स्वतंत्रता (मुक्ति)
[भगवान् राम के हस्त-लिखित लेखों में से एक लेख जो सन् 1901 में रिसाला अलिफ के नं॰ 13 में प्रकाशित हुआ]
स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! स्वतंत्रता! हाय लिबर्टी! हाय फ़्रीडम! बच्चों को सप्ताह के दिन गिनना कौन सिखाता है?—(छुट्टी का दिन) रविवार। अध्यापक लोग विद्यार्थियों को छुट्टी देने से देखने में इन्कार किया करते हैं। पर छुट्टी का स्वाद कोई उनके जी से पूछे। दफ़्तरवालों के पीले मुखों पर किस वस्तु के नाम से चमक आ जाती है?—छुट्टी के नाम से। संसार के इतिहास में बड़े-बड़े विप्लव एवं युद्ध-कलह किस बात के लिये हुए?—स्वतंत्रता के लिये। कोटि-कोटि प्रजा की रक्त-नदी किस बात पर बही?—स्वतंत्रता पर। सामान्यतः सारे धर्म और विशेषतः हिंदू-शास्त्र किस ज्योति पर अपना तन, मन, धन पतंग बनाया चाहते हैं? संन्यासी अपना सर्वस्व किस पर न्योछावर करता है?—मुक्ति पर। जिसका आभिधानिक अर्थ अर्थात् वास्तविक अर्थ है—'स्वतंत्रता'!
1—बल बे आज़ादी! खुशी की रूह उम्मेदों की जाँ। बुलबुला साँ दम से तेरे पेच खाता है जहाँ॥
2—मुल्के-दुनिया के तेरे बस इक करश्मा पर लड़े। खून के दरिया बहाए नाम पर तेरे मरे॥
3—हाय मुक्ती! रस्तगारी! हाय आज़ादी नजात। मक्सदे-कुमला मज़ाहब है फ़क़त तेरी ही ज़ात॥
4—उँगलियों पर बच्चे गिनते रहते हैं हफ्ते के रोज़। कितने दिन को आयगा यकशंबा1 आज़ादी फ़रोज़॥
5—रम बरांडी के मुक़ैयद2, सच्ची आज़ादी से दूर। हो गए नश्शे पे लद्दू बहरे-आज़ादी सुरूर॥
6—साहबो! यह नींद भी मीठी न लगती इस क़दर। क़ैद-तन से दो घड़ी देती न आज़ादी अगर॥
7—क़ैद में फँसकर तड़पता मुर्ग है हैरान हो। काश! आज़ादी मिले तन को नहीं तो जान को॥
8—लम्हा जो लज़्ज़त मज़े का था वह आज़ादी का था। सच कहें, लज़्ज़त मज़ा जो था वह आज़ादी ही था॥
9—क्या है आज़ादी! जहाँ जब जैसा जी चाहे, करे। खाना पीना ऐश गुलछरों में सब दिन काट दे॥
10—राग शादी नाच इशरत जहाँ रंगारंग के। बंगले बाग़ात-आली योरोपियन ढंग के॥
11—क़तआ3 टोपी की नई फ़ैशन निराला बूट का। दिलकशो4 बेदाग खिलना बदन पर वह सूट का॥
12—दिल को रंगत जिसकी भावे शादी बेखटके करे। धर्म की आईन5 चुपके ताक पर तह कर धरे॥
13—खचचरे फ़ीटन के आगे कोचवाँ का पोश पोश। अबलकोंद6 का बढ़ निकलना हिनहिनाना जोश जोश॥
14—कोट पहनाता है नौकर जूता पहनाए गुलाम। नाक चिढ़ाता है आक़ा "जल्द बे……हरीम"॥
(1) रविवार। (2) अधीन। (3) आकार, ढंग। (4) चित्त-आकर्षक। (5) नियम, कानून, धर्मशास्त्र। (6) घोड़ों।
15—मुँह में घटघट सोडावाटर या सिगारों का धुवाँ। ज़ोफ़1 की दिल में शिकायत राम की अब जाय2 कहाँ॥
16—क्या आज़ादी है? हाय! यह तो आज़ादी नहीं। ग़ेप3 चौगाँ की परेशानी है, आज़ादी नहीं॥
17—अस्प4 हो आज़ाद सरपट, क़ैद होता है सवार। अस्प हो मुतलक़ अनाँ5 हैरान रोता है सवार॥
18—इंद्रियों के घोड़े छूटे बागडोरो तोड़कर। वह मरा, वह गिर पड़ा, असवार सिर मुँह फोड़कर॥
19—एताज़ो तोसन तुंदखू7 पर दस्तो-पा8 जकड़े कड़े। ले उड़ा घोड़ा मेज़पाँ9 जान के लाले पड़े॥
20—जाने-मन! आज़ाद करना चाहते हो आपको। कर रहे आज़ाद क्यों हो आस्तीं के साँप को॥
21—हाँ वह है आज़ाद जो क़ादिर10 है दिलपर जिस्मपर। जिसका मन क़ाबू में है, कुदरत है शक्लो11 इस्मपर॥
22—ज्ञान से मिलती है आज़ादी यह राहत12 सरबसर। वार कर फेंकूं मैं उसपर दोजहाँ का माल-ज़र॥
23—*आज़ादा-अम आज़ादा-अम अज़ रंज दूर उफ़ताद-अम अज़ इशवप-ज़ाले-जहां आज़ादा-अम बालास्तम॥
पहिली टिप्पणी—'मेजपा का दंड।
तेज़ी और तुंदी का पुतला, आफ़त का परकाला एक
(1) निर्बलता। (2) स्थान। (3) खेल के गेंद। (4) घोड़ा। (5) नितांत बद्ध, पूरा अधीन वा रुका हुआ। (6) अरब का सरकश घोड़ा। (7) तेज़ स्वभाव वाला। (8) हाथ पैर। (9) सवार का नाम। (10) वशी अर्थात् इन्द्रिय, मन को अपने वश में रखने वाला। (11) नाम रूप। (12) आनन्द, सुख।
*मैं स्वतन्त्र हूँ, मैं स्वतन्त्र हूँ, शोक से नितान्त परे हूँ संसार रूपी बुढ़िया के नखरों के प्रभाव से मुक्त और निर्लिप्त हूँ।
घोड़ा जिसपर अभी ज़ीन नहीं डाला गया था, जंगल से छांटकर लाया गया। उसपर मेज़पा को सवार करके हाथ पैर खूब मज़बूत कस दिए गए कि गिरने न पावे और फिर उस नख-शिख-दुष्ट घोड़े को कड़ी चाबुक मारकर 'कड़वा करेला नीम चढ़ा' की आपत्ति मोल ली। बिजली की गति से वह घोड़ा 'मेज़पा' को ले उड़ा। नदी नाले चीर गया। खाइयाँ फलांग गया। दीवारों पर से कूद गया। चल, चल, चल, चला चल। रेगिस्तान पार हो गया। कड़ी मंज़िलें आन की आन में काट गया। चुटकी बजाते कहीं का कहीं जा निकला। बेचारा विपत्ति का मारा सवार अधीर हो रहा है। कभी शिर दाहिने उछल उछल पड़ रहा है, कभी बाएँ को, कभी आगे की ओर, कभी पीछे। हे भगवन्, यह कैसी सवारी है! शत्रु को भी नसीब न हो। वृक्षों की रगड़ से शरीर छिल गया, काँटों से तन चलनी हो गया। घोड़े की भाँति मुँह से झाग (फेना) निकल पड़ी। शरीर से रक्त का पसीना बह चला। हे भगवन्, इस यात्रा का अंत भी कहीं होगा। और पहुंचना कहां है? फूट गया भाग्य।—
खून रोता है जिगर, यह देख आजादी तेरी। हाय! 'मेजपा' यह आजादी है बरबादी तेरी॥
