श्री रामायण मन्दिरमाधवबाड़ी, बरेली · विकासनगर, देहरादून

विवाहित जीवन की उपयोगिता

अध्याय 3 / 5 · भाग 1 / 2 · गृहस्थ में आनंद की यात्रा
अध्याय 3 / 5 · भाग 1 / 2

विवाहित जीवन की उपयोगिता — भाग 1

राम का ध्यान वेदांत के उपदेशों पर की गई कतिपय आपत्तियों की ओर आकृष्ट किया गया है । पिछले दिन एक व्यक्ति ने कहा कि यदि यही वेदांत ही हिंदुओं का दर्शन है, तब आसानी से समझ सकते हैं कि भारत का राजनीतिक अधःपतन किन कारणों से हुआ ? एक-दूसरे व्यक्ति ने राम से पूछा कि यदि हिंदुओं का यही शास्त्र, अर्थात वेदांत दर्शन, हिंदुओं का यही वास्तविक धर्म विश्व का सर्वाधिक उत्कृष्ट दर्शन और धर्म है, तो क्या कारण है कि भारत इतना अंधकारयम तथा दीन-हीन है और सभी ईसाई देश इतने उन्नत तथा संपन्न हैं ?

राम इस समय इन प्रश्नों का उत्तर नहीं देगा, क्योंकि यदि इन प्रश्नों पर विचार-विनिमय प्रारंभ किया गया, तो जिस विषय पर आज चर्चा करने का वचन दिया गया था, उसकी व्याख्या नहीं की जा सकेगी । लेकिन इन प्रश्नों पर बाद में अन्य भाषणों में विचार-विमर्श किया जाएगा और इन सभी प्रश्नों का इस प्रकार उत्तर दिया जाएगा कि सभी लोग उसको सुनकर अचंभित हो जाएंगे ।

जो लोग यह सोचते हैं कि भारत के पतन का कारण वेदांत है, तो वे लोग इन उत्तरों को सुनकर दांतों तले उंगली दबा लेंगे । परंतु अभी इन प्रश्नों की चर्चा करने का उपयुक्त समय नहीं है ।

जिन लोगों ने राम के व्याख्यानों, वेदांत के उपदेशों को सुना है, उन सभी से राम का केवल यह अनुरोध है कि वे इतने अधिक आतुर न हों, और अविलंब कोई निष्कर्ष न निकालें । राम को उनसे अपेक्षा है कि वे थोड़ा धैर्य रखें और राम को ध्यानपूर्वक सुनें ।

'अलकुरान' में जो मुसलमानों के लिए उसी प्रकार का धर्म-ग्रंथ है, जिस प्रकार ईसाइयों के लिए बाइबिल है, एक अंश ऐसा भी है, जिसका मंतव्य इस प्रकार है—''यदि तू अपने आपको अपवित्रता, बुराइयों, पापों को भेंट कर देगा, यदि तू अपना जीवन शराब पीने और इंद्रिय-सुखों में लगा देगा, तो तू अपनी खुद की बरबादी करेगा और अपनी बरबादी को अपने आप हासिल कर लेगा ।''

एक मुसलमान सज्जन ऐसे थे जिनको शराब पीते हुए देखा गया । वह शराब पीने की तरह ही शारीरिक सुखों तथा विषय-वासना, संभोग आदि के आनंद के लिए लालायित रहा करते थे । एक मौलवी उनके पास आए और डांटते हुए बोले कि उन्हें इस प्रकार का बर्ताव नहीं करना चाहिए, क्योंकि इससे वह खुद अपने पैगंबर द्वारा बताए गए कानूनों को तोड़ेंगे । इस पर उस व्यक्ति ने, उस पियक्कड़ ने तुरंत ही 'अलकुरान' के उस अंश का पहला हिस्सा दुहरा दिया और कहा—''मौलवी साहब ! इनायत कर यह भी देखिए । 'अलकुरान' में यह भी लिखा है कि ''यदि तू शराब पिएगा, मजा उड़ाएगा और अपने आपको इंद्रिय-सुखों की भेंट चढ़ा देगा—'' यही तो है, ठीक यही तो कहता है हमारा अलुकरान, हमारा धर्म-ग्रंथ । देखिए तो अलकुरान हमारा पाक धर्म-ग्रंथ हमसे शराब पीने और इंद्रियों का सुख भोगने के लिए कहता है तब हम ऐसा क्यों न करें ?''

