सफलता की कुंजी।
टोकियो (जापान) के हाई कमर्शल कॉलेज में दिया हुआ स्वामी रामतीर्थ का व्याख्यान। भाइयो, भारत की अपेक्षा जापान जिस विषय का व्यवहार ज़ाहिरा अधिक बुद्धिमानी से कर रहा है उस पर एक अभ्यागत भारतीय का व्याख्यान देना क्या आश्चर्यजनक नहीं है? होगा। किन्तु एक से अधिक कारणों से मैं आप लोगों के सामने उपदेश देने खड़ा हुआ हूँ। किसी विचार को दृढ़तापूर्वक अमल में लाना एक बात
है और उसके तत्व को समझ लेना दूसरी बात है। किन्हीं सामान्य सिद्धान्तों के वर्तने से यदि कोई राष्ट्र आज फल-फूल भी रहा हो तो भी उसके पतन का पूरा २ खतरा है, यदि राष्ट्रीय चित्त ने उन सिद्धान्तों को भली भांति नहीं समझ लिया है और गम्भीर कल्पना से वे (सिद्धान्त) अनुमोदित नहीं हैं। सफलता पूर्वक किसी रासायनिक प्रयोग को करने वाला मजूर रसायन-शास्त्री नहीं बन जाता। क्योंकि उसका कार्य कल्पना या युक्ति से परिपूर्ण नहीं है। इंजन को सफलतापूर्वक चलाने वाला कोयला-झोंकू इंजीनियर नहीं हो सकता, क्योंकि वह फल की तरह एक बंधे ढर्रे पर काम करता रहता है। हमने एक जर्राह की कहानी पढ़ी है जो घावों को एक सप्ताह तक पट्टी से बंधा रख कर और नित्य तलवार से छूकर अच्छा कर देता था। खुले न रहने के कारण घाव अच्छे हो जाते थे। किन्तु वह तलवार के स्पर्श में अच्छा करने की विचित्र शक्ति बताता था। उसके रोगी भी ऐसाही समझते थे। इस श्रद्धाविश्वासमय कल्पना के कारण अनेक ऐसे मामलों में, जिन्हें केवल बन्धन के सिवाय किसी अन्य दवा की भी ज़रूरत थी, बार २ असफलता पर असफलता हुई। इस लिये ठीक उपदेश और ठीक प्रयोग का साथ रहना बहुत ही जरूरी है। दूसरे, मैं जापान को अपना देश समझता हूं और जापानियों को अपने देश-वासी। मैं युक्तिपूर्वक सिद्ध कर सकता हूं कि आपके पूर्वज प्रारम्भ में भारत से आये। तुम्हारे पूर्वज मेरे पूर्वज हैं। इस लिये तुम्हारे भाई की तरह तुम से हाथ मिलाने आया हूं, न कि परदेशी की तरह। एक और भी हेतु है जो मुझे समान भाव से इस स्वत्व का अधिकारी बनाता है। जन्म से ही मैं स्व-
भाव, ढंगों, आदतों और सद्अनुभूतियों में जापानी हूं। इस भूमिका के बाद में अपने विषय पर आता हूं। सफलता की कुंजी एक खुला हुआ रहस्य है। हरेक आदमी इस विषय पर कुछ न कुछ कह सकता है, और इसके सामान्य सिद्धान्तों का वर्णन शायद आपने अनेक बार सुना होगा। परन्तु विषय यह इतने महत्व का है कि लोगों के मनों में बैठाने के लिये जितना भी इस पर जोर दिया जाय ठीक ही है। सफलता का पहला सिद्धान्तः—कार्य। शुरू में हमें यह प्रश्न अपने इर्दगिर्द की प्रकृति से करना चाहिये। "बहते हुए नालों की" सब "किताबें, और शिलाओं के उपदेश" असंदिग्ध स्वरों से निरन्तर, अविरत कार्य के मंत्र का प्रचार कर रहे हैं। प्रकाश से हमें देखने की शक्ति मिलती है। प्रकाश सब प्राणियों को एक मूलस्रोत देता है। आओ देखें कि स्वयं प्रकाश