श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

मंगलाचरण

भाग 7-9 · श्री स्वामी रामतीर्थ ग्रन्थावली
भाग 7-9 · अध्याय 1 / 14

मंगलाचरण

[ 1 ] दोहरा, राग विभास नारायण सब राम रहा, नहीं द्वैत की गन्ध । वही एक बहु रूप है, पहिला बोलूँ छन्द ॥ 1 ॥ कृपा सद्गुरु देव से, कटी अविद्या फन्द । मैं तो शुद्ध ब्रह्म हूँ, द्वितीया बोलूँ छन्द ॥ 2 ॥ स्व स्वरूप राम को लखूँ एक सच्चिदानन्द । वह मेरो है आत्मा, तृतीया बोलूँ छन्द ॥ 3 ॥ स्वाँस स्वाँस अनुभव करूँ, राम कृष्ण गोविन्द । सो मैं ही, कोई भिन्न न, चतुर्थ यह बोलूँ छन्द ॥ 4 ॥ सो स्वरूप सा मैं लख्यो, निजानन्द मुकन्द । सो आनन्द मैं एक रस, पञ्चम बोलूँ छन्द ॥ 5 ॥ Notes: 1 अनेक, नाना, 2 राम भगवान् वा राम स्वामी से भी अभिप्राय है, 3 वही ।

( 2 ) राम-वर्षा [ 2 ] राग पीलू, ताल दीप चन्दी रफ़ीक़ों में गर है मुरव्वतें तो तुझ से । अज़ीज़ों में गर है मुहब्बत तो तुझ से ॥ 1 ॥ ग़नियों में जो कुछ है दौलत तो तुझ से । अमीरों में है जाह-ओ-सौलतें तो तुझ से ॥ 2 ॥ हकीमों में है इल्मो-हिकमतें तो तुझ से । या रौनक़े-जहाँ या है बरकत तो तुझ से ॥ 3 ॥ है रो कर यह तकरारे-उलफ़तें तो तुझ से । कि इतनी यह हो मेरी क़िस्मत तो तुझ से ॥ 4 ॥ मेरे जिस्मो-जाँ में हो हरकत तो तुझ से । उड़े मन-ओ-मनी की वह शिरकतें तो तुझ से ॥ 5 ॥ मिले सद्क़ा होने की इज़्ज़त तो तुझ से । सदा एक होने की तलज़्ज़त तो तुझ से ॥ 6 ॥ उड़े रेढ़ी वांकी यह चालाकियाँ सब । सिपर फेंक, ढूँढ़ सलामतें तो तुझ से ॥ 7 ॥ Notes: 1 मित्रों, 2 सत्कार, लिहाज़, कृपा, शील, 3 प्यारों में, 4 पद, मान और वैभव, 5 विद्या और चिकित्सा-बुद्धि, 6 संसार की शोभा, 7 प्रेम के झगड़े और विवाद, 8 देह और प्राण, 9 अहंकार, 10 पृथकता, जुदाई, 11 अर्पण होना, 12 तिस पर, 13 कल्याण ।

मंगलाचरण ( 3 ) [ 3 ] राग शाम कल्याण क्या क्या रक्खे हैं भगवान् ! सामान तेरी कुद्रत । बदले हैं रंग क्या क्या, हर आन तेरी कुद्रत ॥ 1 ॥ सब मस्त हो रहे हैं, पहचान तेरी कुद्रत । तंतर पुकारते हैं, सुबहान तेरी कुद्रत ॥ 2 ॥ कोयलें की कूक में भी, तेरा ही नाम है गा । और मोर की गुटरूँ में, तेरा ही प्यार है गा ॥ 3 ॥ यह रंग सोलहड़े का जो सुबहो-शाम है गा । यह और का नहीं है, तेरा ही काम है गा ॥ 4 ॥ बादल हवा के ऊपर, चकोर नाचने हैं । मेंढक उछल रहे हैं, और मोर नाचते हैं ॥ 5 ॥ बोलें कबूतर बटेरें, कुमरी पुकारे कू कू । पी पी करें पपीहा, बगले पुकारें तू तू ॥ 6 ॥ क्या फ़ाख़तों की हक़ हक़ें, क्या हुद हुदों की ह्ह् ह्ह् । सब रट रहे हैं तुझ को, क्या पंखे क्या पखेरू ॥ 7 ॥ Notes: 1 माया, प्रकृति, 2 समय, हर घड़ी, 3 तेरी माया पर वारि, 4 पक्षी का नाम, 5 चाल, 6 पैग़ाम, संदेशा, 7 शफ़क़, प्रातः व सायंकाल की आकाश में लाली, 8 प्रातः सायं, 9 पक्षी का नाम, 10 ग्वालाज़ का नाम, 11 पक्षी छोटे व बड़े।

