श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

पुरुषार्थ और प्रारब्ध।

भाग 6 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 6 · अध्याय 4 / 5

पुरुषार्थ और प्रारब्ध।

[ अमेरिका से लौटकर 1905 में लखनऊ में दिया हुआ स्वामी जी का व्याख्यान ]

असली हवाला या प्रमाण तुम्हें स्वयं होना चाहिए। क्या पुस्तकें बेकार हैं? निस्संदेह पुस्तकों से मुझे सहायता मिली और जो कुछ उन पुस्तकों में लिखा था वह सब अपने अनुभव में लाया। वह पहले मेरे प्रमाण और हवाला थीं और अब मैं स्वयं प्रमाण और हवाला हूँ। रसायन विद्या की पुस्तक विद्यार्थी को सहायता देती है, किंतु विद्यार्थी का अपना अनुभव उसकी सच्ची प्रामाणिकता करता है। वेद या कुरान तुम्हें आत्मिक रसायन में सहायक हो सकते हैं, लेकिन तुम्हारा स्वतः का अनुभव असली प्रमाण या हवाला है। आप लोग आज मेरी सब बातों से सहमत न होंगे, खैर आज नहीं तो कल सहमत होंगे, और कल नहीं तो दूसरे जन्म में जाओगे, वहाँ मानना ही पड़ेगा। सचाई की सदैव विजय होगी। असली जाति मनुष्य की तो है ईश्वर, और सारे संसार की शक्तियां उसके आधीन हैं। लेकिन जिसको प्रायः लोग जन वा मनुष्य कहते हैं, मन-बुद्धि, और शरीर है। यह उसी तरह से प्रकृति की शक्ति प्राप्त है जिस तरह से नदी-नाले, बादल, हवा वर्षा और सूर्य हैं। यदि मनुष्य को इन्हीं अर्थों में लें, तो मनुष्य एक मिकैनिकल पराधीन वस्तु अन्य वस्तुओं की भाँति है। कहते हैं कि गेंद को हाथ में लेकर, जब हवा में फेंकते हैं उसमें एक गति उत्पन्न हो जाती है। यदि कहीं वह सचेत हो जाय अर्थात् उसमें चेतना

(कौंशंस) समझने-बूझने की शक्ति उत्पन्न हो जाय, तो वह यही कहेगा कि मैं स्वयं चलता हूँ; लेकिन यह प्रत्यक्ष है कि वह स्वयं नहीं चलता, भिन्न भिन्न शक्तियाँ हैं जो उसे चलाती हैं जिनमें से एक ग्रैविटेशन (आकर्षण शक्ति वा अधः पतनशीलता) है और एक वह शक्ति है जिसने उसमें गति उत्पन्न की थी। मनुष्य भी इसी प्रकार अन्य शक्तियों की तरह है दूसरी शक्तियों की अधीनता में काम करता है। भेद केवल इतना है कि वृक्ष, फल, फूल और वनस्पति में चेतना नहीं और यह सचेत है। वह नहीं कहते कि हम किसी काम को करते हैं, लेकिन यह कहता है कि 'मैं करता हूँ' 'मैं करता हूँ'। वास्तव में वह एकही शक्ति है जो सबमें काम करती है, यद्यपि नाम अनेक हैं। संसार की और वस्तुओं में उसे ग्रेविटेशन (अधः पतनशीलता वा आकर्षण शक्ति) कहो और उसी शक्ति का मनुष्य में चाहे प्रेम नाम रक्खो, प्रकृति में उसे अट्रैक्शन (ग्रहण-शक्ति) कहो और मनुष्य में भक्ति। प्रकृति में जो अट्रैक्शन और रिपल्शन (आकर्षण और विकर्षण वा निराकरण) है, वही मनुष्य में राग-द्वेष है। इसको एक उदाहरण से स्पष्ट किया जायगा। पहाड़ों की चोटियों पर बर्फ जमी रहती है और उसी में ग्लेशियर या बर्फ की नदी उत्पन्न होती है और रास्तों को काटती-छाँटती, वृक्षों को उखेड़ती-पुखेड़ती आगे बढ़ती चली जाती है। यह किसकी बदौलत? सूर्य की बदौलत, तथा अन्य शक्तियों के भी कारण जो मिलकर काम कर रही हैं। फिर वह आगे बढ़कर नदी बनकर चली। यह नदी क्योंकर चल रही है? वही सूर्य, आकर्षण शक्ति तथा अन्य शक्तियाँ काम कर रही हैं जो बर्फ में कर रहीं थीं। किंतु नदी तरल है, इस लिये सूर्य का उसमें प्रतिबिम्ब पड़ता है। पक्षी, वनस्पति और पाषाण

