विवाहित जीवन की उपयोगिता — भाग 2
कारण यह है कि तब कोई द्वैत नहीं रहता, एक ही सत्ता, एकमात्र एकता ही विद्यमान होती है । संपूर्ण संसार लोप हो जाता है, संसार पूरी तरह समाप्त हो जाता है । 'अस्ति' में कोई भ्रम नहीं रहता । सत्य उजागर होता है । मैं शरीर नहीं हूं, और न ही पत्नी शरीर है । मैं शरीर, मन, संसार से परे हूं । फिर तो स्वर्ग की पुनर्प्राप्ति कर ली गई । लक्ष्य उपलब्ध हो गया । सभी अवस्थाओं को पार कर लिया गया । कोई बंधन नहीं रहा । इस तथ्य का सदैव यही तात्पर्य निकलता है कि वस्तुतः वहां कुछ अन्य वस्तु, कुछ अन्य सत्य है ।
वेदांत कहता है कि वहां, उस समय, उस स्थल पर आप विद्यमान हैं, आप चिद् हैं, आनंद हैं, शक्ति हैं, आपकी वास्तविक आत्मा वहां है । यह कितना अद्भुत वक्तव्य है कि आप स्वयं वहां हैं ! जब बिजली की सकारात्मक और नकारात्मक अथवा धनात्मक और ऋणात्मक शक्तियों का पूर्ण वृत्त बन जाता है तभी बिजली के बल्ब से प्रकाश होता है । आपके शरीर में मानो एक डाइनेमो है जो विद्युत-परिपथ के ह्रास की विभिन्नताओं का पता लगाता है, उनकी संपूर्ति करता है और विद्युत-परिपथ परिपूर्ण बनाता है, तभी दोनों ध्रुव समीप आते हैं—और फिर तो, देखिए सामान्य या प्राकृतिक स्थिति का पुनः उद्भव हो जाता है । बस, आनंद, निर्भयता, रचनात्मक शक्ति, स्वयं ईश्वर का प्राकट्य हो गया । यही सही प्राकृतिक आत्मा है और तभी हम कहते हैं कि ''ईश्वर का पुत्र है यह मानव ।''
जब पति-पत्नी मौलिक सिद्धांत में लीन हो जाते हैं, दोनों पूर्ण सत्य में समाहित हो जाते हैं, तभी संपूर्ण संसार विलुप्त हो जाता है । आत्मा उस समय सभी को सन्निहित कर लेती है, सभी जाति-बिरादारी, गोरे-काले का भेद, सभी मत-मतांतर केवल चावल के छोटे दानों के सदृश हो जाते हैं जिनको मृत्यु तराशती है । आत्मा उन सभी दानों को अपने में समाविष्ट कर लेती है, क्योंकि आत्मा ही सृजनात्मक शक्ति है ।
वेदांत कहता है कि इसके विपरीत हम देखते हैं कि जो लोग अज्ञानी हैं और जिन्हें सत्य का पता नहीं है, वे बाह्य भासमान स्वरूपों, मिथ्या पदार्थों के प्रेम-जाल में फंस जाते हैं, आत्मा को तिरस्कृत और अपमानित होते रहने देते हैं और केवल बाह्य आकारों के बारे में सोच-विचार किया करते हैं ।
एक मनुष्य किसी जंगल में एक पुस्तक भूमि पर पड़ी देखता है, तभी बिजली की कड़क होती है, बिजली कौंध जाती है । वह अज्ञानवश सोचता है कि यह बिजली इस पुस्तक के कारण उत्पन्न हुई । उसे अन्यथा नहीं समझाया जा सकता है, क्योंकि उसने दोनों चीजें—पुस्तक और बिजली—एकसाथ देखी थीं । वह सोचता है कि वे दोनों एक-दूसरे के कारण हैं । यही बात उसके मन में समा गई है ।
इस प्रकार व्यक्ति दोनों के मिलन में आनंद की सुखानुभूति देखता है, जबकि तथ्य यह है कि आनंद पुरुष और स्त्री के मिलन से वास्तविक रूप से उत्पन्न नहीं होता है, यह आनंद तो ईश्वर की सत्ता से मिलन की अनुभूति से प्राप्त होता है ।
इस तथ्य का आप क्या उपयोग करते हैं ? आपको तत्क्षण, अभी और यहीं, यह अनुभूति कर लेनी चाहिए कि जब मन को विषय-वासना और सांसारिक पदार्थों से उपराम कर लिया जाता है और जब मन केवल उस एकमात्र आनंद के विचार में ही सोचता है, जो स्वतः एक शक्ति है, जो एक ऊर्जा है, जो सत्यात्मा है, तब आपको अधोगतिवाले मन में उतरने की कोई आवश्यकता नहीं है । उस स्थिति में पतित मन अपने आप लोप हो जाता है ।
