पाप ; आत्मा से उसका सम्बन्ध।
(रविवार ता॰ 16-11-1920 को दिया हुआ व्याख्यान।)
बहनों और भाइयो,
पिछले सप्ताह में जो चार व्याख्यान दिये गये हैं उन्हीं के सिलसिले में आज का विषय है। जिन्होंने पिछले व्याख्यान सुने हैं वे इसे खूब समझेंगे।
आज के व्याख्यान में राम पाप की व्याख्या न करेगा, अथवा इसे कौन लाया, कहाँ से यह आया, या संसार में यह पाप क्योंकर है, कुछ लोग दूसरों से अधिक पापी क्यों होते हैं, कुछ लोगों में दूसरों से लालच क्यों अधिक होता
है, और दूसरों में लालच की अपेक्षा क्रोध क्यों अधिक होता है। यदि समय मिला तो इन प्रश्नों का विचार किसी दूसरे व्याख्यान में किया जायगा।
पाप शब्द का व्यवहार उसके साधारण अर्थ में आज हम कर रहे हैं, अथवा उस अर्थ में जो अर्थ समस्त इसाई संसार उसका ग्रहण करता है।
इस संसार में आप कुछ अति विचित्र घटना, अत्यंत चमत्कार पूर्वक घटना देखेंगे। आप इस संसार में कुछ ऐसी बातें देखेंगे जो तत्वज्ञानियों की चतुरता को मात करती हैं, और आपको कुछ ऐसे नैतिक और धार्मिक तथ्य दिखाई पड़ेंगे जो वैज्ञानिकों को उद्विग्न करनेवाले हैं। वेदान्त के प्रकाश में आज इनकी व्याख्या की जायगी। पापकी अद्भुत घटना भी इन्हीं विचित्र तथ्यों के अन्तर्भुक्त है। यह कैसी बात है कि हरेक मनुष्य जानता है कि इस संसार में जिसने जन्म लिया है वह मरेगा अवश्य। प्रत्येक पेड़ जो पृथ्वी पर दिखाई देता है वह एक दिन नष्ट अवश्य होगा। प्रत्येक पशु जो पृथ्वी पर दिखाई देता है एक दिन नष्ट अवश्य होगा, प्रत्येक मनुष्य मरेगा अवश्य। हर आदमी यह जानता है। बड़े बड़े सूरमा, सिकन्दर नेपोलियन, वाशिंगटन, वेलिंगटन, जो लाखों मनुष्यों की मौत के कारण हुए, सब मरे। ये सब के सब, जिनके हाथों के बयान के बाहर नरसंहार और रक्तपात हुआ, मृत्यु को प्राप्त हुए। वे भी मरे, और मरों को जिलाने वाले भी मरे। हम जानते हैं, शरीर नश्वर है। हरेक मनुष्य यह जानता है। परन्तु व्यवहार में कोई भी इस पर विश्वास नहीं करता। बुद्धि से तो वे इसे स्वीकार करते हैं, परन्तु व्यावहारिक विश्वास इस तथ्य में नहीं दिखलाते। यह क्या
बात है? जो सत्तर वर्ष का हो चुका है, जो 80 वर्ष का होने वाला है, ऐसे बूढ़े से बूढ़े मनुष्य के पास जाओ और तुम देखोगे कि वह भी अपने सम्बन्धों की फैलावट जारी रखना चाहता है, वह हमेशा इस संसार में रहना चाहता है, मृत्यु को परित्याग करना चाहता है, और व्यावहारिक जीवन में अपनी मौत की बात कभी नहीं सोचता। वह अपनी सम्पत्ति बढ़ाना चाहता है, वह अपने नातेदारों और मित्रों का मण्डल बढ़ाना चाहता है, वह अपने शासन में अधिकाधिक सम्पत्ति चाहता है। वह जीते रहने की आशा करता है। व्यवहारतः मृत्यु में उसका कोई विश्वास नहीं है, और इसके सिवाय, मृत्यु का नाम ही उसके सारे शरीर में मूँड़ की चोटी से पैर के अंगूठे तक, कंपकपी पैदा कर देता है। मृत्यु के नाम से शरीर थरथराने लगा है। यह क्या बात है कि मनुष्य मृत्यु के विचार को नहीं सह सकता मृत्यु के नाम को नहीं सह सकता और साथ ही जानता है, कि मौत अवश्यंभावी है यह क्या बात है? यह एक नियमविरोध है, एक प्रकार की उल्टभासी है। इसे समझाओ। मनुष्यों को मृत्यु में व्यावहारिक विश्वास क्यों नहीं होता, यद्यपि उसका बौद्धिक ज्ञान उन्हें होता है? वेदान्त इसे इस प्रकार समझाता है। "मनुष्य में वास्तविक आत्मा है, जो अमर है, वहाँ वास्तविक आत्मा है जो नित्य निर्विकार, आज, कल्ह और सदा एकरस है। मनुष्य में कोई ऐसी वस्तु है जो, मृत्यु को नहीं जानती, किसी प्रकार के परिवर्तन को नहीं जानती। मृत्यु में व्यावहारिक अविश्वास का कारण मनुष्य में इस वास्तविक आत्मा की उपस्थिति है। और मृत्यु में लोगों के व्यावहारिक अविश्वास के द्वारा यह वास्तविक, नित्य, अमर, आत्मा अपने अस्तित्व को प्रमाणित करता है।"
अब हम एक दूसरी विचित्र बात पर आते हैं, स्वाधीन होने की अभिलाषा की विचित्रता। इस संसार में प्रत्येक प्राणी स्वतंत्र होना चाहते हैं, कुत्ते, शेर, चीते, पक्षी, मनुष्य स्वाधीनता से प्रेम करते हैं। स्वाधीनता का विचार सार्वभौम है। राष्ट्र खून गिराते हैं और मानव जाति के रक्त से भूमि तर करते हैं, पृथ्वी का सुन्दर मुख स्वाधीनता के नाम पर हत्याकाण्ड से, रक्त से लोहित किया जाता है। इसाई, हिन्दू, मुसलमान, सबने अपने सामने एक लक्ष्य रक्खा है। वह क्या है? मुक्ति, जिसका छोटा सा अर्थ स्वाधीनता है।
भारत में किसी मन्दिर में एक मनुष्य मिठाई बाँटता हुआ दिखाई पड़ा था। बड़े हर्ष और अभ्युदय में भारतवासी गरीबों को मिठाई या दूसरी चीजें बाँटते हैं। किसी ने आकर पूछा, इस प्रसन्नता का कारण क्या है। मनुष्य ने कहा कि मेरा घोड़ा खोगया। चकित होकर उन्हों ने कहा, "वाह! तुम्हारा घोड़ा खोगया और तुम आनन्द मना रहे हो?" उसने कहा, "मेरी बात का उलटा अर्थ न समझो। घोड़ा तो मैंने खो दिया परन्तु सवार को बचा लिया। चोरों के एक दल ने मेरा घोड़ा चोरा लिया। जिस समय घोड़ा टहलाया गया था उस समय मैं उस पर सवार न था। यदि मैं घोड़े पर सवार होता तो शायद मैं भी चोरा जाता। धन्यवाद है कि, घोड़े के साथ मैं भी नहीं चोरा लिया गया"। लोग जी खोल कर हंसे। वाह, कैसा सीधा आदमी है!