दूसरी टिप्पणी—एक भोजन में बच्चों को देखा कि मिठाइयां मुँह में डालने के स्थान पर जेब में ठूँस रहे थे। एक मसख़रा बोल उठा—प्यारो! कपड़े की जेब में पड़ी हुई मिठाई स्वाद न देगी, न क्षुधा निवृत्त करेगी। मिठाई को पेट के थैले में भरो। कौन मिठाई या उत्तम पदार्थ है जो स्वतंत्रता से बढ़कर स्वादिष्ठ है। प्यारो, यह मिठाई शरीर रूपी वस्त्र की जेब में भरी हुई क्षुधा को कदापि नहीं
हटाने की। उसको अपने सच्चे थैले में भरो। घोड़े की स्वतंत्रता से आपको (जो कि सवार हो) बंधन प्राप्त होगा।
तीसरी टिप्पणी—एक पठान के लड़के को किसी बात पर उसके गुरु ने बहुत झिड़का। पठानपुत्र ने आँखें लाल करके झट तलवार निकाली। मौलवी साहब के होश उड़ गए। आगे उठ दौड़े। नंगी तलवार हाथ में लिए पठानपुत्र पीछे लगा। इतने में संयोग से बड़े खाँ साहब घटनास्थल पर पधारे। दूर ही से पुकारा—"ओ शिष्टक! ओ शिष्टक! ठहरियो। ठहरियो। मेरे बेटे का पहला वार है। खाली न जाय।" नवयुवको! स्वतंत्रता चाहते हो, पर बताओ तो सही, स्वतंत्रता तुम्हें दरकार है कि तुम्हारे चतुर शिष्य (अहंकार) को? मांगना अपने लिये और देना दूसरों को। खैर, हाथ खुलने दो उसका। तुम्हीं पर हाथ साफ़ होगा। वासना स्वतंत्र होगी, तुम गप बीते।
चौथी टिप्पणी—सन् 1857 ई॰ के ग़दर के दिनों में एक नवाब साहब के प्रासाद पर बाग़ी सिपाहियों ने हल्ला किया। घर का बड़ा फाटक भीतर से बंद था, किंतु घर के पिछली ओर एक पतली गली में एक दरीची खुलती थी। नवाब साहब का पलंग उस दरीची के पास बिछा था। यह देखकर कि बाग़ियों ने बड़ा फाटक तोड़ना आरंभ कर दिया है, नवाब साहब को जान बचाने के लिये इस दरीची से कूदकर भाग निकलने की सूझी। किंतु वह नवाब साहब, जिनके लिये दो मनुष्यों के कंधों पर हाथ धरे बिना बग्घी में सवार होना अपनी शान को बट्टा लगाना था, आज अपने आप कूदकर कैसे जायँ; वह नवाब साहब, जिनके विचार में पैदल चलना वैसे ही बुरा और सभ्यता के विरुद्ध
था जैसे बंदर का उछलना, आज अपने आप भाग कैसे निकलें। नौकर को पुकारा—"सलीम ! ओ सलीम ! अरे जल्द आओ। हमें जूता पहना दे।" जब किसी की अपनी जान पर आ बनती है, तो दूसरों को बचाना भूल जाता है। भय के मारे सलीम की दृष्टि में बाग़ियों की चमकती हुई बर्छियां और तलवारें नाच रही थीं। रंग बदल गया था। काटो तो खून नहीं। जब नवाब साहब ने बुलाया, तो दरीचे को देखते ही सलीम को अपनी रक्षा का उपाय सूझ पड़ा। जूता तो नवाब साहब को पहनाया नहीं, सीधा दरीचे के पास चला गया और कूदकर झट पार। वह गया, वह गया। नवाब साहब गालियों की झाड़ बांधते ही रह गए। फिर दूसरे नौकर को बुलाया—"कलीम ! अो कलीम !! अजी आइयो। अरे जूता, जूता। कलीम आया ?" ऐसी विपत्ति के समय जूता कौन पहनाना। कलीम भी झट दरीचे में से कूदकर चलता बना। तीसरे नौकर सलीम को बुलाया और दीन वाणी में कहा कि ज़रा जूता पहना दो। इतने में बड़ा फाटक आधा टूट चुका था। सलीम मियां के हाथ-पैर फूल रहे थे। उसने सुना ही नहीं कि नवाब साहब ने क्या हुक्म दिया। हलबली में दरीचे से कूदा और भागा। हाय विपत्ति ! तिलंगे भीतर घुस आए। नवाब साहब के प्राणों की कुशल नहीं।
महाशयो, धर्म से बताना कि फ़ैशन की अधीनता, जो जूता पहनना ही तो क्या बात बात में औरों का मुहताज (अधीन) बनाती है, क्या यह अमीरी है ! ऐसे नवाब साहब मालिक और स्वामी थे अथवा नौकरों के नौकर (dependent) ? दोहाई है ! इस स्वतंत्रता के रूप में बन्धन के लिये दोहाई
है ! जो व्यक्ति अविद्या के दांव पेच में फँसकर इस धोकेबाज़ की बहुरंगी मौजों (freaks) को पूरा करने के पीछे दौड़ता है, उसे यह स्त्री बेच खाती है। वह स्वतंत्रता का दावा करने का अधिकारी नहीं।
पाँचवीं टिप्पणी—वेदांत शास्त्र पढ़ने बैठे। जम्हाइयों पर जम्हाइयाँ आनी आरंभ हो गईं। मन कभी कहीं जाता है कभी कहीं। ध्यान लगता ही नहीं। तबियत बेबस है। मन रूपी घोड़ा या नौकर अधिकार में नहीं है। जैसे कहा जाता है—"कर यह काम।" वह सुनता ही नहीं। ऐसा पुरुष मालिक, स्वाधीन वा स्वतंत्र कहला सकता है ?—कदापि नहीं। जिसका अपने घर ही में अधिकार नहीं चलता, वह स्वाधीन क्या ख़ाक होगा।
छठी टिप्पणी—देश, काल और वस्तु तीनों प्रकार के बंधनों में बद्ध अर्थात् आत्मज्ञान से शून्य पुरुष कभी स्वतंत्रता का आनंद भोग सकता है ?—कदापि नहीं। तीनों बंदीगृहों में बद्ध वा आसक्त को स्वतंत्रता की डींग मारने का कभी अधिकार है ?
सातवीं टिप्पणी—स्वतंत्र वही है जो देश, काल और वस्तु से मुक्त है। 'स्वामी' वही है, जो तत्त्ववेत्ता वा यति है। राजराजेश्वर वही है, जो स्वराट् है। गंगा बिना यत्न अपने आप शीतल रहती है। सूर्य सदैव प्रकाश ही करेगा; कभी अंधकार नहीं कर सकता। इसी प्रकार शम, यम, दम जिसके स्वभाव में प्रविष्ट होगए, वह स्वतंत्र है।
आठवीं टिप्पणी—प्रश्न—स्वाभाविक उद्गार वा रुचि को रोकना प्रकृति के नियम को तोड़ना है। क्या यह पाप नहीं है ? जिसको तुम स्वतंत्रता कह रहे हो, यह तो उलटी गंगा बहाना है, पाप है।
उत्तर—निस्संदेह सच्ची स्वतंत्रता गंगा के स्रोत की ओर चढ़ना ही है। ऊर्ध्वरेता होना और तुम्हारे प्राकृतिक नियम को तोड़ना ही है। यदि क़ानून की पाबंदी रही तो स्वतंत्रता कैसी ?
