अमेरिका का कुछ विस्तृत वृत्तान्त।
अमेरिका में पहली आश्चर्य की बात यह देखी गई कि एक जगह पति तो प्रोटेस्टंट मत का था और पत्नी रोमन कैथोलिक। चित्त में यह विचार आया कि इस प्रकार के संप्रदाय भेद वाले लोग हमारे भारत में तो (जैसे आर्य-
समाजी और सनातनधर्मी) एक मोहल्ले में कठिनता से काटते हैं, इन पतिपत्नी का एक घर में कैसे निर्वाह होता होगा? पूछने से मालूम हुआ कि बड़े प्रेम से रहते सहते हैं। रविवार के दिन पति पहले पत्नी को उसके रोमन कैथोलिक गिरजा में साथ जाकर छोड़ आता है, उसके बाद वह स्वयं अपने दूसरे गिरजा में जाता है। पति से बात चीत हुई तो वह कहने लगा कि जी! मेरी पत्नी के धर्म का प्रश्न तो उसके और परमात्मा के मध्य है। मैं कौन हूं हस्तक्षेप करने वाला? मेरे साथ उसका सम्बन्ध नितान्त सरल है, परमात्मा के साथ अपने सम्बन्ध की वह जाने। क्या खूब!
अमेरिका में राष्ट्रीय एकता के सामने मतभेद की कुछ वास्तविकता ही नहीं। भारत वर्ष का आर्य समाजी हो, सिक्ख हो, मुसलमान हो, अमेरिका में हिन्दू ही कहलाता है। उनके हृदय में राष्ट्रीय एकता इतनी समा रही है, कि वे हमारे यहां के इतने भारी मतभेदों को भूल जाने में जरा देर नहीं लगाते। भारत वर्ष के कुछ धर्मानुयायी यदि यह जानते कि अन्त में अन्य सभ्य देशों में हमें हिन्दू, भारतवासी ही कहलाना है, तो हिन्दू शब्द पर इतने झगड़े और इस नाम से इतनी लज्जा न मानते।
उस देश के शक्तिशाली होने का एक कारण यह भी है कि वहां ब्रह्मचर्य है। मनुष्यबल को व्यर्थ नहीं खोने देते। सामान्यतः 20 वर्ष पर्यंत तो लड़के लड़की को विचार भी नहीं आता कि विवाह क्या वस्तु है। इसका एक कारण विचार पूर्वक देखने से यह मालूम हुआ कि बालक और बालिकायें बचपन से इकठ्ठे खेलते कूदते, एक छत के नीचे लिखते पढ़ते, और साथ २ रहते सहते हैं, और फिर साथ २
ही कालिजों में शिक्षा पाते हैं। अतएव आपस में भाई बहिन का सा सम्बन्ध बना रहता है और अन्तःकरण शुद्धता और पवित्रता से भरे रहते हैं। वहां लड़कियों के शरीर लड़कों के शरीर के समान ही बलवान होते हैं, इस लिये युवावस्था में उनकी सन्तति भी बलवान होती है। यदि पुरुष बलवान् है और स्त्री दुर्बल हो तो इसका आधा प्रभाव सन्तान पर होगा।
एक बार लेकजिनिवा (Lake Geneva) के तट पर जब राम रहता था, एक 13 वर्ष के वय की बालिका तैरते २ 3 मील तक चली गई। किश्ती पीछे २ थी, कि यदि डूबने लगे तो सहायता की जाय। परन्तु कहीं सहायता की आवश्यकता न पड़ी। जब लड़कियों की यह दशा है तो भविष्य में उनकी सन्तान क्यों बलवान न होगी? और जब शरीर में स्वास्थ्य है तो अन्तःकरण में क्यों पवित्रता न होगी?
