं हो। यदि मन तुम्हारा है तो तुम मन नहीं हो। यदि दिमाग़ तुम्हारा है तो तुम दिमाग़ नहीं हो। तुम्हारे इन्हीं शब्दों से प्रगट होता है कि तुम बुद्धि के प्रभु हो, दिमाग़ के मालिक हो, और मन के
शासक हो। तुम मन, बुद्धि या दिमाग़ नहीं हो। तुम क्या हो? कृपा करके विचारो, विचारो। और सावधानी से हमें ठीक २ बताओ कि तुम क्या हो। तब ईश्वर ठीक तुम्हारे पास लाया जायगा, तुम ईश्वर को देखोगे, तुम सीधे ईश्वर के सामने पहुँचा दिये जाओगे। दया करके हमें बताओ कि तुम कौन हो"।
लड़का सोचने लगा, विचारता रहा, विचारता रहा परन्तु और आगे न जा सका। उसने कहा, "मेरा मन, मेरी बुद्धि और आगे नहीं जा सकती"।
ओः, ये शब्द कैसे सच्चे हैं। सचमुच मन या बुद्धि अन्तरस्थ सच्चे ईश्वर या देवत्व तक नहीं पहुँच सकती। सच्ची आत्मा, सच्चा ईश्वर शब्दों और मनों के परे है।
लड़के से कहा गया कि अब तक तुम्हारी बुद्धि जहां तक पहुँची है कुछ देर बैठ कर उस पर विचार करो। "मैं शरीर नहीं हूँ। मैं मन नहीं हूँ।" यदि ऐसा है तो इसे समझो, इसे अमल में लाओ, बोध की भाषा में, कार्य की भाषा में इसकी आवृत्तियां करो; अनुभव करो कि तुम शरीर नहीं हो। यदि इस विचार के अनुकूल अपना जीवन बनाओ, यदि सत्य के इतने ही अंश को व्यवहार में लाओ, यदि तुम शरीर और मन से ऊपर उठ जाओ तो सब चिन्ता और भय से तुम छूट जाते हो। शरीर और मन की कोटि से अपने को ऊँचा करते ही तुम्हें भय छोड़ देता है। समस्त चिन्ता दूर हो जाती है, सब रंज भाग जाता है, जब तुम सत्य के इतने ही अंश का अनुभव करते हो कि तुम शरीर और मन से परे कोई वस्तु हो।
इसके बाद बालक को यह जानने में कुछ सहायता दी
गई कि वह स्वयं क्या है, और उससे पूछा गया, "भाई राजकुमार, आज तुमने क्या किया है? क्या कृपापूर्वक हमें बताओगे कि आज सबेरे आपने कौन २ से काम किये हैं?"
वह वर्णन करने लगा, "मैं प्रातःकाल जागा, स्नान किया, और फलाना २ काम किया, भोजन किया, बहुत कुछ पढ़ा, कुछ चिट्ठियां लिखीं, कुछ मित्रों से मिलने गया, कुछ मित्रों से अपने घर पर भेंट की, और यहां स्वामी जी को दण्डवत करने आया"।
अब कुमार से प्रश्न किया गया, "बस, यही? क्या तुमने और बहुत कुछ काम नहीं किया? केवल इतना ही? ज़रा सोचो"। उसने विचार किया, और विचार किया, तब इसी तरह के कुछ और काम बताये। "इतना ही सब कुछ नहीं है। तुमने और हज़ारों काम किये हैं। तुमने सैकड़ों, हज़ारों, बल्कि लाखों और काम किये हैं। अगणित काम तुमने किये हैं, और उन्हें बताना तुम अस्वीकार करते हो। यह योग्य नहीं है। कृपया हमें बता दो तुमने जो कुछ किया हो। आज सबेरे तुमने जो कुछ किया हो हमें सब बता दो"।
ऐसी अद्भुत बात सुनकर कि, बताये हुए कामों के सिवाय और भी हज़ारों काम उसने किये हैं, कुमार चकित हुआ। "महोदय, मैंने आप से जो कुछ बताया है उसके सिवाय कुछ नहीं किया, उसके सिवाय कुछ नहीं किया"। "नहीं, तुमने करोड़ों, अरबों, संखों बातें और की हैं"। सो कैसे?
लड़के से पूछा गया, "स्वामी जी की ओर इस समय कौन देख रहा है?" उसने कहा, "मैं" "तुम यह चेहरा, यह नदी गंगा, जो हम लोगों के निकट बह रही है, देख रहे हो?"
