अवतरण।
यह मेरे लिये बड़े संतोष की बात है कि, स्वामी राम के लिये मेरे आदर-भाव की विनय और अपर्याप्त सूचना ने मई 1908 में मेरे इस ग्रन्थ के प्रकाशन का भार उठाने का रूप धारण किया। स्वामी नारायण की सूचना और सलाह पर यह भार उठाया गया था। उनकी संगति और उपदेशों से जो मुझे अपूर्व आध्यात्मिक लाभ हुए हैं उनके लिये मैं उनका आजन्म बहुत ऋणी रहूंगा। केवल उनकी हार्दिक और सच्ची सहकारिता का ही यह फल है कि, यह कार्य संतोषजनक रीति पर अन्ततः एक ग्रन्थ में पूरा होगया, यद्यपि मैं अनुभव करता हूं कि अभी बहुत कुछ करना है। अन्त में स्वामी राम के लेख सुरक्षित होगये और अब वे लुप्त नहीं हो सकते। जननी जन्मभूमि को, अपने इतिहास के इस नाजुक समय पर, उनकी बड़ी आवश्यकता है। यह और भी अधिक संतोष और प्रसन्नता की बात है कि अनेक आशातीत स्थानों में भी इस काम की बड़ी सराहना हुई है। कोई प्रायः हरेक पखवारे में मुझे दो पत्र ऐसे मिल जाते हैं, जिनमें बड़ी ही प्रशंसात्मक भाषा में बड़े उत्साह और सचाई के साथ मेरे साहस के लिये मुझे धन्यवाद और बधाई दी जाती है, और जिनमें सत्य तथा चित्त की शान्ति के अन्वेषण में लगी हुई अनेक भूखी और प्यासी आत्माओं के होने वाले आध्यात्मिक कल्याणों का वर्णन किया जाता है। यद्यपि इस अति प्राचीन और पवित्र भूमि में पाश्चात्य शिक्षा का प्रचार हुए एक सदी से अधिक बीत
गई और फलतः लोगों की प्रवृत्ति "जड़वाद" की ओर होगई है, तथापि सौभाग्य से सत्, आनन्द, शान्ति, प्रेम, भक्ति, ज्ञान, बुद्धि, ध्यान, और मुक्ति, रूपी अमूल्य रत्नों, परम कल्याणों तथा वास्तविक गुणों के लिये हमारी प्रिय मातृभूमि की दुष्कर आकांक्षा अभी लुप्त नहीं होगई है। मुझे प्रतीत होता है कि, कवि, उपदेशक, तत्त्वज्ञानी और देवतुल्य स्वामी राम उन महापुरुषों में से थे, जो संसार के इतिहास की अत्यन्त भयंकर संधियों के अवसरों पर जगत में समय-समय पर अवतीर्ण हुआ करते हैं। निस्सन्देह वे भारतवर्ष के एक अति विख्यात और श्रेष्ठ पुत्र थे और ठीक उसी समय आये थे जब उनकी अत्यन्त आवश्यकता थी। भारत के इतिहास के रंगमंच पर उनका प्रादुर्भाव कोई नवीन सम्प्रदाय या दल (इनकी संख्या तो हम में बहुत है) गढ़ने को, किसी प्राचीन या मृत धर्म या उपासना प्रणाली को नवजीवन देने को, किन्हीं नवीन सिद्धान्तों या तत्वज्ञान का प्रचार करने को, कोई नवीन संस्था स्थापित करने को, अथवा नानक की भांति हिन्दू और मुसलमानों को एक करने को - यद्यपि निस्सन्देह इस कार्य के लिये क्षेत्र सूना नहीं हुआ था। परन्तु उनका महान् और उत्कृष्ट कर्तव्य सार्वभौम और विश्वव्यापी था। इसी काल की, इस बीसवीं सदी में, इस वैज्ञानिक युग में, प्रतियोगिता, साम्यवाद, कठिन जीवन संग्राम, व्यवसायीपन, धन के लिये जोशीली दौड़, और समस्त संगिनी बुराइयों के इस जमाने में, समस्त संसार में, विशेषतः भारत में उच्चतम अविनाशी आध्यात्मिक सत्यों की शिक्षा देना और प्रचार करना उनका महान् उद्देश्य, उनका महान जीवन-कर्म था।