इस पर मौलवी साहब ने जवाब दिया—''भाई, मेरे प्यारे भाई ! आप क्या करने वाले हैं ? आप इसके बाद का लिखा हुआ हिस्सा भी तो पढ़िए । उसमें साफ लिखा है कि 'तू खुद-ब-खुद अपनी बरबादी कर लेगा ।' (यह उक्त अंश का बाद का हिस्सा था) इस हिस्से को भी देखो, उसे पढ़ो ।''

पर उस पियक्कड़ व्यक्ति ने कहा—''इस पूरी धरती पर एक भी आदमी ऐसा नहीं है जो अलकुरान में दी गई सभी हिदायतों पर पूरा अमल कर सके । इसलिए मुझे अलकुरान के केवल इसी हिस्से की हिदायत का पालन करने दें ।

''किसी भी इंसान से यह उम्मीद नहीं की जाती है और न ही उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह बाइबिल या अलकुरान के सभी उपदेशों तथा शिक्षाओं को पूरी की पूरी तरह व्यवहार में अमल कर लेगा । कुछ लोग तो इन शिक्षाओं के बहुत थोड़े भाग पर अमल कर पाते हैं और कुछ लोग इन हिदायतों के कुछ अधिक हिस्से को अपनी जिंदगी में अपना पाते हैं । बस, इतना ही होता है । कोई भी आदमी अभी तक पूरे के पूरे उपदेशों पर अमल नहीं कर सका । तब आप मुझसे क्यों उम्मीद करते हैं कि इस पूरी की पूरी हिदायत पर मैं अमल करूं ? इसलिए मुझे इस हिदायत के सिर्फ पहले हिस्से का मजा उठाने दें ।''

इसलिए राम आपसे केवल यही विनयपूर्वक कहता है कि उस मुसलमान पियक्कड़ के तर्कों तथा दर्शन को मत अपनाइए, पूरे के पूरे अंश को, पूरी की पूरी हिदायत को पढ़िए और तभी कोई नतीजा निकालिए, इससे पहले नहीं ।

एक बार राम के पास सोने की एक घड़ी थी । उसकी चेन के साथ जो सस्ते आभूषण लगे थे, उसमें एक खिलौने की घड़ी भी थी जो वास्तव में एक कुतुबनुमा थी । वह खिलौने की घड़ी या कुतुबनुमा अपने आप तो चलती नहीं थी, पर उसकी सुइयों को एक निश्चित दिशा में घुमाने से उसमें एक बज सकता था । यही किया गया । उसकी सुइयों को घुमाकर उसमें एक बजा दिया गया । इस एक में द्वैत का कोई स्थान नहीं था । वही 'एक' आप हैं । आप देश, काल, कार्य कारण से ऊपर हैं, इन सभी पर आपका शासन है, आपका नियंत्रण है, ये आपको नियंत्रित नहीं करते हैं, आप इनके पराधीन नहीं हैं, ये देश-काल, कार्यकारण जैसे सभी संबंध आपकी कल्पना के सेवक हैं, दो-तीन आदि सभी मिथ्या हैं, असत्य हैं केवल 'एक' ही काल के बंधनों से मुक्त है, उस पर किसी का अधिकार नहीं है ।

प्रश्न-क्या कोई विवाहित व्यक्ति आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करने की अभिलाषा कर सकता है ?

एक सुझाव यह आया है कि इस प्रश्न पर विचार न किया जाए और इसके स्थान पर राम के प्रिय विषय की ही व्याख्या हो । राम का सीधा उत्तर है कि हर विषय राम का प्रिय विषय है । यदि इस प्रश्न पर पूरी तरह, सम्यक् रूप से विचार किया जाए, तो इससे आपका अत्यधिक लाभ होगा, परंतु यह चर्चा बहुत ही चौंकानेवाली, अचंभित करनेवाली होगी । इसलिए आपको इसे पूरी तरह ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए । कदाचित यह चर्चा इस देश (अमरीका) के लोगों को विचित्र लगे । पर राम को इसकी किंचित चिंता नहीं है, राम तो बस, आपका समादर करता है ।

वेदांत इस प्रश्न के उत्तर में कहता है—''निश्चित रूप से औषधि उसी व्यक्ति को दी जाती है जो बीमार हो । उसे औषधि नहीं दी जाती है जो स्वस्थ हो ।'' जो लोग इस संसार से और इसके खतरों, इसके भय से सर्वाधिक त्रस्त हैं, उनको औषधि की सबसे अधिक आवश्यकता है । एक अविवाहित व्यक्ति उन बातों की आसानी से अनुभूति नहीं कर सकता जो वह व्यक्ति करता है, जो विवाहित है, जो सही रीति से अपना गृहस्थ जीवन चलाता है । पर यदि वह विवाहित व्यक्ति भी बेपरवाह ढंग से, अव्यवस्थित रूप से रहता है, तो वह भी उन बातों का साक्षात्कार नहीं कर पाएगा और अधोगति की ओर ही बढ़ेगा ।