उसने कहा, हां, बेशक"। "अच्छा, तुम नदी देखते हो और स्वामी जी का मुखमंडल देखते हो, किन्तु नेत्रों की छः नसों को कौन चला रहा है? तुम जानते हो कि, जब हम देखते हैं, आंखों की छः नसें डोलती हैं। यह किसी दूसरे का काम नहीं हो सकता, यह कोई अतिरिक्त वस्तु नहीं हो सकती। देखने के कार्य में, अवश्य, स्वयं ही आंखों की नसों को डोलाता होगा"।
लड़के ने कहा, "ओः, अवश्य यह हमारा ही काम हो सकता है, कोई दूसरी वस्तु नहीं हो सकती"।
"अच्छा, इस समय देख कौन रहा है, इस व्याख्या को कौन सुन रहा है"? लड़के ने कहा, "मैं, मैं"। "अच्छा, यदि तुम देख रहे हो, यदि तुम यह उपदेश सुन रहे हो, तो वक्तृत्व-शक्तिवाली नसों को फड़का कौन रहा है? तुम्हीं, तुम्हीं होंगे। दूसरा कोई नहीं। आज सबेरे भोजन किसने किया था"? लड़के ने कहा, "मैंने, मैंने"। "अच्छा, यदि तुमने आज सबेरे भोजन किया था, और तुम्हीं टट्टी जाकर उसे निकाल दोगे तो टट्टी जाकर भोजन को पचाता और एकरस कौन करता है? वह कौन है, कृपया बताइये, हमें बताइये? यदि तुमने भोजन खाया था और निकाल दिया था, तो उसे पचाने और एकरस करने वाले भी तुम्हीं हो सकते हो, दूसरा कोई नहीं हो सकता। वे दिन गये जब किसी प्राकृतिक चमत्कार की व्याख्या के लिये बाहरी कारणों की खोज की जाती थी। यदि कोई मनुष्य गिर जाता था, उसके गिरने का कारण कोई बाहरी प्रेत बताया जाता था। विज्ञान शंका के ऐसे समाधानों को नहीं मानता। विज्ञान और तत्त्वशास्त्र आप से कहते हैं कि घटना का कारण स्वयं घटना में ही ढूंढो"।
"तुम भोजन करते हो, टट्टी जाते हो और उसे निकाल बाहर करते हो। जब वह पच जाता है, तो तुम्हीं उसे पचाने वाले हो, कोई बाहरी शक्ति आकर उसे नहीं पचाती, वह स्वयं तुम्हीं हो। पाचन का कारण भी तुम्हारे ही भीतर खोजना होगा, न कि तुम से बाहर"।
अच्छा, लड़के ने यहां तक स्वीकार किया। अब उससे प्रश्न हुआ, "प्यारे कुमार, ज़रा सोचो, थोड़ी देर के लिये विचार करो। सैकड़ों गतियां पाचन क्रिया के अन्दर आ जाती हैं। पाचन क्रिया में, चबाने में, मुख में चबाओ से लार निकलती है। दूसरे स्थान में दूसरी क्रिया तचाने की हो रही है। वहां नाड़ियों में रक्त-संचरण हो रहा है। वहां वही भोजन लोहू की नसों, हड्डियों, और बालों में बदला जा रहा है। यहां शरीर में वृद्धि की क्रिया हो रही है। ये होने वाली बहुत सी क्रियायें हैं, और शरीर के भीतर की इन सब क्रियाओं का पाचन और एकरसता की क्रिया से सम्बन्ध है।
यदि तुम भोजन करते हो, तो सांस लेने का कारण भी तुम्हीं हो, तुम्हीं अपनी नाड़ियों में रक्त के संचारक हो। तुम्हीं शरीर की वृद्धि करते हो। और अब ध्यान दो कि, कितने कार्य, कितनी क्रियायें तुम हर क्षण करते रहते हो"।
लड़का सोचने लगा और बोला, "वस्तुतः, महाराजजी, मेरे शरीर में, इस शरीर में हज़ारों क्रियायें हो रही हैं, जिनको बुद्धि नहीं जानती, मन जिनसे बेखबर है, और फिर भी वे हो रही हैं। और इन सब का कारण अवश्य मैं ही हो सकता हूं। इन सब का कर्ता मैं ही हूं और निस्सन्देह मेरा यह कहना ग़लत था कि मैंने कुछ काम किये हैं, केवल वही कुछ काम, जो मेरी बुद्धि के द्वारा हुए थे, और कोई
काम नहीं।
इसे और भी साफ कर देना चाहिये। तुम्हारे इस शरीर में दो प्रकार के काम हो रहे हैं। दो तरह के कार्य हो रहे हैं, एक अपनी इच्छा से, और दूसरे अनिच्छा से। स्वेच्छा से किये हुए काम वे हैं जो बुद्धि और मन के द्वारा होते हैं। उदाहरण के लिये, लिखना, पढ़ना, चलना, बातचीत करना, और पीना, ये कार्य बुद्धि और मन के द्वारा किये हुए हैं। इसके सिवाय, हज़ारों क्रियायें और कार्य, कह सकते हैं, सीधे २ भुगत रहे हैं। जिनमें मन या बुद्धि की आढ़त या माध्यम की आवश्यकता नहीं। उदाहरण के लिये, सांस लेना, नाड़ियों में रक्त का सञ्चारण, बालों का बढ़ना, इत्यादि।