जो उन्नति कर रहे हैं, वह परमेश्वर की बदौलत, या कई विभिन्न शक्तियों की बदौलत, अविनाशी भगवान् की बदौलत। लेकिन वे (पक्षी पाषाण आदि) जमी हुई बर्फ की भाँति हैं और उनमें सूर्य का प्रतिबिम्ब या चेतनात्मा का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। मनुष्य का संबंध अन्य वस्तुओं के साथ वही है जो पिघलती हुई नदीका बर्फ के साथ। इसमें नदी की भाँति एक प्रतिबिम्ब (चेतनता) पड़ रहा है; सचेतन है, अहंता का मादा (बीज वा मूल) उत्पन्न हो गया; और कहता है कि यह तो "मैं करता हूँ," "मैं करता हूँ," यद्यपि करनेवाली वही सारी शक्तियाँ हैं। वास्तव में वृक्षों का ईश्वर वही है जो तुम्हारा ईश्वर है, वृक्षों का अंतरात्मा वही है, जो तुम्हारा। इस लिए वृक्ष तुम्हारे भाई हुए, संपूर्ण ईश्वरीय सृष्टि तुम्हारी भाई हुई। यह बात तो प्रकृतिने समस्त ब्रह्मांड में दिखा दी है, और साथही यही दर्जे छोटे पैमाने पर प्रत्येक मनुष्य के जीवन में भी पाए जाते हैं। जब वह बच्चा था तो आत्मा यद्यपि वैसाही था, लेकिन अहंकार वा अहंता उसमें नहीं समाई थी। बढ़ते ही मानो पहाड़ों की बर्फ पिघल पड़ी और उस नदी में सूर्य की किरणें पड़ने लगीं अर्थात् उसमें चैतन्य का प्रतिबिम्ब पड़ने लगा और वह कहने लगा "यह मैंने किया," "मैंने किया," जो बचपन में नहीं कहता था। सुषुप्ति की अवस्था लो। इस अवस्था में भी शरीर कुछ न कुछ बढ़ ही रहा है। इसमें रक्त का दौड़ा बंद नहीं, किंतु इस समय अहंता की अवस्था नहीं। उस समय तो तुम पाषाण या वनस्पति के भाई हो। जब जाग्रत अवस्था में आप तो फिर तरल अवस्था में आप और किरणें प्रतिविम्बित होने लगीं, फिर कहने लगे कि "पुस्तकें मैंने लिखीं", "व्याख्यान मैंने दिया", 'यह मैंने किया' 'वह मैंने किया'। एक बात और विचार करने की है।

जब मनुष्य अति उच्च अवस्था पर पहुँचा हुआ होता है — कवि का उदाहरण ले लो, जिस समय वह अपने विचारों में मग्न हो जाता है — उसे कदापि स्मरण नहीं रहता कि मैं लिख रहा हूँ। अहंता का खयाल ही नहीं। जिस समय एक गणितज्ञ कठिन से कठिन गुत्थियों (घुड़ियों वा उलझनों) को हल कर रहा हो, उस समय मानो उसका मस्तष्क ईश्वर ने पकड़ लिया है, अहंता नितान्त दूर है। लेकिन निरहंता (देहाध्यास की शून्यता) में हल कर चुकने के बाद फड़क उठा कि वाह क्या! "ग्रन्थी हल की है," 'मैंने की है'। नेपोलियन को देखिए कि युद्धक्षेत्र में खड़ा है, इधर गोला सनसनाता हुआ निकल गया, उधर से सनसनाता हुआ आया, हज़ारों मनुष्य गिर रहे हैं, लेकिन उसे खबर ही नहीं कि क्या हो रहा है, खुदी (अहंता) का नाम ही नहीं, इसकी वही दशा है जैसी ग्लेशियर की हालत। जब अत्युच्च स्थिति पर शक्ति होती है, अहंता नहीं होती। यह बात याद रखने-योग्य है कि जितने बड़े बड़े काम होते हैं, अहंता के बिना होते हैं। और आश्चर्य यह है कि जब अहंता आती है तो हमारे कार्य को रही कर देती है। एक मनुष्य व्याख्यान दे रहा है जिस समय उसे खयाल आया कि मैं अच्छा व्याख्यान दे रहा हूँ, उसी समय से वह बात जाती रही। लड़के ने जिस समय स्कूल में यह खयाल किया कि क्या अच्छी तरह कविता पढ़ रहा हूँ, बस उसी समय मुँह बन्द हो गया। यह अहंता उस मक्खी की भाँति है जो गाड़ी चल रही थी तो घोड़े की पीठ पर बैठी हुई कह रही थी कि गाड़ी मैं चलाती हूँ। मनुष्य में जब अहंता आई, वहीं से "तुम और हो, मैं और हूँ" हो गया। अहंता ही है जिसकी बदौलत मस्तष्क में यह बात समा जाती है कि 'यह हमने किया,' यद्यपि अहंता ने कुछ भी नहीं किया। जैसे

