श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

सब इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग।

भाग 6 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 6 · अध्याय 2 / 5

सब इच्छाओं की पूर्ति का मार्ग।

(ता० 13 दिसम्बर 1902 को साधु-संग (हर्मिटिक ब्रदरहुड) के सामने दिया हुआ स्वामी राम का व्याख्यान।)

इन नाना रूपों में मेरे निजात्मन्,

विषय शुरू करने के पहले भारत की भौतिक दीनता पर कुछ शब्द कहे जायँगे। शायद एक समय ऐसा था जब भारत आज कल के सम्पूर्ण यूरोप से भी अधिक धनवान् था। आज कल समग्र अमेरिका में जितने रत्न, हीरे, मोती और लाल हैं उनकी अपेक्षा भारत में अधिक थे, ऐसा एक समय था। समय समय पर राष्ट्र के बाद राष्ट्र ने भारत को धन दबोचा। यूनान भारत की बदौलत अमीर हुआ, ईरान भारत की बदौलत अमीर हुआ, अफ़ग़ानिस्तान भारत की बदौलत अमीर हुआ, और आज इंग्लैंड भारत की बदौलत दौलत बटोर रहा है। भारत वास्तव में किसी समय सोने और रत्नों का भांडार था।

हमें पछतावा नहीं है। भौतिक वैभव में भारत के पिछड़े होने का हमें खेद नहीं है। हम जानते हैं कि एक नियम है, ईश्वरीय नियम है, हमारी अपनी प्रकृति का नियम है, जो मामलों का नियमन कर रहा है, जिसके अनुसार प्रत्येक बात हो रही है। हम जानते हैं कि दैवी हाथ हमारे मामलों का संचालन और नेतृत्व कर रहा है, और यह जानकर हम अपनी भौतिक दरिद्रता के लिये व्याकुल नहीं होते। भौतिक सम्पत्ति की हानि के लिये हमें सोच नहीं। इन वस्तुओं की, वैभव के इन भौतिक पदार्थों की, इन सब की परीक्षा हुई थी; भारतवासियों द्वारा ये तराजू में तौले गये

थे और कम पाये गये। अमेरिका अभी बिलकुल नौजवान है, अत्यन्त बालक है, बल्कि बच्चा है। इसी तरह यूरोप भी बिलकुल नौजवान है। भारत ने भौतिक क्षेत्र में प्रयोग किये हैं, इन सब चीज़ों को तौला है और कम पाया है। भारत इन्हें फेन का एक बूँद मात्र समझता है, और कुछ नहीं। वे आपके सुख के कोई साधन नहीं। वे आपको सचमुच सुखी नहीं बना सकते, कदापि नहीं, कदापि नहीं। लोहा और सोना खरीदने के ही लिये ठीक हैं, बस। सुख इन भौतिक पदार्थों की ही जाति की वस्तु नहीं है। वह खरीदा नहीं जा सकता। सुख, सच्चा आनन्द इन चीज़ों से नहीं मोल लिया जा सकता।

सुख का रहस्य कुछ और ही है। रहस्य यह है कि जितना ही तुम चीज़ों को ढूँढ़ने हो उतना ही तुम उन्हें खोते हो। जितना ही आप कामना से परे रहते हैं उतना ही आप अपने को अभाव से भी परे पाते हैं, उतना ही भौतिक पदार्थ आपका पीछा करते हैं। आज कल के भारतवासी भी, सांसारिक बुद्धिवाले भारतवासी भी इस रहस्य को नहीं जानते, और तीक्ष्ण तथा गम्भीर निरीक्षण के अभाव के कारण वे किसी अपूर्व घटना का कारण ऐसी बातों को मानते हैं जो उसका वास्तविक कारण नहीं। भारत का राजनैतिक पतन क्यों हुआ, अथवा भौतिक दृष्टि से भारत इतना नीचा क्यों है? कारण यही है कि आज कल के भारतीय उन दिनों के भारतीय हैं जब भारत का पतन शुरू हुआ था। उनमें व्यावहारिक वेदान्त का अभाव है। आपको सुनकर आश्चर्य होगा कि वही भारत जो वेदान्त और आध्यात्मिकता का घर था, एकता का मूलस्रोत था, "सब एक है" की भावना का मूल-

स्थान था, वही भारत, वही बंक जिससे दैवी ज्ञान, आध्यात्मिक ज्ञान, आत्म-सम्मान, आत्म-ज्ञान, आत्म-गौरव की गंगा बही थी, वही भारत आज व्यावहारिक वेदान्त से हीन है। और यही भारत के पतन का कारण था, आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा, परन्तु अब इस विषय की आलोचना करने के लिये समय नहीं है। यदि समय मिला तो किसी भावी व्याख्यान में इस पर विचार किया जायगा। राष्ट्र क्यों गिरते और उठते हैं, बाह्य दृश्यों की आड़ में कौन सी ऐसी वस्तु है जो एक क़ौम को गिराती और दूसरी को उठाती है, कौन सा चन्द्र राष्ट्रों के ज्वार-भाटे का कारण होता है?

इतना ही कहना यथेष्ट होगा कि बिना आध्यात्मिक पतन के किसी राष्ट्र का किसी भी दृष्टि से पतन नहीं हो सकता—और एक भारतीय के मुख से, जिसने भारत तथा अन्य राष्ट्रों पर मनन किया है, निकले हुए इन शब्दों का आप स्वागत करेंगे। इस कथन में शायद अन्य भारतीय राम से सहमत न होंगे, किन्तु राम अपने ही प्रमाण पर, तीक्ष्ण अवलोकन के प्रमाण पर यह बात कहता है। यह क्या बात है कि अमेरिका इस समय तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और विलक्षण उन्नति कर रहा है? भौतिक उन्नति की दृष्टि से अमेरिका इतनी शीघ्रता से क्यों अग्रसर हो रहा है? कारण यही है कि अमेरिकानिवासी अज्ञात भाव से इस स्थूल लोक में वेदान्त का जीवन बिता रहे हैं। अमेरिकावासी क्योंकर व्यावहारिक रूप से वेदान्त की ज़िन्दगी बसर कर रहे हैं, और वह उनकी भौतिक उन्नति का कारण क्यों है, इस पर कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है। परन्तु बात यही है। सत्य, सत्य, केवल सत्य गौरव पावेगा। वास्तविकता, वास्तविक चरित्र,

