नक़द धर्म।
(अक्तूबर 1906 में गाज़ीपुर में दिया हुआ व्याख्यान।)
सत्यमेव जयते नानृतम्। मुण्डकोपनिषत्।
हमारे वेद में लिखा है कि जय सत्य की ही होती है, झूठ की कभी नहीं। सांच को आंच नहीं। द्रोह को फरोग नहीं। जहां कहीं दुनिया में ऐश्वर्य और संपत्ति है, धर्म ही उसका मूल कारण है। हिन्दू कहते हैं कि लक्ष्मी विष्णु की स्त्री है और पतिव्रता है। जहां विष्णु जी अर्थात् सत्य वा न्याय होगा वहीं लक्ष्मी होगी। इसको और किसी की परवाह नहीं। ऐश्वर्य किसी भूगोल की सीमा के आश्रित नहीं, अर्थात् किसी स्थान विशेष में बँधी हुई नहीं। जो लोग यूरोप अमेरिका आदि की उन्नति का कारण वहां का शीतल जलवायु बताते हैं, या जो अन्य देशों की अवनति का कारण वहां का क्षेत्र विशेष कहते हैं वे भूल करते हैं। अभी दो हजार वर्ष नहीं हुए कि इंग्लैंड के निवासी रोम आदि देशों में कैदी और गुलाम बने बिकते थे। आज इंग्लैंड इतने बड़े देशों का राज्य कर रहा है। क्या इंग्लैंड अपनी पुरानी चौहद्दी से भाग कर कहीं आगे निकल गया है? पांच सौ वर्ष पहले अमेरिका पृथ्वी के उसी भाग पर था जहां आज, किन्तु इस समय वहां के निवासियों की अवस्था के भेद का अनुमान कीजिये। रोम, यूनान, मिश्र और हमारा भारतवर्ष आज वहीं तो है, जहां उन दिनों थे. जब कि समस्त पृथ्वी में इनकी विद्या और वैभव की धाक
बंधी थी। वैभव (ऐश्वर्य) देशों और मुल्कों की परवाह नहीं करता। जो लोग सत्य पर चलते हैं केवल उन्हीं की जय होती है। और जब तक सत्य धर्म पर चलते रहते हैं उनकी विजय बनी रहती है। प्यारे! क्षमा करना, राम आप का है और आप राम के हैं, तुम हमारे हो, हम तुम्हारे हैं। पूरे प्रेम के साथ सामने आओ। कुछ हम कहेंगे प्रेम से कहेंगे किन्तु खुशामद नहीं करेंगे। प्रेम यह चाहता है कि मनुष्य खुशामद न करे। राम जापान में रहा, अमेरिका में रहा, यूरोप के कई मुल्क भी देखे, पर जहां जय देखी सत्य की देखी। अमेरिका जो उन्नति कर रहा है, धर्म पर चलने से कर रहा है। धर्म पर किसी का ठेका (इजारा) नहीं। प्रत्येक स्थान में यह आचरण में आ सकता है। धर्म दो प्रकार का है, एक नक़द, दूसरा उधार। यह एक दृष्टांत से स्पष्ट होगा। एक मनुष्य ने कुछ धन जमीन में गाड़ रक्खा था। उसके लड़के को मालूम हो गया। लड़के ने जमीन खोद कर धन निकाल लिया, और खर्च कर डाला। किन्तु तौल कर उतने ही वजन के पत्थर वहां रख छोड़े। कुछ दिन के बाद जब बाप ने जमीन खोदी और रुपया न पाया तो रोने लगा, हाय मेरी दौलत कहां गई। लड़के ने कहा "पिता जी, रोते क्यों हो? आप को उसे काम में तो लाना ही न था। और रख छोड़ने के लिये देख लो उतने ही तौल के पत्थर वहां मौजूद हैं।
बराए निहादन चे संगे चे ज़र।
अर्थात् रख छोड़ने के लिये जैसे पत्थर वैसे रुपये।
धार्मिक वाद विवाद और झगड़े जो होते हैं, वह नक़द धर्म पर नहीं होते, उधार धर्म पर होते हैं। नक़द धर्म वह
