श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सफलता का रहस्य।

भाग 5 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 5 · अध्याय 4 / 5

सफलता का रहस्य।

(ता॰ 26-1-1903 को सैन फ्रांसिस्को नगर के गोल्डेन गेट हाल में दिया हुआ स्वामी राम का व्याख्यान।) (टोकियो के छोटे से व्याख्यान की अपेक्षा इसमें बहुत अधिक विस्तार किया गया है—सम्पा॰) तीन लड़कों को उनके गुरू ने आपस में सम-भाग में बांट लेने के लिये एक मुद्रा दी। उन्होंने रुपये से कोई चीज़ खरीदने का निश्चय किया। उनमें से एक लड़का अंग्रेज़, एक हिन्दू और तीसरा ईरानी था। उनमें से कोई भी दूसरे की भाषा भली भांति नहीं समझता था। इस लिये उन्हें यह निश्चय करने में कुछ कठिनता पड़ी कि कौन सी वस्तु मोल लीजाय। अंग्रेज़ बालक ने "वाटर मेलन" (तरबूज़) खरीदने की जिद की। हिन्दू लड़के ने कहा, "नहीं, नहीं मैं हिन्द- वाना पसन्द करूंगा"। तीसरे लड़के, ईरानी ने कहा, "नहीं नहीं हमें तरबूज़ लेना चाहिये"। इस तरह वे निश्चय न कर सके कि कौन सी वस्तु खरीदी जाय। जिसको जो वस्तु पसन्द थी उसने वही मोल ली जाने पर जोर दिया, दूसरों की प्रवृत्ति की हरेक ने उपेक्षा की। उनमें अच्छा खासा झगड़ा उठ खड़ा हुआ। वे सड़क पर चलते-चलते झगड़ते जाते थे। वे एक ऐसे मनुष्य के पास से होकर निकले जो इन तीनों भाषाओं अंग्रेज़ी, फारसी और हिन्दुस्थानी को समझता था। इस मनुष्य को लड़कों के झगड़े में बड़ा मज़ा आया। उसने उनसे कहा कि तुम्हारा झगड़ा मैं निपटा सकता हूँ। तीनों ने उसे अपना अभियोग सुनाया और उसका फैसला मानने को राजी हुए। इस मनुष्य ने उनसे मुद्रा लेली और कोने में

ठहरने को कहा। वह स्वयं एक खटिक की दुकान पर गया और एक बड़ा सा तरबूज़ मोल लिया। उसने इसे लड़कों से छिपाये रक्खा और एक-एक करके तीनों को बुलाया। पहले उसने अंग्रेज़ बालक को बुलाया और उससे छिपा कर तरबूज़ को तीन सम भागों में काट एक टुकड़ा अंग्रेज़ी बालक को देकर बोला "यही वस्तु तुम चाहते थे?" लड़का बहुत खुश हुआ। प्रसन्नता और कृतज्ञता से स्वीकार कर कूदता, नाचता और यह कहता हुआ वह चल दिया कि यही वस्तु मैं चाहता था। इसके बाद उस पुरुष ने ईरानी लड़के से अपने पास आने को कहा और दूसरा टुकड़ा देकर पूछा, यही चीज़ तुम मांगते थे। ईरानी लड़का खुशी से फूल कर कुप्पा हो गया और बोला, "यही मेरा तरबूज़ है, यही मैं चाहता था"। तिस पीछे हिन्दू लड़का पुकारा गया और तीसरा टुकड़ा उसे दिया गया। उससे पूछा गया 'इसी वस्तु की तो तुम्हें अभि- लाषा थी' बालक बड़ा संतुष्ट हुआ। उसने कहा, "यही मैं चाहता था, यही मेरा हिन्दवाना है।" झगड़ा या बखेड़ा क्यों हुआ? छोकरों में मनमोटाव किस बात ने पैदा किया? केवल नामों ने। एक मात्र नामों ने, और कुछ नहीं। नामों को हटा दो, नामों के परदे के पीछे झांको, अरे! अब तो दिखाई पड़ता है कि तीनों विरोधी नाम, "वाटरमेलन", हिन्दवाना और तरबूज़, एक और उसी चीज़ के सूचक हैं। तीनों नामों के नीचे एक ही वस्तु है। यह हो सकता है कि फारस का तरबूज़ इंग्लैंड के तरबूज़ से कुछ भिन्न होता हो और यह भी हो सकता है कि भारत के तरबूज़ इंग्लैंड के तरबूज़ों से कुछ भिन्नता रखते हों, परन्तु वास्तव में फल एक ही है। वह एक ही

वही वस्तु है। छोटे भेदों की उपेक्षा की जा सकती है। इसी प्रकार विभिन्न धर्मों के विवादों, झगड़ों, मनोमा- लिन्यों और वाद-विवादों पर राम को हँसी आती है। इसलिये ईसाई यहूदियों से लड़ रहे हैं, यहूदी मुसलमानों से झगड़ते हैं, मुसलमानों का ब्राह्मणों से विवाद चल रहा है, ब्राह्मण बौद्धों में त्रुटियां निकाल रहे हैं और बौद्ध उसी तरह बदला चुका रहे हैं। ऐसे झगड़े बड़े मनोरंजन की चीज़ हैं। इन झगड़ों और मनोमालिन्यों का कारण मुख्यतः नाम हैं। नामों का घूंघट उतार डालो, नामों का परदा समेट दो, उनके (नामों के) पीछे देखो, वे जो कुछ सूचित करते हैं उसकी ओर देखो और तब तुम्हें अधिक भेद न मालूम होगा। राम प्रायः "वेदान्त" शब्द का, जो एक नाम है, व्यवहार करता है। इसी नाम का द्वेष कुछ लोगों को राम से कुछ भी सुनने के विरुद्ध कर देता है। एक मनुष्य आता है और वह बुद्ध के नाम से उपदेश देता है। बहुतेरे लोग उसे नहीं सुनना चाहते, क्यों कि वह एक ऐसा नाम उनके पास लाता है जो उनके कानों को नहीं रुचता। कृपया कुछ अधिक समझदार बनो। यह बीसवीं सदी है, नामों से ऊपर उठने का समय आये बहुत काल हुआ। राम जो कुछ तुम्हारे लिये लाता है, अथवा दूसरा कोई व्यक्ति जो कुछ तुम्हारे लिये लाता है उसके दोष गुणों को परखो। नामों के भ्रम-जाल में न उलझो, नामों के धोखे में न पड़ो। हरेक चीज़ की जांच करो, देखो वह काम की है या नहीं। कोई धर्म सब से प्राचीन है, इसी लिये उसे न ग्रहण करलो। सब प्राचीनता उसके सत्य होने का कोई प्रमाण नहीं। कभी-कभी सब से पुराने घर गिरा देने के और सब से पुराने कपड़े बदलने के योग्य होते

हैं। नया से नया नव-मार्ग, यदि वह तर्क की परीक्षा में ठहर सकता है, चमकते हुए ओसकण से सुशोभित गुलाब के ताज़े फूल के समान उत्तम है। नवीनतम होने ही के कारण किसी धर्म को न ग्रहण करलो। नवीन चीज़ें सदा सर्वोत्तम नहीं हुआ करतीं, क्यों कि समय की कसौटी पर वे नहीं कसी गई हैं। किसी धर्म को मानवजाति का अति-अधिक अंश मानता है, इसी लिये उसे ग्रहण न करो, क्यों कि मानव जाति का बहुत बड़ा भाग व्यवहारतः शैतानी धर्म पर, अविद्या के धर्म पर विश्वास रखता है। एक समय था जब मनुष्य जाति का बहुत बड़ा भाग गुलामी को ठीक समझता था। परन्तु गुलामी की रीति उत्तम होने का यह कोई प्रमाण नहीं है। किसी धर्म पर चुने हुए कुछ लोगों का विश्वास है, इसी लिये उस पर विश्वास न करो। कभी-कभी किसी धर्म को ग्रहण करने वाले थोड़े से लोग अन्धकार में, भ्रान्ति में होते हैं। कोई धर्म इसी लिये मान्य नहीं है कि उसकी प्राप्ति एक महान साधु से, पूर्णत्यागी से हो रही है, क्यों कि हम देखते हैं कि बहुतेरे साधु, बहुतेरे सर्व त्यागी पुरुष कुछ भी नहीं जानते, सचमुच पूरे धर्मान्ध हैं। किसी धर्म के प्रवर्तक राजकुमार या राजा हैं, इसी लिये उसे ग्रहण न करो, क्यों कि राजा महाराज प्रायः अध्यात्म-दरिद्र होते हैं। कोई धर्म इसी लिये ग्राह्य न समझो कि उसका संस्थापक बड़ा सच्चरित्र था, क्यों कि सत्य की व्याख्या करने में बड़े से बड़े चरित्रवानों का प्रायः असफलता हुई है। सम्भव है कि किसी मनुष्य की पाचन-शक्ति बड़ी ही प्रचल हो और पाचन क्रिया के सम्बन्ध में वह कुछ भी न जानता हो। यह एक चित्रकार है। वह तुम्हें एक अत्यन्त सुन्दर, मनोहर, चित्र कला का अति उज्ज्वल रत्न देता है। फिर भी चित्रकार का

संसार का परम कुरूप मनुष्य होना सर्वथा सम्भव है। ऐसे भी लोग हैं जो घोर कुरूप होते हुए भी सुन्दर सत्यों का प्रचार करते हैं। सुकरात इसी तरह का एक मनुष्य था। सर फ्रांसिस बेकन हो गया है। न तो वह बड़ा नैतिक ही था, न चरित्र ही में बहुत बढ़ाचढ़ा था, फिर भी उसने संसार को "नोवम आर्गेनम" नामक ग्रन्थ दिया और पहले पहल व्याप्तिवाद (आगमनात्मक तर्क शास्त्र) की शिक्षा दी। उसका तत्वज्ञान उत्कृष्ट था। किसी धर्म में इस लिये न विश्वास करो कि वह बड़े विख्यात व्यक्ति का चलाया हुआ है। सर आइज़क न्यूटन बड़ा प्रसिद्ध पुरुष है। फिर भी प्रकाश के सम्बन्ध में उसकी निर्गममीमांसा भ्रान्त है, गुरुत्ववृद्धि का उसका तरीका लीवनिट्स के चलन पद्धति को नहीं पाता। किसी वस्तु को स्वीकार और किसी धर्म पर विश्वास उसके गुणों को समझ कर करो। स्वयं उसकी परीक्षा करो। उसकी जांच पड़ताल करो। बुद्ध, ईसा मोहम्मद, या कृष्ण को अपनी स्वाधीनता न सौंप दो। यदि बुद्ध ने वह शिक्षा दी थीं, या ईसा ने यह शिक्षा दी थीं, अथवा मोहम्मद ने कोई और ही शिक्षा दी थीं तो वे उनके लिये बहुत अच्छी थीं, उनके समय दूसरे थे। उन्हों ने अपनी सम- स्याओं को हल किया था, उन्हों ने अपनी बुद्धियों से निर्णय किया था, उन्हों ने बड़ा काम किया। किन्तु तुम आज जी रहे हो, तुम्हें अपने लिये आप मामलों की जांच और आलो- चना और निर्णय करना पड़ेगा। स्वतंत्र हो, अपने ही प्रकाश से हरेक वस्तु देखने को स्वतंत्र हो। यदि तुम्हारे पूर्वज किसी विशेष धर्म पर विश्वास करते थे, तो शायद उनके लिये उसी पर विश्वास करना बहुत उचित था, परन्तु तुम्हारी मुक्ति अब तुम्हारा अपना काम है, तुम्हारा उद्धार तुम्हारे

पूर्वजों का व्यवसाय नहीं। वे एक विशेष धर्म पर विश्वास करते थे, जिसने उनको बचाया हो या न बचाया हो परन्तु तुम्हें अपना मोक्ष सम्पादन करना है। जो कुछ तुम्हारे सामने आवे उसकी उसी रूप में जांच करो, स्वयं उसकी परीक्षा करो, बिना अपनी स्वतंत्रता खोये हुए। तुम्हारे पूर्वजों को एक ही खास धर्म बताया गया होगा, पर तुम्हारे सामने सब प्रकार के सत्य, सब प्रकार के धर्म, सब प्रकार के तत्वज्ञान, सब प्रकार के विज्ञान प्रतिपादित किये जा रहे हैं। यदि तुम्हारे पूर्वजों का धर्म तुम्हारा इस लिये है कि वह तुम्हारे सामने रक्खा गया है तो बुद्ध का धर्म भी तुम्हारे सामने रक्खा जाने के कारण तुम्हारा है, उसी तरह वेदान्त भी तुम्हारे सामने उपस्थित किया जाने के कारण तुम्हारा है। सत्य किसी व्यक्ति-विशेष की सम्पत्ति नहीं है। सत्य ईसा की जायदाद नहीं है; उसका प्रचार हमें इसके नाम में नहीं करना चाहिये। सत्य बुद्ध की सम्पत्ति नहीं है; उसका प्रचार हमें बुद्ध के नाम में नहीं करना चाहिये। वह मोहम्मद का भी सम्पत्ति नहीं है। वह कृष्ण अथवा किसी और पुरुष की जायदाद नहीं है। वह हरेक की सम्पत्ति है। यदि पहले किसी ने सूर्य की किरणों का सेवन किया अथवा स्नान किया है तो आज आप सूर्य-ताप में नहा सकते हैं। यदि एक मनुष्य चश्मे का ताजा पानी पीता है तो तुम भी वही ताजा पानी पी सकते हो। सब धर्मों के प्रति आपका यह भाव (आदर) होना चाहिए। किसी का भी दिल अपने पड़ोसियों के लौकिक ऐश्वर्यों को हड़पने में हिचकेगा। परन्तु क्या यह विचित्र बात नहीं है कि जब हमारे पड़ोसी बड़ी प्रसन्नता से अपने धार्मिक अथवा आध्यात्मिक कोष,

