आर्य माता।
अमेरिका और इंग्लैंड में बहुधा कहा जाता है कि भारत वर्ष में स्त्रियों का सत्कार नहीं होता और पति उनके साथ उचित प्रेम नहीं करते। यह बहुत ही असत्य विचार है क्यों कि भारतवर्ष में इस देश की अपेक्षा स्त्री का अधिक सन्मान और प्रेम होता है। इस देश में सर्व साधारण के समक्ष स्त्री के साथ प्रेम होता है, चुम्बन होता है, लाड होता है, परन्तु घर में जाते ही उसका अनादर होता है। भारत वर्ष में सर्वसाधारण के समक्ष पति स्त्री का कुछ आदर-सत्कार नहीं करता, उसके सामने भी नहीं देखता, परन्तु अन्तः करण में तो वह उसकी पूजा करता है* इस देश में स्त्री का सर्व साधारण के समक्ष व्यवहार अकेले की अपेक्षा अधिक महत्व का समझा जाता है, परन्तु भारतवर्ष में ऐसा नहीं है। वहां पति सर्व साधारण के समक्ष स्त्री की ओर कुछ ध्यान ही नहीं देता, परन्तु हृदय में स्त्री के लिये अपना सर्वस्व अर्पण करने को तैयार रहता है। वह उसके सुख के लिये सब कुछ सह सकता है। अन्तर केवल इस बात में है कि भारत की स्त्रियां पुरुष के समान शिक्षित नहीं है। तथापि क्या इस देश में स्त्रियां उतनी शिक्षित हैं जितने कि पुरुष हैं? भारत वर्ष में न तो पुरुष ही इतने शिक्षित हैं और न स्त्री ही हैं जितने कि यहां है। आज कहा सब दोष भारत वर्ष के विवाहसंबंध के * यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।—मनुस्मृति।
माथे मढ़ा जा रहा है, परन्तु यह ठीक नहीं है। इस प्रश्न का यह यथार्थ निराकरण नहीं है। भारत वर्ष में पुरुष अपनी पत्नी को "मेरी स्त्री" कहने की घृष्टता नहीं कर सकता। वह अपनी पत्नी के संबंध में बोलता हो तब "मेरी स्त्री" कह कर बात नहीं करता। इस प्रकार के शब्द वहां असभ्य, ग्राम्य, निंद्य, और निर्लज्ज समझे जाते हैं। भारत वर्ष में पुरुष इन शब्दों का कभी प्रयोग नहीं करता। जब वह अपनी स्त्री के संबन्ध में कुछ कहता है तब वह उसको अपने "लड़के की मा" ऐसे पर्याय नाम से पुकारता है—जैसे "मेरे कृष्ण की मा, मेरे राम की मा" इत्यादि। + + + + + + + भारतवर्ष में जहां यह नियम है कि प्लेग के रोगी के पास किसी को जाने की आज्ञा नहीं दी जाती थी, ऐसी एक झोंपड़ी में एक बालक को प्लेग की वीमारी हो गई थी। इस बालक को रुग्णालय (हास्पीटल) में ले गये थे। एक वत्सल आर्य माता ने किसी प्रकार से रुग्णालय में प्रवेश प्राप्त किया। वहां वह रही और उसने रोग से पीड़ित बालक की सेवा करने के लिये कहा कि जो मरणासन्न हो रहा था अन्त में बालक की मा को भी आने की आज्ञा मिली और वह प्रिय बालक अपनी माता के चरणों पर सिर रख कर पड़े २ प्राण त्याग कर रहा था। पुत्र वत्सल माता की गोद में उसने प्राण त्याग किया। हिन्दू धर्म के अनुसार वह मृत्यु वैसी ही पवित्र भूमि में हो रही थी, जैसे एक ईसाई ईसा के चरणों पर अपना मस्तक रख कर मृत्यु प्राप्त करता है। जब भारतवर्ष का एक बालक अपनी माता के अंक पर
सिर रखकर प्राण त्याग करता है, तब वह मृत्यु परम पवित्र मानी जाती है। इस देश में तुम परमेश्वर को पिता के समान पूजते हो कि जो "पिता स्वर्ग में है"। भारतवर्ष में परमेश्वर की पिता के समान नहीं किन्तु माता के समान पूजा होती है। भारत-वर्ष की भाषा में "माता" का शब्द सब से प्यारा शब्द है। "माताजी" यह संज्ञा ही उनका परम प्रिय दैवत है,-जिनका पूज्य परमात्मा है। जब भारतवर्ष में कोई बीमार होता है, अथवा कोई महान् दुःख उसके सिर पर आ जाता है, तब उस समय उसके मुख से "मेरे प्रभु" शब्द नहीं किन्तु "मां, मां," के शब्द ही निकलते हैं। वही शब्द उसके शुद्ध अन्तः करण से निकलते हैं। हिन्दु के अन्तः करण की पवित्र भावना— "मा" शब्द से व्यक्त और व्याप्त होती है। ॐ! ॐ!! ॐ!!!