श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

आत्मकृपा।

भाग 5 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 5 · अध्याय 5 / 5

आत्मकृपा।

(भारतवर्ष में दिया हुआ स्वामी रामतीर्थ जी का व्याख्यान) उपनिषद् (श्रुति) का वाक्य है कि 'श्रेय और है, प्रेय और है'। फर्ज़ (कर्तव्य, धर्म) कुछ कहता है किन्तु गरज़ (स्वार्थ-कामना) और तर्क खींचती है। श्रेय, फर्ज़ या ड्यूटी (duty) तो कहते हैं—"दे दो—त्याग"। लेकिन प्रेय या गरज़ तरगीब देती है—"लो लेलो, यह तुम्हारा हक्क है, अधिकार है, राइट है"। दुनियां में अपने राइट (हक्क) वा अधिकार पर ज़ोर देना तो साधारण और सुगम है, किन्तु अपने धर्म या फ़र्ज़ को पूरा करने में ज़ोर देना कठिन और नीरस मालूम देता है। वस्तुतः विचार करें तो फ़र्ज़ और गरज़ में वही सम्बन्ध है जो वृक्ष के बीज को उसके फल के साथ होता है। बड़े आश्चर्य की बात है कि फल तो सब लोग खाना चाहते हैं, किन्तु बीज को बोने और उसके पालन पोषण के परिश्रम से भागा चाहते हैं। बात तो यूं है कि जब हम लोग अपनी ड्यूटी (duty) पूरा करने पर ज़ोर देते चले जाँय, तो हमारे राइट [right] हमारे हक्क, हमारे अधिकार हमारे पास स्वयं आयेंगे। जब हम लोग केवल अपने अधिकार पर ज़ोर देंगे, अपने राइट, अपने अधिकार फड़कायेंगे तो हम अभागी मुँह तकते ही रह जायँगे, हमारे हक्क भी झूठे हो जायंगे। प्रकृति का नियम ऐसा ही है। ड्यूटी (duty) अर्थात् ऋण चार प्रकार के हैं। पहला

ऋण परमेश्वर के प्रति, दूसरा ऋण मानव जाति की ओर, तीसरा ऋण देश सेवा का और चौथा ऋण अपने आप की तरफ। ये सब ऋण अन्त में एक ही ऋण में समा जायँगे। वह एक ऋण क्या है? जो आपका ऋण अपने आपकी तरफ है। जो लोग अपना ऋण (कर्ज़) अपने आपको पूरी तरह से अदा कर देते हैं, उनके वाकी तीनों ऋण (फ़र्ज़) अपने आप अदा हो जाते हैं। कहा जाता है कि कृपा तीन प्रकार की है:—ईश्वर कृपा, गुरु कृपा, और आत्मकृपा। ईश्वर कृपा उस पर होती है जिसपर गुरुकृपा होती है, गुरुकृपा उस पर होती है जिसपर आत्मकृपा होती है। देखिये; एक लड़का जो स्कूल में पढ़ता है, अगर अपने स्वधर्म को, निजी कर्तव्य को अच्छी तरह से पूरा न करे, अर्थात् अगर वह आप आत्मकृपा न करे तो गुरुकृपा उस पर न होगी। और जब अपना पाठ अच्छी तरह से याद करे तो गुरुकृपा उसपर अपने आप होगी, और गुरुकृपा होने से ईश्वर कृपा हो ही जाती है। देश की सेवा वह मनुष्य नहीं कर सकता, जिसने पहले अपनी सेवा नहीं की। जो अपना भी ऋण पूरा नहीं कर सका, वह देश सेवा क्या ख़ाक करेगा? जिस किसी ने कोई विद्या प्राप्त नहीं की, कोई कला (हुनर) नहीं सीखी, किसी बात में निपुणता प्राप्त नहीं की, किसी कारीगरी या कला कौशल्य में कुशलता प्राप्त नहीं की, और दम भरने लगे देश-प्रेमी होने का, तो भला बोलो उससे क्या बन पड़ेगा? हाँ, इतना ज़रूर है कि जिसके दिल में सच्चाई भर जाय, वह अधूरा पुरुष भी कुछ न कुछ तो देश सेवा कर सकता है। देश की सेवा तो कोयला भी जलकर और लकड़ी भी कट

कर, नाव बनकर, कर सकते हैं। जब लकड़ी या कोयला भी कट या जल कर देश सेवा कर सकते हैं, तो वह मनुष्य भी जिसने कोई विद्या या कला नहीं पढ़ी, देश सेवा सच्चाई के ज़ोर से कुछ न कुछ क्यों नहीं कर सकता? मगर उसकी सेवा की केवल कोयला और लकड़ी की सेवा से समानता की जा सकती है। इसके साथ सच्चाई भरा मनुष्य प्रवीणतारहित (अधूरा) कैसे कहला सकता है? सच्चाई तो स्वयं प्रवीणता (वा निपुणता) है। वह व्यक्ति जिसने, अपना ऋण अपने प्रति किसी प्रकार पूरा किया और अपने तईं आध्यात्मिक या बुद्धिमत्ता के बालकपन की हालत से आगे बढ़ा दिया तो समझना कि उसने कुछ नहीं तो एम. ए. या शास्त्री आदि श्रेणी की योग्यता प्राप्त करली। यह व्यक्ति जिस हद (दर्जे) तक आध्यात्मिक या बुद्धिविषयक बल उत्पन्न कर चुका है, उसी प्रमाण से समाज की गाड़ी को उन्नति की सड़क पर आगे खींच सकता है। यदि ऐसा मनुष्य देश के सुधार का दम न भी भरे, और प्रकट रूप में देश की पूरी सेवा न भी करे, तो भी उसको देख कर और स्मरण करके बहुत से लोग बड़े उत्साह में आ जायंगे कि हम भी, एम. ए. पास करें, हम भी योग्यता पैदा करें। यह मनुष्य अपने आचरण से लोगों को उपदेश कर रहा है, और देश के बल को बढ़ा रहा है। दामन आलूदा अगर खुद हमः हिकमत गोयद। अज़ सखुन गुफ़्तनए ज़ेबायश बदाँ बिह न शवन्द॥ वाँकि पाकीज़ा दिलस्त अर वनशीनद ख़ामोश, हमः अज़ सीरते साफ़ीश नसीहत शिनवन्द॥ भावार्थः—दुष्कर्मी अगर स्पष्ट बुद्धिमानी की बातें कहे