उनके ब्रह्मचर्य का और भी एक कारण है। अशक्ति से पाप होता है, और अजीर्ण से अशुद्धि होती है। जब मेदा ठीक न हो तो चिन्ता और फिक्र स्वाभाविक ही पीछे लगजाते हैं। स्वास्थ्य ठीक नहीं है तो बात बात में क्रोध आता है। वेद में लिखा है कि बलहीन इस आत्मा को नहीं जान सकता।
"नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः"।
कमजोर की दाल ईश्वर के घर में भी नहीं गलती। जिसके अन्दर शारीरिक और आत्मिक बल नहीं है, वह ब्रह्मचर्य का कब पालन कर सकता है? और यह भी स्पष्ट है कि ब्रह्मचर्य से रहित मनुष्य शारीरिक और आत्मिक बल से रहित हो जाता है।
वहां कालिजों में क्या स्थिति है? बी. ए. एम. ए. और
डाक्टर आफ फिलासफी की उपाधि [डीगरी] पाने पर्यन्त विद्यार्थियों को शारीरिक व्यायाम का शिक्षण साथ २ दिया जाता है। युद्धविद्या, कृषिविद्या, लोहारी, बढ़ाईपन, मेमार का काम बराबर सिखाया जाता है। मनुष्य के अन्दर तीन बड़े महकमे [कार्यालय] हैं। एक कर्मेन्द्रिय, दूसरा ज्ञानेन्द्रिय और तीसरा अन्तःकरण, इनको अंगरेजी में 'ह' कार से आरम्भ होनेवाले तीन शब्दों में वर्णन कर सकते हैं। हैंड [Hand-कर्मेन्द्रिय] हेड, [Head-ज्ञानेन्द्रिय] और हार्ट [Heart-अन्तःकरण]।
ज्ञानेन्द्रियों से बाहरी ज्ञान अन्दर जाता है और बाह्य पदार्थ अन्दर असर करते हैं। कर्मेन्द्रियों (जैसे हाथ पैर) से अन्दर की शक्ति बाहर प्रभाव डालती है। कर्मेन्द्रियां और ज्ञानेन्द्रियां यदि परस्पर योग्य प्रमाण से बढ़ती रहें और उन्नति करती जांय तो उत्तम है। यदि बाहर से ज्ञान को ठूंसते जांय और अन्दर के ज्ञान तथा बल को बाहर न निकालते रहें, तो दशा वैसी ही हो जाती है कि मनुष्य खाता तो रहे किन्तु उसके शरीर से कुछ बाहिर न निकल सके। इसका परिणाम होगा बौद्धिक अजीर्ण और आत्मिक कब्ज़। यह शिक्षा नहीं है, रोग है।
अमेरिका में साधारण रीति से युनिवर्सिटि की शिक्षा का यह मन्तव्य और उद्देश्य है कि स्वदेश की वस्तुएँ काम में लाई जांय, अर्थात् जमीन, खानें, बनस्पति, और अन्य पदार्थ इत्यादि का उपयोग और अधिक मूल्यवान बनाना मालूम हो जाय। जितने कला कौशल्य सिखलाये जाते हैं वे प्रत्यक्ष व्यवहार में उपयोगी और लाभदायक होते हैं। कोई विद्यार्थी रसायनशास्त्र निरर्थक नहीं पढ़ेगा। यदि
उसने रसायनशास्त्र को व्यावहारिक उपयोग में लाने की कला जैसे कि रासायनिक शिल्पविज्ञान [Chemical Engineering] इत्यादि भी साथ न सीखना हो।
एक धार्मिक कालेज में राम का व्याख्यान हुआ। व्याख्यान के बाद कालेज के लोगों ने अपनी जंगी कवायद [सैनिक व्यायाम] दिखलाई और कालेज के सैनिक गीतों से जय पुकारते २ व्याख्याता की सलामी की। राम ने पूछा "यह क्या? कालेज तो धार्मिक और शिक्षा सैनिक?" प्रिन्सपल साहब ने उत्तर दिया, 'धर्म के अर्थ हैं देह और देहाभ्यास को हज़रत ईसा के समान सूली पर चढ़ा देना, अभिमान को मिटा देना, जान को देश निमित्त हथेली में उठाये फिरना। और यह प्राण समर्पण और सच्ची शूरवीरता की आत्मा सैनिक शिक्षा से आती है।
