श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

विश्वास या ईमान।

भाग 4 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 4 · अध्याय 7 / 8

विश्वास या ईमान।

(ता॰-10-9-1905 को फैजाबाद के विक्टोरिया हाल में दिया हुआ व्याख्यान)

(स्वामीजी ने फरमाया कि व्याख्यान से पूर्व हम सबको ध्यान कर लेना जरूरी है। अर्थात् इस बात का ख्याल करें कि हम सब में एक ही आत्मा व्यापक है, एक ही समुद्र की हम सब तरंगें हैं, एक ही सूत्र (धागे) में हम सब माला के मोतियों के समान पिरोये हुए हैं। फिर कुछ समय तक शान्ति आच्छादित हो गई। सब ने मौन धारण कर लिया और श्री स्वामी जी तथा श्रोतागण इस ध्यान में डूब गये। तत्पश्चात् "ओ3म्" का ऊंचे स्वर से उच्चारण करके स्वामी जी ने अपनी वक्तृता इस प्रकार आरम्भ की।)

वनस्पति विद्या [Botany] की यह एक साधारण कहावत है कि जून के महीने से वृक्ष फूल नहीं देते और अपने पत्तों को इस प्रकार शोभायमान करते हैं कि उनके सामने फूल मात हो जाते हैं। चाहे रंगत की दृष्टि से देखो चाहे सुगंध की दृष्टि से। रंग और गंध दोनों ही में वे पत्ते किसी दशा में न्यून नहीं होते —वरन् बल और शक्ति की दृष्टि से वे पुष्पों से भी श्रेष्ठ होते हैं, क्योंकि उन में पुष्पों की कोमलता और बलहीनता के स्थान पर बल और शक्ति होती है। इसका कारण क्या है? इसका कारण वही "ब्रह्मचर्य" है! अर्थात् पुष्पों का विवाह होता है, मगर वह पौधे, जो फूलते नहीं ब्रह्मचारी रहते हैं।

जब यह बात वृक्षों में पाई जाती है, तो क्या मनुष्य में इसका विकास नहीं है? हमारी दृष्टि सत्, परमेश्वर में

इस प्रकार जमनी चाहिये कि उसके सामने इस जगत् के पदार्थ सब के सब मिथ्या दिखाई देने लगें।

हूर पर आंख न डाले कभी रैंदा तेरा। सब से बेगाना है, ऐ दोस्त आशिनासा तेरा।

राम इसी अवस्था का नाम अभ्यास, निश्चय, श्रद्धा, विश्वास वा इस्लाम बतलाता है।

असभ्य जातियों के विषय में कहा जाता है कि रात्रि को वह जाड़ों के मारे ठिठुर रहे हैं। अगर किसी ने उनको कम्मल दे दिया तो ओढ़ लिया, फिर जहां सबेरा हुआ और धूप निकली, फिर जिसने चाहा एक मिसरी की डली देकर उनसे कम्मल ले लिया। रात हुई अब फिर कांप रहे हैं। फिर दूसरी रात को कम्मल पाया। ओढ़ा और दिन में किसी ने एक जरा सी मिसरी की डली का लालच देकर उनसे कम्मल ले लिया। अर्थात् अब उनको उस मिसरी की डली के सामने वह रात का जाड़ा जो अब सामने मौजूद नहीं है, याद नहीं आता। इसी तरह ऐसे लोग भी हैं जो अपने आप को असभ्य नहीं कहते मगर वह उस चीज़ को नहीं मानते जो उनकी आंखों के आगे इस समय मौजूद नहीं, अर्थात् विश्वास नहीं रखते। उस वस्तु का मानना जो उनकी आंखों के आगे मौजूद नहीं है, विश्वास, निश्चय, यक़ीन, fatih या इस्लाम कहलाता है।

एक बार देवताओं का असुरों के साथ युद्ध हुआ। देवता लोग बल में असुरों से कम थे। उनके गुरु वृहस्पति ने चार्वाक का तत्वज्ञान असुरों को सिखाया। इस तत्वज्ञान के ऐसेही सिद्धांत हैं कि खाओ पियो और चैन करो (eat,