( 4 ) राम-वर्षा [ 4 ] मुसद्दस राग वडहंस अथवा राग बरवा ताल तीन कहीं कैसा सितारा हो के अपना नूर चमकाया । कहीं ज़ुहल में जा कहीं चमका, कहीं मरीख़ में आया ॥ कहीं सूरज हो क्या क्या तेज़ जल्वा आप दिखलाया । कहीं हो चाँद चमका और कहीं ख़ुद बन गया साया ॥ तू ही बातिन में पिनहाँ है, तू ज़ाहिर हर मकान पर है । तू मुनियों के मनों में है, तू रिंदों की ज़ुबान पर है (टेक)॥ 1 ॥ तेरा ही हुक्म है इन्दर, जो वरसाता है यह पानी । हवा अटखेलियाँ करती है तेरे ज़ोर-निगरानी ॥ नज़र आतशे-सोज़ां में तेरी ही है नूरानी । पड़ा फिरता है मारा मारा डर से मर्गे-हैवानी ॥ तू ही० 2 ॥ तू ही आँखो में नूरे-मर्दमकों हो आप चमका है । तू ही हो अक़ल का जौहर सिरों में सब के दमका है ॥ तेरे ही नूर का जलसा है क़तरे में जो नम का है । तू रौनक़ हर चमन की है, तू दिलबर जामे-जम का है ॥ तू ही० 3 Notes: 1 सातवां आकाश का, 2 शनिश्चर तारा, 3 मंगल तारा, 4 तेज व प्रकाश, 5 चन्द्र, 6 छिपा हुआ, 7 निगरानी के नीचे, आज्ञाधीन, 8 तेज, रौशनी, 9 जलती हुई अग्नि, 10 चमक, प्रकाश, 11 पशुस्वभाव मृत्यु देवता, 12 आँख की पुतली की रौशनी, 13 तरी, 14 बाग़, 15

मंगलाचरण ( 5 ) कहीं ताऊस ज़री वाल बनकर रक़्स करता है । दिखाकर नाच अपना मोरनी पर आप मरता है ॥ कहीं हो फ़ाख़ता कू कू की सी आवाज़ करता है ॥ कहीं बुलबुल है ख़ुद है वागवां फिर उस से डरता है ॥ तू० 4 कहीं शाहीन बना शहबाज़, कहीं शकरा है मस्ताना । शिकारी आप बनता है, कहीं है आब-ओ-दाना ॥ लटक से चाल चलता है कहीं माशूक़े-जानाना । सनम में तू, ब्राह्मण, नाक़ूस तू ख़ुद, तू है बुतख़ाना ॥ तू ही० 5 ॥ तू ही याक़ूत में रौशन, तू ही पुखराज और दुर में । तू ही लाल-ओ-बदख़शां में, तू ही है ख़ुद समुद्र में ॥ तू ही कोहे और दर्या में, तू ही दीवार में, दर में । तू ही सेहरा में आवादी में तेरा नूर नय्यर में ॥ तू ही० 6 ॥ [ 5 ] राग बरवा, ताल तीन अजब हैरान हूँ भगवन् ! तुम्हें क्योंकर रिझाऊँ मैं । कोई वस्तु नहीं ऐसी जिसे सेवा में लाऊँ मैं ॥ 1 ॥ करूँ किस तरह आवाहन कि तुम मौजूद हो हर जा । निरादर है बुलाने को, अगर घंटी बजाऊँ मैं ॥ 2 ॥ Notes: 1 मोर, 2 सुनैहरी वालों वाला, 3 नृत्य, नाच, 4 घुग्गी (घुगघतो), (5,6,7) पक्षियों के नाम, 8 पानी और दाना, 9 प्रिया, स्त्री की तरह, 10 प्रिय, प्यारा, 11 शंख, 12 मंदिर, (13,14,15) मोती और लाल, 16 पर्वत, 17 द्वार, घर, 18 जंगल, 19 सूर्य, 20 हर जगह, प्रत्येक स्थान।