उसकी अच्छी २ बातें कहने से बुरे लोग अच्छे न होंगे। और जो पवित्र हृदयवाला अगर चुप भी बैठे सब लोग उसके उत्तम स्वभाव से उपदेश ले लेंगे। सर आइज़क न्यूटन, जिसको खयाल भी न था कि मैं स्वदेश और जगत की सेवा करूंगा, इस प्रकार विद्या के पीछे दौड़ रहा था कि जिस प्रकार दीपक की ज्वाला (लाट) पर पतंगे। सर आइज़क न्यूटन अपनी तरफ जो ध्यान है, उसका निर्वाह करता हुआ, आत्मकृपा करता हुआ लोकोपकारक साबित हुआ। अगर एक व्यक्ति मैदान में खड़ा होकर दृष्टि फैलावे तो थोड़ी दूर तक देख सकता है और कुछ मनुष्यों को अपनी आवाज़ पहुँचा सकता है। किन्तु जब वह ऊँचे मीनार या पर्वत की चोटी पर पहुँच जाता है तो अपनी आवाज़ चारों ओर बहुत दूर तक पहुँचा सकता है। राम के साथ एक समय कुछ मनुष्य गंगोत्री के पहाड़ पर जा रहे थे रास्ता भूल गये। झाड़ियों और कांटों से बदन छिल गये साथियों में से अगर कोई पुकारता तो उसकी आवाज़ दूसरों तक नहीं पहुँच सकती थी, मुश्किल के साथ अन्त में चोटी पर पहुँच कर जब राम ने आवाज़ दी तब सब आ गये। इसी तरह से जब तक हम स्वयं नीचे गिरे हुए हैं, दूर की आवाज़ सुनाई नहीं देगी। और जब चोटी पर चढ़ कर आवाज़ दें तो सब के सब सुनेंगे। इस चौकी को जो राम के सामने है, यदि हिलाना चाहें और उसकी पहली तरफ या बीच में हाथ डालें और ज़ोर मारें तो नहीं हिलेगी, लेकिन नज़दीक से नज़दीक स्थान से हाथ डाल कर हम सारी चौकी को खींच सकते हैं। दुनिया के साथ मनुष्य का सम्बन्ध भी ऐसा ही है।

बनी-आदम आज़ाए यक दीगरन्द, कि दर आफ़रीनश ज़ यक गौहरन्द। भावार्थः—प्रजापति की सन्तान (मनुष्य) परस्पर एक दूसरे के अंग हैं, क्योंकि उत्पत्ति में मूल कारण एक ही है। समस्त जगत को यदि तुम हिलाना चाहते हो तो दुनिया का वह भाग जो अति समीपस्थ है, अर्थात् अपना आप उसको हिलाओ। अगर अपने आप को हिला दोगे, तो सारी दुनिया हिल जायगी; न हिले तो हम जिम्मेदार। जिस कदर अपने आपको हिला सकते हो, उसी कदर दुनिया को हिला सकते हो। कुछ लोग सुधार (सांसारिक) के काम में हज़ारों यत्न करते हैं, रातदिन लगे रहते हैं तथापि कुछ नहीं हो सकता। और कुछ ऐसे हैं कि उनके जीते जी या मर जाने के पीछे उनकी यादगार में उनके नाम पर लोग स्वयं कालेज बनाते हैं, सभाएं स्थापित करते हैं, और सैकड़ों सुधार जारी करते हैं, जैसे बुद्ध, शंकर, नानक, स्वामी दयानन्द। कारण क्या है? बस यही कि उक्त महात्मा अपने सुधारक आप बने। यूनान में एक बड़ा गणितवेत्ता हो गया है जिसका नाम है आर्कमिडीज़। इसका कहना है कि "मैं थोड़ी सी ताक़त से समस्त ब्रह्माण्ड को हिला सकता हूं, यदि मुझे उसका मध्यबिन्दु मिल जाय।" किन्तु उस बेचारे को कोई स्थायी मुकाम (केन्द्र स्थान) न मिला। प्यारे! वह केन्द्र स्थान जिस पर खड़े होकर ब्रह्माण्ड को हिला सकते हो वह केन्द्र स्थान आपका अपना ही आत्मा है वहां जम कर, अपने स्वरूप में स्थित होकर जो संचार [हलचल] और शक्ति उत्पन्न होगी वह समस्त ब्रह्माण्ड को हिला सकती है।

जब एक जगह की वायु सूर्य की गर्मी लेते २ पतली होकर ऊपर उड़ जाती है, तो उसकी जगह भरने को स्वतः चारों ओर से वायु चल पड़ती है, और कई बार आँधी भी आ जाती है। इसी तरह जो व्यक्ति स्वयं हिम्मत [ईश्वरीय प्रकाश] को लेता २ ऊपर बढ़ गया, वह स्वाभाविक ही देश में चारों ओर से मत [सम्प्रदायों] को कई कदम आगे बढ़ाने के निमित्त कारण हो जाता है। अब यह दिखलाया जायगा कि क्यों कर अपना ऋण अपने आप की ओर निवाहते हुए हमारा ईश्वर की ओर का ऋण भी पूरा हो जाता है। मुसलमानों के यहां कथा है कि एक कोई सत्य का जिज्ञासु था। ईश्वर की जिज्ञासा में प्रेम का मारा चारों ओर दौड़ता था कि ईश्वर करे कोई ऐसा ब्रह्मनिष्ठ मिल जाय कि जिसके दर्शन से हृदय की आग बुझ जाय और दिलको ठंढक पड़े। यूं ही तलाशें करता हुआ हताश होकर जंगल में जा पड़ा कि अब न कुछ खायेंगे न पियेंगे—जान दे देंगे। बैठे हैं तेरे दर पे तो कुछ करके उठेंगे, या वस्ल ही हो जायगी या मर के उठेंगे। अर्थात् तेरे द्वार पर आ बैठे हैं कुछ करके ही उठेंगे। एकता हो जायगी या प्राणत्याग करेंगे। उस समय के पूर्ण ज्ञानी हज़रत जुनैद थे और उस दिन हज़रत जुनैद दजला में घोड़े को पानी पिलाने जा रहे थे। घोड़ा अड़ता था। दजला की तरफ नहीं जाता था। घोड़े को अड़ता हुआ और बिगड़ा हुआ सा देख कर जुनैद ने जाना कि इसमें भी कोई भलाई होगी। आखिर घोड़े के साथ ज़िद छोड़ दी और कहा:—"चल

अब चलता है, चारों तरफ मेरे ही खुदा का मुल्क तो है, सब मेरा ही देश है।" घोड़ा दौड़ता हुआ उस जंगल में, खास उसी स्थान पर आ पहुँचा जहां वह बेचारा सच्चा जिज्ञासु प्रेम का मतवाला, इश्क का जला हुआ, परमेश्वर का भूखा प्यासा पड़ा था। जुनैद घोड़े से उतर कर उस जिज्ञासु के पास आकर हाल पूछने लगे और थोड़े ही सत्संग से वह परमात्मा का सच्चा जिज्ञासु मालामाल होगया। जब जुनैद जाने लगे तो उस प्यारे से कहा कि "अगर फिर कभी कब्ज़ — [आत्मिक अरुचि] हो जाय और तुझे ब्रह्मनिष्ठ गुरु की जरूरत हो तो बग़दाद में आ जाना। मेरा नाम जुनैद है, कहीं से पूछ लेना" उस मस्त ने जवाब दिया, कि क्या अब मैं हुज़ूर के पास गया था? मुझे अब भेद मालूम होगया। अब मैं आने जाने का कहीं नहीं। अगर आयन्दा जरूरत होगी तो अब की तरह फिर भी चाहे हुज़ूर खुद, चाहे और कोई गरदन से पकड़ा हुआ घसीटता आवेगा। असर है जज़्बे-उल्फ़त में तो खिंचकर आ ही जायेंगे, हमें परवाह नहीं हमसे अगर वह तन के बैठे हैं। अर्थात् प्रेमाकर्षण में यदि कुछ प्रभाव है तो आप खिंच कर आ जायंगे। इस बात की परवाह नहीं कि आप तनकर दूर बैठे हैं। वाह रे आत्मसत्ता का रसायन! बेहूदह चरा दरपये ओ मेगर्दी, विनशीं अगर ओ खुदास्त खुद में आयद। इश्के-अव्वल दर दिले-माशूक़ पैदा मेशवद, ता न सोज़द शमा कै परवानः शेदा मेशवद। गिर्दे-ख़ुद गर्दे ग़नीचन्द कुनी तौफ़े-हरम, रहबरे नेस्त दरीं राह विदा अज़ किबला नुमा।