इस विषय पर क्या प्रकाश डालता है। उदाहरण के लिये मैं साधारण प्रकाश, दीपक को लेता हूं। दीपक की प्रभा और उज्ज्वलता का मूल मंत्र यही है कि वह अपनी बाती और तेल को नहीं बचाता है। बाती और तेल या तुच्छ स्वयं निरन्तर खर्च किया जा रहा है और गौरव इसका स्वाभाविक परिणाम होता है। यही वो बात है। दीपक कहता है, अपने को बचाते ही तुम तुरन्त बुझ जाओगे। यदि तुमने अपने शरीरों के लिये चैन और आराम चाही, यदि विलासिता और इन्द्रियों के सुखों में तुमने अपना समय नष्ट किया तो तुम्हारी खैर नहीं है। दूसरे शब्दों में, अकर्मण्यता तुम्हें मृत्यु के मुख में डालेगी और कर्मण्यता, केवल कर्मण्यता ही जीवन है। बंधे हुए तालाब और बहती हुई
नदी को देखो। नदी का झरझराता हुआ बिलौरी पानी सदा ताजा, स्वच्छ, मनोहर और पीने के योग्य रहता है। किन्तु, इसके विपरीत, बंधे हुए सरोवर का जल, देखिये तो सही, कैसा मैला, गंदला, बदबूदार, दुर्गन्धयुक्त और घिनौना होता है। यदि आप सफलता चाहते हैं तो कार्य का रास्ता पकड़िये, नदी की निरन्तर गति का अनुकरण कीजिये। उस मनुष्य के लिये कोई आशा नहीं है जो अपनी बाती और तेल को खर्च करने से बचाने में नष्ट करना चाहता है। सदा आगे बढ़ने, दूसरी वस्तुओं को सदा अपने रूप में मिलाते रहने, सदा अपने को परिस्थिति के अनुकूल बनाने, और बराबर काम करने की नदी की नीति बड़ी। सफलता का पहला सिद्धान्त है काम, काम, विश्रामहीन काम। "अच्छे से बहुत अच्छे होते हुए नित्य प्रति अपने आप से आगे बढ़ना"। यदि आप इस सिद्धान्त पर काम करें तो आप देखेंगे कि "छोटा बनना जितना सहज है बड़ा बनना भी उतना ही"। दूसरा सिद्धान्तः—आत्मोत्सर्ग। हरेक मनुष्य सफेद चीज़ों को प्यार करता है। उनके सार्वभौम प्रेमपात्र होने का कारण जानना चाहिये। सफेद की सफलता का सबब हमें समझाना चाहिये। काली चीज़ों से सब कहीं घृणा की जाती है। वे सर्वत्र उपेक्षित होती हैं, कहीं भी उनका आदर नहीं होता। इस तथ्य को मान कर हमें इसका कारण जानना चाहिये। पदार्थ-विज्ञान हमें रंग के चमत्कार की असलियत बताता है। लाल लाल नहीं है, हरा हरा नहीं है, काला काला नहीं है, और सभी चीज़ें जैसी दिखाई पड़ती हैं वैसी नहीं हैं। लाल गुलाब लाल
रंग को लौटाने या प्रतिक्षेप करने से ही अपना सुहावना (लाल) रंग पाता है। सूर्य की किरणों के और सब रंग गुलाब अपने में लीन कर लेता है और गुलाब को उन रंगों का कोई नई फांता। हरी पत्ती प्रकाश के अन्य सब रंगों को अपने में लीन कर लेती है किन्तु जिस रंग को वह ग्रहण नहीं करती तथा लौटा देती है उसी की बदौलत वह ताजी और हरित जान पड़ती है। काले पदार्थों में सब प्रकाशों को अपने में लीन कर लेने और किसी को भी प्रतिबिम्बित न करने का गुण होता है। उनमें आत्म-त्याग और दान का भी नाम मात्र को भी नहीं होता। वे एक किरण का भी त्याग नहीं करते। वे जो कुछ प्राप्त करते हैं उसका