इस समय क्या ठीक इसी शिक्षा की हमको परमावश्यकता नहीं है? क्या इस दशा की सबसे बड़ी जरूरत आध्यात्मिकता और उच्चतर जीवन का उनका सन्देश नहीं है? क्या उनकी सम्पूर्ण शिक्षा अनियंत्रित स्वार्थपरता का, बाह्यरीपन और भड़कीले दिखावे का, रूप और बहिरंग की पूजा का, धार्मिक दलों और धर्मान्धों की असहिष्णुता और शत्रुता का, विलासिता के अनुराग और उसकी संगिनी बुराइयों का, अपने पाश्चात्य भाइयों को उसी स्वर्गीय पिता के पुत्र हानि पहुंचाकर यूरोपीय राष्ट्रों के नित्य नये उत्थान का, आधुनिक विनाशक अस्त्रों के हृदयहीन व्यवहार और युद्ध की अत्यन्त व्ययसाध्य तैयारियों का [आधुनिक सभ्यता के ये कुछ लक्षण अटकलपच्चू लिख दिये गये हैं] प्रबल जोरदार और सजीव प्रतिवाद नहीं है? अस्ताचलगामी सूर्य की भूमि अमेरिका में, उदय होते हुए सूर्य की भूमि जापान में, मातृभूमि भारतवर्ष में उन्होंने सत्य का प्रचार करके सिद्ध किया कि, उनका जीवन-कर्तव्य विश्वव्यापी था, उनका सन्देश, गरीब और अमीर, बूढ़े और जवान, पढ़े और अनपढ़, नर और नारी, पाश्चात्यवासियों और यूरोपियनों, कालों और गोरों, सब के लिये एक सा था। जात पांत, सम्प्रदाय, रंग या जाति के भेदों को वे नहीं पहचानते या मानते थे। और इस प्रकार उन्होंने बड़े महत्व का उपदेश दिया, जो उनके स्वदेश के लिये और पश्चिम के लिये भी जहां उत्कर्ष और शिष्टाचार की इस उन्नत दशा में भी और सहायता को इतनी शक्ति एवं प्रभाव तथा उदारता की वृद्धि के होते हुए भी इन भेद-भावों को बड़ा गौरव दिया जाता है, खूब गर्भित और गूढ़ परिणामों और फलों से परिपूर्ण था। भारत की भांति किसी एक देश को भले
ही इस समय उनके उपदेशों की दूसरों से अधिक जरूरत हो, परन्तु वे थे सारे संसार के लिये। जो अन्य सभी से अपनी एकता, अपनी "अभिन्नता" में पूरा विश्वास रखता था और जिसने इसका अनुभव भी किया था उसके उपदेश दूसरी तरह के हो ही कैसे सकते थे? किन्तु केवल महान् आध्यात्मिक उपदेशक होने के ही कारण राम की विचित्र व्यक्ति का मैं ख्यालपात्र नहीं हूँ। वे "मातृभूमि, भारत" के सच्चे प्रेमी थे। निष्कपट, विशुद्ध और अनुरक्त देशभक्त थे। बड़े २ महात्माओं, ऋषियों और मुनियों, सिद्धों और विद्यावारिधियों, साधुओं और योगियों, तथा परम शूरों, शासकों और पूजनीय नायकों की जन्मभूमि भारत के वे योग्य और सच्चे सपूत थे। पवित्र आर्यावर्त के तत्पर और सत्यसंघ सेवक तथा देशहित के लिये बलि थे। उनकी यही विशेषता मुझ पर अधिक प्रभाव जमाती, यत्न पूर्वक मर्म-स्पर्श