( 6 ) राम-वर्षा तुम्हीं हो मूर्ति में भी, तुम्हीं व्यापक हो फूलों में । भला भगवान् पर भगवान् को कैसे चढ़ाऊँ मैं ॥ 3 ॥ लगाना भोग कुछ तुमको, यह इक अपमान करना है । खिलाता है जो सब जग को, उसे कैसे खिलाऊँ मैं ॥ 4 ॥ तुम्हारी ज्योति से रोशन, हैं सूरज चाँद और तारे । महा अंधेर है तुमको, अगर दीपक दिखाऊँ मैं ॥ 5 ॥ भुजाएँ हैं न सानो हैं, न गर्दन है, न पेशानी । तू है निलेप नारायण, कहाँ चन्दन लगाऊँ मैं ॥ 6 ॥ [ 6 ] राग हिंडोल तेरी कुदरत तू ही जाने और न दूजा जाने । जिसनूं कृपा करे तू प्यारे सोई तुझे पिछाने ॥ 1 ॥ तेरी सेवा तुझसे होवे और न दूजा करता । भगत तेरा सोई तुझे भावे जिसनूं तू रंगधरता ॥ 2 ॥ तू बड़ दाता, तू बड़ दाना और नहीं कोई दूजा । तू समर्थ स्वामी मेरा, हों क्या जाना तेरी पूजा ॥ 3 ॥ तेरा महल अगोचर मेरे प्यारे ! विरखमें तेरा है भाना । कहो नानक ढहें पया झारे, रख लेवो सुगढ़ अजाना ॥ 4 ॥ Notes: 1 ज्ञाती व स्थान, 2 मस्तक, 3 तुक्के, 4 हृदय को रंगता है, 5 बड़, 6 मैं, 7 कठिन, 8 भान करना, जानना, 9 गिर पड़ा।

मंगलाचरण ( 7 ) [ 7 ] हे अच्युत ! हे पार ब्रह्म ! अविनाशी अघनाशो । हे पूर्ण ! हे सर्वमय ! दुख भंजन गुण तासों ॥ 1 ॥ हे संगी, हे निरंकार, हे निर्गुण सब ठेक । हे गोविन्द, हे गुण निधान, जाके सदा विवेक ॥ 2 ॥ हे अपरम्पर हर हरे, है भी, होवन हार । है सन्तां के सदा संग, निर्धारा आधार ॥ 3 ॥ हे ठाकुर हौं दासड़ो, मैं निर्गुण गुण नहिं कोय । नामक दीजे नाम दान राखो हित्थैं परोय ॥ 4 ॥ [ 8 ] श्लोक ऊँचा अगम अपार प्रभु कथन न जाय अकथैं । नानक प्रभु शरणागति राखन को समर्थैं ॥ 1 ॥ वासुदेव सर्वत्र में ऊनैं न कतहूँ ठाय । अन्तर बाहर संग है नानक कायँ दुड़ाय ॥ 2 ॥ लाल गोपाल गोविन्द प्रभु, गहिर, गंभीर अथाह । दूसर नाहिं अवर कोय, नानक बेपरवाह ॥ 3 ॥ Notes: 1 पाप के नाशक, 2 उसका, 3 मैं, 4 हृदय में परोक्ष, हृदय के साथ, 5 अकथनीय, 6 समर्थवान, 7 खाली, न्यून, 8 कहीं भी, 9 स्थान, जगह, 10 क्यों दौड़ रहा है वा दौड़ रहा है।