भाइयो और बहनो, यह कहानी हास्यजनक जान पड़ती है। परन्तु हरेक को इसे अपने पर घटा कर देखना चाहिये कि, वह इस मनुष्य से भी अधिक बेढंगा बर्ताव कर रहा है या नहीं। उसने घोड़ा खो दिया, किन्तु अपने को बचा लिया।
किन्तु हजारों, नहीं लाखों मनुष्य क्या कर रहे हैं? वे घोड़े को बचाने की चेष्टा कर रहे हैं और सवार को खोते हैं। यह कितनी बुरी बात है। इस प्रकार जब उसने घोड़े को खो दिया और सवार को बचा लिया तो उसके लिये आनन्द मनाने का अवसर था। सभी जानते हैं कि, असली आत्मा, या वास्तविक स्वयं, अहं या आत्मा का नक्षत्र की तरह टिमटिमानेवाले शरीर से वैसा ही सम्बन्ध है जैसा सवार या घोड़े वाले का घोड़े से। किन्तु किसी से भी जाकर उसकी वास्तविक प्रकृति और उसके विषय में पूछिये। तुम स्वयं क्या हो, तुम्हारा आत्मा क्या करता है? उत्तर मिलेगा, "मैं महाशय अमुकामुक हूँ। मैं फलां २ कार्यालय में काम करता हूँ"। ये सब लक्षण और उत्तर केवल स्थूल शरीर से संबन्ध रखते हैं। अर्थात् ये ऐसे उत्तर हैं, जो असंगत हैं। हम पूछते हैं, "तुम कौन हो, तुम क्या?" और उसके उत्तर से उसकी वास्तविकता पर कोई प्रकाश नहीं पड़ता। यह निशान से दूर है, प्रसंग से संगत नहीं है। हम उसके आत्मा के सम्बन्ध में प्रश्न करते हैं और वह हमें घोड़े की बात बता रहा है। हम सवार का हाल जानना चाहते हैं, और वह प्रश्न को टालकर वे बातें हमें बताता है, जो बिलकुल नहीं पूछी गई थीं। क्या हम घोड़े ही को सवार नहीं समझ रहे हैं? घोड़ा खो गया है, अब गुलगपाड़ा मचाना चाहिये, खोगया, खोगया, खोगया! समाचार पत्रों में छुपवा देना चाहिये, खोगया, खोगया, खोगया। क्या खोगया? घोड़ा? नहीं, घोड़ा नहीं खोया है। हरेक घोड़े की बात कहता है। शरीर के लक्षण, चिन्ह और हाल सब कोई कहने को तैयार है। खोई हुई चीज़ है घोड़ा-सवार, खोई हुई वस्तु है आत्मा, वास्तविक स्वयं, सार पदार्थ, जीवात्मा। महान् आश्चर्य!
सच्चे स्वयं, सवार, वास्तविक आत्मा का हम कैसे पता लगावें और पावें? गत सप्ताह के व्याख्यानों में प्रायः हर दिन इस प्रश्न के उत्तर दिये गये थे। आज हम एक दूसरी ही विधि से, पाप की विचित्र घटना से इस प्रश्न का उत्तर देंगे। पापका मूल क्या है? पापने इस संसार में कैसे प्रवेश किया? जो समझौता दिया जायगा वह उल्टा समझ पड़ेगा, विलक्षण, चौंकानेवाला समझ पड़ेगा। किन्तु चकित मत होइये। प्रकट में यह आश्चर्य में डालने वाला समझौता भी स्वयं आपकी बाइबिल के उपदेशों से सर्वथा संगत साबित किया जा सकता है, जिस बाइबिल को यूरोपीय लोग उस तरह नहीं समझ सकते जिस प्रकार भारतवासी, क्योंकि इसा एशिया का है, और यह भी दिखाया जा सकता है कि वह भारत का भी है। बाइबिल के सब रूप की और अलंकारों की हिंदू शास्त्रों ही में बारम्बार आवृत्तियाँ हुई हैं। इससे हिन्दू, एशिया के लोग, उस प्रकार की लेख शैली के अभ्यासी होने के कारण, पाश्चात्य लोगों की अपेक्षा बाइबिल को अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैं। और इस लिये अभी जो समझौता दिया जायगा वह जिन लोगों को अपने पोषित विचारों और अति पूज्य भावों के सर्वथा विपरीत और आश्चर्यजनक समझ पड़े उन्हें धीरज धरना चाहिये क्योंकि प्रगट में यह अद्भुत व्याख्या अन्त में स्वयं तुम्हारी बाइबिल के विरुद्ध नहीं है। पापकी समस्या पर आने के पूर्व हम कुछ प्रारम्भिक मामलों पर विचार करेंगे।
यह कैसी बात है कि, पैदा होने वाले हरेक को यद्यपि मरना पड़ेगा फिर भी लोग मृत्यु का विचार कभी नहीं कर सकते? मृत्यु का विचार मात्र उनके शरीर कंपा देता है
और उनके शिर की चोटी से पैर के अंगूठे तक में थरथराहट पैदा कर देता है। हम कहते हैं, यह क्या बात है कि, भूतकाल में जितने महाराजा हुए सब चल बसे, सब महात्मागण भी जो मृतकों को उनके शरीरों को फिर उठा कर खड़ा करते थे, मृत्यु को प्राप्त हुए। वे मुर्दों को जिन्दा करते थे पर उनके शरीर भी मुर्दा हैं। हम देखते हैं कि, भूतकाल के सब धनाढ्य पुरुष, भूतकाल के सब बलाढ्य पुरुष मर गये हैं। और बौद्धिक विचार-बिन्दु से हमें निश्चय है कि, देर या सबेर हमारे शरीर भी अवश्य मरेंगे। तुम चाहे सत्तर वर्ष तक जीते रहो, नहीं, उसकी दूनी, चौगुनी अवस्था तक के हो जाओ परन्तु मरना अवश्य पड़ेगा। मौत से तुम नहीं बच सकते। यह सर्वथा निश्चित है। परन्तु महाविस्मयकर बात तो यह है कि, यह सब होते हुए भी कोई अमली रूप से अपनी मृत्युपर विश्वास नहीं कर सकता। हरेक मृत्यु के विचार से घृणा करेगा, मृत्यु आने की चिन्ता को न सहन करेगा। हरेक अपने साथियों से अपने सम्बन्धों को फैलाता जाता है, और अपने नातेदारों से नातेदारियां बढ़ाता रहता है, अपने कार्यक्षेत्र की वृद्धि का प्रसार करता रहता है, और इस तरह पर जिन्दगी बसर करता है। मानों मृत्यु उसे कभी न पकड़ेगी, उसकी मृत्यु होना असम्भव है। यह क्या बात है? मौत का नाम किसी से सुनते ही मनुष्य के सारे शरीर में बुखार चढ़ आता है। यह क्यों? एक ओर तो मृत्यु का आना अटल है, दूसरी ओर हम उसके विचार से भी भागते हैं, ठीक पत्ती की तरह, जो अपने पंखोंपर पानी पड़ते ही पानी को गिरा देता है। यह क्या बात है कि, हम मृत्युपर व्यावहारिक विश्वास कदापि नहीं कर सकते? मौत का वर्णन करनेवाले गान आप भले ही गावें, परन्तु व्यावहार
