रामपरिचय । *
( 1 ) [ "तीन आधुनिक भारतीय सुधारक।" लेखक, रायबहादुर लाला बैजनाथ बी. ए. ] तीसरे महापुरुष, जिनसे मेरा घनिष्ठ परिचय था और जिनके साथ मैंने काम किया था, पंजाब के स्वामी रामतीर्थ एम. ए. थे। ये उन उत्तम और उत्कृष्ट आत्माओं में से थे, जो आत्मा की उच्चतम आकांक्षाओं की प्राप्ति का आदर्श उपस्थित करने के लिये कभी २ मानवजाति के मध्य में आया करती हैं। पंजाब के गुजरानवाला जिले के एक कट्टर ब्राह्मण वंश में इनका जन्म हुआ था। कुछ नहीं से प्रारम्भ कर स्वामी जी ने 20—21 वर्ष की ही अवस्था में पंजाब विश्वविद्यालय में, जिसका एम. ए. उन्होंने गणित में पास किया था, प्रसिद्धि प्राप्त की। इसके बाद वे लाहौर के फॉरमैन क्रिश्चियन कालेज के अध्यापक बनाये गये। परन्तु उपनिषदों के महान सिद्धान्त—वह तू है (तत्त्वमसि)—की सत्यता का अनुभव करने के लिये उन्होंने शीघ्र ही यह पद और कुटुम्बियों तथा मित्रों से सब सम्बन्ध परित्याग कर दिया। बगल में उपनिषद् की एक पोथी दबी हुई है, साथी हैं जंगल के पशु और पक्षी तथा पहाड़ी गंगा का स्वच्छ जल, गर्मी और सर्दी और वन की सब मुसीबतों को भूलता हुआ, जीवन की समस्याओं पर गम्भीर विचार में रत लगातार वर्षों तक यह नवयुवक भटकता रहा, कभी कैलास शिखर *अंग्रेज़ी से अनुवादित।
( 9 ) पर चढ़ता है, तो कभी काश्मीर में अमरनाथ की यात्रा कर रहा है, आज यमुना के मूलस्थान यमुनोत्तरी के दर्शन करने गया है तो कल गंगा के मूल स्रोत गंगोत्तरी जायगा, अब नदी के तट पर विचार में अपने दिन पर दिन बिता रहा है। इतने पर भी जब वह अपने अनुसन्धान की वस्तु को न प्राप्त कर सका तो संसार का अस्तित्व विसर जाने के साथ ही उसे अपने शरीर की भी सुध न रही कि वह चल कर किस पत्थर से जाकर टकरायगा। अन्त को 28 वर्ष की अवस्था में उस वस्तु की प्राप्ति हुई, जिसे वह ढूंढ रहा था। भारत की सेवा में अपने को लगाने को अब वह उतर कर जन-समाज में आता है, और सब सम्प्रदायों तथा राष्ट्रों के हज़ारों मनुष्यों को उपदेश देता है। केवल अपनी उत्सुकता और मनोहर व्यक्तित्व के बल से वह उनको अपना अनुयायी बना लेता है। शारीरिक आराम-चैन से बेपरवाह, जो कुछ उसे मिल जाता है भोजन कर लेता है और जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं की वस्तुओं के सिवाय कोई भी चीज़ वह अपने साथ नहीं रखता। रुपया-पैसा या वस्त्र अथवा दूसरी चीज़ ज्योंही उसे भेंट की जाती है, वह दूसरों को दे देता है। इस संन्यासी द्वारा प्रेमी भक्तों के दिये हुए स्वादिष्ट भोजन इस बिना पर त्याग दिये जाते हैं कि जो लोग सत्य का जीवन व्यतीत करने की आकांक्षा रखते हैं उनके प्रारब्ध में उच्च विचार और सादी रहन ही है। न अपनी श्रेष्ठता का निरूपण है, न दर्पपूर्ण व्यवहार। बड़प्पन का तो चेत ही नहीं है। जिस किसी का स्वामी का संसर्ग हो जाता है उसी को उनकी मुसकियां मोहित कर लेती हैं, और उसे उस समय जान पड़ने लगता है कि, मानो उसके सब संकट और खेद दूर होगये। अध्ययन का अनुराग इतना