केवल स्वच्छ चरित्र को गौरव और सफलता प्राप्त होगी। और कोई इसे न पावेगा।

सब ब्यौरे को छोड़कर और सच्चे परन्तु प्रकट में विपरीत कथन पर टीका-टिप्पणी करना छोड़कर, जो कौतूहलजनक बातें हमने अभी कही हैं उन पर और विचार न करके अब हमें आज के विषय पर आना चाहिये।

इंजील में लिखा है "माँगो और तुम उसे पाओगे; खटखटाओ और दरवाज़ा तुम्हारे लिये खुल जायगा।" उधर हिन्दू कर्म-वाद का उपदेश देते हैं, जिसका अर्थ है कि मानो प्रत्येक कामना अपनी पूर्ति अपने साथ लिये रहती है, प्रत्येक अभिलाषा और प्रत्येक संकल्प किसी न किसी समय पूर्ण होने का वचन देता है, पूर्ण होहीगा। राम इस विषय पर व्याख्यान न देगा। इस समय इसकी चर्चा ही यथेष्ट होगी। कहा जाता है कि बाग़ में दिखाई पड़नेवाली हरेक कली अपनी आशा पूर्ण हुई देखती है, कभी न कभी खिलती और फूलती है। और हीनतर पशुओं की बँधाई हुई सब उम्मेदें भी कार्य में परिणत होती हैं। इस संसार में कोई भी उद्योग, कोई भी शक्ति, कोई भी पदार्थ व्यर्थ नहीं जाता, कोई भी चीज़ खोती नहीं। शक्ति के आग्रह, उद्योग के संरक्षण, पदार्थ के अविनाशिपन के नियम हम लिपिबद्ध पाते हैं और इसी तरह मानसिक क्रियाशीलता तथा मानसिक कामनायें, संकल्प और अभिलाष अर्थात् मानसिक उद्योग-शक्ति है, इसका भी नाश कैसे हो सकता है? इसमें यह भी फल लगेंगे, देर या सवेर इसकी भी पूर्ति होगी। इस तरह सब आकांक्षायें पूर्ण होहीगी। कर्म-वाद का सार और संकलन यही है। हिन्दू उपदेश देते हैं कि इस नियम के अनुसार "माँगिये और आप

उसे पावेंगे, खटखटाओ और दरवाज़ा तुम्हारे लिये खुल जायगा।" किन्तु क्या सचमुच ऐसा ही है? क्या वस्तुतः ऐसा ही है? अपने दैनिक जीवन में क्या हमें ऐसा ही अनुभव होता है? है तो ऐसा ही। परन्तु कर्म-वाद का साधारणतः जो अर्थ लोग लगाते हैं उसके अनुसार होनेवाले अपने अनुभव से यदि आप इसे सिद्ध करना चाहते हैं, साधारण लोग "माँगिये और आप उसे पावेंगे, खटखटाइये और वह आपके लिये खुल जायगा" से जो अर्थ ग्रहण करते हैं उस ढंग से यदि आप इस वक्तव्य को प्रमाणित करना चाहें तो आप भूल करेंगे। आप अपने को हानि में पावेंगे। आप देखेंगे कि यह काम नहीं देता; यह सिद्धान्त व्यवहार में काम नहीं करता। यह कथन पूर्ण सत्य नहीं है, यह सत्य का एक अंश मात्र है। बाइबिल में या हिन्दुओं द्वारा जब यह कहा गया था कि "खटखटाइये और वह आपके लिये खुल जायगा, माँगिये और वह तुम्हें मिल जायगा" तब इससे जो अर्थ ग्रहण किया जाता था वह साधारण लोग नहीं समझते या उसकी उपेक्षा करते हैं। मतलब यह था कि आपको उसकी कीमत भी देना होगा। उसका मूल्य भी देना पड़ेगा। यह मत भूलो कि मूल्य भी अत्यन्त ज़रूरी है। मूल्य की भी चर्चा हम इंजील में पाते हैं, "जो अपना जीवन बचायेगा वह इसे खो देगा।" इसका अर्थ क्या है? इसमें यह गर्भित है कि जो विनय करेगा और तड़फेगा तथा आकांक्षा करेगा वह इसे नहीं पावेगा। तड़फने में, विनय और आकांक्षा करने में हम अपने जीवन को रखना चाहते हैं। "जो अपने जीवन को रक्खेगा वह इसे खो देगा।"

"मनुष्य का जीवन केवल अन्नाधीन न होना चाहिये।"

यह देखिये, प्रभु की प्रार्थना में हम कहते हैं, "आज के दिन हमें हमारी नित्य की रोटी दीजिये"। "आज के दिन हमें हमारी नित्य की रोटी दीजिये", इस वाक्य में हम कहते हैं कि मनुष्य का जीवन केवल अन्नाधीन न होना चाहिये। इन कथनों की संगति बैठाइये। उन्हें अच्छी तरह समझिये। "हमें हमारा नित्य का भोजन दीजिये", इस ईश-विनय का यह अर्थ नहीं है कि आप माँगते रहें। इसका यह मतलब नहीं कि आप अनुनय-विनय करें, अभिलाषा, आकांक्षा करें। कदापि नहीं। यह अर्थ नहीं है। इसका अभिप्राय यह था कि एक महाराज, एक सम्राट् को भी, जिसे नित्य का भोजन न मिलने का ज़रा सा भी खटका नहीं है, यह प्रार्थना करनी चाहिये, एक राजकुमार को भी, जिसे नित्य का भोजन अवश्यमेव मिलने का पूरा विश्वास है, यह प्रार्थना करनी ही चाहिये। यदि ऐसा है तो प्रकट है कि "हमारा नित्य का भोजन हमें दीजिये" का अर्थ यह नहीं है कि लोग मँगनपन धारण करें, वे भौतिक सम्पृद्धि की अभिलाषा करें। यह अर्थ नहीं है। प्रार्थना का अर्थ यही है कि हरेक को, वह राजकुमार या महाराज या साधु कोई भी क्यों न हो, अपने इर्द-गिर्द की सब वस्तुयें, विपुल धन-राशि, समस्त दौलत, सुन्दर और मनोहर पदार्थ अपने न समझना चाहिये, वह इन सब (धन-दौलत आदि) को अपनी मिल्कियत न माने, बल्कि समझे कि यह सर्वस्व ईश्वर का है, ईश्वर का, मेरा नहीं है, मेरा नहीं है। इस प्रार्थना का अर्थ माँगना नहीं है, अर्थ है त्यागना। सुनिये। "हमारा नित्य का भोजन हमें दीजिये" का अर्थ माँगना और चाहना नहीं है, बल्कि इसका अर्थ त्यागना और दे देना है। दे देना, ईश्वरार्पण करना उक्त प्रार्थना का अर्थ था। आप समझ सकते हैं कि किसी बादशाह का यह "आज के