जो निर्विवाद रूप से लौकिक निधियों से बढ़ कर हैं, हमें देते हैं तो हर्षपूर्वक उन्हें ग्रहण करने के बदले हम उनके विरुद्ध डंडा लेकर खड़े होते हैं? तुम्हें वेदान्ती का दुर्नाम देने के इरादे से राम तुम्हारे पास वेदान्त नहीं लाया है। नहीं। इन सबको तुम ले लो, इसे पचा लो, इसे अपना लो, फिर चाहे इसे इस्लामियत ही कहो। नाम हमारे लिये कुछ भी नहीं है। राम तुम्हारे पास एक पैसा धर्म लाया है, जो केवल इंजील और अधिकांश पुराने धर्मग्रन्थों ही में नहीं मिलता, बल्कि दर्शन शास्त्र और पदार्थ-विज्ञान के नये से नये ग्रन्थों में भी मिलता है। राम तुम्हें एक ऐसे धर्म का उपदेश देने आया है, जो पथों में मिलता है, जो पत्तियों पर लिखा हुआ है, जो नालों द्वारा गुनगुनाया जाता है, जो पवन में डोल रहा है, जो तुम्हारी अपनी ही नसों और शिराओं में फड़क रहा है। यह वह धर्म है जिसका सम्पर्क तुम्हारे व्यवसाय और अन्तःकरण से है। यह वह धर्म है जिसके अभ्यास के लिये तुम्हें किसी खास गिरजाघर में जाने की जरूरत नहीं। यह वह धर्म है जिसका तुम्हें अपने नित्य के जीवन में, अपने भोजनागार में, अपने अग्नि-कुंड के आसपास अभ्यास और व्यवहार करना है। सब कहीं तुम्हें इस धर्म का आचरण करना है। वेदान्त हम इसे न कहें, किसी दूसरे ही नाम से हम इसे पुकार सकते हैं। वेदान्त शब्द का अर्थ केवल मूल सत्य है। सत्य तुम्हारा अपना है, राम का अधिकार उसपर तुम से अधिक नहीं है, हिन्दू का स्वामित्व उस पर तुम से अधिक नहीं है। वह किसी की मिल्कियत नहीं; हरेक चीज़ और प्रत्येक प्राणी उसका है। अब हम यह विचार करेंगे कि इस जीवन में वेदान्त हमारा

मार्ग सरल और हमारे काम अधिक रुचिकर क्यों कर बनाता है। आज हम व्यावहारिक वेदान्त, दूसरे शब्दों में सफलता की कुंजी पर कहेंगे। वेदान्त का आचरण करना ही सफलता की कुंजी है। हरेक विज्ञान की उसके अनुरूप एक कला भी होती है। और आज हम वेदान्त के उसी स्व- रूप को लेंगे जो विज्ञान की अपेक्षा कला अधिक है, अर्थात् अमली वेदान्त। कुछ लोग कहते हैं कि वेदान्त निराशावाद की शिक्षा देता है, वेदान्त नाउम्मेदी, आलस्य, सुस्ती सिखाता है। राम की इन लोगों से प्रार्थना है कि वे अपना न्यायशास्त्र अपने ही पास रक्खें और दूसरों के हाथ अपनी बुद्धि न बेचें। वे अपनी बुद्धि अपने ही पास रक्खें और देखें कि वेदान्त की शिक्षा जीवन, शक्ति, उद्योग, सफलता का कारण होती है। या किसी और चीज़ की। यह न पूछो कि पूर्व-भारत का निवासी इसका व्यवहार करता है था नहीं। राम साफ-साफ कहता है कि यह केवल भारतीयों की सम्पत्ति नहीं है, यह हरेक की सम्पत्ति है। यह आपका निजी जन्मस्वत्व है। अमेरिकावासी अपने व्यापारिक जीवन में इसका अधिक आचरण करते हैं और इसी से उन्हें उस विभाग में सफलता होती है। भारतीय उसी मात्रा में इसका व्यवहार नहीं करते और भौतिक दृष्टि से वे इसी लिये पिछड़े हुए हैं। राम विशिष्ट वेदान्त आप के पास नहीं लाया है, वह लाया है, प्रकृति के मूल स्रोतों से निकला हुआ असली वेदान्त। अपनी बुद्धि और तर्क का (आज के) विषय पर प्रयोग करो और आप देखेंगे कि वेदान्त कैसा अपूर्व है और हरेक विभाग में वह हमें क्यों कर सफलता दिलाता है, क्यों

कर हरेक को अपनी इच्छा के विरुद्ध वेदान्त की रेखा पर चलना और उसके आदेशों का पालन करना पड़ेगा। सफलता का रहस्य बहुरूप है। रहस्य के दृश्य हैं। हम एक-एक करके इन सिद्धान्तों को लेंगे और हिन्दू धर्म-ग्रन्थों की व्याख्या के अनुसार वेदान्त से उनके सम्बन्ध का पता लगावेंगे। सफलता का पहला सिद्धान्त:—कार्य। यह खुला हुआ भेद है कि सफलता की कुंजी कार्य, आक्रमण, साग्रह-प्रयोग है। "चोट लगाओ, चोट लगाओ"! सफलता का पहला सिद्धान्त है। काम बिना तुम कदापि सफल नहीं हो सकते। "जीवन-संग्राम" में सुस्त आदमी का नष्ट होजाना अटल है, वह नहीं जी सकता, उसे मरना ही होगा। यहां पर एक सवाल उठता है जो अति बहुधा वेदान्त के विरुद्ध उठाया जाता है। स्वयं या आत्मा की वेदान्त प्रतिपादित विशुद्ध, निर्विकार, भावमय प्रकृति से अविरत श्रम की संगति कैसे आप युक्त ठहरा सकते हैं? वैराग्य या त्याग का उपदेश देकर और परमात्मा की शान्ति और विश्राम की प्राप्ति को अपने उपदेश का अंग बना कर क्या वेदान्त सुस्त और अकर्मण्य नहीं बनाता है? कार्य या त्याग की प्रकृति का भयंकर अज्ञान ही इस आपत्ति का कारण है। काम क्या चीज़ है? वेदान्त के अनुसार अतीव कार्य ही विश्राम है। "काम विश्राम है" यह एक विस्मयकर कथन है, परस्पर विरोधी बयान है। सच्चा कार्य मात्र विश्राम है। यही वेदान्त सिखाता है। सब से बड़े कामकाजी पर उस समय ध्यान दो, जब वह अपने काम की चोटी पर हो, जब

वह खुद काम कर रहा हो, दूसरों की दृष्टि से वह चाहे जैसे प्रयत्न में लगा हुआ है, परन्तु उसी के दृष्टि बिन्दु से उसे जांचिये, वह कर्ता ही नहीं है; जैसे दूर से देखने वालों का दृष्टि में इन्द्रधनुष में अनेक सुन्दर रंग होते हैं परन्तु मौके की जांच से मालूम हो जाता है कि उसमें किसी तरह का कोई भी रंग नहीं है। समर में जिस समय नायक, नेपोलियन या वाशिंगटन कोई भी कहलो, लड़ रहा हो, लड़ रहा हो, अपने जौहर दिखला रहा हो, तब उस पर ध्यान दीजिये। शरीर मानो आप से आप यन्त्रवत् काम कर रहा है; मन इस दर्जे तक काम में लिप्त है कि "मैं काम कर रहा हूँ" का भाव बिलकुल चला गया है, क्षुद्रोपभोगी क्षुद्र अहं बिलकुल लुप्त है, वाह वाही का भूखा तुच्छ स्वयं गैरहाजिर है। यह निरन्तर कार्य अनजाने ही आप को योग की सर्वोपरि दशा में पहुँचाता है। वेदान्त चाहता है कि सतीव कार्य के द्वारा आप क्षुद्र स्वयं, तुच्छ अहं के ऊपर उठें। शरीर और चित्त को निरन्तर इस दर्जे तक काम में लगा रखना चाहिये कि परिश्रम का बोध ही न हो। कवि तभी अभिनिवेश में होता है जब वह क्षुद्र स्वयं या अहं के विचार से ऊपर उठता है, जब "मैं कविता कर रहा हूँ" का उसे ध्यान नहीं रहता। किसी भी ऐसे व्यक्ति से पूछो, जिसे गणित के कठिन प्रश्नों को हल करने का अनुभव प्राप्त हुआ है, वह तुम्हें बतावेगा कि तभी कठिनाइयां दूर और समस्याएं हल होती हैं जब "मैं यह कर रहा हूँ" का विचार बिलकुल दूर हो जाता है। और क्षुद्र अहं या तुच्छ स्वयं से जितनाही अधिक ऊँचा कोई मनुष्य उठ सकता है उतनाही अधिक गौरवान्वित कार्य

उसके द्वारा होता है। इस प्रकार, वेदान्त उत्सुक कार्य के योग से क्षुद्र अहं से ऊपर उठने और वास्तविक अवर्णनीय सिद्धान्त में, जो वेदान्त के अनुसार असली स्वयं अथवा आत्मा या ईश्वर है, सर्वथा लीन होजाने की शिक्षा देता है। जब कोई विचारशील, तत्वज्ञानी, कवि, वैज्ञानिक या कर्मी समाधि या योग की अवस्था से अपनी एकता स्थापित करता है और तल्लीनता या वैराग्य की इतनी ऊँची अवस्था में प्राप्त होजाता है कि व्यक्तित्व का कोई लेश ही उस में नहीं रह जाता तथा वेदान्त की कार्यतः प्राप्ति हो जाती है तब और तभी केवल परमेश्वर नाद्-गुरू उस (तत्वज्ञानी या कवि इत्यादि) के शरीर और चित्त के वाजे या यंत्र को अपने हाथ में लेता है और उससे महान अलाप, मधुर ध्वनियां और अनुपम सच्चे स्वर निकालता है। लोग कहते हैं, "अरे! वह आवेश में है!" परन्तु उस में कोई वह या मुझे नहीं है, उसके स्थिति-बिन्दु से उस में कर्म करने या भोग करने के लेश का भी पता नहीं है। अमली जीवन में यही वेदान्त की प्राप्ति या अनुभूति है। इस प्रकार वेदान्त के बेजाने व्यवहार से सफलता मात्र बहती है। वेदान्तिक योग की प्राप्ति के लिये आप के जंगलों में जाने और असाधारण कार्यों का अभ्यास करने की कोई जरूरत नहीं है। जब तुम कर्म में डूबे हुए हो, जब काम में लीन हो तब तुम योग के जनक हो, स्वयं शिव हो। वेदान्त के अनुसार शरीर तुम्हारा आत्मा नहीं है, और क्या आप यह नहीं देखते कि केवल तभी आप उच्च गौरव प्राप्त करते और अत्युत्तम काम दिखाते हैं जब अमली रूप से इस सत्य का

आचरण करते हैं तथा अतीव प्रयत्न के प्रभाव से शरीर और मन का आपके लिये अभाव हो जाता है। दीपक या प्रकाश से समझाया जायगा कि काम क्या वस्तु है। एक गिलास या तेल का दीपक ले लीजिये। वाह्, रोशनी कैसी उज्वल, चमकदार, प्रभापूर्ण, उत्तम और भड़कीली है! दीपक को गौरव और प्रभा काहे से मिलती है? निरन्तर कार्य के द्वारा अहं का अन्त करने से। दीपक अपनी बत्ती और तेल को बचाने की चेष्टा करते ही अन्धकारमय असफलता का पुंज, सफलता से सर्वथा शून्य होजायगा। सफलता पाने के लिये दीपक को जलना चाहिये, अपनी बत्ती और तेल को वह नहीं बचा सकता। वेदान्त की यही शिक्षा है। यदि आप सफलता चाहते हैं, यदि आप समृद्धि चाहते हैं तो अपने कामों के द्वारा, अपनी ही दैनिक जीवन चर्या से अपने ही शरीर और शिराओं की आहुति दीजिये, उपयोग की अग्नि में उनको जलाइये। आप को उन्हें काम में लाना चाहिये। आप को अपने शरीर और चित्त का दाह करना होगा, उन्हें जलती हुई दशा में रखना पड़ेगा। अपने शरीर और चित्त को सूली पर चढ़ाओ, काम करो, और तब तुम से प्रकाश फैलेगा। सभी काम अपनी बत्ती तथा तेल को जलाने के सिवाय और कुछ नहीं है। दूसरे शब्दों में, सभी काम अपने शरीर और चित्त को माया या मिथ्या बनाने अथवा आप की अपनी ही चेतना या बोध के स्थिति-बिन्दु से कार्यतः उन्हें शून्य या व्यर्थ कर देने के सिवाय और कुछ नहीं है। उन (शरीर आदि) से ऊपर उठना ही काम है। सभी सत्य काम तभी पूर्ण होता है जब हम शरीर

