पाप के पूर्वलक्षण और निदान ।
[ता॰ 20-12-1902 को एकेडेमी आफ साइंसेज़-अमेरिका में दिया हुआ स्वामी राम का व्याख्यान]
गंदली गढ़ैया में रहनेवाली चिड़िया के पंखों को छूने पर आपको मालूम होगा कि, वे सूखे हैं, पानी की रंगत या कीचड़ का उन पर नाम मात्र का भी असर नहीं पड़ा है, वे सूखे हैं । वे भीगते नहीं । वेदान्त कहता है, "ऐ मनुष्य ! इसी तरह तुझ में भी ऐसी कोई वस्तु है, जो निर्मल है जो शरीर के अपराधों, पापों, और दुर्बलताओं से दूषित नहीं होती" । इस दुष्टतामय और आलस्यपूर्ण संसार में यह (वस्तु) विशुद्ध रहती है । कौनसी गलती की जाती है ? वास्तव में पापहीनता सचमुच स्वयं, आत्मा का गुण है, परन्तु भूल से व्यवहार में यह गुण शरीर पर आरोपित किया जाता है । शरीर और चित्त को शुद्ध समझने के इस भाव की उत्पत्ति कहां से हुई ? लोगों के दिलों में इसे किसने जमाया ? किसी दूसरे ने नहीं किसी दूसरे ने नहीं । कोई शैतान, कोई बाहरी पिशाच इसे आपके दिलों में जमाने नहीं आया । यह तुम्हारे भीतर है । कारण स्वयं कार्य में ही होना चाहिये । वे दिन बीत गये जब लोग अद्भुत घटना के कारण अपने से बाहर ढूंढ़ते थे । किसी मनुष्य के गिर पड़ने पर, कारण प्रेत बताया जाता था । गिरने का कोई कारण मनुष्य से बाहर बतलाया जाता था । वे दिन गुज़र गये । विज्ञान और तत्त्व-विद्या को ऐसी व्या-
ख्यायें मान्य नहीं हैं । स्वयं कार्य में हमें कारण ढूंढ़ना चाहिये । हम जानते हैं कि, शरीर पापमय है, सदा अपराधी है, फिर भी हम अपने को निष्पाप समझते हैं । इस अद्भुत व्यापार की व्याख्या कैसे की जाती है ? वेदान्त कहता है, "किसी बाहरी शैतान का आश्रय लेकर इसे मत समझो, बाहरी पिशाचों पर इसे आरोपित कर इसकी व्याख्या मत करो । नहीं, नहीं । कारण तुम्हारे अन्तर्गत है । शुद्धों में महाशुद्ध तुम्हारे भीतर है, निष्पाप भी तुम्हारे भीतर है । आत्मा जो अपने अस्तित्व का बोध कराती ही है, जो नष्ट नहीं की जा सकती, त्यागी नहीं जा सकती, दूर नहीं की जा सकती । वह तुम में है । शरीर कितना ही अपराधी, कितना ही पापमय क्यों न हो, वास्तविक आत्मा की निष्पापता तो वहां है ही । वह अपना बोध करावे ही गी । वह वहां है, उसका विनाश नहीं किया जा सकता" ।
अब हम पापों, पाप कहे जानेवाले विविध कार्यों की ओर आते हैं ।
खुशामद:—यह पहले आती है । इसे घोर पाप तो नहीं समझा जाता, परन्तु यह है सार्वभौम ।
यह क्या बात है कि, तुच्छ से तुच्छ कीड़े से लगा कर ईश्वर तक को खुशामद पसन्द है ? यह क्या बात है कि, प्रत्येक प्राणी खुशामद का गुलाम है, स्तुति, लल्लो-चप्पो, और हाँजी २ चाहता है ? प्रत्येक चाहता है कि, वह बहुत कुछ समझा जावे, ऐसा क्यों है ?