है जो मरने के वाद नहीं किन्तु जीते जी (वर्त्तमान जीवन) से सम्बन्ध रखता है। उधार धर्म एतबारी अर्थात् अंध विश्वास पर निर्भर होता है, नक़द धर्म श्रद्धात्मक, अर्थात् अन्तःकरण के दृढ़ विश्वास का उधार धर्म कहने के लिये नक़द धर्म करने के लिये। वह भाग जो धर्म का नक़द है, उस पर सर्व धर्मों की एकवाक्यता है। "सत्य बोलना, ज्ञान संपादन करना और उसे आचरण में लाना, स्वार्थ से रहित होना, परधन, पर स्त्री को देख कर अपना चित्त न बिगाड़ना, संसार के लालच और धमकियों के जादू में आकर वास्तविक स्वरूप (जात मुतलक़) को न भूलना, दृढ़चित्त और स्थिर स्वभाव होना, इत्यादि"। इस नक़द धर्म पर कहीं दो सम्मतियां नहीं हो सकतीं। झगड़े उस धर्म पर लोग करते हैं, जो दबा कर रखते हैं। उधार के दावे, वाद विवाद करने की प्रीति रखनेवाले लोगों को छोड़ कर स्वयं नक़द धर्म (फ़र्ज़े-मौजूदः) पर चलते हैं, वे उन्नति और वैभव को पाते हैं। इस बात का अनुभव अन्य देशों में जाने से हुआ। भारतवर्ष और अमेरिका में क्या भेद है? यहां दिन है, वहां रात है। वहां दिन है, तो यहां रात है। जिन दिनों भारतवर्ष के ग्रह अच्छे थे-हिन्दुस्तान का सितारा ऊँचा था, अमेरिका को कोई जानता भी न था। आज अमेरिका उन्नति पर है, तो भारतवर्ष की कोई पूछ नहीं। हिन्दुस्तान में बाजार आदि में रास्ता चलते बाएँ ओर चलते हैं वहां दाएँ ओर। पूजा और सत्कार के समय यहां जूता उतारते हैं. वहां टोपी। यहां घरों में राज्य पुरुषों का है, वहां स्त्रियों का! इस देश में यह शिकायत है कि विधवा ही विधवा है उस देश में कुमारियों (अविवाहिता) की अधिकता है। हम कहते हैं "पुस्तक मेज़ पर है" वे कहते हैं "पुस्तक पर मेज़
"The book on the table" हिन्दुस्तान में गधा और उल्लू मूर्खता की संज्ञा है, उस देश में गधा और उल्लू भलाई और बुद्धिमता का चिन्ह है। इस देश में जो पुस्तक लिखी जाती है, जब तक आधी के लगभग पहले के विद्वानों के प्रमाणों से न भरी हो उसका कुछ सन्मान नहीं होता। उस देश में पुस्तक की सारी बातें नवीन न हों तो उसकी कोई कदर ही नहीं। यहां किसी को कोई विद्या या कला मालूम हो जाय तो उसे छिपा कर रखते हैं, वहां उसे वर्त्तमानपत्रों में प्रकट कर देते हैं। यहां अंध विश्वास (उधार धर्म) अर्थात् गतानुगतिक अनुकरण अधिक है, वहां दृढ़विश्वास (नक़द धर्म) बहुत है। हमारे यहां इस बात में बड़ाई है कि औरों से न मिलें, अपने ही हाथ से पकाकर खायें और सब से अलग रहें, वहां पर जितना औरों से मिलें उतनी ही बड़ाई है। यहां पर अन्य देशों की भाषा पढ़ना दोषयुक्त समझा जाता है—"न पठेत् यावनी भाषाम्" यवन लोगों (म्लेच्छों) की भाषा न पढ़ना चाहिये, वहां जितना अन्य देशों की भाषा का ज्ञान प्राप्त किया जाता है, उतना ही अधिक सन्मान होता है। जब राम जापान को जा रहा था तो जहाज पर अमेरिका का एक वयोवृद्ध प्रोफेसर मित्र बन गया। वह रूसी भाषा पढ़ रहा था। पूछने पर मालूम हुआ कि ग्यारह भाषायें वह पहले भी जानता है। उससे पूछा गया "इस वय में यह नवीन भाषा क्यों सीखते हो?" उसने उत्तर दिया, "मैं भूगर्भशास्त्र (Geology) का प्रोफेसर हूँ। रूसी भाषा में भूगर्भशास्त्र की एक अच्छी पुस्तक लिखी गई है, यदि मैं इसका अनुवाद कर सकूंगा तो मेरे देशबान्धवों को अत्यन्त लाभ पहुँचेगा। इस लिये रूसी भाषा पढ़ता हूं।" राम ने कहा "अब तुम मौत के