जरा सा भी अंश नहीं लौटाते। प्रकृति आपको बतलाती है कि जो कोई अपने पड़ोसी को अपनी प्राप्ति देने से इनकार करता है वह काला, कोयले के समान काला दिखाई पड़ता है। देना ही पाने का उपाय है। सर्वस्व-त्याग, जो कुछ मिले वह सब का सब तुरन्त अपने पड़ोसियों को दे डालना ही सफेद मालूम होने की कुंजी है। सफेद वस्तुओं के इस गुण को प्राप्त कीजिये और आप सफल होंगे। सफेद से मेरा मतलब क्या है? यूरोपीय! केवल यूरोपीय ही नहीं, सफेद शीशा, सफेद मोती, सफेद वस्त्र, सफेद बर्फ, विशुद्धता और शुचिता के सभी चिन्ह आपके महान गुरू हैं। इस लिये बलिदान की भावना को धारण करो और जो कुछ तुम्हें मिले उसे दूसरों पर प्रतिबिम्बित करो। स्वार्थपूर्ण शोषण का आश्रय न लो और तुम सफेद हो जाओगे। अंकुरों में फूट कर वृक्ष बनने के लिये बीज को अपने को मिटाना पड़ता है। इस प्रकार पूर्ण आत्मोत्सर्ग का अन्तिम परिणाम सफलता है। सभी शिक्षक मेरे इस कथन का समर्थन करेंगे।
कि ज्ञान का प्रकाश जितना ही अधिक हम फैलाते हैं उतना ही अधिक हम प्राप्त करते हैं। तीसरा सिद्धान्तः—आत्मविस्मृति। विद्यार्थी जानते हैं कि अपनी साहित्यिक सभाओं में व्याख्यान देते समय ज्यों ही उनके चित्त में यह विचार प्रबलता प्राप्त करता है कि "मैं व्याख्यान देता हूं" उनका व्याख्यान बिगड़ जाता है। काम में अपने तुच्छ स्वयं को भूल जाओ और दिलोजान से उसमें लग जाओ, तुम सफल होगे। यदि तुम विचार कर रहे हो तो विचार ही बन जाओगे और तब तुम्हें सफलता होगी। यदि तुम काम में लगे हो तो स्वयं काम ही बन जाओगे। और सफलता का केवल यही उपाय है। मैं कब मुक्त हूंगा? जब "मैं" न रह जायगी। दो भारतीय राजपूतों की एक कहानी है। ये दोनों भारत के मोगल सम्राट अकबर के पास गये और नौकरी मांगी। अकबर ने उनकी योग्यता पूछी। उन्होंने कहा, हम शूरवीर हैं। अकबर ने उनसे इस कथन का प्रमाण देने को कहा। दोनों ने अपने खंजर म्यान से निकाल लिये। अकबर के दरबार में दो बिजलियां कौंधने लगीं। खंजरों की चमक दोनों वीरों की आन्तरिक शूरता का प्रतिरूप थी। तुरन्त दो कौंधें दोनों शरीरों में मिल गईं। दोनों ने अपने २ खंजर की नोक दूसरे की छाती पर रखी और दोनों ही ने निर्मम शान्ति से खंजरों पर दिल कर अपनी शूरता का प्रमाण दिया। शरीर गिरे, आत्माओं का मेल हुआ, और वे वीर सिद्ध हुए। उन्नति के इस युग में यह कहानी वीभत्स है। मेरा संकेत कहानी की ओर नहीं है। उनकी शिक्षा पर
ध्यान दीजिये। इससे यही शिक्षा मिलती है, अपने तुच्छ स्वयं को उत्सर्ग कर दो, अपने काम के करने में इस तुच्छ स्वयं को भूल जाओ, और सफलता तुम्हारे सामने आकर हाज़िर होगी। इसके विरुद्ध हो ही नहीं सकता। क्या यह मैं नहीं कह सकता कि सफलता प्राप्त करने के पूर्व ही काम करने में ही सफलता की आपकी आकांक्षा का अन्त हो जाना चाहिये? चौथा सिद्धान्तः—सार्वभौम प्रेम। प्रेम सफलता का एक और