श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

संकल्प बल।

भाग 4 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 4 · अध्याय 6 / 8

संकल्प बल।

पुराणों में सुना करते थे और पढ़ा करते थे कि अमुक ऋषि के वर या शाप से अमुक व्यक्ति की दशा बदल गई। योगवासिष्ठ में शिला (पत्थर) में सृष्टि दिखाने का उल्लेख आता है, किन्तु अमेरिका में ऐसे दृश्य आंखों के सामने प्रत्यक्ष गुजरे। युनिवर्सिटी के मकानों और हस्पतालों में इस प्रकार के प्रयोग किये जाते हैं कि हजारों रोगी केवल संकल्प बल से अच्छे किये जाते हैं। प्रोफेसर की उत्तेजना से मेज का घोड़ी दीखना या जेम्स साहब का डाक्टर पाल हो जाना (व्यक्ति का बदल जाना), पुराने जेम्सपन का उड़ जाना यह सब अपनी आंखो देखा।

संस्कृत में वेदान्त के असंख्य उत्तम ग्रन्थ हैं जैसे दत्तात्रेय की अवधूत गीता, श्री शंकराचार्य के वेदान्त के स्तोत्र, अष्टावक्र गीता, योगवासिष्ठ के कुछ अध्याय। फारसी में सब से बढ़कर (तौहीद) अद्वैत का ग्रन्थ शम्स तब्रेज़ का है। उस से उतर कर मसनवी शरीफ, शेख अत्तार, मगरबी वगैरह। किन्तु अमेरिका में वाल्ट व्हिटमन के "तृणपर्ण" (Leaves of Grass) बड़ा अद्वैत का उन्माद और निजानन्द लाते हैं, जो अवधूत गीता, अष्टावक्र गीता, शंकराचार्य के स्तोत्र, शम्स तब्रेज़ और बुल्लाशाह की कविता, बल्कि इनसे भी कहीं बढ़कर।

डट कर खड़ा हूँ खौफ से खाली जहान में, तस्कीने-दिल भरी है मेरे दिल में जान में। सूंघे जमाँ मकाँ हैं मेरे पर मिस्ले-सग, मैं कैसे आ सकूं हूँ कैदे-बयान में।

हबशी गुलामों को स्वतंत्रता देने के लिये अमेरिका के आन्तर युद्ध के दिनों यह वाल्ट व्हिटमन प्रत्येक युद्ध में मरहम पट्टी करना, प्यासों को पानी पिलाना, मृत्युमुख पुरुषों को अपनी मुस्कयानों से जान में जान लाना और इसी समय की अपनी नवीन काव्यकृति को रात दिन गाते फिरना उसके लिये खेल का काम था। इस रोने धोने की भीड़ में, घोर रणभूमि में, भीषण संग्राम में, व्हिटमेन ऐसा प्रसन्नचित्त और प्रफुल्लित फिरता था जैसे महादेवजी भूत प्रेत के घमसान में, या कृष्ण भगवान कुरुक्षेत्र की रणभूमि में। धन्य थे इन निरन्तर युद्धों के अधमुए जो ऐसे अवतार पुरुष के दर्शन करते मृत्यु को प्राप्त हुए।

शब हो हवा हो धूप हो तूफाँ हो छेड़ छाड़, जंगल के पेड़ कब इन्हें लाते हैं ध्यान में? गर्दिश से रोजगार के हिल जाय जिसका दिल, इन्सान होके कम हैं दरख्तों से शान में।

भावार्थ:—चाहे रात्रि हो, चाहे हवा हो, चाहे धूप हो, चाहे आंधी और उसके झोंके, जंगल के वृक्ष इनकी कुछ परवाह नहीं करते। और समय के हेरफेर से जिनका चित्त अस्थिर हो जाय वह चाहे मनुष्य है, परन्तु वृक्षों की अपेक्षा तुच्छ है।

1 शान्ति। 2 काल। 3 देश। 4 कुत्ते के समान। 5 उल्लेख के बन्धन में

इस प्रकार का ब्रह्मनिष्ठ अमेरिका में हेनरी थोरो भी हुआ है जो सच्चे ब्रह्मचारी या संन्यासी का जीवन एकान्त जंगलों में व्यतीत करता था। अलबत्ता आलस्यसेवी साधु न था। अमेरिका का सब से बड़ा लेखक (एमर्सन) इस थोरो के सम्बन्ध में लिखता है कि, शहद की भिड़ उसकी चारपाई पर उसके साथ सोती है, किन्तु इस निडर प्रेम के पुतले को नहीं डसतीं। जंगल के सांप उसके हाथों और टांगों को चिमट जाते हैं, किन्तु इन्हें कंकण और आभूषण समझता हुआ इनकी परवाह नहीं करता। कैसा व्यालभूषण है!

मार्ग पर चलते २ एमर्सन ने पूछा "यहां के पुराने निवासियों के तीर कहां मिलते हैं, तो अपने स्वभाव के अनुसार झट जवाब दे दिया, "जहां चाहो" और इतने में झुक कर उसी स्थान से अपेक्षित तीर उठाकर दे दिया। दृश्यमान् जगत पर यह कितना महत्व का अधिकार है!