निकट हो, अब क्या पढ़ते हो? अब ईश्वर सेवा करो *डुकृञ्करणे में क्या धरा है'? "उसने उत्तर दिया" लोक-सेवा ही ईश्वर सेवा है।"
बन्दा हूं बेखुदा मैं बन्दे मेरा खुदा है।
अर्थात् विना ईश्वर का मैं मनुष्य हूं, लोक मेरे ईश्वर है। इसके साथ यदि इस काम को करते २ मुझे नरक में जाना पड़ेगा तो मैं जाऊंगा, इसकी कुछ परवाह नहीं। नरक में मुझे दुःख मिलते हैं, तो हजारों जन्मों से भी कबूल है, यदि देश बान्धवों को सुख, लाभ मिल जाय। इस जीवन में सेवा के आनन्द का अधिकार मैं मौत के उस पार के डर से नहीं छोड़ सकता।
गुज़ऱ्ता ख्वाबो आमन्दा खयालस्त, गनीमत दां हमीं हमरा कि: हालस्त।
भावार्थः—भूतकाल को स्वप्न समान समझ, भविष्य केवल अनुमानमात्र है, और वर्त्तमान काल में जो श्वास अभी चलता है उसे तू उत्तम समझ।
यही नक़द धर्म है। भगवद्गीता में बड़ी सुन्दरता से आज्ञा दी है किः—
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। गीता २।47।
अर्थात् कर्म तो करते ही जाओ, परन्तु फल पर दृष्टि मत रक्खो। लार्ड मेकाले की प्रार्थना थी कि मैं मरूं तो पुस्तकालय में मरूं। मैं मरूं तो प्यारे की गली ही में मरूं।
दफ़न करना मुझ को कूए-यार में, कब्रे-बुलबुल की बने गुलज़ार में।
भावार्थः—मेरे प्यारे की गली में मुझे गाड़ना, क्योंकि बुलबुल पक्षी की समाधि बागों में ही बनती है।
* देखो श्री शंकराचार्य कृत चर्पटपंजरिका स्तोत्र—'भज गोविन्दं' इत्यादि
मरें तो कर्तव्य पालन करते करते मरें, शत्रुओं के साथ मरें, युद्धक्षेत्र में मरें। हिम्मत, आनन्द और उत्साह के साथ प्राण त्याग करें।
एक मनुष्य (माली) बाग लगाता था। किसी ने पूछा "बूढ़े मियां, क्या करते हो? तुम क्या इसके फल खाओगे? एक पांव तो तुम्हारा मानो पहले ही कब्र में है, क्या तुमको वह फकीर की बात याद है?
घर बनाऊं खाक इस वहशत-कदा में नासिहा, आये जब मजदूर मुझको गोर-कन याद आ गया।
भावार्थ:—ऐ उपदेशक! इस भयंकर संसार में क्या खाक घर बनाऊं? जब मजदूर आये तो मुझे कब्र खोदनेवाले याद आ गये।
माली ने उत्तर दिया, "औरों ने बोया था, हमने खाया, हम बोयेंगे और खायेंगे"। इसी प्रकार संसार का काम चलता है। जितने बड़े बड़े हो गये हैं, ईसा, मुहम्मद इत्यादि, क्या इन महापुरुषों ने उन वृक्षों का फल आप स्वयं खाया था जो वे बो गये? कदापि नहीं। इन महापुरुषों ने तो केवल अपने शरीरों को मानो खाद बना दिया, फल कहां खाये? जिन वृक्षों का फल सदियों के बाद लोग आज खा रहे हैं, वे उन ऋषियों की खाक से उत्पन्न हुए हैं। यह सिद्धान्त ही धर्म का वास्तविक प्राण है। यही नियम उस प्रोफेसर के आचरण में पाया गया जो ऋषि भाषा पढ़ता था।
जिस समय राम जापान से अमेरिका को जाता था, जहाज में कोई डेढ़ सौ जापानी विद्यार्थी थे जिनमें कुछ अमीरों के घराने के भी थे। पर उनमें शायद ही कोई ऐसा था जो अपने घर से रुपया ले चला हो। बहुधा उनमें ऐसे
