श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

पत्रमंजूषा।

भाग 4 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 4 · अध्याय 8 / 8

पत्रमंजूषा।

वसिष्ठाश्रम। जून का अन्त 1906। (राय बहादुर लाला बैजनाथ को भेजे हुए एक पत्र की नकल।)

व्यास पर्वत के शिखर के पास की सब गुफाएँ वार्षिक अतिथियों अर्थात् ऋतु की वर्षा से सताई जाती हैं, इस लिये राम को चोटी पर के नन्दन वन को छोड़ना पड़ा। वह एक परम सुहावन उच्च समचौरस पर उतर कर आ गया है, जहां सर्वदा जल तरंगो से स्पर्श करती हुई वायु बहा करती है। सफ़ेद और पीली चमेली अन्य पुष्पों के साथ यहां पर बहुत है। बेर मकोइया, किरमीनी और अन्य प्रकार के बहुत से जंगली मेवे यहां बहुत पके हुए मिलते हैं। नई बनी हुई राम की पर्णकुटि के एक ओर एक स्वच्छ हरा मैदान, बहती हुई दो नदियों के मध्य में रमणीय भू प्रदेश बहुत दूर तक फैला हुआ है। दूसरी ओर सुहावना मैदान बहता हुआ पानी, नवपल्लव से ढकी हुई पहाड़ी और लहराते हुए खेत और जंगल हैं। स्वच्छ, विस्तीर्ण शिलापट राम बादशाह के मेज़ और सिंहासन हैं। यदि छाया की आवश्यकता हो, तो राम का स्वागत करने के लिये अनेक लताकुंज सर्वत्र तैय्यार है।

इस अरण्य में यहां के रहनेवाले गड़रियों ने तीन घंटे में पर्णकुटि तैय्यार की। उन्हों ने अपनी शक्ति के अनुसार उसे पानी का बचाव बना दिया है। रात को वर्षा का तूफान आया। प्रत्येक दो या तीन मिनट में बिजली चमकने लगी और बादल की गड़गड़ाहट होती रही जिससे पर्वत मानो

हिलने और कांपने लगे। यह इन्द्र का सुप्रसिद्ध पवि लगातार तीन घंटों तक अपनी गर्जना करता रहा। वर्षा बड़े जोर से होने लगी। बेचारी पर्णकुटि चूने लगी। आंधी से उसका बचाव करना इतना असंभावित हो गया कि छत के अन्दर पुस्तकों को भीगने से बचाने के लिये सब समय तक एक छाता खोल कर रखना पड़ा। वहां सब पानी से तर हो गये। घास से ढकी रहने के कारण जमीन में कीचड़ न होने पाया। फिर भी छत से धीरे २ गिरते हुए जल-बिन्दुओं की भेंट वर्षा करती रही थी। राम उस समय मत्स्य और कच्छप जीवन (अवतार) के अनेक अंशों का आनन्द ले रहा था। रात्रिभर जलशायी जीवन का यह अनुभव अपूर्व आनन्द देता रहा। उस प्रेममय प्यारे के चिन्तवन में रात्रि व्यतीत करानेवाले वे बादल अवश्य धन्यवाद के योग्य हैं।

"शौह जागे हों काहनु सोवा" ग्रन्थ साहब। अर्थः—प्रियतम जागता हो तब मैं कैसे सो जाऊं?

जु उमर यक शब कम गिर्दे जिनहार मख़लफ़। अर्थः—अपने जीवन में एक रात्रि कम समझ और अब कभी मत सो।

"मेरा कैसे निर्वाह होगा? मेरा अब क्या होगा?" और इस प्रकार की नानाविधि तुच्छ और मूर्ख बातों की फिक्र करने के लिये मनुष्य ने जन्म नहीं लिया है। उसको कम से कम इतना स्वाभिमान होना चाहिये, जितना मत्स्य, पक्षी और वृक्षों में होता है। वे आंधी और सूर्यताप से घबराते नहीं परन्तु प्रकृति के साथ एक होकर रहते हैं। मैं स्वतः गिरती हुई वर्षा का जल हूं, मैं चमकता हूं, मैं गर्जता हूं, मैं कितना विकराल और शक्तिमान् हूं। मेरे अन्तःकरण से

"शिवोऽहम्" का स्रोत एकदम निकल पड़ता है। अब मीख्वाहन्द मस्तां खाना गो वीरां शवद्। अर्थात् मकान चाहे गिर कर मैदान बन जाय, मगर मस्त पुरुषों बादल की परवाह नहीं करते।

चार तरफ से 1अब की वाह उठी थी क्या घटा, बिजली की जगमगाहटें 2राअद रहा था गडगडा। बरसे था मेंह भी झुम झुम छाजों 3उमंड उमंड पड़ा, झोंकें हवा के ले चले होश-4बदन को वह उड़ा। हर रगे-5जाँमें जोर था 6नग्मा था जोर शोर का, अब्रेबरों से था सिवा दिल में 7सरूर बरसता। आबे 8हयात की झड़ी जोर जो रोज़ो 9शब पड़ी, फिक्रो-ख्याल बह गये टूटी 10दूई की झोंपड़ी।

जंगल सब अपने तन पर हरयाली सज रहे हैं, गुल फूल झाड़ बूटें कर अपने सज रहे हैं। बिजली चमक रही है बादल गरज रहे हैं, अल्लाह के नकारे नौबत के बज रहे हैं।