भावार्थ—उस (ईश्वर) के लिये तू व्यर्थ क्यों घूमता फिरता है? बैठ, अगर वह खुदा है, तो खुद आयेगा। प्रिया के हृदय में प्रथम प्रेम उत्पन्न होता है। जब तक दीपक न जले पतंग इस पर मोहित क्यों हो सकता है? ऐ गनी (कवि)! अपने गिर्द तू घूम, काबे की परिक्रमा तू कब तक करेगा? क्योंकि इस मार्ग में इस किबलानुमा (पूज्यात्मा) से और कोई अन्य पथदर्शक नहीं है। यह है आत्मकृपा का बल। "यह हमारे भाग्य में नहीं था" "यह हमारी किस्मत में नहीं था," "ईश्वर की इच्छा," "आज कहीं गुरु नहीं मिल सकता," "अच्छा सत्संग नहीं," "दुनिया बड़ी खराब है," इत्यादि ऐसे २ वचन हमारे अन्तःकरण की मलिनता और कायरता के कारण से हैं। कैसे मिले रकीब को, यह तश्ने-अकरुया, तेरा ही दिल न चाहे तो यार हज़ार हैं। अर्थात् विरोधियों की शिकायतें कैसी और संबंधियों के उलाहने क्या? जब अपना ही चित्त न चाहे तो हज़ार यहां हो जाते हैं। आपने बीसियों कथाएं सुनी होंगी कि किस २ तरह से ध्रुव, प्रह्लाद, और अभिमन्यु इत्यादि छुटपुट बालकों ने परमेश्वर को बुलाया, प्रकट कर लिया। एक जरा सा लड़का नामदेव अपने नाना को ठाकुरपूजन करते हुए देखा करता था। उसके मन में आने लगा कि मैं भी पूजा करूंगा। चुपके २ "ठाकुरजी ठाकुरजी" जपा करता था। उसकी दृष्टि में शालिग्राम की प्रतिमा, सच्चे ठाकुरजी थे। जब उसका दांव लगता, शालिग्राम की मूर्ति के पास आकर

बड़ी श्रद्धा से स्नान करा के कहा करता था "ठाकुरजी! खात!" मगर उसे ठाकुरजी को स्नान कराने और पूजा करने की आज्ञा उसका नाना नहीं देता था। एक दिन उसके नाना को कहीं बाहर जाना था, और बिल्ली के भागों झींका टूटा। लड़के ने नाना से कहा "अब तो तुम जाते ही हो, तुम्हारे पीछे मैं ही ठाकुर पूजन करूंगा"। उसने कहा "अच्छा तू ही करना। लेकिन तू तो प्रातःकाल बिना हाथ मुंह धोये रोटी मांगता है, तेरे जैसा नादान पूजन क्या करेगा? अगर पूजन किया चाहता है, तो पहले ठाकुरजी को खिलाना और फिर स्वयं खाना"। खैर, नानाजी तो इतना कह कर चले गये। रात को मारे प्रेम के बालक को नींद न आई। बच्चा उठ कर अपनी माता से कहता था "प्रातःकाल कब होगा! ठाकुरजी का पूजन कब करूंगा?" प्रातःकाल होते ही बच्चा गंगाजी पर स्नान के लिये गया और स्नान के बाद उसकी माता ने ठाकुरजी के सिंहासन को उतार कर नीचे रख दिया, और बच्चे ने मूर्ति को निकाल कर गंगाजल के लोटे में भट दुबो दिया। फिर सिंहासन पर बैठा कर माता से दूध मांगने लगा कि "जल्दी दूध ला, जल्दी दूध ला, ठाकुरजी स्नान कर बैठे हैं और उनको भूख लगी है।" उसकी माता दूध का कटोरा लाई। बालक ने ठाकुरजी के आगे दूध रख दिया, और कहने लगा "महाराज पीजिये, दूध पीजिये।" उस परमात्मा ने दूध नहीं पिया। लड़का आंखें बन्द करके धीरे २ ओंठ हिलाने लगा और मुंह से 'राम राम' या 'ठाकुर ठाकुर' का नाम बड़ बड़ाने लगा इस विचार से कि मेरी इस भक्ति से प्रसन्न होकर तो ठाकुरजी जरूर दूध पीलेंगे। किन्तु बीच २ में आंखें खोल २ कर देखता

जाता था कि ठाकुरजी दूध पीने लगे या नहीं। बहुतेरा मंत्र पढ़ा, राम २ ठाकुर २ जी कहा, मगर दूध ठाकुरजी ने नहीं पिया। अन्त में थक कर बेचारा बालक नामदेव मारे भूख, प्यास, रात की थकावट, और निराशा के रोने लगा। हिचकियों का तार बंध गया। ओंठ सूख गये। हाय! अरे ठाकुर! आज तेरा दिल पत्थर का क्यों हो रहा है? क्यों नन्हे बच्चे की खातिर दूध नहीं पीता? ऐसे भोलेभाले बच्चे से भी कोई जिद करता है! सीमी बरी तो जानां लेकिन दिले तो संगस्त, दरसीम संग पिनहां दीदम न दीद बूदम। भावार्थः—ऐ प्यारे (माशूक़)! तू है तो चांदी के वदन वाला, लेकिन दिल तेरा पत्थर है। मैंने चांदी में पत्थर छिपा हुआ पहिले कभी न देखा था, पर अब देखा। हाय! चांदी के वदन में पत्थर का दिल कहां से आ गया? बेचारा बच्चा रोता हुआ निढाल हो रहा है। आंखों से नदियां बह रही हैं। रोते २ मूर्छा आ गई। लोगों ने गुलाब छिड़का। जब होश आया, लोगों ने समझाना चाहा कि "बस! अब तुम पीलो, ठाकुरजी नहीं पीया करते, वह केवल वासना के भूखे हैं।" बच्चे में अभी यह अकल (बुद्धि) नहीं आई थी कि परमेश्वर को भी झुठलावे। ठाकुर जी को धोखा देना नहीं सिखा था। वह नहीं जानता था कि झूठ मूठ भोग लगाया जाता है। बच्चा तो सच्चा था। सदाकत [सच्चाई] का पुतला था। मचल कर चिल्लाया कि अगर ठाकुर जी दूध नहीं पीते तो खाने पीने या जीने की परवाह हम को भी नहीं। नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः॥ मुर्ण्डक उप०।