कुत्ते भी जब तुम उन्हें चुमकारते और थपथपाते हो बड़े ही प्रसन्न होते हैं । उन्हें भी खुशामद पसन्द है । घोड़ों को चाटुकारिता प्रिय है । घोड़े का मालिक आकर जब उसे
चुमकारता तथा पीठ ठोंकता है, तो वह अपने कान खड़े कर लेता और उत्साह से भर उठता है ।
भारत में कुछ राजा शिकार में कुत्तों के बदले चीतों से काम लेते हैं और शिकार को तीन छलांगों में पकड़ना चीते का स्वभाव है । यदि उसने शिकार (तीन छलांगों में) पकड़ लिया तो बहुत अच्छा, नहीं तो चीता हताश होकर बैठ जाता है । ऐसे अवसरों पर राजा-महाराजा आकर चीते को थपथपाते और चुमकारते हैं और तब फिर उसमें शक्ति भर जाती है । हम देखते हैं कि, चीतों को भी खुशामद पसन्द है । ऐसे आदमी को ले लीजिये जो किसी काम का नहीं, व्यर्थ है । उसके पास जाइये और हां में हां मिला कर उसका दिल बढ़ाइये, उसकी खुशामद कीजिये । ओः ! उसका चेहरा प्रसन्नता से चमचमा उठता है । तुरन्त ही आपको उसके गालों पर लालिमा दिखाई पड़ेगी ।
जिन देशों में लोग देवताओं की पूजा करते हैं, वहां हम देखते हैं कि वे (देवगण) भी चाटुकारिता से तुष्ट होते हैं । और कुछ एकेश्वरवादियों की प्रार्थनाओं का क्या अर्थ है ? उनकी स्तुतियां उनके आवाहन-मंत्र क्या हैं ? उनकी परीक्षा कीजिये । निःस्वार्थभाव से, पक्षपात-बुद्धि को त्याग कर उनकी परीक्षा कीजिये, आप देखेंगे कि खुशामद के सिवाय वे कुछ नहीं हैं । यह क्या बात है कि, चाटुकारिता सर्वभौम है । प्रत्येक प्राणी खुशामद पसन्द करता है, परन्तु साथ ही एक भी मनुष्य उस तरह की खुशामद का पात्र नहीं है, जो उसे खुश करती है । एक भी मनुष्य उन अनावश्यक सराहनाओं की योग्यता नहीं रखता जो उसके प्रशंसक उसकी करते हैं । वेदान्त यह कह कर इसकी व्याख्या करता है कि, प्रत्येक व्यक्ति में,
प्रत्येक मनुष्य में वास्तविक स्वयं, सच्ची आत्मा है, जो वस्तुतः श्रेष्ठों में सर्वश्रेष्ठ है, उच्चों में सर्वोच्च है । सचमुच तुम में कोई ऐसी वस्तु है, जो सब से उच्च है और जो अपने अस्तित्व का बोध कराती है । खुशामदी जब हमारी प्रशंसा और स्तुतियां करने लगता है तब हम फूल उठते हैं, प्रसन्न हो जाते हैं । क्यों ? इन कथनों की सत्यता इसका कारण नहीं है । परन्तु वेदान्त कहता है कि, वास्तविक कारण हमारे वास्तविक आत्मा में है दृश्यों के पीछे कोई चीज़, कोई प्रबल शक्ति, कोई वस्तु कठिन और अक्षय, सर्वश्रेष्ठ, सर्वोच्च है, जो आपका वास्तविक आत्मा और सब तरह की खुशामद तथा प्रशंसाओं के योग्य है । और कोई भी खुशामद, कोई भी स्तुति, कोई भी उत्कर्ष वास्तविक आत्मा के योग्य नहीं हो सकता । किन्तु इससे कोई यह नतीजा न निकाले कि, राम खुशामद को नीतिसंगत बतला रहा है । नहीं । वास्तविक आत्मा की खुशामद, प्रशंसा, और गौरव-गान होना चाहिये, न कि शरीर की । तुच्छ स्वयं को इनका अधिकारी न समझना चाहिये । "जो पदार्थ सीज़र के हैं वे सीज़र को दो और ईश्वर की वस्तुयें ईश्वर को" । खुशामद में पाप यही है कि, सीज़र की चीज़ें ईश्वर को और ईश्वर के पदार्थ सीज़र को देने की भूल की जाती है । हमारे खुशामद के दास होने की पापात्मकता इसी उलट-पुलट दशा में है । इसी में पापमयता है । हां, गाड़ी घोड़े के आगे रक्खी जाती है । यदि आप स्वयं का अनुभव कर सर्वश्रेष्ठ और सर्वोच्च से अपनी एकता का बोध करें, और उसे अपनी आत्मा समझें, शरीर से, चित्त से ऊपर उठें, तो वास्तव में आप श्रेष्ठों में सर्वश्रेष्ठ हैं, उच्चों में सर्वोच्च हैं, आप ही अपने आदर्श हैं, अपने ईश्वर आप ही हैं । इसका अनुभव कीजिये और आप
स्वतंत्र हैं । किन्तु आत्मा, वास्तविक स्वयं का गौरव शरीर को देने में और शरीर के लिये उत्कर्ष तथा खुशामद चाहने में भूल की जाती है । यही भूल है । यह क्या बात है कि, इस संसार में हरेक मनुष्य और हरेक पशु भी दर्प या खुशामद से कलुषित है ? यह क्या बात है कि अहंकार और अभिमान सर्वव्यापी हैं ?
