श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

कर्म।

भाग 6 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 6 · अध्याय 3 / 5

कर्म।

[ता० 5।1।1902 के रोज सोशल ऐसोसिएशन, मथुरा में दिया हुआ स्वामी राम का एक व्याख्यान]*

कुछ लोग कहते हैं कि सारे काम ईश्वर की इच्छा से होते हैं; कुछ कहते हैं नहीं, मनुष्य के प्रयत्न वा पुरुषार्थ से होते हैं।

पूर्व-कथित महाशय इस मामले को इस तरह माने बैठे हैं कि जो कुछ काम होता है वह सब ईश्वर ही करता है और उसकी इच्छा से ही होते हैं; हमारा इसमें बिलकुल कर्तृत्व नहीं है और पश्चात्कथित महाशय इस झगड़े को इस तरह से किए बैठे हैं कि जो काम होता है, मनुष्य के पुरुषार्थ से होता है; ईश्वर का इसमें कुछ भी कर्तृत्व नहीं है। क्योंकि इतिहास में स्पष्ट रूप से देखने में आता है कि नेपोलियन बोनापार्टे ने संपूर्ण योरप को अपने ही साहस और दृढ़ता से छिन्न-भिन्न कर दिया था, नादिरशाह और महमूद ग़ज़नवी आदि का हाल भी इसी तरह का है। अगर ये साहसभरे वीर पुरुष साहस, दृढ़ता और पुरुषार्थ को एक किनारे रखकर केवल घर में ईश्वर पर भरोसा किए बैठे रहते, तो सारे योरप और भारतवर्ष में अपना सिक्का

*इस के संक्षिप्त नोट श्री आर. एस. नारायण स्वामी ने, जो उन दिनों ब्रह्मचारी थे और श्रीस्वामी राम की सेवा में साथ रहते थे, लिये थे और तत्पश्चात् आर्टिकल के रूप में वे छपाये गये थे। कर्म और प्रारब्ध के विषय पर कुछ समय सभा के सभासदों में शास्त्रार्थ होता रहा, तत्पश्चात् स्वामी जी का व्याख्यान आरम्भ हुआ।

कभी न जमा सकते। अतः साहस और दृढ़ता अर्थात् पुरुषार्थ ही आवश्यक है; ईश्वर पर भरोसा करके बैठे रहना अपने आपको आलसी और कायर बनाना है।

इसके संबन्ध में वेदान्त यों कहता है कि यदि दूरदर्शितापूर्वक देखा जाय अर्थात् यदि इस झगड़े की सत्यता पर दृष्टि डाली जाय, तो विदित होगा कि इन दोनों बातों में—अर्थात् ईश्वर सब कुछ करता है वा पुरुषार्थ से सब कुछ होता है—कुछ भी अंतर नहीं है; बल्कि अंतर केवल उन दृष्टियों में है जो वास्तविकता तक नहीं पहुँचतीं। वेदान्त तो उन सब लोगों की सेवा में जो कहते हैं कि ईश्वर ही सब कुछ करता है, यह प्रश्न उपस्थित करता है कि पहले केवल इतना बता दो कि आप ईश्वर का स्वरूप क्या माने बैठे हैं?—आया वह निराकार अर्थात् रूप-रहित है या साकार अर्थात् रूप-रेखवाला, आया वह शरीर के स्वामी की भाँति कर्ता पुरुष है या केवल अकर्ता; वह सम्बन्ध-सहित वा संगवाला है या निस्संबंध वा असंग? जब तुम हमारे इन प्रश्नों का उत्तर सविस्तर और ठीक-ठीक रीति से दे दोगे या सुन लोगे, तो तुम पर इस ग्रंथि का भेद आप ही खुल जायगा। फिर उन महाशयों को भी जो केवल साहस और दृढ़ता को ही मानते हैं और ईश्वर की इच्छा आदि को एक कोने रखते हैं और जो प्रमाण में इतिहास आदि की साक्षियाँ दे देकर पुरुषार्थ को सिद्ध किया चाहते हैं मगर अपनी बुद्धि को ज़रा और आगे नहीं दौड़ाते, वेदांत अपना आप समझकर यह उपदेश देता है कि प्यारो! यदि इतिहास की सत्यता को ख़ूब समझकर पढ़ते, तो ये परिणाम न निकालते। यदि अब भी इतिहास को दुबारा ग़ौर से पढ़ो, तो ऐसे परिणाम कभी भी आपको प्राप्त न हों;

बल्कि इनसे बढ़कर सफलता के उत्तमोत्तम कारण आपको दिखाई दें, क्योंकि इतिहास में प्रायः भ्रांति भी हो जाती है। एक तत्त्ववेत्ता ने क्या ही अच्छा कहा है कि—

"Don't read history to me, for I know it must be false." (मुझे इतिहास पढ़कर न सुनाओ, क्योंकि मैं जानता हूँ कि इतिहास अवश्य झूठा होता है।)

यह पढ़कर सारे इतिहासकार और इतिहासज्ञ बड़े आश्चर्यित होंगे। बल्कि यह प्रश्न उपस्थित करेंगे कि—

(1) क्या इतिहास बिलकुल झूठे ही होते हैं?

(2) क्या ऐसे-ऐसे सुयोग्य इतिहासकारों ने केवल झूठ को ही उन्नति देने के लिये अपना बहुमूल्य समय व्यय किया था?

इस तरह के उलटे-पुलटे आक्रमण करने को तैयार हो जायँगे।

इसमें राम का यह कहना है कि यद्यपि इतिहास बिलकुल ही झूठा नहीं होता, मगर प्यारो! इस तत्त्ववेत्ता का कथन भी अनुचित नहीं है बल्कि कुछ सत्यता रखता है। यद्यपि वह देखने में व्यर्थ दिखाई देता है, मगर उसमें भी कुछ रहस्य है। क्योंकि हम नित्य देखते हैं कि मनुष्य जब अपने नित्य के रोज़नामचे लिखने में बहुत सी भूलें कर जाता है, तो सोचिये कि औरों के हाल लिखने में कितनी भूलें करता होगा। फिर आजकल लोग उन मनुष्यों के इतिहास लिख रहे हैं जिनको उनके बाप-दादे ने भी नहीं देखा था। केवल इतिहासिकों के झूठे-सच्चे वृत्तांतों को लेकर उसमें से कुछ उद्धृत करके अपने इतिहासों में अंकित कर रहे हैं। इससे स्पष्ट विदित होता है कि उनमें लाखों ही भ्रांतियाँ होती होंगी,