करती है और संस्कार डालती है। उन्होंने हमारे राष्ट्रीय धर्म की हमें स्पष्ट शिक्षा दी है। उनके कथन हममें उस भारी जिम्मेदारी के ज्ञान का संचार करते हैं, जो महान और ऐतिहासिक अतीत के उच्चदायकारी होने के कारण मातृभूमि के प्रति हमारी है। यह बात मुझे बड़ी ही विलक्षण जान पड़ी कि, स्वार्थ-शून्य महान स्वामी राम के इस पहलू का, जो "संसार में होता हुआ भी संसार से पर" था उसके चरित्र के इस लक्षण का, उनके सम्बन्ध के किसी भी प्रशंसात्मक लेख में, जो ई० 1906 में उनकी मुक्ति होने के बाद समाचार पत्रों में तथा अन्यत्र प्रकाशित हुए हैं, उल्लेख या अंगीकार नहीं हुआ है। उनकी देशभक्ति के सम्बन्ध में मैंने अभी जो कुछ
कहा है उसको भली भांति पुष्ट और सत्य सिद्ध करने को (अंगरेजी) तीसरी जिल्द का सातवां भाग काफी है। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि, निर्भीकता और साहस की उतनी ही मात्रा पाई जाती है जितनी किसी जटिल आधिभौतिक समस्या के विवेचन में। और बिना प्रतिवाद की आशंका के मैं यह भी जोड़ सकता हूँ कि, विदेशी राष्ट्रों के सामने पतित मातृभूमि का पक्ष पुष्ट करने में, जैसे कि "भारत की ओर से अमेरिकनों से अपने निवेदन" (अपील) में, अथवा सदियों के ह्रास और पतन के बाद—जैसी विचित्र घटना संसार के किसी अन्य बड़े राष्ट्र को देखना नहीं नसीब हुई है—भारत की अयोग्य और अधम सन्तानों को उन्नति और उत्थान का पथ बताने में साहस और उत्सर्ग का जो भाव उन्होंने सदा प्रगट किया है वह हमारे श्रेष्ठ संन्यासियों में भी विरल ही रहा है। यदि प्यारे राम ने ऐसा न किया होता तो अब वे जो कुछ हमारे लिये हैं सो कदापि न होते। जो चीतों और कालरूप सर्पों के बीच में बिना भय खाये रहता था, बिलकुल निर्जन वन और विकट जंगली पहाड़ जिसे न डरा सके, निश्चित संकट के सामने से भी जिसने अपने पग पीछे नहीं लौटाये, चावल भर फिसलने पर तात्कालिक मृत्यु की सम्भावना भी, जैसी सुमेरु (बंदर पूँछ) की ऊँची चोटियों पर चढ़ने में थी, जिसे भयभीत और लक्ष्यभ्रष्ट न कर सकी, जिसने प्रबल काल को जीत लिया था, जिसके लिये यह जीवन और मृत्यु सचमुच समान थे, क्या वह, क्या ऐसा पुरुष, मैं कहता हूँ, भला किसी भी मानवी शक्ति या मानव से, वह कितना ही ऊँचा, कितना ही बड़ा, या कितना ही बलवान क्यों न होता, डर सकता था? पूर्ण निर्भीकता और स्वतंत्रता का यही मनोभाव, जीवन और