"यह आत्मा बलहीन पुरुष को कभी प्राप्त नहीं होता"। हाय! नन्हे से नामदेव! तुझ में किस कदर ज़ोर है? कैसा आत्मबल है? इस नन्हे से बच्चे ने वह जिद जो बांधी तो एक लम्बा सा छुरा निकाल लाया [हिन्दुस्तान में उन दिनों हथियार रखने का प्रतिबंध नहीं था।] और अपने गले पर रख कर बोला:—"ठाकुर जी पियो, ठाकुर जी दूध पियो, नहीं तो मैं नहीं"। छुरा चल रहा था, गला कटने को था इतने में क्या देखते हैं कि ठाकुर जी एकदम मूर्तिमान होकर [प्रत्यक्ष हो कर] दूध पीने लगे। आप लोग कहेंगे कि यह गप्प है। राम कहता है कि आप लोगों का विश्वास कहां गया? राम अमेरिका में रह कर कालिजों में, अस्पतालों में, अपनी आंखों से ऐसे दृश्य देख आया है कि विश्वास की प्रेरणा [बल] से इस चौकी को जो आपके सामने है, घोड़ा दिखा सकते हैं। आत्मतत्वविद्या के अनुभवी इस प्रकार के प्रयोग को स्पष्टतः सच्चे सिद्ध कर रहे हैं, तो क्या सच्चे निष्पाप पूरे भक्त बेचारे नामदेव के विश्वास का बल ठाकुर जी को मूर्तिमान नहीं कर सकता था! परमेश्वर तो सर्वव्यापी है, परन्तु आत्मकृपा अर्थात् पूर्णविश्वास वह वस्तु है जिसके प्रभाव से परमेश्वर साक्षात् नहीं होते आकाश से, विदिश्त से, हज़ारवें स्वर्ग से, वैकुण्ठ से, गोलोक से, इस से भी परे से अर्थात् जहां भी हो वहां से खिंच कर आ सकता है। थामे हुए कलेजे को आओगे आपसे, मानोगे जज़्बे-दिल में भला क्यों असर नहीं। वह कौन सा उकदा है जो वा हो नहीं सकता, हिम्मत करे इन्सान तो क्या हो नहीं सकता।

कीड़ा ज़रासा और वह पत्थर में घर करे, इन्सां वह क्या जो न दिले-दिलबर में घर करे। ऐ मनुष्य, आपके अन्दर वह महान् धन और अनन्त शक्ति है कि उसका नियमित विकाश (आविर्भाव) ही देश, जगत् और परमात्मा तक को प्रसन्न करता है। ऐ नव-वसन्त के पुष्प! तू अपनी जात (स्वरूप) में प्रसन्न तो हो। इस निज का ऋण पूरा करने में तेरे बाकी सब ऋण पूरे हो जायंगे। पक्षी, मनुष्य और वायु तक सब खुश हो जायंगे। तो खुशी तो खूबी आ काने-खुशी, तो चिरा खुद मिन्नते—बादाकशी। भावार्थः—तू स्वयं आनन्द है, तू सुन्दर स्वरूप है, और तू आनन्द की कान है, फिर तू आसव [सुरा] का उपकार अपने ऊपर क्यों लादता है? अपना ऋण पूरा करने के साधन। स्काटलैंड के एक अनाथालय में एक लड़का पलता था बहुधा बच्चों के नियमानुसार यह बच्चा खिलाड़ी और नटखट भी था। एक दिन वह उस अनाथालय से भाग निकला और रास्ते के ग्रामों में रोटियां मांग २ कर गुज़ारा करते हुए लन्दन आ पहुँचा। वहां के सब से अधिक संपत्तिवान् लार्ड मेयर के बाग में घूमने लगा [लार्ड मेयर बहुधा ऐसे धनवान् होते हैं जिनसे अमीर लोग, राजा लोग और बादशाह लोग भी जरूरत के समय कर्ज लिया करते हैं] यह गरीब बच्चा बाग में टहल रहा था। एक बिल्ली को उसने दौड़ते पाया। उसके साथ वह खेलने लगा और निरर्थक बातें करने लगा। उसकी पीठ पर हाथ फेरता था, पूंछ खींचता था, और लड़कपन के तरंग में बिल्ली से कुछ

बातें करता था। पड़ोस में गिरजे का घड़ियाल बज रहा था। बच्चा बिल्ली से पूछता था, "यह पागल घड़ियाल क्या बकता है? कहो।" [पागल इस लिये कि घड़ियाल बहुधा कोई चार बजा कर बन्द हो जाता है, कोई आठ, दह बारह बजा कर तो अकसर रुक जाते हैं, मगर गिरजे का घड़ियाल बजता ही चला जाता है। पागल की तरह बन्द होता ही नज़र नहीं आता] बिल्ली बेचारी तो घड़ियाल के आवाज़ को क्या समझती? लड़का बिल्ली की तरफ से खुद ही जवाब देता था "टन, टन, टन, विटिंगटन, विटिंगटन," "[विटिंगटन उस लड़के का नाम था] घड़ियाल कहता है। टन, टन, टन, विटिंगटन, विटिंगटन. लार्ड मेयर आफ लन्दन"। ज़रा खयाल कीजियेगा, अनाथालय से भाग कर आया हुआ तो छोटा सा बालक और अपने स्वप्न कहां तक देखा रहा है! घड़ियाल की आवाज़ में भी अपने लार्ड मेयर होने के गीत सुन रहा है। वाह! "टन, टन, टन, विटिंगटन, विटिंगटन, लार्ड मेयर आफ लन्दन"। इतने में लार्ड मेयर साहब अपने बाग में हवाखोरी करते वहां आ निकले। बालक से पूछा—"अरे तू कौन है? और क्या बकता है?" लड़का मस्ती और आनन्दभरा जवाब देता है:—"लार्ड मेयर आफ लन्दन, लार्ड मेयर आफ लन्दन" बच्चे पर गुस्सा तो क्या आता, उलटी लड़के की वह स्वतंत्र अवस्था लार्ड मेयर के हृदय में खप गई। और स्वाधीनता किस दिल को प्यारी नहीं लगती? लार्ड मेयर ने पूछा, "स्कूल में दाखिल [प्रवेश] होना चाहता है? बच्चे ने जवाब दिया? "अगर शिक्षक मारा न करे तो"। वह लड़का स्कूल में दाखिल कराया गया। स्कूल में पढ़ते २ फिर क्रम से

कालिज की सब श्रेणियों को पास कर के सन्मानपूर्वक ग्रेज्युएट होगया। इतने में लार्ड मेयर के मरने का दिन आगया। बच्चे कोई सन्तान नहीं थी। लार्ड मेयर अपनी संपत्ति का बहुत सा भाग इस लड़के को दे मरा। यह बालक इस संपत्ति को बढ़ाते २ एक दिन खुद लार्ड मेयर आफ लन्दन ही हो गया। आप लार्ड मेयर की नामावली में इसका नाम पावेंगे। यह दुनिया और इसका आपके साथ वर्ताव, आपकी हिम्मत, और मनोभाव का जवाब है। विटिंगटन का बचपन में अपूर्व था और उसके दिल के भाव सच्चे और ऊंचे थे। इसको वैसा ही फल क्यों नहीं मिलता? जैसी मति वैसी गति होती है—यानतिश्चागतिर्भवेत्—जैसा दिल में मरोगे वैसा पाओगे। जैसा अपने विचारभूमि में बोवोगे, वैसा बाहर काटोगे। चीन में एक विद्यार्थी बहुत ही गरीब था। रात को पढ़ने के लिये उसे तेल भी प्राप्त न होता था। जुगनू [खद्योत] को इकट्ठे करके एक पतले मलमल के कपड़े में बांधकर किताब के ऊपर रख दिया करता और उसकी चमक में पढ़ा करता था। किसी ने कहा कि इतना परिश्रम क्यों करता है "क्या चीन के वज़ीर हो जावेगा?" उसने उत्तर दिया कि "यदि विद्याबल के विषय में मशहूर के नियम सच्चे हैं तो एक दिन मैं अवश्य वज़ीर हो जाऊंगा"। चीन के इतिहास में देखिये कि एक वह दिन आया कि यही लड़का वज़ीर बन गया! 'तज़किरा आवेह्याब' नाम की पुस्तक में प्रोफेसर आज़ाद ने एक आश्चर्यजनक घटना लिखी है। एक दिन लखनऊ में एक शायर (कवि) नवाब साहब वज़ीरदीवान