कि सूर्य की गर्मी और आकर्षणशक्ति नदी को चलाने के कारण थे, यदि नदी में प्रतिबिम्ब कह दे कि मैं नदी चला रहा हूँ तो क्या आप उसे मानेंगे? या वह माने जाने के योग्य है? इसी प्रकार आपकी अहंता नहीं है जो काम करती है। जो काम आप कर रहे हैं या हो रहा है, वह एक परमेश्वर की बदौलत हो रहा है। जैसे लेवरटरी Laboratory होती है या इनवंटरी (Inventory), वहां खयाली बातें नहीं हैं, वहां प्रत्येक वस्तु का अनुभव और साक्षात्कार किया जाता है। वैसे अमेरिका में संकल्प शक्ति (वा संकल्प शास्त्र) के अनुभव भी किये जाते हैं। कुछ अनुभव जो राम ने देखे हैं, अब उनकी साक्षी देगा। एक मनुष्य को ऐसी अवस्था में डाल सकते हैं जब अहंता काम न कर सके, अर्थात् नदी बहती जाय और सूर्य का प्रतिबिम्ब न पड़े। यह वह अवस्था है जिस समय मनुष्य हिप्नोटाइज़्ड या साइकौलोजाइज़्ड कर दिया जाता है। राम के सामने एक ऐसे मनुष्य को इस अवस्था में डाला जिसे चौथिया का ताप था अर्थात् जिसे चौथे दिन की बारी से ज्वर आया करता था। उसे हिप्नोटाइज़ करके उसमें यह खयाल (संकल्प) डाला कि ज्वर दूर हो जाय, और ऐसी चित्तशक्ति से यह खयाल भरा कि उसका प्रभाव हो। फिर उसी अवस्था में ले आए। ज्वर दूर हो गया, किन्तु उसके स्थान में नित्य ज्वर आने लगा। यह खयाल का अपराध नहीं था, बरन उसका अपराध था जिसने खयाल भरा था। कुछ समय बाद उसमें ज्वर बिलकुल छोड़ देने का खयाल डाला गया और फिर जगाया गया। ज्वर बिलकुल दूर हो गया। यह परिणाम इस बात का सूचक है कि आप का शरीर आपके संकल्पों (खयालों) से बना हुआ है। और अनुभव सुनिए। एक व्यक्ति था जिसे सिगार पीने का

बड़ा व्यसन था। उन्होंने चाहा कि वह स्वभाव बंद कर दें। उसे बेहोशी की अवस्था में डाला और उसमें यह खयाल भरा कि उसने दिन भर में एक ही बार सिगार पिया है। इसके बाद उसने एक इतना बड़ा सिगार बनाकर पीना आरंभ किया जो सब के बराबर था। यह भूल खयाल डालने वाले की थी। फिर दुबारा उसपर अमल किया गया और अभ्यास बिलकुल छूट गया। इन अनुभावों में आरंभ में तो कुछ असफलता रही, मगर पूर्ण सफलता के अनुभव भी यह ही हैं। कल बताया था कि मिस्टर जौन्स उसकी ऐसी अवस्था बदल गई और उसके खयालों की शक्तियां ऐसी मरोड़ी गईं कि वह डाक्टर पाल की अवस्था में काम करने लगा। यह अनुभव चाहे मानो या न मानो। अभी कुछ काल नहीं बीता कि लोग रेल और तार की आश्चर्यजनक शक्तियों को न मानते थे। न मानो, तुम्हारी इच्छा है। किंतु यह आँखों देखी बातें हैं, उनको राम कैसे कह दे कि नहीं हैं। आपके शरीर की रोगता और अरोगता, आपके मुख मंडल की प्रफुल्लता और मलिनता, और आप के मुख मंडल की रंगत, यह कौनसी शक्तियां हैं जो चला रही हैं। यह शक्तियां खयाल की हैं। आपकी वाह्य अवस्था और कर्म आप के इस खयाल की शक्ति पर निर्भर हैं। कल राम ने आपको बताया था कि एक मनुष्य को ऐसी अवस्था में डालकर फ़र्श को भील कर दिया और वह उस में मछलियाँ पकड़ने लगा। यह भी देखा कि एक मनुष्य को ऐसी अवस्था में डाला गया और खयाल किया कि वह वृद्ध है, सिर एक मेज़ पर रखा और पैर दूसरी मेज़ पर, बीच में बोझ रखा गया और उस पर लड़के चढ़े, लेकिन झुकने का नाम नहीं, यह क्या! यह सिद्ध करता है कि शारीरिक और बाह्य काम खयाल पर निर्भर हैं।