और केवल औरों की नक़ल करके अत्युक्ति से ही किताबें भरी जाती होंगी। क्योंकि यह प्रत्यक्ष देखा जाता है कि एक मनुष्य अपना आँखों-देखा हाल अपने रोज़नामचे में लिखते समय बीसों भूलें कर जाता है, तो फिर क्या यह बात असंभव है कि वह उन लोगों के हाल लिखने में अगणित भूलें न करता होगा जिनको उसने स्वयं तो क्या बल्कि उसके बाबा-परबाबा ने भी नहीं देखा है? इसलिये इतिहास की इबारत को समझने के लिये भी ऐसे मस्तिष्कवान् मनुष्य का होना आवश्यक है जो पढ़ते समय इन समस्त भ्रांतियों पर दृष्टि रक्खे; अन्यथा इबारत की शब्दावली पर ही लट्टू होनेवाले लोग न तो नेपोलियन के साहस और दृढ़ता (पुरुषार्थ) की सत्यता समझेंगे और न कोई और अच्छा परिणाम ही निकाल सकेंगे। मगर ख़ैर, ऐसे महाशयों से भी जो केवल इतिहास के प्रमाण ही सामने रखना चाहते हैं और स्वयं कुछ नहीं विचारते वेदान्त बड़े प्रेम और स्नेह से यह पूछता है कि हमारे ही लिये अपनी दशा पर विचारकर बताओ कि किस समय आपको सफलता प्राप्त होती है? या दूसरे शब्दों में यह कि जिस समय आपको सफलता प्राप्त होनेवाली होती है तो उस समय आपकी क्या दशा होती है? (क्योंकि जब आपको अपनी सफलता का तत्त्व विदित हो जायगा तो औरों की सफलता के विषय में अपने आप ठीक परिणाम अवश्य निकाल लोगे।) इसके उत्तर में प्रत्येक के अंतःकरण से यह ध्वनि निकलेगी कि हर काम में केवल उस समय सफलता होती है जब साहस भी अपूर्व हो और चित्त में अहंकार की गंध तक न हो। जो लोग नेपोलियन बोनापार्टे के साहस आदि का हवाला देते रहते हैं, अगर वे उसके जीवनचरित्र को ग़ौर से पढ़ेंगे, तो अवश्य यह बात पाएँगे कि जिस समय

नेपोलियन बोनापार्टे सफलता प्राप्त कर रहा था उस समय उसके हृदय में कभी यह विचार उत्पन्न न होता था कि मैं काम कर रहा हूँ; बल्कि मस्ती के जोश से बेखबर होकर वह हमेशा लड़ता था, उसे सफलता प्राप्त होती थी। जब अहंकार को साथ लेकर लड़ा है, उसी समय उसने हार खाई और बंदी हुआ। क्योंकि यही प्रकृति का नियम है कि जहाँ अहंकार होता है वहाँ कभी भी सफलता प्राप्त नहीं होती। इस विषय में हरएक का अनुभव साक्षी है। क्योंकि प्रकृति का यह नियम कि "अहंकार से अलग होने पर ही सदैव सफलता होती है", केवल एक ही व्यक्ति पर लागू नहीं है बल्कि सब पर इसका शासन है।

शंका—जब अहंकार का भाव सफलता प्राप्त करते समय बिलकुल उड़ा हुआ था, तो उस समय नेपोलियन के हाथ से जो काम हुआ, वह किस गणना में होगा-किस नाम से पुकारा जायगा?

उत्तर—वेदांत यहाँ यह कहता है कि जिस समय मनुष्य के भीतर से काम करते समय अहंकार दूर हो जाता है, तो उसके भीतर वह शक्ति काम करती है जो अहंकार से रहित अर्थात् स्वार्थ से दूर है। इसी शक्ति को, जो स्वार्थ और अहंकार की सीमा से परे है, वेदांत में ईश्वर कहते हैं। अतः सफलता प्राप्त होते समय केवल ईश्वर ही स्वयं काम करता है। यद्यपि उस समय सफलता प्राप्त करता नेपोलियन दिखाई दे और सफलता उसके नाम से भी पुकारी जाय, परंतु वास्तव में उस समय स्वयं ईश्वर वा शक्ति ही काम करती है (या यों कहो कि ईश्वर ही सब काम करता है)। जैसे समुद्र का भाग जब बंगाल के नीचे होता है तो उसका

नाम बंगाल की खाड़ी होता है, जब अरब के नीचे है तो अरब का समुद्र कहलाता है और जब योरप के नीचे है तो रोम के सागर के नाम से प्रसिद्ध होता है। इत्यादि-इत्यादि। परंतु वास्तव में एक समुद्र के ही नाम भिन्न-भिन्न स्थानों के कारण भिन्न-भिन्न पड़ जाते हैं। इसी तरह एक सर्वव्यापी, सब पर आवृत्त शक्ति रूप शरीर जब नेपोलियन के द्वारा काम करता है, तो वह साहस के नाम से अभिहित होता है, और जब पेड़ के पत्तों आदि में काम करता है तो उसका नाम विकास होता है—अर्थात् यह कि पेड़ बढ़ रहा है। बात इतनी है कि एक रूप में उसकी नेपोलियन के साहस से पहचान हो सकती है और दूसरे रूप में वृक्ष के विकास से। मगर सब में वही एक शक्ति है, अर्थात् सारे काम वही शक्ति करती है। अतएव लोगों का यह कथन कि नेपोलियन ने विजय की, बिलकुल निरर्थक है और विजय की सत्यता को न जानना सिद्ध करता है।

अब उन महाशयों को लीजिए जो यह मानते हैं कि सारे काम ईश्वर की इच्छा से होते हैं, मगर ईश्वर की इच्छा से उनका अभिप्राय प्रारब्ध होता है। अर्थात् जो कुछ होता है वह ईश्वर की बनाई हुई प्रारब्ध से होता है और कर्म वा पुरुषार्थ से कुछ नहीं होता। इससे यह सिद्ध होता है कि वे इन शब्दों-अर्थात् कर्म और प्रारब्ध-के अर्थ नहीं जानते। उनको भी वेदांत यों समझाता है कि प्यारो! अगर तुमने इन दोनों की सत्यता को समझा होता तो अंते से लोगों के साथ झगड़ा करने में समय न बिताते, बल्कि अपने सुधार में अपना समय देते। अस्तु, अब आप इस विषय के निर्णय को ध्यान से पढ़कर इसका परिणाम हृदयंगम कीजिए।

वेदांत इस विषय का यों निपटारा करता है कि जैसे

गणित में एक ही वाक्य में दो प्रकार के राशि होते हैं, एक राशि अस्थिर और दूसरे राशि स्थिर, जैसे—

3 अ ल+64 अ ल—अल+अ ल-अ ल

इनमें अ स्थिर है और ल अस्थिर। इसी तरह मनुष्य में भी दो शक्तियाँ मौजूद हैं—एक स्वतंत्र, स्वाधीन अर्थात् कर्म करने की शक्ति और दूसरी परतंत्र या पराधीन। तात्पर्य यह है कि प्रारब्ध स्वाधीन नहीं है, स्वतंत्र नहीं है।

अब यह देखना चाहिए कि मनुष्य कहाँ तक स्वाधीन है और कहाँ तक पराधीन। कहाँ तक मनुष्य में स्वतंत्रता अर्थात् कर्म करने का अंश है और कहाँ तक उसमें पराधीनता अर्थात् प्रारब्ध का अंश है।

इससे पहले कि इस विषय को और प्रकार हल किया जाय, गणित का ही उदाहरण लेकर तै किया जाता है। क्योंकि यद्यपि हम लोगों को नित्य प्रति नदी में तैरते देखते हैं, मगर तैराकी का समझना या समझाना ज़रा कठिन बात है, किए ही से समझ में आती है। और तरह नहीं। इसी तरह यद्यपि हम नित्य प्रति इन दोनों वस्तुओं को मनुष्यों में देखते हैं, फिर भी उदाहरणों के बिना इनका समझना या समझाना बहुत कठिन होता है। इसलिये यदि इस प्रश्न को हल करने के लिये गणित आदि के उदाहरण उपस्थित किए जायँ, तो कुछ अनुचित नहीं।

द्रव्य-शास्त्र (इसमें मायात) में द्रव्य की गति पहले एक बूँद की गति के द्वारा निश्चित की जाती है और फिर कभी-कभी समवाय रूप से अर्थात् संपूर्ण जल के प्रवाह की गति के द्वारा मालूम की जाती है। इसी तरह कर्म और प्रारब्ध के इस मामले में भी दो प्रकार से विवेचना की जायगी, एक