1 स्वर्ग की अप्सरा। 2 प्रेमासक्त। 3 निराला। 4 पहचाननेवाला।

drink and be merry) और किसी ऐसी वस्तु को जो तुम्हारे सामने न हो मत मानो।

जिस जाति में भलाई, सत् या ईश्वर पर विश्वास, श्रद्धा या इस्लाम नहीं है वह जाति विजेता नहीं हो सकती। एक महाशय ने राम से आज यह शिकायत की कि विश्वास ने भारतवर्ष को चौपट कर दिया। वह महाशय विश्वास का अर्थ नहीं जानते हैं जो ऐसा कहते हैं। लो, आज राम विश्वास के बारे में कुछ बोलेगा। अमेरिका का एक सुविख्यात देशभक्त कवि वाल्ट व्हिटमेन जिसका ज़िक्र राम ने कल किया था और जिस के नाम पर आज सैकड़ों बल्कि हज़ारों मनुष्य जिन्होंने उसके आनंदमय वाक्यों को पढ़ा है, उसी तरह जान देने को तैयार हैं, जिस तरह ईसाई लोग हज़रत ईसा पर, मुसलमान लोग मोहम्मद साहब पर और हिंदू लोग भगवान् राम या कृष्ण पर। वह अपनी पुस्तक "तृणपर्ण" (Leaves of grass) में इस तरह लिखता है कि आकाश पर तारे और भूमि पर कण केवल धर्म या विश्वास के लिये चमकते हैं। इस अमेरिकन लेखक का उल्लेख राम इस कारण से करता है कि लोगों का यह ख्याल है कि योरप और अमेरिकावाले सब के सब नास्तिक होते हैं अर्थात् ईश्वर को नहीं मानते। भला यह क्या संभव है कि बिना ईश्वर में विश्वास किये हुए कोई देश उन्नति कर सके? हां, निस्संदेह वह ऐसे ईश्वर को नहीं मानते जो मनुष्यों से अलग, संसार से परे कहीं बादलों के ऊपर बैठा हुआ है। कहीं उसको वहां जुक़ाम न हो जाय। और जिस देश में suspicion (भ्रम व अविश्वास) फैल जाता है अर्थात् जहां संदेह घर कर लेता है, उस देश की दशा नष्ट हो जाती है।

इस रोग की शीघ्र दवा करो, नहीं तो यह रोग असाध्य जीर्ण ज्वर हो जायगा। बहादुरी विश्वासवालों के लिये है।

मरना भला है उसका जो अपने लिये जिये। जीता है वह जो मर चुका इन्सान के लिये॥

कहां अरब की मरुभूमि। वहां एक उम्मी-अनपढ़ (हज़रत मुहम्मद से अभिप्राय है) जंगलों के रहने वाले अनाथ के मन में इस्लाम (श्रद्धा, faith, विश्वास) की आग भड़क उठी। अर्थात् सिवाय अल्लाह (ईश्वर) के और कुछ नहीं है— "ला इलाहिल अल्लाह" "एकमेवाद्वितीयम् नास्ति"।

इस बात का यक़ीन उसके मन में जम गया। परिणाम यह हुआ कि उसके अंतःकरण में आग भड़की और उस मरुस्थल में पड़ी जहां रेत का एक एक कण अग्निप्रसारक बारूद का ज़र्रा बन गया और सारे संसार में एक हलचल मच गई। ग्रेनाडा से लेकर दिल्ली तक और योरप, अफ़्रीका और एशिया के इस सिरे से उस सिरे तक एक आफ़त मचा दी। यह क्या था? श्रद्धा और विश्वास का बल। विश्वास की शक्ति, न कि तलवार और बंदूक की शक्ति जैसा कि लोग प्रायः कहा करते हैं कि बंदूक और तलवार की शक्ति से इस्लाम ने विजय पाई।