महेचन त्वादिवः परा शुल्काय देयाम्। न सहस्राय नायुताय वज्रिवो न शताय शतामघ॥ (ऋग्वेद अ० 5 अ० 7। 11 मं० 5)

अर्थातः—हे पर्वत को हिलाने वाले इन्द्र! मैं तुझे न तो किसी भी मूल्य से और न हज़ारों (सुवर्ण मुद्राओं) के लिये भी त्याग सकता हूं। हे इन्द्र! हे असंख्य उदारता के परमेश्वर! मैं तुझे न तो दस हज़ार के लिये और न सैकड़ों हज़ार के लिये त्याग सकता हूं।

यच्छुक्रासि परावति यद्ववृवति वृत्रहन्। अतस्त्वा गोभिरध्वुं गदिन्द्र के शिभिः सुतावाँ अविवासति॥

1 बादल। 2 बिजली की गर्जना। 3 अर्थात् बड़े जोर से वर्षा हुई। 4 देहभान। 5 प्रत्येक प्राण में। 6 ध्वनि। 7 आनन्द। 8 जीवनामृत। 9 दिन रात। 10 द्वैत।

इस ऋचा का सायणाचार्य आदि ने चाहे जैसा अर्थ किंवा विनियोग किया हो परन्तु राम को यह ऋचा यही बतलाती है।

भावार्थः—हे शक्र! चाहे तू दूर घुलोक (गड़गड़ाता मेघमंडल) में हो, हे वृत्रहन् (शंका संहारक) चाहे तू (बहते हुए वायु के रूप में) समीप अन्तरिक्ष में हो, [तेरे बैठने के लिये] गगनभेदी गान [हृदय भेदक प्रार्थना] के रूप में लम्बी आयाल वाले अश्व भेजे जाते हैं। और उसके पास शीघ्र ही आते हैं जिसने [तेरे लिये अपने जीवन का] इस निचोड़ लिया है। हे सोम! आओ, मेरे अन्तःकरण में बैठो और मेरे जीवन के सोमरस का कुछ आनन्द प्राशन करो।

दर्द क्यों न मेरे अंधेरे हिय में? [सूरदास] अर्थात् मेरे अंधकारमय हृदय में वेदना क्यों नहीं होती?

परमात्मदृष्टि से जब इस जगत् को देखते हैं, तब यह समस्त संसार सौन्दर्य का मन्दिर, आनन्द का आविर्भाव और परमसुख का महासागर प्रतीत होता है। जब माया की मर्यादा पर विजय होजाता है, कोई भी वस्तु विरूप कुरूप दिखाई ही नहीं देती। "सारा जग सोहना" प्रकृति की शक्तियां वास्तव में हमारे हाथ पैर और अन्य इन्द्रियां बन जाती हैं।

जैसे आत्मा आनन्द और सर्वस्व है, वैसे ही आत्मसाक्षात्कार का अर्थ अन्तःकरण का यह विश्वास है कि अपनी आत्मा ही यह समस्त रूपों में भासमान् होने लगे।

यह अखिल विश्व मेरी आत्मा का ही स्वरूप है इस लिये मूर्तिमान् माधुर्य है। ऐसी अवस्था में मैं किसको दोष दूं? मैं किसके छिद्र देखूं? हे आनन्द! सब कुछ मैं ही हूं! ॐ;

कैसे रंग लागे खूब भाग जागे, हरी गई सब भूख और नंग मेरी। चूड़े सांच स्वरूप के चढ़े हमको, टूट पड़ी जब कांच की बंग मेरी। तारों संग आकाश में चमकती है, बिन डोर अब उड़ी पतंग मेरी। झड़ी नूर की बरसने लगी जोरों, चन्द सूर है एक तरंग मेरी।

पराजय और विजय के विषय में वेद में आत्मिक नियम की कैसी मार्मिकता के साथ व्याख्या है:—

ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद। (बृहदारण्यकोपनिषद् अ० 2—4।6)

भावार्थः—आत्मा से अतिरिक्त जो अन्य किसी में ब्राह्मण को देखता है, उसको ब्राह्मण छोड़ देते हैं।

किसी भी मनुष्य के अपने अन्तःकरण के सातवें पर्दे में किसी भी पदार्थ पर (उसको सत्य समझ कर) विश्वास करते ही वह वस्तु अवश्यमेव उसे त्याग देगी, या विश्वासघात करेगी। यह नियम गुरुत्वाकर्षण के नियम की अपेक्षा अधिक कठोर है। एक केवल वास्तविक सत्य आत्मा ही, हमारी सब वस्तुओं को सत्य समझने की माया का नाश करके सत्य को दिखाता है।

क्या आश्चर्य! कदापि न ज्ञानी घट भीतर छिप सकता है, रवि सम सब के उपर जीत कर किला, दीवार चमकता है। गगन मार्ग से सूरज जैसे मेघों को ही बरसता है, उनके हटते ही सारे दिन सुख से फिर वह तपता है।

जब तक मनुष्य के अन्तःकरण में किसी प्रकार की वासना का किंचित् मात्र भी अंश होगा, "शिवोऽहम्" या परमानन्द की स्थिति का अनुभव करना कभी संभवित नहीं होसकता किन्तु,

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि स्थिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते॥ (कठोपनिषत् अ० 2।14)

ॐ! ॐ!! ॐ!!!