आदि से ऊपर उठते हैं। भारत के सम्राट अकबर के दरबार में एक बार दो वीर हिन्दू भाई पहुँचे। उन्होंने बादशाह से नौकरी पाने की प्रार्थना की। सम्राट ने उनसे उनकी योग्यता पूछी। उन्हों ने कहा हम शूर-वीर हैं। बादशाह ने उनसे शूरता का प्रमाण देने को कहा। अकबर के दरबार में वे आमने सामने खड़े हुए। उनके तांबी नोकवाले, लपलपाते हुए खांड़े चमक गये। दोनों ने अपने अपने खंजरों की तीव्र नोक अपने भाई के छाते में अड़ाई। मुस्कुराते हुए, प्रसन्न-चित्त वे एक दूसरे की ओर बढ़े। उनके हाथ दृढ़ थे, खंजर शरीरों में घुसते जाते थे, किन्तु शान्तिपूर्वक और बिना सहमे एक दूसरे के पास पहुँच गया। न हिचक थी, न डर था। उनके शरीर रक्त बहाते हुए जमीन पर गिरे और मिले, और उनकी आत्माएं वैकुण्ठ में मिलीं। उनकी वीरता का बड़ा ही विलक्षण प्रमाण बादशाह को मिल गया। यह इस बात का उदाहरण है कि सच्चा कार्य तभी पूरा होता है जब स्वयं का निरूपक कार्यकर्ता अपना बलिदान कर देता है। डंक मारते समय भिड़ों को अपने प्राणों की प्रतिष्ठा डंक में ही कर लेनी पड़ती है। प्लेटो कहता है, "जो मनुष्य अपना आप ही स्वामी (जितेन्द्रिय या आत्म-जयी) है उसका काव्य के द्वार पर खटखटाना व्यर्थ है।" इस प्रकार समस्त वैभव और सफलता की प्राप्ति जीवन-चर्या में वेदान्त को चरितार्थ करने से होती है। सांसारिक मनुष्य के लिये निरन्तर कार्य, निरन्तर परिश्रम ही सब से बड़ा योग है। जब आप अपने लिये कुछ भी काम नहीं करते तो संसार के लिये बहुत बहुत बड़े कामकाजी होते हैं। पुनः, किस दशा और रंगत में सफल काम हमारे लिये

स्वाभाविक होजाता है? "काम करो, काम करो" यह कहना तो बड़ा सहल है परन्तु काम करना बड़ा कठिन है। हरेक सब से बड़ा चित्रकार बनना चाहता है, हरेक सब से बड़ा गवैया बनना चाहता है, पर हरेक जो कुछ चाहता है वही नहीं बन जाता। अकर्मण्यता की प्रवृत्ति आप में क्यों कर होती है! परिश्रम में आप को मजा क्यों मिलता है? क्या आप को यह अनुभव नहीं हुआ है कि प्रायः काम करने की इच्छा होने पर भी आप काम नहीं कर सके? क्या आप के ध्यान में यह नहीं आया है कि कोई एक उच्चतर सत्ता है जो आप की कार्य-क्षमता का शासन करती है? कितनी वार ऐसा नहीं होता कि मनुष्य सवेरे जाग कर अपने को एक अद्भुत अवर्णनीय अवस्था में, प्रकृति से पूर्ण एकता में पाता है? ऐसी अवस्था में वह अपनी लेखनी उठाता है और उस की लेखनी से अत्युत्तम काव्य या तत्वज्ञान की धारा वह चलती है। एक चित्रकार सुन्दर चित्र खींचने की चेष्टा करता है, परन्तु लाख प्रयत्न करने पर भी उससे नहीं बन पड़ता। किसी दिन प्रातःकाल जागने पर वह अपने को मानो आवेश में पाता है और तब बड़े ही कौशलपूर्ण चित्र खींचता है। है यह बात कि नहीं? इस प्रकार हमें पता चलता है कि कोई एक उच्चतर वस्तु है जो आप की समस्त कार्य-कारिणी शक्तियों को अत्यन्त उपयोगी बनाती है। यदि आप उसे उच्चतर मनोवृत्ति से लाभ उठावें तो आप सदा अपने को अपनी उत्कृष्ट दशा में रख सकते हैं और आपके हाथ से निकला हुआ काम सर्वांगपूर्ण और सुन्दर होगा। उस उच्चतर मनोवृत्ति या उस उच्चतर रहस्य को वेदान्त आपके सामने रखता

है। अखिल विश्व से पूर्ण ऐक्य स्थापित करने, परमेश्वर के स्वर में स्वर मिलाने, कार्यतः भागवत जीवन व्यतीत करने, और क्षुद्र अहं या स्वार्थपूर्ण आकांक्षाओं के ऊपर उठने के सिवाय यह (उच्चतर मनोवृत्ति या उच्चतर रहस्य) और कुछ नहीं है। इस तरह आप अपने अन्तर्गत सम्पूर्ण शक्ति या प्रकाश के रहस्य से लाभ उठा कर कार्य को विचित्र बना सकते हैं। कोई कलाकुशल चित्रकार सड़क पर जाता है और वहां अनेक चेहरे देखता है। एक व्यक्ति के नेत्र उसको लुभा लेते हैं, उसके चित्त भण्डार में अज्ञात भाव से उनका संचय हो जाता है। वह दूसरे मनुष्य को मिलता है और उसकी चिबुक [ठोढ़ी] उसे मनोहर जंचती है। वह इस ठोढ़ी को अपने चित्त में जमा कर लेता है। नेत्र एक मनुष्य के लिये गये और ठोढ़ी दूसरे व्यक्ति की हरी गई। तीसरा आदमी उसकी दूकान पर तसवीर खरीदने आता है। चित्र उसके हाथ बेच दिया गया, ग्राहक चित्र लेकर चला गया किन्तु यह नहीं जानता कि वह अपने केश शिल्पी के चित्त में पीछे छोड़ आया है। इसके बाद एक और आदमी आता है जो चित्रकार से कुछ काम कराना चाहता है। चित्रकार उसका वह काम करता है और उसके माथे के कान झपट लेता है। और इस तरह सूक्ष्म रूप से चित्रकार का चित्त काम में लगा हुआ है। विभिन्न पुरुषों के नेत्र, ठोढ़ी, नाक आदि अपने काम में लाते समय चित्रकार को यह विचार नहीं रहता कि वह इन अंगों को ले रहा है किन्तु सूक्ष्म रूप से बेजाने यह काम होता रहता है। कुछ दिनों बाद चित्रकार अपनी कलाशाला में (चित्र खींचने के लिये) पट लेकर

बैठता है। वह एक अद्भुत चित्र खींचने की चेष्टा करता है। परिणाम में एक मनुष्य के मृगलोचन, दूसरे की सुन्दर नासिका, तीसरे के मनोहर केशों का एकही चित्र में सम्मिलन हो जाता है और चित्रशिल्पी एक अत्यन्त रमणीय वस्तु तैयार कर देता है, ऐसा चित्र प्रस्तुत कर देता है जो अपने सब मूल उदाहरणों से बढ़कर है। चित्र-कला का यह सुन्दर काम कैसे हुआ था? क्या यह कार्य व्यक्ति विशेष का किया हुआ था? नहीं, यह कार्य भावात्मक था। "मैं कर रहा हूँ" की चित्तवृत्ति से परे, स्वार्थपरता के दूषण और अहं-भाव से मुक्त दशा में निरन्तर रहने से यह सब कार्य सम्पन्न हुआ था। विद्वेष या तृष्णा से जिसे प्रायः भ्रान्तिवश प्रेम कहा जाता है, शिल्पकार के कलुषित होते ही उसके चित्त का पहरेदार खिंच जाता है, काम करने के क्रम या परम्परा में फिर वह नहीं रह जाता, वह अव्यवस्थित हो जाता है, वह अस्तव्यस्त होजाता है। उसकी मनोवृत्ति की भावात्मकता जाती रही, वह स्वार्थपरता से आकृष्ट हुआ है, प्रशान्त अवस्था लुप्त हो गई। सर्वे से हमारा संसर्ग बनाये रखने वाली वेदान्तिक भावना का स्थान सीमाबद्ध-कापी प्रेम या घृणा ने ले लिया है और चित्रकार का मन अब इस या उस मनुष्य की आकृति का चार ले लेने का सूक्ष्म या भावात्मक कार्य नहीं कर सकता। अमली वेदान्त चला गया और साथ ही उसके कौशल के अनुपम कार्य करने की परम शक्ति भी चल दी। इस प्रकार आप देखते हैं कि आपका कार्य जितना ही अधिक भावात्मक होता है और "मैं कर रहा हूँ" से जितना ही अधिक आप ऊपर उठते हैं, स्वामित्व अथवा सर्वो-

धिकार स्वरछिन रखने की भावना की जितनाही अधिक आप त्याग करते हैं और संचय करने, छपापाश बनने की वृत्ति को जितनाही पीछे छोड़ देते हैं, अपने अवास्तविक (मिथ्या) प्रगट स्वयं का जितनाही अधिक आप निग्रह करते हैं आपका काम उतनाही अधिक अच्छा होता है। वेदान्त चाहता है कि संग या फलप्राप्ति की इच्छा को त्याग कर आप काम ही के लिये काम करें। कार्य को सफल बनाना हो तो आप परिणाम का विचार त्याग दें, फल या अन्त की चिन्ता न करें। साधन और फल को एक साध कर दो, कार्य ही को परिणाम समझो। वेदान्त चाहता है कि आप का आन्तरिक स्वयं निश्चिन्त रहे। अन्तरात्मा तो शान्त रहे और शरीर लगातार काम करता रहे। गति-विद्या के नियमों का पालन करता हुआ शरीर काम में लगा रहे और अन्तरात्मा सदैव सब अवस्थाओं में (स्थिर) शान्त रहे। हमारी स्वार्थमय बेचैनी ही हमारे सब काम को बिगाड़ देती है। कार्य से संलग्न शान्ति या निर्वाण के लिये काम करो। सफलता का दूसरा सिद्धान्तः—स्वार्थरहित बलिदान। एक सरोवर और एक सरिता में झगड़ा हुआ। तालाव ने नदी से यह कहाः—"ऐ नदी, तू बड़ी मूर्ख है कि अपना सब जल और सम्पूर्ण वैभव समुद्र को दे देती है, समुद्र पर अपना जल और ऐश्वर्य मत लुटा। महोदधि को इसकी जरूरत नहीं, वह अकूतप्र है। तू अपनी सकल संचित निधियां उसमें भले ही भरती जाय परन्तु वह उतनाही नमकीन, उतनाही खारा बना रहेगा जितना आज है, उसका खारी पानी न बदलेगा। 'सूअर के सामने मोती मत फेंक'। अपनी सब निधियां अपने ही पास रख।" यह लौकिक बुद्धिमानी

थी। अन्त पर विचार करने, फल की चिन्ता करने और परिणाम पर ध्यान देने को नदी से कहा गया था। किन्तु नदी वेदान्तिनी थी। सांसारिक बुद्धिमानी की यह बात सुनकर नदी ने उत्तर दिया, "जी नहीं परिणाम और फल मेरे लिये कुछ नहीं है, सफलता और असफलता मेरे लिये तुच्छ है, मैं काम करूंगी क्योंकि मुझे काम प्यारा है, काम के लिये ही मैं काम करूंगी। काम ही मेरा ध्येय है, कर्मशीलता ही मेरा जीवन है। उद्योग ही मेरा प्राण, मेरी वास्तविक आत्मा है। मुझे काम करना ही होगा।" नदी काम करती रही, समुद्र में लाखों वर्षों पर लाखों घड़े जल डालती रही। कंजूस कमखर्च तालाव तीन चार महीने में सूख गया। वह दुर्गन्धियुक्त, निश्चेष्ट, सड़े हुए कूड़े से भरपूर हो गया। किन्तु नदी ताजी और विशुद्ध बनी रही, उसके अमर स्रोत नहीं सूखे। नदी के मूल-स्रोतों की पूर्ति करने के लिये चुपचाप और धीरे धीरे समुद्र-तल से जल लिया गया। मेघमालाएं और अयन (मौसमी) वायु धीरे धीरे तथा चुपचाप समुद्र से जल ले गईं और नदी के मूल को सदा ताजा रखा। ठीक इसी तरह वेदान्त चाहता है कि आप सरोवर की सन्यमासी नीति को न वरें। क्षुद्र, स्वार्थान्ध सरोवर ही परिणाम की चिन्ता करता है, सोचता है कि "मेरा और मेरे काम का क्या परिणाम होगा"। काम के लिये तुम काम करो, तुम्हें काम करना ही चाहिये। काम ही में तुम्हारा लक्ष्य होना चाहिये। और इस तरह वेदान्त तुम्हें व्याकुलता और संताप देनेवाली कामनाओं से मुक्त कर देता है। वेदान्तप्रचारित इच्छाओं से स्वाधीनता का यह अर्थ है।