कामनाएँ, मानसिक इच्छाएँ वा उद्गार स्वाभाविक हैं क्या ? ज़रा ध्यान तो करो, स्वाभाविक शब्द का प्रयोग यहाँ किन अर्थों में हुआ है। रेल की पटरी पर धक्का खाकर धूली का वायु की भाँति उड़ते जाना स्वाभाविक है, क्यों ? Inertia अर्थात् जड़ता। चौगान की चोट खाकर गेंद का लुढ़कते जाना स्वाभाविक है, क्यों ? Inertia अर्थात् जड़ता। ठीक इसी भाँति मांसाहारी, तृणाहारी और सामान्य पशुओं के शरीरों से विकास evolution लाभ करता हुआ पुरुष जब मनुष्य का चोला पहनता है, तो उस पर पाशविक रुचियों और उद्गारों के प्रभाव का आवेश होना स्वाभाविक है। पर यह क्यों ? पुरानी जड़ता (Inertia) पर मनुष्य की श्रेष्ठता (सर्वोत्तम होना) किस बात में है ? केवल इसमें कि उसको (Inertia) जड़ता पर विजय पाने की क्षमता अर्थात् योग्यता प्राप्त है और पिछले धक्के को निष्फल करने की शक्ति है। अतः स्मरण रहे कि इस जड़ता (Inertia) की प्रकृति पर विजय पाना ही मनुष्य की मनुष्यता है। पाशविक स्वभाव पर विजय पाना मानुषी प्रकृति से बाहर जाना नहीं है, स्वाभाविक है, बल्कि मनुष्य का परमोत्तम स्वभाव है। और मानसिक कामनाओं, रुचियों तथा मन और इंद्रियों पर शक्तिमान् और स्वामी होना न तो प्रकृति के नियम को तोड़ना है और न पाप ही है। बल्कि सच्चा स्वभाव कदापि चैन नहीं लेने देगा जब तक अपने आपको सच-
मुच स्वतंत्र न कर लोगे और प्रकृति से श्रेष्ठतर न हो जाओगे।
नवीं टिप्पणी—वेताल की कथा योरप और एशिया में लगभग सब स्थानों में प्रचलित है। योगवासिष्ठ में विंध्याचल के वेताल का उल्लेख है जिसके प्रश्नों का उत्तर प्रत्येक बटोही (यात्री) को देना होगा। ठीक ठीक उत्तर न देनेवाले के प्राण बचना असंभव है। ऐ संसार यात्रा के यात्रियो ! क्या तुम उत्तर दिए बिना पहला छुड़ा सकते हो ?—कदापि नहीं। वेताल हाथ धोकर पीछे पड़ा है। वह खाया कि खाया। उत्तर दिए बिना छुटकारा हो सकता है क्या ?—कभी नहीं। वह प्रश्न दो शब्दों में यह है—"स्वतंत्रता क्या है ?" प्रत्येक व्यक्ति इस प्रश्न का उत्तर देने में चक्कर में पड़ा हुआ है।
नोट—गणित विद्या जिन लोगों ने नियमानुसार नहीं पढ़ी, वह गणित के प्रश्न वैसे ही हल करते हैं जैसे नन्हें बच्चे अपनी बुढ़ी दादी से पूछी हुई पहेलियां बूझते हैं, अर्थात् जो मुँह में आया बोल दिया। सोचना-समझना कुछ नहीं। "एक व्यक्ति ने अपने बैंकवाले रुपयों का दसवाँ भाग धर्मार्थ व्यय कर दिया, तीसरा भाग एक स्थान पर चंदा दिया रायबहादुरी की उपाधि के लोभ में, सातवां भाग बेटी के ब्याह पर नाच-रंग में व्यय कर दिया, शेष रुपयों की भूमि मोल ली। यह भूमि 1780 की है। उसकी कुल जायदाद बताओ।"
अपरिचित लोग इस प्रश्न को इस प्रकार हल करेंगे— कल्पना करो कि उत्तर दो हज़ार है। इस प्रश्न की शर्तें पूरी करते हुए शेष 1780 नहीं बचे, इसे छोड़ो। अब ढाई हज़ार उत्तर कल्पना किया। इससे भी उत्तर की शर्तें नहीं
पूरी हुई। कल्पना करो कि तीन हज़ार उत्तर है। इससे भी नहीं निपटती। इसी तरह कभी कुछ कल्पना किया, कभी कुछ। भाग्य से कहीं उत्तर ठीक मिल गया, तो ख़ैर, नहीं तो अंधों की भांति लाठी से रास्ता टटोलते-टटोलते जंगल में रात कर देना कहीं गया ही नहीं।
बीज तर भूमि पर पड़ा है। ऊपर पत्थर आ गया। उगते समय नन्हा वृक्ष किस ओर झुकेगा। ठीक उसी ओर बढ़ेगा जिधर निकट से निकट मार्ग प्रकाश (स्वतंत्रता) को हो। बीज के रूप में पुरुष ने वेताल के प्रश्न (स्वतंत्रा का प्रश्न) का उत्तर व्यावहारिक रूप में ऐसे दिया है कि किसी वस्तु को एक अवस्था में थिरता नहीं है, प्रत्येक वस्तु लगातार परिवर्तनशील है। अपनी पहली अवस्था से भागती जाती है। वर्तमान रूप और नाम से स्वतंत्र हुआ चाहती है। वेताल का प्रश्न हल करने में लगी है।
बहर लहजा बहर साअत बहर दम। दिगरगूं मीशवद अहवाले-आलम॥
अर्थात्—प्रत्येक क्षण, प्रत्येक घड़ी और प्रत्येक श्वांस संसार की अवस्था भिन्न भिन्न रूप होती है।
वेताल का प्रश्न इस प्रकार पीछे लगा हुआ है जिस प्रकार पक्षी के पीछे बाज़। पर हाय ! एक भूल से निकलने नहीं पाते कि दूसरी भूल में गिर जाते हैं। ठीक उत्तर तो एक ही हो सकता है। ग़लत उत्तरों की कुछ सीमा नहीं। "तवे से उतरे चूल्हे में पड़े" वाला मामला हो रहा है। ठीक उत्तर नामरूप के साम्राज्य में कहीं नहीं। इसीलिये नाम और रूप की परिधि में थिरता और निवास, सुख और शांति दुर्लभ है।
सृष्टि में लड़ाई-भिड़ाई और उद्यम वा पुरुषार्थ Struggle for existence के क्या अर्थ हैं ? विकासवाद में पद बढ़ने से रुकावटें दूर हों, स्वतंत्रता मिले। क्या इस दौड़धूप के चक्र में कहीं भी कोई 'जीवन' निमित्त उद्योग नहीं, बरन् 'स्वतंत्रता निमित्त उद्योग' से तटस्थ हो सकने की शक्ति रखता है ? साइंस ने दिखा दिया कि सूर्य का अंधकार फैलाना और गंगा का गरमी करना तो कदाचित् संभव भी हो, किंतु "स्वतंत्रता निमित्त उद्योग" में सम्मिलित न होनेवाले का बचाव स्वप्न में भी संभव नहीं। आलसी पैरों तले रौंदा जायगा, निकम्मा जूतों तले कुचला जायगा, कोरा तमोगुणवाला नहीं बच सकता।
He is not fit to survive, यह प्रकृति का नियम है। सब पापों का मूल क्या है ?—आलस्य, सुस्ती, जिसको शास्त्रों में तमोगुण कहा गया है। आलसी वेताल का उत्तर देने से स्पष्ट अस्वीकृत करता है। वेताल उसे खा जायगा।
विकास की पद्धति पर तमोगुण का प्रेमी (पुरुष) चढ़ते-चढ़ते मनुष्य के शरीर में आकर स्वतंत्रता के लिये कहाँ-कहाँ टक्करें नहीं मारता, कैसी-कैसी ठोकरें नहीं खाता ? वह जो भोग-विलास में पड़ गया या आलस्य में गड़ गया, उसका मांस और रक्त तो वेताल की क्षुधा-पिपासा के काम आया। मरा, नष्ट हुआ। ऐसों को छोड़कर उन मनुष्यों की दशा पर एक दृष्टि डालिए जो स्वतंत्रता की खोज में साहस नहीं छोड़ बैठे, उद्योग और परिश्रम को नहीं छोड़ बैठे।
यूसुफ़ जब मिस्र में बिकने लगा, तो एक बुढ़िया ने बहुत आगे बढ़कर नीलाम की बोली दी और (अपनी जायदाद) आध पाव रुई को बड़े चाव से मूल्य की भाँति उप-
स्थित किया। शाबास, बुढ़िया ! शाबाश। आध पाव रुई से तो यूसुफ़ न मिला, किंतु हज़रत यूसुफ़ के ख़रीदारों में तो नाम पाया !