एक सज्जन ने आकर राम से कहा, "देखिये, देखिये ! हमारा धर्म सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसके उपासकों की, उसे माननेवाले लोगों की संख्या सब से बड़ी है । मानवजाति का अधिकतम भाग हमारे धर्म का है, इस लिये अवश्य ही वह सब धर्मों से अच्छा है" राम ने कहा, "भइया, भइया, समझ बूझ कर बात कहो । तुम शैतान में विश्वास करते हो ?" उसने कहा, "हां" । "तो कृपया बतलाइये कि, शैतान के धर्म के अनुयायी अधिक हैं या आपके धर्म के ? यदि बहु-संख्या पर सत्य का निर्णय होना है, तो शैतान को सब पर श्रेष्ठता प्राप्त है" ।
हम कहते हैं कि, अभिमान या अहंकार ने, आप इसे शैतान का एक पहलू कह सकते हैं, इस संसार के प्रत्येक प्राणी पर दृढ़ अधिकार कर लिया है ! यह क्या बात है ? साथ ही हम यह भी जानते हैं कि शरीर किसी प्रकार के गर्व के योग्य नहीं है, शरीर को अभिमान करने का श्रेष्ठता का भाव दिखाने का कोई अधिकार नहीं है । हरेक जानता है कि शरीर किसी प्रकार के अहंकार अभिमान की पात्रता या योग्यता नहीं रखता, परन्तु हरेक में यह वर्तमान है । ऐसा क्यों है ? यह सार्वभौम विलक्षणता कहां से आई ? यह सार्वभौम विरोधाभास, यह सार्वभौम विरोध कहां से
आया ? यह अवश्य तुम्हारे भीतर से आया होगा । कारण ढूंढ़ने दूर नहीं जाना है । तुम्हारे भीतर श्रेष्ठों में सर्वश्रेष्ठ अर्थात् आपका वास्तविक स्वयं है । तुम्हें उसे जानना और अनुभव करना पड़ेगा, और जब तुम सच्चे स्वयं, वास्तविक आत्मा को जान और अनुभव कर लोगे तब इस तुच्छ शरीर के लिये प्रशंसा पाने को तुम कभी न झुकोगे । तब फिर इस शुद्ध शरीर के लिये अहंकार या गर्व प्राप्त करने को तुम कभी न झुकोगे । यदि तुम सच्चे स्वयं का अनुभव कर लो, यदि तुम स्वयं अपने हृदय का उद्धार करलो, तो तुम्हीं अपने उद्धारक हो । यदि तुम अपने अन्दर ईश्वर का अनुभव करलो, तो इस तुच्छ शरीर के लिये प्रशंसायें सुनना, अपने शरीर की स्तुतियां सुनना तुम्हें अपने आपको तुच्छ और नीच बनानेवाला कार्य समझ पड़ेगा । तब तुम शारीरिक अभिमान या स्वार्थपूर्ण अहंकार से ऊपर उठ जाओगे । शारीरिक अभिमान या स्वार्थमूलक अभिमान से ऊपर उठने का यही उपाय है ।
अन्तर्गत सच्ची आत्मा, सच्चा स्वयं श्रेष्ठों में श्रेष्ठ, उच्चों में उच्च, देवों में परमदेव होता हुआ अपने स्वभाव को कैसे छोड़ सकता है ? यह आत्मा अपने को पतित कैसे बना सकती है, अपने को दीन, भाग्यहीन, कीड़ा या मकोड़ा कैसे मान सकती है ? इतनी गहरी अज्ञानता में वह अपने को कैसे गिरा सकती है ? वह अपनी प्रकृति नहीं त्याग सकती है ? और अहंकार या अभिमान के सार्वभौम होने का यही कारण है किन्तु इस व्याख्या से अहंकार या अभिमान नीतिसंगत नहीं सिद्ध होता । शरीर के लिये अभिमान, अहंकार अयुक्त है ।