हम मौत पर विश्वास कभी नहीं कर सकते। कारण क्या है? वेदान्त इसकी व्याख्या करता हुआ कहता है कि, वास्तविक कारण आपके वास्तविक आत्मा की अमरता है। आपका वास्तविक आत्मा कभी नहीं मर सकता। जिस शरीर को मरना है, जो हर क्षण मृत्यु को प्राप्त हुआ करता है,-मृत्यु से हमें यहां परिवर्तन समझना चाहिये-जो हर क्षण बदल और मर रहा है, आपका सच्चा आत्मा नहीं है। आप में कोई ऐसी वस्तु है, जो कभी नहीं मर सकती। शरीर से आत्मा का, वास्तविक तत्व का संयोग है, जो कभी नहीं मर सकता। परन्तु आप कहेंगे कि, व्यावहारिक जीवन में, नित्य के जीवन में हम यह विश्वास नहीं करते कि, आत्मा कभी नहीं मरेगा, परन्तु हम यह विश्वास करते हैं कि, हमारे शरीर कभी न मरेंगे—विश्वास करते हैं कि हमारे शरीरों को अमर रहना चाहिये। हिन्दू धर्म का वेदान्त दर्शन कहता है, यद्यपि यह सत्य है कि, आत्मा को नहीं मरना है और शरीर को मरना है, परन्तु भूल से आत्मा के गुण, वास्तविक स्वयं या अहं का गौरव नश्वर शरीर को प्रदान किया जाता है। मूल में ही अविद्या है। यह विचार सार्वभौम है। यह सब कहीं, सब देशों में वर्तमान है। और पशु-जगत में भी यह वर्तमान है। इस विश्वास की सर्वव्यापकता को वेदान्त के सिवाय कोई दूसरा तत्वज्ञान नहीं समझता। इस विश्वास की सार्वभौमिकता का तथ्य है, और इस तथ्य समझाना जाना चाहिये जो तत्वज्ञान प्रकृति के सब तथ्यों को नहीं समझता वह तत्वज्ञान ही नहीं है। अधिकांश तत्वशास्त्रों की भांति वेदान्त इस तथ्य को बेसमझाये नहीं छोड़ देता। कारण आन्तरिक होना चाहिये। बाहरी कारणों का प्रमाण देने के दिन गये। एक आदमी गिर
पड़ता है; उसके गिरने का कारण उसी के भीतर दिखाना होगा। वह कह सकता है, जमीन फिसलौंदी थी, या इसी तरह की और कोई बात। किन्तु कारण घटना में ही दिखाना होगा, उससे बाहर नहीं। और यदि स्वयं घटना में हेतु की प्राप्ति हो सकती हो तो बाहरी कारणों में जाने का हमें कोई अधिकार नहीं है। अमरता में व्यावहारिक विश्वास को आप ऐसे कारण से किस प्रकार समझा सकते हैं जो भीतरी हो न कि बाहरी? शरीर में हम ऐसी कोई बात नहीं पाते जो हमें यह विश्वास, अमरता का विश्वास, दे सके। मन में हम ऐसी कोई वस्तु नहीं पाते, जो यह विचार देनेवाली हो। चित्त से दूर जाओ, शरीर से दूर जाओ, और वेदान्त सच्ची आत्मा को बताता है, जिसका वर्णन किसी पिछले व्याख्यान में किया गया था। वही, सच्चिदानन्द-प्रकाश अमर है, आज, कल और सदा एक रस। 'अ-मृत्यु' में इस सार्वभौम विश्वास का कारण हमें उसमें मिल सकता है। और व्यावहारिक जीवन में की जानेवाली भूल है, जो गैलीलियो के समय से पूर्व समस्त मानव जाति ने की थी। पृथ्वी की गति सूर्य को प्रदान की जाती है। आत्मा की दैवी अमरता शरीर को प्रदान करने में आप भी वैसी ही भूल करते हैं।
अब प्रश्न होता है, अमर आत्मा और नश्वर शरीर हैं और उनके साथ है अज्ञान, विद्या का अभाव। यह अविद्या कहां से आई? अब हम देखते हैं कि, अविद्या मनुष्य में है, और वह देवी आत्मा मनुष्य में है तथा शरीर भी मनुष्य में है। ये भीतरी चीजें हैं, इनमें से बाहरी कोई नहीं है, इनमें से आप के विषय से बाहर कोई नहीं है। और इनके, शरीर और चित्त तथा अमर आत्मा और अविद्या, कार्य से शरीर
की मृत्यु पर व्यावहारिक अविश्वास के चमत्कार के अस्तित्व की व्याख्या होती है।
पुनः, यह क्या बात है कि, इस संसार में कोई भी स्वतंत्र नहीं हो सकता, यद्यपि हरेक अपने को स्वतंत्र समझता है, स्वतंत्रता का विचार करता है, और स्वतंत्रता की इतनी इच्छा की जाती है। आप कहेंगे कि, मनुष्य स्वाधीन है। क्या तुम में अनेक अभिलाषायें, प्रलोभन, और विकार नहीं हैं? तो फिर आप अपने को स्वतंत्र कैसे कह सकते हैं? मीठे फल या स्वादिष्ट भोजन आप को गुलाम बना सकते हैं। कोई भी चित्ताकर्षक रंग तुरन्त आप को मन हर सकता है। मोहित कर सकता है, और आप को गुलाम बना सकता है। लौकिक अभ्युदय का कोई भी विचार आप को गुलाम बना सकता है, और फिर भी आप अपने को स्वतंत्र कहते हैं। ज़रा सूक्ष्मता से जांच कर देखिये कि, भला पूरी स्वाधीनता से आप मनमाना कोई काम कर सकते हैं? क्या यह बात नहीं है कि, आप के किसी मामले में कोई गड़बड़ होते ही आप का मिजाज बेकाबू हो जाता है, आप क्रोध के गुलाम हैं, वृत्तियों के गुलाम हैं। यह क्या बात है कि, वास्तव में लोग पूरे स्वतंत्र नहीं हो सकते, और फिर भी वे सदा स्वाधीनता का विचार, स्वाधीनता की बात, स्वाधीनता बड़ी मधुर है, अत्यन्त वाञ्छनीय है, बहुत प्यारी है, करते रहते हैं?
भारत में रविवार स्वाधीनता का दिन है, और स्वाधीनता के विचार के द्वारा बच्चों को सप्ताह के दिनों की शिक्षा दी जाती है। हर दिन वे अपनी माताओं से पूछते हैं, आज कौन दिन है? वे उनसे बताती हैं, आज सोम, मंगल या
बुध है। फिर वे अपने पोरों पर मंगल, बुध इत्यादि गिनना शुरू करते हैं, अरे! इतवार कब आवेगा?
