श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सुमेरु दर्शन।

भाग 3 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 3 · अध्याय 8 / 11

सुमेरु दर्शन।

जिस समय राम यमुनोत्री की गुफाओं में रहता था तो चौबीस घंटे में एक बार मांड़ा (एक प्रकार का धान) और आलू खाता था। इससे अजीर्ण हो गया। लगातार तीन दिन तक सात २ बार शौच किया करनी पड़ी। इस अस्वस्थ अवस्था के चौथे दिन बड़े तड़के गरम झरने में स्नान करके राम सुमेरु यात्रा को निकला और केवल कोपीन के, शरीर पर न तो कोई वस्त्र था, न जूता न साफ़ा, न छाता। पांच हट्टे कट्टे पहाड़ी, खूब गरम कपड़े पहने हुए उसके साथ हो लिये। नारायण और तुलाराम नीचे घरसाली को भेज दिये गये थे। आरम्भ में हमें नन्ही सी यमुना को तीन चार बार पार करना पड़ा। फिर पैंतालीस गज़ ऊंचा और डेढ़ फर्लांग लंबा एक बर्फ़ का प्रचंड ढेर दिखलाई दिया, जिसने यमुना की घाटी को रोक रक्खा था। दोनों तरफ़ दो सीधी दीवारों की तरह पहाड़ खड़े थे। क्या इन्होंने आपस में सलाह करली है कि राम बादशाह को आगे न बढ़ने देंगे? कुछ परवाह नहीं। वज्र प्राय दृढ़ निश्चय के सामने सारी रुकावटों को भागना पड़ता है। पश्चिम की तरफ़ की पहाड़ी दीवार पर हम लोग चढ़ने लगे। कभी कभी हमें अपने पैर टेकने के लिये कुछ भी आधार न मिलता था। सुवासित परन्तु कंटीले गुलाब की झाड़ियों को पकड़ कर और 'चा' नामी पहाड़ी और कोमल घास के सहारे अपने अंगूठों को टिका कर हमें अपने शरीर को संभालना पड़ता था। किसी किसी

समय हममें और मृत्यु में केवल एक इंच का अन्तर रह जाता था। यदि हममें से किसी का पैर ज़रा भी फिसलता तो उसका यथायोग्य स्वागत करने के लिये एक बड़ा गहरा गढ़ा यमुना की घाटी में बर्फ़ का शीतल बिस्तर बिछाये हुए, क़ब्र की तरह मुंह खोले खड़ा था। नीचे से यमुना का कल- कल करता हुआ शब्द मन्द २ सुनाई देता था मानो ढकी हुई ढोलक से शोकगीत की ध्वनि आ रही है। इस तरह से पौन घंटे के लगभग हम को मौत के जबड़े में चलना पड़ा। सचमुच वह एक विलक्षण ही स्थिति थी। एक तरफ़ तो मृत्यु मुंह खोले खड़ी थी और दूसरी ओर प्रफुल्लित और उल्लसित करने वाली सुगंधयुक्त वायु थी। इस विकट और विचित्र साहस से हम अन्त में उस प्रचंड बर्फ़ के ढेर के पार पहुंचे। यहां से यमुना का साथ छूट गया और सारी मंडली ने एक सीधे पर्वत पर चढ़ाई की। न वहां कोई रास्ता था न पगडन्डी। एक खूब घने बन से होकर निकले। वहां पर हम वृक्ष की लकड़ियों को भी नहीं देख सकते थे। राम का देह कई जगह खुरच गई। इस शोक और बर्च वृक्षों के बन में एक घंटा दौड़धूप करने के पश्चात् हम लोग खुले मैदान में पहुंचे, जहां छोटे २ वृक्ष उगे हुये थे। हवा बदली हुई थी परन्तु मधुर सुवास से भरी हुई थी। इस चढ़ाई से पहाड़ी लोग हांपने लगे। राम के लिये भी वह एक अच्छा व्यायाम हो गया। अस्सी फुट या उससे भी अधिक उतार चढ़ाव चढ़ना पड़ा। ज़मीन बहुत करके फिसलनी थी। परन्तु चारों ओर के सुन्दर दृश्य, मनोहर पुष्प समूह और हरियाली की भरमार ने मार्ग की कठिनता को भुला दिया। यूरोपियन बागवान, कम्पनी बाग़ों को सुशोभित करने के लिये यहां से फूलों के बीज ले जाते हैं। और अंग्रेज़ी बोलने वाले अज्ञान

