श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

प्रेरणा का स्वरूप ।

भाग 6 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 6 · अध्याय 1 / 5

प्रेरणा का स्वरूप ।

( ता० 21 फरवरी 1903 को स्वामी राम का दिया हुआ व्याख्यान )

भारत में एक सभा में बुद्धिमान लोग, बड़े बुद्धिमान लोग उपस्थित थे, और हिन्दू धर्म-ग्रन्थों से पवित्र वचन पढ़े जा रहे थे । आचार्यों द्वारा जब उन वचनों की व्याख्या हो चुकी और सभा का विसर्जन होनेवाला था तो एक श्रोता ने एक महात्मा का ज़िक्र किया, जो नगर में पधारा था और नदी-तट पर ठहरा था, और उसकी बड़ी ही प्रशंसा की । इस महात्मा का अधिक हाल जानने के लिये लोग स्वभावतः बहुत उत्सुक हुए । एक तोता इस बातचीत को सुन रहा था, अथवा यह कह लीजिये कि एक गुलाम नगर

में आने वाले महात्मा के सम्बन्ध की यह बातचीत सुन रहा था। जो भलामानुस महात्मा की चर्चा कर रहा था उससे पिंजड़े में बन्द तोते या गुलाम ने कहा, कि जाइये और मेरे छुटकारे का अव्यर्थ उपाय उस महात्मा से पूछ आइये। जिस भलेमानुस से पहले महात्मा से भेंट हुई थी वह ऐसे समय पर महात्मा के पास पहुँचा जब वह नदी में स्नान कर रहा था और यह प्रश्न किया, 'पिंजड़े में बन्द उस पक्षी, तोते या मान लीजिये, उस विशेष मनुष्य का छुटकारा कैसे हो सकता है ? वह कैसे छूट सकता है ?''

जब प्रश्न किया गया था, ठीक उसी समय महात्मा तेज धारा में बह जाते दिखाई पड़ा। नगर निवासियों ने उसे मरा हुआ देखा। महात्मा की यह दशा देखने वाले लोग चकित होगये और उन्होंने प्रश्नकर्त्ता या तोते अथवा गुलाम का सन्देश लानेवाले मनुष्य को बहुत डाँटा-डपटा। लोगों ने समझा कि पिंजड़े में क़ैद तोते या बन्द गुलाम की हालत पर रहम खाने के कारण महात्मा मूर्छित या बेहोश होगया है। जान यह पड़ा कि महात्मा को उस दिन चेत नहीं हुआ। दूसरे दिन फिर जब उस स्थान पर सभा हुई जहाँ पिंजड़े में पड़ी चिड़िया या बन्द गुलाम था तब तोते या गुलाम ने महात्मा से भेंट करने वाले भलेमानुस से पूछा, हमारा सन्देश कहा था ? उस भले मानुस ने जवाब दिया कि तुम्हारा सन्देश कह दिया गया था, और साथ ही कहा कि पिंजड़े में क़ैद तोते जैसे अभागे या बँधे हुए गुलाम सरीखे दुखिया का संदेश ले जाने के लिये मुझे खेद है। तोते या गुलाम ने पूछा कि आप खिन्न क्यों हैं ? भद्र पुरुष ने कहा कि सन्देश सुनते ही महात्मा को मूर्छा आगई। सब लोगों को आश्चर्य होने लगा, चकित हुए, कि यह मामला क्या है। किन्तु तोते

या गुलाम ने सब भेद समझा दिया। तोता या आप कह सकते हैं, गुलाम बुद्धिमान नहीं था। किन्तु यह बात सुनते ही तोते को भी मूर्छा आगई। उस के मूर्छा आगई और देखने में वह मर ही गया। देखने वाले चकित होगये कि अद्भुत संदेश था, जिसके कारण दो की मृत्यु हुई। महात्मा के पास सन्देश पहुँचा तब तो वह मरा. और जब तोते या गुलाम को इसकी खबर दी गई तब गुलाम मरा। क्या आप जानते हैं कि इसके बाद क्या हुआ ? जब पास के लोगों ने देखा कि तोता मर गया तब उसे पिंजड़े में डाले रखना उन्हों ने मुनासिब नहीं समझा। उन्होंने पिंजड़ा खोल दिया और तुरन्त तोता उड़ कर बाहर आया और बोला, पवित्र धर्म ग्रन्थों को सुनने के लिये यहाँ नित्य एकत्र होने वाले ऐ सभ्यो ! ऐ लोगो ! तुम नहीं जानते कि मुक्ति, अनुभव, ईश्वरीय प्रेरणा की प्राप्ति कैसे हो सकती है। महात्मा से मेरे संदेश का जो उत्तर मिला उससे मैं ने आज वह (मुक्ति का) उपाय सीखा है। महात्मा को मूर्छा नहीं आई थी। मूर्छित होकर, बेहोश होकर महात्मा ने मानो मुझे अनुभव का उपाय बताया था, मेरे सन्देश का उत्तर दिया था। मुक्ति का मार्ग, अनुभव की विधि जाहिर में मृत्यु है। उसके सिवाय किसी और तरह, बलिदान की अपेक्षा किसी अन्य सरल उपाय से प्रेरणा (ईश्वरीय सन्देश) की प्राप्ति नहीं हो सकती।