पृथ्वीतल पर इतना खून क्यों गिरता है? स्वतंत्रता, स्वाधीनता के विचार के कारण। वह कौनसा विचार था जिसकी प्रेरणा से अमेरिकनों ने उससे अपना सम्बन्ध तोड़ लिया जिसे वे अपनी मातृभूमि कहा करते थे? यह क्या था? स्वाधीनता का विचार था। और प्रत्येक धर्म का उद्देश्य क्या है? हमारी संस्कृत भाषा में मोक्ष शब्द है जिसका अर्थ है मुक्ति, स्वाधीनता, स्वतंत्रता। अरी स्वाधीनता, स्वाधीनता, स्वाधीनता! प्रत्येक मनुष्य मधुर स्वाधीनता का भूखा और प्यासा है। और फिर भी ऐसे आदमी कितने हैं, जो वास्तव में स्वाधीन हैं? बहुत थोड़े।
वेदान्त कहता है, इस जगत में आप हर घड़ी कारागार में बन्द हैं, जिस कारागार में तेहरी दिवाल है—काल की दीवाल, दिशा की दीवाल, और हेतु की दीवाल। जब आप का प्रत्येक विचार, प्रत्येक कार्य हेतुता की श्रृंखला से स्थिर होता है, और आप उस जंजीर से बंधे हुए हैं, तो जब तक इस संसार में निवास कर रहे हैं तब तक स्वाधीन कैसे हो सकते हैं? फिर भी स्वाधीनता हरेक और सब की प्रिय वस्तु है। क्या यह विचित्र और विरोधाभास सा नहीं है? क्या यह वचन-विरोध नहीं जान पड़ता है? यह समझाओ।
वेदान्त कहता है, इसका भी कारण है, और कारण तुम्हारे अन्दर है, तुमसे बाहर नहीं है। तुममें स्वाधीनता का यह विचार, यह सार्वभौम विचार हमें बताता है कि, आपमें कोई चीज़ है, और आपमें वह कोई वस्तु आपका सच्चा आत्मा, वास्तविक मुझे है, क्योंकि यह स्वाधीनता
आप मुझे के लिये, मैं के लिये, वास्तविक स्वयं के लिये चाहते हैं, और किसी दूसरे के लिये नहीं। आपमें ऐसी कोई वस्तु है, जो वास्तव में स्वाधीन, असीम, अबद्ध है। इस भाव की सार्वभौमिकता स्पष्ट भाषा में प्रचार करती है कि, वास्तविक स्वयं, वास्तविक आत्मा कोई पूर्ण स्वतंत्र वस्तु है। परन्तु उसी तरह की भूल के कारण, जो अज्ञानी लोग पृथ्वी की गति सूर्य पर आरोपित करने और सूर्य की किरणों को पृथ्वी पर लाने में करते हैं—अविद्या के कारण गुणों का परस्पर परिवर्तन करते हैं—हम शरीर, मन, स्थूल आप के लिये स्वाधीनता की प्राप्ति करना चाहते हैं।
इस संसार में हम एक दूसरी अति विचित्र घटना देखते हैं। अपने क्षुद्र स्वयं की दृष्टि से प्रत्येक इस संसार में पापी है। प्रत्येक मनुष्य किसी न किसी तरह किसी न किसी त्रुटि या कमी का जिम्मेदार है, और फिर भी अपने सच्चे हृदय से कोई भी अपने को पापी नहीं समझता है। इस विशाल विश्व में, पृथ्वीतल पर कोई भी, एक भी व्यक्ति अपनी प्रकृति पापिष्ठ होने पर विश्वास नहीं करता। अपने आन्तरिक हृदय से वह अपने को शुद्ध समझता है। व्यावहारिक जीवन में कोई भी अपने को पापी नहीं समझता। ऊपर से यदि तुमने अपने को पापी पुकारा ही तो क्या हुआ। किन्तु तब भी वास्तविक लक्ष्य यही रहता है कि, लोग धर्मात्मा मनुष्य समझें। परन्तु अपने अन्तरतम हृदय में उन्हें अपनी प्रवृति के पापमय होने पर कुछ भी विश्वास नहीं होता। हरेक अपने विचार से शुद्ध है। न्यायालय में प्रश्न होने पर "तुमसे पाप हुआ" घोर पापी और अपराधी कदाचित ही कभी कहते हैं "हां, हमसे पाप बन पड़ा"। यदि
लाचार होकर उन्हें पापाचार स्वीकार करना पड़ता है तो मामले में कोई दूसरा ही पेंच होता है। यद्यपि बाहर से वे अपने पापकर्म को स्वीकार करते हैं तथापि अपने हृदयों में वे अपनी स्वीकारोक्ति को गलत समझते हैं। उन्होंने कोई पाप नहीं किया। यह कैसी बात है? जो लोग देवालय में पुरोहित के सामने अपने पापों को कबूलते हैं उन्हें भी सड़क पर यदि कोई चोर के नाम से पुकारता है तो वे पलट पड़ते हैं और उस पर मुकदमा चलाते हैं, अभियोग लगाते हैं और न्यायालय से दण्ड दिलवाते हैं। केवल ईश्वर के सामने, देवालय में उन्होंने परमात्मा के लोचनों में धूल फाँकने की चेष्टा की थी। केवल देवस्थान में उन्होंने अपने पाप स्वीकार कर अपने को पापी कहा था।
यह अद्भुत घटना भी प्रकट करती है कि, इस संसार में कितनी बेहूदगी है। यह बेढंगापन कैसे दूर होगा? वेदान्त कहता है, हम पापी नहीं हैं और हम पाप से बहुत परे हैं, इस विचार को निर्मूल कर सकने की हमारी असमर्थता और अपनी प्रकृतियों के निष्पाप होने में हमारे व्यावहारिक विश्वास की सर्वव्यापकता ही इस बात के जीते जागते प्रमाण तथा लक्षण हैं कि, वास्तविक आत्मा की प्रकृति निष्पाप है, सच्ची आत्मा, वास्तविक जीवात्मा स्वभाव से पापहीन, शुद्ध, पवित्र है। वास्तविक तत्व, वास्तविक आत्मा, निष्पाप, विशुद्ध, परम पुनीत है। यदि आप इस व्याख्या को नहीं मानते, तो इस प्रकट विरोध की किसी दूसरी तरह से व्याख्या कीजिये।
यह कैसी बात है कि, हरेक बुद्धि से जानता है कि वह संसार का सब धन नहीं सञ्चय कर सकता है, यथेच्छ
धनी नहीं हो सकता है? यह हम नित्य ही अपने मध्य में देखते हैं। जो लोग करोड़पती प्रसिद्ध हैं उनसे जाकर पूछिये कि, क्या वे संतुष्ट और तृप्त हैं? यदि वे जी खोलकर आपसे बात करेंगे तो कहेंगे कि, हम संतुष्ट नहीं हैं, तृप्त नहीं हैं। वे और अधिक, और अधिक, और अधिक धन चाहते हैं। उनके हृदय भी उतने ही स्वच्छ हैं जितने कि उनके, जिनके पास चार डालर (अमेरिकन रुपया) है। मन की शान्ति, संतोष, और विश्राम के लिये चार रुपये और चार अरब रुपये में कुछ भी अन्तर नहीं है। ये काम धन के नहीं हैं। यदि धनी होते हुए भी लोग संतुष्ट हैं, शान्त हैं, तो शान्ति का कारण दौलत नहीं है। किन्तु उस शान्ति का कारण अवश्य ही कुछ और है, अवश्य ही उसका कारण अनजाने वेदान्त का व्यवहार है और कुछ नहीं। उनकी शान्ति का कारण एक मात्र वही (वेदान्त का व्यवहार) हो सकता है, क्योंकि ऐश्वर्य में अपने स्वामी को प्रसन्न करने की कोई शक्ति नहीं है।
