श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

जांनिसारी—प्राणसमर्पण।

भाग 4 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 4 · अध्याय 4 / 8

जांनिसारी—प्राणसमर्पण।

एक जापानी जहाज में कुछ भारतवासी विद्यार्थी सवार थे। जहाज में जो इस वर्ग के प्रवासियों को खाने को मिला वह किसी कारण विशेष से उन्होंने नहीं लिया। एक निर्धन जापानी विद्यार्थी ने देखा कि भारतवासी भूखे हैं। सब के लिये दूध और फलादि खरीद कर लाया और सामने रख दिया। भारतवासियों ने पहले तो अपने देश की रीति के अनुसार उसे अस्वीकार किया और पश्चात् खा लिया। जब जहाज से उतरने लगे तो धन्यवाद के साथ वे उन वस्तुओं का मूल्य देने लगे। जापानी ने न लिया। किन्तु रोकर यूं प्रार्थना करने लगा "जब भारतवर्ष में जाओ तो कहीं यह खयाल न फैला देना कि जापानी लोग ऐसे नालायक हैं कि उनके जहाजों पर छोटे दर्जे के प्रवासियों के लिये खाने पीने का यथोचित प्रबन्ध नहीं है।" जरा खयाल कीजियेगा, एक निर्धन प्रवासी विद्यार्थी, जिसका जहाज के साथ कोई सम्बन्ध नहीं, वह अपना निजका द्रव्य इसलिये अर्पण कर रहा है कि कहीं कोई उसके देश के जहाजों को भी बुरा न कहे। यह विद्यार्थी अपने जीवन को देश से पृथक नहीं मानता। सारे देश का जीवन को अपना जीवन वर्ताव में अनुभव कर रहा है। क्या स्वदेशभक्ति है! क्या प्राण समर्पण है! यह है व्यावहारिक अभेद-अद्वैत! यह है नकद धर्म! इस क्रियात्मक वेदान्त के बिना उन्नति और कल्याण का कोई उपाय नहीं है।

मरना भला है उसका जो अपने लिये जिये, जीता है वह जो मर चुका इन्सान के लिये।

आपको याद होगा कि जापान में जब जरूरत पड़ी थी कि रूसियों के बल को रोकने के लिये कुछ जहाज समुद्र में डुबो दिये जांय, तो राजा मिकाडो ने कहा कि, "मैं प्रजा में किसी को विवश नहीं करता किन्तु जिनको ऐसे जहाजों के साथ डूबना स्वीकार है, वे खुद स्वयंसेवक बन कर अपनी अर्जियां पेश करें।" हजारों अर्जियां आवश्यकता से भी अधिक एकदम आ गईं। अब इनमें चुनाव की जरा दिक्कत थी। तिस पर जापानी युवकों ने अपने शरीर से रुधिर निकाल कर उससे प्रार्थना पत्र लिख कर पेश किये कि शीघ्र स्वीकार हो जांय। अन्त में रुधिर से लिखी हुई अर्जियों को अधिक मान दिया गया। जब जहाजों के साथ वे लोग डूब रहे थे तो इनमें दो एक कप्तान यदि चाहते तो अपनी जान बचा भी सकते थे। किसी ने कहा "कप्तान साहब आप काम तो कर चुके अब जान बचाकर जापान चले जाओ"। तो मौत की हंसी उड़ाते हुए कप्तान साहब ने तिरस्कार से उत्तर दिया "क्या मैं न वापिस जाने के लिये यहां आने की अर्जी दी थी?"

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। गीता 15।6

अर्थात् जहां जाकर फिर कोई नहीं लौटता है, वह मेरा परम धाम है।

शूर वीरता का अर्थ यह नहीं है कि वापिस लौटा जाय।

ईंजा जुजी कि जां पसपारन्द चारा नेस्त।

अर्थात् यहां सिवाय जान देने के कोई उपाय नहीं।

1 मनुष्य

शेर सीधा तैरता है, वफ्ते-रफ्तन् आब में।

अर्थात् धारा में चलते समय शेर सीधा तैरता है।

यह है नकद धर्म, यह है क्रियात्मक अर्थात् आचरण में लाया हुआ वेदान्त।

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। गीता २।23

मुझको काटे कहां वह तलवार? दाग दे मुझको कहां वह नार? गर्क मुझको करे कहां वह पानी! बाद में ताब कब सुखाने की? मौत को मौत आ न जायगी, कस्द मेरा जो करके आयगी।

अर्थात् कहां है वह तलवार जो मुझे मारे? कहां है वह अग्नि जो मुझे जलादे? कहां है वह जल जो मुझे डुबोदे? कहां है वायु में शक्ति जो मुझे सुखा दे? मृत्यु जब मेरा अभिलाषा करके आवेगा, तो उसका ही मृत्यु हो जायगा।