पति-पत्नी के बीच सच्चे संबंधों के ज्ञान के अभाव से बहुत सारे कष्ट उठाने पड़ते हैं । इतने महत्वपूर्ण विषय की और उस विषय की, जो आपके हृदय के सबसे अधिक निकटस्थ है, आखिर क्यों उपेक्षा की जाए ? इस प्रश्न के इस पक्ष पर कि विवाह की किस प्रकार तैयारी की जाए, इस समय चर्चा नहीं की जाएगी । यह एक बड़ा प्रश्न है और बाद में किसी अन्य व्याख्यान में इस पर विचार किया जाएगा ।

राम और उसकी पत्नी अपने विवाह के बाद दो वर्षों तक अकेले-अकेले रहे । यह तथ्य है, कोई कपोल कल्पना नहीं ।

विवाह हानिकारक नहीं होता है, परंतु यदि वैवाहिक संबंधों में दुर्बलता का प्राधान्य हो जाए तो निश्चय ही इससे अपकार ही होगा, जैसे नीच प्रकृतिवाले तत्वों से होता है । उदाहरण के लिए—रूप से आसक्ति, इस विचार की प्रधानता कि ''मैं शरीर हूं, मेरा साथी भी शरीर है'', वासना, वस्तु-उपार्जन, आधिपत्य की लालचपूर्ण, लुभावनी लालसा । यदि वही विधि है जिसमें वैवाहिक संबंधों को व्यवहार में लाना है, तो कोई भी व्यक्ति कभी भी आत्मा का साक्षात्कार नहीं कर सकता ।

उस 'पेनेलापी' महिला का उदाहरण लें जो दिन में सूत काता करती थी और रात में उस कते हुए सूत को उधेड़ दिया करती थी । ऐसी महिला का काम क्या कभी समाप्त हो सकता है ? वह व्यक्ति किस प्रकार उन्नति कर सकता है जो हमेशा इसी उपक्रम में लगा रहता है कि उसने जो भी उपलब्धि हासिल की है, उसे वह किसी प्रकार नकार दे, उसे किसी प्रकार समाप्त कर दे ?

वेदांत निर्भयतापूर्वक घोषणा करता है कि वैवाहिक संबंधों द्वारा आपको शक्ति से अनुप्राणित होना चाहिए, उच्चतर प्रेम से परिपूर्ण होना चाहिए, आपको उन अधम तथा नीच प्रवृत्तियों से ऊंचा उठना चाहिए जिसे भ्रम से प्रेम कहा जाता है, आपको शारीरिक चेतना से विरत होना चाहिए, उससे परे होना चाहिए ।

यह पेनेलापी की तरह सूत कातने की निरर्थक क्रिया ही होगी, जिसके अनुसार जब पति-पत्नी एक-दूसरे के केवल शरीर को देखेंगे, शरीर को ही प्रधानता देंगे तो जो कुछ भी किया कराया था, सब नष्ट हो जाएगा । यह तो वैसा ही होगा जैसा पेनेलापी की काते गए सूत को उधेड़ने की क्रिया से सारी उपलब्धि नष्ट हो जाया करती है । तो फिर आप किस प्रकार उन्नति कर सकते हैं ?

क्या इसका यह मंतव्य है कि लोग शादी ही न करें ? नहीं, यह कदापि नहीं है । इसका तात्पर्य यह है कि विवाह का उपयोग भिन्न प्रकार से करें । वेदांत की शिक्षाओं को व्यवहार में लाएं । विवाह को आप स्वयं को ऊंचा उठाने का साधन बनाइए, तब विवाह अत्यंत सहायक होगा । जो अवरोध है उसी को ऊपर चढ़ने का साधन बनाइए ।

जब आप विवाह को वासनाओं का दास बना देते हैं, तो जितनी भी बार आप उन वासनाओं से जितना अधिक आनंद उठाएंगे, उतनी ही बार आपके बंधन आपको उतने ही अधिक जकड़ते जाएंगे और आप अधोगति की ओर निरंतर बढ़ते जाएंगे ।