लोग यह भूल, स्पष्ट भूल करते हैं कि, केवल उन्हीं कामों को अपने किये हुए मानते हैं, जो मन या बुद्धि की आढ़त के द्वारा होते हैं। अन्य सब करतूतें और कार्य, जो बुद्धि या मन की आढ़त के बिना सीधे २ हो रहे हैं, बिलकुल अस्वीकार किये जाते हैं। वे पूरी तरह से फेंक दिये जाते हैं, उनकी पूरी उपेक्षा की जाती है; और इस भूल तथा उपेक्षा से, सच्चे आप को इस तरह क़ैद करने से, अनन्त को छोटा सा दिमाग़ मान लेने से लोग अपने को दुखिया अभागा बना रहे हैं। वे कहते हैं, "ओः, ईश्वर हमारे भीतर है।" बहुत अच्छा, स्वर्ग का साम्राज्य तुम्हारे भीतर है, ईश्वर तुम्हारे भीतर है, किन्तु वह गूदा (सार पदार्थ), जो तुम्हारे भीतर है, वह गूदा तुम स्वयं हो, न कि ऊपर का खोल। दया करके इसपर गम्भीरता से विचार कीजिये। मनन करो कि, तुम गूदा हो या छिलका, भला तुम वह हो, जो भीतर है, या तुम बाहरी छिलका हो।
कुछ लोग कहते हैं, "अजी महाशय, मैं खाता हूं और प्रकृति पचाती है; अजी महाशय, मैं देखता हूं किन्तु प्रकृति नसों को चलाती है; अजी महाशय, मैं सुनता हूं किन्तु नसों को प्रकृति लहराती है।" विचार, न्याय, सत्यता, स्वाधीनता के नाम में ज़रा विचारिये तो कि, आप वह प्रकृति हैं या केवल शरीर हैं? समझ रखिये, आप वह प्रकृति हैं। आप अनन्त ईश्वर हैं। यदि पूर्व-निश्चयों को हटाकर, सब पूर्व-धारणाओं को दूर कर, और अन्धे विश्वासों को त्याग कर आप इस बात पर मनन करें, इसका पता लगावें, इसकी परीक्षा करें, इसको छानें तो आप का भी वही विचार हो जायगा, जो प्रकृति के उस रूप का है, जिसे आप राम कहते हैं। आप देखेंगे कि, आप गूदा हैं, प्रकृति हैं, आप पूर्ण प्रकृति हैं।
आपमें से बहुतों ने इस तर्क का अभिप्राय समझ लिया होगा। किन्तु वह लड़का, भारतीय राजकुमार इसे भली भांति नहीं समझा। उसने कहा, "भला यहां तक तो मैं समझ गया कि मैं बुद्धि से परे कोई वस्तु हूं।" इसी समय कुमार के अनुचर ने प्रश्न किया, "महोदय, मुझे ज़रा अच्छी तरह समझा दीजिये, मैं अभी नहीं समझा हूं।" तब उस अनुचर से पूछा गया, "महाशय अमुक और अमुक, जब तुम सो जाते हो तब जीते रहते हो या मर जाते हो?" उसने उत्तर दिया, "जीता रहता हूं, मैं मर नहीं जाता।" "और बुद्धि का क्या हाल होता है?" उसने कहा, "मैं स्वप्न देखता रहता हूं, बुद्धि तब भी बनी रहती है।" "जब तुम गहरी नींद में सोते हो, (आप जानते हैं कि एक दशा गहरी नींद की दशा कहलाती है। उस दशा में स्वप्न भी नहीं दिखाई पड़ते), तब बुद्धि
कहां रहती है, मन कहां होता है?"
वह सोचने लगा। "वह शून्यता में चली जाती है। वह वहां नहीं है, बुद्धि वहां नहीं है, मन वहां नहीं है, किन्तु तुम वहां हो या नहीं?" उसने कहा, "ओः, मैं अवश्य वहां ही हूंगा, मैं मर नहीं सकता, मैं वहीं रहता हूं।" "अच्छा, अब ध्यान दो। गहरी नींद की दशा में भी जब बुद्धि नहीं रह जाती है, जहां बुद्धि मानो खूँटी या बांस पर टांगे हुए वस्त्र की तरह हो जाती है, बुद्धि उतार कर अरगनी पर टांगे हुए अंगरखे के समान है। तुम अब भी वहां हो, तुम मर नहीं जाते।" लड़के ने कहा, "बुद्धि वहां नहीं रहती, और मैं मर नहीं जाता, यह मेरी समझ में अच्छी तरह नहीं आता।"
तब लड़के से पूछा गया, "यह गहरी नींद लेकर जब तुम जागते हो, जब तुम जागते हो, तब क्या ऐसी बातें नहीं कहते? 'आज रात को मुझे खूब नींद आई, आज मैंने स्वप्न नहीं देखे।' क्या ऐसी उक्तियां तुम्हारी नहीं होतीं?" उसने कहा, "होती हैं"। भला, यह बात बड़ी सूक्ष्म है। तुम सब को ध्यान से सुनना होगा। गहरी नींद से जागने पर जब यह बात कही जाती है, 'मुझे ऐसी गहरी नींद आई कि मैंने स्वप्न नहीं देखे, मैंने नदियां, पहाड़ नहीं देखे, उस अवस्था में न कोई पिता था, न माता थी, न घर था, न कुटुम्ब, ऐसी कोई वस्तु नहीं थी। सब वस्तुयें मुर्दा और लुप्त थीं। वहां कुछ नहीं, कुछ नहीं। कुछ वहां नहीं था।' यह बयान उस आदमी का सा बयान है जिसने एक जगह का उजड़पन देखा और कहा था, "रात की शून्यता में अमुक २ स्थान पर एक भी मनुष्य नहीं मौजूद था"। उस मनुष्य से यह बयान