हम जानते हैं कि पृथ्वी चलती है और, पृथ्वी के सम्बन्ध में, सूर्य स्थिर है । सब जानते हैं कि सूर्य नहीं चलता और पृथ्वी चक्कर करती है । किन्तु हम एक भूल करते हैं, भ्रम में पड़ जाते हैं । पृथ्वी की गति हम सूर्य को प्रदान करते हैं और सूर्य की अचलता पृथ्वी को । इसी तरह की भूल वे लोग करते हैं, जो अभिमान के भूखे हैं, जो अहंकार के अधीन हैं । यहां भी उसी तरह की भूल होती है । यहां आत्मा, वास्तविक सूर्य, प्रकाशों का प्रकाश है, जो अचल है, जो वास्तव में सम्पूर्ण गौरव का मूल है, और शरीर पृथ्वी के तुल्य है, जो हर घड़ी बदलती रहती है और किसी तरह की प्रशंसा की पात्र नहीं, किसी प्रकार के गौरव की योग्यता से रहित है, परन्तु आत्मा का गौरव शरीर को प्रदान करने में और शरीर की निरर्थकता आत्मा को, वास्तविक स्वयं को प्रदान करने की भूल करते हैं । यह भूल, अविद्या का यह प्रकार इस तुच्छ शरीर के लिये उत्कर्ष चाहने का कारण है । अच्छा, यदि इस अज्ञान को शैतान कह सकते हैं, यदि शैतान का अनुवाद अज्ञान किया जा सकता है, तो हम कह सकते हैं कि, इस रीति से शैतान आकर चीज़ों को अस्तव्यस्त कर देता है, आत्मा का गौरव शरीर को और शरीर की असारता आत्मा को प्रदान करता है । इस अविद्या को दूर करो और तुमने अभिमान या अहंकार को नष्ट कर दिया ।
यह क्या बात है कि, लोलुपता, उत्कर्ष, या लालच सार्वभौम हैं ? पशुओं में लोलुपता है, मनुष्यों में है, नारियों में है, प्रत्येक में है । यह क्या बात है कि, लोलुपता, लालच, या उत्कर्ष सार्वभौम हैं ? हरेक चाहता है कि उसे सब तरह की वस्तुयें प्राप्त हो जाँय । हरेक अपने शरीर के इर्दगिर्द पदार्थों
का संग्रह करना चाहता है, और इस लोलुपता की तृप्ति कभी नहीं होती । जितना ही अधिक तुम पाते हो उतना ही अधिक लोभ की लौ भभकती है, उतनी ही उसमें आहुति पड़ती है । तुम सम्राट बन जाते हो, परन्तु फिर भी लोभ वर्तमान है और वह सम्राटोपयुक्त है । तुम गरीब आदमी हो और तुम्हारा लोभ भी गरीब है । यह सार्वभौम क्यों है ? गिर्जों में, देवालयों में, मसजिदों में, सर्वत्र उपदेशक बड़े २ उपदेश देते और कहते हैं, "भाइयो ! लोभ छोड़ो, लोभ छोड़ो, लोभ छोड़ो" । लोभ का गला घोंटने में वे अपनी पूरी शक्ति लगा देते हैं, वे उसे हटाना, निर्मूल करना चाहते हैं, परन्तु उनके सम्पूर्ण निवारण-उपदेश व्यर्थ जाते हैं और वह बना रहता है । यह क्यों ? वह रोका नहीं जा सकता, उसका गला नहीं दबाया जा सकता, वह वर्तमान है । इसे समझाओ । लोभ के रोग को विनष्ट करने की इच्छा करने के पूर्व हमें उसका कारण जान लेना चाहिये । जब तुम रोग का कारण न बतलाओगे तब तक उसे अच्छा करने की आशा तुमसे नहीं की जा सकती । हमें उसका कारण जान लेना चाहिये । शैतान तुम्हारे हृदय में उसे रखता है, यह कहना अवैज्ञानिक है, अतार्किक है । तर्कशास्त्र के सब नियमों के यह विरुद्ध है । इससे काम नहीं चलेगा । यदि तुम तथ्य की कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं कर सकते तो यह पौराणिक व्याख्या क्यों ? यह सार्वभौम क्यों है ? वेदान्त इसे यह कह कर समझाता है कि, मनुष्य में वास्तविकता, सच्चा स्वयं, प्रकृत आत्मा है और वह अपना निरूपण करती है । वह कुचली नहीं जा सकती । कहा जाता है कि, कोई भी शक्ति नष्ट नहीं की जा सकती, कोई भी बल छिन्न-भिन्न नहीं किया जा सकता । पौरुष के संरक्षण, पदार्थ की अनश्वरता,