दिन हमें दीजिये इत्यादि" प्रार्थना करना कितना अनुचित है, यदि प्रार्थना का साधारण अर्थ ग्रहण किया जाय। कितना अयुक्त है! यह प्रार्थना तभी संगत होती है जब महाराज इस भाव से प्रार्थना करे कि अपने कोष के सब रत्न, अपने घर की सारी दौलत, घर तक, मैं त्याग करता हूँ, मानों यह सब कुछ ईश्वरार्पण करता हूँ, मानों अपने सर्वस्व पर से 'अपना अधिकार हटाता हूँ। यह कहा जा सकता है कि उन सब वस्तुओं से वह अपना सम्बन्ध तोड़ता है और उनसे दूर खड़ा हो जाता है। वह सर्वश्रेष्ठ साधु है। वह कहता है, यह ईश्वर का है। मेज़, मेज़ पर रक्खी हुई सब चीज़ें उस (ईश्वर) की हैं, मेरी नहीं; मेरा कुछ भी नहीं है। जो कुछ भी मिलता है, सब प्यारे (ईश्वर) से मिलता है। प्रार्थना द्वारा वह यही अनुभव करता है। "आज मुझे दीजिये इत्यादि" का राम द्वारा अभी समझाया हुआ अर्थ यदि आप ग्रहण करें तो आप इसे "मनुष्य का जीवन केवल अन्नाधीन न होना चाहिये" से संगत पाइयेगा; तब तो आप दोनों वचनों में संगति पावेंगे, अन्यथा असंगति।

इंजील में हम यह भी पाते हैं कि "स्वर्ग का साम्राज्य तलाश करो, और अन्य सब चीज़ें तुम्हें मिल जायँगी"। यही कुंजी है। यह प्रार्थना की कुंजी है। "पहले स्वर्ग का साम्राज्य ढूँढ़ो फिर अन्य सब चीज़ें आप ही मिल जायँगी", यही आश्वासन स्वामी ने प्रभु-प्रार्थना पर दिया था।

फिर है "रंज में उसे बच्चे का पोषण करना चाहिये"। खोई हुई कड़ी, गायब टुकड़ा इस वाक्य में मिलता है। बच्चा तो वह पोषेगी, किन्तु रंज उसका मूल्य है। इच्छाओं में फल लगेंगे, आप जो कुछ चाहते हैं वह सामने आवेगा,

आपकी जो कुछ अभिलाषा है उसकी पूर्ति होगी। परन्तु शोकरूपी मूल्य आपको देना होगा। "रंज में उसे बच्चे का पोषण करना चाहिये", यह केवल नारी के लिये नहीं कहा गया है। यह हरेक के लिये कहा गया है। इच्छायें फलवती होंगी, परन्तु कीमत देने पर। कीमत क्या है? रंज। इस रंज शब्द को भी व्याख्यान की अपेक्षा है। रंज का अर्थ है सब इच्छाओं का त्याग। कौन अपनी इच्छायें पूर्ण होती देखेगा? कौन? वह जो अपनी इच्छाओं में चिपटता है? वह जो दिलोजान से अपनी इच्छाओं के अधीन हो जाता है? नहीं नहीं जो मनुष्य मानों शाहाना ढंग से इच्छाओं का पोषण करना है, जो तटस्थता-पूर्वक, उदासीन भाव से इच्छाओं का पोषण करता है केवल वही अपनी अभिलाषाओं को फलते-फूलते देखेगा।

लोग कहते हैं कि प्रार्थनाओं का उत्तर मिलता है। प्रार्थनायें क्या चीज़ हैं? प्रार्थना शब्द का अर्थ माँगना, भिक्षा करना, इच्छा करना अभिलाषा और कामना करना (कुछ लोग प्रार्थना शब्द का यही अर्थ लगाते हैं)। है प्रार्थना करने का अर्थ यह मानना चाहिये कि इच्छा करने, कामना करने, अभिलाषा करने, माँगने और चाहने से प्रार्थनायें सुनी जाती हैं। यह कथन ग़लत है। यदि प्रार्थना शब्द का अर्थ आप माँगना, चाहना, इच्छा करना, कामना करना समझते हैं तो कोई प्रार्थना कभी नहीं मंज़ूर होती। कोई चीज़ माँगने से कभी नहीं मिलती। भीख चाहने से कभी वस्तु नहीं हाथ आती। माँगते ही आप कुछ न पावेंगे। परन्तु प्रार्थना शब्द का साधारणतः कुछ और ही अर्थ है। वह क्या? प्रार्थना शब्द का अर्थ उस अवस्था में उठना है जिसमें