व्यष्टि रूप से, दुसरे समष्टि रूप से। इन्हीं को संस्कृत में व्यष्टि और समष्टि भाव कहते हैं।

यदि मनुष्य की दृष्टि से अर्थात् व्यष्टि रूप से विचार किया जाय तो मालूम होगा कि इसमें एक अंश है जिसको स्वतंत्र या स्वाधीन कर्म के नाम से अभिहित करते हैं और एक ऐसा है जिसको पराधीन, परतंत्र या प्रारब्ध (भाग्य) के नाम से प्रसिद्ध करते हैं। जैसे रेशम के कीड़े का हाल है कि जब तक उसने अपने भीतर से रेशम नहीं निकाला, तब तक वह स्वतंत्र है और तब तक ही वह स्वाधीन वा स्वेच्छाचारी कहा जाता है; मगर जब रेशम निकाल चुकता है तो फँस जाता है अर्थात् परतंत्र कहलाता है। इसी तरह जो कर्म मनुष्य से हो चुका है, उसके कारण वह उसके फल भोगने को परतंत्र या पराधीन है; मगर जो कर्म कि अभी तक किया ही नहीं, उसके कारण वह स्वाधीन है और उसके करने का अधिकार रखने के कारण स्वतंत्र और स्वेच्छाचारी कहा जाता है। जैसे मकड़ी जाला बनाने के बाद परतंत्र या पराधीन है और उससे पहले स्वतंत्र या स्वाधीन, या जैसे रेलगाड़ी जब तक सड़क नहीं बनी, हर ओर चलने के लिये स्वाधीन है, और जब सड़क बन गई तो उसपर चलने के लिये विवश है—अर्थात् सड़क बनने के बाद रेलगाड़ी उसपर चलने के बंधन में आ जाती है, इसी तरह मनुष्य भी एक कर्म के करने से पहले उसके फल आदि से स्वतंत्र है और कर्म करने के पश्चात् उसके फल भोगने में परतंत्र है। अतः मनुष्य में इन दो वर्तमान अंशों का नाम स्वतंत्रता और परतंत्रता या कर्म और प्रारब्ध (भाग्य) है। यद्यपि कुछ लोग कर्म और भाग्य को एक ही गिरोह में गिनते हैं अर्थात्

इन दोनों के एक ही अर्थ करते हैं; मगर वेदांत में भाग्य से तात्पर्य है परतंत्र, पराधीन वा जकड़ा हुआ—अर्थात् मनुष्य में वह अंश जो कर्मों के फल भोगने में परतंत्र वा विवश है; और कर्म से तात्पर्य है स्वतंत्र वा स्वाधीन अर्थात् मनुष्य में वह अंश जो अभी फल आदि के बंधन से मुक्त है और स्वतंत्र वा स्वेच्छाधीन है। अँगरेज़ी में एक कहावत है कि 'मनुष्य अपनी प्रारब्ध बनाने का आप अधिकार रखता है' अर्थात् 'मनुष्य अपना भाग्य अपने हाथों बनाता है'। इसमें हमारे शास्त्र का भी यही सिद्धांत है कि 'जैसा करोगे, वैसा भरोगे,'। इसके अर्थ यही हैं कि जैसे कर्म या कामना करोगे,वैसे उनके फल दूसरे जन्म में या इसी जन्म में भाग्य के रूप में प्रकट हो जायँगे।

लोग इस बात पर दिन-रात रोते रहते हैं कि हाय! हमारी "कामनाएँ पूरी नहीं होतीं। मगर वेदांत इसमें यों कहता है— प्यारो! अगर तुम्हें रोना ही स्वीकार है तो धाड़ मारकर रोओ, मगर इस बात पर, कि तुम्हारी कामनाएँ अपना फल दिए बिना नहीं रहेंगी।" यह सुनकर हर एक अनजान के मन में यह शंका उठती है कि यदि मान भी लिया जाय कि हमारी सारी कामनाएँ पूरी होती हैं, तो यह क्यों पूरी होती है? इसके उत्तर में वेदांत यह बताता है कि मन का, जिसमें संकल्प अर्थात् कामनाएँ उठती हैं, मूल केवल आत्मदेव है, जो सत्यकाम और सत्यसंकल्प है—अर्थात् इसका प्रत्येक विचार और कामना सच्ची हुए बिना नहीं रहती। इस (आत्मदेव) को ही शक्ति या ईश्वर के नाम से अभिहित करते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि इसकी सारी कामनाएँ पूरी हों जबकि वह अपना मूल सत्यकाम और सत्यसंकल्प रखता है।

शंका—अब यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि वेदांत का जब यह सिद्धांत है कि मन की कामनाएँ पूरी होती हैं, तो वह पूरी होती हुई दिखाई क्यों नहीं देतीं? क्योंकि किसी को भी अपनी कामनाएँ हर समय पूरी होती दिखाई नहीं देती हैं। अतएव उपयुक्त शास्त्र का सिद्धांत बिलकुल मिथ्या और अशुद्ध है।

उत्तर—वेदांत इसका कारण यों बताता है कि जैसे बड़ी अदालत (chief court) और छोटी अदालत (small cause Court) दो अलग-अलग अदालतें होती हैं। बड़ी अदालत में तो मुक़द्दमे अति लंबे-लंबे और अधिक होते हैं, इसलिये उनकी पेशी की तारीख़ 15 वर्ष या उससे कुछ न्यूनाधिक रक्खी जाती है। इतने समय में संभव है कि मुद्दई मर जाय या जज साहब ही बदल जायँ या वकील साहब आदि न रहें, मगर मुक़द्दमे की पेशी अवश्य होती है और किसी किसी तरह का फ़ैसला भी अवश्य होता है। चाहे पहली पेशी में, चाहे चार या पाँच पेशियों के बाद—अर्थात् बहुत शीघ्र भी यदि प्रयत्न किया जाय तो 20 या 25 वर्ष में मुक़द्दमा फ़ैसल होता है; और दूसरी अदालत खफ़ीफ़ा में मुक़द्दमे छोटे-छोटे और बहुत थोड़े होते हैं, इसलिये पेशी की तारीख़ भी उसी दिन या एक दो दिन के बाद रक्खी जाती है। और पहिले तो वह मुक़द्दमा कच्ची पेशी ही में तय हो जाता है, अगर देर भी लग जाय तो भी एक सप्ताह के भीतर-भीतर ही फ़ैसल हो जाता है—अर्थात् मुक़द्दमे बहुत थोड़े और छोटे होने के कारण बहुत शीघ्र फ़ैसल हो जाते हैं। ऐसे ही मनुष्य भी दो प्रकार के मनवाले होते हैं। एक ऐसा मन रखते हैं कि जिसके भीतर बड़े बड़े भारी और असं-