शक्ति के आग्रह के नियम को हम सुनते हैं । ये सब बातें हमें सुनने को मिलती हैं, और यहां वेदान्त कहता है, "ऐ मंत्रियो, ऐ इसाइयो, हिन्दुओ, और मुसलमानो, तुम इस शक्ति को, इस बल को, जो लोभ के रूप में प्रकट होता है, कुचल नहीं सकते" । तुम इसका दमन नहीं कर सकते । अनादि काल से सब प्रकार के धर्म लोभ, कृपणता, उत्कर्ष के विरुद्ध उपदेश देते चले आ रहे हैं परन्तु तुम्हारे वेद, बाइबिल, और कुरान संसार को कुछ भी न सुधार सके । लोभ वर्तमान है । शक्ति नष्ट नहीं की जा सकती परन्तु तुम उसका सदुपयोग कर सकते हो । वेदान्त कहता है, "ऐ संसारी मनुष्य, तू एक गलती करता है" । सब से महान शब्द, तीन अक्षरों का शब्द जी G-ओ O-डी D (गाड = ईश्वर) ले लीजिये और उसे व्यतिक्रम से पढ़िये । वह क्या हो जाता है ? डी D-ओ O-जी G (डाग = कुत्ता) । इस प्रकार तुम शुद्धों में शुद्ध का अनर्थ कर रहे हो, तुममें जो शुद्ध ईश्वर है उसे कुछ और ही समझ रहे हो, उसे तुम उलटी तरफ से पढ़ते हो और इस तरह अपने को सचमुच कुत्ता बनाते हो, यद्यपि वास्तव में तुम विशुद्धों में विशुद्ध, विशुद्ध ईश्वर हो । भूल से, आत्मा का गौरव शरीर पर और शरीर की तुच्छता आत्मा में आरोपित करने के अज्ञान के कारण, इस भूल के कारण तुम लोभ के शिकार बनते हो । इस भूल को निर्मूल करदो और तुम अमर परमात्मा हो । तुममें निहित सच्चे स्वयं का उद्धार करो, सच्चे स्वयं पर दृढ़ता से खड़े हो, और अपने को देवों का परमदेव, विशुद्धों में विशुद्ध, विश्व का स्वामी, प्रभुओं का प्रभु अनुभव करो, फिर इन बाहरी वस्तुओं को दृढ़ कर इस शरीर के इर्दगिर्द जमा करना तुम्हारे लिये असम्भव हो जायगा ।
अब हम प्रीति या शोक के व्यापार पर आते हैं । प्रीति का कारण क्या है ? इसका अर्थ यह है कि, इस व्याधि से पीड़ित मनुष्य अपने आसपास की वस्तुओं में परिवर्त्तन नहीं चाहता । किसी अपने प्रिय की मृत्यु से कोई मनुष्य चिन्ता और शोक से परिपूर्ण है । उसके शोक और क्षोभ से क्या सूचित होता है ? इससे क्या सिद्ध होता है ? जब हम बुद्धि से जानते हैं कि, इस संसार में प्रत्येक वस्तु परिवर्त्तनशील है, बहाव की दशा में है, तो क्या हम ज्यों की त्यों दशा बनी रहने की आशा कर सकते हैं, क्या हम अपने प्यारों को सदा अपने पास रखने की आशा कर सकते हैं ? और फिर भी हम इच्छा यही करते हैं कि कोई परिवर्त्तन न हो । यह क्यों ? वेदान्त कहता है, "ऐ मनुष्य, तुममें कोई ऐसी वस्तु है जो वास्तव में निर्विकार है, जो कल, आज, और सदा एकसा है, परन्तु भूल (अज्ञान) से सच्चे स्वयं की नित्यता शरीर की अवस्थाओं को प्रदान की जाती है" । यही इसका कारण है । अज्ञान को दूर करो और सांसारिक अनुरागों से तुम दूर खड़े हो ।