लिखने को कहा गया था। उसने इसे कागज़ पर लिखा। विचारक ने उससे पूछा, "अच्छा, क्या यह बयान सत्य है?" उसने कहा, "जी हां"। "अच्छा, यह बयान तुम सुने हाल के अनुसार कर रहे हो, या अपने निजी ज्ञान के आधार पर। क्या तुम स्वयंदर्शी गवाह हो?" "जी महाशय, मैं स्वयंदर्शी गवाह हूं। सुना हाल इसका आधार नहीं है"। "तुम इसके स्वयंदर्शी गवाह हो कि कागज़ पर कथित स्थान में कथित समय पर कोई भी मनुष्य उपस्थित नहीं था?" उसने कहा "हां"। "तुम क्या हो? तुम मनुष्य हो या नहीं?" उसने कहा "हां, मैं एक मनुष्य हूं"। "तो फिर तुम्हारे अनुसार यदि यह बयान सच है तो हमारे अनुसार यह असत्य है। तुम वहां मौजूद थे और तुम भी एक मनुष्य हो, इस लिये यह बयान अत्यन्तशः सत्य नहीं हो सकता कि वहां एक भी मनुष्य मौजूद नहीं था। तुम वहां मौजूद थे। तुम्हारे अनुसार यह बयान सत्य होने के लिये हमारे अनुसार इसे असत्य होना पड़ेगा, क्योंकि वहां कोई भी चीज़ न होने के लिये वहां कोई चीज़ होनी ही चाहिये, अन्ततः स्वयं तुमको स्थल पर होना ही चाहिये"।
इसी तरह गहरी नींद लेने के बाद जब तुम जागे तुमने यह बात कही, "मैंने स्वप्न में कोई चीज़ नहीं देखी"। अच्छा, हम कह सकते हैं कि तुम तो मौजूद रहे ही होगे। वहां कोई पिता, माता, पति, स्त्री, घर, नदी, परिवार नहीं उपस्थित था, परन्तु तुम तो उपस्थित ही होगे। तुम जो गवाही दे रहे हो वही, तुम्हारी ही गवाही सिद्ध कर रही है कि तुम सोये नहीं, तुम्हें निद्रा नहीं आई। यदि तुम्हें नींद आई होती तो हम से वहां की शून्यता की बात कौन बताता?
तुम बुद्धि से परे कोई वस्तु हो। बुद्धि सोई हुई थी, दिमाग़ एक प्रकार से आराम में था, किन्तु तुम निद्रित नहीं थे। यदि तुम सोते होते तो रक्त-नाड़ियों में रक्त का सञ्चारण कौन करता, पेट में पाचन-क्रिया कौन जारी रखता? तुम्हारे शरीर की बाढ़ को कौन जारी रखता, यदि तुम वास्तव में गहरी नींद की दशा को प्राप्त हुए होते? इस प्रकार तुम ऐसी कोई वस्तु हो जो कभी नहीं सोती। बुद्धि सोती है, परन्तु तुम नहीं। मैं शरीर, बुद्धि, और मन से परे कोई वस्तु हूं"।
अब लड़के ने कहा, "महोदय, महोदय, मैं यहां तक समझ गया और जान गया कि, मैं दैवी शक्ति हूं, मैं अनन्त शक्ति हूं, जो कभी नहीं सोती, कभी नहीं बदलती। मेरी जवानी में शरीर की दूसरी दशा थी, मेरे बचपन में बुद्धि वैसी ही नहीं थी जैसी अब है, शरीर वैसा ही नहीं था जैसा अब है। मेरे बचपन में मेरी बुद्धि, शरीर और मन अपनी आज की दशा से निपट भिन्न हालत में थे। डाक्टर लोग हमें बतलाते हैं कि सात वर्ष के बाद सम्पूर्ण रक्त बिलकुल ही बदल जाता है। प्रत्येक क्षण शरीर बदल रहा है, प्रति पल मन बदल रहा है, और बचपन में आप के जो मानसिक विचार थे, जो मानसिक भावनायें थीं, वे अब कहां हैं? बालकपन के दिनों में आप चन्द्र को देवदूतों के खाने के लिये सुन्दर कचौरी समझते थे, चन्द्रमा शीश का सुन्दर टुकड़ा था, तारे हीरों के समान बड़े थे। ये विचार कहां चले गये? तुम्हारा मन, तुम्हारी बुद्धि बिलकुल ही बदल गई है, उनमें सोलहों आनो परिवर्तन हो गया है। किन्तु तुम अब भी कहते हो, "जब मैं बच्चा था, जब मैं लड़का था, जब मैं