थे कि जहाज का किराया भी उन्होंने घर से नहीं दिया था। कोई उनमें से धनाढ्य प्रवासियों के बूट साफ करने पर, कोई जहाज की छत के तख्ते धोने पर, कोई ऐसे ही अन्य छोटे कामों पर नौकर हो गये थे, और जहाज का खर्च इस प्रकार पूरा कर रहे थे। पूछने से उनका यह विचार पाया गया कि अपने देश का धन अन्य देशों में जाकर क्यों खर्च करें? जहाज का किराया भी जहाज का काम करके देते हैं। अमेरिका में जाकर इनमें से कुछ विद्यार्थी तो अमीरों के घरों में दिन भर महनत मजदूरी करते थे और रात को रात्रिशाला (Night School) में पढ़ते थे और कुछ रेल की सड़क पर या बाजारों में रोड़ी कूटने पर या किसी और काम पर लग गये। यह लोग गरमियों में मजदूरी करते थे और सर्दियों में कालिज की शिक्षा पाते थे।
पये इल्म चूं शमअ बायद गुदाख्त।
अर्थात् विद्या के लिये मोमबत्ती की भांति पिघलना चाहिये। इसी प्रकार सात आठ वर्ष रहकर अपने दिमाग को अमेरिका की विद्या तथा कलाकौशल से और अपनी जेबों को अमेरिका के रुपये से भरकर यह जापानी विद्यार्थी अपने देश में वापिस आते हैं। प्रत्येक जहाज में बीसियों और कई बार सैकड़ों जापानी प्रतिवर्ष जहाजों में जर्मनी व अमेरिका को जाकर वहां से विद्या प्राप्त करके वापिस आते हैं। इसका परिणाम आप देख ही रहे हैं। पचास वर्ष हुए जापान भारतवर्ष से भी नीचा (गिरा हुआ) था। आज यूरोप से बढ़ गया। तुम्हारा हाथ खूब गोरा चिट्टा है, और इसका रुधिर बिलकुल साफ है, अगर कलाई पर पट्टी बांध लोगे तो हाथ का रुधिर हाथ ही में रहेगा, शरीर के और भाग में
नहीं जायगा, किन्तु गंदा हो जायगा, और हाथ सूख जायगा। इसी प्रकार जिन देशों ने यह कहा कि हम ही उत्तम हैं, हम ही अच्छे हैं, हम ही बड़े हैं, हम म्लेच्छों या काफिरों से क्या सम्बन्ध रक्खें? और अपने आपको अलग थलग कर लिया, उन्होंने अपने आप पर मानो पट्टी बांध कर अपने तई सुखा लिया। प्रसिद्ध कहावत है कि
"बहता पानी निरमला खड़ा सो गंदा होय।"
आबे-दर्या वहे तो बिहतर, इन्सान रवां रहे तो बिहतर।
अर्थात् नदी का जल बहता रहे तो अच्छा, और मनुष्य चलता रहे तो उत्तम है।
यदि विचार से देखा जाय तो मालूम होगा कि जिन देशों ने उन्नति की है, चलते ही रहने से की है। अमेरिका के लोगों की स्थिति इस विषय में देखिये। औसतन 45000 अमेरिकन प्रतिदिन पैरिस में रहते हैं, झुण्डों के झुण्ड आते हैं, और जाते हैं। कोई जरा सी नवीन रचना व घटना फ्रान्स में देखी तो फट अपने देश में पहुंचा दी। प्राचीन विद्याओं और कला कौशल्यों के सीखने में कोई कम नहीं। इस मौसम अर्थात् शरद ऋतु में कोई 80000 अमेरिकन मिश्र में आते जाते हैं मीनारों को देखते हैं। 40 फी सद्दो अमेरिकन सारी दुनियां घूम चुके हैं। इस तरह से ये लोग जहां किसी विद्या का ज्ञान होता है वहां से लाकर अपने देश में पहुंचा देते हैं। जर्मनी वालों की भी यही दशा है। अमेरिका से आते समय राम जर्मन जहाज पर सवार था। उसमें लगभग तीनसौ मनुष्य प्रथम वर्ग के प्रवासी होंगे। उनमें प्रोफेसर, डयूक, बैरन, सौदागर लोग शामिल थे। दिन के समय