फ़ैशन के गुलामों ! स्वतंत्रता के ग्राहकों में तो गिने गए। स्वतंत्रता तो भला क्या मिलनी थी। सामान्य सांसारिक मनुष्य स्वतंत्रता (अर्थात् वह अवस्था जहाँ शिर पर कोई दबाव न हो, बड़ाई, बड़प्पन और प्रताप) के लिये उचित या अनुचित ढंग पर कौड़कन (फ़रहाद) की भांति तेशा चलाए जाते हैं। बड़ाई, बड़प्पन और शान (स्वतंत्रता) कुछ ऐसी मधुर है, कि उसकी चाह के लिये कौन है जिसका जीवन कड़ुवा नहीं हो रहा है। व्याख्यान, उपदेश और प्रचार के अवसर पर प्रायः यह शब्द सुनाई दिया करता है—"अरे भाइयो ! नम्रता, नम्रता, नम्रता, निर्धनता और दीनता ग्रहण करो। दास बनो, दास बनो। बड़प्पन की भावना त्याग दो," इत्यादि। या बंदगीगाहों (मन्दिरों वा मस्जिदों) में इस प्रकार के शब्द अवश्य सुनाई देते हैं—"मैं गुलाम, मैं गुलाम, मैं गुलाम तेरा। तू दिवान, तू दिवान, तू दिवान मेरा।" हमको नौकर राखो, हमको नौकर राखो जी, इत्यादि।
[बात में बात—कर्म सिद्धांत के अनुसार ये दासतत्व के संस्कार फल दिए बिना कदापि नहीं रह सकते ? अब परमेश्वर अपने निराकार रूप में दास कैसे रक्खे, या अपनी पत्थर या अष्टधातु की मूर्ति से कैसे नौकर रक्खे। किंतु यह दासपन के संस्कार भी फल दिए बिना कदापि नहीं रह सकते। अतः प्रकाश स्वरूप, ज्योतिर्मय परमेश्वर श्वेत चमकीले गोरे चिट्टे शरीर धारण करके इंडिया को गुलाम बना रहा है।]
किंतु जुड़े हुए हाथों, झूकी हुई गर्दन और निकले हुए दांतों की तह के नीचे घर-घर में, दुकान-दुकान में, हर दफ्तर में, हर चौक बाज़ार में, भोजन करते समय, सोते समय, चलते-फिरते समय यह स्वाभाविक वाणी प्रत्येक के अंतःकरण से लगातार आती रहती है—। "गुरुता, गुरुता, गुरुता, हाय महत्ता ! हाय बड़ाई, स्वतंत्रते !" इस भीतरी शब्द को दबाने या रोकने के असंख्य प्रयत्न किए गए, किंतु इसका बल द्विगुण ही होता गया। गठिया के पुराने रोग की भांति एक स्थान से नाम को हटाया भी गया तो दूसरे स्थान पर झट फूट आया। क्या सच कहा है:—
Truth crushed to earth shall rise again, the eternal years of God are hers.
भावार्थ:—सचाई यदि दबाई जाय तो पुनः फूट कर निकल आती है क्योंकि ईश्वर का नित्य का समय उसी के लिये होता है।
वही बंदे प्रार्थी जो इबादतघरों (मन्दिरों) में सर रगड़ रगड़ कर यह कहते हुए सुनाई देते थे, "मैं दास, मैं दीन, पापी पातकी, सब का सेवक आदि" यही परमेश्वर के साथ बना बना कर चिकनी चुपड़ी छल छिद्र की बातें करने वाले जब ज़रा सुन पाते हैं कि अमुक व्यक्ति ने हमें कह दिया है "पापी, अधम" तो झट आग-बबूला हो जाते हैं। आश्चर्य है, वह व्यक्ति जो प्रति दिन परमेश्वर के पवित्र उपासनालय में पुकार कर प्रतिज्ञा कर आया है—"मैं दीन, अधम, पापी" वह सब बाज़ार में आकर अपने ही वचन से चिढ़ता क्यों है ? हाय ! परमेश्वर के मंदिर में झूठ बोल आया। गंगाजली उठाकर ही नहीं, गंगाजी में स्नान करते समय "पापी हूं, पाप करनेवाला हूं, पापात्मा हूं, इत्यादि" कहते हुए नास्ति-
कता की आँधी बहा आया। क्या ऐसा गंदा झूठ दंड दिए बिना रह जायगा। यादवों ने एक ब्राह्मण के सामने झूठ बोला था, सत्य को छिपाया था, और का और करके दिखाया था, पुरुष को गर्भिणी स्त्री बनाया था, परिणाम क्या हुआ ? पीछे यादवों ने बहुत कुछ प्रयत्न किए कि दंड से छुटकारा मिल जाय, लेकिन किस प्रकार ? उस मुसल (वर्तन-बाटी) को रेत में रगड़ते रगड़ते मटियामेट करना चाहा, उसको सर्वथा नष्ट करने का पूरा पूरा यत्न किया गया। परन्तु 'सत्यमेव जयते नानृतम्।' Truth crushed to earth shall rise again, the eternal years of God are hers. वही रगड़ा हुआ बीज फिर उगा। उसी बीज ने यादवों को नष्ट कर दिया। नाम मिटा दिया। द्वारका पर पानी फिर गया। उसी बीज ने बाण की गाँसी बनकर स्वयं कृष्ण के पाद-पद्म से आँख लड़ाई और ऐसा पांव पर पड़ा कि कृष्ण कहां रहा। इस स्वाभाविक स्वतंत्रता की ध्वनि को, जो निरन्तर सत् की ओर से आ रही है, हज़ारों व्याख्यान, लाखों पुस्तकें, करोड़ों सिजदागाहें, (उपासनास्थान) दीनता और नम्रता के रोने से नहीं दब सकतीं। यह बला की गुत्थी उपस्थित करना वेताल कभी नहीं भूलेगा। दीनता दीनता का नाम लेकर उत्तर देने से अस्वीकृति करने वाला अनुत्साह के गढ़े में गिरेगा, और असत्य उत्तर भी रोने और दांत पीसने का कारण होगा।
*यह कहानी प्रचलित है कि यादवों ने एक पुरुष के पेट पर बाटी (वर्तन) बांध कर उसे स्त्री का रूप धारण कराकर दुर्वासा ऋषि से पूछा कि महाराज यह स्त्री क्या जनेगी ? उसके उत्तर में यह शाप मिला कि मुझे भी धोका देना चाहते हो ? यह वह जनेगी जिससे तुम सबका नाश हो जायगा।
असत्य उत्तर—जो लोग अहंकार (देहाध्यास) को लेकर बाहरी दबाव से स्वतंत्र अर्थात् बड़ा बनना चाहते हैं, वह प्रकृति वा निज स्वभाव की भीतरी ध्वनि का असत्य उत्तर देते हैं।
बड़ाई के सामान्य अर्थ क्या हैं ? "प्रधान होना अपनी जाति में, अद्वितीय हो निकलना। ऐसा उच्च पद पाना कि अपने समान गुणवानों की संख्या कम हो जाय, समान गुण और समान व्यवहार वालों की संख्या जितनी ही कम होगी, संसार में उतनी ही श्रेष्ठता और महत्ता अधिक गिनी जायगी। अतः संसारी लोगों के यहां बड़ाई वह है जो समान गुण वालों की श्रेणी वा सीमा से बाहर निकाले, अद्वितीय बनाए। चिंताओं के बोझ से छुटकारा दे। अन्यों के खटकों से निवृत्ति दे। दूसरों के भय से छुटकारा दे। नानात्व का बोझ उतार दे।"
अब वह महाशय जो इधर तो शरीर के अहंकार little self से परिच्छिन्न हो रहे हैं और उधर स्वतंत्र और बड़ा बनना चाहते हैं, सदैव असफल रहेंगे, पछतायेंगे।
"मैं उत्तम वंश का हूँ"—इस बात पर मुग्ध पुरुष थोड़े दिनों में भाईबंदों को अपने ऐसा देखकर विचलित होता है। क्योंकि वह देखता है कि मैं अद्वितीय नहीं, समान गुण लोग बहुसंख्यक मौजूद हैं। वेताल का प्रश्न (हाय स्वतंत्रते) फिर तीर की भांति खुभता है। ब्रह्मविद्या जिसके व्यवहार (बर्ताव) में नहीं है, इस प्रकार का एक बड़ा भारी पंडित किसी और विद्वान पंडित का नाम सुनकर यदि खुल्लम खुल्ला निंदा करना न आरंभ करेगा, तो मन में अवश्य वैसे ही घटने लग जायगा जैसे आरंभिक श्रेणी का बालक अपने