शास्त्रीय शोध के लिये अमेरिका में जीवन्त मनुष्य के शरीर पर घाव लगाने का प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ी। अनेक नवयुवक अपनी छातियां खोल कर खड़े हो गये कि लो चीरो, हमें काटो, इंच इंच कर के हमारा प्राण जाय, हमारे जीवन्त शरीर पर घाव लगाना [Vivesection] हजार बार मुबारक है, यदि इससे शास्त्र की प्रगति हो और दूसरों का कल्याण हो। अब इसे हम प्रेम कहें कि वीरता? यह है नकद धर्म, अर्थात् व्यावहारिक या क्रियात्मक वेदान्त। यही है सर्वात्मभाव।

संयुक्त संस्थानों के अध्यक्ष एब्राहम लिंकन के संबंध में कहा जाता है कि एकबार जब अपने मकान से दरबार

को आ रहा था, मार्ग में क्या देखता है कि एक शूकर कीचड़ में फंसा हुआ अधमरा हो रहा है। बहुत ही प्रयत्न कर रहा है किन्तु किसी तरह निकल नहीं सकता, और दुःख से चिल्ला रहा है। प्रेसिडेन्ट (अध्यक्ष) से देखा न गया। सवारी से उतर कर शूकर को बाहर निकाला और उसका प्राण बचाया। सब वस्त्रों पर कीचड़ के छींटे पड़ गये, किन्तु परवाह न की और उसी स्थिति में दरबार में आया। लोगों ने पूछा और जब उपरोक्त घटना का पता लगा तो सब ने बड़ी प्रशंसा करते हुए कहा कि आप बड़े दयालु और ईश्वर भक्त हैं। अध्यक्ष ने कहा कि बस, अधिक मत बोलो, मैंने दया का कोई कार्य नहीं किया। उस शूकर के दुःख ने मुझे दुःखित कर दिया इसलिये मैं तो केवल अपना ही दुःख दूर करने के लिये उस शूकर को निकालने गया था। वाह, कैसा विश्वव्यापी प्रेम है! कितनी विशाल सर्वात्मभावना है?

खूं रगे—मजनूं से निकला फस्द लैली की जो ली।

अर्थात् लैली के शरीर की नस खोलते ही मजनूं के शरीर से रुधिर बहने लगा। कैसी अनुभवात्मक एकता है!

पत्ती के, फूल की लगा सद्मा नसीम का, शवनम के कतरे आंख से उनके टपक पड़े।

अर्थात् पुष्प की पत्ती को ठंडी वायु लगते ही तेरे नेत्रों में हिमबिन्दु दिखाई पड़े।

नकद धर्म, जीवन्त धर्म, सनातन धर्म का तत्व यह है कि तुम समस्त देश के आत्मा को अपना आत्मा समझो। धर्म का यह तत्व जिन देशों में व्यवहार अर्थात् बर्ताव में आता है, वे उन्नति कर रहे हैं, जिन जातियों में नहीं आया

वे गिर रही हैं। अपने देश के विषय में अब एक बात बड़े खेद से कहनी पड़ेगी। इन दिनों हांगकांग में सिक्खों की फौज़ है, उसके पहले पठानों की फौज़ थी। हांग कांग में सिक्खों को, (हमें ठीक याद नहीं) शायद एक पौंड प्रत्येक मनुष्य को वेतन मिलता है और साधारण फौजी सिक्खों को इससे भी कम, शायद दस रुपया (दो तिहाई पौंड) मासिक वेतन मिलता है। हांग कांग में पठानों को गोरों के बराबर प्रति व्यक्ति तीन २ पौंड (हमें ठीक याद नहीं) मिलता था। चीन के युद्ध के समय जब सिक्ख लोग वहां पर गये तो पठानों का यह तिगुण से भी अधिक वेतन उनसे सहा न गया। ब्रिटिश पार्लमेन्ट में उन्होंने प्रार्थनापत्र भेजे कि पठानों को जो तीन २ पौंड मिलता है क्यों नहीं आजकल के दो तिहाई पौंड के स्थान पर हमें एक पूरा पौंड मासिक दिया जाता, और उनकी जगह भरती कर लिया जाता? हिन्दुस्तान सरकार और विलायत सरकार में इन प्रार्थना पत्रों के फिरने घूमने के बाद पठानों से पूछा गया कि क्या तुम लोगों को तीन पौंड के स्थान पर एक पौंड वेतन लेना स्वीकार है? एक पठान ने भी इसको अंगीकार नहीं किया। अन्त में पठानों की सब फौज़ मौकूफ की गई। सब पठान आजीविका रहित होगये। भोले सिक्खों ने इतना न देखा कि अन्त में यह पठान भी हमारे ही देश के हैं। यह सहानुभूति न आई कि इनकी आजीविका मारी गई। दया न आई कि भाइयों का गला कट गया। हाय! ईर्ष्या और देश की फूट! यह भूखों मरते पठान आजीविका की खोज में अफ्रीका को गये और शुमाली देश में मुल्ला के साथ होकर इन्हीं सिक्खों से लड़े। इस युद्ध में बिना लड़े ही केवल जल वायु के कठोर प्रभाव ही से सिक्खों की वह गति हुई कि