आत्मानुभव का उपाय है देहाध्यास से उपर उठना, आध्यात्मिक रूप से उस अवस्था में प्राप्त होना, आन्तरिक मुक्ति की उस दशा में पहुँच जाना, जहाँ शरीर मानो मृतक है, जहाँ क्षुद्र व्यक्तित्व अचेतन है, बिलकुल बेपता है, बिलकुल पीछे छूट गया है, यही नित्य जीवन का मार्ग है।

संस्कृत में दो शब्द बड़े मार्के के हैं, एक भोग और दूसरा योग। आप लोगों में से अधिकांश योग शब्द से परिचित हैं। शायद आपने योग का प्रतियोगी भोग शब्द भी पढ़ा हो। भोग का शाब्दिक अर्थ है ग्रहण और योग का अर्थ है त्याग। लोग इस संसार में भोग की चर्चा बहुत करते हैं। सुख-भोग क्या है ? सुख-भोग की यदि आप परीक्षा करें, विश्लेषण Analysis करें तो आप उसे योग अर्थात् त्याग के सिवाय और कुछ नहीं पावेंगे। बिना त्याग के वास्तविक भोग नहीं है, बिना त्याग के (दैवी) प्रेरणा कहाँ, बिना त्याग के प्रार्थना नहीं। क्षुद्र व्यक्तित्व को प्रसन्नता पूर्वक बनाये रखना और आत्मभोग, ये दोनों बातें साथ नहीं हो सकतीं। जिस क्षण जहाँ प्रसन्नता होती है उस क्षण वहाँ भोग करने वाला स्वयं नहीं होता। जिस क्षण जहाँ प्रेरणा होती है वहां 'मैं जानता हूं' और 'मैं यह करता हूँ' का भाव नहीं उपस्थित रह सकता। बड़े २ आचायों ने यही इस सम्बन्ध में बतलाया है। जो मनुष्य अपने आप पर स्वामी है उसका काव्य के द्वार पर खटखटाना व्यर्थ है। तुम ऐसी दशा में नहीं हो सकते कि कविता भी रचो और उसका मज़ा भी लूटो। ऐसा नहीं हो सकता तुम अपने आप पर स्वामी और साथ ही काव्य-लेखक नहीं हो सकते। किसी के भी द्वारा लिखना और उसके साथ ही लिखने के तथ्य का ज्ञान नहीं हो सकता। जब वह उस ज्ञान का रूप हो जाता है, तभी वह प्रेरणा (आवेश) के स्थान का स्पर्श करता है। कारीगर को अपनी कारीगरी के भेट होना ही होगा। जब आप परम कुशल कारीगर का काम निभाते हैं, तब दूसरों की दृष्टि में आप बड़े भारी कारीगर होते हैं, परन्तु अपने विचार बिन्दु से उस समय आप होते ही नहीं। 'मैं कह रहा हूँ' का ज़रा भी विचार मौजूद नहीं

है, आप की सर्व से पृथकता हो गई है। जब आप अपने नुक्ते-ख़याल से कारीगर नहीं हैं, तब दुभाषिया, लिखना, और लेखक एक हो जाते हैं। तब सम्पूर्ण भेद भाव का विनाश हो जाता है। यह है प्रेरणा का स्वरूप, प्रेरणा का रहस्य। लोग कहते हैं, 'वह आध्यात्मिक पुरुष है'। परन्तु जब वह स्वयं अपने को दैवी संदेश से युक्त समझता है तब वह अभिनिवेश में (दैवी प्रेरणा) में नहीं होता। दूसरे उसे प्रेरणा में समझते हैं। दूसरे लोग इन्द्रधनुष की ओर देखते हैं और रंगों की, सुन्दर उज्ज्वल रंगों की प्रशंसा करते हैं। वे उन्हें (रंगों को) पसन्द करते हैं, उनकी प्रशंसा करते हैं। परन्तु जहाँ पर इन्द्रधनुष दिखाई पड़ता है वहां तो जाइये। परीक्षा कीजिये, सावधानी से देखिये, और आप को कोई भी इन्द्रधनुष न दिखाई देगा। आप को वहां पर इन्द्रधनुष न दिखाई देगा। इन्द्रधनुष दूसरों की दृष्टियों में मौजूद है। परन्तु दूसरे (इन्द्र धनुष के) स्थान के दृष्टि बिन्दु से, अथवा जिस स्थान पर दूसरे लोग इन्द्रधनुष देखते हैं उस स्थान पर बैठे हुए मनुष्य के दृष्टि बिन्दु से वहां पर कोई इन्द्रधनुष नहीं है।

इसी प्रकार दूसरों के नुक्ता ए-ख़याल से एक व्यक्ति प्रेरणा में, महापुरुष, लेखक, विचारशील, तत्त्ववेत्ता समझा जाता है। परन्तु स्वयं अपने विचार बिन्दु से उस समय उसमें इस तरह का कोई प्रपञ्च नहीं मौजूद होता कि, 'मैं लिख रहा हूँ' या 'मैं प्रेरणा में हूँ'। कारीगर को अपनी कारीगरी की भेंट चढ़ना ही होगा। मक्खियों की भांति कारीगरों को अपने डंक-प्रहार में अपने प्राण भर देने चाहिए। प्रेरणा का यही पूरा रहस्य है। मक्खी आप के