जैसी आपकी मती होगी, वैसी आपकी गती होगी।

विचारों की एक अवस्था होती है, जिस में अहंता का साथ न हो। उस अवस्था को कारण शरीर (सब्जेक्टिव माइंड) वा सुषुप्ति कहते हैं। एक अवस्था में अहंता का साथ होता है उसे सूक्ष्म शरीर (आब्जेक्टिव माइंड) वा स्वप्न कहते हैं, जाग्रत अवस्था को स्थूल शरीर कहते हैं। ये तीनों शरीर परस्पर ऐसा संबंध रखते हैं जैसे पानी और बर्फ का परस्पर संबंध होता है। जो काम हाथ से होता है, उसका प्रभाव मन पर पड़ता है। और इस समय जो व्याख्यान सुन रहे हो, वह अपनी इंद्रियों से सुन रहे हो, यह शारीरिक क्रिया है। और फिर सूक्ष्म शरीर की क्रिया अर्थात् विचार हो रहा है। जब यहाँ से चले जाओगे, कुछ देर तक प्रभाव रहेगा, फिर यह प्रभाव मन में भी नहीं रहेगा, अंततः यह शक्ति भी कहीं न कहीं रहेगी। अगर तुम्हारे पास न रही, तो फिर यह शक्ति कहाँ रहेगी? यह सुषुप्ति अवस्था या कारण शरीर में रहेगी। वहाँ का जाना यों स्वीकार करेंगे। एक झील है, उस में बहुत सी वस्तुएँ गिरीं। कुछ देर ऊपर रहीं, फिर तह में जम गईं। अगर हिलाते हैं तो सतह (तल) पर आ गईं। राम हिंदुस्तानी बोल रहा है, अंग्रेज़ी फ़ारसी मन की तह में है। मनकी झील को हिला दें, तो सतह पर आ सकती हैं। जिस समय आप स्वप्नमय वा मनोमय जगत् में होते हैं तो कई बार जोश आ जाता है कि 'मैं यह काम करूँगा, वह काम करूँगा,' मानो यह शक्ति बाहर से आई, इस तरह यह आपको गति में डाल देती है। यह कब हुआ? किसी दूसरे ने यह खयाल दिला दिया या भीतर से उत्पन्न हुआ? राम स्पष्ट करके दिखा देगा कि राम के सामने यह अनुभव हुआ। एक लड़का था। हिप्नोटाइज़्ड किया गया और उससे कहा कि "देखो जिस

समय तू जाग पड़ेगा, हम ताली बजाएँगे, साथ ही इसके तुम पानी की ओर जाना और नदी के पास एक छड़ी पड़ी है उसे उठा लेना और नाचना और गाना, वहाँ से लौटकर आकर बैठ जाना"। यह कथन कारण-शरीर में डाला गया जिस में यह खयाल जम गया, लेकिन जागकर वह बात भूल गया कि किसी ने कुछ कहा था। भूल जाने के यह अर्थ हैं कि झील की तह में वह बातें थीं उसे खबर ही नहीं रही। जिस समय तह हिला दी गई अर्थात् ताली पिटी पश्चिम की ओर चला और छड़ी उठाली, सिर पर रक्खी, नाचा, गाया और लौट आकर बैठ गया। उससे पूछा जाता है, यह क्या है? हमने तुझे ऐसी अवस्था में न समझाया था, लेकिन वह मानता ही नहीं। वह कहता है कि यह मेरे मन का खयाल था, मेरा यह जोश था, मेरी यह मौज थी। इसी प्रकार प्रायः हम काम कर बैठते हैं, किंतु उसका कारण नहीं मालूम होता। अदालत में प्रायः कारण पूछा जाता है। वह लोग साइकौलाजी के सिद्धांत ही को नहीं जानते। यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक काम का कोई न कोई ज्ञात कारण ही हो।

भाग्य क्या है? — प्रारब्ध या कर्म, शाब्दिक अर्थ क्रिया, वा काम। क्या काम वह है जो शरीर से किया जाय? काम की परिभाषा वह गति है जिससे मन का संबंध हो। कर्म वह है जिससे मन को लगाव हो। असली कर्म वह खयाल है जो मन वा सूक्ष्म शरीर की तरह में है। अतः हमारे खयालों से भाग्य बना हुआ है। इसके संबंध में एक बात ध्यान से सुनिए। हिन्दू कहते हैं कि चौरासी लाख चक्र में होकर तुम अभी मनुष्य की योनि में आया है। evolution (परिणामवाद)