मृत्यु के सम्बन्ध में यही पूरी उदासीनता, अपने भविष्य के लिये यही निपट बेपरवाही उनके सत्य के, वह सत्य पुरोहितों या पुरोहित-वर्ग और सभ्यताओं किसी के भी विषय में हो, साहसपूर्ण और निर्भय प्रतिपादन का कारण थी। यही उनके गौरव की, उनकी महत्ता की—महत्ता में वे इस जमाने के किसी भी महापुरुष से कम नहीं थे—कुंजी थी। यही बात उनकी उन अनेक उपदेशकों, प्रचारकों, नेताओं और सुधारकों से, जो प्रायः "कम से कम प्रतिरोध के रास्ते से काम" के स्निग्ध सरल वाक्य को अपना मुख्य सिद्धान्त बनाकर कार्यारम्भ करते हैं और जिनकी पहली चिन्ता का विषय अपनी सुरक्षा और अपने तथा अपने सगों एवं कुटुम्बियों के स्वार्थ होते हैं, ऊँचा करती है। इसी से उनका सच्चा सन्यासीपन सिद्ध होता है। स्वाधीन अमेरिका में और वहां से लौटने पर अपनी जन्मभूमि में स्वाधीनता पूर्वक सत्य संसार के सभी महापुरुषों और शहीदों की तरह वे परिणामों का बिना विचार किये, अपने श्रोताओं की प्रसन्नता या अप्रसन्नता को बिना मन में लाये वे सत्य, अलंकरणशून्य, स्पष्ट, खरे सत्य का प्रचार करते थे—कहने के लिये लौकिक शक्तियों द्वारा उन पर कितना अत्याचार हुआ, यह सर्व साधारण और उनके अनेक प्रेमियों तथा प्रशंसकों को भी बहुत कम मालूम है। उनका सत्य मलिन धन के विचारों या तुच्छ लाभ या हानि के लौकिक अभिप्रायों से अप्रभावित होता था; उनका सत्य "बड़े आदमियों" अर्थात् संसार के करोड़पतियों से शासित या उनकी कृतियों से कलुषित नहीं होता था। शुद्ध सत्य-नीति और सामयिक आवश्यकता के विचारों से अन्य—"सत्य, सम्पूर्ण सत्य और सत्य के सिवाय कुछ नहीं" कहने का यह भाव ही उन्हें महा-नायक बनाता है। इसी से
संस्थाओं, सरकारों, सभ्यताओं, रीतियों परिपाटियों, पुरोहित-वर्गों, बने हुए सुधारकों, कायर नेताओं और सामान्य पुरुषों की उनकी आलोचना और निन्दा को बल और मूल्य प्राप्त होता है। स्वामी राम ने मातृभूमि की एक और बड़ी सेवा की है। अनुमान किया गया है कि, इस देश में बावन लाख साधु हैं। इनके सामने उन्होंने बड़ा ऊँचा दृष्टान्त और संन्यास का सच्चा आदर्श रक्खा है। स्वयं अपने ही जीवन और उपदेशों से उन्होंने संन्यास सम्बन्धी भ्रान्त, बल्कि दुष्ट धारणा की, कि अकर्मण्यता और गृहत्याग तथा फकीरी और शारीरिक क्लेश-सहन ही संन्यास है, अनुपयोगिता और निरर्थकता प्रगट कर दी है। वे अपने साथी मनुष्यों में स्वच्छन्दता से रहते और विचरते थे। अत्यन्त उन्नत और सभ्य देशों में उन्होंने लम्बे २ सफर किये, सरल भाव से जो कोई उनके पास पहुंचा उससे तर्क-वितर्क किया और उपदेश दिया, व्याख्यान दिये और लिखा, विवाहित जीवन और मांस-भोजन जैसे विषयों पर विवेचन किया और इस प्रकार प्रगट किया कि, संन्यास का अर्थ एकान्तता या अकर्मण्यता या कर्म-त्याग नहीं है। साथ ही इस दावे को भी उचित साबित किया कि, वेदान्त एक ऐसा व्यावहारिक तत्वज्ञान है जो मानव-जीवन के नित्य के जटिल मामलों में और आधुनिक सभ्यता के नये प्रश्नों में काम में लाया जा सकता है। अपने सादे और संयमी तथापि कर्मशील जीवन से उन्होंने हमारे सब संन्यासियों को यथार्थ मार्ग, जीवन की विधि, सफलता की कुंजी दिखला दी है। इन्हीं की उनकी प्यारी परन्तु उपेक्षित मातृभूमि को इस बड़ी बड़ी कही