यही दिव्य सिद्धांत है, यही दिव्य सत्य है जो सूर्य, चंद्रमा, सर्वशक्ति, अनंतता है, जो देश, काल, कार्यकरण से परे है, जो एक महासागर है, जिसमें सभी पदार्थ ऊंची-नीची लहरों, भंवरों आदि के समान हैं और जिनमें वास्तविक, मौलिक तथा मूलभूत सिद्धांत की प्रतीति परिलक्षित होती है । समस्त शरीर बस महासागर की ऊंची-नीची लहरें और भंवरें हैं, जिनमें विभिन्नता का एकमात्र कारण रूप-रंग के भेद-भाव हैं ।
एक बालक नदी की ओर देखकर चिल्लाता है—''भइया ! देखो तो सही, यहां तक बड़ी लहर उठ रही है ।'' पर वस्तुस्थिति यह है कि वहां जल ही जल है । लेकिन प्रमुखता दी जा रही है लहर को, दृश्य को । बालक तो यही कहता है कि ''मैं तुम्हें लहर दिखाऊंगा ।'' वह यह नहीं कहता है कि ''मैं तुम्हें नदी या जल दिखाऊंगा ।'' बस, सब इसी प्रकार का दृश्य है ।
सत्य यह है कि केवल एक निर्विवाद, अविभाज्य ईश्वर है । सूर्य-चांद, ये शरीर और ये लहरें तो मेरे-तेरे की मानसिकता के सागर में उठती-बैठती रहती हैं । इसी प्रकार मनुष्य अनेकता पैदा करता है जो दृश्यों में, पदार्थों में देखी जाती हैं, जहां शरीर एक-दूसरे से टकराते रहते हैं, लहरें एक-दूसरे से मिलती-बिछुड़ती रहती हैं ।
यदि सुख को केवल पदार्थों के टकराव, पदार्थों के घर्षण और संघर्ष से ही उत्पन्न होना है, तो यह धारणा एक भूल है, भ्रम है ।
वास्तविकता यह है कि वहां आत्मा विद्यमान है, जल विद्यमान है जो उस समय प्रकट होता हुआ मालूम होता है, जिसकी अनुभूति उस समय प्रतीत होती है, जब लहरें टकराती हैं, लहरें घर्षण करती हैं ।
एक वेदांत शास्त्री एक बालक को यह बतलाना चाहता है कि सोना क्या होता है ? इसके लिए वह उसे सोने की एक अंगूठी दिखलाता है । बालक इस पर पूछता है—''क्या सोना गुलाई होता है ?'' उसे उत्तर मिलता है—''नहीं ।'' तब वह पूछता है—''क्या सोना कोई रंग है ?'' नहीं, ऐसा भी नहीं । फिर वह प्रश्न करता है ''तो क्या सोना चिकनापन, भार या वजन है ?'' उसे बताया जाता है कि ऐसा भी नहीं है ।
तब सोना क्या है, यह विचार बालक को किस प्रकार समझाया जाए ? तब उसे सोने की दूसरी चीजें दिखाई जाती हैं । तभी वह उनको देखकर सोने के विचार को निकाल लेता है, सोना क्या है, इसको हृदयंगम कर लेता है, इसकी अनुभूति कर लेता है ।
किसी को जानने के लिए उसे अंतर्निहित गुणों का पता लगाएं, उन गुणों की यथार्थता को जानें और फिर उनको व्यवहार में लाएं ।
एक बार बीरबल से अकबर बादशाह ने पूछा कि नेत्रहीन अथवा दृष्टिवाले व्यक्तियों में किनकी संख्या अधिक है, कौन ज्यादा हैं ? इस पर वाद-विवाद हुआ और यह तय किया गया कि इस प्रश्न को सबूत देकर, साक्ष्य द्वारा सिद्ध किया जाए । अकबर बादशाह ने सोचा कि दृष्टिहीन, अंधे लोग ही अल्पमत में होंगे, परंतु बीरबल अपनी बात सिद्ध करने के लिए कपड़े का एक टुकड़ा उठाकर अपने साथ लाए । उस कपड़े के टुकड़े को उन्होंने अपने सिर पर बांधा और पूछा—''यह क्या है ?'' उत्तर मिला—''सिर की पगड़ी—सिर का साफा ।'' तब उन्होंने वही कपड़ा अपने कंधे पर लटकाया और पूछा—''यह क्या है ?'' उत्तर मिला—''यह शाल है ।'' तीसरी बार बीरबल ने वही कपड़ा अपनी कमर में लपेटा और धोती की तरह पहना, फिर उन्होंने वही प्रश्न किया कि यह क्या है और उत्तर यही दिया गया कि यह धोती है ।