हिन्दुस्तानी तरुण इनको विलायती फूल कहते हैं। परन्तु अधिकांश फूलों में एक अद्भुत बात यह है कि जब यह किसी दूसरे स्थान पर लगाये जाते हैं, तो उनमें सुगन्ध नहीं रहती यद्यपि उनका रंग पूर्ववत् ही बना रहता है। यूरोपीय शिक्षा में चूर तरुण गण अपने यूरोपीय अध्या- पकों के लिखे हुए ग्रन्थों में वेदान्त का प्रतिध्वनि मात्र पढ़ कर यह समझ लेते हैं कि ये पाश्चात्य कल्पना है। और उन पर लट्टू हो जाते हैं परन्तु इन बेचारों को यह मालूम ही नहीं है कि वह कल्पनारूपी कुसुम जिन पर वे इतने मोहित हो गये हैं, उनकी ही मातृभूमि से ले जाकर वहां लगाये गये हैं। अन्तर केवल इतना है कि यूरोपीय अध्यापकों के हाथ में जाने से इन दिव्य फूलों में त्याग रूपी वैराग- सुगंध नहीं रहती। यूरोपियन लोगों के प्रतिपादित किये हुए वेदान्त में तत्वज्ञान का बाहरी रंग और आकार तो अवश्य रहता है परन्तु अनुभव रूपी सुगंध नहीं रहती। "अकसे गुल में रंग है गुल का व लेकिन बू नहीं" राम की अस्वस्थता का क्या हाल हुआ? राम उस दिन बिलकुल अच्छा हो गया। न कोई बीमारी थी, न थकावट थी, न और किसी प्रकार की शिकायत थी। उन पहाड़ियों में से कोई भी राम से आगे न जा सका। हम सब बराबर चढ़ते चले गये। और मंडली के प्रत्येक मनुष्य को खूब क्षुधा लगी इस समय हम लोग ऐसे प्रदेश में पहुंच गये थे जहां मेघ जलरूप वृष्टि कभी नहीं करता, परन्तु यथेच्छ बर्फ रूप से गिरता है। इस ऊंचे, ठंडे और रुक्ष पर्वत पर वनस्पति का नाम तक न था। हमारे ज्ञान के ज़रा पहले वहां पर नवीन बर्फ

की वृष्टि हुई थी। राम के बैठने के लिये एक बड़ी शिला पर एक लाल कम्बल बिछाया गया, और रात्रि के उबाले हुए आलू उसको खाने के लिये दिये गये। संगी साथियों ने अपने सादे भोजन को बड़ी कृतज्ञता से खाया। बर्फ़ के चमचमाते हुए और हलके हलके टुकड़ों ने खूब अच्छा (ठोस) पानी का काम दिया। भोजन करने के पश्चात् हम लोग फिर चल पड़े। धीरे धीरे हम लोग आगे और ऊपर चढ़ते ही गये। हम में से एक जवान थक कर गिर पड़ा। उसका दम फूल गया और उसके पैरों ने उसे आगे ले जाने से इनकार किया। वह कहने लगा कि मुझे चक्कर आता है। उस समय उसे वहीं छोड़ दिया। थोड़ी ही दूर आगे गये थे कि एक साथी और मूर्छित होकर गिर पड़ा और कहने लगा कि मेरा सिर बड़े ज़ोर से घूमता है। कुछ काल के लिये उसे भी वहीं छोड़ा और शेष सब लोग आगे बढ़े। थोड़ी देर के पश्चात् तीसरा साथी भी पीछे रह गया। उसकी नाक से खून निकलने लगा। दो बचे हुये साथियों को लेकर राम फिर आगे बढ़ा। तीन सुन्दर 'बरार' (पहाड़ी हरिण) हमारे सामने से जाते हुए दिखाई दिये। चौथा साथी किंचित् पीछे चलने लगा और अन्त में एक बर्फ से आच्छादित पत्थर पर गिर पड़ा। आस पास कहीं पतला (Fluid) पानी नहीं दिखाई देता था परन्तु जहां वह मनुष्य पड़ा था वहां पत्थरों के नीचे से बड़े ज़ोर की घड़घड़ाहट सुनाई देती थी। राम के साथ इस समय भी ब्राह्मण था। वह एक लाल कम्बल, एक दुर्बीन, एक हरा चश्मा और एक कुल्हाड़ी लिये हुए था। श्वासोच्छ्वास करने को वायु बहुत सूक्ष्म हो गई थी। जिस समय यहां पर दो गरुड़ पक्षी हमारे सिर के ऊपर उड़ते हुए निकल गये तो