साधारणतः राम जहाज की सब से ऊंची छत पर जाकर बैठता था, एकान्त में पढ़ता लिखता था, या ध्यानविचार में लग जाता था, किन्तु जर्मन लोग जहाज के ऊपर छत पर चढ़कर राम को नीचे लाते थे और राम के व्याख्यान कराते थे। राम को विदेशी समझ कर उसके साथ काफिर या म्लेच्छ का बर्ताव तो न था, किन्तु यह खयाल था कि जितना भी ज्ञान इस विदेशी से मिल सकता है, ले लें। संयुक्त संस्थान अमेरिका में सब से पहला नगर जो राम ने देखा वह वाशिंग्टन है। वहां वाशिंग्टन यूनिवर्सिटि ने राम को हिन्दू दर्शन शास्त्र पर व्याख्यान देने को निमन्त्रण दिया। व्याख्यान के बाद एक युवा प्रोफेसर से मिलना हुआ जो अभी अभी जर्मनी से वापिस आया था। राम ने पूछा "जर्मनी क्यों गये थे?" उसने जवाब दिया, "वनस्पति शास्त्र और रसायन शास्त्र में अपनी यूनिवर्सिटि की जर्मन युनिवर्सिटियों से तुलना करने गया था।" और साधारण रीति से इसका परिणाम यह सुनाया कि इस वर्ष का समय हुआ जर्मन लोग हम से बढ़कर थे किन्तु आज हम उनसे कम नहीं हैं।
"पीर शोविया मोज" अर्थात् वृद्धावस्था पर्यन्त पढ़ते ही जाओ। जांतोड़ परिश्रम के साथ विदेशियों से सीख सीख कर उन लोगों ने विद्या को पाया और बढ़ाया है।
यह विचार ठीक नहीं कि अमेरिका के लोग डालर (रुपया) के दास हैं, बल्कि विद्या के पीछे डालर तो स्वयं आता है। जो लोग अमेरिकावालों पर यह कलंक लगाते हैं कि उनका धर्म नकद धर्म नहीं बल्कि 'नकदी'-धर्म है, वे या तो अमेरिका की वास्तविक स्थिति से अनभिज्ञ हैं, या नितान्त अन्यायी हैं, और उन पर यह कहावत ठीक बैठती
है कि अंगूर अभी कच्चे हैं, कौन दांत खट्टे करे।
केलीफोर्निया (California) में एक स्त्री ने अठारह करोड़ रुपया देकर एक विश्वविद्यालय (University) स्थापित किया। इसी प्रकार विद्या के बढ़ाने फैलाने के लिये प्रति वर्ष करोड़ों का दान दिया जाता है। भारतवर्ष की ब्रह्मविद्या का वहां इतना सन्मान है कि जैसा वेदान्त अमेरिका में है वैसा व्यावहारिक वेदान्त भारतवर्ष में आज कल नहीं है। उन लोगों ने यद्यपि हमारे वेदान्त को पचा लिया है और अपने शरीर और अन्तःकरण में खपा लिया है, किन्तु वे हिन्दू नहीं बन गये। वैसे ही हम उनकी विद्या और कलाकौशल्य को पचाकर भी अपना राष्ट्रीयत्व-हिन्दुत्व स्थिर रख सकते हैं। वृक्ष बाहर से खाद लेता है किन्तु खुद खाद नहीं हो जाता। बाहिर की मिट्टी, जल, वायु, तेज को खाता है, और पचाता है किन्तु मिट्टी, जल, वायु आदि नहीं हो जाता। जापानियों ने अमेरिका और यूरप के विज्ञान शास्त्र और कला कौशल्य पचा लिये, किन्तु जापानी ही बने रहे। देवताओं ने अपने कच (वृहस्पति के पुत्र) को राक्षसों के पास भेज कर उनकी संजीवनी विद्या सीख ली किन्तु इससे वे राक्षस नहीं हो गये। इसी तरह तुम यूरप और अमेरिका जाकर ज्ञान (विद्या तथा कला कौशल्य) सीखने से गैर हिन्दू (अनार्य) और गैर हिन्दुस्तानी (विदेशीय) नहीं हो सकते। जो लोग विद्या को भूगोल की तटबन्धी में डालते हैं कि 'यह हमारा ज्ञान है, यह विदेशियों का ज्ञान है। विदेशियों का ज्ञान हमारे यहां आने से पाप होगा, और हाय! हमारा ज्ञान और लोग क्यों ले जाय' ऐसे विचार वाले लोग अपने ज्ञान को घोर अज्ञान में बदलते हैं। इस कमरे में प्रकाश है, यह प्रकाश अत्यंत आह्लादकारक और प्रसन्नकारी है,
