भारतवर्ष की स्त्रियां।
राम अब एक व्याख्यान का कुछ भाग पढ़ेगा, जो व्याख्यान लंदन में एक अंगरेज़ सन्नारी ने दिया था और जो भारतवर्ष के एक वर्त्तमान पत्र में भी प्रकाशित हुआ था। राम यह व्याख्यान आप लोगों को यह बतलाने के लिये पढ़ता है कि इस देश में भारतीय जीवन- व्यवहार और कुटुम्बव्यवस्था के सम्बन्ध में कैसे गलत और झूठे विचार फैले हुए हैं। कुछ लोगों का यह विचार है कि जो लोग भारतवर्ष में जायंगे, कुछ भी कार्य न कर सकेंगे। उनका यह अनुमान है कि वहां जातिभेद ने ऐसा प्रबल अधिकार जमा रक्खा है कि उनके साथ कोई भी अमेरिकानिवासी नहीं मिल सकता। ऐसे कुछ विचार उन मनुष्यों द्वारा फैले हुए हैं जिनका भारतवासियों से कभी भी संबंध नहीं रहा है। जिस पर हम प्रेम करते हैं, उसके लिये जीवन समर्पण करना कितने बड़े सौभाग्य की बात है! अहा! कितने परम आनन्द की बात है! प्रेम वही केवल कर सकता है जो अपने प्रेमपात्र के लिये प्राण अर्पण करने को निरन्तर प्रसन्नचित्त होकर तैयार रहता है! ऐसा प्रेम ही मनुष्य को जीवित रखता है और उससे महान् सेवा करा लेता है। ऐसे प्रेम की ही भारतवर्ष को आवश्यकता है। भारतवर्ष में कार्य करने जानेवाले अमेरिकन स्त्री पुरुषों को ऐसा ही प्रेम रखना चाहिये। बहुत से गलत समाचार उन मनुष्यों द्वारा फैलाये गये हैं जो भारतीय जीवन को न देखते हुए भारत में रहते हैं। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे तुम एक पुस्तक को मोमजामे में लपेट कर पानी में डुबो देते हो, परन्तु पुस्तक के चारों
और पानी होते हुए भी वह नहीं भीगती। इसी प्रकार ऐसे मनुष्य भारत में रहते हुए भी भारतवासियों से नहीं मिलते और न उनमें प्रेम ही करते हैं। यहीं इस बात की एक स्त्री साक्षी दे रही है जो भारत में भारतीय रीति से रही है। राम चाहता है कि इसी स्त्री के सदृश अमेरिकावासी भारतीयों से मिले। यदि तुम वास्तविक कर्मवीर बन करके जाओगे तो तुम्हें एक पाई का भी खर्च नहीं करना पड़ेगा। वहां लोग लाखों मनुष्यों का पालन पोषण कर रहे हैं। वहां के लोग निर्धन होते हुए भी अत्यन्त उदार हैं। राम ने भारतवर्ष के साधुओं के पास कभी धन नहीं देखा। जब वे सड़कों से निकलते हैं तब सर्वदा यही समझा जाता है कि वे अपनी क्षुधा निवृत्त करने के लिये कुछ भिक्षा मांग रहे हैं। प्रत्येक भारतरमणी यह अपना ईश्वरदत्त कर्त्तव्य कर्म समझती है कि जो कोई क्षुधार्त मनुष्य उसके घर के सामने से निकले उसको भोजन दे और उसकी अन्य आवश्यकतायें भी पूरी करें। यदि कोई साधु एक ऐसी स्त्री के घर के सामने से निकला जिसके पास क्षुधार्त की क्षुधा तृप्त करने के लिये कुछ भी नहीं है तो ऐसी अवस्था में क्या होगा, यह राम ही भली भांति जानता है। निर्धन साधु को देने के लिये जब उसके पास अन्न न होगा तब उसके नेत्रों से करुणाजनक अश्रुप्रवाह बह निकलेगा। दरिद्र या भूखे मनुष्य के वस्त्र पहने हुए जो कोई व्यक्ति सड़क से निकलता है, तो वह साधु के समान समझा जाता है। साधु का अर्थ स्वामी ही नहीं है। यदि तुम भारत में हो और भूखे हो तो तुम्हारा आदर साधु के समान होगा। जिस किसी के पास द्रव्य अथवा वस्त्र नहीं है, वह साधु ही माना जाता है। ॐ! ॐ!! ॐ!!!