जिस समय मोहम्मद ग़ोरी और महमूद ग़ज़नवी भारतवर्ष में आये तो वह लोग बहुत कम थे और हम लोग दल के दल। मगर क्या कारण था कि हमारी हार हुई और उनकी जीत? एक इतिहासज्ञ लिखता है कि जिस प्रकार घटा (आंधी) के आगे खाक उड़ती चली जाती है उसी प्रकार हिन्दुओं के दल के दल मुसलमानों के सामने उड़ते चले जाते थे। इसका कारण वही यक़ीन या विश्वास था। जब

तक हृदय में यकीन न हो हाथ में शक्ति भी नहीं आती। जब हृदय में विश्वास भरता है तो हाथ और बाहु शक्ति से फड़कने लगते हैं। एक बार का ज़िक्र है कि जब राम बी० ए० की परीक्षा दे रहा था तो परीक्षक ने गणित के पर्चे में 13 प्रश्न देकर ऊपर लिख दिया कि Solve any nine out of the thirteen इन तेरह प्रश्नों में से कोई 9 प्रश्न हल करो। चूँकि राम के हृदय में विश्वास ज़ोर मार रहा था, उसने उसी समय में सब तेरह के तेरह प्रश्न हल करके लिख दिया कि इन तेरह प्रश्नों में से कोई 9 जाँच लो, यद्यपि इन 13 प्रश्नों में से औरों ने कठिनता से 3 या 4 प्रश्न हल किये थे।

जेम्स भी ऐसा कहता है कि विजय या जीत उसी की है जिसको यकीन या विश्वास है, और यही रूहानी क़ानून (आत्मिक नियम) है। विश्वास के बारे में बयान करते हुए यह देखना चाहिये कि दो वस्तुएँ होती हैं, एक तो विश्वास और दूसरा मत जिसका अर्थ यकीन (Faith-श्रद्धा) और अकीदा (Creed-मत) है।

क्रूसेड अर्थात् ईसाइयों के उस जिहाद (धर्म युद्ध) का ज़िक्र राम सुनाता है जिसमें इंग्लैंडराज रिचर्ड प्रथम भी सम्मिलित था। जब ईसाई लोग यरूसलम में हारने लगे तो एक बूढ़ा मनुष्य उनमें से यों बोल उठा कि मैंने जिब्राईल को देखा जिसने मुझसे यह कहा कि इसी भूमि के नीचे जहाँ हम लोग लड़ रहे हैं वह भाला दबा हुआ है जिससे हज़रत मसीह छुप गये थे। अगर वह भाला मिल जाय तो हमारी विजय अवश्य होगी। इसको सुनकर लोगों ने उस भूमि को खोदना आरंभ किया मगर कोई भाला न मिला।

खोदते खोदते अंत में एक अत्यन्त जीर्ण भाला भूमि में से निकला। वह लोग उस भाले को ईसावाला भाला जानकर जी तोड़ कर लड़ने लगे और अंत में वह विजयी हुए। मरते समय उस बूढ़े मनुष्य ने पादरी के आगे इस बात का इकरार (confession) किया कि मैंने यरूसलम की लड़ाई में भाले वाली कहानी गढ़ दी थी, जिससे विजय हो। चाहे कुछ हो, मगर वह बात उस समय काम कर गई। इस कहानी का वह अंश जिससे लोगों के हृदयों में यकीन (निश्चय) बढ़ गया, विश्वास या faith है और कहानी मत (creed) है। विश्वास की शक्ति जीवन है। राम ऊपर के अकीदे 'मत' पर ज़ोर नहीं देता, वह तो भीतर की आग आप ही में से निकाला चाहता है।

लोग कहते हैं कि योरप के बड़े बड़े लोग नास्तिक हैं। ब्रैडला और हरबेट स्पेंसर यद्यपि ईसाइयों और मुसलमानों या और धर्मवालों के ख़ुदा को न मानते थे, मगर उनमें यकीन और विश्वास अवश्य था और उन लोगों के चाल चलन आप लोगों के पंडितों, धार्मिक उपदेशकों और व्याख्याताओं से कहीं श्रेष्ठ थे।