परिणामों के लिये व्याकुल न हो, लोगों से कोई आशा न रक्खो, अपने काम की खरी या अनुकूल आलोचना के लिये हैरान न हो। जो कुछ तुम कर रहे हो वह अंगीकृत होगा या नहीं, इस की चिन्ता न करो, इसका बिलकुल विचार ही न करो। काम को काम ही के लिये करो। इस प्रकार तुम्हें अपने को कामना से मुक्त करना होगा। तुम्हें काम से मुक्त होना नहीं है, तुम्हें मुक्त होना है उत्सुकता की बेचैनी से इस तरह तुम्हारा काम कितना महान हो जाता है। सब प्रकार की व्याकुल करने वाली वासनाओं और प्रलोभनों का सब से अच्छा और प्रभावशाली उपचार काम है। किन्तु यह तो केवल निषेधात्मक [दोष हटाने वाला] गुण हुआ। सत्य-व्रत कार्य के साथ जो साक्षात सुख जुड़ा हुआ है वह है मुक्ति का एक फल, बेजाने आत्म-अनुभव। वह तुम्हें विशुद्ध, निष्कलंक, और परमेश्वर से अभिन्न रखता है। यही आनन्द-कार्य का सर्वोच्च और अटल इनाम है। हृदय की स्वार्थमय लालसाओं को पूरा करने के अभिप्राय से काम करके इस स्वास्थ्यकर स्वर्गीय निधि को अप्रय न करो। मलिन आकांक्षाएं और तुच्छ उत्सुकताएं हमारी उन्नति को आगे बढ़ाने के बदले पछेल देती हैं। बाहरी और जमीभूत [जमे हुए] प्रलोभन हमारी परिश्रम करने की शक्ति के लिये सहायक होने के बदले हानिकर हैं। जीजान से किये जाने वाले काम के साथ जो तात्कालिक आनन्द लगा हुआ है उससे बढ़कर सुख-दायक और स्वास्थ्यकर कोई पुरस्कार या प्रशंसा नहीं हो सकती। तो फिर काम में जो वैराग्य, धर्म, या उपासना निहित है उसे प्राप्त करने के लिये काम करो, उस से मिलने वाले बच्चों के खिलौनों के लिये नहीं। किसी तरह की जिम्मेदारी न समझो, कोई इनाम न मांगो।

"अभी 'यहां' तुम्हारा लक्ष्य होना चाहिये। लोग कहते हैं, "पहले योग्य बनो तब इच्छा करो"। वेदान्त कहता है, "केवल योग्य बनो, इच्छा करने की कोई जरूरत नहीं"। "जो पत्थर दीवार के काबिल है वह सड़क पर कभी न मिलेगा"। यदि तुम में पात्रता है तो एक अनिवार्य दैवी नियम से सब चीज तुम्हारे पास आ जायगी। यदि कोई दीपक जल रहा है तो वह जलता भर रहे, पतिंगों को बुला भेजने की उसे कोई जरूरत नहीं, पतिंगे अपनी इच्छा से ही दीपक को आ घेरेंगे। जहां कहीं ताजा चश्मा है लोग स्वयं वहां पहुंच जायंगे, चश्मे को लोगों की दमड़ी भर भी परवाह करने की जरूरत नहीं। जब चन्द्रोदय होगा तो लोग आपही चांदनी का आनन्द लूटने के लिये निकल आवेंगे। चढ़ चलो! चढ़ चलो! चोट लगाओ! चोट लगाओ! शरीर की असारता और सच्चे स्वयं की परम वास्तविकता का अनुभव करने के लिये काम करो। इस तरह पर प्रगट कर्मशीलता की चोटी पर तुम्हें निर्वाण और कैवल्य का स्वाद मिलेगा। और इस तरह पर अपने व्यक्तित्व तथा अहंभाव को श्रम की सूली पर जब तुम चढ़ा चुके होगे तब सफलता तुम्हें ढूंढ़ेगी और आकर प्रशंसा करने वाले लोगों की कमी न होगी। ऐसा जब तक जीते थे लोगों ने उन्हें नहीं माना, पूजे जाने के पहले सूली पर चढ़ना उनका जरूरी था धूल में लोटाया हुआ सत्य फिर उठेगा। अपने रंग रूप को बिना बिगाड़े कोई बीज उगने और वृद्धि करने में समर्थ नहीं हो सकता। इस तरह पर सफलता के लिये दूसरी आवश्यकता है बलिदान की, क्षुद्र स्वयं को सूली पर चढ़ाने की, वैराग्य की। "वैराग्य" शब्द का अनर्थ न करना। "वैराग्य" का अर्थ फकीरी नहीं है। हरेक आदमी सफेद, ज्योतिमान, चमकदार, चटकीला

होना चाहता है। आप क्योंकर गौरवशाली हो सकते हैं? कुछ पदार्थ सफेद क्यों हैं? सफेद पदार्थों की ओर देखिये। उनमें इतनी सफेदी कहाँ से आई? विज्ञान आपको बतलाता है कि सफेदी की कुंजी आत्मत्याग है, और कुछ नहीं। सूर्यकिरणों के सातों रंग विविध पदार्थों से टकराते या उनपर गिरते हैं। कुछ पदार्थ तो इनमें से अधिकांश को अपने में लीन कर लेते और रख लेते हैं और केवल एक को फिर बाहर निकालते हैं। ऐसे पदार्थ सिर्फ एक उसी रंग के कहे जाते हैं जिसे वे लौटाते या नहीं ग्रहण करते हैं। तुम उस वस्त्र को गुलाबी रंग का कहते हो परन्तु यही गुलाबी रंग उस वस्त्र का नहीं है। जो रंग उसने अपना लिये हैं और वास्तव में उसमें उन रंगों का तुम उसे (वस्त्र को) नहीं कहते। कैसी विचित्र बात है। काले पदार्थ सूर्य-किरणों के सब रंग पचा जाते हैं। वे कोई रंग बाहर नहीं निकालते, वे कुछ नहीं त्यागते, वे कुछ नहीं लौटाते। इसी से वे काले हैं, अंधकारमय हैं। सफेद पदार्थ कुछ नहीं आत्मसात करते, किसी चीज को नहीं अपना बनाते, वे सर्वस्व त्याग करते हैं। वे स्वार्थपूर्ण अधिकार रखना नहीं चाहते। स्वामित्व की भावना उनमें नहीं है, और इसी से वे श्वेत हैं, उज्ज्वल हैं, चमकीले हैं, प्रभापूर्ण हैं। इसी तरह यदि आप गौरवान्वित और समृद्धिशाली होना चाहते हैं तो आपको अपने अन्तःकरण को स्वार्थपूर्ण और स्वामित्व की भावना से ऊपर उठाना पड़ेगा। तुम्हें उसके ऊपर उठना चाहिये। हमेशा दाता बनो, कार्यकर्ता बनो। अपने दिल को मँगतापन और आशा में कभी न रक्खो। एकाधिकार करने की आदत से छूटो। तुम्हारे

फेफड़ों में जो हवा है उस पर एक मात्र तुम्हारा ही दावा क्यों हो? वह हवा हरेक व्यक्ति की सम्पत्ति है। इसके विपरीत, अपने फेफड़ों की वायु की अल्प मात्रा का उपयोग करना जब आप कोई देते हैं तब आप समस्त वायुमण्डल का अधिकारी अपने को पाते हैं, आपके साधन असीम हो जाते हैं। विश्व की प्राणप्रद वायु को पान करो। अभिमानी मत बनो, दर्प न करो। कभी मत समझो कि कोई वस्तु तुम्हारे क्षुद्र स्वयं की है। वह ईश्वर की, तुम्हारी वास्तविक आत्मा की है। सर आइज़क न्यूटन का उदाहरण ले लो। संसार की दृष्टि में इतना प्रभावान, उज्ज्वल, गौरवशाली वह क्योंकर हुआ? जिस भावना से उसने अपने जीवन में काम किया था वह उसके मरने के समय मालूम हुई थी। संसार का सर्वश्रेष्ठ पुरुष होने के लिये बधाई पाने या प्रशंसित होने पर उसने कहा, "नहीं जी, यह बुद्धि अथवा मेरा यह क्षुद्र व्यक्तित्व ज्ञान के विराट, विशाल समुद्र के तट पर बिखरे बटोरनेवाले छोटे बच्चे के तुल्य है"। वह अब भी बालू पर पड़ा हुआ बिखरा बटोर रहा था। इस प्रकार हमें उस विनीत आत्मा के दर्शन होते हैं जो किसी वस्तु पर भी अपना अधिकार नहीं बताती, जो कोई चीज भी अपनी नहीं बनाती, जो क्षुद्र स्वयं को नहीं बढ़ाती, जो उसी भावना से कार्य करती है जिस भावना से आपको सामर्थ्य और आप की कार्यकारिणी शक्तियाँ परमोत्कर्ष को प्राप्त होती हैं। और वेदान्त की भावना का यही मुख्य लक्षण है। तुम अभिलाषाओं को रखते हो, सब प्रकार की कामनाएँ तुम में हैं, और तुम चाहते हो कि तुम्हारी इच्छाएँ पूरी हों। किन्तु इच्छाओं की पूर्ति की कुंजी जानो। खिड़की के परदे

को जब हम बढ़ाना चाहते हैं तब उसे नीचे की ओर खींच कर छोड़ देते हैं और खिड़की का परदा चढ़ जाता है। तुम्हारी समस्त कामनाओं की पूर्ति के रहस्य का यह दृष्टान्त है। जब तुम इच्छा को छोड़ देते हो तभी वह फलीभूत होती है। तीर कैसे छोड़े जाते हैं? हम धनुष को झुकाते हैं। जब तक हम धनुष की तांत को खींचते रहते हैं तब तक बाण शत्रु तक नहीं पहुँचता। तांत को तुम चाहे जितना तानो, बाण तुम्हारे ही पास रहेगा। जब तुम तांत छोड़ देते हो तभी तुम्हारे शत्रु की छाती छेदने के लिये झनाहट के साथ बाण छूटता है। इसी तरह से जब तक तुम अपनी कामना को ताने रहोगे, अथवा इच्छा, अभिलाषा, कामना करते रहोगे, उत्सुक रहोगे, तब तक वह दूसरे पक्ष के अन्तःकरण तक न पहुँचेगी। जब तुम उसे छोड़ देते हो तभी वह इच्छित वस्तु की आत्मा में प्रवेश करती है। "जब तुम मुझे छोड़ देते और खो देते हो, केवल तभी तुम मुझे अपने पास पाते हो"। जब तुम अपने को उस विचित्र, अवर्णनीय भाव में डालते हो जो हम तुम दोनों से उच्चतर है, केवल तभी तुम मुझे पाते हो। वेदान्त यही आपको बताता है। दो साधु साथ यात्रा कर रहे थे। उनमें से एक ने व्यवहारतः सञ्चय-वृत्ति को कायम रक्खा। दूसरा वैरागी था। नदी-तट पर पहुँचने तक वे ग्रहण और त्याग के विषय पर तर्क-वितर्क करते रहे। कुछ रात जा चुकी थी। त्याग का उपदेश देनेवाले मनुष्य के पास कौड़ी-पैसा न था, दूसरे के पास था। त्यागी पुरुष ने कहा, "शरीर की हमें क्या चिन्ता है, मल्लाह को देने को हमारे पास रुपया नहीं है, ईश्वर का नाम भजते हुए इसी तट पर हम रात काट देंगे"। रुपये

वाले साधु ने उत्तर दिया, "यदि हम नदी के इसी पार रहें तो कोई गांव, खेरा, झोपड़ी या साथी हमें न नसीब होंगे और मक्खियां हमें खा जायँगी, सांप डस लेंगे, सर्दी ठिठुरा देगी। हमें उस पार उतर चलना चाहिये। केवट को उतराई देने के लिये मेरे पास पैसा है। उस पार एक गांव है, वहां हम आराम से रहेंगे"। नावेवाला नाव लाया और दोनों को उस पार उतार दिया। जिस मनुष्य ने उतराई दी थी वह रात को त्यागी मनुष्य से बिगड़ा। "पैसा रखने का फायदा तुम्हें समझ पड़ा या नहीं! मेरे पास पैसा होने से दो जानें बच गईं। आज से तुम कभी त्याग का उपदेश न देना। तुम्हारी तरह मैं भी त्यागी होता तो हम दोनों भूखे मर जाते या ठिठुर जाते और नदी के उस तट पर मर जाते"। त्यागी मनुष्य ने उत्तर दिया, "यदि तुमने रुपया अपने पास रक्खा होता, यदि तुम उससे किनारा न करते, यदि तुमने उसे केवट को न दे दिया होता, तो हम उस किनारे पर मर जाते। इस प्रकार रुपये के त्याग या दान से ही हमारी रक्षा हुई"। "इस के सिवाय," त्यागी पुरुष ने कहा, "जब मैंने अपनी जेब में बिलकुल रुपया नहीं रक्खा था, तभी तुम्हारी जेब मेरी जेब हो गई। मेरे विश्वास की बदौलत उस (तुम्हारी) जेब में रुपया था। मुझे कभी क्लेश नहीं होता। जब कभी मुझे आवश्यकता होती है वह पूरी हो जाती है"। इस कहानी से सूचित होता है कि जब तक तुम अपनी इच्छाओं को अपनी जेब में रखते हो तब तक तुम्हारे लिये चैन या रक्षा नहीं है। अपनी इच्छाओं को त्यागो, उनसे ऊपर उठो, और तुम्हें दोहरी शान्ति तुरन्त चैन और अन्त में इच्छाओं की पूर्ति—प्राप्त होगी। याद रक्खो कि तुम्हारी कामनाएँ तभी पूरी होंगी जब तुम उनसे ऊपर उठकर परम