डंक मारने के बाद मर जाती है। इस प्रकार वही प्रेरित है जो अपने डंक-प्रहार में अपना सम्पूर्ण जीवन भर देता है। यही पूर्ण रहस्य है। यह नहीं हो सकता कि एक ही समय में तुम अभिनिवेश में भी हो और भोग भी करो। किसी वस्तु का भोगने की चेष्टा करते ही तुम प्रेरणा में नहीं रह जाते। जब तुम प्रेरणा में होगे तब दूसरे तुम्हें भोग करेंगे, संसार तुम्हें भोग करेगा। परन्तु तुम स्वयं एक ही साथ प्रेरणा युक्त और भोग करने वाले दोनों नहीं हो सकते। तुम भोगी तो न होगे, परन्तु और भी अच्छे होगे, स्वयं सुख होगे।

पतंग दीपक की लौ में जल मरता है और तब अपना प्रेम प्रमाणित करता है। साधारण पक्षी और परिंगे में भेद किये जाने के लिये यह आवश्यकता होती है कि परिंगा दीपक से दग्ध होकर सिद्ध करदे कि वह पक्षी पतंग है। इसी तरह प्रेरणा युक्त मनुष्य ठीक प्रेरणा युक्त मनुष्य समझा जाने के लिये, उसकी प्रेरणा शक्ति प्रमाणित और प्रगट होने के लिये यह आवश्यक है कि वह मनुष्य योगी हो। भय से परे, दूर; दूर वह जाता है, संसार के लिये सब तरह से मृतक होता है।

जीवित प्रकृति को छोड़ कर और कहीं से कभी कोई महान मेधावी genious प्रेरणा नहीं प्राप्त कर सका। प्रकृति से एक उपमा लेकर इसका दृष्टान्त दिया जायगा। पानी इस पृथ्वी को जीवन प्रदान करता है। प्रकाश के साथ पानी ही इस संसार में सब प्रकार की उपजों का कारण होता है। तुम्हारी खेती पानी से पकती है, पानी ईश्वर का बड़ा भारी प्रसाद है। इस देश में लोग वर्षा को नहीं पसन्द करते। परन्तु

भारत में, और पूर्व के सभी देशों में वृष्टि संसार का सब से बढ़ कर कल्याणकारी पदार्थ है। बड़े २ तत्त्वज्ञानी और बड़े २ कवि, प्रेरणा के अभिलाषी महापुरुष लोग, सदा उस अवसर से लाभ उठाते हैं जब आकाश में मेघ गर्जते होते हैं और ज़ोर से पानी बरसता होता है। सभी कवि और दैवी प्रेरणा पाने के सभी अभिलाषी ऐसे अवसरों को बड़ी उत्सुकता से ढूँढ़ते हैं, और राम स्वयं अपने अनुभव से कह सकता है कि अन्य समयों की अपेक्षा वर्षा होते समय राम के लिये कविता करना कहीं सहज होजाता है। जब पानी बरसने वाला होता है, या जब फुहार पड़ती होती है तब मन आप से आप उच्चाशय हो जाता है और दिमाग़ काव्य-वृत्ति धारण करता है, तथा प्रत्येक वस्तु अत्यन्त भावोन्मेष कारिणी (भाव को पैदा करने वाली) बन जाती है। वृष्टि के द्वारा स्वर्ग और पृथ्वी के संयोग के सिवाय और कोई दूसरा जाहिर कारण भी इस असाधारण अभ्युत्थान का नहीं बताया जा सकता। मेघ के द्वारा पृथ्वी और स्वर्ग का संयोग होता है। भारत में ऐसे अवसरों पर साधारणतः विवाहोत्सव होते हैं। लोग समझते हैं कि पृथ्वी और स्वर्ग का संयोग होता है। इस लिये नर और नारी को भी अपनी विवाह-ग्रन्थि बाँधने दो। अब यहाँ पर यह विचार करना चाहिये कि वायुमण्डल हमें प्रेरणा युक्त किस तरह करता है, और मेघ, ओस, पवन के मनोहर झोंके क्यों कर देता है। समग्र आकाश-मण्डल की प्रेरक कौन सी वस्तु है ? विज्ञान हमें बताता है कि आकाश-मण्डल की प्रेरणा का कारण अतिपूर्णता नामधारी चीज़ है। इस शब्द की व्याख्या होनी चाहिए। एक कटोरा दूध लीजिये और उसमें शक्कर मिलाइये। शक्कर घुल जायगी थोड़ी। और शक्कर डालिये,

वह भी घुल जायगी। परन्तु अन्त में एक ऐसी सीमा आवेगी जब शक्कर न घुलेगी। फिर थोड़ी या बहुत आप चाहे जितनी शक्कर छोड़ें, वह घुलेगी नहीं। यह एक बिन्दु है जहां शक्कर की एक मात्रा घुली हुई है, और अब दूध और शक्कर नहीं सोक सकता, अब और शक्कर दूध को नहीं स्वीकार है।