और उनके साथियों को अपने शेरों (कविता) से प्रसन्न कर रहा था। महल में नवाब साहब विलम्ब से पहुँचे। बेगमों ने पूछा कि विलम्ब क्यों हुआ। नवाब साहब ने फरमाया कि अद्भुत चुटकुले और शेर व सुखन सुनते रहे। बेगमों ने कहा कि हमको भी सुनवाइयेगा। दूसरे दिन पर्दा किया गया, और शायर को बुलवाया गया। बेगमें बहुत ही प्रसन्न हुईं और आज्ञा दी कि महल में एक कमरा इसको रहने के लिये दिया जाय। शायर (कवि) भांप (ताड़) गया कि अगर मैं महल में रहूँगा तो इस विचार से कि मैं बेगमों को देख सकूँगा नवाब साहब को अच्छा नहीं लगेगा। नवाब साहब को सोच में देख कर शायर ने खुद शिकायत की कि "और तो मैं सब बातों में अच्छा हूँ, मगर केवल एक ही बात की कसर है, मुझको बिलकुल दिखलाई नहीं देता। आँखों से बेकार हूँ।" शायर की यह शिकायत सफल हुई, बहाना ठीक उतरा, और नवाब साहब के दिल में जो खटका था वह दूर हो गया और दे दी कि महल में एक कमरा इसे रहने को दिया जाय। मगर [नापाक] [मलिन चित्त] शायर झूठ मूठ यह धोखा दे रहा था कि मैं अन्धा हूँ। दिल में यह बुरी नियत भरी थी कि इस बहाने से बेखटके बेगमों और औरतों को पड़ा भाँकूँ। परन्तु धोखा तो अन्त में अपने आपके सिवा और किसी को भी देना सम्भव नहीं और बुराई में सफलता तो मानो विषभरी मदिरा है। एक दिन शायर शौच जाना चाहता था। दासी से पानी का लोटा माँगा उसने कहा "कमरे में लोटा नहीं है, कहाँ से लाऊँ?" [यह साधारण नियम है कि नौकर लोग ऐसे

मेहमानों से दिक्क आ जाते हैं।] शायर को जल्दी लगी थी; रहा न गया, सहज बोल उठा "देखती नहीं है? वह क्यों लोटा पड़ा हुआ है।" सत्य भला कहाँ तक छिपे। यह सुनते ही दासी भागी और बेगम साहिबा के पास पहुँच कर कहा कि "यह मुआ तो देखता है, अन्धा नहीं है। अपने तई झूठ मूठ अन्धा बताता है।" उसी दिन वह महल से निकाल दिया गया। परन्तु कहते हैं कि दूसरे ही दिन वह सचमुच अन्धा हो गया। कैसा उपदेशजनक दृष्टान्त है। जैसा तुम कहोगे और विचार करोगे वैसा ही होना पड़ेगा। गर दर्द दिले तो गुल गुज़रद गुलख्वाशी, वर बुलबुले बेकरार बुलबुल वाशी। भावार्थ—अगर तेरे दिल में पुष्प [शुभ विचार] गुज़रेंगे तो तू पुष्प (शुभ चित्त) होजायगा और यदि अशान्त चित्त बुलबुल, तो तू बुलबुल (अशान्त चित्त) हो जायगा। सौदाये-बला रंज बला मी आरद, अन्देशए-कुल पेशाकुनी कुलवाशी। भावार्थः—बला का खफ़कान (विपत्ति का निरन्तर सोच) बला और रंज लाता है, और जब तू सब के हित का फिक्र करेगा तो तू सर्वमय होजायगा। बाल्यावस्था में बहुधा देखा होगा कि कुछ बालक आँखें बन्द करके अन्धे होकर उलटे चला करते थे। उनकी मातायें यह देख कर उनको मारती थीं और रोका करती थीं कि अच्छी अच्छी मुरादें माँगो। अन्धों के स्वांग भरते हो, कहीं अन्धे ही न हो जाओ। सच कहा है:— कृष्ण कृष्ण मैं करती थी तो मैं ही कृष्ण होगई। मीरां०

आपने देख लिया, अन्धा कहने से अन्धा, वज़ीर के ध्यान से वज़ीर लार्ड मेयर के खयाल से लार्ड मेयर बन जाते हैं। पस अपनी मदद आप करने के लिये, अपनी तरफ अपना ऋण आप पूरा करने के लिये सब से आवश्यक बात आप लोगों के लिये है विचारों की पवित्रता, उत्साह की वृद्धि, शुभ संस्कार, निर्मल भाव और "मैं सब कुछ कर सकता हूँ" ऐसा उच्च विचार, अविरत उद्योग और धैर्य। गर बफ़के मानिन्द सद्कोहे—सेह्नत रोज़गार, चीने पेशानी नवीनद गोश्ये—अब्रुए-मां। भावार्थः—यदि समय हमारे सिर पर परिश्रम के सैकड़ों पर्वत रख डाले, तो भी हमारी भौं (अब्रू) का कोना हमारे माथे के बल को नहीं देखेगा। गरांच सफुर जगह से टल तो टल जाये, हिमालय स्वाद की ठोकर से गो फिसल जाये, गरचि ज़हर भी जुगनू की दुम से जल जाये, और आफ़ताब भी एकबल उखज ढल जाये, कभी न साहबे-हिम्मत का हौसला टूटे, कभी न भूले से अपनी दहर्री पर बल जाये। उच्च शूरवीरता—उन्नत विचार का यह अर्थ न समझ लें कि अपने तईं तो तीसमारखां ठान लें और औरों को तुच्छ मानने लगें। कदापि नहीं। बल्कि अपने तईं नेक और बड़ा बनाने के लिये औरों की केवल नेकी और बड़ाई ही को दिल में स्थान देना उचित है। बुद्ध भगवान् कहा करते थेः— जैसा कोई खयाल करेगा, हो जायगा। उनके पास दो मनुष्य ───────── (1) ध्रुव। (2) वायु। (3) समुद्र। (4) सूर्य। (5) उदय काल से पूर्व। (6) मस्तक (पेशानी)।