और बेहिसाब ज़रूरत है। यदि हमारे दो चार लाख साधु भी वेदान्त की अति उच्च शिक्षाओं को समझ कर अपने व्यावहारिक जीवन में उनका चाव से अनुसरण करें, जैसा कि बालब्रह्मचारी स्वामी दयानन्द, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द स्वामी राम, और उनके चेले स्वामी नारायण—ये कुछ नाम अटकलपच्चू चुन लिये जाते हैं—आदि के श्रेष्ठ और मानवजाति को ऊपर उठाने वाले आदर्श जीवनों के दृष्टान्तों से प्रगट होता है, तो अहो! भारत के जीवन और दशा में कैसी क्रान्ति हो जाय, हम लोग क्या से क्या हो जांय, हमारे देश के भविष्य के निर्माण में यह एक कैसा प्रबल और प्रधान अंग हो जाय। इन महात्माओं ने उद्योग और पुनीत कार्य का गौरव बढ़ाया है। उन्होंने दिखला दिया है कि, स्फूर्ति और प्रयत्नमय (यद्यपि निष्काम) कर्मण्यता तथा संघर्ष से परिपूर्ण जीवन संन्यास के सच्चे भाव से असंगत या उसके गौरव को गिरानेवाला नहीं है। सब दुनियवी शुभाशाओं और अपने अखिल सांसारिक सम्बन्धों तथा सम्पर्कों का स्वामी राम के द्वारा भरी जवानी और होनहार लौकिक जीवन चरित के प्रारम्भ में ही, विचार सहित और आग्रहपूर्वक त्याग किया जाना—अनेक आदमियों के मार्ग के दो बड़े विघ्न और प्रलोभन—एक और अपूर्व उदाहरण पुरुष के अनेकों में जोड़ता है, जिनके कारण सत्य और मातृभूमि का उन पर उच्च श्रेणी का और अनिवार्य दावा है। विवाह के बन्धन की बेड़ियां इस देश में प्रायः हरेक को बहुत ही जल्दी और असमय में बांध कर असहाय बना देती हैं और विवाहितों को सारे मामले की किसी अवस्था में भी जवान हिलाने या अपनी इच्छा प्रगट करने का अवसर नहीं दिया
जाता। ऐसी अवस्था में एक विद्वान शास्त्री और एम. ए. को यह मत उपदेश और प्रतिपादन करते देख-सुन कर मुझे आश्चर्य होता है कि, हमारी माताओं, बहनों और स्त्रियों के प्रति हमारा कर्तव्य मातृभूमि भारतजननी या नित्य सत्य, सदाचार और न्याय के प्रति हमारे परम कर्तव्य की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण उच्चतर और अनिवार्य है। और इनमें से अन्तिम अर्थात् स्त्रियों की उस समय हमसे गांठ जोड़ दी जाती है जब विवाह-बन्धन का उद्देश्य और स्वभाव भी समझने में वे असमर्थ होती हैं। स्वामी राम स्वार्थत्याग और वैराग्य की विधि (कानून) के श्रेष्ठ उदाहरण की प्रतिमा हैं। किन्तु अपने संन्यास के ही द्वारा उन्होंने भारत की महान सेवा और उत्तम उदाहरण का स्थापन नहीं किया है। उनका विद्यार्थी जीवन भी, उनके गुरु को लिखी हुई उनकी चिट्ठियों के छुप जाने से जिस पर हाल ही में बड़ा प्रकाश पड़ गया है, हमारे विद्यार्थियों और नवयुवकों के