सिद्धान्त है। प्यार करो और प्यार पाओ, यही लक्ष्य है। हाथ को अपने जीवन के लिये शरीर के सब अंगों को प्यार करना पड़ेगा। यदि वह अपने को अलग करके सोचने लगे कि "मेरी कमाई का लाभ समग्र शरीर क्यों उठावे" तो उसकी कुशल नहीं, उसे मरना पड़ेगा। संगत स्वार्थपरता के विचार से, केवल अपने परिश्रम -वह कलमी हो या तलवारी आदि- की चोट से प्राप्त मांस और पेय को हाथ को मुख में न रखना चाहिये, उसे उचित है कि सब प्रकार के पौष्टिक भोजनों को अपनी ही खाल में भरकर दूसरे अंगों को अपने परिश्रम के फल में भाग न लेने दे। यह सत्य है कि इस भराव अथवा मधुमक्खी या बर्रैया के डंक से हाथ मोटा हो सकता है। परन्तु ऐसी मोटाई हित की अपेक्षा अहित ही अधिक करती है। सूजन तरक्की नहीं है और पीड़ित हाथ अपनी खुदगर्जी के कारण अवश्य मर जायगा। हाथ तभी समृद्ध हो सकता है जब उसे शरीर के और सब अंगों के स्वयं से अपने आप की एकता का अमली अनुभव हो और समग्र की भलाई से अपने आपकी भलाई को अलग न करले।
सहकारिता प्रेम का ऊपरी प्रकाशन मात्र है। सहकारिता की उपयोगिता के सम्बन्ध में आप बहुत कुछ सुनते रहते हैं। विस्तारपूर्वक उस पर कुछ कहना अनावश्यक है। आपके भीतरी प्रेम से उस सहकारिता का उद्भव होना चाहिये। प्रेममय हो जाते ही आप सफल हैं। जो व्यापारी अपने ग्राहक के स्वार्थों को अपने ही नहीं समझता वह सफलता नहीं प्राप्त कर सकता। फलने-फूलने के निमित्त उसे अपने ग्राहकों से प्रेम करना चाहिये। उसे दिलोजान से उनकी सेवा करना चाहिये। पांचवां सिद्धान्तः—प्रसन्नता। दूसरी वस्तु जो सफलता के सम्पादन में महत्वपूर्ण भाग लेती है, प्रसन्नता है। मेरे भाइयो, तुम स्वभाव से ही प्रसन्नचित्त हो। तुम्हारे खिलते हुए चेहरों की सुसज्जा देख कर मुझे आनन्द होता है। तुम मुस्कुराते हुए फूल हो। तुम मानवजाति की हंसती हुई कलियां हो। तुम मूर्तिमान प्रसन्नता हो। मैं तुम्हें यह बतलाना चाहता हूं कि समय के अन्त तक अपने जीवन का यह लक्षण कायम रक्खो। अब हमें यह विचारना है कि इसकी रक्षा कैसे हो सकती है। अपने प्रयत्नों के पुरस्कार के लिये चिन्तित न हो, भविष्य की परवाह न करो, संशयों को त्याग दो, सफलता और असफलता का विचार न करो। कार्य के लिये कार्य करो। काम अपना पुरस्कार आपही है। भूत पर विना खिन्न हुए और भविष्य की बिना चिन्ता किये जीवित वर्तमान में काम करो, काम करो, काम करो। यह भाव तुम्हें सब अवस्थाओं में प्रसन्न रक्खेगा। जीवित बीज को फलने फूलने के लिये हवा, पानी और मट्टी की जितनी मात्रा की जरूरत है