ख्य संकल्प-कामनाएँ उत्पन्न होती रहती हैं और अधिक एवं भारी होने के कारण चीफ़कोर्ट की भाँति, जहाँ मुक़द्दमे शीघ्र फ़ैसल होने नहीं पाते और जहाँ यह भी संभव है कि वे मुक़द्दमे (संकल्प कामना आदि) फ़ैसल होने के लिये अगर उस जज साहब (ऐसे मनवाले मनुष्य) की दो-तीन पेशियां (दो-तीन जन्म) भी ले लें, तो बड़ी बात नहीं है। इसीलिये ऐसे मन रखनेवाले महाशयों को, जो लगभग सब संसारी ही होते हैं, चीफ़कोर्ट अर्थात् बड़ी अदालत के जजों की पंक्ति में गिनना चाहिए; और कुछ लोग ऐसा मन रखते हैं जिसके भीतर कामनाएँ बहुत कम और बहुत छोटी छोटी उठती हैं अर्थात् जहां मुक़द्दमे बहुत थोड़े और छोटे-छोटे होते हैं, इस हेतु पहले तो एकदम में ही, नहीं तो एक दो घंटे या दिनों के भीतर-भीतर पूरे (फ़ैसल) हो जाते हैं। ऐसे मन रखनेवाले महाशय, जो प्रायः ज्ञानी या ऋषि लोग होते हैं, हिंदुओं के यहां अदालत खफ़ीफ़ा के जज माने जाते हैं। यद्यपि नाम या अदालत के विचार से ये छोटे दिखाई देते हैं परन्तु पद में इनको हमारे शास्त्र औलिया या पैगंबर (सिद्ध या अवतार) की श्रेणी में गिनते हैं। मगर यह याद रहे कि कामनाएँ अर्थात् मुक़द्दमे इन दोनों महाशयों के फ़ैसल अवश्य होंगे—अर्थात् वास्तव में ये दोनों महाशय सत्यकाम और सत्यसंकल्प अवश्य कहे जायँगे; केवल अंतर इतना रहेगा कि एक के मुक़द्दम (कामनाएँ) बहुत दर में और मुद्दत के बाद फ़ैसल होंगे और कामनाओं के देर में पूरी होने के कारण वह महाशय सत्यकाम और सत्यसंकल्प प्रकट में नहीं मालूम होंगे; और दूसरे के मुक़द्दमे (संकल्प) बड़ी जल्दी बल्कि तत्काल पूर्ण होते दिखाई देंगे, और कामनाओं के शीघ्र पूरा होने के कारण वे सत्यकाम और सत्यसंकल्प

दिखाई देंगे। मगर इन दोनों व्यक्तियों के संकल्पों अर्थात् मुक़द्दमों के पूरा होने में तनक भी संशय नहीं है। अतएव ऐसे महाशय जो इस बात की शिकायत करते हैं कि हमारी कामनाएँ पूरी होती नहीं दिखाई देतीं, इसमें केवल उनकी अपनी कमी है। यदि वे अपनी कामनाओं को पूरा होते देखना चाहते हैं तो अदालत खफ़ीफ़ा के जज (ज्ञानी, सिद्ध, अवतार) की भांति अपनी अवस्था बनाएं—अर्थात् उनकी भाँति मन में कामनाएँ (संकल्प मुक़द्दमे) छोटी-छोटी और बहुत थोड़ी होने दें। स्वयं उनको अपना अनुभव अपने आप साक्षी देगा बरन् उनको फिर कहने की भी आवश्यकता न रहेगी।

शंका—यदि स्वयं हमारी ही कामनाएँ पूरी होती हैं तो फिर भाग्य के, जिसकी चर्चा शास्त्रों में प्रायः आती है, क्या अर्थ हैं?

उत्तर—केवल जो कामनाएँ असंख्य होने के कारण एक जन्म में मरण पर्यंत पूरी नहीं हुईं, उनका अवशिष्ट समुदाय, पूरा होने के लिये, अपनी शक्ति के अनुसार, दुबारा जन्म दिलाता है और वही, न पूरी हुई कामनाएँ, जिन्होंने मरने के पश्चात् अपना-अपना फल देने के लिये दुबारा जन्म दिलाया है, अब (दूसरे जन्म में) भाग्य कहलाती हैं और इसीलिये हमारे शास्त्रों में लिखा है कि संकल्पों या कामनाओं के अनुसार लोगों का दूसरा जन्म होता है।

शंका—हिंदुओं के यहाँ यह कहावत प्रसिद्ध है कि 'यंत मता सोई गता' अर्थात् जैसी मरने के समय कामनाएँ होती हैं उन्हीं के अनुसार दूसरा जन्म होता है। मगर आप बतला

रहे हैं कि जो कामनाएँ पूरी हुए बिना पहले जन्म से बची रहती हैं, उनका फल जन्म होता है। इसमें फ़र्क़ क्यों है?

उत्तर—वेदांत भी इस बात का अनुमोदन करता है कि जो विचार अंत में अर्थात् मरने के समय होते हैं, उन्हीं के अनुसार दुबारा जन्म होता है। मगर साथ इसके वेदांत इस बात पर बड़ा ज़ोर देता है कि मरते समय विचार और कामनाएँ भी वही मन में आती हैं जो जीवन में मनुष्य के चित्त पर सवार रहती थीं। क्योंकि परीक्षा के कमरे में प्रश्नों के उत्तर उसी बालक के मन से निकलते हैं जो वर्ष भर पहले पढ़ता रहा है; और जो सारी आयु में पढ़ा ही नहीं वह कभी संभव ही नहीं है कि परीक्षा में जाकर पर्चा लिख आवे या परीक्षा उत्तीर्ण कर सके। अलबत्ता वही व्यक्ति परीक्षा पास कर सकता है जो परीक्षा के समय से पहले सारी आयु पढ़ता रहा हो। इसी तरह जो व्यक्ति सारी आयु भर बुरे विचार या बुरी कामनाएँ करता रहता है, तो संभव नहीं है कि मरने के समय अच्छी कामनाएँ उसके मन में उत्पन्न हों; और न यह संभव हो सकता है कि जो व्यक्ति सारी आयु अच्छी कामनाएँ या अच्छे काम करता रहा हो, मरने के समय बुरे विचार या बुरे काम उसके मन में प्रवेश करें, बल्कि जो विचार सारी आयु भर में पहले उठते रहे हैं और अभी तक पूरे नहीं हुए वही विचार मृत्यु के समय उसके मन में आयंगे या उन्हीं का समवाय शरीर धारण करके मृत्यु के समय उसके सामने आयगा और उनके अनुसार वह मरने के पश्चात् दुबारा जन्म लेगा।

अतः यह सिद्ध हुआ कि एक जन्म की अवशिष्ट कामनाओं का फल प्राप्त करना ही दूसरे जन्म की आवश्यकता

उत्पन्न करना है। वह व्यक्ति जिसके मन में मरने से पहले ही (जीवन-काल में) विचारों का उठना बंद हो गया है, उसके मन में मरने के समय भी कोई अच्छा या बुरा विचार उत्पन्न नहीं हो सकता। इसीलिये उसका कोई और जन्म भी नहीं होता। मगर ऐसी अवस्था प्रायः ज्ञानी या जीवनमुक्त पुरुषों की होती है। अतः जब यह सिद्ध हुआ कि जो कामना (संकल्प) या कर्म मनुष्य कर चुका है, उनका फल अवश्यमेव उसको विवश होकर भोगना पड़ता है और पहले कर्मों या संकल्पों का ही फल दूसरे जन्म में भाग्य कहलाता है, तो इससे स्पष्ट प्रकट है कि भाग्य के कारण मनुष्य परतंत्र वा बद्ध है और दूसरा अंश मनुष्य में स्वतंत्रता का अर्थात् कर्म करने का है जिस कर्म या कामना के करने से उसका आगामी भाग्य बनता है और जिसके करने में वह बिलकुल स्वतंत्र है, चाहे उसको करे चाहे न करे, और इसी कारण तत्ववेत्ताओं ने भी यह कहा है कि मनुष्य अपना भाग्य अपने हाथों बनाते है, क्योंकि यद्यपि मकड़ी में जाला तनने की शक्ति है, मगर जब तक उसने अपने मुँह से तार बाहर नहीं निकाले है वह बिलकुल स्वतंत्र है, मगर जब निकाल दे तो फिर उसमें बद्ध है। इसी तरह कर्म करने से पहले मनुष्य स्वतंत्र है और जब कर दिया तो उसके फल अर्थात् भाग्य का परतंत्र या बद्ध है। यह तो कुछ थोड़ा सा एक व्यक्ति रूप से वा व्यष्टि भाव से स्पष्ट किया है, मगर जब समुच्चय रूप से या समष्टि भाव से देखा जाता है तो और ही बात दिखाई देती है। हरबर्ट स्पेंसर साहब कहते हैं कि देश की अवस्था भी स्वयं अपने अनुकूल मनुष्य उत्पन्न कर लिया करता है।