का प्रश्न हद दर्जे तक पहुँचा। अमेरिका में डार्विन के मत की व्याख्या उत्तम रूप से की गई, वहाँ एक अद्भुतालय (अजायबघर) है जहाँ माता के पेट का एक दिनका बच्चा, दो दिन का बच्चा, तीन दिन का बच्चा, इसी तरह पर नौ महीने तक के बच्चे शीशियों में रक्खे हुए हैं। आप विचार करें तो पहले मेंढक, मछली और बंदर आदि के रूप से वह गुज़र लेता है तब मनुष्य होता है। यह मामला है कि प्रकृति ने हमको दिखा दिया है कि दायरे (वृत्त) के भीतर दायरा है, प्याज के छिलकों की भाँति एकके भीतर एक मौजूद है, या द्रौपदी के चीर भाँति सारी में नारी और नारी में सारी है। एक ही नियम है जो सारे पदों की तहों में चल रहा है। वही नियम मनुष्य पर चलता है। जब मनुष्य माता के उदर में आता है, तो नौ मास के समय में सारी अवस्थाओं को पार कर जाता है। जैसे बी० ए० की परीक्षा के पहले लड़के पूरी किताबें थोड़े समय में दोहरा जाते हैं, शरीर की बनावट में यह पाया जाता है कि आपके कारण शरीर में पिछले जन्मों के अभ्यास संचित हैं। यह जो आप सुना करते हैं कि एक मनुष्य ने अपने को मुर्दा बना डाला है, नाड़ी और हृदय की गति बंद है। लोग कहते हैं कि वह मर गया और फिर जी उठा। इसके अर्थ यह हैं कि मेंढक आदि के जन्म में जो अभ्यास था, उसको दोहरा लिया। सिद्धि, सिद्धि लोग बहुत कहते हैं, इनके पीछे पड़ने का नाम उन्नति नहीं है, बरन् ऐसा करने से तुम अपनी अवस्था को रीछ और मेंढक आदि की अवस्था में डाल सकते हो जिन में अब भी बहुत शक्तियाँ वर्तमान हैं, जो सर्वसाधारण में सरल नहीं हैं। देखो, कुत्ता दूर से सूँघ लेता है, यदि तुम यह शक्ति प्राप्त करो, तो यह कुछ उन्नति नहीं है, वरन् बात का

दोबारा खयाल करना है। आपकी विचार-शक्ति सब कुछ कर सकती है। राम बतलाएगा कि किस ओर विचार लगाओ। शतरंज का उदाहरण लो। जब तक कुछ मोहरे मारे न जायेंगे, जीतना संभव नहीं। परिणाम यह निकलता है कि यदि सफलता प्राप्त करना है, तो कुछ वस्तुओं को छोड़ो और कुछ वस्तुओं को लो। इस लिये कि शक्ति अर्थात् प्रकृति उच्च स्वर से कह रही है कि समय के साथ परिवर्तित हो या नष्ट हो। प्रकृति की प्रत्येक वस्तु से, तारों से, वृक्षों से, पत्थरों से पाठ सीख सकते हो। ज़रा गौर से देखो, असभ्य लोगों को कहते हो कि परिणामवाद वा विकासवाद की उन्नति की दौड़ में असभ्य लोग बहुत पीछे हैं। किंतु राम ने देखा है कि उनके नेत्रों में इतना प्रकाश है कि मील दो मील की दूरी से हरे वृक्ष पर हरा तोता देख सकते हैं, पैरों में यह शक्ति है कि हरिन को दौड़ कर पकड़ सकते हैं, हाथों में यह शक्ति है कि सिंह से बिना शस्त्र के लड़ते हैं; किंतु सुसभ्य मनुष्य के न हाथ में न पैर में और न आँख में इतनी शक्ति है। इसका कारण क्या है? कारण यही है कि वे लोग इन [अंगों] को व्यवहार में लाते हैं, इसके बिना वे जीवित नहीं रह सकते। उनकी संतान भी वैसी ही होती है। सुसभ्य मनुष्य असभ्य की तरह नहीं दौड़ सकता है। जब जाना हुआ, गाड़ी घर पर तैयार है। अमेरिका में दो-दो मिनिट पर रेलें ऊपर-नीचे और भूमि पर चलती हैं, इसलिये अमेरिकन को पैरों का व्यवहार कम करना पड़ता है। रेलें मानों उन्हीं की बढ़ी हुई टांगें हैं। असभ्य पुरुष हाथ से काम लेते हैं सुसभ्य उसके स्थान में शस्त्रों से। जब आँख दुर्बल हुई उन्होंने ऐनक लगाई, दूरबीनों का आविष्कार किया कि दूर से दूर की वस्तुएँ दिखाई दें। अतएव ज्ञात हुआ कि सुसभ्य लोगों ने