इस पर बीरबल ने कहा—''आप सबके सब अंधे हैं, नेत्रहीन हैं । इनमें से यह टुकड़ा कुछ भी नहीं है जो आप लोगों ने बताया । यह टुकड़ा तो केवल कपड़ा है ।'' नाम-रूप से कपड़ा छिप गया और नाम-रूप ही उभरकर सामने आ गए ।
इसका साक्षात्कार कीजिए कि आत्मा क्या है ? सोने को देखिए, परखिए, इसके लिए उसे तोड़ने की आवश्यकता नहीं है । जब आप पुरुषों, महिलाओं, समुद्र की लहरों, भंवरों, कपड़े के विभिन्न टुकड़ों और सोने की भिन्न-भिन्न वस्तुओं के बारे में सोचते हैं, उस समय आप इन सबके पीछे की वास्तविकता, इन सबके अधिष्ठान के बारे में बिल्कुल विचार ही नहीं करते हैं ।
कृपया यह न कहें कि धर्म विवाह का विरोधी है या विवाह से धर्म का मेल नहीं खाता है । बस, आप ये देखें कि आनंद की वास्तविक स्थिति क्या है ? वास्तविक आत्मा क्या है ? आत्म-साक्षात्कार के जिज्ञासु होने के नाते आपको वास्तविक सत्, चिद्, आनंद अथवा मूल सिद्धांत पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए । जब कभी आप अपनी सत्यात्मा के तादात्म्य से अपनी चेतना को भंग होते देखें, उस समय ध्यानावस्थित हो जाएं, बंधनों के कारण का उन्मूलन करें और सत्य में, वास्तविकता में अपने को डुबो दें, उसमें समा जाएं ।
इसका पूरा परीक्षण कीजिए—''ॐ ! वही मैं हूं ।'' प्रश्न यह है कि ''क्या वही मेरा वास्तविक, मेरा सत्य स्वरूप है ?'' ''क्या मैं वही हूं ?'' यदि मैं वही हूं तो संसार तो पानी का एक बुदबुदा, पानी की छोटी लहर है । फिर मैं क्योंकर उसके पीछे दौड़ता फिरूं ? शारीरिक चेतना में, शरीर के प्रति लगाव में ही इच्छाएं और लालसाएं होती हैं । आप स्वयं से, अपने भीतर मूल सिद्धांत के बारे में वाद-विवाद करें । स्वयं में विचार-विनिमय करें । किसी निष्कर्ष पर पहुंचे । फिर आप देखेंगे कि आपके शारीरिक तंतुओं में से इस निष्कर्ष की इच्छाशक्ति उत्तरोत्तर ऊंची होती जाएगी ।
मस्तिष्क द्वारा इस इच्छाशक्ति का दबाव निरंतर बढ़ता जाएगा और अधिक ऊंचा उठता जाएगा । इच्छाशक्ति की इस प्रक्रिया में वासनाएं स्वाभाविक रीति से हटती जाती हैं और अंततः सभी वासनाओं की विजय भी परे हटती जाती है । ऐसा क्यों होता है ? कारण यह है कि सूर्य के प्रकाश में बिजली के बल्बों की रोशनी प्रकट नहीं होती है, जब केवल अंधेरा होता है तभी बिजली के बल्ब चमकते हैं और प्रकाश फैलाते हैं ।
धीरे-धीरे जब आप सूर्य के तेजोमय प्रकाश में आ जाएंगे, तब इंद्रियजनित सुख दीपक की भांति अपना कोई प्रभाव, अपना कोई आकर्षण नहीं फैला सकते हैं । वासनाओं, इच्छाओं का दुरुपयोग करना और उनको दोष देना अस्वाभाविक है । आप इन वासनाओं को कुचल नहीं सकते हैं, बल्कि इनसे ऊपर उठ सकते हैं और उनको समाप्त कर सकते हैं ।
प्रिय आत्मन् ! वासनाओं को साधन बनाइए, उनका सदुपयोग कीजिए और फिर उनसे ऊपर उठ जाइए । यही विकल्प है ।
विश्व तो स्वयं ही एक अद्भुत चमत्कार है । फिर दूसरे चमत्कारों की क्या आवश्यकता है ? भय ही सब पापों की जड़ है और इस भय का निर्मूल नाश केवल आत्मज्ञान से ही होता है । विशुद्धता का साक्षात्कार कीजिए और स्वयं मूर्तिमान विशुद्धि बन जाइए । किसी अन्य धर्म की शिक्षा देना अस्वाभाविक है ।
हे ईश्वर !