( 10 ) अधिक था कि थोड़े ही समय में पाश्चात्य धार्मिक और तात्त्विक पुस्तकों का पूरा पुस्तकालय ही पढ़ डाला गया। उपनिषद् के ऋषि, व्यास, कृष्ण, शंकर, बुद्ध के वाक्य उतने ही उनकी जिह्वा के अग्र भाग पर थे जितना कि शम्स तब्रेज़ और मौलाना रूम के। कांट, शोपेनहार, फिक्टे और हीगेल उतने ही परिचित थे जितने कवीर और नानक। परन्तु उर्दू काव्य स्वामी जी का विशेष विषय था और लक्षणों से प्रतीत होता है कि उनके पद्य भारतीयों में वेदान्त के अन्य अनेक प्रमाणभूत श्लोकों की तरह प्रचलित हो जायँगे। ई० 1902 में हम उन्हें जापान होते हुए अमेरिका जाते पाते हैं। वहां उन्होंने दो वर्ष के काल में अनेक विद्वान और अग्रणी जनों को अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। अमेरिका की "ग्रेट पैसिफिक रेलरोड कंपनी" के प्रबन्ध कर्त्ताओं ने उन्हें "पुलमैन कार" में स्थान देते हुए कहा था, उनकी मुस्कियां दुर्निवार हैं। अमेरिका में अपने भक्तों की पूजा और भेंट से ही उन्हें संतोष नहीं हुआ, वे भारत का हित साधने के लिये प्रयत्न करते रहे। कार्य करना, निरन्तर कार्य करना उनका मूल मंत्र था। "हमारे सामने इस समय ठीक तरह की यज्ञ, त्याग, दीनों की रक्षा और सेवा करने की समस्या है। और यह यज्ञ इस प्रकार की जानी चाहिये कि, कार्य, अपने उद्देश्य के लिये ही हानिकर न सिद्ध हो। प्रत्येक भारतवासी को पद, धन, विद्या या शक्ति में अपने से सब छोटों को अपने ही बच्चों की तरह सहायता करनी चाहिये। और बिना किसी पुरस्कार की इच्छा के आत्मा के भोजन, उत्साहदान, विद्या और प्रेम से उनकी सेवा करने के अधिकार का उपयोग, जो माता का परमानन्द है, करना चाहिये। यही वास्तविक निष्काम यज्ञ है"। जैसा कि उन्होंने अपने
( 11 ) विशेष ढंग से कहा था, "दूसरों के सुधारकों की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है आत्मसुधारकों की, जिन्होंने विश्वविद्यालय की उपाधियां नहीं प्राप्त की हैं, परन्तु स्वयं पर विजय पाई है। अवस्था—दैवी आनन्द की जवानी। वेतन—ईश्वरत्व। भिक्षात्मक प्रार्थनाओं के साथ नहीं, परन्तु आदेशात्मक निर्णयपूर्वक विश्व के संचालक को-तुम्हारे अपने आप को-तुरन्त सूचित करो"। पश्चिम में दो वर्ष रहकर स्वामी जी भारत लौटे। परन्तु इतने ही समय में वहां की अमली ज़िन्दगी का जो ज्ञान उन्होंने प्राप्त किया वह किसी दूसरे मनुष्य का बीस वर्ष में भी नहीं हो सकता था। इस ज्ञान को उन्होंने उदारतापूर्वक अपने देशवासियों के चरणों में अपने लेखों और व्याख्यानों में रखा। और उनके समस्त लेख और व्याख्यान पूर्व के अगाध पण्डित और पश्चिम के अमली व्यवसायी के छाप से अंकित होने थे। भारत के लिये हल करने की समस्या है, "व्यावहारिक बुद्धि की गरीबी और आबादी की अधिकता। शारीरिक श्रम से घृणा, जात पांत के अस्वाभाविक विभाग, विदेशी यात्रा का विरोध, बाल विवाह और नारियों को व्यापक शारीरिक और बौद्धिक अंधकार में रहने को विवश करना आदि सभी को व्यावहारिक बुद्धि का यह अभाव घेरे हुए है। पूर्व पुरुषों से दाय बिना मिले हमारा काम नहीं चल सकता। जो समाज इसे त्याग करता है वह अवश्य बाहर से नष्ट हो जायगा। साथ ही यह अंश बहुत अधिक होने से भी काम नहीं चलता। जिस समाज में इसका प्राबल्य है वह भीतर से नष्ट हो जायगा। छोटे विचारों के बड़े आदमियों से देश बलवान नहीं होता परन्तु बड़े विचारों के छोटे आदमियों के अस्तित्व से देश बलिष्ठ होता है। एक औसत भारतीय घर समग्र राष्ट्र की अवस्था का आदर्श है।