( 8 ) राम-वर्षा रूप न रेख न रंग किछु, त्रिहु गुण ते प्रभु भिन्न। तिसहि बुझावै नानका जिस होवे सुप्रसन्न॥4॥ [ 9 ] राग तिलंग (महला 1) तुधु बिन दूजा नाहिं कोय। तूं करतार करे सो होय॥ तेरा ज़ोर तेरी मन टेक। सदा सदा जप नानक एक॥1॥ सब ऊपर पार ब्रह्म दातार। } रहाव तेरी टेक तेरा आधार॥ } है तू है तू होवनहार। अगम अगाध उच्च अपार॥ जो तुध सेवे तिन भौ दुःख नाहिं। गुरप्रसाद नानक गुण गाहिं॥2॥ जो दीसे सो तेरा रूप। गुण निधान गोविन्द अनूप॥ सिमर सिमर सिमरे जन सोई। नानक करम प्राप्त होई॥3॥ जिन जपया तिसको बलिहार। तिसके संग तरे संसार॥ Notes: 1 उसे दर्शन देता या अनुभव कराता है जिसपर वह स्वयं प्रसन्न होता है, 2 तेरे बिना, 3 आश्रय, 4 संसार का दुःख, 5 दीखे, दिखाई दे, 6 भाग्य।

कहो नानक प्रभु लोचा पूरे। संतजनों की बांछों धूर॥4॥ [ 10 ] राग बरवा ताल तीन है आरफों के दिल में; भगवन्! मकान तेरा। और वेद पाठियों के, लबों पर है नाम तेरा॥1॥ काशी के बुतकदों में, कुछ तू नहीं मुक़य्यद। हर जा है तेरा मन्दिर, हर जा है धाम तेरा॥2॥ जपते हैं तुमको प्यारे, दुनिया के जीव सारे। हस्तीं का तेरी शाहिद, हर एक काम तेरा॥3॥ दिल साफ़ कर लिया है, दुनिया की मैल से जिसने। वह देखता है दिल में दर्शन मुदाम तेरा॥4॥ आज़ाद को सिखा दो प्रीति की राह अपनी। जिससे अमर हो पी के अमृत का जाम तेरा॥5॥ [ 11 ] तर्ज़ दुसरी राग कु़माच, ताल तीन जो तुम हो सो हम हैं प्यारे, जो तुम हो सो हम हैं। (टेक) पर्बत में तुम, नदीयन में तुम, चहुँदिश तुम ही हो विस्तारे॥ वृक्षलता में तुमहि विराजो, सूरज चन्द्र तुम ही हो तारे॥1॥ Notes: 1 पूर्णरूप में देखा, 2 आत्मज्ञानियों, 3 मुख पर, ओष्ठ पर, 4 मन्दिरों, 5 परिच्छिन्न, कैद, 6 स्थान, देश, 7 अस्तित्व, मौजूदगी, 8 साक्षी, 9 मैल, कीचड़, 10 नित्य, सर्वदा, 11 प्याला।

( 10 ) राम-वर्षा देश भी तुम हो, काल भी तुमहो, तुमही हो सबके आधारे॥ अलख ब्रह्म है नाम तिहारो, माया से तुम नित्य हो न्यारे॥2॥ रूप नहीं, नहीं गुण है तुममें, वस्तु क्रिया से दूर सदा रे॥ तीनों लोक में तुम ही व्यापो, तबहुँ उनते होत तुम न्यारे॥3॥ जो ध्यावे सो यह ही पावे, तुम उनसे चेतन प्यारे॥ रामानन्द अब जान लेहु यों, आनन्द चेतन नहीं दो न्यारे॥4॥ नोट—उक्त भजन राम भक्त स्वर्गवासी राय बहादुर लाला वैजनाथ साहब जज का है जो उन्होंने स्वामीजी को अपने पत्र द्वारा लिखकर भेजा था।