सार में पहुंचोगे। जान कर या बेजाने जब तुम अपने को परमेश्वर में लीन कर दोगे तभी और केवल तभी तुम्हारी अभिलाषाओं की पूर्ति का उपयुक्त समय होगा। सफलता का तीसरा सिद्धान्तः—प्रेम। साफल्य का तीसरा सिद्धान्त है प्रेम, विश्व से संगति, परिस्थिति के योग्य आचरण। प्रेम का क्या अर्थ है? प्रेम का अर्थ है अमली तौर पर अपने पड़ोसियों और सभी संसर्ग में आने वालों से अपनी एकता और अभिन्नता का अनुभव करना। यदि आप दुकानदार हैं तो जब तक आप अपने ग्राहकों के स्वार्थ और अपने स्वार्थ को एक न समझेंगे तब तक आप कोई उन्नति न करेंगे, आप के काम की हानि पहुंचती रहेगी। यदि हाथ स्वार्थपरतावश शरीर के अन्य अंगों से अपनी भिन्नता प्रतिपादित करने में इस प्रकार तर्क करे "देखो, मैं दहना हाथ, मैं सब तरह का परिश्रम करता हूं, मेरी खून पानी करने वाली दासता की कमाई में सकल शरीर का भाग क्यों होना चाहिये! मेरे श्रम से कमाया हुआ भोजन पेट को और वहां से अन्य सब अवयवों को मिलना चाहिये? नहीं, नहीं। मैं सब कुछ अपने ही लिये रक्खूंगा"। इस स्वार्थपूर्ण कल्पना को चरितार्थ करने के निमित्त हाथ के लिये इसके सिवाय और कोई उपाय नहीं है कि भोजन को लेकर पिचकारी अथवा नश्तर द्वारा अपने चमड़े में प्रविष्ट करे। क्या यह विधि हाथ के लिये उपकारिणी होगी! असम्भव! कदापि नहीं! हां, एक तरह से हाथ खूब मोटा हो सकता है, अकेला अकेला इतना सम्पत्तिवान हो सकता है कि शरीर के अन्य सब अंग उससे स्पर्धा करें। बर्रैया, मधुमक्खी, या सांप को पकड़ कर हाथ अपने को

कटवा सकता है। इस तरह हाथ बड़ा मोटा, स्वयं भारी हो जायगा। हाथ की स्वार्थपरता पूरी होने का केवल यही एक उपाय है, इसी तरह हाथ का स्वार्थमय तत्वज्ञान चरितार्थ किया जा सकता है। किन्तु यह कितना अवांछनीय है। इस तरह की तृप्ति या इस तरह की सफलता हम नहीं चाहते हैं। यह तो रोग है। इसी तरह, याद रक्खो कि सम्पूर्ण जगत एक शरीर है। तुम्हारा शरीर हाथ की तरह एक अवयव है, केवल उँगली या नख के तुल्य है। यदि तुम सफल होना चाहते हो तो तुमको अपने स्वयं को अखिल विश्व के स्वयं से भिन्न और पृथक न समझना चाहिये। हाथ के फलने-फूलने के लिये यह आवश्यक है कि वह समग्र के हितों से अपने हितों की अभिन्नता का अनुभव करे। दूसरे शब्दों में, हाथ को यह समझना और अनुभव करना होगा कि उसका स्वयं कलाई से आगे के छोटे से भाग में निबद्ध नहीं है। प्रत्युत उसे व्यवहारिक रूप से समग्र शरीर के स्वयं से अपने को एक और अभिन्न समझना चाहिये। समग्र के स्वयं को खिलाना हाथ के स्वयं को खिलाना है। जब तक तुम इस तथ्य का अनुभव और इस सत्य का आचरण न करोगे कि तुम और विश्व एक हो, कि मैं और ईश्वर एक हूं, तब तक तुम्हें सफलता नहीं हो सकती। वियोग और विभाग के कीचड़ में जब अवरुद्ध रहते हो तब तुम आरोग्य से रहित और पीड़ित रहते हो। तुम अपने आप को समग्र और सर्व अनुभव करते ही तुम पूर्ण और सर्व हो। इस एक-पन का बोध होने से तुम कार्यतः वेदान्त का आचरण करते हो। इस दैवी और श्रेष्ठ सत्य का उल्लंघन करोगे, इस पवित्र नियम को व्यवहार में भंग करोगे

तो मूर्ख, स्वार्थी हाथ की तरह तुम्हें अपने धर्मलंघन के लिये अवश्य क्लेश भोगना पड़ेगा। "एनशेएट मैरीनर" नामक अपनी पुस्तक में कोलरिज ने बड़ी सुन्दरता से इस सत्य को प्रकट किया है। "प्रिज़नर आफ चिल्लन" में बाइरन ने भी ऐसाही किया है। इन पद्यों में यह सिद्ध है कि जब कभी कोई मनुष्य प्रकृति से बेमेल हो जाता है तब उसे क्लेश होता है। उसी क्षण सम्पूर्ण समृद्धि तुम्हारी है जिस क्षण में अपने समभूतों से तुम अपनी एकता अनुभव करते हो। "वही सर्वोत्तम प्रार्थना करता है जो सब से बढ़कर प्यार करता है, मनुष्य, और पक्षी, और पशु दोनों को। वह खूब प्रार्थना करता है जो खूब प्यार करता है, सब चीजें बड़ी और छोटी दोनों को"। एक महाराज एक दिन शिकार खेलने गया। आखेट की उत्तेजना में राजा अपने साथियों से छूट गया। भयंकर सूर्य-ताप के कारण उसे बड़ी प्यास लगी। वन में उसे एक छोटा बगीचा दिखाई पड़ा। वह बाग में गया। परन्तु शिकारी पोशाक में होने के कारण माली उसे न पहचान सका। बेचारे गँवई के माली ने सम्राट के दर्शन कभी नहीं किये थे। राजा बड़ा प्यासा था, उसने माली से कुछ पेय लाने को कहा। माली तुरन्त बगीचे में गया, कुछ अनार लिये, उसका रस निचोड़ा और एक बड़ा कटोरा भर कर महाराज के पास लाया। वह एक ही वार में सब गटक गया परन्तु उसकी कांटे डालने वाली प्यास बिलकुल नहीं बुझी। महाराज ने उससे और अनार का रस लाने को कहा। माली लेने गया। माली के चले जाने पर राजा अपने मन में सोचने

लगा। "यह बाग खूब फला-फूला जान पड़ता है। बात की बात में आदमी ताजे अनार-रस से भरा हुआ बड़ा कटोरा ले आया। ऐसे समृद्धिशाली पदार्थ के मालिक पर भारी आय-कर लगना चाहिये" इत्यादि। दूसरी ओर माली को देर होती गई, वह घण्टे भर में भी महाराज के पास न लौटा। बादशाह को आश्चर्य होने लगा, "यह क्या बात है कि पहली बार जब मैंने उससे कुछ पीने को मांगा तब तो वह एक मिनट से कम में ही अनार का रस ले आया और इस बार लगभग एक घण्टे से वह अनारों का रस निचोड़ रहा है किन्तु अभी तक कटोरा नहीं भरा। यह क्या मामला है?" एक घण्टे के बाद कटोरा महाराज के पास लाया गया, परन्तु लबालब नहीं भरा था। बादशाह ने पूछा कि कटोरा कुछ खाली क्यों है, जब कि पहली बार इतनी जल्दी कटोरा भर गया था। माली महात्मा था। उसने उत्तर दिया:— "जब मैं अनार-रस का पहला कटोरा आपके लिये लाने गया था तब हमारे भूपति के बड़े साधु विचार थे और जब मैं आपके लिये दूसरा कटोरा लाने गया तब हमारे महाराज का कृपालु, उदार स्वभाव अवश्य बदल गया होगा। अपने अनारों के रसीलेपन में इस आकस्मिक परिवर्तन का कोई दूसरा कारण मैं नहीं बता सकता।" राजा ने अपने मन में सोचा, देखो तो सही बात तो बिलकुल ठीक है। जब राजा ने पहले बगीचे में पैर रक्खा था तब वहां के लोगों के लिये उस की बड़ी ही उदार और प्रेममय वृत्ति थी, वह अपने मन में विचारता था कि ये लोग बड़े दीन हैं और सहायता चाहते हैं, किन्तु जब बूढ़ा मनुष्य बात की बात में अनार-रस से भरा कटोरा उसके लिये ले आया तब राजा का मन बदल गया और विचार और के और होगये। प्रकृति के स्वर से महाराज के

बदल होजाने का प्रभाव त्याग के अनारों पर पड़ा। इधर महाराज द्वारा प्रेम का नियम भंग किया गया, उधर बूढ़े ने उसे रस पहुंचाना अस्वीकार किया। कहानी सच्ची हो या झूठी, इससे हमारा कोई प्रयोजन नहीं। किन्तु यह सत्य अत्याज्य है कि जब तक प्रकृति से हम पूरे मिले रहेंगे, जब तक आप का अखिल विश्व से ऐक्य रहेगा और आप हरेक तथा सब से अपनी एकता समझते तथा अनुभव करते रहेंगे तब तक सभी परिस्थितियां और आस-पास की चीजें, हवा और लहरें तक, आप के पक्ष में रहेंगी। जिस क्षण तुम्हारी सर्व से फूट होगी उसी क्षण आप के मित्र और सम्बन्धी आप के विरोधी हो जायंगे, उसी क्षण सारे संसार को आप अपने विरुद्ध सशस्त्र खड़ा कर लेंगे। प्रेम के इस दैवी नियम को समझो और मानो। प्रेम सफलता का एक सजीव सिद्धान्त है। सफलता का चौथा सिद्धान्तः—प्रसन्नता। सफलता का चौथा सिद्धान्त स्थिरता (श्रुति, आत्मनिष्ठा) अथवा प्रसन्नता है। और स्थिरता या प्रसन्नता कैसे रक्खी जा सकती है? "प्रसन्न हो, शान्त हो, सावधान हो", यह कहना बड़ा सहल है। किन्तु सब अवस्थाओं में प्रसन्न, शान्त, और सावधान रहना बड़ा कठिन है। कृत्रिम नियमों से आप कुछ भी नहीं कर सकते। तो फिर हम अपने को प्रसन्न क्यों कर रख सकते हैं? आपकी वृत्तियों का शासन कौन करता है? वेदान्त बताता है कि जब हम शरीर के, क्षुद्र स्वयं और प्रबल आकांक्षाओं के समतल पर उतरते हैं तभी हम उदासीन, प्रसन्नतारहित, क्षुब्ध, उदास और विवश होजाते हैं। केवल तभी हमारी स्थिरता जाती रहती है।

हमें अपने पेट का खयाल तभी होता है जब वह रोगी होता है। हमें अपनी नाक का ध्यान तभी होता है जब सर्दी लगती है। जब बांह में खुजली होती है केवल तभी हमें उसका बोध होता है। इसी तरह जब हमारी आध्यात्मिक व्यवस्था बिगड़ जाती है केवल तभी हमें व्यक्तिगत अहं, क्षुद्र स्वयं, या शरीर का बोध होता है। शरीर के लिये एकाग्र मनोयोग और व्यक्तिगत तुच्छ अहं के प्रति चिन्ता-उत्पादक ध्यान में शोचनीय आत्मिक बीमारी निहित है। हमारी शारीरिक निर्बलता ज्योंही अपना रंग जमाती है त्योंही हम नन्दन कानन से गिर पड़ते हैं। भेद और अन्तर के वृक्ष के फल को जीभ पर धरतेही हम वैकुण्ठ से नीचे फेंक दिए जाते हैं। किन्तु मांस [शरीर] को सूली पर चढ़ाना स्वीकार करके हम खोये हुये स्वर्ग को फेर सकते हैं। जिस क्षण आप शरीर से ऊपर उठें, क्षुद्र स्वार्थपूर्ण, नीच, तुच्छ, जघन्य अनुबन्धों से ऊपर उठें, उसी समय अपने समतोलन को फेर सकते और प्रसन्न हो सकते हैं। इस प्रकार प्रसन्नता, स्थिरता या श्रुति पाने के लिये आपको वेदान्त की मुख्य शिक्षा को, इस नित्य सत्य को, कि आपकी सच्ची आत्मा या आपका वास्तविक स्वयं एक मात्र यथार्थ वास्तविकता है, अमल में लाना होगा। कठोर तथ्य अर्थात् अपनी सच्ची आत्मा में जब आप पगे होते हैं तब चमत्कारिक सांसारिक अवस्थायें आपके लिये चंचल, चपल, और लचीली हो जाती हैं। मैं शरीर नहीं हूँ। समस्त शारीरिक लगाव, सम्बन्ध, और बन्धन केवल खेल की चीजें हैं। वे केवल नाटकाभिनय के नाते अथवा कार्य हैं। मुझ नट का एक मनुष्य मित्र है और एक मनुष्य शत्रु, दूसरा

मनुष्य मेरा पिता है, कोई और पुत्र है। किन्तु वास्तव में न मैं पिता हूं और न पुत्र, शत्रु और मित्र न शत्रु हैं और न मित्र। मैं पूर्ण ब्रह्म हूं। सांसारिक बन्धनों और सम्बन्धों से मेरा कोई मतलब नहीं। सब सम्बन्ध माया मात्र हैं। हरेक अभिनेता को मेल में अपने कर्म का निर्वाह भलीभांति करना चाहिये, परन्तु जो कोई प्रीति या अप्रीति के अपने नाटकीय कर्म को हृदय में स्थान देता है और उसका अपने वास्तविक स्वयं से सम्बन्ध जोड़ना है वह पागल से किसी तरह कम नहीं। और संसार जब नाट्य-प्रदर्शन मात्र ही है तो कर्तव्य-कर्म के बाह्य रूपों में अनुचित महत्ता मुझे क्यों समझना चाहिये? यदि कोई महाराजा है तो उससे ईर्ष्या क्यों, और यदि कोई भिखुक है तो उससे घृणा किस लिये! "प्रतिष्ठा और अपमान की उत्पत्ति किसी दशा से नहीं होती; अपना कर्म भली भांति निवाहो, इसी में सब इज़्ज़त है"। वेदान्त सिखाता है कि तुम को अपनी परिस्थितियों और इर्द-गिर्द के लिये न आकुल होना चाहिये। नियम को जानो और सब भयों को भाड़ दो। मान लो, एक न्यायकर्ता है। वह अपने न्यायालय में आता है और अपना आसन ग्रहण करता है। वह न्याय-प्रार्थियों, लिखने-पढ़ने वालों, वकीलों, चपरासियों और अन्य लोगों को अपनी राह देखते चुप पाता है। न्यायकर्ता को गवाहों को बुलवाना नहीं पड़ा, वकीलों को आमंत्रित नहीं करना पड़ा, अथवा वादियों और दूसरों को जाकर पुकारना नहीं पड़ा। उसे कमरे की गर्द नहीं झाड़ना पड़ी, फर्श पर झाड़ नहीं लगाना पड़ा, चौकी नहीं लगाना पड़ो, इत्यादि। जिस तरह सूर्य के उदय होने ही से सब प्रकृति जाग पड़ती है, पौधे, पक्षी, पशु, नदी, और