उसे वह लगाव या सम्बन्ध के अलंघ्य नियम से अपनी ओर खींच ही लेगा। इसी प्रकार प्रकृति प्रसन्नचित्त कमठ कार्यकर्त्ता को हर प्रकार की सहायता का वचन देती है। "जो कुछ हमें प्राप्त है उसका सदुपयोग ही अधिक प्रकाश पाने का साधन है।" यदि एक अंधेरी रात में तुम्हें बीस मील की यात्रा करना है और तुम्हारे हाथ के प्रकाश की रोशनी केवल दस फीट ही तक जाती है तो समग्र अप्रकाशित रास्ते का विचार न करो, बल्कि प्रकाशित फासला चल डालो और दस फीट रास्ता और आप ही रोशन हो जायगा फिर कोई भी स्थल तुम्हें अंधेरा न मिलेगा। इसी तरह किसी वास्तविक, उत्सुक कार्यकर्त्ता को एक आवश्यक नियम के अनुसार अपने मार्ग में कहीं भी अंधेरी भूमि नहीं मिलती है। तो फिर घटना के सम्बन्ध में बेचैन होकर दिल को शोक हम क्यों करें? जो लोग तैरना नहीं जानते वे यदि अचानक झील में गिर पड़े तो केवल अपनी समविचत्तता को बनाये रख कर अपने को बचा सकते हैं। मनुष्य का जातीय गुरुत्व जल से कम होने के कारण वह उतराता रहेगा। किन्तु साधारण मनुष्यों के चित्त की स्थिरता जाती रहती है और उतराते रहने के अपने प्रयत्न के ही कारण वे डूब जाते हैं। इसी तरह भावी सफलता के लिये व्यग्रता स्वयं ही प्रायः असफलता का कारण होती है। सफलता के पीछे दौड़ने और भविष्य से चिपटनेवाले विचार के स्वभाव को हमें जान लेना चाहिये। वह ऐसा है। एक मनुष्य अपनी ही छाया पकड़ने को जाता है। अनन्त समय तक वह भले ही दौड़ता रहे परन्तु अपनी छाया को कदापि, कदापि न पकड़ पावेगा। किन्तु छाया की ओर पीठ करके
सूर्य की ओर अवलोकते ही, देखो तो सही! वही छाया उसके पीछे दौड़ने लगती है। ज्योंही तुम सफलता की ओर अपनी पीठ फेरते हो, ज्योंही तुम परिणामों की चिन्ता त्याग देते हो, ज्यों ही तुम अपनी उद्योग-शक्ति अपने उपस्थित कर्तव्य पर एकाग्र करते हो त्यों ही सफलता तुम्हारे साथ हो जाती है, बल्कि तुम्हारे पीछे २ दौड़ने लगती है। अतः सफलता का अनुसरण करो, सफलता को अपना लक्ष्य न बनाओ। तभी और केवल तभी सफलता तुम्हें ढूंढेगी। किसी न्यायालय में विचारक को, अपना इजलास लगने के लिये वादियों-प्रतिवादियों, वकीलों और चपरासियों आदि को बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती। स्वयं न्यायाधीश के अपने न्यायासन पर बैठ जाने भर की जरूरत है और सम्पूर्ण रंगशाला आप ही आप उसके सामने प्रगट हो जाती है। प्यारे मित्रो! यही बात है। बड़ी प्रसन्नता से अपने कर्तव्य का पालन करते रहो और सफलता के लिये तुम्हें जो कुछ भी आवश्यक है सब तुम्हारे पैरों पर आकर गिरेगा। छठा सिद्धान्तः—निर्भीकता। जिस दूसरी बात की ओर मैं आपका ध्यान खींचना चाहता हूं और जिसकी सत्यता स्वानुभव से सिद्ध करने को मैं आपसे आग्रह करूंगा वह निर्भीकता है। एक ही नज़र से सिंह वशीभूत किये जा सकते हैं, एक ही दृष्टि से शत्रु शान्त किये जा सकते हैं, एक ही निर्भय चोट से विजय प्राप्त की जा सकती है। हिमालय की वनी घाटियों में मैं घूमा हूं। चीते, रीछ, भेड़िये और चिपैले जन्तु मुझे मिले हैं। कोई हानि मुझे नहीं पहुंची। जंगली जानवरों पर अशंक भाव से सीधी दृष्टि डाली गई, नज़र से नज़र मिली,