सत्तर वर्ष का हो जाऊंगा"। तुम अब भी ऐसी बातें कहते हो, जिनसे प्रगट होता है कि तुम कोई ऐसी चीज़ हो, जो बचपन में वही थी, जो बालकपन में वही थी, जो सत्तर वर्ष की अवस्था में भी वही रहेगा। जब तुम कहते हो, "मैं सो गया, मुझे गहरी नींद आ गई, इत्यादि," जब तुम ऐसी बातें कहते हो, तब प्रगट होता है कि सत्य "मैं" तुम में है, वास्तविक आत्मा तुम में है, जो स्वप्नदेश में वही रहता है, जो जागृत दशा में वही रहता है। तुम्हारे भीतर ऐसी कोई वस्तु है, जो तुम्हारी मूर्च्छावस्था में भी वही रहती है, जो उस समय भी वही रहती है जब तुम नहाते हो, जब तुम लिखते हो। कृपा करके ज़रा सोचिये, विचारिये, ध्यान में लाइये। क्या तुम ऐसी कोई वस्तु नहीं हो जो सब परिस्थितियों में वही रहती है, जिसकी दशा निर्विकार है, जो आज, कल्ह और सर्वदा एकरस है? यदि ऐसी है तो थोड़ा और विचार कीजिये, और तुरन्त तुम्हारा ईश्वर का सामना करा दिया जायगा। आप जानते हैं कि आप को वचन दिया गया था, अपने को जानो, अपना ठीक पता कागज़ पर लिख दो, और तुरन्त ईश्वर से तुम्हारी भेंट करा दी जायगी।
अब लड़के को, राजकुमार को यही आशा थी, क्योंकि वह अपने को जान गया था, उसे पता लग गया था कि, वह कोई निर्विकार वस्तु है, कोई चीज़ निरन्तर है, कोई ऐसी वस्तु है जो कभी नहीं सोती। अब उसने ईश्वर को जानना चाहा। कुमार से कहा गया, "भाई, लखो, यहां पर ये पेड़ बढ़ रहे हैं। इस पेड़ को जो शक्ति बढ़ा रही है क्या वह उससे भिन्न है जो उस वृक्ष को बढ़ा रहा है?" उसने कहा, "नहीं, नहीं, निश्चय एक ही शक्ति है"। "अच्छा जो
शक्ति इन सब पेड़ों को बढ़ा रही है वह क्या उस शक्ति से भिन्न है जो पशुओं के शरीरों को बढ़ाती है?" उसने कहा, "नहीं, नहीं, भिन्नता नहीं हो सकती, एक ही शक्ति है"। "अब, क्या वह बल, वह शक्ति जो तारों को चला रही है उस शक्ति से भिन्न है जो नदियों को बहा रही है?" उसने कहा, "उसमें भिन्नता नहीं हो सकती, एक ही शक्ति होना चाहिये"। अच्छा, जो शक्ति इन वृक्षों को बढ़ा रही है उस शक्ति से भिन्न नहीं हो सकती जो तुम्हारे शरीर या केशों को बढ़ाती है। प्रकृति की वही सर्वव्यापी शक्ति, जो तारों को चमकाती है, तुम्हारी आंखों को चमकाती या झपकाती है, वही शक्ति, जो उस शरीर के बालों का कारण है, जिसे तुम मेरा कहते हो, वही शक्ति प्रत्येक और सब की नाड़ियों में रक्त दौड़ाती है। सचमुच, तब तुम और क्या हो? क्या तुम वही शक्ति नहीं हो, जो तुम्हारे बालों को बढ़ाती है, जो तुम्हारे रक्त को तुम्हारी नाड़ियों में बहाती है, जो तुम्हारे भोजन को पचाती है? क्या तुम वह शक्ति नहीं हो? सचमुच तुम वही शक्ति हो, जो बुद्धि और मन के परे है। यदि ऐसा है तो तुम वही शक्ति हो, जो सम्पूर्ण विश्व की शक्ति का शासन कर रही है। वही अक्षेय, वही तेज, शक्ति, तत्व, जो जी चाहे कहलो, वही दैवी शक्ति, वही सम्पूर्ण, जो सर्वत्र विद्यमान है, वही, वही तुम हो।
बालक चकित होकर बोला, "वास्तव में, वास्तव में मैंने ईश्वर को जानना चाहा था। मैंने सवाल किया था कि, ईश्वर क्या है, और मुझे पता लगता है कि मैं आप स्वयं, मेरी सच्ची आत्मा ईश्वर हूं। मैं क्या पूछ रहा था, मैंने क्या पूछा था, कैसा बेहूदा प्रश्न मैंने किया था। मुझे अपने ही
को जानना था, ईश्वर को जानने के लिए मुझे अपने ही को जानना था। इस तरह ईश्वर तो ज्ञात ही था"।
इस सत्य का अनुभव करने के मार्ग में एक यही कठिनाई है कि, लोग बच्चों का स्वांग (अभिनय) करते हैं। आप जानते हैं, बच्चे कभी २ किसी विशेष प्रकार की थाली पर मुग्ध हो जाते हैं, और तब तक कोई पदार्थ भोजन करना नहीं चाहते हैं जब तक उनकी प्रिय थालियों में वह चीज़ नहीं परोसी जाती। वे कहेंगे, "मैं अपनी थाली में खाऊंगा, मैं अपनी रकाबी में खाऊंगा, दूसरी किसी थाली में मैं कोई वस्तु न ग्रहण करूंगा"। ऐ बच्चो! देखो, केवल यहां कोई विशेष रकाबी तुम्हारी नहीं है, घर की सब तश्तरियां तुम्हारी ही हैं, सब सोनहली थालियां तुम्हारी हैं। यह एक भ्रम है। यदि इस संसार में लोग अपने को जानें तो वे सच्चे आपको सर्वशक्तिमान ईश्वर, अनन्त शक्ति पावेंगे। किन्तु वे तो इस विशेष थाली, इस शिर, दिमाग़ पर लट्टू हो गये हैं। मस्तिष्क के द्वारा जो कुछ होता है केवल वही मेरी करनी है। मन और बुद्धि के द्वारा जो कुछ होता है वह तो मेरा है और शेष सब में नहीं अपना सकता, बाकी सब मैं अस्वीकार करता हूं। मैं केवल वही ग्रहण करूंगा, जो इस विशेष थाली में मुझे परसा जायगा। यही स्वार्थपरता है। वे सब कुछ इसी थाली के द्वारा कराना चाहते हैं। और इस थाली की कीर्ति के लिए वे हरेक चीज़ इसी छोटी सी थाली के, जिसे वे मुख्यतः अपने को बताते हैं, जिससे उन्होंने अपनी एकता मान ली है, आस पास जमा करना चाहते हैं। सम्पूर्ण स्वार्थपरता, समस्त चिन्ता और विपत्ति का यही कारण है। इस मिथ्या विचार से पीछा छुटाओ, अपने सच्चे आपको सर्व अनुभव