आलस्य या प्रमाद का क्या कारण है ? वेदान्त के अनुसार प्रमाद या आलस्य के सर्वव्यापकता का कारण यह है कि प्रत्येक और सकल के अन्तर्गत सच्चा आत्मा पूर्ण विश्राम तथा शान्ति है, और अनन्त होने के कारण सच्चा आत्मा चल नहीं सकता । अनन्त चल नहीं सकता । केवल सान्त ही में गति हो सकती है । यह एक मण्डल है, और यहां दूसरा मण्डल है । जहां यह है, वहां वह नहीं है, और जहां वह है, यह नहीं है । यदि एक दूसरे के अस्तित्व को सीमाबद्ध करता है तो दोनों सान्त हैं । यदि हम एक मण्डल को
अनन्त बनाना चाहते हैं तो वह समग्र स्थान को घेर लेगा। छोटे मण्डल के लिये तब स्थान न रह जायगा। जब तक छोटा मण्डल उसे (बड़े मण्डल को) परिमित किये हुए था, तब तक आप उसे अनन्त नहीं कह सकते थे। पहले मण्डल को असीम बनने के लिये एक होना पड़ेगा उससे बाहर कुछ न होना चाहिये। और जब उससे बाहर कोई भी दूसरी चीज़ नहीं है तो फिर ऐसी कोई चीज़ नहीं रह गई जो अनन्तता से परिपूर्ण नहीं है। और इस तरह स्थान के अभाव के कारण अनन्तता चल नहीं सकती। अनन्त में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। अन्तर्गत आत्मा, सच्चा स्वयं अनन्त है। वह सम्पूर्ण शान्ति, सम्पूर्ण विश्राम है। उसमें कोई गति नहीं है। यह मामला है। अज्ञान से अनन्तता की, आत्मा की शान्ति शरीरगत आलस्य और प्रमाद समझा जाता है। आलस्य और प्रमाद के विश्वव्यापी होने का यही कारण है।
वह क्या बात है कि, इस संसार में कोई भी अपना हरीफ़ (प्रतिद्वंद्वी) नहीं चाहता? हरेक सर्वश्रेष्ठ शासक बनना चाहता है।
"जो कुछ मैं देखता हूं उस सबका मैं सम्राट हूं, मेरे अधिकार पर आपत्ति करनेवाला कोई नहीं है"।
हरेक मनुष्य यही बोध चाहता है। इसकी विश्वव्यापकता का कारण क्या है? इस तथ्य, इस कठिन, कठोर वास्तविकता को समझाइये, इसे समझाइये। वेदान्त कहता है, मूल कारण यह है, मूल कारण यह है कि, मनुष्य में सच्ची आत्मा है, जो बिना दूसरे के एक है, जो प्रतिद्वंद्वी-रहित है, बेजोड़ है, और भूल से, अज्ञान से आत्मा का गौरव और
एकपन, शरीर पर आरोपित किया जाता है।
दूसरे पापों में हम न प्रवेश करेंगे। उन्हें भी इसी तरह वेदान्त समझाता है सब घोर पापों की व्याख्या होगई, और इन पापों को दूर करने का सरल उपाय है विश्वव्यापी अज्ञान दूर करना जिसके कारण आप आत्मा के स्वभाव और लक्षणों को शरीर के स्वभाव और लक्षण मानने की भ्रान्ति में फँसते हैं।
एक मनुष्य दो रोगों से पीड़ित था। उसे एक नेत्रव्याधि थी और एक उदर-रोग था। एक वैद्य के पास जाकर उसने चिकित्सा करने को कहा। वैद्य ने इस रोगी को दो प्रकार की औषधियां, दो तरह के चूर्ण दिये। एक चूर्ण नेत्रों में लगाये जाने के लिये था। एक सुरमा, गंधक था और खाने से यह विष है, यह आंखों में लगाया जा सकता है और भारत में लोग इसे नेत्रों में लगाते हैं। इस लिये वैद्य ने उसे नेत्रों के लिये सुरमा दिया। दूसरा चूर्ण वैद्य ने खानेके लिये दिया था। इस चूर्ण में काली मिर्चें आदि थीं। मिर्चें बड़ी गर्म होती हैं। एक चूर्ण वैद्य ने उसे खाने के लिये दिया जिस में मिर्चें थीं। यह मनुष्य व्यग्र दशा में तो था ही, इसने दोनों चूर्णों को आपस में बदल लिया। खानेवाला चूर्ण तो उसने आंखों में लगाया और सुरमा तथा दूसरी चीजें, जो विष थीं उसने खाईं। अब तो आँखें फूट गईं और पेट भी बिगड़ गया।
