पत्र मञ्जूषा।
(1) 15 सितम्बर 1903 परम प्रिय बालिके, या मधुर कुमारी कमले! तुम शुद्ध, निर्दोष और पवित्रों की पवित्र हो। तुम में कोई दोष नहीं है, कोई कलंक नहीं है, सांसारिकता का कोई धब्बा नहीं है, किसी प्रकार का भय नहीं है और कोई पाप नहीं है। क्या तुम ऐसी नहीं हो, प्रिय बालिके! यदि तुम्हें कोई एतराज नहीं है तो निम्न लिखित विचारों को कविता के रूप में ग्रथित करो। इन विचारों को छन्दोबद्ध करने का प्रयत्न तुम्हें काव्यानन्द के उच्च शिखर पर रक्खेगा। यह एक फारसी कविता का अनुवाद किया गया है, जिसे राम ने आज प्रातःकाल ही लिखा है। तुम पोर्टलैंड अथवा डेनवर में इनकी कविता बनाओ। अपने को तुम अब उनके योग्य बना लो। विचारों को कविता में लिखने के योग्य अनुकूल परिवर्तन करने का तुम्हें पूर्ण अधिकार है। (1) ए आनन्दसागर! तुम उन्मत्त क्रोध रूपी तरंग और आंधी से पृथ्वी और आकाश को समतल कर दो। सब विचार और चिन्ता खूब गहरे डुबा दो, और उन्हें टुकड़े २ करके छितर वितर करदो। अहा! मुझे इन से क्या करना है (2) आओ, हम खूब दिव्य आनन्दामृत का आकंठ पान करके मस्त हो जायँ। हम इतना पान करें कि देह का नितान्त
विस्मरण हो जाय। भेदभाव के विचारों को हम निकाल देते हैं, संकुचित अस्तित्व की दिवालों को गिरा देते हैं और स्वयंप्रकाश आत्मसूर्य की अन्तःकरण में संस्थापना करते हैं। (3) ए दिव्य उन्माद! ए निजानन्द! आओ, शीघ्रता करो, सत्वर आओ, विलम्ब मत करो। मेरा चित्त अब इस अस्थि के पिंजरे से थक गया है, अब इस मन को तुझमें-तुझमें ही गोता लगाने दे। कृपया इसकी अब जलती हुई [संसार की] भट्टी से रक्षा करो। (4) "मेरा और तेरा" की कल्पना पर अब आग लगा दो। सब प्रकार के भय और आशा को वायु के तुफ़ानों में बह जाने दो। भेद भाव को तोड़ दो और सिर और पैर में भेद मत समझो। (5) मुझे रोटी की परवाह नहीं, जल की जरूरत नहीं। मुझे विश्राम मत करने दो। हे प्रेम की अमूल्य उत्कट प्यास! अहा तू अकेली ही इस प्रकार के करोड़ों ढांचों (शरीरों) के पतन का प्रायश्चित्त करने के लिये समर्थ है। पश्चिम का आकाश चमकता दीख रहा है, तेज मनोहर सुन्दर कितना दीख रहा है! उसको क्या आदित्य बनाता सुखमय ऐसा? है यह निस्सन्देह प्रकाश तुम्हारा ऐसा। तुम्हारा प्रत्यक्ष आत्मा, राम।
(2) (राम साहब ला॰ बैजनाथ को भेजे हुए एक पत्र की नकल) वसिष्ठाश्रम। 27 मार्च 1906 धन्यतम परमात्मभूर्ते, पूर्ण शान्ति मम पास नदी सम बहती आती, शान्ति समीरण लहरि के सम आ लहराती। गंगा के निर्मल जल के सम शान्ति बहती, नख शिख से सब रोम रोम से बह निकलती। जल तरंग शान्ति सागर के ये जो उछले, हृदय, हस्त और चरण समी को ये हैं त्यागे। ॐ आनन्द! ॐ परमानन्द!! ॐ शान्तिः!!! यह आश्रम (वसिष्ठाश्रम) हिम रेखा के ऊपर है। राम की गुफा के नीचे से वसिष्ठगंगा नाम की एक रमणीय (जल) धारा बहती है। इस धारा में पांच या छै झरने हैं। नदी की घाटी में पत्थरों पर शिवजी के हाथों से प्राकृतिक कुंड खोदे गये हैं जिनसे छोटे २ सुहावने बीस ताल बन गये हैं। शिखरें उन सत्य प्रकाशप्रिय गंगाजल के दृढ़ वृक्षों से ढंकी हुई हैं, जिनकी हरियाली उस समय भी नहीं मुरझाती जब कि उनके आसपास 6 फीट बर्फ जम जाती है। ये धन्य तरुवर महान् वनमाली के प्रेम और कृपा के सर्वथा पात्र हैं, इसमें कोई शंका नहीं। अमुं पुरः पश्यसि देवदारुम्। पुत्री कृतोऽसौ वृषभध्वजेन॥ (रघुवंश २।36) भावार्थः—पास के देवदारु वृक्ष तू देखता है? वृषभध्वज श्री शिवजी ने उसका पुत्रवत् संवर्धन किया है।