चाहे आओ तुम या चाहे न आओ तुम, पर हो तुम मुझमें ही । दूर रहो या रहो पास । इच्छा तुम्हारी, जहां चाहे वहां रहो, पर हो तुम मुझमें ही, और घूमते-फिरते हो मुझमें ही । नहीं, सच तो यह भी है मैं ही हूं तुममें । आओ, हो जाओ समाहित मुझमें और बनो चिदानंद सागर । मैं तो हूं दाता, याचक रहा कभी भी नहीं । इसलिए, उचित है यही आओ, तुम और बनो भागीदार मेरी प्रकृति के और हो जाओ परिपूर्ण प्रेमानंद में ।
भारत में जिस तर्कसंगत, वैज्ञानिक और प्राकृतिक पद्धति का प्रचलन है, वह यह है कि पत्नी अपने पति की सहायता करती है, उसकी प्रगति में कभी अवरोधक नहीं बनती ।
जब राम ने आत्म-साक्षात्कार कर लिया, उसके बाद भी दो वर्षों तक उसने पारिवारिक जीवन और व्यतीत किया । राम की धर्मपत्नी को वेदांत की शिक्षा दी गई । वह राम के पास फल-फूल, धूप-बत्ती आदि लाती थी और आत्मा में तल्लीन हो जाया करती थीं । वह नतमस्तक होकर पूजा करती थी और तब, उस समय तक राम की ओर निहारा करती थी, जब तक उसके लिए राम का शरीर एक प्रतीकमात्र नहीं बन जाता था । वह 'ॐ' का उच्चारण करती । वह राम में आत्मा की अनुभूति करती और स्वयं में भी ईश्वर ही देखती । वह इस प्रकार के विचारों का ध्यान किया करती थी ।
इस तरह वे दोनों, पति-पत्नी, एक-दूसरे में ईश्वर के ही दर्शन करते रहते थे, एक-दूसरे की सहायता करते थे और आत्मसाक्षात्कार की अनुभूति किया करते थे । राम उसे ऊंचा उठने में सहायता दिया करता था । यह प्रक्रिया कुछ समय तक चलती रही और इसी प्रक्रिया को अपनाते हुए उन्होंने साथ-साथ रहते हुए महीनों व्यतीत किए, पर कोई भी निम्न विचार दोनों के मन को छू तक नहीं सका, दोनों में पूर्ण पारस्परिक सहमति थी, दोनों ही स्वतंत्र और निर्द्वंद्व थे । पति-पत्नी के सभी प्रकार के विचार विलुप्त हो गए थे, कहीं कोई बंधन नहीं था । वह राम को अपने पति के रूप में नहीं देखती थी और न ही राम उसे अपनी पत्नी के रूप में मानते थे ।
पारिवारिक कलह और कष्टों का कारण विचारों की संकीर्णता और अधिकारलिप्सा है । ऐसी स्थिति में ही स्वार्थों का टकराव होता है और वैवाहिक अवरोध उपस्थित होते हैं । वेदांत को समझिए, वेदांत का अनुशीलन कीजिए और निर्द्वंद्व स्वछंद बनिए । तब नाममात्र के संबंध होंगे, पर बंधन कोई नहीं होगा । हर एक को स्वतंत्र होना है । स्वतंत्र होने के लिए ही वह है । इसलिए अपने बाल-बच्चों को, अपने आत्मजों को पूर्ण स्वतंत्रता दीजिए । यह स्वतंत्रता कभी किसी को बिगाड़ती नहीं है । संपूर्ण विश्व स्वर्ग है और ईश्वर को कभी भी धोखा नहीं दिया जा सकता ।
ॐ ! ॐ !! ॐ !!!