हमें निश्चय है कि दौलत के सञ्चय से, भौतिक सम्पत्ति से शान्ति की प्राप्ति नहीं होती, और फिर भी प्रत्येक मनुष्य अर्थ का भूखा है, अर्थ के लिये छटपटा रहा है। क्या यह विचित्र नियमविरुद्धता नहीं है? इसे समझाइये। कोई भी तत्वज्ञान या धर्म इसे पूरे तर्कों से या युक्तिपूर्वक नहीं समझाता। वेदान्त कहता है, यह देखो, सम्पत्ति के लिये, सब कुछ बटोरने और सञ्चय करने के लिये हाय हाय मची हुई है। यह क्यों? शरीर समस्त संसार का अधिकारी कदापि नहीं हो सकता। यदि सारा संसार भी आपके अधिकार में आजाय तो भी आपको संतोष न होगा, आप
चन्द्रलोक पर अधिकार होने की बात सोचने लगेंगे। सारे संसार के शासक सम्राटों का, रोम के सम्राटों का ख्याल कीजिये। उन नीरो-गण का ध्यान कीजिये। क्या आपके रोमांच नहीं होता? उन कैसरों और नीरो-गण की, उनकी मानसिक अवस्थाओं का विचार कीजिये। क्या वे सुखी थे? क्या वे संतुष्ट थे? उनमें से एक खाता है, वह खाने का शौकीन है, और हर घड़ी एक से एक स्वादिष्ट भोजन उसके लिये तैयार रहते हैं। वह एक पदार्थ जी भर के खाता है और अब उसके पेट में जगह नहीं है। उसके पास वमन करने की औषधियां हैं और वह अभी खाया हुआ पदार्थ क्षै कर देता है। अब दूसरे पदार्थ उसके पास लाये जाते हैं और वह फिर इच्छा भरके खाता है। यह सब केवल रुचि की तृप्ति के लिये। इस तरह वह समस्त दिन खाता और वमन करता रहता है। क्या वह तृप्त हुआ? क्या उसे शान्ति मिल गई? नाम मात्र को भी नहीं। हमें इसका निश्चय है। नहीं, सम्पूर्ण संसार के अधिकारी हम नहीं बन सकते, और यदि बन भी जाँय तो भी क्या परिणाम? सम्पूर्ण संसार को प्राप्त कर यदि आपने अपनी आत्मा खोदी तो क्या फल हुआ? ज्योतिषविद्या विषयक गणनाओं में स्थिर नक्षत्रों से हमारे व्यवहार के समय आपकी यह पृथ्वी एक बिन्दु मात्र होती है। यह पृथ्वी गणित शास्त्रीय परिमाणरहित बिन्दु मात्र समझी जाती है।
आपकी यह पृथ्वी, यह क्या है? इस पृथ्वी पर अधिकार होने से वास्तविक तृप्ति, वास्तविक शान्ति कैसे मिल सकती है? यद्यपि बौद्धिक पक्ष से हम यह जानते हैं तथापि इस ऐश्वर्य के पीछे बिना लपटे हम नहीं मान सकते।
कहता है, इसका कारण यही है कि, आपमें वास्तविक आत्मा, आप में वास्तविक मुझे वस्तुतः सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है। इसी कारण से तुम अपने को सारे संसार का मालिक देखना चाहते हो।
भारत में एक महाराज की कथा प्रचलित है, जो अपने पुत्र द्वारा कारागार में डाल दिया गया था। उसका पुत्र सम्पूर्ण राज्य का अधिकारी बनने का अभिलाषी था, इसी लिये वह कैदखाने में बन्द किया गया था। पुत्र ने अपनी धन की भूख बुझाने के लिये पिता को जेलखाने भेजा था। एक बार पिता ने अपने ही पुत्र को कुछ विद्यार्थी भेज देने को लिखा ताकि विद्यार्थियों को पढ़ाकर वह अपना मनोरञ्जन कर सके। इस पर पुत्र ने कहा, "इस मनुष्य, मेरे पिता की सुनते हो? वह इतने वर्षों तक साम्राज्य का शासन करता रहा है और अब भी हुकूमत करने की अपनी पुरानी आदत उससे नहीं छोड़ी जाती। वह अब भी विद्यार्थियों पर शासन करना चाहता है, कोई न कोई उसे शासन करने के लिये चाहिये। वह अपनी पुरानी आदतें नहीं त्याग सकता"।
यही बात है। हम अपनी पुरानी आदतें कैसे त्याग सकते हैं? पुराना अभ्यास हममें चिपटा रहता है। हम उसे दूर नहीं कर सकते। आपका वास्तविक आत्मा, सम्राट शाहजहां (इस शब्द का अर्थ है, 'सारे संसार का शासक', और इस प्रकार उस सम्राट के नाम शाहजहां का अर्थ है, सम्पूर्ण विश्व का सम्राट), विश्व ब्रह्माण्ड का सम्राट है। अब आपने सम्राट को एक बन्दीखाने में, अपने शरीर की अन्धी कोठरी में, अपने क्षुद्र स्वयं की हद्बन्दी में डाल रक्खा है। वह वास्तविक आत्मा, विश्व का वह सम्राट अपने पुराने
अभ्यासों को कैसे भूल सकता है? वह अपने स्वभाव को कैसे त्याग सकता है? किसी में भी अपनी प्रकृति को दूर कर देने की शक्ति नहीं है। इसी प्रकार आत्मा, सच्चा स्वयं, आपमें वास्तविक वास्तविकता अपने स्वभाव को कैसे छोड़ सकती है? आपने उसे कारागार में अवरुद्ध कर रक्खा है, किन्तु कारागार में रहती हुई भी वह सारे संसार पर अधिकार करना चाहती है, क्योंकि समग्र उसका था। वह अपनी पुरानी आदतों को नहीं छोड़ सकती। यदि आप चाहते हैं कि, आकांक्षा का यह भाव, यह लोभ दूर हो जाना चाहिये, यदि आपकी इच्छा है कि इस संसार के लोगों का वह लिप्सा-भाव जाता रहे, तो क्या आप उन्हें ऐसा करने का उपदेश दे सकते हैं? असम्भव।
कुछ कटु बातें कहने के लिये आप राम को क्षमा करें, परन्तु सत्य कहना ही होगा। राम सत्य का व्यक्तियों से अधिक आदर करता है। सत्य कहना ही चाहिये। बाइबिल में मैथ्यू के पांचवें अध्याय में, 'माउंट' पर 'सर्मन' (पहाड़ी पर उपदेश) में कहा गया है, "यदि आप के एक गाल पर कोई थप्पड़ जमावे तो दूसरा भी उसकी ओर कर दीजिये।" जब अब आपको पवित्र सिद्धान्तों का प्रचार करना हो तब अपने पास धन न रखिये, नंगे पैर, नंगे सिर जाना चाहिये। यदि न्यायालय में आप बुलाये जाँय तो जाने के पहले यह न सोचिये कि, आपको क्या कहना पड़ेगा। अपना मुँह खोलिये और वह भर जायगा। उद्यान के फूलों और बन के पक्षियों को देखिये। वे दूसरे दिन का कोई विचार नहीं करते, परन्तु कोकाबेलियों और गौरैयों को ऐसे वस्त्र पहनने को मिलते हैं कि सालोमन भी स्पर्धा करे। क्या आपकी बाइबिल में यह
बयान नहीं है कि "ऊँट चाहे सुई के नाके से निकल जाय, परन्तु धनी के लिये स्वर्ग के राज्य की प्राप्ति असम्भव है।" क्या आपने बाइबिल में नहीं पढ़ा है कि, "एक धनी आदमी ने आकर क्राइस्ट से दीक्षित होने की इच्छा प्रकट की और क्राइस्ट ने कहा, "तुम्हारे लिये एक ही उपाय है, दूसरा कोई नहीं। अपनी सब दौलत तुम त्याग दो। इतना करने ही से तुम्हें शान्ति मिल सकती है"। त्याग का यह भाव, यह अध्याय, जो कम से कम भारत में, और सारे संसार में, धर्म प्रचारकों (मिशनरियों) द्वारा बहुत पीछे रक्खा जाता है, यह अध्याय वेदान्त की और उन उपदेशों की शिक्षा देता है जिनका पालन आज भी भारतीय साधु करते हैं। उस पवित्र धर्म के नाम में, त्याग की उस शिक्षा के नाम में जरा उन लोगों पर ध्यान दीजिये जो भारत में आचार्य और धर्म-प्रचारकों की हैसियत से जाते हैं। राम को आप क्षमा करें यदि आप आत्मा को शरीर में समझते हैं। तो किसी को रुष्ट न होना चाहिये। किसी को ज़रा सा भी रुष्ट होने का अधिकार नहीं है, यदि उसके तुच्छ शरीर के विरुद्ध कुछ कहा जाता है।