मनुष्य सजग हो जाते हैं, ठीक उसी तरह न्यायकर्ता के प्रभाव मात्र से सब चीजें यथास्थान हो जाती हैं। इसी प्रकार जब तुम दृढ़तापूर्वक सत्य में अपना रोपण करते हो, जब आप तटस्थ परम न्यायाधीश—स्वयं आपका आत्मा—के आसन पर अपने को आरूढ़ करते हो, जब आप का प्रभामय स्वयं अपनी पूरी दमक से चमकता है, तब सब परिस्थितियाँ आपका समस्त आस-पास अपनी चिन्ता आप कर लेगा, हरेक चीज सजग हो जायगी और आपकी उपस्थिति के मनोहर प्रकाश में यथास्थान हो जायगी। भारत के श्रेष्ठतम नायक राम के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि जब वे सीता—जो दैवी विद्या-रूपिणी है—का उद्धार करने चले तब समस्त प्रकृति ने उनको सहायता की। बन्दरों, चिड़ियों, गिलहरियों और जल, पवन, पत्थरों तक ने उनका पक्ष लेने में एक दूसरे से चढ़ा उतरी की। अधम आसक्ति और पतनकारिणी घृणा से दूर रहकर अपने स्वयं की प्रभा और राज्यश्री की ज्योति दिखाइये, फिर यदि नीच गुलामों की तरह देवता और देवदूत आपकी सेवा न करें तो उनको धिक् है। हरेक व्यक्ति बच्चे के दुलार क्यों सहता है! नन्हा अत्याचारी परम बलवान कंधों पर चढ़ता और मुकुटधारी शिरों के बाल नोचता है। यह क्या बात है? इसी लिये कि बच्चा परिस्थितियों से परे, अज्ञातभाव से परमात्मा में निवास करता है। यदि आप अपने कर्तव्य को पालते रहें, यदि आप अपने काम के वफादार हैं, तो बाहरी सहायताओं और मददों के लिये न घबड़ाइये। वे अवश्य आपको मिलेंगी, वे आने को बाध्य हैं। जब आप व्याख्यान देते हैं और उसमें कोई बात

सुरक्षित होने के योग्य है तो मत उद्विग्न हो कि कौन आकर उसे लिख लेगा या प्रकाशित करेगा, इत्यादि। न्यायाधीश का स्थान ग्रहण करो, अपनी प्राक्कालीन पदवी पर दृढ़ हो जाओ, बाहरी मामलों और बाहरी सहायताओं के लिये आशंकाओं से अपनी प्रसन्नता को कभी न नष्ट करो। शरीर के किसी भी भाग में जब खुजली मालूम पड़ती है तब हाथ आप से आप खुजलाने के लिये उस भाग पर पहुँच जाता है। हाथ के नीचे जो शक्ति या स्वयं है वह वादिशा वही शक्ति या स्वयं है जो खुजली के स्थान के नीचे है। मन में रक्खो कि ठीक इसी तरह तुम में जो स्वयं है वह वही स्वयं है जो आसपास में या अगल-बगल की वस्तुओं में है, और जब तुम्हारा मन इस नीचे रहनेवाले परम स्वयं से संगति में लहराता या आन्दोलित होता है और तुम्हारे शरीर के लिये वह (परम स्वयं) समग्र संसार हो जाता है तब बाहरी सहायताएँ और उपकार स्वभावतः और अनायास उठ कर उसी तरह आपके पास आवेंगे जिस तरह हाथ खुजली की जगह पर पहुँच जाता है। जब हम अपनी प्रतिच्छाया को पकड़ने दौड़ते हैं तो वह कभी हाथ नहीं आती, छाया हमेशा हम से आगे दौड़ती है। किन्तु यदि प्रतिच्छाया की ओर पीठ फेर कर हम सूर्य की ओर दौड़ें तो वह हमारा पीछा करेगी। इसी तरह जिस क्षण तुम इन बाहरी पदार्थों की ओर फिर कर इन्हें पकड़ना और रखना चाहोगे उसी घड़ी ये तुम्हारी पकड़ बचा जायँगे, तुमसे आगे दौड़ेंगे। ज्यों ही आप उन की ओर पीठ फेरेंगे और परम प्रकाश अर्थात् अपने आन्तरिक स्वयं की ओर मुँह करेंगे त्योंही उपकारी अवस्थाएँ आपको ढूँढेंगी, यही

नियम है। "कर्त्तव्य" के नाम से ही अधिकांश लोग पेल पड़ जाते हैं, दिक़ हो जाते हैं। कर्त्तव्य भूत की तरह उन्हें जब तक सताता है, उन्हें कूटता रहता है, उन्हें चैन नहीं लेने देता, और बराबर सिर पर सवार रहता है। ऐसे जल्दबाज गुलाम, बल्कि "कर्त्तव्य" के यंत्र, जल्दी के विचार से जितना लाभ उठाते हैं उतनी ही शक्ति खोते हैं। कर्त्तव्यबुद्धि को अपने पर न बढ़ने (समतोलन न बिगाड़ने) दो अथवा अपने मन को न हताश करने दो। याद रक्खो कि सम्पूर्ण कर्त्तव्य का अपने ऊपर लादने वाले मूल में तुम्ही हो। अन्त में तुम आप ही अपने मालिक हो। तुमने स्वयं अपने पद चुन, सेवा करने को तैय्यार हुए, और अपने हाकिम रक्खे। अब यदि आपको उनके रुपये-पैसे की जरूरत है, तो वे उसी मात्रा में आपकी सेवा चाहते हैं। शर्तें बराबरी की हैं, क्रिया और प्रतिक्रिया समान हैं। आप अपनेही संकल्प की सेवा करते हैं, किसी और दूसरे की नहीं। आप का वर्तमान आस-पास आप ही की रचना है, सम्बन्धों की छोटी सी दुनिया आप ही की कारीगरी है, आपका भविष्य आपही का बनाया हुआ होगा। अपने प्रारब्ध के कर्त्ता आपही हैं। इसे जानिये और प्रसन्न होइये, गद्गद होइये। "विचार पर विचार से हम अपना भविष्य गढ़ते हैं, बुरा या भला और यह जानते नहीं हैं। नसीब ही दूसरा नाम है विचार; तो फिर अपना नसीब चुन लो, और उसकी राह देखो। मन उसके क्षेत्र का स्वामी है; शान्त रहो, तत्पर और सच्चे रहो;

भय ही एक मात्र भयंकर शत्रु है। तुझमें जो ईश्वर है उसे उठने और कहने दीजिये विपरीत अवस्था से—'मेरी आज्ञा मानो और तुम्हारी प्यारी इच्छा पूरी होजायगी'। किसी तरह काल काटने वाले मजूर की तरह काम न करो। आनन्द के लिये, उपयोगी कसरत समझ कर, सुख-क्रीड़ा अथवा मनोरञ्जक खेल समझ कर कुलीन राजकुँवर की तरह काम करो। दबे हुए दिल से कदापि किसी काम को न हाथ में लो। अपने आप हो जाओ। अनुभव करो कि महाराज और राष्ट्रपति तुम्हारे चाकर मात्र हैं। नक्षत्रों की तरह काम करो— "अपने समीप की सब चीज़ों से बिना भय खाये, दिखाई पड़ने वाली वस्तुओं से बिना भीत हुए, ये नहीं माँगते कि हमसे बाहर की चीजें हम प्रेम, मनोरञ्जन, सहानुभूति अर्पण करें, गान का अनोखा पुरस्कार गान था—वही अपनी किलक (किलकारी) और दमक जो खिलते हुए फूलों की होती है, और बुलबुल तथा लाल [जिसे किलकारी और दमक का] जानते हैं"। किसी तरह की जिम्मेदारी न ओढ़ो, कोई इनाम न माँगो। अपने लिये प्रमाण तुम आपही हो। किसी भी कर्त्तव्य-ज्ञान या बाहरी अधिकार को आप अपने ऊपर छाया डालने वाला मेघ न होने दीजिये। बाहरी अधिकारी की दी हुई आज्ञा अधिक से अधिक ठीक २ नपी-तुली हो सकती है; किन्तु जिस आज्ञा की रचना तुम स्वयं करोगे वह स्वभाव सिद्ध होगी।

सफलता का पाँचवां सिद्धान्त—निर्भीकता। अब हम सफलता के पाँचवें सिद्धान्त निर्भीकता पर आते हैं। निर्भयता क्या वस्तु है? माया में बिलकुल विश्वास न होना और वास्तविक स्वयं का जीता-जागता ज्ञान और उस पर निष्कपट विश्वास होना। डर हमारे पास तभी आता है जब हम अपने को भय का आलय या शरीर समझते हैं। शरीर सदा ही चिन्ता-कीटों से भक्षणीय है। वह सब तरह की पीड़ाएँ उसे भेद और दबा सकती हैं। जिस क्षण हम क्षुद्र शरीर से ऊपर उठते हैं उसी क्षण हम भय से छूट जाते हैं। ईश्वर की तरह जीवन बिताओ, वेदान्त का व्यवहार करो, फिर तुम्हें कौन हानि पहुँचा सकता है? कौन तुम्हें चोट दे सकता है? वेदान्त और निर्भीकता को अलग नहीं किया जा सकता। निर्भीकता सफलता के लिये बहुत बहुत जरूरी किस तरह है? इसके लिये अपने अनुभव में आई हुई एक बात का उदाहरण दूँगा। हिमालय के वन में एक बार पाँच रीछ एक साथ ही राम के सामने आगये, परन्तु उन्होंने उसे (राम को) जरा भी नहीं सताया। यह क्यों? केवल निर्भयता के कारण। राम में यह भावना भरी हुई थी, "मैं शरीर नहीं हूँ, मैं चित्त नहीं हूँ, मैं परब्रह्म हूँ, मैं ईश्वर हूँ, अग्नि मुझे जला नहीं सकती, शस्त्र मुझे घायल नहीं कर सकता"। उनसे नजर मिलाई गई और वे भाग गये। एक बार जंगली भेड़िया इसी तरह भगाया गया। दूसरी दफे एक चीता यों ही चलता बना। जब बिल्ली आती है तो कबूतर अपनी आँखें बन्द कर लेते हैं। वे समझते हैं कि हम बिल्ली को नहीं देखते इस लिये बिल्ली भी हमें नहीं देखते। फिर भी बिल्ली उन्हें खा ही जाती है। यदि तुम

डरोगे तो बिल्ली तुम्हें खा जायगी। क्या आपने यह खयाल नहीं किया है कि गँवई गांव की ओर से निकलते हुए जब हम नाम मात्र को भी भीत होने के लक्षण दिखाते हैं तो कुत्ते हम पर झपट पड़ते और दिक करते हैं? यदि हम डरेंगे तो कुत्ते भी हमें नोच डालेंगे। किन्तु यदि हम बेडर हैं तो हम सिंहों और चीतों को भी जीत और हिला सकते हैं। एक पात्र से दूसरे पात्र में पतली चीज ढालते समय यदि हमारे हाथ जरासा भी कांप जाते हैं तो अवश्य वह वस्तु गिर जाती है। बेभरम होकर, निर्भयता से, विश्वासपूर्वक तरल पदार्थ दूसरे बर्तन में उलटोगे तो एक बूँद भी न मिटेगा। भय और सन्देह से ही तुम अपने को मुसीबतों में डालते हो। किसी बात से भी अस्थिर और चकित न हो। तुम सर्व हो। क्या यह करुणाजनक बात नहीं है कि छोटे से पटाके, या छोटे से चूहे, या पत्ती की खुरखुराहट की आवाज, बल्कि थरथराती हुई छाया, उन पहने हुए पूरे दो मन मांस को चौकन्ना करदे? संकट की भीति से बढ़कर कोई संकट नहीं है। मृत्यु के भय को मन में स्थान देने के बदले मर जाना मैं पसन्द करूंगा। किसी ने कहा है:-"जिस के मन में फलनेवाला पौधा नहीं था उसे कभी भी फलनेवाला पौधा नहीं मिला"। यदि तुम्हारे मन में प्रीति है तो तुम्हें प्रीति मिलेगी। यदि तुम अप्रीति का पोषण करते हो तो तुम्हें अप्रीति मिलेगी। यदि तुम्हें प्रतारकों और जासूसों का डर है तो तुम उनसे बचोगे नहीं। यदि तुम स्वार्थपरता और कपट की आशा करते हो तो तुम निराश न होगे, चारों ओर से स्वार्थ-परता और कपट तुम्हारे सामने आवेगा। तो फिर डरो मत, अपने में