इस बिन्दु को अतिपूर्णता का बिन्दु कहते हैं। हम देखते हैं कि पानी किसी सीमा या अंश तक निमक को घुलाता है परन्तु उस अंश के बाद पानी निमक की और अधिक मात्रा नहीं ग्रहण करता। यदि और निमक छोड़ा जायगा तो वह पड़ा रहेगा, वह तह पर बैठ जायगा, वह घुलेगा नहीं। अब पानी को निमक से अतिपूर्ण समझना चाहिए। पानी मट्टी से भी अतिपूर्ण हो सकता है। मट्टी की एक मात्रा हम पानी में छोड़ दें, वह उसमें घुल-मिल जायगी। परन्तु थोड़ी और छोड़ो, वह न घुलेगी, और तब पानी को मट्टी से अतिपूर्ण समझना चाहिए। हमारा यह वायु-मण्डल नत्रजन (नाइट्रोजेन) अम्लजन (आक्सिजेन), कर्बन डाइआक्साइड, सजीव पदार्थ (आरगैनिक मैटर), भौतिक कण (मैटीरियल पार्टिकल्स), और जल बाष्प (एक्वीयस वेपर) का बना हुआ है। पानी के कण हवा में लटके रहते हैं। एक समय आता है जब वायुमण्डल जल वाष्प से अतिपूर्ण हो जाता है। ऐसे समय भी होते हैं जब वायुमण्डल जल-वाष्प से अतिपूर्ण नहीं होता है। परन्तु जब वायुमण्डल जल-वाष्प से अधिकता से अतिपूर्ण होता है और उसकी थोड़ी सी और मात्रा आजाती है तब हवा अपने पानी को धारण किये रहने में असमर्थ हो जाती है। अतिरिक्त जल, अथवा वायुमण्डल में मौजूद वह

जल जो बाष्प की उस मात्रा से अधिक होता है जितनी वायुमण्डल को अतिपूर्णता के लिये यथेष्ट है, वह जल मेघ के रूप में नीचे गिरता है। इस तरह जब वायुमण्डल में उसे अतिपूर्ण करनेवाली मात्रा से अधिक जल होता है तब संसार में वृष्टि होती है, ओस गिरती है, तूफान आते हैं, बौछारें पड़ती हैं। ऐसे चमत्कार अतिपूर्णता के बिन्दु के बाद होते हैं। यह हम पीछे विचारेंगे कि यह अतिपूर्णता कैसे संघटित होती है। अभी इतना ही कहना काफ़ी है कि वायुमण्डल के प्रेरणा में आने के लिये, वृष्टि होने के लिये, अतिपूर्णता की सीमा तक पहुँचना ज़रूरी है, बल्कि उसका अतिक्रमण होना चाहिए, बाष्प को अतिपूर्ण होना चाहिए बल्कि उसमें जल की और भी अधिकता होनी चाहिए। यह दशा प्राप्त होने पर शुभ फल होता है, संसार में महान परिणाम होते हैं। इसी तरह यह तुम्हारा मन है, जिसकी तुलना वायुमण्डल या पवन से की जासकती है। जब मन किसी भावना से परिपूर्ण होजाता है और उससे तुम्हारा मन भर जाता है, वह तुम्हारे मन को जीत लेती है, तुम्हारे मन को आवृत कर लेती है और मन में व्याप्त हो जाती है, तुम्हारी समग्र आत्मा में भर जाती है, तब तुम्हें अतिपूर्ण कर देती है। अब ध्यान दीजिये। जब तुम्हारा मन किसी भावना से अतिपूर्ण हो जाता है, तब आप अपने मनको विचित्र अवस्था में पाते हैं, और उसे बेचैनी की हालत कहते हैं। मन की यह हालत उस हालत से खूब ही मिलती-जुलती है जिसे हम निस्तब्धता कहते हैं, जिसे इस भूमि पर हम रुकाव की हालत कहते हैं। और आप जानते हैं कि अति रुकाव Closeness की हालत में लोग वृष्टि की आशा करते हैं। जब आप अति रुकाव, वायुमण्डल में अति पूर्णता पाते हैं, तब अति पूर्णता

के बिन्दु का अतिक्रमण होने पर वृष्टि की आशा करते हैं। इसी प्रकार जब आप का मन किसी भावना से निरन्तर परिपूर्ण हो जाता है, तब वह उस हालत में होता है जिसकी उपमा बड़ी ख़ूबी से उस हालत से दी जा सकती है जिसे हम रुकाव या निस्तब्धता की हालत कहते हैं। जब आपका मन आप की प्रिय वस्तु के विचार से अति पूर्ण होता है तब, आपने ख़याल किया होगा, एक ऐसा समय आता है कि मन रुकाव, निस्तब्धता या बेचैनी, अथवा अवर्णनीय घबड़ाहट की हालत में होता है, जिसे लोग अजीब बेचैनी कहते हैं। जब इस दशा का अतिक्रमण होता है, जब आप इस दशा को पार कर जाते हैं, आप कवि हो जाते हैं, तब कविता आप से टपकने लगती है; मधुर पद्यों की, अति उत्तम गीतों की वर्षा होने लगती है। यही हालत थी। जब आपका चित्त प्रेरणा के बिन्दु को पार कर गया, या उससे आगे बढ़ गया, तब काले और सफेद रूप में घनी भूत विचार टपक पड़े। तब प्रेरणा थी।