क्या यह विस्मय की बात नहीं है कि, त्याग के नाम पर भारतवर्ष जानेवाले लोग गद्दियों पर नित्य आराम करें, शानदार महलों में रहें, और बारह चौदह सै रुपये महीने तनख्वाह लेकर राजसी ठाठ से रहते हुए कहें कि, हम त्याग के धर्म का प्रचार और उपदेश करते हैं? यह विचित्रता नहीं है? वेदान्त कहता है कि, मञ्च से किसी प्रकार की शिक्षा या प्रचार के द्वारा आय संचय और प्रत्येक वस्तु के अधिकारी बनने के विचार का दमन नहीं कर सकते। तुम
इसका दमन नहीं कर सकते। क्योंकि अपने वास्तविक आत्मा का सार्वभौम राजत्व, विश्वव्यापी सम्राटत्व तुम नाश नहीं कर सकते। किन्तु क्या यह रोग असाध्य है? क्या इस रोग की कोई औषधि, कोई प्रतिकार नहीं है? है, है। विभीषिका का कारण अज्ञान है। जिस अज्ञान के कारण आप आत्मा का गौरव शरीर पर आरोपित करते हैं और, दूसरी ओर, शरीर के क्लेश को आत्मा पर आरोपित करते हैं। इस अज्ञान को दूर करो और निर्धन होता हुआ भी मनुष्य तुम्हें समृद्धिशाली दिखाई पड़ेगा, और सम्पत्ति या भूमि से हीन होता हुआ भी मनुष्य तुम्हें सम्पूर्ण संसार का महाराज दिखाई पड़ेगा। जब तक अविद्या वर्तमान है तब तक आप में लोभ और आकांक्षा रहेगी ही। इसका कोई उपाय नहीं है, कोई इलाज नहीं है। इस ज्ञान को प्राप्त करो, इस दैवी बुद्धिमत्ता को प्राप्त करो, और आत्मा को बन्धनमुक्त करो, उसे कैदखाने से तुरन्त निकालो। उसे स्वाधीन करो। इसका आशय यह है कि, अपना सच्चा, नित्य, अनन्त आत्मा का, जो ईश्वर है, स्वामी है, विश्व का शासक है, अनुभव करो। यह अनुभव करो, तुम पवित्रों में पवित्र हो, महापवित्र हो, और लौकिक वसुधा या सांसारिक ऐश्वर्य के विचार को स्थान देना भी आप को पाप कर्म तथा अपमानजनक समझ पड़ेगा।
संसार के उन सब देशों को जीतने के बाद, जो उसे ज्ञात थे, जब सिकन्दर भारत गया तो उसने विलक्षण भारतवासियों को, जिनकी चर्चा उसने बहुत सुनी थीं, देखने की इच्छा प्रकट की। सिंधु नदी के तटपर किसी साधु या आचार्य के पास लोग उसे ले गये। साधु बालू पर
नंगे-सिर, नंगे-पैर, नंगे-बदन पड़ा हुआ है, और यह भी पता नहीं कि कल्ह भोजन उसे कहां से मिलेगा। इस दशा में पड़ा हुआ वह घाम खा रहा है। महान (आज़म) सिकन्दर उसके निकट अपने पूरे गौरव से युक्त खड़ा हुआ है, ईरान से उसने जो उज्ज्वलायमान रत्न और हीरे पाथे थे उनसे जटित उसका मुकुट चमचमा रहा है, प्रकाश फैला रहा है। उसके निकट था विवश साधु। कितना अन्तर है, कितना भेद है! एक ओर तो सारे संसार के वैभव का प्रतिनिधि-स्वरूप सिकन्दर का शरीर है, और दूसरी ओर सारी गरीबी का प्रतिनिधि महात्मा है। किन्तु उनकी सच्ची आत्माओं की गरीबी या अमीरी के यथार्थ ज्ञान के लिये केवल उनके मुखमण्डलों की ओर आपके देखने की ज़रूरत है।
भाइयों और बहनों! अपने घावों को छिपाने के हेतु तुम ऐश्वर्य के लिये हाय २ करते हो, उन्हें (घावों को) ढकने के लिये तुम पट्टी बांधते हो। यहां एक साधु है, जिसकी आत्मा धनाढ्य थी, यहां एक साधु है, जिसे अपनी आत्मा की अमीरी और गौरव का अनुभव हो गया था। उसके पास महान सिकन्दर खड़ा था, जो अपनी आन्तरिक दीनता को छिपाना चाहता था। महात्मा के प्रभापूर्ण, प्रसन्न, आनन्दमय चेहरे की ओर देखिये। महान सिकन्दर उसकी सूरत से चकित हो गया। वह उस पर आसक्त हो गया और उसने महात्मा से यूनान चलने को कहा। साधु हँसा, और उसने उत्तर दिया, "संसार मुझ में है। मैं संसार में नहीं आ सकता। विश्व मुझ में है, मैं विश्व में नहीं अवरुद्ध हो सकता। यूनान और रूम मुझ में है। सूर्य और
नक्षत्र मुझ में उदय और अस्त होते हैं।"
महान सिकन्दर इस प्रकार की भाषा का अभ्यासी न होने के कारण विस्मित हुआ। उसने कहा, "मैं तुम्हें धन दूँगा। सांसारिक सुखों से मैं तुम्हें डुबा दूँगा। सब तरह के पदार्थ, जिनकी लोग इच्छा करते हैं, सब तरह के पदार्थ, जो लोगों को मोहते और अपना दास बनाते हैं, बहुलता से तुम्हें प्राप्त होंगे। कृपया मेरे साथ यूनान चलिये।"
महात्मा हँसा, उसके उत्तर पर हँसा और बोला, "पैसा कोई हीरा या सूर्य या नक्षत्र नहीं है, जिसके प्रकाश का कारण मैं नहीं हूँ। सम्पूर्ण स्वर्गीय वस्तुओं के गौरव का कारण मैं हूँ। समस्त इच्छित वस्तुओं की मोहनी, चित्ताकर्षक शक्ति मुझ से है। पहले तो इन पदार्थों को गौरव और मनोहरता मैंने प्रदान की, और अब इन्हें ढूंढ़ता फिरूँ, सांसारिक धनिकों के द्वारों पर मांगता फिरूँ, सुख और आनन्द पाने के लिये पाशविक वृत्तियों और स्थूल शरीर के दरवाजों पर हाथ फैलाऊँ, यह मेरी मर्यादा के विरुद्ध है, मेरे लिये अपमानजनक है। यह मेरी शान के खिलाफ है। मैं इतना नीचा कभी नहीं झुक सकता। नहीं, मैं उनके द्वारों पर जाकर हाथ नहीं पसार सकता।"
इससे महान सिकन्दर आश्चर्य में पड़ गया। उसने अपनी तलवार खींचली और साधु का सिर उड़ा देना ही चाहता था। अब तो साधु ठठाकर हँसा और बोला, "ऐ सिकन्दर। तूने अपने जीवन में इतनी झूठी बात कभी नहीं कही, ऐसा घृणित मिथ्यालाप कभी नहीं किया। मेरा वध, मेरा वध, मेरा वध! वह तलवार कहां है जो मुझे मार सकती है? वह कौन सा अस्त्र है, जो मुझे घायल कर
सकता है? ऐसी कौन सी विपत्ति है, जो मेरी प्रसन्नता को नष्ट कर सकती है? वह कौन सा रंज है जो मेरे आनन्द में विघ्न डाल सकता है? नित्य, आज, कल्ह और सदा एक-रस, पवित्र और शुद्धों में शुद्ध, विश्व-ब्रह्माण्ड का प्रभु, मैं वही हूँ, मैं वही हूँ। ऐ सिकन्दर! जो शक्ति तुम्हारे हाथों को चलाती है वह मैं ही हूँ। तुम्हारे शरीर के मर जाने पर भी मैं, वही शक्ति, जो तुम्हारे हाथों को चलाता है, बना रहता हूँ। मैं ही वह शक्ति हूँ, जो तुम्हारी नसों को हरकत देती है।" सिकन्दर के हाथ से तलवार छूट पड़ी।