अगर हम कहें यह प्रकाश हमारा है, हमारा है, हमारा, हाय! यह कहीं बाहर के प्रकाश से मिल कर अपवित्र न हो जाय। और इस विचार से अपने प्रकाश की रक्षा करते हुए हम खिड़कियां गिरा दें, परदे डाल दें, द्वार भेड़ दें, खिड़कियां लगा दें, रोशनदान बन्द कर दें, तो हमारा प्रकाश एकदम दूर हो जायगा। नहीं नहीं मुश्केस्याह (कस्तूरी समान काला) हो जायगा अर्थात् अंधेरा ही अंधेरा फैल जायगा। हाय! हम लोगों ने भारतवर्ष में यह अन्ध पद्धति क्यों स्वीकार कर ली।
हुब्बुलवतन अज मुल्के-सुलेमां खुशतर, खारे-वतन अज सुम्बुले-रेहां खुशतर।
अर्थात् स्वदेश तो सुलेमान के देश से भी प्यारा होता है। स्वदेश का कांटा तो सुम्बल और रेहां से भी उत्तम होता है।
ऐसा कहकर स्वयं तो कांटा हो जाना और देश को कांटों का वन बना देना स्वदेशभक्ति नहीं है। साधारणतया एकही प्रकार के वृक्ष जब इकट्ठे गुंजान झुंडों में उगते हैं तो सब कमजोर रहते हैं। इनमें से किसी को जरा अलग बो दो तो बहुत मजबूत और मोटा हो जाता है। यही दशा जातियों की है। कश्मीर के विषय में कहते हैं:—
अगर फिरदोस बर-रूए जमीनस्त, हमीनस्तो-हमीनस्तो-हमीनस्त।
अर्थात् यदि पृथ्वी (भूलोक) पर स्वर्ग है तो, यही है, यही है, यही है।
किन्तु वह कश्मीरी लोग जो अपने फिरदोस (Happy Valley) अर्थात् स्वर्ग को छोड़ना पाप समझते हैं, निर्बलता, निर्धनता और अज्ञानता में प्रसिद्ध हो रहे हैं, और
वह बहादुर कश्मीरी पंडित जो इस पहाड़ी (फिरदोस) से बाहर निकले, मानो सचमुच स्वर्ग (फिरदोस) में आ गये। उन्होंने, जहां गये, अन्य भारतवासियों को हर बात में मात कर दिया। उनमें से सब ऊंचे ऊंचे पदाधिकार पर बिराजित हैं। जब तक जापानी जापान में बन्द रहे निर्बल थे, और अशक्त थे, किन्तु जब वे अन्य देशों में जाने लगे, वहां की वायु लगी, बलवान हो गये, यूरप के निर्धन गरीब और प्रायः अधम स्थिति के लोग जहाजों पर सवार होकर अमेरिका जा बसे। अब ने लोग दुनियां की सब से बलिष्ठ शक्ति हैं। कुछ भारतवासी भी बाहर गये। जब तक अपने देश में थे, कुछ पूछ न थी, अन्य देशों में गये तो उन बढ़ी चढ़ी जातियों में भी प्रथम वर्ग में गिने गये और बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की।
पानी न बहे तो उसमें बू आये, खंजर न चले तो मोरचा खाये। गर्दिश से बढ़ा मिहर व मः का पाया, गर्दिश से फलक ने औज पाया।
जैसे वृक्ष सब रुकावटों (बाधाओं) को काट कर अपनी जड़ें उधर भेज देता है जिधर जल हो, इसी तरह अमेरिका जर्मनी, जापान, इंग्लैंड के लोग समुद्रों को चीर कर, पहाड़ों को काट कर, रुपया खर्च करके, सर्व प्रकार के कष्ट झेल कर वहां वहां पहुंचे, जहां से थोड़ा बहुत, चाहे
1 दुर्गंध। 2 जंग। 3 भ्रमण। 4 सूर्य। 5 चन्द्र। 6 पदवी। 7 आकाश, धुलोक। 8 ऊंचा पद।
किसी प्रकार का भी ज्ञान प्राप्त हो सका। यह एक कारण है उन देशों की उन्नति का। अब और सुनिये।