यह बात ठीक है, क्योंकि जब थोड़ा विचारपूर्वक इन

सब बातों पर समुच्चय रूप से दृष्टि डाली जाय तो मालूम होता है कि वह नेपोलियन बोनापार्टे जो व्यष्टि रूप से स्वतंत्रतापूर्वक काम करता दिखाई देता था, उस व्यक्ति की भी ऐसे समय पर, ऐसे ज़माने में, आने की निस्संदेह आवश्यकता थी। इसलिये जब समष्टि रूप से देखा जाता है, तो मालूम होता है कि कोई दैवी शक्ति प्रत्येक में छिपी हुई (निहित) है, उसकी बदौलत मनुष्यों का जन्म सदैव वहाँ होता है जहाँ उनकी पहले आवश्यकता होती है, और उसी शक्ति की बदौलत सारे संसार में पुरुषों और स्त्रियों की संख्या भी एकसा रहती है। जिस प्रकार एक वस्तु में स्थिर (positive) और चंचल (negative) दोनों प्रकार की विजली एकत्र होती है, इसी तरह वह नियम जो इधर इच्छावाले उत्पन्न करता है उधर उनकी इच्छाओं को पूरा करनेवाला भी उत्पन्न करता है, इस तरह से दोनों पलड़े बराबर तुले रहते हैं। इस नियम से सिद्ध होता है कि वह नेपोलियन बोनापार्टे, जिसको आप स्वतंत्र कह रहे हैं, इसी नियम की बदौलत जन्म लेकर आया है अर्थात् जिसको स्वतंत्र कहा जाता था वह भी एक शक्ति के अधीन होकर जन्म लेता है। इस प्रकार से व्यष्टि रूप से तो यद्यपि वह स्वतंत्र दिखाई देता है मगर समष्टि रूप से यदि देखा जाय तो वह भी वैसा ही परतंत्र और बद्ध है जैसा कि व्यष्टि रूप से एक मनुष्य भाग्य की दृष्टि से परतंत्र या बद्ध कहलाता था अथवा दिखाई देता था।

प्रश्न—अतः समष्टि रूप से जब यह सिद्ध है कि सब काम एक ही शक्ति (चेतन) के द्वारा होते हैं अर्थात् एक ही चेतन सब कुछ करनेवाला है, तो फिर क्यों हरएक के मन में यह विचार उठता है कि "मैं स्वतंत्र हूँ"? साथ ही आप किस प्रकार कहते हैं कि मनुष्य स्वतंत्र और परतंत्र दोनों है?

दरमियाने-कारे-दरिया तख़्ता-बंदम करदाई। बाज़ में गोई कि दामन तर मकुन हुशियार बाश॥

तात्पर्य—ऐ प्रभो! गहरे दरिया में तूने स्वयं तो मुझे बांध-कर फैंक दिया है और फिर ऐसे कहता है कि कपड़ा मत भिगो (अर्थात् क्षोभायमान मत हो) और हुशियार रह।

उत्तर—यद्यपि द्वैत अर्थात् नानात्व के मानने वाले भी अभी तक इस प्रश्न का पूर्ण रूप से उत्तर नहीं दे सके, मगर वेदांत बड़े ज़ोर से गरज कर प्रेम पूर्वक प्रत्येक को यह उत्तर देता है कि प्यारो! यह भेद वा रहस्य, जो संसार भर के दर्शनों और धर्मों से स्पष्ट नहीं हुआ और जिसका उत्तर देने में भेदवादियों की आँखें नीची हो जाती हैं, बताता है कि हाँ वही परम स्वतंत्र, जो प्रत्येक के भीतर बोल रहा है कि "मैं स्वतंत्र हूँ" और जो सबका अंतर्यामी है और जिसके फुरने मात्र से ही यह संपूर्ण जगत् बना हुआ है, वही सारा का सारा मनुष्य के भीतर मौजूद है और वही मनुष्य का अंतरात्मा है, वही बाहर है। जैसे श्रुति कहती है—

"यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदान्विह मृत्योः स मृत्युमाप्नोति यह हु नानेव पश्यति" ॥ (क० अ० 2 म० 10)

अर्थात्—जो यहाँ है, निःसंदेह वही वहाँ है, और जो वहाँ है वही यहाँ है। इस स्थान पर जो भेद देखता है वह निःसंदेह एक मृत्यु से दूसरी मृत्यु के मुँह में जाता है।

और यही भेद इस बात को और श्रुतियों के द्वारा स्पष्ट रीति से पुकारकर प्रकट कर रहा है कि जो बाहर है वही तुम्हारे भीतर है। यथा—

"तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके। सदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः" (ई० अ० 1 मं० 5)

अभिप्राय—हम चल हैं, हम चल हैं नाहिं, हम नेडे हम दूर। हम ही सब के अन्दर चानन, हम ही बाहिर नूर।

और बहुत सी श्रुतियाँ हैं जो इस रहस्य को स्पष्ट रूप से खोलकर दर्शाती हैं, पर उन सब के लिखने से ग्रन्थ के ग्रन्थ भर जायंगे, इसलिये इस समय केवल इतना ही समझा देना काफ़ी है।

अब जो वेदांत ने पहले बताया है कि मनुष्य में एक अंश स्वतंत्र और एक अंश परतंत्र है, उसके अर्थ केवल यही हैं कि उस परम स्वतंत्र स्वरूप आत्मा की दृष्टि से जो आपके भीतर सारे का सारा मौजूद है, आप स्वतंत्र हैं; और शरीर की दृष्टि से आप बिलकुल परतंत्र वा बद्ध हैं। शरीर को यदि कहो कि स्वतंत्र है तो कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि शरीर की दृष्टि से उस पर कोई न कोई अधिकार रखनेवाला अवश्य रहता है। और फिर यह शरीर रोगादि व्याधियों के भी वश में रहता है और पहले कर्मों के फल भोगने को भी विवश है, इसलिये शरीर किसी भाँति स्वतंत्र नहीं हो सकता, और न परिवर्तनशील होने के कारण स्वतंत्र कहा जा सकता है। हाँ, अगर तुम स्वतंत्र कहे जा सकते हो तो उस परम स्वतंत्र स्वरूप के कारण से कहे जा सकते हो जो तुम्हारे भीतर उच्च स्वर से बोल रहा है कि "मैं स्वतंत्र हूँ, मैं स्वतंत्र हूँ", और यही परम स्वतंत्र आत्मदेव जो तुम्हारे भीतर से बोल रहा है, वही है जो सब वस्तुओं में समा रहा है। इस समय वार्तालाप यद्यपि द्वैतवाली दिखाई देती है, मगर स्मरण रहे कि ऐसा बोलने का प्रयोजन केवल तुमको ऊपर की ओर अद्वैत में लाने का है। पहले रहस्यों को समझाने के लिये, केवल द्वैत जाननेवालों के