आप कामना से परे होंगे, जिसमें "तेरी मर्ज़ी पूरी हो" वाक्य से आपका स्वराज्य होगा। सावधान! प्रार्थना का अर्थ माँगना, हाथ फैलाना, इच्छा करना तथा स्वेच्छा पूर्ण कराना नहीं है। प्रार्थना को लोग अपनी इच्छा पूर्ण होने का उपाय समझते हैं। आत्मा से वे क्षुद्र आत्मा, यह मंगता आत्मा समझते हैं। किंतु प्रार्थना का प्राण, प्रार्थना का सारांश इस वाक्य में है "तेरी मर्ज़ी पूरी हो"। जब शरीर सब प्रकार के क्लेशों के, सब तरह की पीड़ा और व्यथा के अधीन होता है तब भी आपके हृदय से, हृदयों के हृदय से यह विचार, या भावना कह लीजिये, उत्पन्न होता है, "तेरी इच्छा पूर्ण हो"। यह बहुत ठीक है। जब शरीर रोगी होता है, जब आपके इर्द-गिर्द की सब परिस्थिति आपके विपरीत होती है, आपका विरोध करती है, तब आपके भीतर से यह विचार उठ खड़ा होता है, "तेरी इच्छा पूर्ण हो", मेरी नहीं। यही समर्पण है, यही आत्म-त्याग है, तुच्छ आत्मा का उत्सर्ग है। प्रार्थनाओं का, हृदय से निकली हुई प्रार्थनाओं का यही मर्म है, यही तत्त्व है, यही आत्मा है। जिन प्रार्थनाओं का अन्त केवल स्वार्थ-पूर्ण कामनाओं में होता है उन प्रार्थनाओं की सुनवाई कभी नहीं होती, कभी नहीं होती। प्रार्थनायें तभी सुनी जाती हैं जब चित्त ऐसी दशा में पहुँच जाता है जिसमें संसार संसार नहीं रह जाता, जिसमें पूर्ण उत्सर्ग हो जाता है और शरीर शरीर नहीं रह जाता, चित्त चित्त नहीं रह जाता, सम्बन्धी पीछे छूट जाते हैं, सब सम्पर्क भूल जाते हैं। और जब आपका चित्त ऐसी अलौकिक चैतन्यता कुछ समय के लिये, एक क्षण के लिये भी, प्राप्त करता है तब प्रार्थनायें सुनी जाती हैं। और उसके बाद, उस अवस्था से ठीक जागते ही, नहीं, उस अवस्था के बाद ठीक सोते ही, उस दशा से ठीक नीचे उत-

रते ही, यदि आपके सामने कोई अभिलाषा आ खड़ी होती है तो वह पूरी होती ही है। इस तरह की प्रार्थनायें तभी सुनी जाती हैं जब कोई एक ख़ास तल पर चढ़ जाता है, पूर्ण देह-विस्मृति, तुच्छ आत्मा के पूर्ण संयम, सब वस्तुओं के पूर्ण त्याग, संसार से पूर्ण वैराग्य, पूर्ण ब्रह्मार्पण, पूर्ण उत्सर्ग की उच्चता पर पहुँच जाता है। परन्तु ये प्रार्थनायें माँगनेवाली नहीं कही जा सकतीं। इन्हें भिक्षाशील प्रार्थनायें नहीं कहना चाहिए।

पुनः कुछ लोग ऐसे हैं जो साधारण रीति से नहीं प्रार्थना करते, जो किसी बँधे रूप में प्रार्थनायें नहीं करते, और उनकी कामनायें पूर्ण होती हैं, उनकी इच्छायें पूरी होती हैं। क्योंकर, और ये किस तरह के लोग हैं? ये लोग किस तरह के हैं? वे किसके समान हैं? अभी देखिये। आपको कोई इच्छा है, और आप इच्छा, अभिलाषा, अनुनय-विनय, कामना करते जाते हैं, छटपटाते रहते हैं। जब तक आपका यह मंगतेपन का ढंग रहता है, आपको कुछ नहीं मिलता। आप जानते हैं कि यदि हमको किसी बड़े आदमी के पास जाना होता है तो हम उसके पास अच्छी पोशाक पहनकर जाते हैं। ईश्वर सब से बड़ा है, सर्वोच्च है, निष्काम है, सब अभावों से परे है। यदि आप उसके पास जाते हैं तो सुन्दर वस्त्र धारण करके जाइये, ऐसी पोशाक पहनिये जो उसके अनुरूप हो, जो उस मनुष्य के योग्य हो जिसे सकल अभावों से परे महापुरुष के पास जाना है। तुमको भी अभाव से परे होना चाहिए। तुम्हें भी मंगतेपन से दूर होना चाहिए, तुम्हें भी टूटे-पुँजिये दूकानदार या भिखारी के चिथड़े न लादना चाहिए। कोई भी भिखारी को पसन्द नहीं करता।

मंगता दुतकार दिया जाता है। लोग उसकी उपस्थिति से घृणा करते हैं। इस देश में यों भिखारी और टुकड़े नहीं पूछे जाते, उनके लिये कोई जगह नहीं है। इसलिये तुम्हें यदि ईश्वर के पास पहुँचना है तो ईश्वरोचित पोशाक में जाइये। ईश्वरोचित पोशाक क्या है? वह पोशाक जिसमें भिखारी की गंध नहीं है, जिससे आवश्यकता या अभाव नहीं टपकता। तुम्हें अपने आपको आवश्यकता या अभाव से दूर समझना चाहिए। तब ईश्वर द्वारा आपका स्वागत होगा, केवल तभी।

कहा जाता है कि जो मनुष्य छटपटा रहा है, अभिलाषा कर रहा है, इच्छा कर रहा है, जो बेचैनी की हालत में है, जो अभाव बोध करता है, जो निरानन्द और आवश्यकता की दशा में है, उसके पास सुख नहीं आ सकता। जब तक आप तड़फते हैं, अभिलाषा करते हैं, इच्छा करते हैं, तब तक आप बेचैनी की हालत में रहते हैं, आप दुःख की दशा में रहते हैं। इस अवस्था में किसी इच्छा की पूर्ति-रूप आनन्द, या यों कह लीजिये, वह इच्छित पदार्थ, जो आपकी दृष्टि में सुख से परिपूर्ण है, आपके पास न फटकेगा। दोनों में विरोध है। तुम्हारी आत्मा भिक्षा-शील है, कंगाल है, वह काम्य पदार्थ उच्च है, प्रतापी है, सुखमय है। दोनों में विरोध है। वह पदार्थ तुम्हारे निकट न आवेगा। तुम उस पदार्थ की ओर खिंचोगे, उसे ढूँढ़ते फिरोगे, और वह तुमसे हमेशा घृणा करेगा। कुछ काल तक निरुत्साहित किये जाने पर, कुछ काल तक असफलता से व्यथित होने पर, सफलता न पाने के बाद, कुछ समय तक वह पदार्थ न पाने के बाद, जब तुम उस पदार्थ की ओर से मुँह फेर लोगे, जब तुम उस पदार्थ की