यह एक आदमी है। उसके मन में एक विचार बैठता है, एक समस्या हल करने की वह ठानता है। वह उसे फैलाने लगता है, वह काम करता है और फिर काम करता है, परन्तु हल नहीं कर पाता। आप में से जिन लोगों ने गणित या तत्त्वज्ञान की बाहरी समस्याओं को हल करने की चेष्टा की है वे स्वानुभव से राम की बात को पुष्ट कर सकते हैं। हम एक गहरी समस्या को हल करने लगते हैं, प्रारम्भ में जब हम समस्या हल करने लगते हैं तब हमारा चित्त अति पूर्ण नहीं है, हमारे चित्त में और भी वासनायें व्याप्त हैं। यह पदार्थ प्राप्त करने की इच्छा अथवा इस वा

उस पदार्थ की लगन आप के चित्त में प्रबल है, और समस्या हल करने की इच्छा भी आप के चित्त में मौजूद है। गम्भीर समस्या हल नहीं हुई। जब आप देखते हैं कि कुछ प्रयत्नों से समस्या हल नहीं हुई, तब आप कुछ बेचैन हो जाते हैं और दूसरे पदार्थों के प्रति अपनी लगन को दूर कर देते हैं। अब आप कुछ अधिक मुक्त हो गये, दूसरे शब्दों में वह विशेष भावना आप के सामने अधिक प्रमुख हो जाती है, आप के चित्त में अधिकाधिक भर जाती है और दूसरे विचारों को निकाल भगाती है। समस्या अब भी नहीं हल हुई। अधिकांश अन्य विकारों और अनुरागों से भी छुट्टी ले ली जाती है, फिर भी आप के चित्त में, संस्कृत की शब्दावली में, अहंकार का भाव बना रहता है, 'मैं यह करता हूँ' और 'मुझे इसका श्रेय मिलता है'। तब क्या होता है ? समस्या नहीं हल हुई। कुछ देर बाद, जब आप उसे हल करने की धुन में लगे ही रहते हैं और उस पर सोचते ही जाते हैं, मैं और तुम का ध्यान बिलकुल दूर हो जाता है; और वह भावना आपके चित्त में सर्व प्रधान हो जाती है। जब यह गति हो जाती तब मैं और तुम, मेरा और तेरा, अथवा काल और दिक् का ध्यान बिलकुल जाता रहता है। आप के चित्त में समग्र स्थान एक ही भावना घेर लेती है, वह आप के दिल में कोई शून्य स्थान नहीं छोड़ती, आपके हृदय में कोई खाली जगह नहीं रखती और यह कह सकते हैं कि आत्मा उस भावना से अति पूर्ण हो जाती है तथा भावना से आप की अभिन्नता हो जाती है। अब पतंगा दग्ध होने लगा, मधुमक्खी ने अपना जीवन दे दिया, क्षुद्र अहंकार पर स्वामित्व जाता रहा, भोग का विचार चला गया। जब इस अवस्था में पहुँच होगई, तब बलिदान होगया, सहसा आप प्रेरणा में आ गये, और

आपके अन्दर साधन कौंध जाता है। क्या लोग इस वाक्य का उपयोग नहीं करते, 'मुझे यह सूझती है', 'मुझे यह सूझी' ? बिना इस जीवन में मृत्यु के तुम भोगी और प्रेरणा में नहीं हो सकते।

कला-कुशल, शिल्पक, तत्त्वज्ञानी, और विचार शील अपने अपने क्षेत्र में प्रेरणा पाते हैं। परन्तु इस प्रेरणा या आवेश की प्राप्ति केवल आहुति या बलिदान से होती है। इस संसार में लोग अपने को भोगी बनाये रखना चाहते हैं, अपने को कर्ता बनाये रखना चाहते हैं, परन्तु वेदान्त प्रकट करता है कि यह प्रकृति के नियमों से संगत नहीं है कि आप किसी चीज़ को भोगें। किसी पदार्थ का भोग करना मनुष्य के लिये नहीं है। भोक्ता (भोग करने वाला) पुरुष झूठा पुरुष है, वह असली पुरुष नहीं है, वह तुम नहीं हो। सब विचारशीलों और तत्त्वज्ञानियों को अपने शरीर, अपने चित्त, अपनी सारी हस्ती का समस्त संसार द्वारा भोग होते देखना पड़ेगा। वही रास्ता है। यदि आप भोक्ता होना चाहते हैं तो मुक्ति, आनन्द, भुक्ति का मार्ग आप के लिये बन्द है, रुका है। आप इस संसार का भोग नहीं कर सकते, नहीं कर सकते। आप के लिये केवल एक ही पथ है। और वह यह है कि आपका देह, मन, और सर्वस्व परमात्मा द्वारा भोग किया जाता, परमात्मा द्वारा लीन किया जाता दिखाई दे। जैसा कि ईसा ने प्रभु के भोजन के समय कहा है, 'यह, मेरा मांस खालो, खालो'। 'मेरा यह रक्त तुम्हें पीना होगा'। वह बड़ा सुखी और भाग्यशाली है जिसका समस्त जीवन निरन्तर बलिदान है।