इससे हमें पता चला चलता है कि, त्याग के भाव का लोगों को अनुभव कराने का केवल एक ही उपाय है। लौकिक दृष्टि से हम तभी सर्वस्व त्यागने को तैयार होते हैं जब दूसरी दृष्टि से हम धनी हो जाते हैं। गरीबी में जो कुछ मिलता है वह टिकाऊ होता है। क्या आपने अशंकनीय वैज्ञानिक नियम नहीं सुना? बाहरी हानि, बाहरी त्याग की प्राप्ति तभी होती है जब भीतरी पूर्णता, आन्तरिक स्वामित्व या सम्राटत्व की प्राप्ति होती है। और कोई उपाय नहीं है, दूसरा उपाय नहीं है।
इस संसार में क्रोध का अस्तित्व क्यों है? हम नित्य बड़े २ उपदेश सुनते हैं कि, हमें क्रोध कभी न करना चाहिये, निर्बलता को कभी न पास फटकने देना चाहिये। इस आशय के उपदेश हम नित्य सुनते हैं, तथापि जब अवसर पड़ता है तब हम दब जाते हैं। ऐसा क्यों है? क्रोध, द्वेष, अपनी उन्नति, तथा अन्य पाप क्यों है? इन सब पापों की व्याख्या भी वेदान्त उसी प्रणाली और सिद्धान्त पर करता है। इन सब पापों पर ब्योरेवार विचार करने का शायद
समय नहीं है। यदि आप इस सम्बन्ध में अधिक जानना चाहते हैं तो राम के पास आइये, सब पापों का कारण और निदान भली भांति समझा दिया जायगा। परन्तु अब समय बहुत थोड़ा रह गया है, इस लिये राम सब का सारांश कहेगा। और आपका ध्यान इस तथ्य की ओर खींचा जाता है कि, इन सब पापों का कारण अविद्या है, जिसके कारण आप वास्तविक स्वयं और स्थूल शरीर तथा चित्त को एक कर देते हैं। इस अज्ञान को त्यागो और इन पापों का कहीं पता भी न होगा। यदि इन पापों को आप और किसी उपाय से दूर करना चाहेंगे तो आपका प्रयत्न अवश्य असफल होगा, क्योंकि कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं किया जा सकता। अज्ञान का निस्सन्देह नाश किया जा सकता है। अविद्या को हम हटा सकते हैं। जन्म लेने पर बच्चे इस संसार की अनेक बातों से अनभिज्ञ होते हैं। किन्तु हम देखते हैं कि, क्रमशः अनेक विषयों के सम्बन्ध में उनकी अज्ञानता घटती जाती है। केवल अज्ञान दूर किया जा सकता है।
इस दशा में, एक शक्ति ऐसी है जो आपको कुपित करती है, जो आपमें आकांक्षायें पैदा करती है, पाप करवाती है, और जिसकी प्रेरणा से आप धनसंचय करते हैं। आप अपने उपदेशों और शिक्षाओं से इस शक्ति को किसी तरह नहीं मिटा सकते। तुम दमन नहीं कर सकते, तुम इसे कदापि दबा नहीं सकते, क्योंकि शक्ति वहां है। वेदान्त कहता है, हम इस शक्ति को आत्मा बना सकते हैं। इसका दुरुपयोग न कीजिये। इससे उचित काम लीजिये। आप में जो सच्ची आत्मा है, जो बेजोड़ है, जो समग्र संसार की मालिक है, उसी की यह शक्ति है।
हरेक स्वाधीन होना चाहता है। और स्वाधीनता के भाव का, स्वाधीनता की आकांक्षा का प्रधान लक्षण, मूल रूप क्या है? वह है उस ऊँचाई पर उठना, जहां कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। सच्ची आत्मा चाहती है कि, आप उस अवस्था को प्राप्त करें जहां आपको पूरी स्वाधीनता है, अर्थात् जहां आपका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। जहाँ आपकी बराबरी का कोई नहीं है। आत्मा, सच्ची आत्मा का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। यदि सांसारिक स्वार्थपरता या आत्मोन्नति के विचार से आप पीछा छुटाना चाहते हैं तो आप असली शक्ति को हटा और नाश नहीं कर सकते। किसी भी शक्ति का नाश नहीं किया जा सकता। न नित्य आत्मा का ही विनाश किया जा सकता है। प्रत्येक वस्तु का आप दुरुपयोग कर सकते हैं और स्वर्ग को नरक बना सकते हैं।
एक पादरी, इंग्लैंड के इसाई पादरी की कहानी है। कुछ महापुरुषों, बड़े वैज्ञानिकों, डार्विन और हक्सले की मौतों का हाल उसने पढ़ा। वह अपने मन में विचारने लगा कि वे स्वर्ग गये या नरक। वह विचार में मग्न हो गया। उसने अपने मन में कहा, "इन लोगों ने कोई पाप नहीं किये, परन्तु इन्हें बाइबिल पर, ईसा पर विश्वास नहीं था, और यथार्थ में ये इसाई नहीं थे। वे अवश्य नरक गये होंगे।" परन्तु इस विचार पर वह दृढ़ न हो सका। वह सोचता है, "वे अच्छे लोग थे, संसार में उन्होंने कुछ अच्छा काम किया, वे नरक के पात्र नहीं थे। तो फिर वे कहां गये?" वह सो गया और एक अत्यन्त अद्भुत स्वप्न देखा। उसे स्वप्न हुआ कि, वह स्वयं मरा और श्रेष्ठ स्वर्ग में पहुंचाया गया। वहां उसे वे सभी दिखाई पड़े जिन्हें पाने की उसने
आशा की थी, जो इसाई भाई उसके गिर्जे में आते थे वे सब उसे दिखाई पड़े। उनसे उसने इन वैज्ञानिकों, हक्सले और डार्विन के सम्बन्ध में पूछा। स्वर्ग के द्वारपाल या किसी अन्य प्रबन्धक ने कहा, वे घोरतम नरक में हैं।
अब इस आचार्य (पादरी) ने पूछा, केवल उन्हें देखने और पवित्र बाइबिल की शिक्षा देने तथा यह बताने के लिये कि बाइबिल की आज्ञाओं पर विश्वास न करके उन्होंने घोर पाप किया, क्या क्षण भर के लिये मुझे घोरतम नरक में जाने की अनुमति मिल सकती है? कुछ वाद-विवाद के बाद प्रबन्धक ढीला पड़ा और आचार्य के लिये घोरतम नरक का प्रवेश-पत्र ला देना स्वीकार किया। आप को आश्चर्य होगा कि, स्वर्ग और नरक में भी आप अपनी रेलगाड़ियों में आते जाते हैं, पर बात यही है। उस मनुष्य का पालन-पोषण ऐसे स्थान में हुआ था जहां रेल-व्यापार और तार की भरमार थी। अतएव, यदि उसके विचारों में, उसके स्वप्नों में नरक और स्वर्ग से रेलों का मेलजोल हो गया तो कोई आश्चर्य नहीं।
अच्छा, इस पुरोहित को पहले दरजे का टिकट मिला। रेलगाड़ी चली ही जा रही है। बीच में कुछ स्टेशन थे, क्योंकि सर्वोच्च स्वर्ग से निम्नतम नरक को उसे जाना था। बीच के स्टेशनों पर वह ठहरा और देखा कि, ज्यों २ नीचे उतर रहा हूँ त्यों २ दशा बिगड़ती ही जाती है। जब वह उस नरक में पहुंचा जहां से सब से नीचा नरक सिर्फ दूसरा था तो वह अचेत हो गया। ऐसी घोर दुर्गन्ध आ रही थी कि, यद्यपि सारे रुमाल और अंगोछे उसने अपने नथुनों में लगा लिये फिर भी वह बेहोश हो ही गया, उसे मूर्छा आ गई। नीचे