यही लोग कर रहे हैं, और इस संसार में समस्त एवं कथित पाप का यही कारण है। एक ओर तो आत्मा, प्रकाशों का प्रकाश तुम्हारे भीतर है, और यह है शरीर, जिसे पेट कह लीजिये। शरीर के लिये जो कुछ होना चाहिये वह आत्मा के निमित्त किया जा रहा है, और आत्मा की प्रतिष्ठा, आदर
तथा गौरव शरीर को दिया जा रहा है। हरेक चीज़ मिल गई है, हरेक चीज़ गड़बड़ हालत में कर दी गई है। इस संसार में पाप के नाम से परिचित विविध व्यापार का कारण यही है। चीज़ों को ठीक करलो, तुम भी ठीक हो, तुम्हारा सांसारिक अभ्युदय होगा, और आध्यात्मिक हिसाब से देवों में परमदेव हो।
इसी प्रकार हरेक वस्तु तुममें है, किन्तु कुठौर रक्खे जाने से नीचे ऊपर हैं। ईश्वर तो नीचे डाला जाता है और शरीर उसके ऊपर रक्खा जाता है, तथा सर्वोच्च स्वर्ग घोर नरक में बदला जाता है। उन्हें ठीक क्रम से रक्खो, फिर तुम देखोगे कि, यह पापों का भयंकर और घृणित व्यापार भी तुम्हारी अच्छाई और विशुद्धता बखान रहा है। ठीक देखो और तुम परमेश्वर हो।
एक मनुष्य ने, जो नास्तिक था, अपने घर की दीवारों पर सब कहीं लिख रक्खा था, "ईश्वर कहीं नहीं है"। वह अनीश्वरवादी था। वह वकील था। एक बार एक मुवक्किल ने उसे 500) देने चाहे। उसने कहा, "नहीं, मैं 1000) लूँगा"। मुवक्किल ने कहा, "बहुत अच्छा, यदि मुकदमा जीत जायगा तो मैं 1000) दूँगा, परन्तु बाद को 500) लेना मंजूर हो तो पहले ले लीजिये"। वकील साहब को सफलता का दृढ़ निश्चय था और उसने मुकदमा ले लिया। वह न्यायालय गया। उसे पूरा निश्चय था कि, मैंने सब कुछ ठीक किया है। उसने सावधानी से मुकदमे का अध्ययन किया था। किन्तु मुकदमा पेश होने पर प्रतिपक्षी के वकील ने एक ऐसी पुष्ट बात निकाल कर कहदी कि वह मुकदमा हार गया, और मेहनताने के 1000) भी जाते रहे, जिनकी उसे आशा
थी। वह बहुत ही दुखी, हताश और उदास अपने घर लौटा। निराश अवस्था में जब वह अपनी मेज़ के ऊपर झुका हुआ था तब उसका प्यारा बच्चा आया। बच्चा शब्दों के हिज्जे करना सिख रहा था। वह हिज्जे करने लगा, "जी-ओ-डी-आई-एस—यह तो बड़ा शब्द है, इसमें अनेक अक्षर हैं। बेचारा बच्चा इस शब्द के हिज्जे न कर सका। उसने इस शब्द को दो टुकड़ों में तोड़ डाला, एन-ओ-डब्लू (नाऊ) और एच-ई-आर-ई (हीयर), और बच्चा प्रसन्नता से उछल पड़ा। सम्पूर्ण वाक्य के हिज्जे कर डालने की अपनी सफलता पर वह चकित हो उठा। "ईश्वर अब यहां है" (God is now here), "ईश्वर अब यहां है"।* यही सारा मामला है।