पवित्रता और विशुद्धता को रक्खो, तुम्हारा कभी किसी अस्वच्छ वस्तु से सामना न पड़ेगा। जीवनसाफल्य और आत्मिकसाफल्य का साथ रहना चाहिये। वे भ्रान्त हैं जो एक का दूसरे से विच्छेद करते हैं। चोर उसी घर में सेंध लगाते हैं जो अरक्षित होता है। यदि घर में बराबर रोशनी रहे तो वे घुसने की हिम्मत न करेंगे। सत्य का प्रकाश सदा अपने चित्त में सदा प्रज्वलित रक्खो फिर भय या प्रलोभन का पिशाच तुम्हारे निकट न जायगा। ईश्वरी नियम पर विश्वास करो। लौकिक बुद्धि के फेर में पड़ कर अपने जीवन को कष्टमय न बनाओ। कातर चतुरता तुम्हें पूरा २ नास्तिक बना देती है। परिस्थितियों के कुहासे और धुंध से अपने को मेघाच्छन्न क्यों होने देते हो? क्या तुम सूर्यों के सूर्य नहीं हो? क्या तुम विश्व के प्रभु नहीं हो? परिस्थितियों की ऐसी कौन सी चपलता है जिसे तुम हटा नहीं सकते, फाड़ नहीं सकते, फूँक कर उड़ा नहीं सकते? किसी धमकानेवाली परिस्थिति को नाम मात्र को भी असली समझने का विचार तुमसे दूर रहे। निर्भय, निर्भय, निर्भय तुम हो। सफलता का छठा सिद्धान्तः—आत्म-निर्भरता। सफलता का छठा सिद्धान्त स्वावलम्बन है। आप जानते हैं कि हाथी सिंह से कहीं बड़ा पशु है। हाथी का शरीर सिंह के शरीर से कहीं अधिक बलवान मालूम पड़ता है। तथापि अकेला एक सिंह हाथियों के झुंड को भगा सकता है। सिंह की शक्ति का रहस्य क्या है? एक मात्र रहस्य यही है कि सिंह अमली वेदान्ती है और हाथी द्वैतवादी है। हाथी शरीर पर विश्वास करते हैं। सिंह व्यवहारतः

शरीर में नहीं विश्वास करता; वह शरीर से किसी उच्चतर वस्तु, आत्मा में विश्वास करता है। यद्यपि सिंह का शरीर अपेक्षाकृत बहुत छोटा है परन्तु कार्यतः वह अपनी शक्ति असीम मानता है, अपनी आन्तरिक शक्ति अनंत मानता है। हाथी चालीस या पचास और कभी कभी सौ सौ या दो दो सौ का दल बना कर रहते हैं और जब कभी वे आराम करते हैं तो सदा एक प्रबल हाथी को पहरेदार बना देते हैं। उन्हें डर बना रहता है कि कहीं शत्रु चढ़ न आवे और खा न जाय। वे यह नहीं जानते कि यदि अपने में विश्वास हो तो, हम में से एक २ हजारों सिंहों का संहार कर सकता है। किन्तु विचारे हाथियों में भीतरी आत्मा पर विश्वास नहीं होता और फलतः साहस का भी अभाव होता है। इस तरह पर आत्म-विश्वास कल्याण का एक मूल सिद्धान्त है। वेदान्त सिखाता है कि अपने आप को अधम, नीच, पीड़ित पापी या अभागा न कहो। तुम अनन्त हो। तुम सर्वशक्तिमान परमात्मा हो, अनन्त परमेश्वर तुम हो। इस पर विश्वास करो। कितना प्राण-संचारी सत्य है! बाह्य पर विश्वास करते ही तुम असफल होते हो। यही नियम है। मुकद्दमेबाजी में उलझे हुए दो भाई न्यायकर्ता के सामने गये। उनमें से एक लखाधीश था, दूसरा कंगाल। न्यायकर्ता ने लखाधीश से पूछा कि वह इतना अमीर और उसका भाई इतना गरीब कैसे होगया। उसने कहा, "पांच वर्ष पूर्व हमें अपने बापदादे की समान २ सम्पत्ति मिली। दो लाख रुपया मेरे हिस्से में आया और इतनाही मेरे भाई के हिस्से में।

यह मनुष्य अपने को धनी समझ कर आलसी होगया (आप जानते हैं कि कुछ धनवान परिश्रम करना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं) और सभी काम अपने नौकरों को सौंप दिए। यदि कोई चिट्ठी उसके पास आती थी तो अपने नौकरों को देकर कहता था, "जाओ, इस काम को करो"। जो कुछ भी काम करने को होता था वह अपने नौकरों से करने को कहता था। इस तरह चैन और आराम में वह अपना समय काटने लगा। "खाना, पीना, और मौज उड़ाना" उसका काम रह गया। वह अपने नौकरों को सदैव आज्ञा देता था, "जाओ, जाओ, यह काम करो या वह काम करो"। अपने सम्बन्ध में धनिक पुरुष ने कहा, "मैंने जब अपने दो लाख रुपये पाये तो मैं अपना काम किसी दूसरे को नहीं देता था। जब कभी कुछ करना होता था तो सदा मैं स्वयं उसे करने दौड़ता था और नौकरों से कहता था, "आओ, आओ, मेरे पीछे आओ"। मेरी जीभ पर हमेशा आओ, आओ, शब्द रहते थे, और मेरे भाई की जीभ पर 'जाओ, जाओ'। उसके अधिकार की हरेक वस्तु ने उसके तकिया कलाम का पालन किया। उसके नौकरों, मित्रों, दौलत या सम्पत्ति ने उसे त्याग दिया, बिलकुल छोड़ दिया। मेरा सिद्धान्त वाक्य था 'आओ'। मित्र मेरे पास आये, मेरी सम्पत्ति बढ़ी, हरेक चीज बढ़ी"। जब हम दूसरों पर भरोसा करते हैं तब कहते हैं, "जाओ, जाओ"। हरेक चीज चली जायगी। और जब हम स्वयं पर भरोसा करते हैं और आत्मा के सिवाय किसी पर भी निर्भर नहीं करते हैं तब सब चीजें हमारे पास आकर जमा हो जाती हैं। यदि तुम अपने को गरीब, तुच्छ कीट समझते हो

तो वही होजाते हो। और यदि तुम अपना सम्मान करते हो और अपने स्वयं पर निर्भर करते हो तो बड़ाई तुम्हें प्राप्त होती है। जैसा तुम सोचोगे वही अवश्य हो जाओगे। भारत के एक स्कूल में एक निरीक्षक (इंस्पेक्टर) आया। शिक्षकों ने एक लड़के को दिखला कर कहा कि वह इतना तेज है कि अमुक २ काव्य, मिल्टन का 'पाराडाइज़ लास्ट' कह लीजिये, उसे कंठाग्र है और कोई भी अंश वह सुना सकता है। विद्यार्थी निरीक्षक के सामने पेश किया गया किन्तु उसमें वेदान्त का भाव नहीं था। उसने लज्जा और नम्रता धारण की। जब उससे पूछा गया, "तुम्हें अमुक खण्ड कंठाग्र है"! उसने कहा, "जी नहीं, मैं कोई चीज नहीं, मैं कुछ भी नहीं जानता"। इन शब्दों को उसने नम्रतासूचक, लज्जाशीलता का लक्षण समझा। "नहीं जनाब, मैं कुछ नहीं जानता, मैंने उसे नहीं रटा था"। निरीक्षक ने फिर पूछा। किन्तु लड़के ने फिर भी कहा, "नहीं महाशय, जी नहीं, मैं तो नहीं जानता"। शिक्षक का मुँह उतर गया। एक और लड़का था। उसे पूरी पुस्तक कंठाग्र नहीं थी। किन्तु उसने कहा, "मैं जानता हूँ, मैं समझता हूँ कि जो कोई अंश आप चाहेंगे वह सुना सकूँगा"। निरीक्षक ने उससे कुछ प्रश्न किये। लड़के ने सब सवालों का उत्तर फटाफट दे दिया। इस दूसरे लड़के ने चरण पर चरण सुना दिये और इनाम पाया। आप जितना मूल्य अपना समझते हैं उससे अधिक मूल्य का आपको कोई न आँकेगा। कृपा कर के अपने को दीन, हीन, अभागे प्राणी न बनाइये। जैसा सोचोगे वैसे ही तुम हो जाओगे। अपने को ईश्वर समझो और तुम ईश्वर हो। अपने को तुम स्वाधीन

समझो और उसी क्षण स्वाधीन हो जाते हो। एक दिन एक वेदान्ती के घर में एक मनुष्य आया और मकान-मालिक की गैरहाजिरी में गद्दी पर बैठ गया। जब घर का मालिक कमरे में लौटा आ रहा था तब घुस आने वाले ने यह सवाल किया, "ऐ वेदान्ती, मुझे बता कि ईश्वर क्या है, और मनुष्य क्या है"। महात्मा ने प्रश्न का प्रत्यक्ष रीति पर उत्तर नहीं दिया। वह केवल अपने नौकरों को पुकार कर चिल्लाने और कटु भाषा का प्रयोग करने लगा, और उनसे उसे (घुस आने वाले को) घर से निकाल देने को कहा। यह अद्भुत भाषा वास्तव में बुद्धिमान मनुष्य ने व्यवहार की। जब ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया जिस की आशा नहीं थी तो आगन्तुक डर गया और घबड़ा कर यहीं से हट गया। बुद्धिमान मनुष्य उस पर जा विराजा और शान्ति भाव से, गम्भीरता पूर्वक उससे कहा, "यहां (अपने को बता कर) तो ईश्वर है और वहां (आगन्तुक को बता कर) मनुष्य है। यदि तुम डर न जाते, यदि तुम अपने स्थान पर डटे रहते, यदि तुम अपनी स्थिरता कायम रखते, यदि तुम्हारा चेहरा न उतर जाता, तो तुम भी ईश्वर थे। किन्तु तुम्हारा काँपना, थरथराना, और अपने ईश्वरत्व में विश्वास न रहना ही तुम्हें हीन कीट बनाता है"। अपने आप को ईश्वर समझो, अपने ईश्वरत्व में सजीव विश्वास रक्खो, फिर कोई तुम्हारी हानि न कर सकेगा, कोई भी तुम्हें हानि न पहुँचा सकेगा। जब तक तुम बाहरी शक्तियों पर भरोसा और निर्भर करते रहोगे तब तक असफलता ही परिणाम होगा। अन्तर्गत, ईश्वर पर भरोसा करते हुए शरीर को काम में लगाओ,

सफलता निश्चित है। यदि पहाड़ मोहम्मद के पास नहीं आता तो मोहम्मद पहाड़ के पास जायगा। एक आदमी भूखा था। अपनी भूख बुझाने के लिये वह एक जगह आँखें मीच कर बैठ गया और काल्पनिक भोजन करने लगा। कुछ देर बाद वह मुँह खोले हुए अपनी जली जीभ ठंढी करते देखा गया। किसी ने उससे पूछा, क्या मामला है। उसने कहा कि मेरे भोजन में गर्म मिर्च था। नाम तो ठंढा है परन्तु चीज़ है बड़ी गर्म*। इस पर एक पास खड़े मनुष्य ने कहा, "अरे गरीब आदमी, यदि मानसिक भोजन पर ही तुझे निर्वाह करना है तो गर्म मिर्च के बदले कोई मीठी वस्तु ही क्यों नहीं चुनता। जब यह तुम्हारी ही सृष्टि, तुम्हारी ही करतूत, तुम्हारी अपनी ही कल्पना थी, तो कोई अच्छी चीज क्यों नहीं पसन्द की? वेदान्त कहता है आपका समग्र संसार आप ही की रचना, आप ही का विचार है, अपने आपको नीच, अभागा पापी क्यों समझते हो? अपने को ईश्वर का निर्भीक और आत्म-निर्भर अवतार क्यों नहीं समझते? सत्य में सजीव विश्वास रक्खो, इर्द-गिर्द की चीज़ों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करो, अपनी सब परिस्थितियों का यथोचित मूल्य जानो, और इस दर्जे तक आत्मानुभव करो कि यह संसार तुम्हें मिथ्या जान पड़ने लगे। क्या तुम्हें पता नहीं कि ज्योतिषशास्त्र के अनुसार स्थिर नक्षत्रों का अन्तर गुनने में यह संसार अंकगणित का एक बिन्दु मात्र समझा जाता है, उन नक्षत्रों और ग्रहों के सम्बन्ध में यह संसार कुछ * अंग्रेज़ी में मिर्च को "चिली" (Chilli) कहते हैं। "चिली" का दूसरा अर्थ ठिठुराने वाला भी है।