इतने अधिक लोग हाय २ कर रहे थे, रो और चिल्ला रहे थे, दांत कटकटा रहे थे कि, वह सह न सका। इन दृश्यों के कारण वह अपनी आंखें खुली न रख सका। सब से नीचे का नरक देखने के अपने आग्रह के लिये वह पछताने लगा।
कुछ ही मिनटों में यात्रियों के सुभीते के लिये रेल के चौतरे (प्लैटफार्म) पर लोग चिल्ला रहे थे, "सब से नीचा नरक, घोरतम नरक"। स्टेशन की दीवालों पर खुदा हुआ था, "सब से नीचा नरक"। किन्तु पुरोहित विस्मित हुआ। उसने सब से पूछा, "यह घोरतम नरक कैसे हो सकता है? यह स्थान दिव्यतम स्वर्ग के लगभग होगा। नहीं, नहीं, यह नहीं हो सकता। यह सब से नीचा नरक नहीं है, यह सब से नीचा नरक नहीं है, यह स्वर्ग है"। रेल का रक्षक (गार्ड) या संचालक ने उससे कहा, "यही स्थान है," और एक आदमी ने आकर कहा, "महाशय, उतर पड़िये, आपका निर्दिष्ट स्थान यही है।"
वह बेचारा उतर तो पड़ा परन्तु बड़ा चकित हुआ। उसने आशा की थी कि, सब से नीचा नरक सब से नीचे से एक को छोड़कर पूर्ववाले से बुरा होगा। किन्तु यह तो उसके सर्वश्रेष्ठ स्वर्ग के प्रायः समान था। वह रेल के स्टेशन से बाहर निकला और सुन्दर बगीचे देखे, जिनमें सुगन्धित पुष्प खिले हुए थे, और शीतल मन्द-सुगन्ध पवनके झकोरे उसके लगने लगे। उसे एक लम्बा भद्रपुरुष मिला। उसका नाम उसने पूछा, और सोचा कि इस आदमी को तो पहले भी मैं देख चुका हूँ। वह आदमी उसके आगे जा रहा था और पुरोहित पीछे २। जब वह मनुष्य बोला तो पुरोहित प्रसन्न हुआ। दोनों ने हाथ मिलाये और पुरोहित ने उसे पहचान
लिया। यह कौन आदमी था? यह हक्सले था। उसने पूछा "यह कौन स्थान है, क्या यही निम्नतम स्वर्ग है?" हक्सले ने उत्तर दिया, "हां, यही है"। तब उसने कहा, "मैं तुम्हें उपदेश देने आया था, परन्तु पहले यह बताओ कि, यह बात क्या है कि, ऐसा चमत्कार मैं देख रहा हूँ"। हक्सले ने कहा, "महाभीषण अवस्थाविषयक तुम्हारा अनुमान अनुचित नहीं था। वास्तव में जब हम यहां आये थे तो यही विश्व-ब्रह्माण्ड का अति रौरव नरक था। इससे अधिक अवांछनीय की धारणा नहीं हो सकती थी"। और उसने कुछ स्थानों को दिखाकर कहा, "ये गन्दी खाइयां थीं"। दूसरे स्थल को दिखाकर उसने कहा, "वहां गरम बालू थी, और वहां बहुत बदबूदार गोबर था"। एक और स्थान को दिखा उसने कहा, "वहां जलता लोहा था"।
उसने कहा, "पहले हम अत्यन्त गन्दी खाइयों में डाल दिये गये, परन्तु वहां रहते हुए हम पास के जलते हुए लोहे पर पानी फेंकते रहे। और नालों के मैले पानी को किनारों पर पड़े जलते हुए लोहों पर उलचने का काम हम करते रहे। तब घोरतम नरक के प्रबन्धकों को हमें उस स्थान पर लेजाना पड़ा जहां जलता हुआ तरल तेल था। किन्तु जब तक वे हमें वहां ले जायें तब तक लोहे के बहुतेरे डंडे बिलकुल ठंढे हो गये थे, बहुतेरे डंडे हथियाये जा सकते थे, परन्तु फिर भी बहुत सा लोहा तरल, जलती हुई अग्निमय दशा में था। तब जो लोहा बुझ कर ठंढा होगया था उसकी सहायता से और उसे आग के सामने करके हम कुछ कलें और दूसरे औज़ार बनाने में समर्थ हुए।
"इसके बाद हमें उस तीसरे स्थान पर जाना था जहां
गोबर था। वहां हम पहुंचाये गये, और अपने औज़ारों, लोहे के फावड़ों और कलों से हमने खोदने का काम शुरु कर दिया। तदुपरान्त हम दूसरे प्रकार की ज़मीन पर पहुंचाये गये और वहां अपने तैयार औज़ारों और कलों की सहायता से कुछ चीज़ें हमने उस जमीन पर फेंक दीं। इन्होंने खाद का काम दिया और इस तरह धीरे २ हम इस नरक को सच्चा स्वर्ग बनाने में समर्थ हुए"।
बात यह है कि, घोरतम नरक में सब ऐसे पदार्थ वर्तमान थे, जो केवल अपने उचित स्थान पर रख दिये जाने ही से दिव्य स्वर्ग बना सकते थे। वेदान्त कहता है, यही बात है, तुम में परमेश्वर वर्तमान है, और तुम में निरर्थक शरीर मौजूद है, परन्तु तुमने वस्तुओं को स्थानभ्रष्ट कर दिया है। तुमने चीज़ों को ऊपर नीचे कर दिया है, तुमने उन्हें उलटा-पुलटा रख दिया है। तुमने गाड़ी को घोड़ी के आगे रख दिया है। और इस तरह इस संसार को तुम अपने लिये नरक बनाते हो। तुम्हें न तो कोई वस्तु नष्ट करना है, और न कोई चीज़ खोदना है। अपनी इस आकांक्षामय भावना को अथवा इस स्वार्थपरता को, या अपनी इस क्रोध-वृत्ति को, या अपने किसी दूसरे दूषण को, जो ठीक स्वर्ग या नरक के तुल्य है, तुम नष्ट नहीं कर सकते, परन्तु तुम पुनः रचना कर सकते हो। किसी शक्ति का विनाश नहीं किया जा सकता। परन्तु इस नरक को तुम फिर से सज सकते हो और इसे दिव्य स्वर्ग में बदल सकते हो।
वेदान्त कहता है, यही एक ऐसा जादू है जो कारागार के कपाट खोल सकता है, यही एक मात्र उपाय है संसार से सब संकट निकाल देने का—लटके हुए और मलिन चेहरों,
उदास तबीयतों से मामले नहीं सुधरते—सब पापों से बचने और किसी भी प्रलोभन में न फँसने का एक मात्र उपाय है सच्ची आत्मा का अनुभव (प्राप्त) करना । जब तक आप इस गौरव और महिमा को, जो आपको आकर्षित करती है, जो आप पर जादू डालती है, न नमस्कार कर लेंगे, तब तक आप पाशविक वृत्तियों को कदापि न रोक सकेंगे । जब आपको यह अनुभव हो जायगा, आप सब दुर्वृत्तियों से परे हो जाँयगे, और साथ ही बिलकुल स्वतंत्र, बिलकुल स्वाधीन हो जाँयगे, आनन्द से पूरी तरह परिपूर्ण हो जाँयगे । और यही स्वर्ग है ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!
(20 दिसम्बर 1902 को 'एकेडेमी आफ साइंसेज़' में इस व्याख्यान की दूसरी आवृत्ति की गई थी । दूसरी आवृत्ति के मार्के के वाक्य अगले पन्ने में "पाप के पूर्वलक्षण और निदान" शीर्षक से एक प्रकार से इस व्याख्यान के सिलसिले में हैं —सम्पादक ।)
पूर्ववर्ती व्याख्यान के सिलसिले में ।