करो, इस स्वार्थमय अहम्-भाव से ऊपर उठो, इसी समय तुम आनन्द पाओगे, सम्पूर्ण विश्व से तुम्हारी एकता हो जायगी। यह उसी ढंग की भूल है जैसी राजकुमार ने की थी। कुमार से फँसानेवाला सवाल किया गया था, तुम्हारा स्थान कहां है? और उसने राजधानी बताई थी। "वहां मेरा स्थान है"। ऐ लड़के, राज्य की राजधानी ही तेरा एक मात्र स्थान नहीं है। सम्पूर्ण राज्य, समग्र देश तुम्हारा है। तुम उस प्रधान नगर में, राज्य की राजधानी में रहते हो, किन्तु वह राजधानी ही तुम्हारा एक मात्र स्थान नहीं है, समग्र राज्य तुम्हारा है। यह सुन्दर भूभाग, ये सुहावने स्थल, यह महान् (हिमालय का) पहाड़ी दृश्य तुम्हारे ही हैं, न कि केवल वह विशेष छोटा नगर।
लोगों से यही भूल होती है। यही बुद्धि या दिमाग़ तुम्हारे वास्तविक स्वयं, आत्मा का मुख्य नगर अथवा राजधानी कहा जा सकता है। किन्तु तुम्हें कोई अधिकार नहीं है कि इस पर तो अपना स्वत्व घोषित करो और अन्य सब वस्तुओं को अस्वीकार करो। मस्तिष्क रूपी यह छोटी सी राजधानी, मन या बुद्धि की यह राजधानी मात्र ही तुम्हारी नहीं है। विशाल संसार, सम्पूर्ण विश्व तुम्हारा है। सूर्य, तारे, चन्द्रमा, भूमि, ग्रह, आकाश-गंगा, ये सब तुम्हारे हैं। इसका अनुभव करो। अपना जन्म-अधिकार फिर प्राप्त करो, सब चिन्ता, सब विपत्ति दूर हो जायगी।
लोग स्वाधीनता की चर्चा करते हैं। लोग मुक्ति की चर्चा करते हैं। यदि तुम स्वाधीन होना चाहते हो, यदि तुम मुक्ति पाना चाहते हो तो तुम्हें जानना चाहिये कि बन्धन का कारण क्या है। यह ठीक कहानी के बन्दर की सी बात है।
भारत में बन्दर बड़े विलक्षण ढंग से पकड़ा जाता है। एक सँकरे मुँह का भांड़ ज़मीन में रख दिया जाता है और उसमें कुछ फल या बीज और बन्दरों को रुचिकर अन्य खाद्य पदार्थ रख दिये जाते हैं। बन्दर आते हैं और भांड़ में अपने हाथ डालकर उनको फलों से भर लेते हैं। इससे मुट्ठी मोटी हो जाती है और फिर निकाले नहीं निकलती। इस तरह बन्दर पकड़ा जाता है, वह निकल नहीं सकता। अद्भुत रीति से, विचित्र उपाय से बन्दर पकड़ा जाता है। हम पूछते हैं, तुम्हें पहले कौन बांधता है। तुमने स्वयं अपने को दासता और बन्धन के अधीन किया है। यह समग्र विस्तृत संसार है, विशाल सुन्दर वन है, (और सम्पूर्ण विश्व के इस महान सुन्दर बन में एक सँकरे गले का बर्तन मिलता है। संकीर्ण गले का यह भांड़ क्या चीज़ है? यह तुम्हारा मस्तिष्क है। यह छोटा दिमाग़ ही सँकरे मुँह का बर्तन है। इसमें कुछ फल हैं और लोगों ने इन फलों को पकड़ लिया है। दिमाग़ की आदत या इस बुद्धि के माध्यम द्वारा किया हुआ सब कुछ मनुष्य अपना मान लेता है। हरेक कहता है, "मैं मन हूं" हरेक मनुष्य ने कार्यतः अपने को मन मान लिया है। "मैं मन हूं, मैं बुद्धि हूं"। और सँकरे मुख के बर्तनों के इन फलों को वह पोढ़े पकड़ता है। यही तुमको गुलाम बनाता है। यही तुमको चिन्ता, भय, प्रलोभनों, और सब तरह के क्लेशों का दास बनाता है। यही तुमको बांधता है। इस संसार में सब दुःखों का कारण यही है। यदि तुम मुक्ति चाहते हो, यदि तुम स्वाधीनता चाहते हो, तो अपने हाथ खाली करलो, पकड़ छोड़ दो। सारा जंगल तुम्हारा है, तुम हरेक वृक्ष पर फांदते फिर सकते हो और जंगल की सब गिरी, जंगल के सब फल, सब अखरोट खा सकते हो, सब तुम्हारे हैं। सम्पूर्ण संसार