आये। एकने पूछा कि "महाराज, यह जो मेरा साथी है दूसरे जन्म में इसका क्या हाल होगा? यह तो कुत्ते के खयाल रखता है, कुत्ते से काम करता है, क्या अगले जन्म में कुत्ता न बनेगा?" दूसरा पहले के विषय में कहता है कि "यह मेरा साथी हर बात में बिल्ला है। क्या अगले जन्म में यह बिल्ला न होगा?" "महात्मा बोले कि" भाई, जैसे संस्कार (खयाल) होंगे, वैसे ही तुमको फल मिलेंगे। लेकिन तुम लोग इस सिद्धान्त को गलती से लगा रहे हो। वह तुमको बिल्ला कह रहा है, तुम उसको कुत्ता। अब विचार करना वह मनुष्य जो अपने साथी को कुत्ता देखता है, उसका अपना दिल, कुत्ते की सूरत पकड़ रहा है। वह खुद ऐसे खयाल से कुत्ते के संस्कार धारण करता जाता है। पस जब ऐसा मनुष्य मरेगा तो उसके अन्तःकरण में कुत्ता समा रहा है, अतएव वह स्वयं कुत्ता बनेगा। और इसी तरह अपने पड़ौसी को बिल्ला समझने वाला खुद बिल्ला बनेगा। इस सिद्धान्त को विचार से देखना। वह दोष जो हम औरों में लगाते हैं, वह हम में जरूर प्रवेश होंगे। राम कहता है कि अपनी मदद आप करने के लिये आत्मरूपा इस बात की इच्छुक है, कि हम लोग औरों के छिद्र निकालना छोड़ दें और अपने सम्बन्ध में भी विचार के समय सिवाय नेकी और खूबी के और कुछ विचार न आने दें। जैसे गुम्बज़ से हमारी ही आवाज़ लौट कर आती हुई गूँज बन जाती है, वैसे इस गुम्बज़े नीलोफ़री (आकाश-ब्रह्मांड) के नीचे हमारे ही संस्कार लौट कर असर करते हुए प्रारब्ध कहलाते हैं। शब्द न सोचे रे—गरदूँगर कोई मेरी सुने, ───────── (1) बुराई (2) आकाश तले।

है यह गुम्बज़ की (1)सदा जैसी कहे वैसी सुने। अपने विचारों को ठीक रक्खो। व्यर्थ आकाश को कुमार्गी (कुढंगा) और चढ़े (चाँद) को टेढ़े चलनवाला कहना बच्चों की तरह गुम्बज़ को दोष लगाना है। अगर सब कुछ कहीं बाहर ही की भारंभ से है तो शास्त्र विधि-निषेध के वाक्य को जगह न देता। जब शास्त्र यह जानता था कि तुम्हारे स्वाधीन कुछ नहीं है, सब कुछ प्रारब्ध ही है, तो शास्त्र ने क्यों कहा कि "यूँ करो और यूँ न करो" और तुम पर जवाब—देही (उत्तरदायित्व) किस दलील से लगाई गई। दरम्याने—फारे—दर्यो तख्त बन्दम करदई। मार्ज़मी गोई कि दामन तर मकुन तुशियार बाश॥ अर्थात् नदी के भारी वेग के बीच तूने मुझको बन्द किया हुआ है, और तत्पश्चात् तू यह कहता है कि खबरदार अपना पल्ला मत भिगोना। तुम्हारे अन्दर वह शक्ति है, कि जो चाहो कर सकते हो। और सब पूछते हो तो राम कहता है :— मैं ने माना समुद्र को समुद्र ने किया पैदा अवल, मैं वह मखलिक़ हूँ मेरी शक्ल से खुदा पैदा हुआ। * * * * पौरुषा दृश्यते सिद्धिः पौरुषा धीमतां क्रमः। दैवमाश्वासना मात्रं दुःख केवल बुद्धिषु॥ अर्थात्—पुरुषार्थ से सिद्धि होती है और बुद्धिमानों का व्यवहार पुरुषार्थ से ही चलता है। दैवयोग (प्रारब्ध) का शब्द तो बुद्धिमानों में दुःख के समय कोमल चित्त पुरुषों के ───────── (1) आवाज। (2) संसार। (3) ईश्वर। (4) किन्तु। (5) प्रजापति। (6) कहने, आज्ञा।

केवल आंसू पोंछने के लिये हैं। परमेश्वर उनकी सहायता करने को हाज़िर खड़ा है जो अपनी सहायता आप करने को तैयार हों। यह कानून कुदरती है। प्रकृति का यह अटल नियम है कि जब मनुष्य पूरा अधिकारी होगा तो जो उसका अधिकार है अपने आप उसको ढूंढ लेगा। यहां आग जल रही है। प्राणवायु (oxygen) खिंच कर उसके पास आ जायगी। अंग्रेज़ी में एक कहावत है कि "पहले तुम योग्य वा अधिकारी बनो फिर इच्छा करो—First deserve and then desire" राम कहता है कि जब तुम योग्य वा अधिकारी होंगे तो इच्छा किये बिना ही मुराद आ मिलेगा। बांधे हुए हाथों को बउम्मेदे-इजाबत, रहते हैं खड़े सैकड़ों मज़मूँ मेरे आगे। "जो पत्थर दीवार में लगने के लायक है वह बाज़ार में कब रहने पायगा—The stone that is fit for the wall cannot be found in the way" जब आप पूरे अधिकारी होंगे तो आपके योग्य पदवी है और आप हैं, पदवी की तलाश में समय मत नाश करो। अपने तईं योग्य वा अधिकारी बनाने की फिक्र करो। नाखुने—खार आके खुद उकदा तेरा कर देगा वा, पहिले पाये—शौक में पैदा कोई छाला तो हो। अर्थात्ः—कांटे का नाखून अर्थात् नख अपने आप आकर तेरे हृदय की गांठ खोल देगा, पर पहले जिज्ञासा रूपी चरणों में कोई छाला तो हो। जब सूर्य की ओर मुँह करके चलते हो तो साया पीछे भागता फिरता है, जब साया को पकड़ने दौड़ोगे तो साया

आगे हटता चला जायगा। भागनी फिरती थी दुनियां जब तलब करते थे हम, अब तो नफ़रत हमने की वह बेकरार आने को है। * * * * * गुज़श्तम अज़ सरे-मतलब तमाम शुद मतलब, नकाब चिहरा-ए-मक़सूद बुवद मतलब हा। अर्थात् जब मैं इच्छाओं से परे गया तो इच्छायें स्वतः शान्त होगईं। बहुत सी इच्छाओं में वास्तविक स्वरूप का मुख ढका हुआ था, (या बहुत सी इच्छायें वास्तविक स्वरूप के मुख का पर्दा बनी हुई थीं)। भिखमंगों को हर कोई दूर २ करता है, तृप्तात्मा के पास स्वयं नमस्कार करने अर्थात् झुकने को आती हैं। सौ बार गर्ज़ होवे तो धो पिये कदम, क्यों रचखों-मेहरो-माह पै मायल हुआ है तू। जापान में तीन २ सौ चार २ सौ साल के पुराने चीड़ और देवदार के वृक्ष देखे, जो केवल एक २ बालिश्त (कर) के बराबर या कुछ अधिक ऊंचे थे। आप खयाल करें कि देवदार के वृक्ष कितने बड़े होते हैं। मगर क्या कारण कि इन वृक्षों को सदियों तक बढ़ने से रोक देते हैं। पूछने पर लोगों ने कहा कि हम इन वृक्षों के पत्तों और शाखाओं को बिलकुल नहीं छूते किन्तु जड़ काटते रहते हैं, नीचे बढ़ने नहीं देते। और यह नियम है कि जब जड़ नीचे नहीं जायगी तो वृक्ष ऊपर नहीं बढ़ेगा। ऊपर और नीचे (या अन्दर और बाहर) दोनों में इस प्रकार का सम्बन्ध है कि जो लोग ऊपर बढ़ना चाहते हैं दुनियां में फलना फुलना चाहते हैं, ───────── (1) चरण (2) आकाश, सूर्य, और चन्द्र।