लिये, उन्हीं की बोली ग्रहण करनी पड़ती है, जैसे अध्यापक बच्चे को जब आरंभ से पढ़ाता है तो उसके लिये केवल अलिफ़ को अफ़ल ही कहना पड़ता है। यद्यपि अध्यापक अलिफ़ की जगह अफ़ल केवल बच्चे के लिये बोल देता है, मगर अध्यापक का प्रयोजन लड़के को अलिफ़ कहलाने का होता है। इसी तरह अगर यहाँ एक आत्मा और एक शरीर या भीतर और बाहर अलग-अलग करके द्वैत बोली में बताया गया है तो भी वेदांत का प्रयोजन आपको द्वैत में डालने का नहीं है, बल्कि उसके द्वारा आपको ऊपर चढ़ाकर अद्वैत में ले जाने का है। तत्पश्चात् आपका भेद भी स्पष्ट खोला जा सकता है। मगर अभी आपको यहाँ तक समझ लेना आवश्यक है कि वह परम स्वतंत्र सबका अंतर्यामी आत्मदेव जो तुम्हारे भीतर बोल रहा है कि "मैं स्वतंत्र हूँ" वही देव बाह्य वस्तुओं में व्यापक है। जैसे जिस व्यक्ति के शरीर के किसी भाग में खुजली होती है तो उसी व्यक्ति का हाथ अपने आप ठीक स्थान पर जाकर खुजला लेता है, मगर अन्य व्यक्ति का हाथ अपने आप कभी भी ठीक जगह पर नहीं खुजला सकता। इसका क्या कारण है? इसका कारण यही है कि सारे शरीर में यही 'मैं' (आत्मदेव) भरपूर है, मेरी ही शक्ति सारे शरीर में फैली हुई है, क्योंकि जहाँ खुजली हुई थी वहाँ भी मैं ही था और मेरी चेतन शक्ति ही वहाँ मौजूद थी। यद्यपि वार्तालाप में भी यही आता है कि 'मुझे खुजली हुई' और जब हाथ के द्वारा दूर की गई तो उसमें भी मैं ही आत्मदेव मौजूद था और उसमें मेरी ही शक्ति व्याप रही थी जबकि यह कहा जाता है कि मेरे हाथ ने खुजली दूर की। अतः इन शब्दों से कि (मुझे खुजली) हुई और मेरे ही हाथ ने दूर की, सारे कथन का अभिप्राय यह

है कि खुजली की जगह और उसके दूर करनेवाले हाथ में शब्द 'मैं' (आत्मदेव) दोनों स्थानों में एक है। इससे प्रकट हुआ कि वही एक आत्मदेव शरीर के सारे भागों में फैल रहा है। यह व्यष्टिरूप से सिद्ध हुआ कि एक ही आत्मा शरीर के भीतर और बाहर या ऊपर और नीचे फैल रहा है। अब समष्टि रूप से बताया जाता है कि जिस समय आप रात को सो जाते हैं और सवेरे के समय जागने लगते हैं तो उस समय आँखें कुछ देखना चाहती हैं, अर्थात् उस समय आँखों को प्रकाश अनुभव करने के लिये खुजली होती है। मगर जब इधर आँखों को प्रकाश का अनुभव करने के लिये खुजली होती है, तो उधर से झट ठीक स्थानपर खुजली को दूर करने के लिये सूर्य रूपी हाथ आ जाता है। जैसे पहले बतलाया गया है कि जिसके बदन पर इधर खुजली होती है, उधर उसका ही हाथ उसको दूर करने के लिये भागता है, ऐसे ही इन दोनों का एक ही अवसर पर प्रकट होना सिद्ध करता है कि इन दिनों आँख (खुजली का स्थान) और सूर्य (खुजली दूर करनेवाला हाथ) के बीच में एक ही चेतन है। यह बात प्रत्येक को अपने-अपने अनुभव से सिद्ध हो जायगी कि जो लोग भीतर और बाहर एक ही आत्मदेव (अर्थात् एक मैं ही हूं) के देखने का अभ्यास करते रहते हैं, उनमें व्यावहारिक रूप से अद्वैत या प्रेम आ जाता है, बल्कि उनकी ऐसी अवस्था हो जाती है—

खूँ रगे-मजनूँ से निकला फ़स्द लैली की जो ली। इश्क़ में तासीर है पर जज्बे-कामिल चाहिये॥

बल्कि जो व्यक्ति ऐसा अभ्यास बराबर करता रहेगा कि "मैं शरीर नहीं हूँ" "मैं परिच्छिन्न मन, बुद्धि, अहंकार आदि नहीं हूँ, किन्तु संपूर्ण शरीरों का स्वामी हूं और सब शरीरों में मैं

ही फैला हुआ हूं," तो उसको इसका अनुभव इस बात के प्रमाण में स्वयं साक्षी देगा कि हाँ भीतर बाहर सब वस्तुओं में केवल एक ही चेतन आत्मदेव काम कर रहा है, और एक ही आत्मा (जो वास्तव में 'मैं' है) संपूर्ण जगत् में फैला हुआ है।

पहले वर्णन हो चुका है कि विशेष साहस और दृढ़ता जहाँ पर बड़े ज़ोर से होते हैं, वहां स्वार्थपरता की गंध नहीं होती, वहां कार्य अवश्य-अवश्य पूरे होते हैं। और जहां साहस और प्रयत्न कम होते हैं और स्वार्थ संग होता है, वहां सदैव असफलता रहती है। इस भेद के न समझने से कुछ महाशयों के चित्त में यह संदेह प्रायः उठता है कि निःस्वार्थ कार्य में क्यों सफलता होती है और स्वार्थ-पूर्ण कार्य में क्यों नहीं होती? इसका कारण वेदांत यह बतलाता है कि साहसी और स्थिर पुरुष नर-केसरी होता है और इसी कारण से वह मस्ती के मंदिर में रहता है, इसलिये वह एक अवस्था में ब्रह्मनिष्ठ होता है और बेखबरी से व्यावहारिक रूप से इसका अपने स्वरूप में, जो मन से परे है, निवास होता है और यही कारण है कि उसको सफलता प्राप्त होती है, क्योंकि उस अवस्था में केवल सत्यकाम और सत्यसंकल्प स्वरूप (आत्मदेव) से ही काम होते हैं। और जो हमारे शास्त्रों में लिखा हुआ है कि कर्मकांड से मन की शुद्धि होती है, इसका तात्पर्य भी केवल यही है कि जो व्यक्ति अपने कर्तव्य को भली भांति निभा रहा है, वह कर्मकांड को निभा रहा है। पहले समय में और कोई काम इतना फैला हुआ न था, केवल यज्ञादि करने का काम जारी था। इसलिये उन दिनों सब लोगों के लिये नित्यप्रति यज्ञ करना ही हरएक का कर्तव्य

था। मगर आज कल ऋषियों ने इस युग के अनुसार इन्हीं पहली वस्तुओं को संक्षिप्त रूप में उपासना, भक्ति और घर-बार के कामों के रूप में बदलकर आज कल के लोगों का कर्तव्य बना दिया है। इस लिये आज कल जो इन विधानों को ही अपने व्यवहार में लाता रहता है, वह कर्तव्य को पूरा कर रहा है, और इस तरह कर्मकांड को भली भांति निभा रहा है; और जो व्यक्ति व्यावहारिक रूप में अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिये उद्यत है, वह व्यावहारिक रूप में संसार-क्षेत्र से परे जा रहा है और उसका निवास मन से परे होता जाता है। इस प्रकार से ज्यों ज्यों वह बेखबरी से मन से परे होता अपने स्वरूप में लीन होता जाता है, उतना ही उसके मन की गति भी आत्मा की ओर होती जाती है और उधर प्रवृत्त रहने से शुद्ध होती जाती है, और फिर वह ज्ञान का अधिकारी होता जाता है।

शंका—अगर ईश्वर अलग न होता तो हमारी प्रार्थनाएँ, जो प्रायः स्वीकृत होती हैं, कदापि स्वीकृत न होतीं। और जब कि यह बात हम अपनी आँखों प्रत्यक्ष देखते रहे हैं कि हमारी प्रार्थनाएँ स्वीकार होती हैं, हम किस तरह तुम्हारे सिद्धांत को मान सकते हैं जो कि हमारे निजी अनुभव के साफ़ विरुद्ध है?