अब कोमल मनोवृत्ति और अन्तःकरण की पवित्रता की शिक्षा की स्थिति देखिये। एक विश्वविद्यालय [युनिवर्सिटी] में राम गया जो केवल विद्यार्थियों और अध्यापकों की कमाई से चल रही थी। विद्यार्थी लोग वहां शुल्क [फीस] इत्यादि कुछ नहीं देते। अन्य शिक्षाओं के अतिरक्त विद्यार्थी लोग, अध्यापकों के अधीन कालिज की जमीन पर या यंत्रों पर काम करते हैं। अध्यापक नवीन २ प्रयोग और परिशोध करते हैं और विद्यार्थियों को सिखाते हैं। जमीन के अनोखे ढंग की और निराली उत्पन्न और नवीन कारीगरी की आमदनी से सब खर्चे निकलते हैं। राम की उपस्थिति में एक कमरे में विद्यार्थियों का आपस में झगड़ा हो पड़ा। प्रिन्सिपल के पास यह मुकद्दमा गया। प्रिन्सिपल ने उस कमरे में सब काम बन्द करा दिया, और
प्यानो बाजा बजाना शुरू करा दिया। 15 मिनिट में मुकद्दमा फैसला हो गया, अर्थात् परस्पर निपटारा होगया। वाह! जिनके अन्दर शान्ति रस भरा है उनके अन्दर के मेल और शान्ति को उकसाने के लिये बाहरी संगीत ही काफी बहाना हो जाता है। और कैसा प्रबन्ध है, वायु में सत्वगुण भर दिया, दिलों की खटपट आपही रफा हो गई।
शिकागो विश्वविद्यालय के बी० ए० श्रेणि के एक विद्यार्थी ने राम के कुछ तत्वज्ञान के व्याख्यानों पर नोट लिये और थोड़े दिनो में अपनी ओर से घटा बढ़ा के उनकी एक पुस्तक बनाकर विश्वविद्यालय के स्वाधीन की। इस विद्यार्थी को तत्काल एक श्रेणि की वृद्धि करदी। यह नहीं देखा कि इसने मिल और हेमिल्टन की पुस्तकों से अपने मस्तिष्क को लेटरबेग (पत्रों की थेली) बनाया है कि नहीं। अवश्यमेव वास्तविक शिक्षा का आदर्श यह है कि हम अन्दर से कितनी विद्या बाहर निकाल सकते हैं, यह नहीं कि बाहर से अन्दर कितनी डाल चुके हैं।
राम एक समय वहां शास्ता पर्वत के जंगलों में रहता था। कुछ मनुष्य भी मिलने आये। उनके साथ एक बारह वर्ष की लड़की भी थी। सब राम के उपदेश को ध्यानपूर्वक सुनते रहे, किन्तु थोड़ी देर के लिये लड़की अलग जाकर बैठ गई। जब वापिस आई तो एक कागज़ पेश किया। यह क्या था! राम का सारा उपदेश, जिसे वह अंगरेजी कविता में पिरोलाई। बाद में यह कविता वहां के वर्त्तमानपत्रों में छप भी गई। बालकों की यह बुद्धि और योग्यता उनको स्वतन्त्र रखने का परिणाम है। मनुष्य चाहे बच्चा हो या वृद्ध वह केवल वातालाप करने वाला पशु कहलाता है। पशुवृत्ति और