से चतुर बालक को देख दुःख मानता है। "मैं ताज़ा एम० ए० हूं," इस घमंड में चूर का जब एक आध महीने में नशा उतरता है, तो देखता है कि मेरे जैसे, बल्कि मुझसे अच्छे सैकड़ों पड़े हैं, मैं श्रेष्ठ नहीं, अद्वितीय नहीं। वेताल का प्रश्न फिर आग की भांति जलाता है।
आज युनिवर्सिटी कनवोकेशन का जलसा है। चांसलर साहब सभा में शोभायमान हैं। फ़ैलो (सहपाठी वा सम्पद) लोग कुर्सियों पर विराजमान हैं। दर्शक-गण चारों ओर से नए ग्रेजुएटों की ओर उंगलियां उठा रहे हैं। नया स्नातक मन में बड़ा प्रसन्न हो रहा है कि चौदह पंद्रह वर्ष के परिश्रम का आज फल मिलेगा। प्रसन्नता से कपोल फूल रहे हैं। (Gown) गौन अर्थात् शाटक फड़काता सर्टिफ़िकेट के लिये उठा है। चांसलर साहब के सामने सम्मान पूर्वक खड़ा है। इस समय चित्त-वृत्ति कैसी एकाग्र है। ए आशारूपी वाटिका के नव-युवक ! वाइस-चांसलर साहब की वक्तृता सुनने से पहले राम की रामकहानी से चित और कान मत मोड़। प्यारे ! इधर तो कंठ से लेकर पग पर्यंत घोर काला जामा (जो पूरी आयु में एक दिन भी तो काम में नहीं आता) पहनकर लोटपोट हो रहा है, उधर वेताल तमाशा देखदेख कर हँस रहा है कि "सोलह वर्ष बिता दिए किंतु मेरे प्रश्न का उत्तर ठीक न दे सका।" यह नतमस्तक होना, सर्टिफ़िकेट के लिये हाथ का बढ़ाना और सम्मान पूर्वक प्रणाम सब बोल रहे हैं कि नवयुवक उपाधि प्राप्त कर रहा है, प्रमाणपत्र ले रहा है, मान पा रहा है, आनंद यह है कि एक ही बात उधर नवयुवक में अभिमान भर रही है, उधर डिग्री प्रदान करनेवालों (फ़ेलो युनिवर्सिटी से उसके कमतर
और छोटा होने को स्पष्ट जतला रहा है। उस समय ग्रेजुएट के ख्याल में जो उन्नति का पद वा स्थान है, वही उसके न्यून और छोटा होने पर है। डिगरी लेना न तो केवल बीसियों समान गुण विद्यार्थी (फेलो ग्रेजुएट) साथ दिखा रहा है, बरन् सैकड़ों बहुत बड़े बड़े (फेलो महाशयों) के भी एक साथ दर्शन करा रहा है। अतः बी० ए० की बड़ाई (अर्थात् अद्वितीय होना) के भला क्या अर्थ हो सकते हैं? ठीक इसी प्रकार संसारी पुरुष जिस बात में कभी सम्मान समझता है और अभिमान करता है दूसरी दृष्टि से वह बात सदैव उसकी शान की कसर (कमी) जतलाती है। संसार का जीव रहकर अद्वितीय [श्रेष्ठ और स्वतंत्र] होना किसी प्रकार से संभव नहीं, पर क्या यह स्वाभाविक इच्छा (स्वतंत्रता, श्रेष्ठता) मनुष्य के भीतर हँसी-ठठोली के लिये है, केवल मखौलबाज़ी है और पूरी होने के लिये नहीं है? ऐसा क्यों होगा। यह स्वाभाविक धुन [स्वतंत्र और श्रेष्ठ होने की] यह लगन जो रात-दिन पीछे लगी रहती है, पूरी क्यों न होगी? अवश्य पूरी होगी। किंतु परिच्छिन्न जीव होने की हैसियत से मनुष्य के भीतर की यह अग्नि कदापि कदापि नहीं बुझ सकती।
"मैं सेठ हूँ" इस विचार का घमंड रखनेवाला शीघ्र ही देखता है कि मुझ से अधिक घनाढ्य लोग मौजूद हैं। हाय मैं उन-जैसा कब हूँगा। मैं अद्वितीय नहीं, बड़ा नहीं। फिर वेताल का प्रश्न आकर व्याकुल करता है। बढ़ते बढ़ते कल्पना करो कि संसार में इंग्लैंड का राज्य मिल गया, फिर रूस और फ्रांस आदि समान शक्तिवाले हृदय में खटकते रहेंगे, बोरों का भय लगा रहेगा आदि। प्रजा की दृष्टि में बड़े बन गए,
अधीन राजाओं के संपूज्य होंगे, किंतु ज्ञान के बिना दृष्टि तृप्त न होगी और न होगी। निःसन्देह श्रेष्ठता और स्वतंत्रता कोसों दूर रहेगी। सहस्रों महाराजाधिराज इस संसार में हो बीते हैं, क्या सब के सब आनंदित थे?—नहीं, जितनी जितनी जिसमें ज्ञान की झलक थी, उतना उतना वह आनंदित था।
तात्पर्य यह कि जाति, वर्ण और मत [caste colour and creed] की बड़ाई वास्तव में छोटाई है! "मैं उच्च जाति का हूँ, इस लिये बड़ा हूँ" राम कहता है "प्यारे, यदि तुम जाति के कारण सर्वश्रेष्ठ और अद्वितीय बनना चाहते हो तो तुम सब से नीच हो। क्योंकि उस जाति के तुम-जैसे सहस्रों मनुष्य और विद्यमान हैं। किसी विशेष जातिकुल का होना तो तुम्हारे श्रेष्ठ (अद्वितीय वा स्वतंत्र) होने में बाधक है।" यह अनुचित अहंकार मीठी गाजरों की भांति तुम्हें एक दिन उदर पीड़ा उत्पन्न करेगा। बड़े बड़े नगरों में जब दसहरे का मेला होता है, तो लीला वाले मैदान के चारों ओर प्रायः लोहे का कांटेदार तार लगा देते हैं जिससे बिना टिकट के लोग मैदान के भीतर न आने पावें। उस समय तार के चक्र के बाहर हिंदुओं का बड़ा भारी जमाव होता है, देह से देह छिलती है, दर्शक लोग तार के किनारे किनारे बढ़कर लगाते चले जाते हैं, पीछे से धक्के पर धक्के मिलते हैं। आगे भीड़ के कारण पैर टिकाने की जगह नहीं मिलती। इस प्रकार पिस-पिसाव में जकड़े हुए चक्र में घूमनेवाला यदि (क) स्थान से (ख) तक चला जावे, तो निःसंदेह संसार की दृष्टि से बहुत उन्नति करता है, किंतु प्राणों से उसकी जान वा चित्त से पूछो कि आया स्थान (क) की अपेक्षा स्थान
(ख) पर धक्कम धक्का से कुछ कम कुचला जा रहा है कि वैसा ही। प्यारे चाहे (क) पर पहुँच जाओ, चाहे ग पर, चाहे
फिर (क) पर आ जाओ, जब तक चक्र में रहोगे, आगे पीछे के दबाव से स्वतंत्रता अ नितांत असंभव है। हाँ टिकट खरीदने पर मैदान के भीतर (अ) केंद्र को जा सकते हो। वहाँ कोई धक्कम धक्का नहीं है। संसार में
स्थान (ग) वाले (अर्थात् सर्वोच्च प्रतापशाली पुरुष) का चित्त वैसा ही डाँवाडोल, चञ्चल और धक्के खानेवाला होता है, जैसे स्थान (ग) अर्थात् अत्यन्त अधम श्रेणी) वाले का। ऐ पीड़ा और दुःख में रोने वाले संसारी! यदि तुम अपने से संसारी पदों में बड़े लोगों को देखकर डाह और ईर्षा कर रहे हो, तो मुँह मोड़ो, मुँह मोड़ो इससे, भूल जाओ, इस विचार को क्योंकि वह लोग जो देखने में तुम से अधिक प्रतापशाली हैं, अपने बाहरी मान और वैभव के कारण तुम से तनिक भर भी अधिक सुखी और प्रसन्न नहीं हैं। हाँ यदि उनमें ज्ञान का विकास अधिक है तो वह अधिक आनंदित होंगे। और यदि आपके भीतर ज्ञान अधिक व्यवहार में आया हुआ है, तो आप अधिक प्रसन्न होंगे। संसार की संपत्ति और वैभव आनंद की प्राप्ति में कोई नियोगी (factor) नहीं है। वह लोग जो अपने आप को शरीर या शरीरी मानकर अपने को श्रेष्ठ और महान बनाया चाहते हैं और अपने निकट स्थावर जंगम अधिकृतियों (मनकूला वा गैर मनकूला मकबूजात) के ढेर लगाकर बड़े बनने की आशा रखते हैं, वे आरंभ ही में भूल कर आप हैं।