राम का यहाँ कहना है कि प्रथम तो संपूर्ण मनुष्यों की प्रार्थनाएँ स्वीकार नहीं होतीं; हाँ कुछ मनुष्यों की स्वीकार होती हैं; उनकी भी यदि इस बात में साक्षी ली जाय कि प्रार्थनाएँ किस समय और क्यों स्वीकार होती हैं, तो उनसे साफ़-साफ़ वेदांत के अनुसार यही उत्तर मिलेगा कि हाँ किसी व्यक्ति की प्रार्थना उस समय स्वीकार होती है जब

एक इष्टदेव को सामने रखकर प्रार्थना करनेवाले पर, संयोग से या बेखबरी से, ऐसी अवस्था आ जाती है, जिसकी प्रशंसा में एक कवि यों कहता है—

तू को इतना मिटा कि तू न रहे, और तुझमें दुई कि तू न रहे। जुस्तजू भी हिजाबे-हिजाबे-हस्ती है, जुस्तजू है कि जुस्तजू न रहे॥ आरज़ू भी विसाले-परदा है, आरज़ू है कि आरज़ू न रहे।

या जिस समय कि उसका मन अपने स्वरूप (आत्मा) में डूबा हुआ होता है और जिस समय उसमें "मैं हूं" और 'तू है" यह विचार दूर हुए होते हैं, अर्थात् जिस समय 'तू' 'मैं' से परे गया हुआ होता है और ऐसे स्थान में पहुंचा हुआ होता है कि जहाँ पर बुद्धि का भी यह हाल हुआ होता है—

अगर यक सरे-मूए बरतर परम। फ़रोगे-तजल्ली बसोज़द परम॥

अभिप्राय—अगर मैं एक बाल के सिरे के बराबर भी और बढूं तो उसके तेज से मेरा पर जल जाय।

उस समय प्रार्थना स्वीकार होती है, क्योंकि उस समय प्रार्थना करनेवाला अपने स्वरूप में डेरे लगाए हुए होता है जो सत्यकाम और सत्यसंकल्प है, जहाँ विचार उठते ही पूरा हो जाता है—अर्थात् उस समय उस छोटी "मैं" या स्वार्थ से रहित होकर प्रार्थना होती है। दूसरे अर्थों में यह कि उस समय अपने यथार्थ स्वरूप सत्यकाम और सत्य संकल्प से प्रार्थना निकलती है और उठते ही तत्काल पूरी होती है। न कहीं अलग शरीरधारी ईश्वर उसको सुनकर स्वीकार करता है और न कोई इष्टदेव उपस्थित होकर स्वीकृति की आज्ञा प्रदान करता है, बल्कि आप ही "एकमेवाद्वितीयम्" उस समय करते कराते हो।

इन ऊपर लिखे हुए उदाहरणों से प्रकट हुआ कि अपने ही स्वरूप "एकमेवाद्वितीयम्" से जो संपूर्ण अन्य शरीरों का भी अंतरात्मा है और जो सत्यकाम और सत्यसंकल्प है सारे संसार की प्रार्थनाएं कामनाएं और संकल्प आदि पूरे होते हैं। किंतु आश्चर्य की बात केवल यही है कि जिसकी बदौलत यह सब सफलता हो रही है, उसके पाने की या उसके जानने की बिलकुल इच्छा या प्रयत्न नहीं किया जाता। एक कहानी है कि किसी राजा के असंख्य रानियां थीं जो हर प्रकार से अपने राजा को प्रसन्न रखने में शील रहती थीं। एक दिन राजा ने इन सब रानियों को बुलाकर कहा कि मैं तुम से बड़ा प्रसन्न हुआ हूँ, इसलिये मेरी राजधानी में जौनसी वस्तु मांगो, मैं देने को तैयार हूँ। इसपर किसी ने मोतियों का हार मांगा, किसी ने असंख्य आभूषण मांगे, किसी ने राजधानी का कुछ भाग मांगा, किसी ने लाल पन्ने आदि मांगे; मगर केवल एक ने राजा की बाहु पकड़कर कहा कि मैं तुमको मांगती हूँ, जिसपर वह सब रानियों से बढ़ गई, क्योंकि उसने सारे राज्य के स्वामी को अपना बना लिया था। इसी प्रकार वह आत्मदेव जिसकी शक्ति से संपूर्ण संसार स्थिर है और जिसकी शक्ति से संपूर्ण कामनाएं पूरी होती हैं, उसको कोई बिरले ही मांगते हैं और शेष सब संसारी वस्तुओं को, जो बिलकुल तुच्छ, हीन, और अपदार्थ हैं, मांगते रहते हैं।

सिंधु विषे रंचक सम देखें। आज नहीं पर्वत सम पेखें॥

अब प्रश्न यह होता है कि वह आत्मा जो सब को घेरे हुए है, उसके पाने की इच्छा न करने का कारण क्या है?

उत्तर—इसका कारण यह है कि वह आत्मा कोई अन्य नहीं, बरन सब का अपना आप है, इसलिये इच्छा नहीं

होती। यदि कोई अन्य होता तो उसके पाने की इच्छा भी होती। मगर यहाँ पर भी एक बात हरएक की समझ में नहीं आती है कि शास्त्रों में जो आत्मानंद के प्राप्त करने की चर्चा बहुत जगह आई है उसका तात्पर्य यह नहीं है कि जैसे बाहर के पदार्थों को अलग समझ कर उनके पाने का प्रयत्न किया जाता है वैसे ही आत्मा के आनंद को भी कहीं किसी बाह्य वस्तु में समझकर उसके प्राप्त करने की जिज्ञासा की जावे, बल्कि वहां शास्त्रों का यह प्रयोजन है कि आत्मानंद तो आपका सच्चा अपना आप है ही, मगर अज्ञान के कारण भांति-भांति की कामनाओं और संकल्पों ने इसको तीदण स्वभाव बना दिया है। केवल इस तीष्णता को ही दूर करना है। जैसे सिकंजबीन में भी मिठास होती है, पर सिरके की खटाई मिलने से मिठास ज़रा कम मालूम होती है। इस लिये खांड की मिठास को अपनी असली हालत पर लाने के लिये केवल यह आवश्यक होता है कि उस में से वह सिरके की खटाई दूर की जावे। ऐसे ही आत्मानंद तो आनंदघन है ही, मगर पदार्थों की कामना को भीतर प्रविष्ट करने के कारण ज़रा तीदण स्वभाव हो रहा है। केवल इसी तीष्णता को, इच्छाओं के बंद करने से, निकाल देना आवश्यक है जिस में वह शुद्ध खांड की भांति आनंदघन अनुभूत होने लगे। इस आनंद के अनुभव करने की शैली यही है कि भविष्य में बाह्य पदार्थों की कामनाएं बंद कर दी जावें और निज शरीर से जो प्रेम और मोह है, उसको दूर कर दिया जावे, क्योंकि शरीर के साथ संबंध रखने ही से उसके पालने पोसने के लिये और पदार्थों के प्राप्त करने की कामनाएं उठती रहती हैं। अतः शरीर के साथ बिलकुल संबंध न रखना और "मैं आत्मा ही हूं, शरीर नहीं हूं," ऐसा दिन-