हमें बड़ा आश्चर्य मालूम हुआ। अभी हमें एक गहरे नीले रंग की, पुरानी बर्फ़ से ढकी हुई, दुःखदायी शिला चढ़ना बाकी था। उस फिसलनी बर्फ़ में पांव टेकने का आधार मिलने के लिये मेरा साथी सीढ़ियां बनाने लगा। परन्तु वह पुरानी बर्फ़ इतनी कड़ी थी कि उस बेचारे की कुल्हाड़ी टूट गई। उसी समय हमें एक बर्फ़ के तूफ़ान ने आ घेरा। राम ने अपने साथी को यह कह कर धैर्य धराया कि 'इस बर्फ़ के गिरने से हमारा अहित होने की अपेक्षा हित होना ही ईश्वरीय उद्देश्य है'। और ऐसा ही हुआ भी। उस भयंकर बर्फ़ की वर्षा ने हमारे मार्ग को सुगम बना दिया। नोकदार जंगली लकड़ियों की सहायता से हम उस ढालू चट्टान पर बढ़ गये। और फिर जो कुछ हमने देखा उसका क्या कहना है। बस हमारे सामने एक खूब लम्बा चौड़ा सपाट और विस्तीर्ण मैदान बर्फ से ढका हुआ उपस्थित था, जिसे देख कर आंखें चौंधियाती थीं और चारों ओर रुपैहली बर्फ की शुभ्र ज्योति जगमगाती थी। आनन्द! आनन्द! क्या यह देदीप्यमान भासवत् दिव्य और अद्भुत क्षीरसागर तो नहीं है? राम के अद्भुत आनन्द की कुछ सीमा न रही। बस, कन्धे पर लाल कम्बल और पांव में कैनविस का जूता पहने हुए राम बड़े बेग से बर्फ पर दौड़ने लगा। इस समय राम के साथ कोई भी नहीं है। ("आख़िर के तई हंस अकेला ही सिधारा") लगभग तीन मील के वह बर्फ पर बड़े वेग से चला गया। कभी कभी पांव फस जाते थे और विशेष कष्ट उठाये विना बाहर नहीं निकलते थे। अन्त में एक बर्फ के ढेर पर वह लाल कम्बल बिछाया और संसार के गड़बड़ व उत्पात से मुक्त, जनसमूह के कोलाहल और क्षोभ से दूर 'अलिप्त'

अकेला, राम उस पर विराजमान हुआ। वहां पर बिलकुल सन्नाटा था। पूर्ण शांति का वहां पर साम्राज्य था। घनघोर अनाहद ध्वनि के अतिरिक्त वहां पर कोई शब्द नहीं सुनाई देता था। धन्य है वह शान्ति और एकान्त! मेघपटल कुछ कुछ खुल चले। महीन बादलों से छन छन कर सूर्य की किरणें उस दृश्य पर पड़ने लगीं। और रुपैहली बर्फ अब तप्त सुवर्ण सी दिखाई देने लगी। इस स्थान का जो सुमेरु या हेमाद्रि नाम है वह बिलकुल यथार्थ है। ए सांसारिक मनुष्यो! यह अच्छी तरह समझ लो कि तरुण युवतियों के कपोलों की आरक्त छटा, या दिव्य रत्नों और सुन्दर आभूषणों अथवा बड़े बड़े प्रासादों में सुमेरु की कल्पनातीत रमणीयता और मोहकता का यत्किंचित् अंश भी नहीं मिल सकता। और जब तुम अपने आत्मस्वरूप का अनुभव कर लोगे तो ऐसे २ असंख्य सुमेरु तुम्हें अपनी आप में दिखाई देंगे। सम्पूर्ण सृष्टि तुम्हारी सेवा करेगी। मेघों से लेकर एक साधारण कंकड़ तक, श्याम रंग आकाश से लेकर हरी भरी पृथ्वी पर्यन्त, और गरुड़ से लेकर छछू- न्दर तक, जितने जीव संसार में हैं सब तुम्हारी आज्ञा मानने को तत्पर रहेंगे। कोई देवता भी तुम्हारी आज्ञा का उल्लंघन न कर सकेगा। ए नभ! अब तू निर्मल हो जा। ए भारतवर्ष पर अज्ञान के आच्छादित मेघो! दूर हो जाओ। इस पवित्र भूमि पर अब अधिक मत मंडलाओ। ए हिमालय की बर्फ! तुम्हारा स्वामी तुम्हें यह आज्ञा देता है कि तुम अपनी पवित्रता और सत्यनिष्ठा (ज्ञाननिष्ठा) को क़ायम रक्खो। द्वैतभाव से क़लु- षित जल कभी इस क्षेत्र-मैदान में मत भेजो।