भाग्यदर्शक का काम देता है और उनकी अनेक कठिनाइयों तथा समस्याओं को हल कर देता है। विद्यालय और महाविद्यालय के जीवन के अपने आचरण से उन्होंने दिखा दिया है कि, इस दरिद्र, अन्ततः आज कल्ह, देश में गरीबी की कठिनता कैसे हल की जा सकती है। उनका आदरभाव और आज्ञापालन, उनकी लज्जाशीलता और विनम्रता, सहपाठियों से उनकी सहानुभूति, अत्यन्त कठिन अवस्थाओं में भी उनका धैर्य और चित्त की शान्ति, निरन्तर रोगी रहने पर भी उद्योग और परिश्रम करने का उनका स्वभाव, आत्म-सम्मान का उनका ज्ञान, एम. ए. पास करने के ठीक बाद ही उनका सुकृद्धार
अतिथि-सत्कार, संन्यास ग्रहण करने के पूर्व वक्ता की हैसियत से उनकी बड़ी लोकप्रियता और प्रसिद्धि, कलह के लिये उनका कभी न "भड़कना"—ये कुछ बातें हैं जिनका मुझ पर उनकी प्रायः 1100 चिट्ठियों में से 300 के पढ़ने में प्रभाव पड़ा। उपक्रम की ये पंक्तियां लिखने के समय एक घंटे भर भी बिना सूक्ष्म विचार किये उनके अल्प जीवन और उत्कृष्ट उपदेशों के इन कुछ पहलुओं और लक्षणों पर मेरा ध्यान तुरन्त गया। राम को मैंने कभी नहीं देखा और न अब तक विचारपूर्वक उनके उपदेशों के अध्ययन का ही मौका मिला था। उनके अधिकांश देशवासियों को उनके उपदेश अभी अमली रूप से अज्ञात हैं। मुझे विश्वास है कि, जितना ही अधिकाधिक वे पढ़ें और समझें जायंगे उतनी ही अधिक राम की प्रशंसा होगी और आदर तथा अनुकरण बढ़ेगा। और मुझे जान कर बड़ा ही विस्मय हुआ कि, राम के प्रेमियों और भक्तों की संख्या बहुत बड़ी है, वे समग्र भारत में छाये हुए हैं और अपने देशवासियों पर—उन प्रान्तों के निवासियों पर भी जिनमें वे अपने अल्प जीवन और अल्पायुत्व काल में कभी नहीं गये—उन (राम) का कितना अधिक आडम्बरशून्य और मौन प्रभाव पड़ा है। गुजराती, मराठी, हिन्दी और तामील आदि देशी भाषाओं में इन पुस्तकों का अनुवाद हो रहा है। ये अनुवाद कम और अधिक हो गये हैं। उनकी रचनाओं के उर्दू संस्करण का भार अन्त में स्वामी नारायण ने स्वयं उठाया है। [इन भाषान्तरों तथा और कई प्रकाशनों के, सम्बन्ध में यहां पर यह समझा देना आवश्यक ज्ञान पड़ता
है कि, अनुवाद और फिर छापने का स्वत्व स्वरक्षित कर लिया गया है। परन्तु पैसा कमाने के लिये राम की शिक्षाओं के प्रचार को एक हत्या करने के निरन्तर से नहीं। इससे अधिक नीचता, इससे अधिक हमारे विचारों से दूर और हो ही क्या सकता है। प्रकाशित होने वाले ग्रन्थों की पवित्रता, श्रेष्ठता, शुद्धता और स्वच्छता असंदिग्ध कर देने के लिये ही अनिच्छापूर्वक यह काम करना पड़ा है। यह बड़े ही आश्चर्य और करुणा की बात है कि, अधिकार का इतना उपयोग और कार्य का यह नियमन भी अनेक लोगों द्वारा, जिनसे स्वप्न में भी ऐसी आशा नहीं थी, बिलकुल ही और का और समझा गया