ब्रैडला यद्यपि रामायण नहीं जानता था मगर उसका हृदय प्रेम से भरा था। आप के धार्मिक लोग अपने प्रेम को किसी मत विशेष या देश में ही परिच्छिन्न कर देते हैं, मगर उसका चित्त इंग्लस्तान में ही परिच्छिन्न (घिरा हुआ) न था बल्कि भारत के हित में भी अपना रक्त अर्पण कर रहा था। प्रकृति के अटल नियम पर विश्वास रखता था। इसी विश्वास या ईमान की भारतवर्ष को भी आवश्यकता है। यह गाली है कि तुम बे-ईमान हो, अर्थात् तुम्हारा ईमान

नहीं है और ईमान अदृश्य वस्तु पर विश्वास लाने का नाम है, और यह ही धर्म, विश्वास या इस्लाम है, और बिना इसके कोई उन्नति नहीं कर सकता। आर्किमेडीज़ यह कहा करता था कि If I get a Point I shall overturn the whole world. अगर मुझको एक मध्य बिंदु (केन्द्र) खड़े होने के लिये मिल जाय तो मैं संपूर्ण संसार को उलट दूंगा।

राम बतलाता है कि वह स्थिर मध्यबिंदु तुम्हारे ही पास है। यदि तुम उस आत्मदेव को जो दूर से दूर और निकट से निकट है जान लो तो वह कौनसी वस्तु है जिसको तुम नहीं कर सकते।

वह कौन सा उकदा है जो वार हो नहीं सकता, हिम्मत करे इंसान तो क्या हो नहीं सकता।

इस विश्वास को हृदय में स्थान दो और फिर जो चाहो सो करलो। क्योंकि अनंत शक्ति का स्रोत तो तो तुम्हारे भीतर ही मौजूद है।

हक्सले का कथन है कि अगर तुम्हारी यह तर्कशक्ति तार्किकता और बुद्धि व विवेकशक्ति घटनाओं के जानने में सहायता नहीं करते तो-

बरीं अक्लो दानिश ब बायद गरेस्त।

अर्थात् इस बुद्धि और विवेक शक्ति पर तो रोना उचित है। ऐसे तर्क को बदल दो, अक्ल को फेंक दो, मगर घटनाओं को आप बदल नहीं सकते।

आत्मा अर्थात् भीतर वाली शक्ति पर विश्वास रखो। टिटिहरी के मन में विश्वास आगया। उसने साहस की कमर बाँधी। समुद्र से सामना किया और विजय पाई।

* कठिन ग्रंथि, भेद। 2 स्पष्ट हो नहीं सकता।

एक कहानी है कि टिटिहरी के अंडे-बच्चे समुद्र बहा लेगया। उसने विचार किया कि समुद्र आज मेरे अंडे बच्चे बहा लेगया तो कल मेरे और सजातियों के बच्चों को बहा ले जायगा। इससे उत्तम है कि समुद्र का विनाश कर दिया जाय। ऐसा सोचकर समुद्र का जल उन पक्षियों ने अपनी चोंचों से भर भर के बाहर फेंकना आरम्भ किया और विपत्ति-काल में अपने उत्साह को भंग नहीं किया।

इतने में एक ऋषि जी वहां आये और चोंचों से समुद्र का पानी ख़ाली करते देखकर कहा कि यह क्या मूर्खता का काम कर रहे हो क्या समुद्र को ख़ाली कर सकते हो? क्या अकेला चना भाड़ को फोड़ सकता है? इस मूर्खता के काम को छोड़ो। इस पर उसे टिटिहरी ने उत्तर दिया कि महाराज! आप देवर्षि होकर मुझको ऐसा नास्तिकपने का उपदेश करते हैं। आप हमारे शरीरों को देख रहे हैं; हमारे आत्मबल को नहीं देखते। (यही उत्तर काकभुशुंडि को महाराज दत्तात्रेय जी ने दिया था और कहा-यार, तुम तो कौवे ही रहे। क्योंकि तुम्हारी दृष्टि सदैव हाड और चाम पर जाती है। शरीर तो मैं नहीं हूँ। मैं तो वह हूँ जिसका अंत वेद भी नहीं पा सकते। आत्मदेव तो वह है जो कभी भी ख़त्म होने वाला नहीं है!) इस उत्तर को सुनकर ऋषि जी महाराज होश में आप और समुद्र से क्रोध करके बोले कि अरे इसके अंडे बच्चे क्यों बहा ले गया? इसपर समुद्र ने फट अंडे-बच्चे फेंक दिये। और कहा कि मैं तो मखौलबाज़ी (परिहास) करता था।