ओर से हताश हो जाओगे तब उसे छोड़ दोगे, तब उसका पीछा छोड़ दोगे और मन मारकर बैठ रहोगे। ज्योंही तुम अपना मुख उसकी ओर से फेरोगे, उसे छोड़ बैठोगे, त्योंही तुम उससे ऊपर उठ जाते हो, उसी क्षण तुम अपने को उस पदार्थ से ऊँची श्रेणी में पहुँचा देते हो। इधर तुम उस पदार्थ से ऊँचे उड़े उधर वह पदार्थ तुम्हें ढूँढ़ने लगेगा। क्या ऐसा नहीं है? हरेक व्यक्ति को यह अनुभव से ज्ञात है। केवल अपने अनुभव की शरण लो, और हर कामना में तुम्हें इस तरह का अनुभव हुआ है। जब आप किसी व्यक्ति पर प्रेम करते हैं और उसके लिये विकल होते हैं, उसके लिये भूखे रहते हैं, प्यासे रहते हैं, तब आप उसके लिये बहुत उत्सुक होते हैं, और, बहुत ही उत्सुक होते हैं। जब आप उसे किसी उच्चतर भाव के लिये, जो भाव मुझ और तुमसे ऊपर उठ जायगा, छोड़ और भुला दें तब, केवल तभी, आप उस इच्छित वस्तु को अपनी बग़ल में पावेंगे, तभी वह पदार्थ आपको अपने पास मिलेगा।

यह क्या बात है? आप देखते हैं कि हरेक वस्तु अपनी सी वस्तु को आकर्षित करती है। यही बात है। सूर्य भी पदार्थ है और भूमि भी पदार्थ है। सूर्य भूमि को और सब ग्रहों को खींचता है। पृथिवी सूर्य को अपनी ओर नहीं खींचती, वह सूर्य द्वारा खींची जाती है। सूर्य पृथिवी को अपनी तरफ़ खींचता है। धनात्मक [positive] और ऋणात्मक [negative] बिजलियों में भी यही बात है। उनमें अंशों का भेद है, जाति का भेद नहीं है। विज्ञान इसे सिद्ध करता है। यहाँ एक चुम्बक पत्थर है और एक लोहे का टुकड़ा है। जो चीज़ भारी है वह हलकी को खींच लेगी, यह विज्ञान का भली भाँति प्रसिद्ध नियम है।

जब तुम उद्दिष्ट को छोड़ देते हो तब भी ऐसा ही होता है। तुम अपनी उद्दिष्ट वस्तु को छोड़ और खो देते हो। तुम एक ऐसे भाव या हृदयोद्वेग में उठ जाते हो, जो अभावहीनता का आवेग है, जो आवश्यकता से, कामना से ऊपर है, जो निष्कामता का भाव है, जो निष्कामता है। तुम एक उच्चतर कक्षा में हो, और तुम सूर्य हो, और तब वह आनन्द अथवा वह वस्तु पृथिवी या कोई दूसरा ग्रह मात्र हो जाती है और तुम उसे अपने पास खींच लेते हो, वह तुम्हारे पास आ जाता है।

जब तुम्हारी कामना का पदार्थ तुम्हारे पास आ जाता है तब फिर तुम कुछ दर्प से भर जाते हो। पुनः तुम अपने को आवश्यकता में बोध करने लगते हो और पुनः खटपट भी हो जाती है। यही धंधा होता रहता है। तुम राज-सिंहासन पर पहुँच जाते हो, और दूसरे सब लोग तो अब तुम्हें देखेंगे, क्योंकि सब प्रजा, सब दरबारी, सब पदाधिकारी नरेश की ओर खिंच ही जाते हैं। वे महाराज को ढूँढ़ते हैं, वे उससे मुलाक़ात करना चाहते हैं, वे बे बुलाये भी उसकी हाज़िरी भरते हैं। जब तुम अपने को कामना, अभाव, आवश्यकता से ऊपर समझते हो तब यही होता है। तुम राजा के सिंहासन के अधिकारी होते हो, और ये सब वस्तुयें, ये कामनायें, दरबारियों और कर्मचारियों के समान होने के कारण तुम्हें ढूँढ़ती हैं, तुमसे भेंट करना चाहती हैं, तुम्हारे दरबार में हाज़िर हो जाती हैं। तब क्या होता है? इस अवर्णनीय दशा में रहने के बाद, जो दशा केवल उसी पारलौकिक दशा में व्यक्त की जा सकती है, साधारणतः लोग सुचिर, मनोहर वस्तुओं को अपनी ओर खिंचा हुआ पाते हैं।

और जब वे वस्तुयें उनके पास पहुँच जाती हैं तब वे अपना सिंहासन त्यागकर नीचे उतर आते हैं और अपने आप को अभाव या आवश्यकता से हैरान होते पाते हैं। वे फिर अपने को नीची श्रेणी में रख लेते हैं और कामना की वस्तु उन्हें छोड़ देती है। यही होता है। इसकी दूसरी तरह से भी व्याख्या की जा सकती है।

एक गाड़ी में एक दरवाज़ा है और एक मनुष्य दरवाज़े में खड़ा है। वह अपने मित्र को बुलाता है, "आ जाओ, चले आओ"। जब मित्र आता है तब अति चिन्ता के कारण यह दरवाज़ेवाला मनुष्य दरवाज़ा नहीं ख़ाली करता, वहीं खड़ा रहता है। मित्र आवे तो कहाँ? वह मित्र के लिये कोई जगह नहीं देता, मित्र उसके पास नहीं आ सकता। गाड़ी चल देती है, और वह बिना मित्र के रह जाता है। ठीक ऐसा. ठीक ऐसा ही है।