हाथ, पैर और आँख की मुहरों को मरवा डाला और मस्तिष्क के मुहरे को जीवित रक्खा। ऐसे-वैसे मुहरे को पटवाना ही अच्छा है। यदि असभ्यों की तरह इन शक्तियों को वर्तमान रक्खा जाता तो जीवन भार रूप वा संकट रूप हो जाता। यह देखिए कि विकासवाद के वृक्ष की शाखाएँ किस ओर जा रही हैं। मनुष्य को कहते हैं कि मनुष्य सारी सृष्टि का निचोड़ है, यह एक सीमा तक सत्य है, क्योंकि सारे संसार की अवस्थायें जब उसके मस्तिष्क में आ गईं, तब यह सारे संसार का ज्ञानवाला मनुष्य उत्पन्न हुआ। यहाँ तक विकासवाद की सीमा है, किंतु अब किस ओर मुख है। संसार की गति (कृत्यों) की अंतिम अवधि (अवसान भूमि) क्या है?

एक और अवस्था आती है जिसमें मनुष्य केवल बोध से नहीं बरन् हृदय से सारे संसार को अपना आप समझने लगता है। सेरिब्रम (मस्तिष्क) में सारा संसार समा जाता है, केवल शिर और मस्तिष्क ही नहीं बरन् हृदय, जिगर, नख, नाड़ी प्रत्येक रोम में आपके सेरिब्रम (cerebrum) में सारा संसार समा जाता है; आपमें वह अवस्था आ जाती है कि सारा संसार मेरा ही शरीर है, ये पशुपक्षी, ये वृक्ष पर्वत मेरी ही आत्मा हैं, इस नदी में मेरी ही नाड़ियों का रक्त बह रहा है, यह सूर्य यह चन्द्रमा मेरी ही आँखें हैं, मेरा ही हृदय इन सब के छातियों में धड़क रहा है। प्यारे! यह धारना मन से मिटा दो कि तुम और हो और वह और है, तुम और हो और शेष देश के मनुष्य और हैं, जो सब में वह तुम हो जिस देश के लोग इस सत्यता को व्यवहार में लाते हैं, वही जाति शेष रहती है। जैसे कल राम ने बताया था कि जापानियों ने ब्रह्मविद्या पर व्यावहारिक रूप से अमल किया। जो लोग व्यावहारिक रूप से दूसरों की आत्मा को अपनी आत्मा मानते हैं, वही

जीवित रहते हैं, तुम्हारी रक्षा का भी उपाय यही है। आपका ख्याल (आकर्षण शक्ति) यह नियम बताता है कि कई शक्तियां जो परस्पर मिलकर काम कर रही हों उन शक्तियों के फल (परिणाम) का झुकाव बड़ी शक्ति की ओर होगा। जब वह शक्ति कम हो जायगी तो उस से कमज़ोर शक्ति की ओर झुकाव होगा। ऐसे ही आपके भीतर जो ख्याल अधिक दृढ़ है, पहले वह अमल करेगा, तत्पश्चात् दूसरा। अब यह देखा जाता है कि भीतरी शक्तियों का बाहरी शक्तियों से क्या संबंध है। यह लैम्प जो जल रहा है और चहुँ ओर की हवा से उस में आक्सीजन खिंचकर आ जाती है। जो भीतरी शक्तियें हैं, वे विशेष आकर्षण से बाहर की शक्तियों के साथ संबंध रखती है। जैसा संकल्प होता है, वैसा ही सामान प्राप्त हो जाता है। पाज़िटिव (स्थिर) इलेक्ट्रीसिटी के साथ नैगेटिव (चंचल) इलेक्ट्रीसिटी स्वयं उत्पन्न हो जाती है। यह प्रकृति का नियम है। इधर लड़कियाँ उत्पन्न होती हैं, उधर प्रकृति लड़के भी उत्पन्न करती है। आप जानते हैं कि फूलों में भी नर-मादा (स्त्री-पुरुष) होते हैं। गोमती नदी के किनारे किसी स्थान पर मादा फूल है, किसी जगह नर फूल है। मधुमक्खी के द्वारा नर फूल का नर भाग मादा फूल तक पहुँचता है। निदान जब आवश्यकता या इच्छा होती है तो सामान अपने आप प्राप्त हो जाते हैं। यही नियम आपके लिये है। जैसे आपके भीतरी संकल्प होंगे, वैसे ही बाहरी ख्याल उत्पन्न हो जायँगे। जब हिंदू-मुसलमानों ने मंदिर और मसजिदों में यों प्रार्थना की कि हम दास हैं, हमको नौकर रक्खो जी, मैं दास, मैं दास, मैं पापी, मैं अपराधी, तो आकर्षण-नियम को पूरा करने के लिये प्रकाश स्वरूप ज्योतिषां ज्योति रूप परमेश्वर ने गोरे चिट्टे चमकते दमकते