केवल शून्य (0) को चाहे कहाँ तक गुणन दो। वह शून्य का शून्य ही रहेगा। इसी प्रकार यह गुत्थी हल नहीं होने की; व्यर्थ समय खोना है। आध पाव रूई वा रेशम से यूसुफ़ नहीं मिलेगा। शांति नहीं प्राप्त होगी। देहाध्यास में फँसे हुए 'शद्दाद' ने चाहा कि नईम (स्वर्ग-वाटिका) बनाकर ईश्वर की भाँति (जो मुझसे अलग है) आनन्द मनाऊँगा। अलीफ की कहानी के कुत्तेवाली कहावत उसपर ठीक उतरी, जो मुँह में मांस का टुकड़ा लिए नदी में से जा रहा था, अपनी छाया को अपने से अलग मान उस छाया के मुँह वाले मांस को छीनने के लिये पानी में कूदा और इसी झगड़े के कारण नदी में बह गया।
फुटबाल का गेंद यदि नियत झंडियों (गोल) से परे की भूमि में भी चला जाय, लेकिन झंडियों के बीच से न निकल जाय तो व्यर्थ है। गेंद को झंडियों के भीतरी ओर वापस लाना होगा और फिर नियमानुसार झंडियों के बीच में से निकालना होगा, अन्यथा कुछ न बनेगा। ऐ शद्दाद की भाँति अहंकार (little self) को बड़ा बनानेवालो! तुम अनुचित रीति से झंडियों के उसपार की भूमि पर जा रहे हो। लौटो, पीछे हटो, वापस पीछे को मुँह मोड़ो। सच्चे अपने आपको (आत्मा) साक्षात्कार करो और तुम वही ईश्वर हो जिसकी नक़ल उड़ाने का प्रयत्न शद्दाद ने किया था।
धन में, भूमि में, संतति में, मान में और संसार की सैकड़ों वस्तुओं में प्रतिष्ठा ढूँढनेवालो! तुम्हारे सैकड़ों उत्तर सब के सब अशुद्ध हैं। एक ही ठीक उत्तर तब मिलेगा जब अहंकार को छोड़ देह और देहाध्यास के भाव को ध्वंस कर और द्वैत (भिन्न दृष्टि) को त्याग कर सच्चे तेज़ और प्रताप
को सँभालोगे। इस प्रकार और केवल इस प्रकार अन्य का नाम नहीं रहने पाता, द्वैत वा नानात्व का चिह्न नहीं बाकी रहता। परम स्वतंत्र, परम स्वतंत्र, एकमेवाद्वितीयम्, एकमेवाद्वितीयम्।
क्लेश और दुःख क्या है? पदार्थों को परिच्छिन्न दृष्टि से देखना, अहंकार की दृष्टि से पदार्थों का अवलोकन करना। केवल इतनी ही विपत्ति संसार में है; और कोई नहीं। संसारी लोगों, विश्वास करो, दुःख और क्लेश केवल तुम्हारा ही बनाया हुआ है; अन्यथा संसार में वस्तुतः कोई विपत्ति नहीं है।
Look and laugh glass or ludicrous glass
हँसाने वाले वा टेढ़े शीशे में से जब बच्चे सुंदर से सुंदर मनुष्य को देखते हैं, तो कैसा भयानक और डरावना रूप दिखाई देता है। ठीक इसी भांति यद्यपि "ईश्वर सृष्टि" में कोई भी बात बुरी भयानक और निकम्मी नहीं है, "भ्रांति और अविद्या का धुंधला शीशा" आंखों पर लगाने वाले भयानक "जीव-सृष्टि" से बालकों की भांति हताश और भय-भीत पड़े होते हैं।
साज़ सारंगी बजाने वाले की उंगली कभी भूल नहीं करती। प्रथम श्रेणी का प्रवीण है। अद्भुत की सुस्वरता (harmony) उन अंगुलियों से निकल रही है। यदि तुमको विरोधस्वर (discord) सुनाई दे रहा है, तो केवल यही कारण है कि तुम्हारी सारंगी के तार ढीले होंगे। सारंगी के कान (खूँटी) मरोड़ो, तारें कस लो, मधुर स्वर तो पहले ही से हो रहा है। तुम्हारा कभी कुछ बिगाड़ हो ही नहीं सकता। दुःख दर्द क्यों?—
गुलशने-गेती नदारद गैर-गुल। वहमे खुद बगुज़ार खारश् है अस्तो बस॥ न कुछ पीरी बादे-सवा की। बिगड़ने में भी ज़ुल्फ़ उसकी नबाकी॥
संसार के बागीचे में पुष्प से इतर कुछ नहीं। अपना भ्रम छोड़, यही एक कांटा है।
एक नवयुवक पर देवता पुष्प-वर्षा कर रहे थे, इंद्र उसे वरदान दे रहा था, अकस्मात् ऐसी धुंधली छा गई कि नवयुवक की दृष्टि से देवता ओझल हो गए। क्या देखता है कि एक मनुष्य दायें से उसके चुटकी ले रहा है, एक बाँए से उसकी बाहें मरोड़ रहा है, एक सामने से लाल नेत्र दिखा रहा है, एक पीछे से ठकेल रहा है, जब यह स्वप्न-सा दूर हुआ तो बाछें खिल गईं, न कोई धुंध था न अहंकार, न कोई दायें बाँए से छेड़खानी ही थी, वही फूल बरस रहे थे और इंद्र के सामने प्रतर्दन की भांति अपने आप को वर प्राप्त करते हुए मौजूद पाया। ऐ चिंता और शोक में निमग्न पुरुषों! ईश्वर-दृष्टि में तो आप पर फूल ही बरस रहे हैं, इंद्र वर ही दे रहा है, किंतु अपने भ्रमों के बादलों में आप नाना विपत्तियाँ भोग रहे हो। अपनी चिंताओं और शोक के स्वप्न में कुछ का कुछ पड़े रचते हो। इस जीव-सृष्टि का परित्याग करते ही देखोगे कि समय कभी तुम्हारे प्रतिकूल नहीं हुआ। दैव कदापि रुष्ट और दुःख देने वाला नहीं। काल चक्र तुम्हें सच्ची स्वतंत्रता दिलाने पर तत्पर है। यथार्थ आत्मज्ञान से ये चिंताओं और भ्रमों की जीव-सृष्टि का स्वप्न दूर होता है। अंग्रेज़ी राज्य की बदौलत जाति का चमार जब मुक़ाबले परीक्षा उत्तीर्ण करके तहसीलदार हो जाता है, तो वह अपने चमारपन का नाम भी नहीं लेता, चमड़े के काम को
याद भी नहीं करता। इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान की बदौलत सच्ची ईश्वरता पाते ही चमड़े गांठने की चिंता और शोक व्यर्थ है, संशय, चिंता या अनात्मचिंतन की सृष्टि एक दम विलीन हो जाती है।
ऐ मुक्त पुरुषों के देश वालो! ऐ महर्षि-कुमारो! जब देखते हो कि वह तहसीलदार जो तुम्हारे विचार में पीढ़ियों से चमार चला आता है, चमड़ा गांठने (शूद्रपन) के काम को स्वप्न में भी नहीं करता, तो तुम तो अनादि काल से शंकर स्वरूप चले आते हो, सदा ईश्वर हो।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो। न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
तुमको क्या आवश्यकता पड़ी है वाहियात जीव-सृष्टि बनाने की। अनात्म-चिंतन, चमड़े की चिंता और शोक खेद और सन्ताप छोड़ो, जीव-सृष्टि क्यों बनाते हो जबकि ईश्वर सृष्टि तुम्हारी ही है। केवल ज्ञान के प्रकाश की देर है, खेद, चिंता, दुःख, संलाप, पीड़ा और व्याधि पास नहीं फटक सकेंगे। चैलेंज भेजता है राम, शोक, भय, लोभ, मोह, काम आदि को कभी मुँह तो दिखा जायँ।
आज़ादा अम् आज़ादा अम् अज रंज दूर उफ्तादा अम्। अज हसनये-जाले जहां आज़ादा अम् बाला सितम्॥ जाले-जहाँ मैना सखुन इशवफ़्-नाज़की मकुन्। दिल तबो नेखत मुखतिला तन तल्खिमला तला तला॥
भावार्थः—मैं स्वतंत्र हूँ, मैं स्वतंत्र हूँ, शोक से नितान्त दूर हूँ। संसार रूपी बुढ़िया के नखरे से, प्रभाव से मैं नितान्त युक्त और परे हूँ। ऐ संसार रूपी बुढ़िया, यह सुन, नखरे टखरे मत कर, तेरे से मेरा चित्त आसक्त नहीं, तन तनना, तना।
किन्तु चैलञ्ज चैलञ्ज कैसा? साझीदार [भागीदार] है ही नहीं, अन्य हुआ ही नहीं, चैलञ्ज?