तुम्हारी एक कामना है, तुम अभिलाषा या मिन्नत करते हो। कामना बड़ी प्रबल, अति गम्भीर है। इच्छा करके तुम काम्य वस्तु को आमंत्रित कर रहे हो। वह आती है और चिन्ता में पड़े हुए तुम उसके लिये द्वार नहीं ख़ाली करते। तुम दरवाज़ा रोके रहते हो, तुम उसको जगह नहीं देते। तुम्हारी हानि होती है, तुम्हारी हानि होती है। तुम केवल माँग रहे थे, और वह तुम्हें नहीं मिली। किन्तु माँगने, हाथ फैलाने और इच्छा करने के बाद तुम्हें दरवाज़ा ख़ाली करना पड़ेगा; तुम्हें वह स्थान छोड़ना पड़ेगा और भीतर जाना पड़ेगा। भीतर लौटो, और तब मित्र भीतर आवेगा, भीतर पधारेगा, और मित्र को तुम अपने पास पाओगे। यही हाल है।

कल्पना करो कि तुम्हें कोई कामना, अभिलाषा या इच्छा अथवा इस तरह की कोई भी प्रवृत्ति है। तुम इच्छा करते रहते हो। इच्छित वस्तु तुम्हारी ओर खिंच आती है। परन्तु जब तक इच्छा से ऊपर न उठोगे, अपने भीतर न प्रवेश करोगे, तब तक वह तुम्हें कदापि न मिलेगी; क्योंकि उस मनुष्य (इच्छित वस्तु) को गाड़ी में घुसना है। तुम अब अपने भीतर प्रवेश करो, वास्तविक स्वयं के पास पहुँचो। इस तरह स्थान ख़ाली कर देने या रोके रहने पर इच्छित वस्तु मिलती या नहीं मिलती है।

इस स्थान की हवा सूर्य-ताप से गरम हो गई है, वह ऊपर चढ़ जायगी। ख़ाली जगह को भरने के लिये बाहर की हवा भीतर धँस आवेगी। यदि हवा अपनी जगह पर डटी रहती है तो बाहर की हवा आकर उसका स्थान नहीं ले पाती।

ठीक ऐसे ही जब तक आप इच्छाओं और क्षुद्र स्वयं को, तथा इच्छा और अभिलाषावाली दशा को बनाये रखते हैं तब तक चाही हुई वस्तुयें आपकी ओर नहीं फटकतीं। उन इच्छाओं को छोड़ दो। पहले माँगने से, तुम चाहे बिनती भी करो, काम न निकलेगा। बाद को आपको माँगने और इच्छा करने से ऊपर उठना होगा, इच्छाओं से पल्ला छुड़ाकर तुम्हें आगे बढ़ना होगा, तब वे पूरी होंगी।

ऐसे लोग हैं जिनकी इच्छायें, जिनकी आज्ञायें या आदेश सूर्य को, चन्द्र को, (पंच) तत्त्वों को पालना पड़ते हैं। उनकी शक्ति और महिमा का भेद क्या है? क्या रहस्य है? भेद केवल यही है कि उनकी कामनायें व्यक्तिगत और स्वार्थपूर्ण कामनायें नहीं होतीं। उनकी इच्छायें एक नरेन्द्र के वचनों के समान होती हैं, जो (नरेन्द्र) समस्त आवश्य-

कामनाओं से ऊपर होता है—और ध्यान दीजिये—जिसे वास्तव में किसी चीज़ का भी अभाव नहीं होता है, जो केवल खुशी के लिये एक वाक्य बोल देता है या कुछ कह देता है। यदि उसके कहने के अनुसार काम हुआ तो अच्छा, यदि न हुआ तो अच्छा। वह सब अभिलाषाओं से परे है। एक बादशाह, जिसे कोई इच्छा नहीं, किसी से कुछ नहीं चाहता। परन्तु उसके दरबारी और परिजन उसकी आज्ञा पाकर धन्य होते हैं। उसे स्वयं तो कोई इच्छा नहीं है परन्तु केवल अपने मित्रों को खुश करने के अभिप्राय से, अपने को खुश करने के लिये नहीं, उनसे अपना कोई काम करने को कह देता है। वह अपने भीतर ही भीतर परम प्रसन्न और संतुष्ट है।

राजाओं और राजकुमारों की भाँति जो लोग सब इच्छाओं से परे रहते हैं, केवल उन्हीं की आज्ञायें इस संसार में चन्द्र, सूर्य और तरुओं द्वारा पाली जाती हैं। वे कामनाओं से परे होते हैं और उनकी कामनायें पूर्ण होती हैं। इच्छाओं की पूर्ति की यही कुंजी है।

इस संसार में सूर्य सब कुछ करता है। परन्तु उसके द्वारा सब कुछ क्योंकर होता है? यह क्या बात है? कारण यही है कि सूर्य साक्षी मात्र है, केवल गवाह है। और एक महिमान्वित गवाह महाराजाधिराज के तुल्य है। यदि कोई राजा या राजकुमार यहाँ आ पड़े तो उसे तुमसे कोई वस्तु माँगनी न पड़ेगी, हरेक व्यक्ति अपनी ही इच्छा से उसके लिये जगह कर देगा, उसे आसन, जल, भोजन अथवा और कोई वस्तु देगा, धन और दूसरी चीज़ें उसे अर्पण करेगा। अपनी ही इच्छा से अर्पण करेगा। ठीक इसी तरह जो कुछ तुम देखते हो सब सूर्य करता है। जो कुछ तुम देखते हो सब सूर्य के द्वारा देखते हो।

यदि सूर्य न होता तो हवा में ठिठुरन आ जाती और वह गतिशून्य हो जाती और कोई शब्द तुम्हारे कानों में न पहुँच सकता। सूर्य के ताप का ही यह परिणाम है कि तुम स्वाद का सुख भोगते हो। सूर्य की ही गरमी शाक, भाजी पैदा करती है। जो कुछ तुम सूँघते हो उसका भी कारण सूर्य ही है। पृथ्वी अपने वर्तमान रूप में सूर्य ही के कारण ठहरी हुई है। सब बातों का कारण सूर्य ही है, फिर भी किसी अदालत में सूर्य के विरुद्ध कोई शिकायत कभी नहीं दायर हुई। सूर्य के कारण चोर सब कुछ चुराता है, परन्तु किसी न्यायालय में सूर्य पर कभी कोई मुक़दमा नहीं चलाया गया।