उन्हें नीचे अपने भीतर अन्तरात्मा में जड़ बढ़ानी चाहिये। अन्दर अगर जड़ न बढ़ेगा तो वृक्ष ऊपर भी न फलेगा। नफ़स बने चो फिरोशुद बलन्द मी गरदद, अर्थात् बांसुरी में जितनी सांस नीचे उतरती है, उतना शब्द ऊंचा होता है। मन्सूर से पूछी किसी से (1)कूवाये-दिलबर की राह, खुम साफ दिल में राह बतलाती रजुवाने-दार है। * * * * सर हमचो तारे-सबह बसद दुर कशीदाम, आखिर रसीदाम बखुद आरमां दाप्म। अर्थात् माला के डोरे के समान हमने अपने सिर को सौ दानों के अन्दर खींचा। अन्त में जब अपने तक पहुँच तो वहीं ठहर गये। आत्मरूपा (अपने आपकी तरफ फर्ज़) जो राम कहता रहा है उसके अर्थ किसी प्रकार की खुदी (अहंकार), खुद पसन्दी [अहंकार प्रियता], या खुदगर्ज़ी [स्वार्थपरायणता] नहीं है। इसके अर्थ हैं आत्मोन्नति। और आत्मोन्नति वा आत्मरूपा का मुख्य अंग है चित्त की विशालता अर्थात् चित्त की शुद्धि का इस दर्जे तक उत्पन्न करना कि हमारी आत्मा देश भर की आत्मा का नक्शा हो जाय, जगत् के दिखलाने वाले शीशे का काम देने लग पड़े। देश भर की जरूरतों को हम अपनी निजी जरूरत मान [अनुभव] करने लग पड़ें। और जब लोगों की राए में हम सारे भारत वर्ष या जगत् भर के भला का काम कर रहे हों, पर हमें वह काम केवल निज का काम मालूम दे पर अपने चित्त को ऐसा ───────── (1) प्रियात्मा की गली का मार्ग। (2) सूली की नोक।

विशाल या उदार और बड़ा करते जाना कि यह चित्त सारी कौम का चित्त हो जाय, यह आत्मोन्नति है। जाती तरक्की का लक्ष्य है, सब के साथ ऐसी सहानुभूति कि खूँ रंग-मजनूँ से निकला फ़स्द लैली की जो ली, अर्थात् प्रियात्मा लैली की जब नाड़ी काटी गई तो प्यारे मजनूँ की नाड़ी से रुधिर निकल आया। इश्क़ में तासीर है पर अज्व-कामल चाहिये। प्रेम में ऐसा प्रभाव अवश्य है पर ऐसे प्रभाव के लिये पूर्ण प्रेम चाहिये। पत्ती को फूल की लगा सदमा नसीम का, शबनम का कतरा आँखों में उसकी नज़र पड़ा। अर्थात्—मृदु पवन से चोट तो पुष्प की पत्ति को लगी, परन्तु उस अभेदात्मा प्यारे के नेत्रों में आँसू दिखाई देने लग पड़े। जो राम ने कहा है आत्मबल वह अन्य शब्दों में ईश्वर-बल ही है, आपका वास्तविक स्वरूप है, वह सबका स्वरूप है और वही वास्तव में ईश्वर का स्वरूप है। मानूरे-खुदायेम दरीं खाना फ़ितादा, मा आबे-हयातेम दरीं जूए खानेम। अर्थात्—हम ईश्वर का प्रकाश हैं, जो इस शरीररूपी घर में व्याप्त है। हम वह अमृत हैं जो इस देहरूपी नगर में बहता है। यह नामरूप इस वास्तव स्वरूप की निर्मूल छाया के समान है। अपने तईं नामरूप ठानकर जो काम किया जाता है, वह अहंकार और स्वार्थवृत्ति का उफसाया हुआ होता है और उसका परिणाम दुःख और धोखा होता है। परन्तु

जो काम निजानन्द और अभेदता में होता है, अर्थात् जो काम विश्वात्मा की दृष्टि से किया जाता है वह खुदी (अहंकार) से नहीं बल्कि खुदाई (ईश्वरभाव) से होता है और उसका फल सदा शान्ति और कार्यसिद्धि होगा। सारे व्याख्यान का तात्पर्य यह है कि खुदी [अहंकार] के स्थान पर खुदाई [ईश्वर भाव] की आंख से सब सम्बन्धों को देखो और नामरूप में लंगर डाल बैठने के स्थान पर निज स्वरूप में घर करो। बहुत मज़बूत घर है आख़ेरत का इस-दुनिया से, उठा लेना यहां से अपनी दौलत और वहां रखना। जो पुरुष नामरूप के आधार पर कारोबार का सिलसिला चला रहा है, वह वायु की नींव पर किला बनाना चाहता है। जीता वही है जो सांसारिक उन्नति व वैभव, अपकीर्ति व अवनति आदि को जलबुद्बुदवत् या मेघमंडल के छाया सदृश मानता है और इनका आश्रय नहीं करता। सायः गर साये-कोहस्त सुबुक मी बाशद, अर्थात्—छाया यदि पर्वत की छाया हो तो भी तुच्छ ही होती है। आंखो वाला केवल वही है जिसकी दृष्टि बाह्य जगत को चीर कर पदार्थों की स्थिरता व अस्थिरता पर न जमकर, और लोगों की चमकी और प्रशंसा को काट कर एक तत्त्व पर जमी रहती है। "नहीं है कुछ भी सिवाय अल्लाह के"। ब्रह्म ही सत्य है जगत मिथ्या है। सचेत केवल वही है जो हर समय उत्तम स्वरूप, सुन्दर स्वरूप अर्थात् वास्तव स्वरूप को ───────── (1) परलोक वा निजघर (2) यह लोक, संसार।

देखता हुआ आश्चर्य की मूर्ति हो रहा है, वा आश्चर्यस्वरूप बन रहा है। काश देखो, मुझे मुझे देखो। हर सरे मूसे चश्मे-हैरत हो॥ खुर गया जिसके दिल में हुस्न मेरा। दंग सकते का एक आलम था॥ अर्थात्—ईश्वर करे कि आप मुझे अवश्य देखें, और रोम २ से आप आंख भौंचक्का (विस्मित) हों। जिसके चित्त में मेरी छवि समा गई उसके ह्रां मूर्च्छावत् विस्मय दशा व्याप्त हो गई। स्वप्न में किसी को धन मिला। इस धन के आधार से जो धनी बने वह मूर्ख है। इसी प्रकार इस स्वप्नरूप संसार की वस्तुओं के आधार पर जो जीता है, वह जीता ही मरगया। मुख्य धर्म [फ़ैज़उला] और आत्मरूपा की पूर्णता यही है कि तू को इतना मिटा कि तू न रहे, और तुझमें +दूई की बू न रहे। यह परिच्छिन्न अहंकार तथा स्वार्थ इसका नाम तक मिट जाय, निशान तक न रहने पाय। तो मबाश असला! कमाली नस्तोवस, तु खुद हिजाबे-खुदी से दिल! अज़मियां बरखेज़। न दारे आख़रत नैदारे-दुनियां दरनज़र आरम, जि इश्क़ त कारचूँ मन्सूर वादार दिगर दारम। अर्थात्-ऐ प्यारे, तुझ में तू न रहे यही पूर्णता है। ऐ दिल! तू अपना पर्दा आप है. बीच से उठ जा। मेरी दृष्टि ───────── + द्वैत।