वाक्शक्ति अर्थात् बुद्धिमता ये दो अंश जो मनुष्य में हैं, उस में बुद्धिमता सवार है और पशुवृत्ति सवारी का घोड़ा। जब हम बालकों की विचारशक्ति को प्रेम से समझाकर उनसे काम नहीं लेते, किन्तु बुरा भला कहकर उनपर शासन करते हैं तो मानो पशुवृत्ति के घोड़े को लाठी के प्रभाव से बुद्धिमता के सवार के तले से निकाल ले जाना है। ऐसी अवस्था में बच्चे के अन्दरवाले को क्रोध क्यों न आवे? बालकों को डाटना केवल पशुवृत्ति से काम लेना है और उनमें उस अंश (बुद्धिमता) का अपमान करना है, जिसके कारण मनुष्य संसार में श्रेष्ठ कहलाता है। सख्ती करना या झिड़कना उन के भीतर की श्रेष्ठता का अपमान करना है। बिना समझाये या बिना कारण बतलाये बालक पर किसी प्रकार की निषेधक आज्ञा करना कि "ऐसा मत करो, वैसा मत करो" उसे उस काम करने की उत्तेजना स्वतः देना है। जिस समय परमात्मा ने हज़रत आदम को आज्ञा दी कि "अमुक वृक्ष का फल मत खाना" तो उसी निषेध के कारण हज़रत आदम के दिल में बुरा विचार उत्पन्न हो आया। उस स्वर्गोद्यान (बागे-जिन्नत) में हजारों वृक्ष थे किन्तु जब निषेध किया गया कि "यह न खाना" तो स्वतः उसके खाने की इच्छा उत्पन्न हुई। बहुत से आवश्यक विज्ञापनों का वर्त्तमान पत्रों में यह शीर्षक (heading) होता है "इसको मत पढ़ना।"
किसी मनुष्य ने एक महात्मा से मंत्र चाहा। महात्मा ने मंत्र बतला कर कहा "तीन माला जपने से मंत्र सिद्ध हो जायगा। परन्तु शर्त यह है कि सावधान, माला जपते कहीं बन्दर का ख्याल न आने पाय"। थोड़े अनुभव के बाद वह बेचारा साधक महात्मा से आकर कहने लगा, "महाराज जी, बन्दर
मेरे तो कहीं स्वप्न में भी न था, किन्तु आपके 'सावधान' करने से अब तो बन्दर का ख्याल मुझे छोड़ता ही नहीं। "चित्त में यह उलटा प्रभाव डालने वाली शिक्षा का ढंग अमेरिका में नहीं। बालकों की शिक्षा वहां शिशुशिक्षा (किंडर गार्टन) की पद्धति पर होती है। अध्यापक बालकों के साथ खेलते कूदते, गाते, नाचते पढ़ाते चले जाते हैं, और बालक हँसी के साथ अभ्यास करते जाते हैं। उदाहरणार्थ बालकों को जहाज़ का पाठ पढ़ाना है। एक एक लकड़ी का जहाज़ बना हुआ प्रत्येक बालक की कुरसी के आगे रखा हुआ है और बांस की फांकें आदि पास धरी हैं जिनसे नया जहाज़ बना सके। बालकों के साथ मिले हुए अध्यापक या अध्यापिका कहती है "हम तो जहाज़ बनायँगे, हम तो जहाज़ बनायँगे।" बच्चे भी देखा देखी कहने लग पड़ते हैं, "हम भी जहाज़ बनायँगे" पे, लो सब बैठ गये, एक बालक ने जहाज़ बना दिया, दूसरे ने सफलता पा ली, फिर तीसरे ने बना लिया। जिस किसी को जरा देर लगी अन्य बालकों ने या अध्यापिका ने सहायता देदी। फिर बालकों ने बड़ी रुचि के साथ अध्यापिका से स्वयं प्रश्न करने शुरू किये। जहाज़ के इस भाग का क्या नाम है? वह भाग क्या कहलाता है? यह क्या है? वह क्या है? अध्यापिका मस्तूल आदि सब का हाल और नाम बतलाती जाती है, और बालक इस प्रकार जहाज़ के सम्बन्ध की सब बातें मानो अपने आप ही सीख गये। हमारे यहां बालक पढ़ते हैं "K के ee डबल-ई l एल = कील (Keel) माने जहाज़ की पेंदी" ऐसा रटते २ सिर में कील ठुक गई, मगर बालक को खबर भी न हुई कि कील, क्या चीज है, और जहाज़ कैसा होता है? वहां 'पदार्थ' की पहिचान पहले कराई जाती है, 'पद' [नाम] पीछे बतलाया जाता है। यहां नाम [पद]