खूनी पशु भाग गये तथा भयंकर कहे जाने वाले जीव कुपित होकर चल दिये। यही दशा है। निर्भय बनो और कोई तुम्हें हानि न पहुंचा सकेगा। कबूतर बिल्ली के सामने किस तरह अपनी आंखें बन्द कर लेता है, शायद आपने देखा होगा। कदाचित वह समझता है कि बिल्ली उसे नहीं देखती, क्योंकि वह बिल्ली को नहीं देखता। तब क्या होता है! बिल्ली कबूतर पर झपटती है और उसे खा लेती है। निर्भयता से चीता भी पालतू बना लिया जाता है और डरनेवाले को बिल्ली भी खा जाती है। आपने शायद देखा होगा कि थरथराता हुआ हाथ एक बर्तन से दूसरे बर्तन में कोई तरल पदार्थ ठीक २ नहीं उंडेल सकता। वह अवश्य गिर जायगा। किन्तु एक स्थिर अशंक हाथ बिना एक बूंद भी गिराये बहुमूल्य तरल पदार्थ को उलट पुलट सकता है। पुनः प्रकृति आप को अजेय ओजस्विता से शिक्षा दे रही है। एक बार एक पंजाबी सिपाही जहाज पर किसी दुष्ट रोग से पीड़ित हुआ। डाक्टर ने उसे जहाज से फेंक दिये जाने का अपना अन्तिम आदेश निकाला। डाक्टर, ये डाक्टर कभी २ प्राण-वध के दण्ड देते हैं। सिपाही को इसका पता लग गया। शत्रु से घिर जाने पर साधारण लोगों में भी निर्भयता चमक उठती है। असीम शक्ति से सिपाही उछल पड़ा और निर्भय होगया। वह सीधा डाक्टर के पास गया और अपनी पिस्तौल उसकी ओर सीधी करके बोला, "मैं बीमार हूं! तुम पेशा कहते हो? मैं तुम्हें गोली मार दूंगा"। डाक्टर ने तुरन्त ही उसे स्वस्थता का प्रमाणपत्र
दे दिया। निराशा ही निर्बलता है, इससे बचो। निर्भयता ही सारी शक्ति का मूल है। मेरे शब्दों-निर्भयता-पर ध्यान दो। निर्भय हो जाओ। सातवां सिद्धान्तः—स्वावलम्बन। अन्त में, किन्तु तुच्छ नहीं, बल्कि, सफलता का मार्मिक सिद्धान्त अथवा स्वयं कुंजी स्वावलम्बन या आत्म-निर्भरता है। यदि मुझसे कोई एक शब्द में मेरा तत्वज्ञान बताने को कहे तो मैं कहूंगा "स्वावलम्बन" आत्मा का ज्ञान। ऐ मनुष्य! सुन, अपने को जान। वह सच है, अक्षरशः सच है कि जब आप अपनी सहायता करते हैं तो ईश्वर भी आप की सहायता करता ही है। दैव आपकी सहायता करने को बाध्य है। यह सिद्ध किया जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है कि आपका अपना स्वयं ही ईश्वर, अनन्त, सर्वशक्तिमान है। यह एक वास्तविकता, एक सत्यता है, जो प्रयोग से प्रमाणित होने को प्रत्याशा कर रही है। सच मुच, सच मुच, अपने पर निर्भर करो और तुम सब कुछ कर सकते हो। तुम्हारे सामने असम्भव कुछ भी नहीं है। सिंह वन-राज है। वह अपने आप पर निर्भर करता है। वह हिम्मती, बली, और सब कठिनाइयों को जेता है, क्योंकि वह स्वस्थ (अपने में स्थित) है। हाथी, जिन्हें यहूदियों ने पहले पहल भारत के जंगलों में देखकर "गतिशील भूधर" कहा था और ठीक कहा था, अपने शत्रुओं से सदा भयभीत रहते हैं। वे हमेशा दल बांध कर रहते हैं और सोते समय अपनी रक्षा के लिये पहरुए नियुक्त कर देते हैं, और उनमें से कोई भी अपने ऊपर या अपनी सामर्थ्य पर नहीं भरोसा करता। वे अपने को निर्बल समझते हैं और नियम के अनुसार उन्हें