वेदान्त चाहता है कि आप चीज़ों का शुद्ध विन्यास करें उनका अनर्थ न करिये, उनके गलत हिज्जे न कीजिये। इस "गाड इज़ नोव्हेयर God is nowhere" (ईश्वर कहीं नहीं है), अर्थात् पाप और अपराध के चमत्कार को पढ़िये "गाड इज़ नाऊ हीयर God is now here" (ईश्वर अब यहां है)।
तुम्हारे पापों में भी तुम्हारा परमेश्वरत्व, तुम्हारी प्रकृति का परमेश्वरत्व प्रमाणित होता है। इसका अनुभव करो, और समग्र संसार तुम्हारे लिये खिल उठता है, वह स्वर्ग या नन्दन-कानन में बदल जाता है।
* "Nowhere नो व्हेयर" बच्चे ने छोड़ दिया।
+ गाड इज़ नोव्हेयर (God is nowhere) का अर्थ हुआ "ईश्वर कहीं नहीं है" और "नोव्हेयर" को दो टुकड़े कर डालने पर दो शब्द बन गये "नाऊ" और "हीयर" और पूरा नाम हुआ "गाड इज़ नाऊ हीयर" अर्थात् "ईश्वर है अब यहां"।
एक बार परीक्षा में विद्यार्थियों से ईसा के पानी को मद्य में बदल देने के चमत्कार पर निबन्ध लिखने को कहा गया था। दालान छात्रों से भरा हुआ था और वे लिख रहे थे। एक बेचारा सीटी बजा रहा था, गा रहा था, कभी इस कोने की ओर और कभी उस कोने की ओर देख रहा था। उसने एक भी शब्दांश नहीं लिखा। वह परीक्षा-भवन में भी खेल करता रहा, वह मौज करता रहा। ओः, वह स्वाधीन चित्त का था। समय जाने पर जब प्रबन्धक उत्तर-पत्र जमा कर रहा था तो उसने बाइरन से हंसी में कहा, "मुझे बड़ा खेद है कि, इतना बड़ा निबन्ध लिखते २ तुम थक गये"। तब तो बाइरन ने अपना कलम उठाया और उत्तर-पत्र पर एक वाक्य लिख कर उत्तरपत्र प्रबन्धक को दे दिया। जब परीक्षा का नतीजा निकला, तो उसे प्रथम पुरस्कार मिला था, बाइरन को प्रथम पुरस्कार मिला। जिस परीक्षार्थी ने कुछ भी नहीं लिखा था. जिसने कलम उठा कर केवल एक वाक्य एक दफे में खिंचा दिया था, उसे प्रथम पुरस्कार मिला। परीक्षा का प्रबन्धक, जिसने बाइरन खेलंदड़ा समझा था, बड़ा विस्मित हुआ और अन्य परीक्षार्थियों ने प्रबन्धक से सम्पूर्ण श्रेणी के सामने, विद्यार्थियों के पूरे समूह के सामने, बाइरन का निबन्ध, जिसने उसे पुरस्कार दिलाया था, पढ़ने की प्रार्थना की। निबन्ध यों था:-"जल ने अपने स्वामी को देखा और (खिलकर) लाल होगया" यह ईसा के चमत्कार पर था, जिससे उसने जल को मद्य में बदल दिया था। सम्पूर्ण लेख इतना ही था। क्या यह आश्चर्यमय नहीं है? खिल उठने में चेहरा लाल होजाता है, जल लाल मद्य होगया। जब कोई कामिनी अपने स्वामी, अपने प्रेमी की वातचीत सुनती है तो वह विकसित होती है, जल ने भी अपना स्वामी देखा और वह
खिल गया। यही सब कुछ है। वाह, वाह! खूब नहीं कहा?
अपने अन्तर्गत सच्चे आत्मा का अनुभव करो। ईसा की तरह अनुभव करो कि, पिता और पुत्र एक हैं। "प्रारम्भ में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था"। इसे अनुभव करो, इसे अनुभव करो। स्वर्गों का स्वर्ग तुम्हारे भीतर है। यह अनुभव करो, फिर जहां तुम जाओगे गंदले से गंदला जल तुम्हारे लिये चमचमती मद्य में खिल उठेगा, हरेक कारागार तुम्हारे लिये स्वर्गों के स्वर्ग में बदल जायगा। तुम्हारे लिये कोई कष्ट या कठिनता न होगी, सबके तुम स्वामी हो जाते हो।
ॐ! ॐ!! ॐ!!!