है। स्वामी राम के ब्रह्मलीन होने पर टिहरी के महाराज साहब ने स्वामी नारायण को यथाविधि उनका उत्तराधिकारी माना और नियुक्त किया था, तथा स्वयं अपने हाथ से उन्हें राममठ और राम के बक्सों की चाबियां आम दरबार में दी थीं। अतएव इन ग्रन्थों पर स्वामी नारायण को पूरा मालिकाना हक (केवल लौकिक अर्थ में) प्राप्त है। उक्त स्वामी जी को उनके स्वार्थों की सुरक्षा आवश्यक प्रतीत होती है, जिन्होंने उनके कहने पर या उनकी सलाह से पहले क्षेत्र में आकर अपना रुपया—किसी ने कर्ज़ लेकर—फँसाया। ऐसे लोगों के स्वार्थों का उनका ध्यान रखना क्या न्यायसंगत नहीं है? क्या यह सत्य नहीं है कि, अधिक घाटा होने पर ये भाई अवश्य हताश होकर और अधिक प्रकाशन का कार्य न करेंगे, जिसके लिये स्वामी नारायण अभी इन्हीं पर निर्भर करते हैं? जिन लोगों ने इस कार्य से एक कौड़ी का भी लाभ न उठाने की प्रतिज्ञा की तथा शपथ ली है और शुद्ध धार्मिक भाव से प्रेम का श्रम समझ कर समस्त कार्य कर रहे हैं उनको,
आर्थिक लाभ के उद्देश्य से प्रेरित, अनुचित और असामयिक, व्यापारिक प्रतियोगिता से बचाना क्या नैतिक कर्तव्य नहीं है? यह विशुद्ध धार्मिक उद्यम यदि मुकद्दमेबाज़ी का कारण या विषय बन तो क्या यह एक शोचनीय दृश्य न होगा—राम के प्रति हमारे आदर-भाव पर दुखदायी टीका न होगी? भाषान्तरों के सम्बन्ध में, उन्हें रोकने और चन्द करने का ज़रा सा भी विचार नहीं है। हमारी उत्कट अभिलाषा है कि, देश की सब भाषाओं में अनुवाद हों ताकि जनता तक भी ये उत्तम ग्रन्थ पहुँचें और यथोचित भाव से इस कार्य के कर्ताओं का पूरा स्वागत है। स्वामी नारायण स्वयं अपने सब काम में शुद्धता, स्वच्छता, और साहित्यिक रूप तथा आकार-प्रकार पर बड़ी तीक्ष्ण दृष्टि रखते और विशेष ध्यान देते हैं। इस लिये यह बहुत ज़रूरी जान पड़ता है कि, जो लोग इन ग्रन्थों का भाषान्तर करने और छापने की सर्वथा योग्यता रखते हैं वेही इस पवित्र काम को उठावें और निरन्तर स्वार्थपूर्ण लाभ के अभिप्राय से किसी भाई को यह काम न करना चाहिये, जैसा कि, मुझे कहते खेद होता है, कुछ लोग पहले कर चुके हैं। अनुवादकों और अनुवादों के प्रकाशकों के ही हितार्थ यह आवश्यक है कि, जो लोग ऐसा कर रहे हैं वे हमको अवगत रक्खें ताकि अनावश्यक प्रतियोगिता से उन्हें हानि न उठाना पड़े, क्योंकि ऐसा हो सकता है कि अनेक सज्जन एक ही समय में एक ही भाषा में एक दूसरे के कार्य को बिना जाने अनुवाद प्रकाशित करें। केवल ऐसे उच्च अभिप्रायों से ही दूसरों का साहस नियंत्रित मात्र किया जाता है। इस प्रयत्न का कुछ लोग अनर्थ करें, और कुछ लोग, जो अपने को राम का बड़ा प्रेमी और