में न लोक है, न परलोक। मन्सूर के समान तेरे प्रेम से दूसरे की सूली से काम रखता हूँ। अहंकार (परिच्छिन्न भावना) को स्थिर रखकर जो बड़े बनते हैं, फ़रऊन वा नमरूद हैं। परिच्छिन्नता को मिटानेवाला स्वयं ईश्वर, शिवोऽहम्, है। रस्सी में किसी को सांप का भ्रम हो गया। अब अगर उसके लिये रस्सी है तो सांप नहीं और सांप है तो रस्सी नहीं। एक ही रहेगा। खुदी है तो खुदाई नहीं, खुदाई है तो खुदी नहीं। तीरे-निगाह निश्स्त मसकने खुद जां गुज़ारत, ताकते मेहमां न दाश्त खाना न मेहमा गुज़ारत। ताशाना सिफ़त सर न निही दर तहे-अर्श, हरामिज़ व सरे-ज़ुल्फ़-निगारे न रसी। अर्थात्—प्यारे की दृष्टि का तीर बैठते ही जान (प्राण) ने अपना स्थान छोड़ दिया। अतिथिसत्कार की शक्ति न रखने के कारण अतिथि के लिये अपना घर छोड़ दिया। कंघी के समान जब तक तू अपने अहंकाररूपी सिर को ज्ञानरूपी आरा के नीचे नहीं रखेगा तब तक तू प्यारे के सिर के बालों को भी नहीं प्राप्त हो सकेगा। जब तक कंघी की तरह सिर आरा के नीचे न रखोगे यार की ज़ुल्फ़ तक नहीं पहुँच सकते। ता सुमा सिफ़त सुदह न गर्दी तहे-संग, हर्गिज़ व सफ़ा चश्मे-निगारे न रसी। अर्थात्ः—जब तक सुरमा की तरह पत्थर तले पीस न लोगे, असली यार की आंखों तक नहीं पहुँच सकते। अगर कहो कि आंखें नहीं तो यार के कानों तक ही किसी तरह

पहुँच हो जाय तो भी जब तक स्वार्थपरायणता दूर न होगी, जबतक यह अहंकार मर न लेगा, जबतक खुदी गुम न होगी, यार के कानों तक नहीं पहुँच सकते। क्योंकि कान में रहता है, मोती. ज़रा उसकी दशा देख लो। ताहम यो दुर-सुफ़्ता नगरदी वातार, हरगिज़ वदिना गोशे-निगारे न रसी। अर्थात्—जब तक मोती की तरह तार से न छिदोगे यार के कान तक भी कदापि नहीं पहुँच सकते। ता खाके तुरा कूज़ा न सांज़न्द फ़लालां, हरगिज़ बलब-लाल-निगारे न रसी। * * * पस अज़ मुर्दन बनाये जायंगे सागर मेरी गिलके, लबे-जानां के बोसे ख़ूब लेंगे खाक में मिलके। अर्थात्—कुम्भार (ज्ञानवान्) जब तक तेरी अहंकाररूपी मिट्टी के आबखोरे न बना लेंगे तब तक प्यारे के लाल ओंठ तक तू पहुँच न सकेगा। मृत्यु के बाद मेरी मिट्टी के आबख़ोरे (प्याले) बनाये जायंगे, तब हम मिट्टी में मिल कर प्यारे के ओंठ खूब चूमेंगे। इन कविताओं में आंख, कान, ओंठ, आदि से यह आशय नहीं है ऐसे एक ही प्रियात्मा को प्रसन्न करने के लिये उसके कान को राग सुना सकते हैं, या उसकी आंख को सुन्दर रूप दिखा सकते हैं, या नाक को फूल सुंघा सकते हैं। कोई किसी उपाय से इस प्यारे को प्रसन्न कर सकता है, कोई किसी दूसरे उपाय से। लेकिन कोई उपाय ऐसा नहीं कि जिसमें बाह्य अहंकार की मृत्यु के बिना काम निकल सके। निःसन्देह कोई वैष्णव बन कर परमेश्वर को पूज सकता है.

कोई शैव रह कर भक्ति कर सकता है। कोई मुसलमान की अवस्था में पूजा करे। कोई ईसाई की हालत में प्रार्थना करे, लेकिन वैष्णव, शैव, मुसलमान, ईसाई, कोई हो, सिद्धि अर्थात् तत्वदर्शन तभी होगा जब परिच्छिन्नता का मृत्यु (अन्त) हो जायगा। अगर कहो कि बाल आंख कान और ओंठ तक नहीं तो ईश्वर करे, प्यारे के हाथ तक ही तुम पहुंच लिये होते, तो ता हमचो कलम सर न निही दरतहे-कारद, हर्गिज़ व सर-अंगुश्ते-निगारे न रसी। अर्थात् जब तक लेखिनी के समान सिर चाकु के नीचे न रख लोगे कदापि प्यारे की उंगलियों तक नहीं पहुँच सकते। अगर कहो कि हमें सब से नीचे रहना स्वीकार है। प्यारे के चरण तक ही पहुँच हो जाय तो, ता हमचो हिना सुदहन गर्दी तहे-संग, हर्गिज़ व कफ़े-पाये-निगारे न-रसी। अर्थात् जब तक मेंहदी के समान पत्थर के नीचे पिसे न जाओ, तबतक प्यारे के पांव तक कदापि नहीं पहुँच सकते। अलगर्ज़। ता गुल शुदा वे चुरीदा न गर्दी अज़शाख, हर्गिज़ बगुले-हुस्ने-निगारे न रसी। अर्थात्—जब तक फुल की तरह शाख के संबंधो से काटे न जाओगे यार तक किसी सूरत से पहुँच नहीं सकते। वांशुरी से पूछा, "अरी वांशुरी, क्या बात है कि वह कृष्ण, वह प्यारा मुरली मनोहर, जिसके पलकों के इशारे से राजाधिराज कांपते हैं, भीष्म, अर्जुन, दुर्योधन समान नृपतिगण जिसके चरणों को छूने के भूखे प्यासे हैं, जिसकी चरण

रज अभी तक राजा महाराजा लोग जाकर मस्तक पर धारण करते हैं. और चन्द्रमुखी गौरांगना जिसके मधुर हास्य (मृदु मुस्कान) को देखने के लिये तरसते हैं, वह कृष्ण तुमको चाह और प्यार से खुद बारंबार चूमता है? एक ज़रासी घांस की लकड़ी, तूने ऐसे भगवान् कृष्ण पर क्या जादू डाला? तुम में यह करामात कहां से आ गई? वांशुरी ने उत्तर दिया कि "मैं सिर से लेकर पांवों तक (अपनी परिच्छिन्नता, अहंकार को दूर करके) बीच से खाली हो गई। फल यह मिला कि वह कृष्ण स्वयं आकर मुझे चूमता है। जिसके चरणों में चूमने को लोग तरसते हैं वह शौक से मुझे चूमता है। मुझ से चित्ताकर्षक स्वर फिर क्यों न निकलें? मुझ में राम का दम (श्वास) है, मेरी सुरें उसकी सुरें हैं। तही ज़ खुद चो नै शौक़ पाता सरे-खुद, वगरना घोसे-लबे-लाल-नारे आसां नेस्त। भावार्थः—बांसुरी के समान तुम सिर से पांवों तक अहंकार से खाली हो जाओ, नहीं तो बांसुरी बजानेवाले प्यारे के ओठों का चुम्बन मिलना सुगम नहीं है। धीराः प्रेत्यास्मालोकादमृता भवन्ति। उप० धीर पुरुष इस संसार से मुँह मोड़ कर अमृत को पाते हैं। ॐ। ॐ।। ॐ।।।