मुग़लों और अंगरेज़ों के तेजस्वी शरीर बनाकर हमारी कामनाएँ पूरी कीं और दास बना लिया। इसलिये यदि गरीब हो तो अपने बनाए हुए। अपने ख़याल से क़ैद में डाल दिया और अपने ही ख़याल से छुटकारा हो सकता है।

फिर देखिए, कहाँ तक स्वतंत्रता है और कहाँ तक परतंत्रता? कहाँ तक पुरुषार्थ और कहाँ तक प्रारब्ध है? रेलगाड़ी की पटरी की कैफ़ियत है। रेल स्वतंत्र भी है और परतंत्र भी। स्वतंत्र तो ऐसी कि फुर फुर चलती है और परतंत्र यों कि लकीर की फ़कीर है। इसी तरह आपके ख़यालों के साथ मस्तिष्क में पटरियां पड़ जाती हैं और बाहर से साज़ और सामान प्राप्त हो जाते हैं, और वह (affinity) संबंध वा संपर्क बाहर के सामान इकट्ठा कर लेती है, तो भविष्य के लिये उन पटरियों पर रेल चलाना सहज हो जाता है। और यह भी सिद्ध है कि पुरानी पटरियाँ उखड़ सकती हैं। रेशम के कीड़े का उदाहरण लो कि स्वतंत्र भी है और परतंत्र भी। यह रेशम के निकालने में स्वतंत्र है और जब निकाल चुका तो उस कोए (रेशम के कोश) में फँसकर बद्ध हो जाता है। ऐसा ही तुम्हारा उदाहरण है कि—

"रोशनी-ए-तबा तो बर मन बला शुदी।"

अर्थात्—मेरी ही बुद्धि की योग्यता तो सुख पर आफ़त हो गई। तुम्हारी स्वतंत्रता तुम्हें परतंत्र बना रही है। एक मनुष्य ने तमस्सुक लिख दिया कि इतने दिनों में रुपया दे दिया जावेगा। रुपया पैदा करने में स्वतंत्र था, तमस्सुक लिखने में स्वतंत्र था और केवल अपने लिखने से आप बद्ध हो गया। इसी तरह मनुष्य स्वतंत्र होता हुआ भी अपने कर्म से आप बद्ध हो जाता है। कर्म अर्थात् अमल इसके लिये बंधन है।

फिर प्रारब्ध की अधीनता में भी तुम स्वतंत्र हो। लोग आपत्ति करते हैं कि यदि ईश्वर एक है तो यह क्या कि किसी को अंधा और किसी को लूला उत्पन्न किया, किसी को अमीर और किसी को गरीब बनाया? राम कहता है कि यदि ईश्वर और हो और तुम्हारा स्वरूप और हो, तो यह धब्बा अवश्य आएगा और उसकी कृपालुता में अंतर पड़ेगा, क्योंकि उसी पिता के समक्ष एक लड़का फूलों के निकट है, दूसरा लड़का काँटों में गिर रहा है, यह क्यों किया? उसमें इतनी कृपालुता न थी? उसमें बचाने की क्या शक्ति नहीं? यदि ईश्वर और होता, तुम उसके बच्चे होते, तो ईश्वर के ऊपर बड़ा अंतर आ सकता है। किंतु तत्त्व यह है कि वह ईश्वर तुमसे अलग ही नहीं है। यदि एक मनुष्य स्वयं ही नदी में गिरे, स्वयं ही श्मशान में जावे और स्वयं ही पागलख़ाने को, तो वह अत्याचार नहीं है। वही ईश्वर उधर अंगरेज़ है, वही ईश्वर इधर मुसलमान है, वही ईश्वर हिंदू है, वही धनी वही निर्धन, वही जिसको तुम पिता कहते हो पुत्र बनकर प्रकट हो रहा है। एक और बात सुनिए। सूर्य का प्रकाश सब जानते हैं कि श्वेत है, किंतु जब प्रकाश को (prism) तिकोन शीशे से देखते हैं, तो मालूम होता है कि यह धोका था। यहाँ सात रंग दिखाई देते हैं, यह क्या बात है? सात रंग और फिर सफ़ेद। कारण ज्ञात हो या न हो, चाहे आप कुछ भी नहीं जानते, पर यह बात माननी पड़ेगी। तुम कहते हो कि यह फूल सफ़ेद है, यह फूल गुलाबी है, यह पत्ता हरा है। साइंसवाले कहते हैं यह कुछ भी नहीं। वह सिद्ध करके दिखा देते हैं। एक फूल अंधेरे में ले जाओ। फिर देखो वह वैसा ही मुलायम है, उसमें सुगंध भी वही है, वह ठंडा भी वैसा ही है, उसमें पंखड़ियाँ भी