प्रशंसक कहते हैं, निन्दा करें, यह करुणाजनक बात है। ऐसी भ्रान्तियां, क्षुद्र द्वेष, स्वार्थपरता और अन्य दूषणों के, जो विघ्नों का काम देते हैं, शापों से हमारे देश में उत्तम और उपयोगी कार्य को न जाने कब तक हानि पहुंचती रहेगी। कुछ लोगों के द्वारा अधिकार का दुरुपयोग होने पर विवश होकर जो रास्ता हमें लेना पड़ा है उसके कारण और हमारे अभिप्रायों की अज्ञानता के चलते कुछ भाइयों के मनों में और हाल में जिन भ्रान्तियों और भेदों का उदय हुआ है उनको दूर और मामले को बिलकुल साफ कर देने में ऊपर की पंक्तियां समर्थ होंगी, यह मुझे पूरा भरोसा है।] उधर जो कुछ लिखा गया है उससे स्पष्ट है कि, भूत की अपेक्षा भविष्य से स्वामी राम का प्रभाव अधिक सम्बन्ध रखता है और जितना इस समय अनुभव किया जाता या ज्ञात है उसकी अपेक्षा इस देश के भावी घटनाचक्र पर उनका अधिक प्रबल और प्रमुख प्रभाव पड़ेगा, जैसा कि प्रभाव वे डालते यदि अचानक और अकाल में हमें न छोड़ जाते। अब वे स्थूल शरीर हमारे बीच में नहीं हैं, इस लिये उनकी योग्यता और भी अधिक अच्छी तरह जानी, समझी और अनुभव की जायगी। यहां पर मेरा यह सूचित करना क्या बेमौके होगा कि, राम के सच्चे तथा प्रेमी और भक्त, वर्ष में एक बार, यदि सम्भव और सुभीता हो तो, उनकी मृत्यु या जन्म के दिन किसी केन्द्रीय स्थान में या चारी २ से विभिन्न स्थानों में, जहां के भाई आमंत्रित करें, जमा होकर एक साथ राम का अध्ययन और यह निर्णय किया करें कि देश के इस सिरे से उस सिरे तक उनके उपदेशों के समझाने और प्रचार के लिये कौन
उपाय किये जा सकते हैं? इस महान उद्योग में जिनसे मुझे अनेक तरह पर बड़ी और मूल्यवान सहायता मिली है उन्हें केवल धन्यवाद देना अब मेरे लिये बाकी रह गया है। स्वामी नारायण आदि से अन्त तक मेरे पथप्रदर्शक और सहायक रहे हैं। उनके बिना मैं यह काम कर ही न पाता। कुछ सज्जनों ने अपनी समालोचनाओं और मूल्यवान सूचनाओं से, कुछने भाषा में आवश्यक परिवर्तनों और संशोधनों द्वारा, कुछने मूल-लेखों की नकल और टाइप करके, कुछने मेरे प्रूफ देखते समय मूलको पढ़ कर, कुछने पुस्तकें बाहर भेजने के छोटे काम तक में भी मेरी सहायता की है। और अन्त में, किन्तु यह तुच्छ बात नहीं है, अनेकों ने इस प्रकाशन की दूसरों को सूचना देने और उन्हें पुस्तकें मंगाकर पढ़ने को सन्नद्ध करने में तत्परता और उत्साह से साथ दिया है। यदि मैं कुछ के भी नाम लिखूं तो यह दीर्घ अवतरण और भी बहुत बढ़ जाय अतएव मैं इस अवसर पर उन सबको सच्चे हृदय से धन्यवाद देता हूँ और याद दिलाता हूँ कि अभी उन्हें बहुत कुछ करना है। राम के चुने हुए कल्याणों की वर्षा उन पर हो। ईश्वर करे सत्य और न्याय का झंडा उठाना और राम के श्रेष्ठ तथा ऊपर उठाने वाले उदाहरण का अनुकरण करना अनेकों के भाग्य में पड़े। दिल्ली, अमीरचन्द। 26 अप्रैल, 1913। ॐ ! ॐ !! ॐ !!!