रात अभ्यास करना ही अपने आत्मानंद को उसकी आनंदघन अवस्था में लाना है; और यही अभ्यास या पुरुषार्थ आनंद के प्राप्त करने का ठीक प्रयत्न है। इस प्रकार अपने आत्मा अर्थात् अपने ही स्वरूप के घन आनंद का अनुभव करना ही आत्मा को पाना होता है, कोई बाहर से प्राप्त करना नहीं होता। किन्तु आश्चर्य और शोक का स्थान केवल यही है कि जिस शरीर-संबंधी कामों के पूरा करने का विचार तक नहीं आना चाहिए था, बल्कि उन कामों को भाग्य पर छोड़ देना था, अब उनके पूरा करने के लिये प्रयत्न किया जाता है और इस प्रकार शारीरिक भ्रांति बढ़ाई जाती है; और जिस आत्मिक आनंद के पाने के लिये पुरुषार्थ करना था और शारीरिक भ्रांति दूर करना था, उसको केवल भाग्य पर छोड़ जाता है। इस ढंग से उन्नति के स्थान पर अवनति होती है। उदाहरण में एक कहानी है।

एक मनुष्य को दो रोग थे, एक आंख (नेत्र) का, दूसरा पेट (उदर) का। रोगी हस्पताल में गया और डाक्टर साहब को दोनों रोगों को दिखाया। डाक्टर साहब से आंख के रोग को दूर करने के लिये सुरमा और पेट के रोग को दूर करने के लिये पाचन-चूर्ण लेकर लौट आया, मगर दुर्भाग्य से दोनों पुड़ियों को भूल से उलट-पलट कर दिया। दवाई खाने के समय सुरमे की पुड़िया तो खा डाली और चूर्ण आंख में लगा लिया, जिससे दोनों रोगों की दशा भयंकर हो गई। इसी तरह यहां भी इस विषय में सारे काम उलटे हो रहे हैं। क्योंकि जिस शरीर को केवल भाग्य पर छोड़ना था, उसके लिये पुरुषार्थ किया जाता है, अर्थात् आंख की दवा पेट में डाली जा रही है; और जिस आत्मानंद के पाने के लिये पुरुषार्थ करना चाहिए था, उसको केवल भाग्य पर

छोड़ा जाता है अर्थात् पेट की औषधि आंख में डाली जा रही है। इस तरह से उन्नति के स्थान पर अवनति हो रही है। ऐसी दशा में क्योंकर आशा की जा सकती है कि आत्मिक आनंद हर एक को प्राप्त हो। प्यारों! यदि आनंद को प्राप्त किया चाहते हो तो उसके पाने के वास्ते अनंत पुरुषार्थ करो, अर्थात् कामना करना बंद करो और शरीर-संबंधी कामों को केवल भाग्य पर छोड़ दो, क्योंकि शरीर-संबंधी काम तो भाग्य के अनुसार अपने आप हो ही जावेंगे। काम अगर है तो केवल यही है कि अपने आत्मा में लीन हो जाओ, अपने स्वरूप में डेरे गाड़ दो और अपने आत्मा रूपी आनंद में मस्त होकर अपनी ईश्वरता की गद्दी को संभाल लो। केवल तुम्हारे अपने स्वरूप को राजराजेश्वर के सिंहासन पर आसन जमाने की आवश्यकता है, तब सारे काम बिना तुम्हारे संकेत के ही होते हुए दिखाई देंगे। जैसे जज साहब जब अपनी कचहरी में आते हैं तो उनका काम केवल कुर्सी पर बैठ जाना और संसार के मुक़द्दमों को फ़ैसला करने का होता है, शेष सब काम (कमरे का साफ़ आदि करना, भेजे पर दावात क़लम रखना और वकील साहब तथा मुहर्रिर आदि को बलवाना इत्यादि) अपने आप जज साहब के हाथ हिलाए बिना ही होते रहते हैं। इसी तरह ब्रह्मनिष्ठ होने पर अर्थात् संपूर्ण विश्व के सम्राट् के सिंहासन पर इजलास करने के बाद मुक्त पुरुषों का काम केवल अपने स्वरूप के आनंद में मग्न रहना ही होता है, शेष संसारी काम मारे डर के प्रकृति अपने आप बिना संकेत के करती रहती है। मगर भगवन्! यह अवस्था तब ही होगी जब औषधि अर्थात् पुरुषार्थ का उचित व्यवहार करोगे, अर्थात् शरीर को भाग्य पर और आत्मिक उन्नति को पुरुषार्थ पर छोड़ोगे।

एक बार रोम के लोगों ने ईसा से प्रश्न किया कि क्या हमें बादशाह को कर (खिराज) देना चाहिए, या नहीं? प्रश्न इस हेतु से था कि यदि महाराज ईसा यह आज्ञा देंगे कि खिराज नहीं देना चाहिए तो झट रोम के बादशाह को खबर देंगे कि हज़रत ईसा लोगों को राजद्रोही बनाते हैं, और यदि वह अपने श्रीमुख से यह आज्ञा देंगे कि खिराज दे देना चाहिए तो उनके इस वचन को कि "मैं बादशाहों का बादशाह हूँ", या "मुझपर ईमान लाओ," झूठा सिद्ध करेंगे। मगर महाराज ईसा ने इसके उत्तर में एक रुपया हाथ पर रखकर उन प्रश्न करने वालों से पूछा कि प्यारो! पहले यह बताओ कि इस रुपये पर मुहर किस की लगी हुई है? लोगों ने उत्तर दिया कि कैसर की। अतः महाराज ने आज्ञा दी कि वह वस्तुएँ जिन पर कैसर अर्थात् रोम के बादशाह की मुहर लगी हुई है, कैसर के हवाले कर दो; जिनपर ईश्वर की मुहर लगी हुई है, वह ईश्वर के हवाले कर दो। ऐसे ही भगवन्! पुरुषार्थ को कि जिसपर आत्मा की मुहर लगी हुई है, आत्मा के हवाले कर दो; और वह जिसके ऊपर भाग्य की मुहर लगी हुई है, उस शरीर रूपी नकदी को भाग्य के हवाले कर दो। जब एक मनुष्य उत्तम श्रेणी का काम करता है, तो उसकी अनुपस्थिति में निम्न श्रेणी के सब काम होते जाते हैं। इसी प्रकार ज्यों ज्यों पुरुष अपने पुरुषार्थ से अपने स्वरूप की ओर पग बढ़ाए जाता है अर्थात् उत्तम श्रेणी का काम करता जाता है, संसारी शरीर-संबंधी काम अर्थात् निम्न श्रेणी के काम अपने आप उत्तम रीति से पूरे होते जाते हैं।

ॐ ! ॐ !! ॐ !!!