महादेव जी के ये उरुद्बाहु और वज्रहृदय दो बालक ही केवल राम के साथी हैं। नारायण स्वामी भी राम से कम से कम दो वर्ष तक न मिलने के लिये फिर मैदान में (नीचे) भेज दिये गये हैं। यहां एक नवयुवान् नित्य आकर भोजन बना जाता है और रात्रि व्यतीत करने के लिये पास ही एक ग्राम में-जो ग्राम सब से निकट है और तीन मील से अधिक अन्तर पर होगा—चला जाता है। यहां से आधा मील चढ़ने से राम वशिष्ठ पर्वत के शिखर पर पहुँचता है। वहाँ से केदार, बद्री, सुमेरु, गंगोत्री, यमनोत्री, और कैलास के हिमशृंग दिख पड़ते हैं। केदार खण्ड (पुस्तक) में वसिष्ठाश्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है। योगवासिष्ठ के रचयिता ने आश्रमपद के लिये यही स्थान पसन्द किया था। सुख की बात है कि यहां अभी तक कोई शहर या मार्ग निकट नहीं है। राम के आनन्द के विषय में मत पूछो। राम यहां एक अति महत्त्व का ग्रन्थ लिख रहा है। राम के उस ग्रन्थ से हर्षोन्मत्त शान्ति उस समय प्रकट होगी, जब वह कुछ वर्ष के पश्चात् नीचे मैदान में प्रकाशन के लिये भेजी जायगी। उस समय तक कृपया कोई न मिले। परमात्मा ही केवल सत्य है। देखा न शब जो यार को नूरे जिया से कार क्या? मुर्दे की कब्रे-तार को आबो-गिया से कार क्या? चाहे कोई भला कहे ख्वाह पड़ा बुरा कहे, पल्ला छुटा जो जिस्म से बीमो-रजा से कार क्या? नेकी बदी खुशी गमी जीना थी वामे-यार का, जीना जला दो अब यहां पाथी बिया से कार क्या? एहमके कोर ही को हैं उल्फते-मा सिवाये-हक,
काबा-ए-दिल में यह जना बूए-वफा से कार क्या? इतना लिहाज कर लिया दुनिया तेरा, परे भी हट। नाचूं हूं साथ राम के शर्मो-हया से कार क्या? × × + + अजदहा आजादी है मारे आस्तीं चश्म दोबीं, गैर हक को जब नजर आये, जहां हो मार तोप। खाक झूठी जिन्दगी पर, कब्र का कीड़ा न बन, गोरे तन वहमे खुदी पर दे चला फिर मार तोप। मालो-दौलत गीरो-दार, रक्तो बक्तो नक्दो जिन्म, इज्जतो-माओ मनी का फार कर दे पार तोप। भावार्थः—रात्रि को ही प्रियतम के दर्शन नहीं हुए तो दिन के सूर्यप्रकाश से क्या काम? मुर्दे की अंधेरी कब्र को पानी और घास से क्या काम है? चाहे कोई भला कहे या बुरा किन्तु देहाध्यास के नाश होने पर भय और आशा से क्या काम? नेकी, बदी, हर्ष, शोक, प्रियतम की प्राप्ति की सीढ़ी थी, इस सीढ़ी को जला दो अब नीचे उतरने से क्या काम? अन्धे मूर्ख को ही ईश्वर से अतिरिक्त किसी अन्य से प्रीति होती है, अन्तःकरण में ऐसा व्यभिचार (अव्यभिचारिणी भक्ति ही उपयोगी मानी जाती है) हो तब वफादारी की गंध से क्या काम? हे दुनिया तेरा इतना लिहाज कर लिया, अब दूर हट, मैं जब राम के साथ नाचता हूं तो मुझे शर्म और लज्जा से क्या काम? यह द्वैत दृष्टि अजगर का डंग या आस्तीन का सांप है। ईश्वर से अतिरिक्त जहां कहीं द्वैतभाव दीख पड़े उसको तोप से मार। इस झूठी जिन्दगी पर खाक डाल। कब्र का कीड़ा मत बन। कब्र रूपी शरीर के अहंकार के भ्रम पर तोप चला कर मार। धन दौलत, द्रव्य संग्रह, पैहिक वस्तु, भाग्य, नक्रद
और अन्य पदार्थ, मानापमान, तथा ममत्व को तोप मार कर पार काम कर दे। आप का प्रयाग कुम्भ का व्याख्यान विद्वत्तापूर्ण और चातुर्ययुक्त था। इसकी एक प्रति बिहार के महाराजा को उपहार स्वरूप दिया था। परन्तु प्यारे सुनो, वेदान्त कोई ढोंग (वाग्वेदान्त) या (धर्म का) दंभ नहीं है, ऐसे ही यह जगत् परमार्थतः सत्य नहीं। जो उसको सत्य समझता है, अवश्य नष्ट होता है। हाँ, हाँ, हाँ, हाँ, ॐ राम।