ईश्वर बचावे इनको! लकवा होगया, गर्दने मुड़ गई, शरीर सूख गये उपर आदि ने निढ़ाल कर दिया। सच कहा है जो औरों की मौत का उपाय करता है वह आपही उस उपाय से मरता है।

करदनी ख्वेश से आमदनी पेश, चाहकुन रा चाह व दरपेश।

अर्थात् अपनी करनी आप भरनी। अर्थात् यथा कर्म तथा फल। जो मनुष्य खड़ा खोदता है वह आप गिरेगा।

जापान में एक हिन्दुस्तानी विद्यार्थी शिक्षा पाता था। शिल्प-विद्या की एक पुस्तक पुस्तकालय से वह मांग कर ले आया। बाकी लेख या उसके भावार्थ को तो नकल कर उतार लिया किन्तु मशीनों (कलों) के नकशों या चित्रों की नकल न कर सका। अब यह न सोचा कि और लोग भी इस पुस्तक से लाभ उठानेवाले हैं। यह न ख्याल किया कि इस चेष्टा से मेरे देश की अपकीर्ति होगी। भट पुस्तक से वे पन्ने जिन पर चित्र थे फाड़ लिये और पुस्तक वापिस कर दी। पुस्तक बहुत बड़ी थी, भेद न खुला, किन्तु छुपे कैसे? सत्य भी कभी छुपता है? एक दिन एक जापानी विद्यार्थी उसके कमरे में आया, मेज पर उस पुस्तक के फटे हुए पन्ने पड़े थे। देखकर उसने अफसर को सूचना देदी और वहां नियम हो गया कि अब किसी हिन्दुस्तानी विद्यार्थी को कोई पुस्तक न दी जाय। डूब मरने का स्थान है! एक तो आपने उस जापानी विद्यार्थी की बात सुनी जो जहाज़ पर हिन्दुस्तानी लोगों के लिये खाना लाया था, और एक इस हिन्दुस्तानी की कर्तूत देखी। जापानी अपना सर्वस्व दे देने को तैय्यार है कि जिससे अपने देश पर कलंक न आ जाय। और

हिन्दुस्तानी विद्यार्थी अपना ही स्वार्थ चाहता है, समस्त देश पड़ा बदनाम हो—कलंकित हो। हाथ (शरीर से) यह नहीं कह सकता कि मैं अकेला या (सब से) पृथक हूं। मेरा रुधिर और है और सारे शरीर का रुधिर और है। इस भेद भाव से यह ख्याल उत्पन्न होगा कि हाय! कमाऊं तो मैं और पले सारा शरीर। इस स्वार्थ सिद्धि के लिये हाथ के लिये केवल एक ही उपाय हो सकेगा, वह यह है कि जो रोटी कमाई है, उसे सारे शरीर के लिये मुँह में डालने के बदले हाथ अपनी हथेली पर बांध ले, या नाखूनों में घुसेड़ ले। पर क्या यह स्वार्थपरायणता की चाल लाभदायक होगी? अलबत्त एक उपाय और भी है कि शहद की मक्खी या भिड़ से हाथ अपनी उंगलियां डसवाले, इस तरह सारे शरीर को छोड़ कर अकेला हाथ स्वयं बहुत मोटा होजायगा, किन्तु यह मोटापन तो सूजन रोग है, बीमारी है। इसी तरह जो लोग जातीय हित अपना हित नहीं समझते अपने आत्मा को जाति के आत्मा से भिन्न मानते हैं, ऐसे स्वार्थियों को सिवाय सूजन रोग के और कुछ हाथ नहीं आता। हाथ वही शक्तिमान और बलिष्ठ होगा जो कान, नाक, आंख पैर आदि सारे शरीर की आत्मा को अपनी आत्मा मान कर आचरण करता है, और मनुष्य वही फले फूलेगा जो सारे राष्ट्र के आत्मा को अपनी आत्मा मान लेता है।