अगर गम लइकर अंगेज़द कि खूने आरिफ़ां रेज़द। शुआए-जात अंदाज़ेम व बुन्यादश बरन्दाज़ेम॥
अभिप्रायः—यदि चिंता अपनी सेना को आत्मवेत्ताओं की रुद्र-नदी बहाने को भड़काए तो भी हमारे भीतर ज्ञानाग्नि की ज्वाला उस [चिन्ता] की जड़ को उखेड़ [भस्म] कर डालेगी।
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति। महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति॥4॥
य इमं मधुविदं वेद आत्मानं जीवमन्तिकात्। ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते॥5॥ (कठ, अ० 1, व, 4, 4, 5)
भावार्थः—जिस के प्रकाश में स्वप्न और जागरित दोनों अवस्थाएँ दिखाई देती हैं उस अपने वास्तविक स्वरूप को, जो सर्वव्यापक और महान् है, जानते ही आत्मवेत्ता के शोक चिन्ता सब उड़ जाते हैं।
स्वयं जो इस मधु (निजरस) के भोक्ता, समीप से समीपवर्ती, और भूत भविष्य के स्वामी आत्मा को जानता है, वह ज्ञानी फिर कभी नहीं कुढ़ता (अर्थात् न किसी आश्रय वा आधार की जिज्ञासा करता है और न किसी की अप्राप्ति पर व्याकुल होता है)। निःसन्देह यह वही है।
यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह। मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति॥10॥ (कठ, अ॰ 1, व, 4, 10)
"जो यहाँ है, निःसन्देह यही वहाँ है, और जो वहाँ है,
वही यहाँ है" इस स्थान पर विपरीत देखनेवाला मृत्यु से मृत्यु में जाता है।
एक हाथ में स्वादिष्ट मिठाई और दूसरे में अशर्फ़ी बच्चे को दिखाकर कहा जाय कि इन दोनों में से कौन सी एक वस्तु तुम्हें स्वीकार है, तो नादान बच्चा मिठाई को पसंद करेगा जो उसी दम स्वाद दे जाती है। यह नहीं जानता कि अशर्फ़ी से कितनी मिठाई मिल सकती है। यही दशा उन संसारी लोगों की है जो श्रेष्ठ बनानेवाली सच्ची स्वतंत्रता की अशरफी को छोड़कर जुगनू की चमकवाली क्षणभंगुर स्वाद देनेवाली मिठाई अंगीकार कर रहे हैं। ग्वालपन छोड़कर अपने जन्मजात स्वत्व (राजगद्दी) को सँभालने के लिये कृष्ण भगवान् का कंस को मारना अत्यावश्यक कर्तव्य था किंतु कंस तब मरेगा जब कुब्जा सीधी होगी। पान सुपारी चन्दन इत्र अबीर आदि लिए कंस की सेवा को कुब्जा जा रही है, इतने में महाराज से भेंट हो गई। बाँके के साथ कुब्जा की बोलचाल भी अत्यंत टेढ़ी थी। एक मुक्का मारने से कुबरी की पीठ सीधी होगई। नाम तो कुब्जा ही रहा, किंतु सीधी होकर अपने उपकारी के चरणों पर गिरी। अब कंस से संबंध कैसा? पान सुपारी चंदन इत्र अबीर से भगवान् का पूजन किया और उन्हींकी हो रही। सीधी कुब्जा को सहृदय सखी बनाते ही कृष्ण भगवान् की कंस पर विजय है और स्वराज्य (पैत्रिक अधिकार) प्राप्त है। विषयों के वन को त्यागकर सच्चे साम्राज्य को सँभालने के लिये अहंकार (अहंता) रूपी कंस को मारना परम आवश्यक है, नहीं तो अहंकार रूपी कंस की ओर से होनेवाली भाँति भाँति की पीड़ाएँ और चित्र-विचित्र अत्याचार कहीं
चैन से दम न लेने देंगे। अहंकार (कंस) तब मरेगा जब कुब्जा सीधी होकर कृष्ण (आत्मा) की भेदी [आत्मा के रहस्य को जानने वाली] हो जायगी।
कुब्जा क्या है?—श्रद्धा, विश्वास। सर्वे साधारण के यहाँ उल्टी [कूबरी] श्रद्धा अहंकार की सेवा में दिन रात लगी रहती है। "घर मेरा है" इस रूप में अथवा "धनसंपत्ति मेरी है" इस रूप में, "स्त्री-पुत्र मेरे हैं" इस रूप में, "शरीर और बुद्धि मेरे हैं" इस रंग में। इस प्रकार के वेशों में अनर्थ करनेवाली श्रद्धा कुब्जा [उल्टा विश्वास] प्रति समय अहंकार [देहाध्यास वा अहंता] को पुष्टि और बल देती रहती है। जब तक यह संसारासक्त दृष्टिवाली श्रद्धा सीधी होकर आत्मा [कृष्ण] की सहगामिनी, और तद्रूप न होगी, न तो अहंकार [कंस] मरेगा और न स्वराज्य मिलेगा। मारो जोर की लात इस कुब्जा को, जमाओ विवेकरूपी मुक्का इस उलटे विश्वास को। अलिफ़ [।] की भांति सीधी कर दो इस कुबरी श्रद्धा की कमर।
कदे-अलिफ़ पैदा कुनम् चूँ रास्त पुश्ते-तूँ कुनम्
अर्थातः—जब नून अवर की पीठ को सीधा करता हूँ तो अलिफ़ के कद को मैं सीधा कर देता हूँ।
अपने असली स्वरूप परमात्मा में पूर्ण विश्वास उत्पन्न करो, देह और देहाध्यास कैसे। तुम तो मुख्य ईश्वर हो।
गुफ्तम् शहा चंदी गना दारी व मन दर फाका अम्। गुफ्ता बिया, बिगुज़र जे खुद ता मन तुरा कारू कुनम्॥
तुम तो राम हो तुम बिना कुछ और है ही नहीं। मेरा तेरा आदि संबंध के क्या अर्थ? शिवोऽहम्, शिवोऽहम्, शिवोऽहम् शिवोऽहम्। इस प्रकार सीधी पीठवाली कुब्जा (यथार्थ
श्रद्धा) को एकश्वास और एकप्राण बनाते ही कंस वंश कहाँ रह जायँगे। स्वराज्य के तत्काल प्राप्त होने में क्या संशय है? यह श्रद्धा जब तक अहंकार (कंस) की सेवा में है, तब तक पीठ से टेढ़ी अर्थात् भ्रांति और भ्रम है, ज्योंही आत्मा अर्थात् कृष्ण की सेवा में आई, यूँही अलिफ़ की तरह सीधी है, उत्तमताओं का भंडार है, अद्भुत सुंदरी है, उसको सदैव अपने साथ रखने वाला (आत्म-अभ्यासी) स्वतंत्र है, और केवल वही स्वतंत्र है अन्य कोई नहीं, अन्य कोई नहीं। इस पवित्र श्रद्धा (निश्चयात्मा) के मित्र होते ही इंद्रियों के हाव भाव कटाक्ष बंद हो जाते हैं। विषय विकार दूर रह जाते हैं, इच्छाओं से पृथक्ता।
चे नादाँ बूद आँ मजनूँ कि आशिक गश्त वर लैली। चो लैली रफ्त अज दस्तश परेशाँ मांद दर खैली॥ अजब मन शम्स तबरेज़म् कि आशिक गश्ता अम् बरखुद। चो खुद दर खुद नज़र कर्दे प नदीदम् जुज़ खुदा दर खुद॥