केवल भरण शक्ति और खानेवालों की हर वर्ष बढ़ती ही नहीं है, परन्तु निरर्थक और निष्ठुर रीतियों में अनुचित खर्च करने की गुलामी भी है। यदि आबादी की समस्या बिना हल किये छोड़ ही गई तो राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय मैत्री की सब चर्चा निष्फल होगी। विदेश यात्रा से जाति या धर्म जाने का विचार दूर होना ही औषध है। यह धारणा त्यागी जानी चाहिये कि, बच्चों के होने पर ही स्वर्ग में तुम्हारा प्रवेश निर्भर करता है। विवाह को पूर्ववत मधुर सम्बन्ध बनाना चाहिये। देश में अयोग्य, अलमर्थ, असार, परान्न-भोजियों की वृद्धि करने के लिये विवाह मत करो। संगीन की नोक पर तुम्हें शुद्धता प्राप्त करना चाहिये। बिना शुद्धता के न वीरता है, न एकता, और न शान्ति। शिक्षा के क्षेत्र में, प्रधान कर्तव्य हमारे सामने गरीबों और नारियों को शिक्षा देना, कृषि विद्या प्राप्त करना; अधिक उन्नत देशों में कला-कौशल सिखना और उस उपयोगी विद्या को भारत में खूब फैलाना है। यदि विश्वास की लौ और प्रज्वलित ज्ञान की मशाल तुम्हारे हृदय में सजीव नहीं है तो तुम एक कदम भी नहीं बढ़ सकते। प्रकृति के मौखिक समतल की अपेक्षा अधिक गहरे समतल पर रहना, अस्तित्व की गहराइयों को ध्वनित करना, तुम में जो आन्तरिक वास्तविकता है, जो प्रकृति में भी आन्तरिक वास्तविकता है, उसे अनुभव और प्राप्त करना, 'तत्त्वमसि' की जीती जागती श्रुति होना, यही जीवन है, यही अमरता है"। किसी धर्मोपदेशक ने, किसी समाज सुधारक ने समस्या और उसको हल करने की विधि को महान् स्वामी जी की अपेक्षा अधिक स्पष्टता से नहीं वर्णन किया है। खेद इसी बात का है कि, भारत में उनके कथनों की सत्यता का अनुभव करनेवाले बहुत थोड़े लोग
हैं। थोड़े समय तक देश में काम करने के बाद वे ध्यान और अपने साधारण अध्ययन के लिये हिमालय को लौट गये और 31 वर्ष की अवस्था में टिहरी के नजीक स्नान करते समय गंगा में डूब कर यह शरीर त्याग दिया। उनके उपदेश का सार पूर्व की दार्शनिक बुद्धिमत्ता का जापान और अमेरिका की व्यावहारिक बुद्धिमत्ता से मिलाना था "न तो आत्म-अपकर्ष, न जानबूझ कर अधिक समय में आत्म-हनन, न संसार से बिलकुल वैराग्य, न संयमशून्य और विवेकरहित वंशवृद्धि, न अज्ञानता और दासता में तृप्ति, न भूतकाल की विचारहीन और निष्फलकारी उपासना और वर्तमान तथा भविष्य की उपेक्षा, परन्तु पुराने भारी वस्त्रों का त्याग और अंधविश्वास का दूरीकरण" - यही महान् ऋषि का संदेश है। उनके प्रभाव का उन्हीं के साथ अन्त नहीं होगया। हर साल वह धीरे २ और तत्परता से केवल हमारे नवयुवकों में ही नहीं प्रवेश करता जाता है, परन्तु साधुओं में भी, जो पहले उनकी उपेक्षा करते और उन्हें घृणा दृष्टि से देखते थे।
(2) ("भारत में नवजीवन", लेखक, मि. सी. एफ. ऐन्ड्रूज़ एम.ए.) दूसरे व्यक्ति ने, जो अनेक प्रकार से स्वामी विवेकानन्द की अपेक्षा कहीं अधिक आकर्षक था, उसी वेदान्त के आन्दोलन को उत्तर में अग्रसर किया। स्वामी रामतीर्थ ब्राह्मण थे। वे लाहोर में, जहां फोरमैन क्रिश्चियन कालेज में उन्होंने शिक्षा पाई और विश्वविद्यालय के उज्ज्वल चरित के बाद गणित के अध्यापक (प्रोफेसर) हुए, बड़ी नरमी में पले थे। परन्तु उनका हृदय पूरी तरह से धर्म के रंग में रंगा था और महाविद्यालय का कार्य छोड़ कर वे परिव्राजक संन्यासी तथा धर्मोपदेशक हो गये। हिमालय के विकट वनों में घुस