तुम्हारा है। इस स्वार्थपूर्ण अज्ञानता को छोड़ भर दो, और तुम स्वतंत्र हो, अपने त्राता आप ही हो।
"जहां प्रचुरता है वहां दुर्भिच्च डालते हो, (क्या यह न्याय है? नहीं, यह न्याय नहीं है, यह उचित नहीं है।) जहां प्रचुरता है वहां दुर्भिच्च डालते हो, यही (स्वार्थपूर्ण अज्ञान) तेरा शत्रु है, तेरे मधुर आत्मा के प्रति इतना निष्ठुर है, ऐसा न होना चाहिये, ऐसा न करना चाहिये, तेरी अपनी ही कली के भीतर तुपकर तू संतुष्ट रहता है। तू गँवाता है, और वह भी कंजूसी से। कंजूस मत बन, लोभी मत बन" (यह सब मालमता दे देना और इस छोटी सी बुद्धि की कुछ चीज़ों तक तेरे को परिमित करना कंजूसी है।)
यदि सर्व से अपनी एकता का तुम अनुभव करो तो तुम देखोगे कि, तुम्हारा यह मस्तिष्क अनन्त शक्तिशाली हो जायगा। यह वह बात है जो तुम्हारा सारे संसार से पूर्ण एक स्वर कर देगी।
"ओः, अब हम नहीं ठहर सकते, ऐ आत्मा, हम भी जहाज़ पर सवार होते हैं, (यहां आत्मा शब्द का अर्थ बुद्धि है)
तू अपने अंक में मुझको भरती हुई, मैं अपने में तुझको, ऐ आत्मा! निर्भीकता से अज्ञात तटों के लिये खेने को, प्रचण्ड वायु के बीच, हर्षोन्माद की लहरों पर, निश्चिन्तता से अलापते हुए, ईश्वर का अपना गीत गाते हुए, सुखमय अन्वेषण की तानें मारते हुए, सहित हँसी और अनेक चुम्बनों के, सहर्ष हम भी पंथहीन समुद्र में डेंगी हैं।
(दूसरों को क्षमा-प्रार्थना करने दो, दूसरों को पाप अनुताप और अपकर्ष के लिये रोने दो)
ऐ आत्मा, तू मुझको आनन्द देती है, मैं तुझको। ऐ आत्मा, हम भी ईश्वर में विश्वास रखते हैं, और किसी धर्माचार्य से भी अधिक, किन्तु ईश्वर के रहस्य से खेलने का हमें साहस नहीं, ऐ आत्मा, तू मुझको आनन्द देती है, मैं तुझको।
इन समुद्रों में खेते हुए, या पहाड़ों पर, या रात में जागते हुए, जल की तरह बहते हुए विचार, काल और दिशा और मृत्यु के मौन विचार, वास्तव में मानो मुझे अनन्त प्रदेशों में हुए ले जाते हैं।
ऐ भगवन, तू, जिसकी पवन में श्वास लेता हूँ, जिसकी सनसनाहट सुनता हूँ, तेरी पंक्ति में विचरने को, तेरी और चढ़ते हुए मुझे और मेरी आत्मा के सर्वांग का मार्जन करदे, मुझे अपने से निमज्जित करदे।
हे भगवन! तू सर्वोच्च, बेनाम, श्वास और रग, प्रकाश का प्रकाश, विश्वों का सृष्टिकर्ता और उनका केन्द्र, सत्यपरायण, नेक और स्नेही का महान केन्द्र, नैतिकता और आध्यात्मिकता का स्रोत-प्रेम का मूल और भण्डार है।
ऐ मेरी चिन्ताग्रस्त आत्मा—ऐ बेबुझी प्यास क्या, वहां नहीं राह देख रहा है? क्या वहां कहीं पर पक्का साथी सहर्ष हम लोगों की राह नहीं देख रहा है?
तू गाड़ी है (विश्व ब्रह्माण्ड की) तू (उन) सूर्यों, नक्षत्रों, मण्डलों का प्रेरक (है), जो, चक्कर काटते हुए, क्रमपूर्वक, सुरक्षित, तालमेल में, दिशा के निराकार अनन्त विस्तारों को पार करते हैं।
यदि अपने से बाहर उन श्रेष्ठ विश्वों के लिये मैं नहीं चढ़ खड़ा हो सकता, तो कैसे मैं विचार कर सकता हूँ, एक
भी सांस कैसे ले सकता हूँ, कैसे बोल सकता हूं? ईश्वर का ध्यान होते ही, प्रकृति और उसके चमत्कारों पर, काल और दिशा तथा मृत्यु पर, मैं तेज़ी से सिकुड़ता हूँ, पर वही मैं, (जब) फिर कर तुझे पुकारता हूँ, ऐ आत्मा, जो वास्तविक मैं हूँ।
तब देखो, तू सहज ही में ग्रहमण्डलों की मालिक बन जाती है, तू समय की संगिनी बन जाती है, संतोष से मृत्यु पर मुसक्याती है, और भरती है, ऊपर तक लबालब भर देती है दिशा के अनन्त विस्तारों को।
नक्षत्रों या सूर्यों से अधिक कूदती हुई, ऐ आत्मा, तू आगे यात्रा करती है। मेरे और तेरे प्रेम से अधिक दूसरा कौन प्रेम, विशेष विस्तार (से वर्णन) कर सकता है? आदर्श के कौन से स्वप्न, शुद्धि, सिद्धि, और शक्ति की कौन सी तदबीरें, दूसरों के लिये सहर्ष सर्वस्व त्याग की, और दूसरों के लिये सब कुछ सहने की कौन सी आकांक्षायें, कौन सी इच्छायें, ऐ आत्मा, तेरी और हमारियों से बढ़ी चढ़ी हैं?