भावार्थः—वह मजनू कैसा मूर्ख निकला जो लैली पर आशक (आसक्त) होगया और जब लैली हाथ से निकल गई तो अति व्याकुल हुआ घूमता फिरता रहा। मैं तो विचित्र प्रकार का शम्स तब्रेज़ हूँ जो अपने पर (खुद पर) आप आशक (आसक्त) हूँ और जब भीतर दृष्टि करके देखता हूँ तो अपने में परमात्मा से इतर और कुछ नहीं देखता हूँ।
सीधी कुब्जा का जादू मंत्र केवल सत्यता है, और यह मंत्र (ॐ) ऐसा प्रभावशाली होता है कि ग्वालपन (देहाध्यास और अहंता के संसर्ग और संबंध एक दम तोड़ देता है। गोपियां (इच्छाएँ) मानो कभी थीं ही नहीं, बन कानन से कभी प्रयोजन ही न था। सदा से राज्य ही करते चले आप हैं। महाराज! ग्वालपन एक स्वप्नसा था, बीत
गया। कानन भ्रमण एक लीला सी थी, बंद हुई। विषय भोग उलहना ही देते रह जायँगे।
बेवफाई क्या कहूँ मैं श्याम¹ गुलरू की। हमसे खामोशी करे कुंजा से बातें प्यार की॥
अहं वृक्षस्य रेरिवा। कीर्तिः पृष्ठं गिरेरिव। ऊर्ध्वं पवित्रो वाजिनीव स्वमृतमस्मि। द्रविणं सवर्चसम्। सुमेधा अमृतोक्षितः। (तैत्तिरीय व. 1, अ. 10,)
अर्थ—संसाररूपी वृक्ष का हिलाने वाला मैं हूँ। मेरी प्रसिद्धि गिरि-शृंग की भांति ऊँचा, मेरी मूल (मेरा स्वरूप) शुद्ध पवित्र है, मेरा ही अमृत (उज्ज्वल, प्रकाश) सूर्य के तेज में है, मैं प्रभापूर्ण संपत्ति हूँ, पूर्ण ज्ञान, अमर और अविनाशी मैं हूँ।
आपत्ति—ऐसे ही विचार का नाम आत्मचिंतन और ब्रह्म अभ्यास है तो उसे अहंकार आत्मप्रशंसा और स्वार्थ कहना शोभित और उचित होगा। वह आचार्य भी अच्छे थे जिन्होंने इस मंत्र को ब्रह्मयज्ञ की प्रतिष्ठा दी।
उत्तर—यह आपत्ति केवल वेही बुद्धिमान करेंगे जो अपने आपको भी नहीं जानते। वेदांत की आत्म प्रशंसा, संसार की स्वार्थपरता और अहंता से उतनी ही विपरीत है जितना कि वेदांत के अनुसार स्वयं आत्मा शरीर और बुद्धि आदि से परे है। मेरा सच्चा अपना आप वह नहीं है जो तुम्हारे अपने आप से जुदा है बरन मेरा सच्चा अपना आप वह है जो उससे जुदा है जिसको सर्व-साधारण "मेरा अपना आप" कहते हैं, जिसको ऊपर बेताल की उपाधि प्रदान की गई है। यह एक ईश्वरीय नियम है। यह ईश्वरीय
1 श्यामसुन्दर
नियम सब नियमों की अधीनता (बन्धनों) से स्वतंत्रता का मार्ग दिखाता है। यह अटल ईश्वरीय नियम छाया की भाँति सदैव साथ रहता है और जैसे बच्चे अपनी ही छाया से भय खाते और भागते हैं, उसी तरह ब्रह्मविद्या से वंचित लोग इस बेताल की बदौलत भाँति भाँति की दौड़ धूप और आवारागर्दी करते अर्थात् भटकते फिरते हैं। ज्ञानवान् महात्मा जानता है कि यह ईश्वरीय नियम मेरे ही स्वरूप की स्वतंत्रता जतलाता है।
परम स्वतंत्र की दशा।
रागनी बढ़ंस—ताल धमार।
आज़ादा अम, आज़ादा अम, अज़ रंज दूर उफ़तादा अम। अज़ इश्क़-ए-ज़ाले-जहाँ, आज़ादा अम बालास्तम॥1॥ तन्हास्तम, तन्हास्तम, चे बुल अजब तन्हास्तम। जुज़ मन न बाशद हेच शै, यक्तास्तम, तन्हास्तम॥2॥ चूँ कारे-मर्दुम मे कुनद, अज़ दस्तो-पा हरकत कुनद। बेकार मांदम जाए-हरकत, हम मनम, हर जास्तम॥3॥ अज़ खुद चहा बेरूँ जहम, गो मन कुजा हरकत कुनम? अज़ बहरचे कारे कुनम, मन रूहे-मतलबहास्तम॥4॥ चे मुफ़्तलिसम, चे मुफ़्तलिसम, बाखुद न मेदारम ज़रे। अंजम जवाहिर महर ज़र, जुमला मनम, यक्तास्तम॥5॥ नमरूद शुद मरदूद चूँ? बूदश निगह महदूद चूँ। मारा 'तकब्बुर' कै सज़द, चूँ किब्रिया हरजास्तम॥6॥ तालिब मकुन तौहीने मन, दर ख़ाना-ए-राम अस्त बाँ। रू ताफ़ती अज़ मन चुरा? दर कल्बे तौ पैदास्तम॥7॥
अर्थ—मुक्त हूँ, मैं मुक्त हूँ, शोक चिन्ता से मैं मुक्त हूँ। संसार रूपी बुढ़िया के नखरे टखरे से मैं मुक्त और निर्लिप्त हूँ॥1॥ मैं अकेला हूँ, मैं अकेला हूँ, और कैसा विचित्र रूप से अकेला हूँ। कि मेरे बिना कोई वस्तु नहीं, मैं एकमेवाद्वितीयम् हूँ॥2॥ जब लोग कार्य करते हैं और हाथ पाँव से चेष्टा करते हैं, तो मैं बेकार रहता हूँ क्योंकि सब कर्म का अधिष्ठान मैं सर्वत्र हूँ॥3॥ अपने से बाहिर मैं कैसे आऊं? और फिर कहाँ मैं जाऊं? जो कुछ भी काम मैं करता हूँ, मैं ही उसका तात्पर्य व प्रयोजन होता हूँ॥4॥ मैं कैसा निर्धन हूँ, मैं कैसा निर्धन हूँ कि अपने साथ एक जौ भर नहीं रखता हूँ। तारे, मोती, हीरे, सूर्य और सोना यह सब मैं हूँ और अद्वैत हूँ॥5॥ नमरूद मरदूद क्यों हुआ? इसलिये कि उस की दृष्टि परिच्छिन्न था। पर मेरी तो परिच्छिन्न दृष्टि नहीं और मुझे यह परिच्छिन्न दृष्टि कैसे शोभा देती है जब कि मैं स्वयं महान और सर्वत्र हूँ॥6॥ ऐ जिज्ञासु! मेरा अपमान मत कर, तेरे (अन्तः करण) भीतर राम भगवान् है, वहाँ मुझे देख। मेरे से मुख क्यों मोड़ता है? तेरे हृदय में तो मैं ही प्रकट हूँ।
अपने मज़े की ख़ातिर गुल छोड़ ही दिए जब। रूप-ज़मीं के गुलशन मेरे ही बन गए सब॥1॥ जितने ज़ुबाँ के रस थे कुल तर्क कर दिए जब। बस ज़ायक़े जहाँ के मेरे ही बन गए सब॥2॥ खुद के लिये जो मुझ से दीदों की दीद छूटी। खुद हुस्न के तमाशे मेरे ही बन गए सब॥3॥ अपने लिये जो छोड़ी ख्वाहिश हवाख़ोरी की। बादे-सबा के झोंके मेरे ही बन गए सब॥4॥ निज की ग़रज़ से छोड़ा सुनने की आरज़ू को।
अब राग और बाजे मेरे ही बन गए सब॥5॥ जब बेहतरी के अपनी फ़िक्रो-ख़याल छूटे। फ़िक्रो-ख़याल-रंगीं मेरे ही बन गए सब॥6॥ आहा! अजब तमाशा! मेरा नहीं है कुछ भी। दावा नहीं ज़रा भी इस जिस्मो-इस्म पर ही॥7॥ यह दस्तो-पा हैं सब के, आँखें ये हैं तो सब की। दुनिया के जिस्म लेकिन मेरे ही बन गए सब॥8॥
ॐ! ॐ!! ॐ!!!