उतनी ही हैं, लेकिन उसका रंग कहाँ गया? रंग फूल में है ही नहीं, वह प्रकाश का रंग था प्रकाश के साथ चला गया। पत्ती में कहते हो कि हरा रंग है, पत्तों पर एक प्रकार का मसाला या शक्ति है जैसे फ़ोटोग्राफ़ के प्लेट पर हुआ करती है, जिसने छः रंगों को खा लिया या सोख लिया, लेकिन एक रंग, जिसको नहीं खाया, यही वह रंग है जो दिखाई देता है और जिसे हरा रंग कहते हैं। अब देखिए प्रकाश में सात रंग हैं। इन में काला नहीं गिना जाता। काला रंग वह है जिसने प्रकाश के सातों रंगों को खा लिया, सफ़ेद जिसने एक रंग को भी न लिया, सब त्याग दिया। प्यारे! संसार में जितने रंग दृष्टिगोचर हो रहे हैं—यह शक्तियाँ, यह बुद्धि, यह समझ, यह विचारशीलता, ये सब शक्तियाँ एक ही परमात्मा एक ही राम की हैं। यों देखो तो सतरंगा और उस तरह देखो तो सोर रंग उसी के। उसी रंग का नाम माया है। इस संसार में कहते हैं कि यह मनुष्य शक्तिमान् है, यह भी कहते हैं कि दाहिना हाथ अधिक शक्तिमान् होता है। इसलिये शक्तिमान् है कि वह उस हाथ की शक्ति को त्यागता रहता है अर्थात् व्यय करता रहता है। फूल जिस रंग को त्यागता है, वही रंग उसका होता है। प्यारे, जिस वस्तु को तुम त्यागोगे, वही तुम्हारे पास आवेगी। जिस वस्तु से तुम बेपरवाही करोगे अर्थात् मुख मोड़ोगे वही उपस्थित होगी। सूर्य के प्रकाश में यदि तुम छाया का पीछा करोगे तो तुम्हारे आगे आगे भागेगी, और जिस समय तुम उसे त्यागोगे अर्थात् सूर्य की ओर मुख करके दौड़ोगे, तो वह तुमको पकड़ने दौड़ेगी।

"गुज़श्त अज़ मतलब तमाम शुद मतलब।" जिस रंग

को खाते हो, वह नष्ट हो जाता है और जिसको त्यागते हो, वह तुम्हारा हो जाता है। जिस समय यह इच्छा होती है कि तुम्हारा सम्मान हो और जब तुम दूसरों का सम्मान करते हो, तो तुम्हारा अपने आप सम्मान हो जाता है। जिस समय लोगों को प्यार देते हो तो चारों ओर से प्रीति तुम्हारी ओर दौड़ी हुई आती है। काले वह हैं जिन्होंने सोर रंगों को अपने अहंत्व में सोख लिया और कहा "मैं और हूँ", "वह और है", जैसे वह स्वार्थी लड़का जिसका मैंने कल ज़िक्र किया था और जिसने जापान में किताब का वर्क़ चुराया था। और गोरे वह हैं जिनका अमल त्याग-त्याग-त्याग पर है। जिनका कथन यह है कि सब मेरे रंग सब के रंग, जान मेरी सब की जान, माल मेरा सब का माल, मेरा शरीर सब का शरीर, मेरी विद्या सब की विद्या, मेरा ज्ञान सब का ज्ञान। जो मनुष्य सारे रंगों को त्यागता है, उसका आत्मा सब का आत्मा है। जिसे फिर न कुछ ढूँढ़ना है और न कुछ लालसा है! बरन् जिसकी—

आरज़ूए-विसाल पर्दा है, आरज़ू है कि आरज़ू न रहे। जुस्तजू भी हिजाबे-हसनी है, जुस्तजू है कि जुस्तजू न रहे। तू को इतना मिटा कि तू न रहे, और तुझ में दुई की बू न रहे।

अर्थात् मिलने की इच्छा ही भेद है, इसलिये ऐसी इच्छा हो कि इच्छा ही न रहे, जिज्ञासा भी एक सुंदर परदा है, इसलिये ऐसी जिज्ञासा हो कि जिज्ञासा ही न रहे, तू के भाव को इतना मिटा कि परिच्छिन्न तू भाव न रहे और तुझमें द्वैत की गंध तक न रहे।

ॐ! ॐ!! ॐ!!!