आगे की गणना करते २, जब समय आया, सब समुद्र पार कर लिये गये, अन्तरीपों की सब दिक्कतें मिल गईं, यात्रा हो गई, जब ए आत्मा, (चारों ओर से ईश्वर से) घिरी हुई, तू सामना करती है, ईश्वर के सम्मुख होती है, तब प्राप्त लक्ष्य वैसे ही अर्पण करती है, जैसे सौहार्द और प्रेम से परिपूर्ण बड़े भाई के मिल जाने पर छोटा भाई उसकी स्नेहमयी गोद में पिघल जाता है।
(परम प्रिय) भारत की अपेक्षा भी अधिक [दूर] का मार्ग। क्या तेरे पंख सचमुच ऐसी लम्बी उड़ानो के योग्य है? ऐ आत्मा, ऐसी यात्रायें भी क्या सचमुच तू करती है?
ऐसे जलों पर भी तू विहार करती है? क्या तू सस्कृत और वेदों के नीचे से ध्वनि उठाती है? तो ले, अपने बन्धन का पट्टा खारिज करवा ले। तेरे लिये मार्ग है, तट तेरे हैं, ऐ पुरानी भयंकर पहेलियों! (तुम्हें बूझने के लिए अब रास्ता साफ है) जीते जी जो तुमको कमी न पहुंच सके, उनके कंकालों के ढेरों से ढकी हुई ऐ गलाघोटू समस्याओं! तुम्हारी सिद्धि के लिये, तुम्हारे लिए रास्ता है।
खेते चले, बढ़े चलो, वास्तविक आपतक। इस सम्पूर्ण अन्ध विश्वास को, शरीर के इस अन्ध-विश्वास को छोड़ो। इस क्षुद्र शरीर की मोहनी से पिंड छुटाओ। तुमने अपने को इस बुद्धि या शरीर के मोह में फंसा लिया है। उससे पीछा छुटाओ, खेते चलो, नित्यता, वास्तविकता, सच्ची आत्मा की ओर बढ़े चलो। भारत से भी अधिक दूर का मार्ग लो।
भारत से भी अधिक दूर का रास्ता! ऐ भूमि और आकाश के रहस्य? तुम्हारे भी, ऐ समुद्र के जलो, ऐ घूमती हुई नदियों और दरियों तुम्हारे भी, ऐ बनो और खेतों तुम्हारे भी, ऐ मेरे देश के ऐ उद्यानो तुम्हारे भी, ऐ शिलाओ, भारी भारी भूधरों, ऐ आरक्त प्रातःकाल, ऐ मेघो, ऐ वृष्टि और हिमो, ऐ दिन और रात, मार्ग तुम्हारे लिए।
शरीर से ऊँचे उठो, और तुम ये सब हो जाते हो, तुम्हें इन सब के लिये रास्ता मिल जाता है। अनुभव करो कि, तुम स्वयं ये सब हो।
ऐ चन्द्र और सूर्य और तुम समस्त नक्षत्रो! वृहस्पति और शुक्र! मार्ग तुम को, मार्ग तुरन्त मार्ग। रक्त जल रहा है मेरी नसों में। दूर के लिये ऐ आत्मा, तुरन्त लंगर छोड़ दो! काट दो रस्से-निकल चलो—हरेक बादवान को लगादो।
भूमि में वृक्षों की तरह क्या काफ़ी देर तक हम यहां नहीं खड़े रहे? तुच्छ पशुओं की तरह खाते और पीते क्या हम यहां काफी देर तक रेंगते नहीं रहे? क्या हमने देर तक अपने को पुस्तकों से चौंधिया और अन्धकारमय नहीं बना लिया है?
खेते चलो—केवल गहरे पानी के लिये नाव बढ़ाओ, निश्चिन्तता से ऐ आत्मा, ढूढ़ते हुए, मैं तेरे साथ, और तू मेरे साथ। क्योंकि हमारा लक्ष्य वह है जहां जाने का किसी नाविक ने अभी तक साहस नहीं किया।
अपने को और सर्वस्व को, और जहाज को हम जोखिम में डालेंगे।
ऐ मेरी वीर आत्मा! ऐ दूर, दूर खेओ! ऐ साहसी किन्तु सुरक्षित आनन्द! क्या वे सब समुद्र ईश्वर के नहीं हैं? ऐ दूर दूर खेओ!
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!