अति पूर्णता की उस सीमा पर जब हम पहुँचते हैं, जब

मन भावना से भर जाता है। जब सारी हस्ती खयाल में डूब और लुप्त हो जाता है, तब महा गवैया (ईश्वर) यंत्र या उपकरण या बाजे को उठा लेता है और इस उपकरण द्वारा सुन्दर, परम मनोरम, श्रेष्ठ स्वर निकालता है। महान तानें चमत्कार संगीत इस बाजे से पैदा ही होगा। परन्तु बच्चा जब बाजे को अपने ही तक रखना चाहता है और बड़े बजवैये या गवैये को उस बाजे से काम नहीं लेने देता, तब तक बाजा बेसुरा ही गावेगा। जब तक यह पुरुष, यह मिथ्या पुरुष यह अवास्तविक आत्मा, जो भोक्ता पुरुष है, मौजूद है और इस शरीर पर अधिकार बनाये रखना चाहता है तथा इस शरीर को जाने नहीं देता, तब तक इस बाजे या देह से बेसुरी तानें ही निकलेंगी। यह यंत्र या शरीर परम देव को दे दो, इस मिथ्या अहंकार से अपना पीछा छुटा लो, इस तुच्छ अहंकार को दूर करो, इसका बलिदान कर दो, और इससे ऊपर उठो। इसके बाद, जब अतिपूर्णता के बिन्दु का अतिक्रमण हो जाता है, ईश्वर स्वयं इस यंत्र को उठा लेता है, महान गवैया स्वयं यंत्र को हथियाता है और इस यंत्र द्वारा संगीत निकलता है, अतिसुन्दर स्वर उत्पन्न होते हैं। तब आप प्रेरणा में हैं। प्रेरणा ईश्वर की करनी है। जब तुच्छ अहंकार शरीर का कब्जा छोड़ देता है तब मनुष्य निवेशित या प्रेरित होता है।

हमें पता मिलता है कि ईसा द्वारा अपना कर्तव्य आरम्भ होने के पूर्व शैतान ने उन्हें बहकाकर भोगी बनाने की चेष्टा की थी। ये सात लोक हैं, ये सुन्दर २ सुस्वादु भोजन हैं, ये राजस्व है, अलौकिक घटना संघटित करके बड़े नामी होने का ये अवसर है, ये सभी प्रलोभन और भोग ईसा के

सामने रक्खे गये थे। ईसा ने क्या उत्तर दिया था? "शैतान! मेरे सामने से हट जा। मैं तेरे हाथों से कुछ भी नहीं लूँगा"।

खूब, खूब। अमेरिका और यूरोप के लोगो! ईसा की यह नसीहत अपने सामने रक्खो, "शैतान मेरे सामने से दूर हो, तेरे हाथ से मैं कुछ भी न ग्रहण करूँगा"। इस तरह ईसा ने समस्त सांसारिक भोगों को हटा दिया। उसने सूली और वैराग्य ग्रहण किया, और भोग सब त्याग दिये। प्रेरणा का रहस्य, चिन्ह ये तुम्हारे सामने रक्खा है। जब तक भोक्ता या कर्ता के भाव का अनुभव तुम्हारे मन में हो रहा है, तुम निवेशित या प्रेरित नहीं हो सकते, नहीं हो सकते। जब भोक्ता या कर्ता का विचार—"मैं काम कर रहा हूँ, मैं कर रहा हूँ, मुझे वाह वाही मिलना चाहिये"—बिलकुल दूर हो जाता है, केवल तभी आप प्रेरणा में हैं।

एक कहानी से राम इसका अन्त करेगा। हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में असुर नाम वाली तीन व्यक्तियों की अति उत्तम कथा है। इन तीन व्यक्तियों में विलक्षण शक्तियां थीं। वे सूरमा थीं, कोई उनसे पार पाने वाला नहीं था। वे विलक्षण पुरुष थे। लोगों ने उनसे युद्ध किया और तुरन्त हार गये। असंख्य शत्रु आये और तुरन्त पराजित हुए। इन तीन पुरुषों से लड़ने वाले हजारों की संख्या में आये और हार गये। इस तरह बहुधा पराजित होने पर शत्रुगण एक महात्मा के पास गये और पूछा कि इन तीन व्यक्तियों को किस तरह नीचा दिखाया जा सकता है। महात्मा ने कहा कि तुम्हें उनकी अजेयता के कारण का पता लगाना चाहिए, ये तीन असुर अजेय क्यों हैं। बड़े प्रयत्न और श्रम से मालूम हुआ कि इन तीनों की अजेयता का कारण यह है कि ये तीनों कार्य