पहले याद कराते हैं, [पदार्थ] विषय का चाहे सारी आयु पता न लगे। वहां बालक प्रश्न करते रहते हैं (जैसा कि सब जगह बालकों का स्वभाव) और अध्यापक का कर्तव्य है उनको पूरे २ उत्तर देते जाना। यहां इतने बड़े अध्यापकों को लज्जा नहीं आती कि छोटे २ बच्चों को प्रश्न पूछ २ कर हैरान करते हैं। पढ़ना वह क्या है, जिसमें आत्मिक आनन्द न हो। यहां शिक्षक को देख कर बालकों का मारे भय से प्राण जाता है, वहां बालकों का प्रेम जो शिक्षकों से है, माता पिता से नहीं। जो प्रसन्नता उन्हें शाला में है घर में नहीं। शालाओं में वहां शुल्क [फीस] नहीं लिया जाता और पुस्तकें सब को मुफ्त दी जाती हैं।
अब वहां की दुकानों की स्थिति देखिये। शिकागो में राम एक दुकान पर बुलाया गया, जिसके फर्श का क्षेत्रफल एक तिहाई गाज़ीपुर से कम न होगा और दुकान के नीचे ऊपर पच्चीस मंजलें थीं, जिस मंजिल पर जाना चाहो, बालाकश [Elevator—ऊपर उठाने वाली कल] झट ले जायगी। हर मंजिल में नवीन प्रकार का माल भरा हुआ था। करोड़ों के ग्राहक प्रतिदिन आते हैं, किन्तु दुकानवालों का बर्ताव सब के साथ एक समान है, चाहे लाख का ग्राहक हो चाहे पांच पैसे का, मूल्य एक ही होगा, जो प्रत्येक वस्तु के ऊपर लिखा है। इससे कौड़ी कम नहीं, कौड़ी अधिक नहीं, और हसमुख हुए सब के साथ (यहां तक कि जो कुछ भी न खरीदे और दस वस्तुओं के दाम पूछ २ कर चला जाय उसे भी) द्वार तक छोड़ने आते हैं और अपने नियमानुसार शिष्टाचार से नमस्कार करते हैं। इस बड़ी दुकान ही पर नहीं, साधारण दुकानों पर भी यही बर्ताव है।
अमेरिका, जापान, इंग्लैंड, जर्मनी में पुलिस अत्यन्त सभ्य और प्रजा की सेवक है। प्रजारक्षक है, प्रजाभक्षक नहीं। कुछ श्रोतागण शायद दिल में कह रहे होंगे कि बस बन्द करो, अमेरिकन लोगों की बहुत प्रशंसा करली। उनके गीत कहां तक गाते जाओगे? क्या हमें अमेरिकन बनाया चाहते हो? इस भ्रांतिवालों से राम कहता है कि क्या भारतवासी अमेरिकन बने? हर! हर! हर! दूर हो यह विचार जिसके दिल में भी आया हो। परे हटा दो यह आशा जिस किसी ने कभी की हो। राम का ऐसा विचार कदापि नहीं हुआ, न होगा। अलबत्ता कुछ बातें उन देशों से लेना हम लोगों के लिये जरूरी हैं। यदि हम विनाश के प्रहार से बचना चाहते हैं, यदि हमें हिन्दू बने रहना स्वीकार है, तो हमें उनके कला कौशल्य ग्रहण करने होंगे, चाहे