सूर्य, साक्षी, गवाह, निष्पक्ष गवाह है, सूर्यदेव अपनी महिमा से मंडित तटस्थ साक्षी हैं। इसी से पृथ्वी चक्कर पर चक्कर काटती हुई अपने सब भाग सूर्य को दिखाती है। ग्रह उसके इर्द-गिर्द फिरा करते हैं और अपने सब अंग सूर्य को दिखाते रहते हैं। इसी से सूर्य के प्रकट होते ही हिमालयों से पानी बहने लगता है। सूर्य की मौजूदगी में हवा भी चलती रहती है, घास बढ़ती रहती है, इत्यादि। अतएव, सूर्य की उपस्थिति में हरेक चीज़ आती और जाती है। यह क्या बात है? बात यही है कि सूर्य गवाह की, निष्पक्ष गवाह की स्थिति में है, वह अपने द्वारा होती रहनेवाली बातों में हिलमिल नहीं जाता अथवा उन वस्तुओं के साथ भ्रमण नहीं करता, वह प्रतापी साक्षी मात्र रहता है। वेदान्त कहता है, संसार में घूमते-फिरते समय क्या आप खुद उस स्थिति में, अपनी महिमा से मंडित गवाह की स्थिति में, निष्पक्ष संग की दशा में नहीं हो सकते? संसार में कोई व्यक्तिगत,

स्वार्थपूर्ण अनुराग न रखिये, केवल सूर्यवाला स्वार्थ रखिये। जहाँ कहीं जाइये वहाँ जीवन और प्रभा फैलाइये, किसी प्रकार का व्यक्तिगत अनुराग न रखिये, ईश्वरीय चैतन्यता के ईश्वरात्मकता के सच्चे गौरव में—'वही मैं हूँ'—अपने को राखिये। तुच्छ स्वार्थपूर्ण अनुरागी अहं के दृष्टि बिन्दु से किसी चीज़ की ओर न देखते हुए, सत्य के घर में, आत्मा के वास्तविक आत्मा में अपने को रखिये। यदि आप ऐसा करें तो आप अपने को वही परम शक्ति पावेंगे जिसकी आज्ञायें इस संसार की सब शक्तियों को पालनी पड़ती हैं।

इस संसार की सब मुसीबतों, क्लेशों, सुखों, वैभवों, सम्पदाओं और विकट गरीबी तथा हीनताओं को अपने ऊपर उतनी ही कोमलता और पूर्णता से पड़ने दीजिये जितनी स्निग्धता और पूर्णता से कोई मनोहर भूभाग आपके दृष्टिपथ में पड़ता है। भूभाग का दृश्य जब आपकी दृष्टि से गुज़रता है तब आप प्रत्येक वस्तु साफ़ साफ़ परन्तु कोमलता से देखते हैं। उसका तुम पर कोई बोझ नहीं पड़ता, वह तुम्हारे नयनों में थकावट नहीं लाता। इस तरह इस दुनिया में रहो, इर्द-गिर्द भ्रमण करो, जीवन की गलियों में खेलते हुए गुज़रो, साफ़ी प्रकाश हरेक चीज़ स्पष्टता से परन्तु स्निग्धता से देखे, वह अति भाराक्रान्त न हो, किसी बात से दिक़ न हो। यदि यह आप कर सकें तो आप वह महात्मा हैं जिसके आदेश प्राकृतिक शक्तियों को मान्य होते हैं। तुम वही महात्मा हो।

इच्छाओं से ऊपर उठो, और वे पूरी हो जायँगी। कर्मवाद का प्रारब्धवाद या प्राकृतिक शक्तियों से, जो सम्पूर्ण विश्व के द्वारा कार्य कर रही हैं, कैसे समन्वय किया जाय?

दूसरे शब्दों में भाग्यवाद या निर्बन्धवाद की स्वतंत्र संकल्प से कैसे संगति बैठे?

एक सादा उदाहरण दिया जायगा।

कहा जाता है कि जो इच्छायें आपके अन्दर हैं वे वास्तव में सचमुच अनायास इच्छायें नहीं हैं; परन्तु आपकी इच्छायें प्राकृतिक हैं और वे भविष्य में होनेवाली तथा प्रकृति के नियमित क्रम में घटनेवाली घटनाओं की प्रतिच्छाया मात्र हैं। वे पूर्व से ही आपके चित्त में अपनी छाया डालती हैं और इच्छाओं के रूप में प्रगट होती हैं।

एक कहानी है एक महिला की, जो एक प्रथम श्रेणी के चित्रकार के पास अपना छायाचित्र उतरवाने गई थी। तस्वीर उतारनेवाले ने अपना यंत्र ठीक करके रक्खा और अत्यन्त सचेतन फलक का प्रयोग किया। जब उसने खाके को जाँचा तो उसे महिला के चेहरे पर चेचक के चिह्न दिखाई पड़े। वह चकित हुआ। इसका क्या अर्थ? उसका मुखमंडल तो स्वच्छ है परन्तु खाके में उस भयंकर रोग के लक्षण अवश्य हैं। उसने अनेक बार महिला का ऐसा छायाचित्र लेने का यत्न किया जिसमें चेहरे पर शीतला के लक्षण न हों। अन्त में हैरान होकर उसने यत्न त्याग दिया और महिला से कहा कि किसी दूसरे दिन आइयेगा, जब अवस्था अनुकूल होगी और मैं आपका निर्दोष चित्र लेने में सफल हो सकूँगा। महिला अपने घर गई और कुछ घण्टों बाद उसके शीतला निकल आई। क्या कारण था? बाद को उसको याद पड़ा कि मेरी बहिन की, जो चेचक से पीड़ित थी और मेरे यहाँ आनेवाली थी, एक चिट्ठी आई थी जिसके लिफ़ाफ़े को उसने अपने ओठों से गीला तथा उँगलियों से

बन्द किया था। उसी चिट्ठी को खोलने से उस महिला में रोग प्रवेश कर गया था और यथासमय वह रोगाक्रान्त हुई। तस्वीर खींचनेवाले द्वारा काम में लाये जानेवाले परिष्कृत पदार्थों की कृपा से तस्वीर उतारने के यंत्र ने उस (रोग) का पता लगा लिया, परन्तु यंत्रहीन नेत्रों को धोखा हुआ और चर्म में काम करती हुई चेचक नहीं दिखाई पड़ सकी।