अस्तु, मेघ विदीर्ण हो गये। सारी बर्फ ने भगवा रंग धारण कर लिया। क्या पर्वतों ने सन्यास ग्रहण कर लिया है? सचमुच उन्होंने राम के सेवकों की वर्दी पहन ली है। क्या ही अद्भुत बात है? पर्वतों की बर्फ राम का सन्देशा ले जाने के लिये बड़ी आतुरता से उसका मुंह निहार रही है। आ हा हा! आनन्द! वाह! आनन्द महा है। दिव्य गोल संसार दृगों को लुभा रहा है॥ जग से इसका भेद नौगुना छिपा हुआ है। यद्यपि हो असमर्थ दार्शनिक जन तो क्या है॥ बतलाने में भेद श्रमाकुल इसके मन का। (बतलाता हूं तुम्हें एक गुर सच्चेपन का)॥ मिलकर धड़के हृदय प्रकृति का और तुम्हारा। उदय अस्त पर्यन्त तुरत खुल जावे सारा॥ एक अमेरिकन साधू का कथन है कि सृष्टि एक कल्पना का अवतार अर्थात् रूपान्तर है। और जिस तरह बर्फ़ से भाप और पानी बन जाते हैं उसी प्रकार सृष्टि भी कल्पना रूप हो जाती है। यह दृश्य संसार मन का स्थूल रूप है। परन्तु यह चंचल स्थूल रूप पतला होते २ पुनः स्वतंत्र कल्पना में विसर्जित हो जाता है। और इसी से सेंद्रिय अथवा निरिंद्रिय प्राकृतिक पदार्थों का मन पर अधिक और उत्तम प्रभाव पड़ता है। बद्ध, संकुचित और देहधारी मनुष्य विदेह मनुष्य से वार्तालाप करता है! प्रश्नः—यदि यह जगत् मेरी ही कल्पना है (अर्थात् मन या कल्पना का स्थूल रूप है) तो बाह्य पदार्थ मेरी इच्छा के अनुसार क्यों नहीं बदल जाते? उत्तरः—गौड़पादाचार्य कहते हैं:—स्वप्न सृष्टि में केवल कल्पना ही के दो पक्ष हो जाते हैं। एक पक्ष में तो बाह्य जड़

पदार्थ होते हैं और दूसरे पक्ष में अन्तःकरण की वृत्ति, इच्छा इत्यादि। ऐसी स्थिति में अन्तःकरण के विचार अपने अधीन और परिवर्त्तनशील होते हैं। और जब उनकी तुलना जड़ पदार्थों से की जाती है तो मिथ्या प्रतीत होते हैं। परन्तु बाह्य पदार्थ स्वतंत्र, शाश्वत् और सापेक्षित रीति से स्वयंसिद्ध मालूम होते हैं। परन्तु वस्तुतः जाग्रत मनुष्य की दृष्टि से स्वप्न के सत्य और असत्य, बाह्य और आन्तरिक, दोनों ही भाग केवल काल्पनिक है। वे हमारी कल्पना हैं और हमने ही उनको उत्पन्न किया है। इसके अतिरिक्त जाग्रत अवस्था में मनुष्य स्थूल प्रत्यक्ष जड़ पदार्थ में और अप्रत्यक्ष कल्पना में स्पष्ट भेद कर सकते हैं। परन्तु स्वात्मानुभवी मनुष्य को सम्पूर्ण स्थूल पदार्थ और परिवर्त्तनशील कल्पना दोनों ही वस्तुतः स्वप्नवत् मिथ्या प्रतीत होते हैं। और जब तक वे पदार्थ भासित होते रहते हैं, वे केवल उसकी कल्पना स्वरूप से ही उस मनुष्य पर अपना प्रभाव डाल सकते हैं। और यदि वे उसकी इच्छानुसार परिवर्तित नहीं होते तो भी वे हैं तो उसी की कल्पना। तुम्हारे बालों की बाढ़ का या तुम्हारे मुखारविन्द की प्रफुल्लता का कारण यद्यपि तुम्हारी बुद्धि नहीं बता सकती तो भी केश और चेहरे को तुम अपना ही समझते हो। उसी तरह से जीवनमुक्त अपने ही आत्मा को सब का आत्मा जानकर प्रत्येक पदार्थ को अपना ही स्वरूप समझता है। वह साक्षात् प्रेम की मूर्ति बन जाता है। और जब उसकी "एकमेवाद्वितीयम्" की ब्रह्मभावना सिद्ध हो जाती है, तब उसके लिये दृश्य और काल्पनिक भासमान् भेद दोनों आप ही आप मिट जाते हैं। ॐ! ॐ!! ॐ!!!