निर्बल होना पड़ता है। सिंह की एक साहसपूर्ण झपट उन्हें भयभीत कर देती है और हाथियों का सम्पूर्ण समूह घबड़ा जाता है, यद्यपि एक ही हाथी—चलता-फिरता पहाड़— करोड़ों सिंहों को अपने पैरों से कुचल डाल सकता है। दो भाइयों को, जिन्हों ने पैतृक सम्पत्ति को सम-भाग में बांटा था, एक बड़ी ही शिक्षाप्रद कहानी प्रचलित है। कुछ वर्षों के बाद एक तो गरीब हो गया और दूसरे ने अपनी सम्पत्ति अनेकगुणी बढ़ाली। जो "लक्षाधीश" हो गया था उसने किसी के "क्यों और कैसे" प्रश्न के उत्तर में कहा, मेरा भाई सदा कहा करता था "जाओ, जाओ" और मैं सदा कहा करता था 'आओ, आओ'। इसका अर्थ यह है कि उनमें से एक तो अपने मुलायम गद्दी पर पड़ा रहता था और नौकरों को आज्ञा दिया करता था 'जाओ, जाओ, अमुक दाम करो" और दूसरा अपने काम पर सदा खुद मुस्तैद रहता था और अपने सेवकों से सहायता मांगता था, "आओ, आओ, यह करो"। एक अपनी शक्ति पर निर्भर करता था और नौकरों तथा धन की वृद्धि हुई। दूसरा अपने नौकरों को आज्ञा देता था "जाओ, जाओ"। वे चल गये और सम्पत्ति ने भी उसकी "जाओ, जाओ" की आज्ञा का पालन किया और वह अकेला रह गया। राम कहता है। "आओ, आओ" और मेरी सफलता तथा आनन्द में हिस्सा लो। भाइयो, मित्रो, और देशवासियो! यह मामला है। मनुष्य अपने भाग्य का आप ही मालिक है। यदि जापान- वासी अपने समक्ष मुक्त अपने विचार प्रकट करने का और अवसर दें तो यह दिखलाया जा सकता है कि किस्से-कहा- नियों और पौराणिक कथाओं पर विश्वास करने और अपने
से बाहर हमें अपना केन्द्र मानने का कोई युक्ति-संगत आधार नहीं है। एक गुलाम भी स्वतंत्र होने ही के कारण गुलाम है। स्वाधीनता के ही कारण हम सुखी हैं, अपनी स्वाधीनता के ही चलते हम कष्ट भोगते हैं, और हमारी स्वाधीनता ही हमें गुलाम बनाती है। तो फिर हम विलाप और कांय-कांय क्यों करें और अपनी सामाजिक तथा शारीरिक स्वाधीनता के लिये अपनी स्वतंत्रता का उपयोग क्यों न करें? राम जो धर्म जापान में लाया है वह यथार्थ में वही है जो सदियों पूर्व बुद्ध के अनुयायी यहां लाये थे। परन्तु वर्तमान युग की ज़रूरतों के उपयुक्त होने के लिये निपट भिन्न स्थिति-बिन्दु से उसी धर्म के उहापोह की आवश्यकता है। पाश्चात्य पदार्थ-विज्ञान और तत्वज्ञान के प्रकाश में उसे प्रकाशित करने की ज़रूरत है। मेरे धर्म के मूल और आवश्यक सिद्धान्तों का वर्णन जर्मन कवि गेटे के शब्दों में यूँ हो सकता है:—"मैं तुम्हें बताता हूँ कि मनुष्य का परम व्यवसाय क्या है, मुझसे पूर्व कोई जगत नहीं था, यह मेरी सृष्टि है। वह मैं ही था जिसने सूर्य को समुद्र से निकाल कर उठाया, चन्द्र ने अपनी परिवर्तनशील गति मेरे साथ शुरू की"। एक बार इसका अनुभव करो और तुम इसी क्षण स्वतंत्र हो। एक बार इसका अनुभव करो और तुम सदा सफल हो। एक बार इसका अनुभव करो और महा मैले कारागार ठौर ही नन्दन कानन में बदल जाते हैं। ॐ! ॐ!! ॐ!!!