पैगंबर लोग महिलाओं के विरुद्ध बोलते हैं । उनका कहना है—''औरत नरक का द्वार है ।'' इस विचार से राम सहमत नहीं है । एक व्यक्ति सड़क-मार्ग पर जा रहा था, उसकी जेब से शराब की बोतल झलक रही थी । उसकी भेंट एक पादरी से हुई । उसने पादरी से जेल का रास्ता पूछा, वह जेल देखना चाहता था । पादरी के हाथ में छड़ी थी और उसने उससे शराब की बोतल को छुआ । वह बोला—''भाई ! यह बोतल, यह शराब जेल जाने के लिए सबसे सीधा रास्ता है और यह आपको अवश्य ही वहां पहुंचा देगी ।''

इसी प्रकार, औरत के बारे में भी व्याख्या की जाती है । संसार एक कारागार है—आधुनिक विवाह आपको कारागार में अवश्य पहुंचा देगा । यदि स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पतन के साधन हैं तो जिस ईश्वर ने बाइबिल की रचना की, उसी एक ईश्वर ने स्त्री को ढूंढ़ने के लिए पुरुष के हृदय में इस प्रकार की बाइबिल अर्थात पवित्र इच्छा क्यों उत्पन्न की ? यह तो विरोधाभास है । इस विरोधाभास का एक गूढ़ मंतव्य है । यह तो अज्ञान है, अविद्या है जो स्त्री को अधःपतन का माध्यम घोषित करता है । वस्तुतः सारा दोष इस अज्ञान का है, वैवाहिक संबंधों का किंचित भी नहीं ।

प्रश्न यह है कि इस अज्ञान का निराकरण किस प्रकार किया जाए । शून्य का उदाहरण लीजिए । यदि किसी संख्या में शून्य को दशमलव के दाईं ओर लिख दिया जाए तो उस संख्या का मान कम हो जाएगा और यदि इसी शून्य को दशमलव के बाईं ओर लिख दिया जाए तो उस संख्या का मान बढ़ जाएगा । शून्य का स्वयं का कोई मूल्य, कोई मान नहीं होता, उसका मूल्य तो संख्याओं की स्थिति या संख्याओं के संदर्भ में निश्चित होता है (यह बात राम ने उदाहरण देकर समझाई) । इसी प्रकार विवाह के मामले में आपकी स्थिति का मूल्यांकन पति-पत्नी के संबंधों के संदर्भ में ही निर्धारित होता है ।

पति अपनी पत्नी में क्यों सुख की अनुभूति करता है ? इस प्रश्न पर अवश्य ही शोध किया जाना चाहिए अन्यथा समस्या के समाधान का पता नहीं लगाया जा सकता है । यही सुखानुभूति है, यही आनंद है जो पुरुषों को दास बनाता है । 'ट्रोजन' युद्ध इसका ज्वलंत प्रमाण है । यह वही युद्ध है जो एक बालिका को नायिका बना देता है और दूसरे को नहीं । यह कहना झूठ है कि यह आनंद, यह सुख स्वयं औरत से प्राप्त किया जाता है । हमें इस कथन की भूल को समझना होगा । वस्तुतः सुख और आनंद न तो औरत में है और न ही उसके शरीर में ।

यदि सभी सुख अपने प्रेम-पात्र अथवा प्रेम की मनचाही वस्तु में केंद्रित हो तो पति-पत्नी एक-दूसरे के लिए सदैव आनंद, सुख के स्रोत बने रहते । पर हम यह जानते हैं कि यह सत्य नहीं है । जब आपने अपने इंद्रिय-सुख को पूरा भोग लिया तब आपकी क्या स्थिति होती है ? तदुपरांत क्या और अधिक सुख पाने की चेतना नहीं होती है ? यदि आप नपुंसक हैं तब क्या कोई स्त्री अथवा पत्नी ही सही, सुख का स्रोत हो सकती है ? जब आपकी अपनी अर्द्धांगिनी रोग से पीड़ित हो, या जब वह व्यभिचारणी हो, या जब आप स्वयं बीमार हों तो आपकी पत्नी में कोई इंद्रिय-सुख केंद्रित नहीं होता है ।

इस प्रकार दो विभिन्न सत्ताएं आप देख सकते हैं । द्वैत स्पष्ट है । जब यह दोनों विभिन्न सत्ताएं या द्वैत विलुप्त हो जाता है तभी पूर्ण अभेदता स्थापित होती है । यह एकता न केवल शरीर की, अपितु मन और हृदय की होती है । उसके बाद ऐसी स्थिति आती है जो वर्णनातीत होती है । तब शरीर कोई शरीर नहीं होता है, संसार कोई संसार नहीं होता है, बस केवल होता है पूर्ण मिलन, पूर्ण अभेदता, स्वर्ग, स्वतंत्रता, निडरता ।