स्वयं एमर्सन जिनकी लेखनी ने अर्वाचीन जगत में नवीन चेतना फूंक दी, भगवद्गीता और उपनिषदों का न केवल अभ्यासी बल्कि उनको बहुत बड़ा आचरण में लाने वाला था। इसने अपने लेखों में उपनिषद और गीता के प्रमाण कई एक स्थानों पर दिये हैं। और उसके निज के मित्रों की जुबानी मालुम हुआ कि उसके विचारों पर विशेषतः गीता और उपनिषदों का प्रभाव था। महात्मा थोरो अपने 'वाल्डन' नामक पुस्तक में लिखता है, "प्रातःकाल में अपने अन्तःकरण और बुद्धि को भगवद्गीता के पवित्र गंगाजल में स्नान कराता हूं। यह वह सर्वश्रेष्ठ और सर्वव्यापी तत्वज्ञान है कि इसको लिखे हुए देवताओं को वर्षों के वर्ष बीत गये, किन्तु इसके बराबर की पुस्तक नहीं निकली। इसके

समझ हमारा अर्वाचीन जगत अपनी विद्याओं और कला कौशल और सभ्यता के साथ तुच्छ और क्षुद्र मालूम देता है। इसकी महत्ता हमारे विचार और कल्पना से इतनी दूर है, कि मुझे कई बार खयाल आता है कि शायद यह शास्त्र किसी और ही युग में लिखा गया होगा। एक और प्रसंग पर मिश्र के भव्य मीनारों का वर्णन करते हुए थोरो लिखता है कि, प्राचीन जगत के समस्त संस्मरणों में भगवद्गीता से श्रेष्ठ कोई संस्मरण नहीं है। यही भगवद्गीता और उपनिषदों की शिक्षा आचरण में आई हुई व्यावहारिक वेदान्त या नक़द धर्म हो जाती है। इसी को रंगों पट्टों में लाकर वे लोग उन्नति को प्राप्त हो रहे हैं। आपके यहां यह कीमती नोट मौजूद है, पर कागज़ के नोट से चाहे वह कितनी ही कीमती हो भूख नहीं जाती, प्यास नहीं बुझती, शरीर की ठंड नहीं दूर होती। इस हुंडी को भुना कर 'नक़द धर्म' में बदलना पड़ेगा। आज वे लोग इस नोट की कीमत दे सकेंगे। आज वहां पर हुंडी खरी हो सकती है। करो खरी।

जब सीता जी अयोध्या से बनवास को सिधारीं, तो उनके पीछे नगर की शोभा दूर हो गई, शोक विलाप फैल गया। प्रजा व्याकुल हो गई। राजा का शरीर छूट गया। रानियों को रोना पीटना पड़ गया। राजसिंहासन चौदह वर्ष तक मानो खाली रहा और जब सीता जी को समुद्र पार से लाने के लिये रामचन्द्र जी खड़े हो गये तो पक्षी (गरुड़ और जटायु) भी सहायता करने को तैय्यार हो गये, जंगल के पशु (बन्दर, रीछ, इत्यादि) लड़ने मरने के लिये सेवा में उपस्थित हो गये। कहते हैं कि अपनी छोटी सी शक्ति के अनुसार गिलहरियां भी मुंह में रेत के दाने

भर २ कर पुल बांधने के लिये समुद्र में डालने लगीं। वायु और जल भी अनुकूल बन गये। पत्थर भी सब समुद्र में डाले तो सीता के लिये अपने स्वभाव को भूल गये और डूबने के स्थान पर तैरने लगे।

कुनम सद्सर फिदाए पाये-सीता। चे यकता सराचि दहता सराचि सीता॥

अर्थात् मैं सौ सिर सीता जी के पैरों पर भेंट कर दूंगा चाहे एक शिर का शिर हो, चाहे दस का, चाहे तीस का।

सीता से अभिप्राय अध्यात्म रामायण में है ब्रह्मविद्या। हम कहेंगे "अमली ब्रह्मविद्या" (नक़द धर्म) को तिलांजलि देने से भारतवर्ष में सर्व प्रकार की आपत्ति आई। क्या क्या विपत्ति नहीं आई? किस किस दुःख और रोग ने हमें नहीं सताया? हाय! यह सीता समुद्र पार चली गई। व्यावहारिक ब्रह्मविद्या को समुद्र पार से लाने के लिये आज खड़े तो हो जाओ और देखो समस्त संसार की शक्तियां आपस में शर्तें बांध कर तुम्हारी सेवा व सहायता करने के लिये हाथ जोड़े खड़ी हैं, सब के सब देवता और मलायक देवदूत सिर झुकाय हाजिर खड़े हैं! प्रकृति के नियम शपथ खा २ कर तुम्हारी सहायता को कटिबद्ध हो खड़े हैं। अपने ईश्वरत्व में जागो तो सही और फिर देखो, कि होता है या नहीं।

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा, हम बुलबुलें हैं उसकी वह बोस्तां हमारा।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!