इस कहानी में, अमर और अजर आत्मदेव में यकीन का होना तो विश्वास, मज़हब या इस्लाम है, वाक़ी सब

कहानी, मत या अकीदा है। किंतु राम तो विश्वास ही को उत्तेजना देता है; और बात से उसको सरोकार नहीं।

अकेले फ़रहाद ने नहर को काट कर बादशाह के महलों तक पहुंचा दिया। ये सब घटनाएं हैं। आप उन तस्वीरों को देख सकते हैं जो फ़रहाद ने पहाड़ों पर नहर काटते समय बनाई थीं। सिवाय विश्वासवान् पुरुषों के दूसरे का यह काम नहीं। जिसको इस बात का विश्वास है कि मेरे भीतर आत्मा विद्यमान है, तो फिर वह कौन सी ग्रंथि है जो खुल नहीं सकती? फिर कोई शक्ति ऐसी नहीं जो मेरे विरुद्ध हो सके। सूर्य हाथ बाँधे खड़ा है और चंद्रमा प्रणाम के लिये शिर झुका रहा है। ज़रा देखिये, अकेले तो रामचंद्र और उनके साथ एक भाई और सीता जी को समुद्र पार करके वापस लाना चाहते हैं। क्या यह काम सहज है? नाव नहीं, जहाज़ नहीं; मगर वाह रे वीर साहसी! कि जिनकी सेवा करने को वन्य पशु भी उद्यत हैं। बन्दर जैसे चंचल पशु भी आपकी सेवा में उपस्थित हैं। पक्षी भी आपकी सेवा के लिये प्राण-विसर्जन किये देता है। गिलहरियाँ भी मुँह में बालू भर २ कर समुद्र पर पुल बाँधने का प्रयत्न करतीं और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करती हैं। अगर हरेक के हृदय में वही श्रद्धा उत्पन्न होजाय जो राम में थी तो-"कुमारियाँ आशिक हैं तेरी सरो बंदा है तेरा बांकी अवस्था सबकी होजाय"। अगर इस बात का विश्वास नहीं आता कि "मैं वह ही हूं" तो इस का निश्चय तो होना ही चाहिये कि मेरे भीतर वही है। "जब मेरे भीतर वही है, तो मैं सब का स्वामी हूं और जो चाहूं सो कर सकता हूं"। यह ख़याल बड़ा ज़बरदस्त है और

यह ख़याल हृदय में हर समय रक्खें जिससे वह भीतर की शक्ति प्रकट होने लगती है। अमेरिका और इंगलैंड के बहुतेरे अस्पतालों में सरकारी तौर से ऐसी चिकित्साएं होगई हैं जिसमें केवल विचार की शक्ति से रोगी अच्छा कर दिया जाता है और बहुतों ने इस बात की सौगंध खाई है कि हम आयु भर औषधि-सेवन न करेंगे, और अगर कोई बीमारी होजायगी तो केवल विचार की शक्ति से उसको भगा देंगे। यह शक्ति यकीन है, यही विश्वास है।

आजकल की विचार-विद्या ने इस बात को सिद्ध कर दिया है कि मेज़ की जगह आपको घोड़ी दिखलाई दे। क्या आपने इस आख्यायिका को नहीं सुना कि जेम्स साहब का डाक्टर पाल बन गया। तत्व वही है जो विश्वास की आंखों से दिखाई देता है। यदि देखना है तो, उस आत्मा को देखो।