इसी प्रकार इच्छायें भी वास्तव में चेचक के दाग़ हैं, जो चेहरे पर तो नहीं प्रगट हुए हैं परन्तु मंत्र से देखे जा सकते हैं। वास्तव में कामनायें अपनी पूर्ति की ज़मानत हैं। इच्छायें अवश्यमेव घटनेवाली घटनाओं की तालिका मात्र हैं।

ये सब चीज़ें जो हमारे हिस्से में पड़ती हैं, एक दृष्टि से हमारी परिस्थिति को, हमारी अवस्थाओं और बाहरी प्रभावों द्वारा निश्चित होती हैं। दूसरे दृष्टिबिन्दु से भीतरी सब इच्छायें हमें साधारणतः हमारे स्वतंत्र संकल्पों की करतूतें मालूम होती हैं और वे पूरी होकर रहेंगी। हम कहते हैं कि हम स्वतंत्र हैं और हमारा स्वतंत्र संकल्प अवश्य सफल होगा। इस प्रकार स्वतंत्र संकल्प और भाग्यवाद का समन्वय हो जाता है। इच्छायें वास्तव में पहले ही से पूर्ण हो चुकी हैं। परन्तु यह यातना क्यों और कैसी है? इच्छाओं की पूर्ति के लिये हमें यह मूल्य क्यों देना पड़ता है? यह भी ज़रूरी है। एक उदाहरण देकर यह समझाया जायगा।

एक मनुष्य अपने एक मित्र को पत्र लिख रहा था। उसे देखने को वह छटपटा रहा था और बहुत ही उत्सुक था। बहुत दिनों से उसने अपने मित्र को नहीं देखा था। बड़ी लम्बी चौड़ी चिट्ठी वह लिख रहा था, पन्ने पर पन्ने भरते चला जा रहा था। लिखने में वह इतना लिप्त था कि एक

क्षण के लिये भी वह न रुकता था और न आँख उठाता था। प्रायः पौन घण्टा उसने चिट्ठी लिखने में लगाया और इतने समय तक उसने सिर भी नहीं उठाया। जब पत्र पूरा हुआ और दस्तख़त हो गये तब उसने मुँड उठाया और देखा कि उसका प्रिय मित्र उसके सामने खड़ा है। वह उछल पड़ा और अपना स्नेह प्रकट करते हुए मित्र से लिपट गया। बाद को बिगड़कर बोला, "तुम यहाँ हो?" मित्र ने उत्तर दिया, "मुझे यहाँ आये आध घण्टे से अधिक हो गया।" तब उस मनुष्य ने कहा, "इतनी देर से यहाँ हो तो मुझसे कहा क्यों नहीं?" मित्र ने कहा, "तुम इतने मग्न थे कि मैंने तुम्हारे काम में विघ्न डालना उचित नहीं समझा।" यही गति है, यही गति है।

तुम्हारी इच्छायें चिट्ठी लिखने के समान हैं। तुम बिनती कर रहे हो, इच्छा और अभिलाषा करते हो, भूखे हो रहे हो, प्यासे हो रहे हो, हैरान हो—यह सब चिट्ठी लिखना है, और तुम लिखते ही जाते हो। जिसे तुम चिट्ठी लिख रहे हो, जिन वस्तुओं में तुम्हारी लौ लगी हुई है, वे कर्मवाद के गुप्त नियम के अनुसार तुम्हारे सामने पहले ही से मौजूद हैं। किन्तु तुम्हें उनका पता क्यों नहीं चलता, अपने सामने तुम उन्हें क्यों नहीं पाते? क्योंकि तुम इच्छा कर रहे हो, चिट्ठी लिख रहे हो। यही कारण है। जिस क्षण तुम इच्छा करना छोड़ दोगे, पत्र लिखना बन्द कर दोगे, उसी क्षण सब इच्छित पदार्थों को अपने सामने देखोगे। इसीलिये मूल्य देना नितान्त आवश्यक हो जाता है।

इस विषय की दृष्टान्त-स्वरूप हिन्दू धर्म-ग्रन्थों में सैकड़ों कहानियां हैं। एक राजा के प्रधान मंत्री की कथा है जिसने

लक्ष्मी के प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिये आवश्यक सब प्रकार के तप किये। उसने सब आवश्यक मंत्रों, यंत्रों और प्रयोगों की साधना की। लक्ष्मी देवी की प्रत्यक्ष उपस्थिति का अनुभव करानेवाले गुप्त मंत्रों को उसने दस लाख दफ़े जपा। देवी ने दर्शन नहीं दिये। तीस लाख बार सब प्रयोग उसने किये, फिर भी सिद्धि नहीं हुई।

मंत्र-यंत्र से उसका विश्वास जाता रहा और संसार की सब वस्तुओं को त्यागकर संन्यास ले लिया। ज्योंही उसने संन्यास लेकर अपना भवन छोड़ा और वन में कुटी बनाई त्योंही लक्ष्मी उसके सामने आ गई। उसने कहा, "देवी चली जाओ, अब तुम यहाँ क्यों आई हो? मुझे अब तुम्हारी ज़रूरत नहीं। मैं साधु हूँ। साधु को विलासिता, ऐश्वर्य, दौलत और सांसारिक भोगों से क्या मतलब? जब मुझे तुम्हारी चाह थी तब तो आई नहीं, अब जब मुझे तुम्हारी चाह नहीं, तुमने कृपा की है।" देवी ने उत्तर दिया, "तुम स्वयं मेरा रास्ता रोके थे। जब तक तुम मेरी इच्छा कर रहे थे तब तक तुम द्वैत का प्रतिपादन कर रहे थे, तब तक तुम अपने को भिखारी बनाये हुए थे, और ऐसे मनुष्य को कुछ भी नहीं मिल सकता। जिस क्षण तुम कामनाओं से परे हो जाते हो और उनका तिरस्कार कर देते हो उसी क्षण तुम देवता हो, और गौरव देवताओं के ही हिस्से की वस्तु है।" यह रहस्य है।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!