नहीं, शून्य मात्र माना जाता है। यदि पैसा है, तो सर्वश्रेष्ठ अनन्तशक्ति, आत्मा की तुलना में यह पृथ्वी क्या कोई चीज हो सकती है? यह समझो, यह अनुभव करो। प्रकाशों के प्रकाश तुम हो, समस्त गौरव तुम्हारा है। यह समझो और इस दर्जे तक इसे अनुभव करो कि यह पृथिवी और नाम तथा यश, लौकिक सम्बन्ध, लोकप्रियता और लोक-अप्रियता, सांसारिक मान और अपमान, शत्रुओं की निन्दा और मित्रों की खुशामद तुम्हारे लिये निरर्थक चीज़ें हो जाँय। सफलता का यह रहस्य है। नियागारा नदी की तेज धारा दो आदमियों को बहाये लिये जाती थी। उनमें से एक को एक बड़ा लट्ठा मिल गया और जान बचाने की इच्छा से उसने उसे पकड़ा। दूसरे मनुष्य को नन्ही सी रस्सी मिली। किनारे के आदमियों ने इन दोनों के बचाने के लिये यह रस्सी फेंकी थी। सौभाग्य से दूसरे मनुष्य ने यह रस्सी पकड़ ली, जो लकड़ी के लट्ठे के समान भारी नहीं थी। रस्सी यद्यपि जाहिरा बहुत ही डाँवाडोल और भंगुर थी तथापि वह बच गया। किन्तु जिस आदमी ने लकड़ी का बड़ा लट्ठा पकड़ा था वह फुर्ती से लट्ठे के साथ बह कर गर्जनशील प्रपातों के नीचे तरङ्गायित जल की खुली हुई समाधि में पहुंच गया। इसी तरह पर, हे संसारी लोगो, तुम इन बाहरी नामों, कीर्ति, ऐश्वर्य, वैभव, दौलत और समृद्धि पर भरोसा करते हो। ये लकड़ी के लट्ठे की तरह बड़े मालूम होते हैं किन्तु ये बचानेवाले साधन नहीं हैं। बचानेवाला सिद्धान्त महीन तागे की तरह है। वह भौतिक नहीं है, तुम उसे छू नहीं सकते, तुम उसे हथिया और टटोल नहीं सकते। सूक्ष्म

सिद्धान्त, सूक्ष्म सत्य, बहुत ही नन्हा है। किन्तु वही तुम्हें बचानेवाली रस्सी है। ये सब संसारी चीज़ें, जिन पर तुम निर्भर करते हो, केवल तुम्हारे नाश का कारण होंगी और निराशा, चिन्ता, तथा पीड़ा के गहरे गर्त में तुम्हें गिरावेंगी। सावधान, सावधान। सत्य को पोढ़े पकड़ो। बाहरी पदार्थों की अपेक्षा सत्य पर अधिक विश्वास रक्खो। प्रकृति का नियम है कि जब मनुष्य अमली तौर पर बाहरी पदार्थों और दौलत पर विश्वास करता है तो उसे असफल होना पड़ता है। यही नियम है। ईश्वर पर भरोसा करो और तुम सुरक्षित हो। अपनी इन्द्रियों के बहकाने में न आओ। अपने पड़ोसियों की सूचनाओं और वशीकरण से ऊपर उठो। तुम्हारे सब सांसारिक बन्धन और सम्बन्ध तुम्हें चिन्ता और दुर्भाग्य के वश में डालते हैं। उन से ऊपर उठो। सत्य में विश्वास करो, ईश्वर से अपनी अभिन्नता का अनुभव करो और तुम्हारा निस्तार है, बल्कि तुम स्वयं मुक्ति हो। नारायण न करे कि वास्तविक आत्मा की अपेक्षा संसार पर आप अधिक गम्भीरता से ध्यान दें। अपने को परिमित करुणा पात्र, इन्द्रिय-विशिष्ट अहं न बनाये रक्खो। किसी चीज से भी न चिढ़ो। काम उसी निर्लिप्त भाव से करो जिस तरह वैद्य लोग अपने रोगियों की चिकित्सा करते हैं और रोग को अपने पास नहीं फटकने देते। सब उलझनों से मुक्त, अप्रभावित गवाह की भावना से काम करो। स्वतंत्र रहो। सफलता का सातवां सिद्धांतः—विशुद्धता। सफलता को असंदिग्ध बनानेवाली अन्तिम बात परन्तु महत्ता में कम नहीं है वह है पवित्रता। यह सत्य है कि विचार

प्रारब्ध का दूसरा नाम है, मनुष्य जो कुछ विचार करता है वही हो जाता है। किन्तु यदि आप गन्दी बातें विचारने लगें और पतित बनाने वाले दुराचारों को पोषण करें तो उन स्वार्थमय इच्छाओं की पूर्ति के साथ २ हृदय को चूर कर देनेवाली पीड़ा, अति वेदनाकारी यातना और उन्मादकारी शोक भी सौदे में आप पर जबर्दस्ती लादा जायगा। शोक आपकी आत्मा को दबोचेगा। मूर्ख समझता है कि वह इन्द्रियों के सुख लूटता है, किन्तु यह नहीं जानता कि अस्वच्छ विचार या कार्य में उसकी जीवन-शक्ति ही मोल ली जाती है, बिक जाती है और नष्ट हो जाती है। स्वार्थमय उद्देश्यों के लिये जब तुम कर्म का दुरुपयोग करते हो तब कर्म का कानून प्रतिकार करता और तुम्हें व्यर्थ कर देता है। ईश्वर को आदेश मत दो। शारीरिक आवश्यकताओं के सम्बन्ध में ईश्वर की इच्छा पूर्ण होने दो। सांसारिक आवश्यकताओं में ईश्वर की मर्जी को अपनी मर्जी बनालो। समझो, समझो कि तुम वही परम शक्ति हो जिसकी इच्छा ने परिस्थितियों के रूप की रचना की है। अपनी गरीबी को अपनी ही करतूत समझ कर सानन्द भोगो। किन्तु यदि विषयवासना तुम्हें पथभ्रष्ट करदे और कामुकता के दलदल में अपने को फँसा हुआ पाओ तो अपनी भागवत दशा अथवा आत्मानुभूति को पाने और बनाये रखने के लिये अपनी प्रबल इच्छाशक्ति का ज़ोर दिखाओ और उससे बड़े यत्न से काम लो। इस देश में कामुकता पर प्रेम के पवित्र नाम का कलप किया जाता है। कैसा पाखंड है! लोगों के जीवन में पवित्रता नहीं होती। असाधारण स्नेह और असाधारण वासनाएँ उनके दिनों को पैवंदों में काट और बाँट देती हैं। शायद ही कभी कोई युवक अपने भाव प्रकट करने में लगी चिपटी न रखता हो। सर्व

साधारण में प्रकट होनेवाला युवक सदा ही अंगमंग अपूर्णांक, बहिष्ठ उस (युवक) का अत्यन्त अनुचित, जर्जरित अंश होता है। एक अंश तो उसका उसकी प्रेयसी के पास रहता है और दूसरा किसी दूसरे ही पदार्थ में लगा रहता है। अपने कार्य को प्यार करो, जहाँ तुम्हारा हाथ हो वहीं अपने मन को भी रक्खो। हाथ और पैर तो गर्म रहें, काम करते रहें, किन्तु अपना मस्तिष्क शान्त और प्रगाढ़ रक्खो। अपने विचारों को सदा स्वस्थ, वास्तविक स्वयं में केन्द्रित रक्खो, और परिस्थितियों की कोई परवाह न करो। मानव जाति का हित करने के विचार से अपने को हैरान न होने दो। संसार इतना दीन क्यों हो कि वह निरन्तर तुम्हारे ध्यान की भिक्षा करता रहे? शरीर को तुम्हारी अपनी ही मुक्ति के लिये काम करता रहने दो। मूर्ख लोग व्यर्थ को प्रकाश के लिये प्रार्थना और कामना करते रहते हैं। प्रकाश चाहने की भी क्या आवश्यकता है? प्रकाश के लिये अनुनय-विनय तुम्हें अन्धकार में रखती है। एक क्षण के लिये सब इच्छाओं को दूर फेंक दो। ॐ (श्रीराम) की रट लगाओ। न आसक्ति हो, न घृणा, पूर्ण समता हो, और तब तुम्हारा समग्र शरीर मूर्तिमान प्रकाश है। कार्य के सब सांसारिक उद्देश्यों को निर्वासित कर दो। इच्छारूपी प्रेतों को उतार दो, भगा दो। अपने सब काम को पवित्र बना दो। आसक्ति या लगन के रोग से अपने को छुड़ा लो। एक पदार्थ में आसक्ति आपको सब से पृथक कर देती है। स्वार्थमय पाशविक उद्देश्य ही आपके व्यवसाय और जीवन को लौकिक बना देते हैं। कार्य में अज्ञात रूप से जो वैराग्य निहित है उसका मज़ा चखने के लिये शरीर या क्षुद्र स्वयं से परे रहते हुए, क्यों कि कार्य तुम्हें ईश्वर के साथ रखता है, अपना काम करो।

निष्काम कर्म परमोच्च वैराग्य या उपासना का दूसरा नाम है। काम करने में तुम्हारा कोई उद्देश्य क्यों हो? मूर्ख अभागे विश्वास करते हैं कि उद्देश्य पूरे हो कर स्वयं काम की अपेक्षा अधिक सुख देते हैं। अंधे जानते ही नहीं कि स्वयं काम से बढ़ कर अधिक सुख किसी भी परिणाम में नहीं मिल सकता। आनन्द श्रम के वस्त्र पहने रहता है। आप अपनी सफलता सदा अपने साथ रख सकते हैं। इस तरह विशाल विश्व तुम्हारा पवित्र देवालय और तुम्हारा समग्र जीवन एक निरन्तर स्तोत्र हो जाता है। फल की तुम्हें क्या चिन्ता है? वेतन या तनख्वाह के लिये हैरानी तुम्हारे पास न फटके। यदि कोई उच्च पद तुम्हें नहीं मिलता तो दुष्ट अभिमान तुम्हें सड़कों पर झाड़ू देने से न रोके। तुम्हारे हाथ के सामने जो काम आ पड़े उसे करने से न हिचको। परिपाटी के विरुद्ध कार्य से घृणा करना आत्म-सम्मान कदापि नहीं है। शरीर-सम्मान नेकी का प्रतिकूल ध्रुव है, नरक का बड़ा सीधा रास्ता है। जब आप किसी भी श्रम के लिये अपने हाथ बढ़ाने को तैयार हैं तो अति श्रेष्ठ पद और अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यवसाय आपका हार्दिक स्वागत करने के अपने हाथ फैलावेंगे। यही प्रकृति का नियम है। परिश्रम में निवास करनेवाले ईश्वर से यदि आप हिचकते और पलटते नहीं तो ईश्वर से अधिक शिष्टता कौन दिखा सकता है। आपकी इच्छा के विरुद्ध भी प्रकाश आपके द्वारा प्रकाशित होगा। मानवजाति की निन्दा या स्तुति की चिन्ता न करो। ये बातें केवल तुम्हें पथ-भ्रष्ट करती या धोखे में डालती हैं। तुम्हारा स्वर्ग तुम्हारे अन्दर है। प्रसन्नता के एवंकथित बाहरी पदार्थों का सुख लूटने के लिये जब आप झुकते हैं तब आप चीज़ों में मेल करने वाले का अपवित्र, अशुद्ध

अभिनय करते हैं। बाहरी शत्रुओं से कह दो, "शैतान, मेरे पीछे चला जा, मैं तेरे हाथों से कुछ नहीं लेने का"। सम्पूर्ण हर्ष का सोता क्या तुम नहीं हो? "वे ऋतुएँ उसके लिये बेकार लौटती हैं, जो नित्य गर्व अपना आत्मा में वहन करता है।" भारतीय कोयल या फाख्ता को देवदारु के वृक्ष पर बैठा दो स्वभावतः मधुर गीत वह गाने लगेगी। अपने चित्त को स्वगृह में बैठने दो तो फिर स्वतः, स्वभावतः, अनायास मीठे से मीठे स्वर उससे निकलने लगेंगे। तुम्हारा ईश्वरत्व ऐसी कोई चीज नहीं है जिसे पूरा होना है। आत्मानुभव ऐसी चीज नहीं है जो प्राप्त करनी हो, ईश्वर-दर्शन पाने के लिये तुम्हें कुछ करना नहीं है, अपने इर्द-गिर्द इच्छाओं का घटाटोप दाग़ रखने के रूप में तुमने अब तक जो काम कर रक्खा है उसका निराकरण मात्र करना है। मत डरो, तुम स्वाधीन हो। तुम्हारी प्रतीत होने वाली बन्धता पर तुम्हारी स्वाधीनता लदी हुई है। तुम्हारे आमंत्रण के बिना तुम्हें कोई हानि नहीं हो सकती। तुम्हें कोई तलवार नहीं काट सकती जब तक तुम न समझो कि वह काटती है। अपनी बेड़ियों और हथकड़ियों को अलंकारों के समान प्यार करने की क्या आवश्यकता है। निष्फल अनुरागों को धिक्कार कर दूर करो, समस्त कुटिलता को जला दो, फिर विश्व में ऐसी कौन सी शक्ति है जो तुम्हारे जूते खोलने का अधिकार पाकर अपने को धन्य न समझेगी! अपने ईश्वरत्व का निरूपण करो, क्षुद्र स्वयं को सोलहो आने भुला दो, मानो उसका कभी अस्तित्व ही नहीं था। छोटा सा बुलबुला फूटने पर समग्र समुद्र हो जाता है। तुम समग्र हो, अनन्त

हो, सर्व हो। अपनी मौलिक ज्योति से चमको। हे पूर्ण ब्रह्म, तेरे लिये न कोई कर्तव्य है, न काम, तुझे कुछ नहीं करना है, सम्पूर्ण प्रकृति तेरी चेरी है। तुम्हारी उपासना और पूजा करने का सौभाग्य पाकर संसार अपने ग्रहों को धन्यवाद देता है। प्राकृतिक शक्तियों का प्रणाम और दण्डवत् स्वीकार करने की आप कृपा करें। ॐ ! ॐ !! ॐ !!!