एक पेंसिल की कला को देखो जिससे हज़ारों मनुष्य पल रहें हैं, और राष्ट्रीय सम्पत्ति बढ़ रही है। रेल वालों को लाभ, डाकवालों को लाभ। इस कला की हकीकत (वास्तविकता) कहां है? इसके एक छोटे से chemical action इस विकार या भीतरी विकार पर है जो दिखाई नहीं देता। भीतर से आत्मा बराबर निर्विकार है।

जापान और अमेरिका की उन्नति का रहस्य उनकी बाहर का संपत्ति और वैभव के देखने से नहीं मालूम होता वरन् उन देशों के उदय का कारण उनके भीतर का परिवर्तन है। वह क्या है? यकीन या विश्वास है। सब जातियों और राष्ट्रों की उन्नति का मूल कारण उनकी आत्मा में है, शरीर तो केवल आवरण की तरह है।

तैंतीस करोड़ देव देवताओं को क्या, 33 लाख करोड़ देवताओं को पड़े माना करो, भला जब तक आप में भीतरी शक्ति जोश न मारेगी आपका कुछ भला न होगा। जिस समय आपके भीतर का आत्मबल जागेगा तो सारे देवता भी अपनी सेवा के लिये हाथ जोड़े खड़े पाओगे। अभी तुम उनको मानते हो, फिर वे तुमको मानेंगे।

1 कुतुब अगर जगह से टले तो टल जाए। हिमाला, 2 बाद की ठोकर से भी फिसल जाए॥ अगरचे 3 बहर भी जुगनू की दुम से जल जाए। और, 4 आफताब भी कछले-उरूज 5 ढल जाए॥ कभी न साहबे-हिम्मत का हौसला टूटे। कभी न भूले से अपनी, 6 जबीं पै बल आए॥

इसी का नाम विश्वास, यकीन और परमेश्वर में भरोसा रखना है। जिस हृदय में यह विश्वास है, वह बाहरी वस्तुओं की परवाह नहीं करता। वह घर ही क्या जिसमें दीपक न हो, वह ऊंट ही क्या जो बे-नकेल हो और वह दिल ही क्या जिसमें विश्वास न हो।

कोई प्राणी या मनुष्य ही क्या जिसको ईश्वर, सत् (Truth) या हकीकत में विश्वास न हो। जब विपत्ति आती है तो बलिदान की आवश्यकता होती है। हिंदू, मुसलमान, यहूदी, ईसाइयों सब में यह बलिदान की प्रथा प्रचलित है। एक बेचारे पशु (बकरे) को काट डाला या अग्नि में डाल दिया और कह दिया, यह बलिदान है। क्या बलिदान इसी का नाम है?-नहीं २। सच्चा बलिदान तो यह है:-

कर नित्य करें तुमरी सेवा, रसना तुमरो गुण गावे। * * * * बिन लाड़े के बरात भला किस काम की॥

1 ध्रुव। 2 वायु। 3 समुद्र। 4 सूर्य। 5 उदय काल से पूर्व। 6 ललाट।

प्यारे! बलिदान तो यह है कि सचमुच परमेश्वर के हो जाएं और उसी सचाई के सामने इन संसार के भोगों और इंद्रियों की कामनाओं Temptations की कुछ असलियत न रहे।

Take my life and let it be Consecrated, Lord, to Thee. Take my heart and let it be Full saturated, Love, with Thee.

Take my eyes and let them be Intoxicated, God, with Thee. Take my hands and let them be For ever sweating, Truth, for Thee.