वे किसी मूल्य पर मिलें। जब राम अमेरिका में रहा तो सिर पर पगड़ी हिन्दुस्तानी थी किन्तु बाजारों में बर्फ होने के कारण पांवों में जूता उसी देश का था। लोगों ने कहा "जूता भी हिन्दुस्तानी क्यों नहीं रखते?" राम ने उत्तर दिया, "सिर तो हिन्दुस्तानी रक्खूंगा किन्तु पांव तुम्हारे ले लूंगा। राम तो चित्त से यह चाहता है कि आप हिन्दुस्तानी ही बने रहकर अमेरिकन आदि से बढ़ जांय और यह उन राष्ट्रों से दूर रहते हुए नहीं हो सकता। आज विद्युत् वाष्प, रेल तार इत्यादि देश और काल को मानों हड़प कर गये हैं। दुनिया एक छोटा सा टापू बन गई है, समुद्र मार्ग में विघ्नरूप होने के बदले राजमार्ग हो गया है। जिनको कभी भिन्न देश कहते थे वे नगर हो गये हैं। और पहले के नगर मानो गलियां बन रही हैं। आज यदि हम अपने तईं अलग थलग रखना चाहें और दूसरे राष्ट्रों से भिन्न मान कर अपने ही
ढाई चावल की खीचड़ी पकायें, आज बीसवीं शताब्दि में यदि हम मसीह से बीसवीं शताब्दि पहले के रीति और रिवाज़ बर्तें, आज यदि हम पाश्चात्य देशों के कला कौशल का मुकाबला करना न सीखें, आज यदि हम उधार धर्म के लड़ाई झगड़े छोड़ कर नक़द धर्म को न बर्तें, तो हम इस तरह से उड़ जायँगे जैसे देश और काल उड़ गये हैं। भारतवासियो। अपनी स्थिति को पहचानो।
कंचन होवे कीच में विष में अमृत होय, विद्या नाशी नींच में तीनों लीजे सोय।
जब भारतवर्ष में ऐश्वर्य था तो भारतवासियों ने अपने को कूपमंडूक नहीं बना रक्खा था। जब पुष्कर में यज्ञ हुआ तो हबशी, चीनी और ईरानी राष्ट्रों के लोगों को निमंत्रण दिया गया। राजसू यज्ञ के पहिले भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव पांडव दूर २ के विदेशों में गये। स्वयं रामचन्द्र जी मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार ने समुद्र पार जाने की मर्यादा बांधी।
दोश अज मसजिद सूए मैखाना आमद पीरे-मा, चिस्त यारा ने, तरीकत बाद अजी तदबीरे मा।
अर्थात् कल रात्रि हमारा गुरु मंदिर से मदिरागृह में आया। हे मर्यादा वाले लोगो, अब क्या युक्ति की जाय?
उन दिनों तो भारतवर्ष किसी अन्य देश के अधीन भी न था, किन्तु आज अन्य देशों के कला कौशल्य सीखने की वह आवश्यकता है कि इनके बिना प्राण जाता है। बस आज भारतवर्ष यदि जीना चाहता है तो अमेरिका यूरुप, जापान आदि बाहर के देशों से अपने आप को स्वयं खारिज न कर दे। बाहर की हवा लगने से जान में जान आ जायगी। हिन्दू बाहर जायँगे तो सच्चे हिन्दू बन जायँगे।
बाहर जाने से अपने शास्त्र का सन्मान मालूम होगा, और बहुत अच्छी तरह से मालूम होगा, और शास्त्र वर्ताव में आने लगेगा। तुम अपने तईं नितान्त संसार से विरक्त बना नहीं सकते। जितना विदेशी लोगों से मुंह मोड़ा उतना उनके दास बन कर रहना पड़ा।