कर उन्हों ने प्रकृति माता के साथ एकान्तवास किया। उनके चरित्र में वास्तविक काव्य-वृत्ति थी और उनकी तैरती हुई खुशमिजाजी घोर मुसीबतों और संकटों में भी उनका साथ देती थी। उनके शिष्य स्वामी नारायण ने मुझसे उनके सार्वजनिक लेखों का उपक्रम लिखने को कहा था। मैंने बड़े ही चाव से यह अंगीकार किया था, क्योंकि विवेकानन्द की कृतियों की अपेक्षा इनमें रमणीयत का स्वर बहुत प्रबल है। दृष्टान्त के लिये प्रभु की प्रार्थना पर नीचे लिखी व्याख्या से विवेकानन्द की भद्दी भूल की तुलना कीजिये, जो उन्होंने "जो स्वर्ग में है (which art in heaven)" वाक्य के सम्बन्ध में की है, जिसे मैं उद्धृत कर चुका हूं। स्वामी रामतीर्थ लिखते हैं, "प्रभु की प्रार्थना में हम कहते हैं, 'आज हमें हमारी नित्य की रोटी दे' और दूसरे
स्थान पर हम कहते हैं, 'मनुष्य को केवल रोटी पर ही न जीना चाहिये'। इन कथनों पर फिर विचार करो। इन्हें खूब समझो। प्रभु की प्रार्थना का मतलब यह नहीं है कि, तुम मांगते रहो, इच्छा करते रहो। कदापि नहीं। इस प्रार्थना का अभिप्राय यही है कि, एक सम्राट भी, महाराजाधिराज भी, जिसे नित्य की रोटी न मिलने की जरा सी भी आशंका नहीं है, यह प्रार्थना करे। यदि पैसा है, तो स्पष्ट है कि, 'आज हमें हमारी नित्य की रोटी दीजिये' का अर्थ यह नहीं है कि हम मंगतापन का ढंग ग्रहण करें और लौकिक सम्पत्ति की याचना करें। ऐसा नहीं है। प्रार्थना का अर्थ यही है कि, हरेक, वह चाहे राजकुमार हो या राजा, अथवा साधु, अपने इर्द गिर्द की सब वस्तुओं को, सम्पूर्ण द्रव्यों और प्रचुरता को, अपना नहीं ईश्वर का समझे - यह मेरी नहीं है, मेरी नहीं है। इसका अर्थ भिक्षा मांगना नहीं है, परन्तु त्याग है, देना है, प्रत्येक वस्तु का ईश्वरार्पण करना है। सम्राट यह प्रार्थना करते समय अपने को उस अवस्था में लाता है जिसमें अपने कोष के सब रत्न, अपने भवन का सम्पूर्ण ऐश्वर्य, स्वयं भवन तक, वह परित्याग करता है, दे देता है, इन सब वस्तुओं पर से अपना स्वत्व हटा लेता है। यह प्रार्थना करते समय वह साधुओं के भी साधु है। वह कहता है, 'यह ईश्वर का है, यह मेज, इस मेज पर की हरेक चीज, उसकी है, मेरी नहीं। मैं कोई भी वस्तु नहीं रखता। जो कोई चीज मुझे आकर प्राप्त होती है वह मेरे प्रिय के पास से आती है"। स्वामी रामतीर्थ ठीक उन्हीं दिनों पंजाब [युक्तप्रदेश-सम्पादक] की किसी नदी में डूब गये जब उनकी धार्मिक मेधा सर्वो-
त्तम फल फलने वाले थे। ऐसे परिव्राजक धार्मिक उपदेशकों के कार्य की यथेष्ट स्तुति नहीं की जा सकती। ये नवीन और प्राचीन के बीच की कड़ी का काम करते हैं। ये लोग, स्वामी दयानन्द की तरह, विशुद्ध संस्कार और मानी हुई धार्मिक बुराइयों के 'नख-शिख' विनाश का प्रतिपादन कभी नहीं करते। परन्तु आधुनिक उत्कर्ष से इनका यहां तक यथेष्ट परिचय रहता है कि, ये साफ देख सकते हैं कि हिन्दुत्व में भीतर से सुधार की आवश्यकता है। और ऐसा सुधार करने में ये महत्त्वपूर्ण भाग लेते हैं। यूरोप के इतिहास से उदाहरण लेते हुए कह सकते हैं कि कट्टर हिन्दुत्व के भीतर थे, प्रति-सुधार का काम करते हैं, और 16 वीं सदी में इग्नेटियस लोयोला ने जो भार अपने ऊपर लिया था उससे इनका काम बहुत कुछ मिलता जुलता है"।
श्री स्वामी रामतीर्थ और स्वामी नारायण लखनऊ 1909