प्राण मेरे प्रभु, स्वीकृत कीजे, निज पद अर्पित होने दीजे, अन्तःकरण नाथ ले लीजे, निज से उसे प्रेम भर दीजे। स्वीकृत कीजे नेत्र हमारे, निजसे मतवाले कर प्यारे, लीजे सत प्रभु हाथ हमारे, सदा करे श्रम हेतु तुम्हारे।

(इस कविता में 'प्रभु' शब्द से आकाश में बैठा हुआ मेघ मंडल से-परे जाड़े के मारे सिकुड़ने वाला अदृश्य ईश्वर से तात्पर्य नहीं है। प्रभु का अर्थ तो है सर्व अर्थात् समस्त मानव जाति।)

तुम काम किये जाओ, केवल परमेश्वर के निमित्त। खुदी (अभिमान) और खुदग़र्ज़ी (स्वार्थपरता) ज़रा न रहने पावे। यदि तुम आत्माभिमान को भी परमेश्वर के निमित्त बलिदान कर दो, अर्थात् अहंभाव को मिटा दो फिर तो तुम आप में आप मौजूद हो।

लोग कहते हैं कि ऐसी दशा में हमसे काम नहीं हो सकेंगे। जल-विद्या में एक लैम्प का ज़िक्र आया है जिसका

आकार इस प्रकार का होता है कि जिसमें जो हिस्सा नीचे रहता है वह तेल से भरा होता है और ऊपर का भाग ठोस होता है। ज्यों ज्यों जलने से तेल ख़र्च होता जाता है वह ठोस भाग नीचे को गिरता जाता है। अर्थात् तेल की Specific gravity (विशेष गुरुत्व) ठोस के बराबर होती है।

अब इस उदाहरण में तेल को बाहरी काम काज समझो और दूसरे आधे अंश को यकीन, विश्वास, इस्लाम या श्रद्धा कहो।

लोग कहते हैं कि हमको फुरसत नहीं। किंतु जानसन के कथनानुसार समय पर्याप्त है यदि भली भाँति काम में लाया जाय Time also is sufficient if well-employed। यह क्या तुम्हारे हाथ और पैर काम करते हैं?-नहीं नहीं; वरन् तुम्हारे भीतर का आत्मबल यकीन और विश्वास है जो तुम्हारे प्रत्येक नस नाड़ी में गति और ताप उत्पन्न कर देता है।

अरे यारो! आत्मदेव को, जो अकाल-मूर्ति है, उसको काल अर्थात् समय से बाँधा चाहते हो, इसीका नाम नास्तिकता, कुफ्र या Atheism है। हक्सले नास्तिक नहीं है जैसा तुम समझे हुए हो। वह कहता है कि मैं ऐसे परमेश्वर को मानता हूं जिसे स्पीनोज़ा ने माना है और विना सच्चे और भीतर वाले परमेश्वर पर विश्वास लाए हम एक क्षण मात्र भी जीवित नहीं रह सकते।

चूं कुफ्र अज काबा बर खेज़द कुज़ा मानद मुसलमानी।

अर्थात्-यदि स्वयं काबे से ही कुफ्र, नास्तिकता, अविश्वास उत्पन्न हो तो फिर इस्लाम का कहाँ ठिकाना लगे।

परमेश्वर तो आपके भीतर है जो सर्वत्र विद्यमान और

सर्व द्रष्टा है। यदि प्रह्लाद के हृदय में यह विश्वास होता कि ईश्वर कहीं आकाश पर बैठा हुआ है तो उसकी जिह्वा से कभी ये शब्द न निकलते-

मो में राम, तो में राम, खड्ग खंभ में व्यापक राम, जहँ देखो तहँ राम हि राम।

राम तो कहता है कि हाथ कार (कार्य) में और दिल (हृदय) यार में हो। हाथों से हो काम और दिल में हो राम। ऐसे ही पुरुष जब कृष्ण भगवान् के मंदिर में जाते हैं तो अपनी आंखों से आबदार मोती (अश्रु-बिंदु) उस मनोहर मूर्ति पर न्योछावर किये बिना नहीं रह सकते, और यदि मसाजिद में जा खड़े होते हैं तो संसार से हाथ धोकर ('वज़ू' करके) नमाज़ मस्ताना (प्रेमोन्मत्त प्रार्थना-भक्तिविह्वल स्तुति) पढ़ने लगते हैं, और यदि वे गिरजे में प्रवेश करते हैं तो पवित्रात्मा के सामने देहभाव को सलीब (सूली) पर चढ़ा देते हैं।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!