कर्ता या भोक्ता होने का विचार अपने मन में कभी नहीं रखते। विजय प्राप्त होजाने पर वे उसका कुछ भी विचार नहीं करते थे। वे विजय का सुख भोगने की परवाह नहीं करते थे। लड़ते समय यह विचार कि "मैं इस शरीर रूप से लड़ रहा हूँ" अथवा यह विचार कि "मैं लड़ रहा हूँ" उनमें बिलकुल नहीं रहता था। इस संसार में नायक ऐसेही होते हैं। जैसे लोग कहते हैं "मैं समग्र कान या कान-मय हूँ" उसी तरह, आप जानते हैं, समर समय में युद्ध में लिप्त प्रत्येक नायक समग्र युद्ध या युद्ध मय होता है। "मैं कर रहा हूँ" के विचार के लिये कोई स्थान ही नहीं बच जाता। वहां उसका शरीर एक प्रकार से यंत्रवत् होजाता है। वह संग्राममय होजाता है, वहां पैर हाथ ईश्वरत्व से अतिपूर्ण होते हैं। इस तरह ये लोग जब कभी लड़ते थे, तब रणमय होजाते थे। "मैं लड़ रहा हूँ" इस विचार को वे क्षण भर के लिये भी अपने पास नहीं फटकने देते थे। जिस तरह से एक यंत्र काम करता है उसी तरह उनके शरीर काम करते थे। ईश्वर के यंत्र, ईशत्व के यंत्र होकर उनके शरीर काम करते थे। उनकी सफलता की यही कुंजी थी, कोई उनसे नहीं जीत पाता था। उनकी अजेयता का भेद मालूम होने पर अब महान साधु ने इन तीन योद्धाओं को जीतने का उपाय शत्रुओं को बताया। उनसे उन शत्रुओं से कहा कि जाकर उनसे लड़ाई छेड़ो और फिर भाग खड़े हो, उनके पास जाओ और उन्हें लड़ने में लगालो, और जब वे आक्रमण शुरू करें तो उन्हें विजयी छोड़ कर चल दो। इस तरह उन्हें रण क्षेत्र में लाकर उन्हें पीठ दिखा दो। उन सूरमाओं के शत्रुओं ने उन्हें उत्तेजित किया और भाग खड़े हुए। इस तरह उन वीरों के शत्रु और कई बार पराजित हुए। इस प्रकार धीरे २ वे तीन

अजेय शूर अपनी अमोघ स्थिति से हटा लिये गये, अपनी वास्तविक अजेयता से सरका कर अपने शरीरों में ले आये गये, उन्हें यह विश्वास करा दिया कि वे विजयी हैं। उन्हें विश्वास करा दिया गया कि वे महान हैं, वे विजेता हैं। ये तीन मनुष्य शरीर के पिंजड़े में उतार लिये गये, ये तीन आदमी शरीर के कारागार में डाल दिये गये। "मैं कर रहा हूँ" के विचार ने या "मैं महान हूँ" की भावना ने उन पर अधिकार कर लिया और कैदखाने में बन्द कर दिया। उनमें का ईश्वर स्थानच्युत कर दिया गया, और उस का स्थान तुच्छ अहंकार ने ले लिया और तब उन पर विजय पाना और पकड़ कर कैद कर देना कुछ भी कठिन काम नहीं रह गया। अब ये कठिन काम नहीं था, वे तुरन्त हराये और तुरन्त पकड़ लिये गये।

अब इस कहानी के प्रयोग पर ध्यान दीजिये। जब तक कोई काम तुम इस ढंग से करते रहते हो कि मानो तुम्हारा शरीर ईश्वर के हाथ में एक यंत्र रहता है, तुम्हारा व्यक्तित्व ईश्वरत्व में निमज्जित रहता है, जब तक तुम्हारी यह स्थिति रहती है तब तक तुम अजेय हो, उन तीनों असुरों की भांति तुम "मैं भोग रहा हूँ, या मैं कर रहा हूँ" की भावना से परे हो और अजेय हो। पर जब लोग आकर तुम्हारी तारीफ शुरू करते हैं, तुम्हें (अतिशयोक्तियों से) फुलाने लगते हैं, तुम्हारी खुशामद करते हैं, चारों ओर से तुम्हारी प्रशंसात्मक आलोचना करते हैं, तुम्हें विश्वास करा दिया जाता है कि तुम विजयी हो, नायक हो, तुम विजेता हो, दूसरे विजित हैं, तब तुम्हारे प्रतिद्वंद्वी तुम्हारे विरुद्ध हैं, तब तुम उन तीनों असुरों के समान हो जाते हो। "मैं यह कर रहा हूं" की

भावना ही और "मुझे कृति का भोग करना चाहिये" "मैं भोक्ता हूँ" का विचार मात्र ही तुमको कैद कर लेता है, तुम्हें शरीर के पिंजड़े में उतार लाता है। तुम हो बीते, शक्ति जाती रही। बाइबिल में भी क्या आप नहीं देखते कि जब ईसा पहाड़ पर से ताज़ा २ आया था तब उसमें बड़ी शक्ति थी। वह अपने मित्रों के बीच में रहा, उसने बहुत बातचीत की, और उसे कहना पड़ा, "किसने मुझे छू लिया? मैं देखता हूँ कि मेरी शक्ति मुझसे निकली जा रही है"। यह हमें इंजील में मिलता है। वहाँ भी तुम्हें वही बात दिखाई पड़ती है। "मैं कर रहा हूँ, मैं भोग रहा हूँ" जब आप इससे परे होते हैं तब ईश्वर आपके द्वारा काम कर रहा है और आप प्रेरित हैं; किन्तु जब आप कोई काम करके लोगों की समालोचनायें और अपने अनुकूल आलोचनायें, लोगों की तारीफें, लोगों की खुशामदें स्वीकार करते हैं, तब आपकी शक्ति तुरन्त जाती रहती है। वह तुरन्त निकल जाती है, वह फिर पिंजड़े में डाल दी गई। पिंजड़े से बाहर निकलो और तुम प्रेरित हो। फिर पिंजड़े में तुम चले आओ और तुम्हारा अन्त हो गया।

कल्पना करो कि यहाँ एक सुन्दर घड़ी है। वह ठीक है और दिन रात चल रही है। वह एक प्रबल चुम्बक के निकट आती है और आकर्षित हो जाती है, लोहे के स्प्रिंग आकर्षित हो जाते हैं। घड़ी अब चल नहीं सकती, अब वह बेकाम है, समय नहीं बताती। अब इसके साथ मैं क्या करूँ? घड़ी को ज़मीन में तोप दो, आकर्षणशील प्रभावों से उसे दूर रक्खो, वह चुम्बक के आकर्षण से छूट जायगी, वह अपनी पहली काम देने की शक्ति फिर वापिस पा जायगी, और आप फिर उसका उपयोग कर सकते हैं। तुम्हारे मनों

के भीतर तुम्हारा स्वर्गीय, ईश्वरीय निजात्मा है। प्रत्येक बच्चा स्वभाव से ही प्रेरित होता है। प्रत्येक बच्चा स्वभाव से ही कवि होता है। और यदि आप ईश्वरीय नियमों के अनुसार निर्वाह करें, ईश्वर की ताल से मिले हुए रहें, तो आप सदा प्रेरित हैं। यदि आप अपनी सच्ची आत्मा या स्वरूप से मिले हुए रहें, यदि आप अपने अन्तर्गत ईश्वर से, अपने निज स्वरूप या आत्मा से, सदा अपना संसर्ग बनाये रक्खें, तो आप हर घड़ी प्रेरित हैं। आपमें कसर यही है कि आपका मन सब तरफ़ संसारी चुम्बकों, लौकिक संगों के संसर्ग में आता है, और वे आपको आकर्षित कर लेते हैं और आपको अव्यवस्थित कर देते हैं, तब आप कार्यकरी अवस्था में नहीं रह जाते हैं, गड़बड़ा जाते हैं। यदि आज आप प्रेरित नहीं हैं, तो एक मात्र कारण यही है कि आप अपने को यथेष्ट भवसंग या विच्छिन्न नहीं रखते। सांसारिक पदार्थों द्वारा आप अपने को आकर्षित होने देते हैं, मुग्ध होने देते हैं, आप अपने को उनके मनमाने खेल की वस्तु बन जाने देते हैं। यदि आप अपनी प्रारम्भिक शक्तियों और आवेश या प्रेरणा को फेरना चाहते हैं, तो कुछ देर के लिये अपनेको गतसंग रखिये, विच्छिन्न रखिये। वास्तविकता में, ईश्वरत्व में, ईश्वर में, सच्ची आत्मा में अपन को तोप लीजिये। स्ववृत्ति में, सत्य में अपने को गाड़ रखिये। कुछ काल के लिये अकेल रहिये, वास्तविकता के संस्पर्श में रहने के लिये अपने दिन का कुछ समय अलग कर लीजिये। ईश्वर में अपने आपको डुबा दीजिये, गाड़ लीजिये, यह कीजिये और आपको खींच लेनवाली इन सांसारिक पदार्थों की विनाशक आकर्षण-शक्ति और मोह लेनेवाली अशुद्ध सम्मोहन-शक्ति छोड़ देगी, आपका मन पुनः कार्यकरी अवस्था में आ जायगा। आप फिर प्रेरित हो जायँगे।

कुछ दिनों तक समुद्र में चलते रहने पर जहाज़ गड़बड़ा जाते हैं, अव्यवस्थित हो जाते हैं। तब मरम्मत के लिये कुछ दिनों तक उन्हें जहाज़ी मरम्मतखाने में रखने की ज़रूरत पड़ती है। इसी तरह से बहुत समय तक सांसारिक मामलों में, सांसारिक झगड़ों में रहने से, मोहनेवाली परिस्थितियों के बीच में रहने से, बिगाड़नेवाली और थकानेवाली तथा निर्बल-कारिणी हालतों में रहने से आप अपने को बेसिलसिले कर लेते हैं, आप गिर जाते हैं, प्रेरणा की अपनी आन्तरिक स्वाभाविक शक्तियों को आप खो देते हैं। जिस तरह आप अपने जहाज़ों से बर्तते हैं वैसा ही व्यवहार आपको अपने शरीरों से करना चाहिए। अन्ततः कुछ समय के लिये अपने शरीरों को मरम्मतशाला में, पूर्वोक्त प्रभावों से दूर रखिये। कम से कम कुछ काल के लिये अपने शरीरों को स्ववृत्ति में रखिये। वे पुस्तकें पढ़िये जो आपको प्रेरित करेंगी, उन लोगों की संगति में रहिये जो निवेशित करेंगे। अपने आप एकाकी रहिये। कुछ समय ध्यान में लगाइये और आप अपनी प्रेरणा की शक्ति वापिस पावेंगे। क्या आपके शरीर को रोज़ धोने की ज़रूरत नहीं होती, क्या आपके घर को नित्य साफ़ किये और झाड़े जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती? इसी तरह से आपके मन की भी सफ़ाई और पोताई की ज़रूरत है, उसके नित्य धोये और नहलाये जाने की ज़रूरत है। अब तक लौकिक भावनायें, लौकिक संग या सांसारिक भोग के विचार या "मैं यह कर रहा हूँ" इत्यादि के विचार वर्तमान हैं, जब तक आप बिलकुल बलिदान नहीं हो जाते, तब तक आपके लिये कोई आशा नहीं है। शरीरोत्सर्ग के सिवाय प्रेरणा का कोई दूसरा उपाय नहीं है।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!